यूँ तो हर जीवन महत्वपूर्ण है , पर हमारी सच्ची कीमत वहीँ समझी जाती है जहाँ हमारी प्रतिभा के कद्रदान होते हैं

                                       
मेरी कीमत क्या है ?


 हर माँ अपने बच्चे से मेरा अनमोल रतन कहती है | हर व्यक्ति अपने परिवार के लिए बेशकीमती होता है, पर दुनिया उसे ऐसा नहीं मानती है | हर चीज को तोल -मोल कर खरीदने वाली दुनिया की नज़र में इंसान की भी कीमत है | ऐसे में अगर एक बच्चा अपने दादाजी के पास पूंछने चला जाता है कि मेरी कीमत क्या है? तो आश्चर्य की क्या बात है | एक प्रेरणादायक कहानी -

प्रेरक कथा - मेरी कीमत क्या है ?



एक बच्चा जो रोज अपने बड़ों को चीजों को कीमत के अनुसार खरीदते हुए देखता था , उसने एक दिन अपने दादाजी से पूंछा ," दादाजी , दादाजी , मेरी कीमत क्या है ? दादाजी  उस समय बागवानी कर रहे थे , उनकी नज़र बाग़ में पड़े एक पत्थर पर थी | वो उसे  हाथो में उठा कर बहुत देर से देख रहे थे | बच्चे का प्रश्न सुन कर उन्होंने वो पत्थर अपने पोते को देते हुए कहा कि जाओ ये  पत्थर मार्किट में  ले जाओ और लोगों को दिखाओ , कोई इसे खरीदने को कहे तो कुछ बोलना नहीं बस दो अंगुली दिखा देना , वो जितनी कीमत बताये उसे आ कर मुझे बताना |


बच्चा वहां जा कर खड़ा हो गया | एक औरत ने उसे देखा | उसने बच्चे से पूंछा तुम क्या ये पत्थर बेचने आये हो | बच्चे ने हाँ में सर हिलाया | वो बहुत देर तक उस पत्थर को देखती रही फिर बोली इस पत्थर को मैं  खरीदूंगी | मैं से अपनी सेंटर टेबल पर रखी प्लेट में और पत्थरों के साथ रखूंगी | इससे मेरी सेंटर टेबल की ख़ूबसूरती बढ़ जायेगी | तुम्हें इसके लिए कितने पैसे चाहिये?

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बच्चे ने दादाजी के कहे अनुसार दो अंगुलियाँ दिखा दी | महिला ने हंस कर कहा ... ओह , ठीक है मैं तुम्हे इसके दो रूपये दूँगी | बच्चा पत्थर ले कर दादाजी के पास चला आया और उन्हें सारी बात बताई |


दादाजी  ने कहा ," अब मैं चाहता हूँ कि तुम इस पत्थर को म्यूजियम में ले जाओ |कोई इसकी कीमत पूंछे तो बस दो अंगुलियाँ दिखाना |


बच्चा पत्थर ले कर भागता हुआ म्यूजियम चला गया | वहां  वह उस पत्थर को लेकर खड़ा हो गया | वहां कई आदमियों ने उस पत्थर को देखा | एक आदमी ने खरीदने की इच्छा जाहिर करी और उस बच्चे से उसकी कीमत पूँछी | बच्चे ने कुछ कहा नहीं बस दो अंगुलियाँ दिखा दी | आदमी ने कहा ठीक है , मैं इसके लिए तुम्हें २०० रुपये दूंगा | बच्चा फिर पत्थर ले कर दादाजी के पास आ गया |


दादाजी ने कहा अब बस आखिरी बार मैं तुम्हे ये पत्थर ले कर शहर की सबसे प्रसिद्द ज्वेलरी शॉप में  भेज रहा हूँ , पर वहां भी तुम्हें बस अंगुलियाँ दिखानी हैं , कुछ बोलना नहीं है | बच्चा पत्थर ले कर चला गया | वहां उसने वो पत्थर दूकान के मालिक को दिखाया | दुकान का मालिक पत्थर देख कर बोला ," अरे ये तो बहुत दुर्लभ पत्थर है , ये तुम्हें कहाँ से मिला ? मैं इसे लूँगा , तुम्हे इसकी कितनी कीमत चाहिए |

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बच्चे ने फिर दो अंगुलियाँ दिखा दी | दुकान के मालिक ने कहा ," मैं इसे २००००० रुपये में लूँगा | बच्चा आश्चर्य चकित हो गया | वो फिर पत्थर ले कर दौड़ता हुआ घर आया | उसने दादाजी को पत्थर देते हुए सारी घटना बतायी |


दादाजी बोले ," बेटा क्या अब तुम्हें समझ आ गया कि तुम्हारी कीमत क्या है ?

 हम सबके अन्दर एक कीमती हीरा है , लेकिन अगर तुम अपने को ऐसे लोगों से घिरा रखोगे जो तुम्हे केवल दो रुपये का समझते हैं तो तुम जिंदगी भर अपने को दो रूपये का समझते रहोगे | इसलिए अपनी प्रतिभा का विकास करते हुए ऐसे स्थान पर जाओ जहाँ लोगो की नज़र में तुम बेशकीमती हो , वहीँ तुम्हारी कद्र होगी और वहीँ पर तुम अपने जीवन की सही वैल्यू  पाओगे | इसलिए याद रखना कि हर कोई बेशकीमती है बस फर्क हमारे आस -पास के लोगों के नज़रिए का होता है |


अब बच्चे को अपनी कीमत समझ आ गयी थी |

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एक नज़र अपनी कीमत पर - 




मित्रों अब जरा इसे अपने ऊपर रख कर समझिये | मान लीजिये आपको बागवानी बहुत अच्छे से आती है , लेकिन आप ऐसे मुहल्ले में रहते हैं जहाँ किस के पास लॉन तो छोडिये गमला रखने का भी स्थान नहीं है | अब आप लाख बताते रहे कि इस पौधे में ये खाद पड़ती है , वो बेल ऐसे लगती है , ये पौधा अब फल देता है , लोग आपकी बात सुनेगे ही नहीं , उन्हें लगेगा आप किताब से पढ़ कर ज्ञान झाड़ते हैं और उनका समय बर्बाद करते हैं | , उनका समय कीमती है और आप फ़ालतू हैं इसलिए बस गप्प हांकते हैं |


अब राधा और सोनिया को ही लें | राधा  और सोनिया दोनों कोखाना बनाने का शौक था | दोनों अक्सर नयी -नयी डिश बना कर देखती | बड़े होने पर राधा ने एक होटल में और सोनिया ने एक हॉस्पिटल में कुक की नौकरी शुरू कर दी | राधा जब भी नयी डिश बनती , या पुरानी डिश को अच्छे से सजाती उसे खूब वाहवाही मिलती | उसका काम लोगों को और होटल के मालिक को नज़र आने लगा | उसकी तनख्वाह बढ़ने लगी | कुछ समय बाद उसने उससे बड़े होटल में नौकरी शुरू कर दी ... फिर उससे बड़े .. | सोनिया मरीजों के लिए खाना बनाती | उसे ज्यादातर मूंग की दाल की खिचड़ी , दलिया , दाल का पानी बनाना पड़ता | क्योंकि मरीजों को भूंख नहीं लगती वो उसके खाने में कमी निकालते ( हमने भी अपने घरों में ऐसे  बुजुर्ग देखे हैं जो बीमार होने पर घर की औरतों को दोष देते हैं कि खाना ठीक नहीं बना है )| इसके अतिरिक्त जब वो कुछ  नया बनाती तो मरीज कहते इस कारण से उन्हें लूज मोशन या  अपच हो गया है | सोनिया की रूचि खाना बनाने में कम होने लगी | वो अब बस मरीजी खाना ही बेमन से बनाती और तनख्वाह लेती | उसकी तनख्वाह भी नहीं बढ़ी और उसकी भोजन बनाने कला भी वहीँ रुक गयी |


बहुत सी लेखिकाओं की शिकायत सुनी है कि वो एक उम्र बीत जाने के कारण लेखन में इसलिए आई क्योंकि उनके घर में किसी को साहित्यिक अभिरुचि नहीं थी , जिस कारण उनकी कविता या कहानी को अव्वल तो कोई सुनता नहीं और अगर सुन लेता तो मजाक उड़ा  देता | लेकिन हिम्मत कर के जब वो सार्वजानिक लेखन में आयीं तो उन्होंने  पाया कि उनके लेखन को बहुत से लोग पसंद करते हैं |आज वो साहित्य जगत में अपना मुकाम बना चुकी हैं और लोग उनकी किताबें खरीद कर पढ़ते हैं और उससे प्रेरणा लेते हैं | अगर वो घर में रहती तो उनका लेखन दो कौड़ी का समझा जाता |


बहुत समय पहले बिहारी ने इसी पर दोहा लिखा था ...

कर ले सूंघ , सराही के सबिन धरें रही मौन गंधी , गंध गुलाब को गंवई गाहक कौन ||



                                कहने का तात्पर्य बस इतना है कि हम सब को ईश्वर ने कुछ न कुछ प्रतिभा दी है | आप अपनी प्रतिभा का विकास करिए और उन लोगों बीच जाइए जो वास्तव में इसकी कीमत समझते हैं | तभी आप को महसूस होगा कि आप का जीवन भी कीमती और सार्थक है |


अटूट बंधन परिवार


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Atoot bandhan

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