May 2018
दो लोग विवाह के बंधन में बंध एक प्यार भरी गृहस्थी की शुरुआत करते हैं | उनकी बगिया में उगा एक नन्हा फूल उन्हें और करीब ले आता है | फिर ऐसा क्या हो जाता है कि दूरियाँ बढ़ने लगती है | बसी -बसायी गृहस्थी टूटने लगती है ... जिसकी गूँज दूर -दूर तक सुनाई पड़ने लगती है |



टूटती गृहस्थी की गूँज




टूटती गृहस्थी की गूँज

गुलाब एक मल्टीनेशनल कंम्पनी मे इंजीनियर के पद पर था। अच्छा पैकेज था। सब ओर खुशहाली थी। एकाएक कम्पनी ने छंटनी करनी शुरू कर दी। गुलाब भी इससे अछूता ना रह सका। तजुर्बेकार इंजीनियरो को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। गुलाब की गृहस्थी मे तूफान आ गया था। सब गडबडा गया था। नयी नौकरी मिलनी आसान नही थी वो भी मनपसन्द।। इन्टव्यू देता गुलाब पर कोई ना कोई कमी निकल आती। यूं ही हर दम खाली आते आते वह नकारात्मकता से घिरने लगा था। एक डर सा बैठने लगा था। प्रतिभाशाली होते हुऐ भी उसके भीतर एक डर घर कर गया था। दोस्तो की राय भी निराधार साबित हो रही थी। भगवान का ध्यान करता। पर चैन नही मिल रहा था। हर दम परेशान रहने लगा। खाने मे भी कुछ ना भाता,,, हां गुस्सा बढ चला था।। हरदम चिडचिडा सा रहता। अवसाद मे पडा पडा बुरा ही सोचता।


जब से कम्पनी ने रिलीव करदिया तब तो बस घर जाने की सोचता कम्पनी मे काम के वास्ते वो अपने घर से 200 किलोमीटर की दूरी पर किराये के मकान मे रह रहा था। अब कया करे? अब तो उसने अपना बैग उठाया और घर आ गया। जिन माता पिता को वो मिस कर रहा था उनसे मिलकर अपनी व्यथा बताकुछ सुकून पा गया था। इधर पत्नी अपनी नौकरी हेतु अपने मायके जाकर जम गयी थी। छह माह की छोटी बेटी इन दोनो सेअलग थलग पड़ गयी थी। वो दोनो की आंख की तारा थी पर इन हालातो मे वो नानी की गोद मे थी। चूकि पत्नी का मायका बीच शहर मे था। इसीलिये पत्नी को ज्यादा परेशानी नही थी। पर बिना नोकरी गुलाब क्या करता उस शहर मे? उसने पत्नी को भी अपने संग ले जाना चाहा पर ये क्या।,,,, उसने एक दम मना कर दिया। गुलाब; -तुम चलो मेरे साथ पत्नी :- मै कैसे चलूगी,, मेरी नौकरी है यहां। गुलाब :- कौन सी पक्की नौकरी है? ऐसी तो वंहा भी मिल जायेगी। पत्नी :- नही नहीमै बिल्कुल पंसन्द नही करती आपके परिवार को। ना मै वंहा गुजारा कर पाऊगी। गुलाब:- मै यहां अकेला क्या करूंगा? खाली घर खाने को दोडता है मुझे? पत्नी :- मुझे नही पता पर मै नही जाऊगी आपके साथ ये बात पक्की है।

छोटी सी फूल सी बेटी जिसे गुलाब खिलाना चाहता था संग रख प्यार देना चाहता था मजबूरी उसे छोड अपने घर लौट आया था। पर तनाव मे रहने लगा। पर पत्नी को कोई सरोकार ना था,,, उसे केवल अपनी इच्छाओ,, व आकांक्षो की फिक्र थी। ससुराल परिवार केलिये जो उसकी जिम्मेवारी थी,,, पति के लिये सहयोग भावना इन सब से दूर दू र तक कुछ लेना देना ना था।

जिस पति ने उसका इतना साथ दिया था अब जब उसे पत्नी की जरूरत थी एक अच्छी राय चाहिये थी मनोबल बढाने की। उस समय वो नही थी। वो चाहती थी मेरा पति भी अपने घर ना जाये यही रहे मुझे सहयोग दे। पर पुरूष, की ईगो नारी की ईगो पर भारी थी। अपनी बच्ची के बिना यहां भी मन नही लग रहा था पर वहां भी नही रूक सकता था क्योकि ससुराल वालो का हस्तक्षेप जारी था। माता पिता की शह मे पत्नी ने पति को छोड मायके के प्रति ज्यादा जवाबदेही थी। अपने लिये पत्नी की इस भावना ने गुलाब के दिल मे नफरत भर दी थी। उसे कोई फर्क नहीपढता था गुलाब की नौकरी लगी या नही। पत्नी के इस व्यवहार से गुलाब परेशान रहने लगा। कई बार वो चिल्ला कर कहता_ _मेरा तो औरत जात से ही विश्वास उठ चला है__ऐसी होती है पत्नी। पति मरे या जीये उसे फर्क ही नही पढता। मै अब ऐसी औरत के संग नही रह सकता। जिसे सिर्फ मेरे पैसे से प्यार था मुझसे नही।

इधर पत्नी मस्त थी अपने घर। उसने एक मास से एक फोन तक करके नही पूछा कि जॉब का क्या रहा?, इधर गुलाब पल पल टुट रहा था उसे अपनी टूटती गृहस्थी की गूंज साफ सुनाई दे रही थी जिसे वो टूटने नही देना चाहता था। वो चाहता था बस एक बार मेरी अच्छी सी नौकरी लग जाये वह सबकुछ ठीक हो जाये और मै फिर से उंचे मुकाम पर पहुंच जाऊ। इसी कशमकश मे घिरा, गुलाब फिर एक नये इन्टरव्यू की तैयारी मे जुट गया।।

रीतू गुलाटी


लेखिका


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जीवन में खोना व् पाना तो लगा रहता है | जिसके अन्दर आत्मविश्वास होता है  उसे खोने का डर नहीं होता | और शायद इसी कारण कोई आत्मविश्वास के धनी व्यक्ति को कुछ खो जाएगा का डर दिखा कर शोषित नहीं कर पाता | एक ऐसी ही महिला की कहानी ...

                       
                                 आत्मविश्वास


आत्मविश्वास 


बाईस वर्ष की माया सुन्दर तेज तर्रार तीखे नैन नक्श गोरा रंग। पोस्ट गैजुऐट आत्मविशवास से लबरेज युवती ने सीनियर सैं स्कूल मे सीनियर टीचर हेतु आवेदन किया। उसकी कार्य क्षमता से प्र्भावित होकर मुख्याध्यापक ने उसे मनपसंद विषय पढाने को दे दिये। माया भी खुश थी व बडी लगन से अपने काम को कर रही थी। सब कुछ ठीक चल रहा था।

पर.... भीतर ही भीतर मुख्याध्यापक की बुरी नजर माया पर पड़ चुकी थी।


वो उसे अकसर छुट्टी के बाद बहाने से रोकने लगा था। कभी किसी मीटिगं के बहाने अथवा कोई ओर काम,,,। शुरू शुरू मे तो माया उनके कहने से रूक गयी थी। पर एकदिन तो हद हो गयी जब एकान्त का फायदा उठाकर मुख्याध्यापक ने माया को अपनी आगोश मे ले लिया और उसका मुँह चूमने लगा। उसकी इस हरकत से माया आगबबूला हो गयी।


तभी उसने माया से माफी मांग ली।


अब माया चौकंनी हो गयी थी। भीतर ही भीतर वो कुछ फैसला ले चुकी थी। तीसरे दिन फिर मुख्याध्यापक ने जैसे ही माया को अकेला पाया वो फिर सारी हदे पारकर गया।


माया ने आव देखा ना ताव खीचकर एक तमाचा सारे स्टाफ के सामने मुख्याध्यापक के मुंह पर दे मारा। पहले से ही पर्स मे रखे त्यागपत्र को मुख्याध्यापक के मुंह पर दे मारा।

जोर से चिल्लाकर माया बोली..... मै यहां ज्ञान बांटने आयी थी,,,, अपना शरीर नही... कहकर तेजी से बाहर निकल गयी।


रीतू गुलाटी



लेखिका


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अनेक महापुरूषों के निर्माण में नारी का प्रत्यक्ष या परोक्ष योगदान रहा है। कहीं नारी प्रेरणा-स्रोत तथा कहीं निरन्तर आगे बढ़ने की शक्ति रही है। भारतवर्ष में प्राचीन काल से ही नारी का महत्व स्वीकार किया गया है। हमारी संस्कृति का आदर्श सदैव से रहा है कि जिस घर नारी का सम्मान होता है वहाॅ देवता वास करते हंै। भारत के गौरव को बढ़ाने वाली ऐसी ही एक महान नारी लोकमाता अहिल्या बाई होल्कर हैं | 



31 मई को महारानी अहिल्या बाई होल्कर की जयन्ती के अवसर पर विशेष लेख


अहिल्याबाई होलकर का जन्म 31 मई, 1725 को औरंगाबाद जिले के चैड़ी गांव (महाराष्ट्र) में एक साधारण परिवार में हुआ था।इनके पिता का नाम मानकोजी शिन्दे था और इनकी माता का नाम सुशीला बाई था। अहिल्या बाई होल्कर के जीवन को महानता के शिखर पर पहुॅचाने में उनके ससुर मल्हार राव होलकर मुख्य भूमिका रही है।


 लोकमाता अहिल्या बाई होल्कर
फोटो क्रेडिट -विकिमीडिया कॉमन्स


देवी अहिल्या बाई होल्कर ने सारे संसार को अपने जीवन द्वारा सन्देश दिया कि हमें दुख व संकटों में भी परमात्मा का कार्य करते रहना चाहिए। सुख की राह एक ही है प्रभु की इच्छा को जानना और उसके लिए कार्य करना। सुख-दुःख बाहर की चीज है। आत्मा को न तो आग जला सकती है। न पानी गला सकता है। आत्मा का कभी नाश नही होता। आत्मा तो अजर अमर है। दुःखों से आत्मा पवित्र बनती है। 

                

मातु अहिल्या बाई होल्कर का सारा जीवन हमें कठिनाईयों एवं संकटों से जूझते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की प्रेरणा देता है। हमें इस महान नारी के संघर्षपूर्ण जीवन से प्रेरणा लेकर न्याय, समर्पण एवं सच्चाई पर आधारित समाज का निर्माण करने का संकल्प लेना चाहिए। अब अहिल्या बाई होल्कर के सपनों का एक आदर्श समाज बनाने का समय आ गया है। मातु अहिल्या बाई होल्कर सम्पूर्ण विश्व की विलक्षण प्रतिभा थी। समाज को आज सामाजिक क्रान्ति की अग्रनेत्री अहिल्या बाई होल्कर की शिक्षाओं की महत्ती आवश्यकता है। वह धार्मिक, राजपाट, प्रशासन, न्याय, सांस्कृतिक एवं सामाजिक कार्याे में अह्म भूमिका निभाने के कारण एक महान क्रान्तिकारी महिला के रूप में युगों-युगों तक याद की जाती रहेंगी।


पहाड़ से दुखों के आगे भी नहीं टूटी अहिल्याबाई होलकर 



 माँ अहिल्या बाई होल्कर ने समाज की सेवा के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। उन पर तमाम दुःखों के पहाड़ टूटे किन्तु वे समाज की भलाई के लिए सदैव जुझती रही। वे नारी शक्ति, धर्म, साहस, वीरता, न्याय, प्रशासन, राजतंत्र की एक अनोखी मिसाल सदैव रहेगी। उन्होंने होल्कर साम्राज्य की प्रजा का एक पुत्र की भांति लालन-पालन किया तथा उन्हें सदैव अपना असीम स्नेह बांटती रही। इस कारण प्रजा के हृदय में उनका स्थान एक महारानी की बजाय देवी एवं लोक माता का सदैव रहा। अहिल्या बाई होल्कर ने अपने आदर्श जीवन द्वारा हमें सबका भला जग भलाका संदेश दिया है। गीता में साफ-साफ लिखा है कि आत्मा कभी नही मरती। अहिल्या बाई होल्कर ने सदैव आत्मा का जीवन जीया। अहिल्या बाई होल्कर आज शरीर रूप में हमारे बीच नही है किन्तु सद्विचारों एवं आत्मा के रूप में वे हमारे बीच सदैव अमर रहेगी। हमें उनके जीवन से प्रेरणा लेकर एक शुद्ध, दयालु एवं प्रकाशित हृदय धारण करके हर पल अपनी अच्छाईयों से समाज को प्रकाशित करने की कोशिश निरन्तर करते रहना चाहिए। यही मातु अहिल्या बाई होल्कर के प्रति हमारी सच्ची निष्ठा होगी। मातु अहिल्या बाई की आत्मा हमसे हर पल यह कह रही है कि बनो, अहिल्या बाई होल्कर अपनी आत्मशक्ति दिखलाओ! संसार में जहाँ कही भी अज्ञान एवं अन्याय का अन्धेरा दिखाई दे वहां एक दीपक की भांति टूट पड़ो।

                मातु अहिल्या बाई होल्कर आध्यात्मिक नारी थी जिनके सद्प्रयासों से सम्पूर्ण देश के जीर्ण-शीर्ण मन्दिरों, घाटों एवं धर्मशालाओं का सौन्दर्यीकरण एवं जीर्णोद्धार हुआ। देश में तमाम शिव मंदिरों की स्थापना कराके लोगों धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया। नारी शक्ति का प्रतीक महारानी अहिल्या बाई होल्कर द्वारा दिखाये मार्ग पर चलने के लिए विशेषकर महिलाओं को आगे आकर दहेज, अशिक्षा, फिजुलखर्ची, परदा प्रथा, नशा, पीठ पीछे बुराई करना आदि सामाजिक कुरीतियों का नाम समाज से मिटा देना चाहिए। जिस तरह अहिल्या बाई होल्कर एक साधारण परिवार से अपनी योग्यता, त्याग, सेवा, साहस एवं साधना के बल पर होल्कर वंश की महारानी से लोक नायक बनी उसी तरह समाज की महिलाओं को भी उनके जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए।


मातु अहिल्या बाई होल्कर सम्पूर्ण राष्ट्र की लोक माता है। जिस तरह राम तथा कृष्ण हमारे आदर्श हैं उसी प्रकार लोकमाता आत्म रूप में हमारे बीच सदैव विद्यमान रहकर अपनी आत्म शक्ति दिखाने की प्रेरणा देती रहेगी। लोक माता अहिल्या बाई होल्कर की आध्यात्मिक शक्तियों से भावी पीढ़ी परिचित कराना चाहिए। 

                लोकमाता अहिल्या बाई होलकर ने अपने कार्यो द्वारा मानव सेवा ही माधव सेवा है का सन्देश सारे समाज को दिया है। अहिल्या बाई होल्कर के शासन कानून, न्याय एवं समता पर पूरी तरह आधारित था। कानूनविहीनता के इस युग में हम उनके विचारों की परम आवश्यकता को स्पष्ट रूप से महसूस कर रहे है। मातेश्वरी अहिल्या बाई होल्कर के शान्ति, न्याय, साहस एवं नारी जागरण के विचारों को घर-घर में पहुँचाने के लिए सारे समाज को संकल्पित एवं कटिबद्ध होना होगा। आइये, हम और आप समाज के उज्जवल विकास के लिए देवी अहिल्याबाई के सब का भला - अपना भलाके मार्ग का अनुसरण करें। अहिल्या बाई होलकर अमर रहे।


अहिल्याबाई होलकर के जीवन के कुछ प्रसंग 


               
                            होलकर वंश के मुख्य कर्णधार श्री मल्हार राव होलकर का जन्म 16 मार्च, 1693 में हुआ। इनके पूर्वज मथुरा छोड़कर मराठा के होलगाॅव में बस गये। इनके पिताश्री खण्डोजी होलकर गरीब परिवार के थे इसलिए मल्हार राव होलकर को बचपन से ही भेड़ बकरी चराने का कार्य करना पड़ा। अपने पिता के निधन के पश्चात् इनकी माता श्रीमती जिवाई को अपने बेटे का भविष्य अन्धकारमय लगने लगा। और वह अपने पुत्र को लेकर अपने भाई भोजराज बारगल के यहाॅ आ गयी। अब वह अपने मामा की भेड़े चराने जंगल में जाने लगे। एक दिन बालक के थक जाने पर उसे नींद आ गयी तो पास के बिल से एक सांप ने आकर अपने फन से उनके मुख पर छाया कर दी। जिसे देखकर उनकी माता काफी डर गयी परन्तु सांप बिना कोई हानि पहुॅचायें अपने बिल में पुनः वापिस चला गया। इस घटना के बाद उनसे भेड़ चलाने का काम छुड़ा दिया और उन्हें सेना में भर्ती करा दिया गया। सेना में भर्ती होने के बाद से उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और वे अत्यन्त साहसी और वीर योद्धा रहे।

                
एक दिन मल्हार राव होलकर चैड़ी गांव से होकर जा रहे थे। रास्ते में पड़ने वाले शिव मंदिर में विश्राम करने के लिए रूके, तो उन्होंने उस मंदिर में अहिल्या बाई की सादगी, विनम्रता और भक्ति का भाव देखकर काफी प्रभावित हुए। अहिल्या बाई मंदिर में जाकर प्रतिदिन पूजा करती थी। मल्हार राव ने उसी समय उन्हें पुत्र वधु बनाने का निर्णय लिया और सन् 1735 में उनका विवाह खण्डेराव होलकर के साथ सम्पन्न हुआ। विवाह के पूर्व खण्डेराव होलकर काफी उदण्ड एवं गैर जिम्मेदार थे परन्तु विवाह के बाद राजकाज में रूचि लेनी शुरू कर दी। उनके कार्य व्यवहार में काफी बदलाव आ गया


सन् 1745 में पुत्र मालेराव एवं 1748 में पुत्री मुक्ताबाई का जन्म हुआ। मल्हार राव होलकर अपनी पुत्र वधु को अपनी बेटी की तरह ही मानते थे और उन्हें सैनिक शिक्षा, राजनैतिक, भौगोलिक तथा सामाजिक कार्यो में साथ रखते तथा सहयोग भी करते थे। इसी प्रकार कुशल जीवन व्यतीत हो रहा था कि अचानक 1754 में जाटों के साथ युद्ध भूमि में खण्डेराव होलकर वीर गति को प्राप्त हुए। इस शोक का समाचार अहिल्या बाई एवं मल्हार राव होलकर सुनकर एकदम टूट गये। क्योंकि अहिल्या बाई परम्परा के अनुसार सती होने जा रही थी। इस पर मल्हार राव होलकर ने अपनी पुत्र वधू से अनुरोध किया कि बेटी मेरा जीवन तेरे निर्णय पर ही आधारित है। क्योंकि मेरा बेटा तू ही है, अगर लोक लाज के डर से तू सती हो गयी तो इस बुढापे में मुझे और इतने बड़े राज्य को कौन सम्भालेगा। क्या मैंने इसलिए तुझे अपना बेटा और बेटी का प्यार दिया है। इस अनु-विनय को ध्यान में रखते हुए। उन्होंने सती न होकर राज्य/सामाजिक कार्यो में रूचि लेने का निर्णय लिया और सादगीपूर्ण ढंग से देश की सेवा का संकल्प कर 23 अगस्त, 1766 में अपने पुत्र मालेराव का राजतिलक कर दिया परन्तु वह एक सुयोग्य शासक नहीं बन सके क्योंकि अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाहन सही ढंग से नहीं कर रहे थे। जिससे प्रजा खुश नहीं थी। कुछ दिनों बाद युवराज को बुखार आ जाने के कारण उनकी हालत दिन पर दिन बिगड़ने लगी और काफी उपचार करने के पश्चात् भी वे ठीक न हो सके। 22 वर्ष की आयु में ही उनका निधन हो गया। उन्होंने मात्र 10 माह शासन किया अपने पति व पुत्र की मृत्यु को देखकर दुःखी रहने लगी।


               
इसी प्रकार के बहुत से रोचक प्रसंग इतिहास में वर्णित है लोकमाता देवी अहिल्या बाई ने सबसे अधिक धार्मिक स्थलांे का निर्माण कराया। इसके अतिरिक्त अन्य होलकर शासकों ने भी बहादुरी के साथ सराहनीय कार्य किये। जैसे- महाराजा तुकोजी राव होलकर ने सामाजिक सुधार के अनेक नियम बनायें। कानून का अध्ययन किया और उसके पश्चात् हिन्दू विधवा-पुर्न विवाह, एकल विवाह कानून, बाल विवाह प्रतिबन्धक कानून लागू कराया एवं प्रजा को रूढ़ियों से मुक्त भी कराया। इनके प्रथम पुत्र महावीर जशवंत राव होलकर भी साहसी और पराक्रमी थे। उन्होंने जाट राजा रणजीत सिंह के साथ मिलकर 18 दिनों तक अंग्रेजों से युद्ध किया तथा अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिये। इनका मुख्य उद्देश्य अंग्रेजी हुकुमत से मुक्ति तथा हिन्दू धर्म को संरक्षण दिलाना था। इतिहासकारों के अनुसार 26 मई, 1728 से 16 जून, 1948 तक होलकरों का शासन काल रहा है। अर्थात कुल 220 वर्ष 22 दिन होलकरों ने शासन किया।

प्रदीप कुमार सिंह
रायबरेली रोड, लखनऊ


लेखक


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  FILED UNDER-    Ahilya bai Holkar  ,  biography of Ahilya bai Holkar  , GREAT WOMAEN

                                 
   हम सब चाहते हैं कि हमारे सभी रिश्ते अच्छे चले , चाहते न चाहते कुछ रिश्तों में खटास आ ही जाती है | कई बार उन रिश्तों को सँभालने की कोशिश भी करते हैं पर खाई बढती ही जाती है और एक दिन वो अजीज रिश्ता इतनी दूर हो जाता है कि  लाख कोशिश करके भी उसे पहले जैसा नहीं बनाया जा सकता | आप को ये जान कर आश्चर्य होगा कि रिश्तों में यह दूरी हमारे  लगातार उस रिश्ते के बारे में नकारात्मक सोचने के कारण आती है |

आप के रिश्तों पर होता है आपके सोचने का असर

 आप के रिश्तों पर होता है आपके सोचने का असर        

                              एक बार एक महिला ने सुबह उठ कर बड़े प्यार से अपने पति के लिए नाश्ते में कई चीजे बनायीं | पति जो बहुत व्यस्त  रहते थे | जल्दी -जल्दी से उठे  नहाना धोना कर के नाश्ते की टेबल पर पहुंचे वहां अखबार के साथ जल्दी -जल्दी नाश्ता मुंह में ठूंस कर  बैग उठा ऑफिस जाने लगे | पत्नी जिसने बड़े प्यार से नाश्ता बनाया था  और प्रतीक्षा कर रही थी कि पति तारीफ़ के दो शब्द कहेंगे | पर पति ने कुछ नहीं कहा तो उसने ही आगे बढ़ कर पूँछ लिया , जरा उनका संवाद पर गौर करिए ...
पत्नी - "क्यों , नाश्ता कैसा बना था ?"
पति :  ऊऊ ... क्या बनाया था आज नाश्ते में ?
पत्नी : लो , मैंने सुबह चार बजे उठ कर इतनी मेहनत कर के नाश्ता बनाया , कुछ कहना तो दूर आप को ये तक याद नहीं है कि क्या बना था , जबकि आप ने खा भी लिया | 
पति : दिमाग पर जोर देते हुए बोला .... अच्छा अच्छा वो ... हां ठीक बना था , पर मेरी माँ का ज्यादा अच्छा बनता है |

कह कर पति तो चला गया और ऑफिस के काम में भूल गया पर पत्नी दिन भर बैठ कर वही सोचती रही ,  "मैंने इतनी मेहनत से बनाया उन्होंने देखा तक नहीं क्या बना है , तारीफ के दो शब्द भी नहीं कहे ऊपर से कहते हैं , माँ ज्यादा अच्छा बनाती हैं , तो जाएँ न वहीं खाएं , माँ के हाथ का पसंद है तो मुझसे क्यों  मेहनत करवाते हैं | मेरी इस घर में तो कोई कदर ही नहीं है |मैंने इनके लिए क्या -क्या नहीं किया | नौकरी छोड़ी , घर में नौकरानी बनी पर इनको तो मेरी कद्र ही नहीं | "


तभी उसकी बहन का फोन आ गया | उसने सारी बातें अपनी बहन को बतायी | उसकी बहन ने भी हाँ में हां मिलाई | अब तो उस स्त्री को पूरा विश्वास हो गया कि वो सही सोच रही थी | उसके पति को उसकी कदर नहीं है वह बस उसे घर में नौकरानी बना कर लाया है | काफी देर तक वो रोई उसने खाना भी नहीं खाया |


शाम को जब उसका पति घर आया तब तक वो सारी  बात भूल चुका था , पर पत्नी का मूड ऑफ था | पति ने डिनर के समय पत्नी से पूंछा ,  " क्या बात है , इतना मूड क्यों ऑफ़ है ?
पत्नी गुस्से से फट पड़ी , " अच्छा तो अब आप को पता ही नहीं कि मेरा मूड क्यों ऑफ़ है | क्या ये भी मुझे बताना पड़ेगा | मैंने तो आपके लिए नौकरी छोड़ी पर आप को सिर्फ अपनी नौकरी की कद्र है | मेरी तो कोई कद्र ही नहीं है | मैं तो बेकार हूं |

झगडा शुरू हो गया , और दोनों बिना खाए सो गए | कई दिन तक बातचीत बंद रही | फिर घर गृहस्थी के कामों के कारण बातचीत तो शुरू हुई पर एक गाँठ तो पड़ ही गयी थी |


ऐसी न जाने हम कितनी गांठे अपने रिश्तों में डालते रहते हैं  और अकेले होते चले जाते हैं |


मित्रों , ये कहानी हमने ब्रह्म कुमारी शिवानी जी के प्रवचन से ली है | उपरी तौर पर इस कहानी में पति की गलती लगती है , हम कह सकते हैं कि उसे ऐसा नहीं बोलना चाहिए था , पर ये भी हो सकता  है कि जल्दी की वजह से उसे ध्यान ही न रहा हो कि उसने क्या खाया | क्या ये स्वाभाविक नहीं है | या फिर ये भी हो सकता है कि उसे अपनी माँ के हाथ की बनायीं वो डिश ज्यादा पसंद हो | तब तो उसने सच ही बोला |


                        उसे ऐसे कहना चाहिए था या नहीं इस पर तर्क हो सकते हैं , फिर भी पति ने सिर्फ एक बात कही और पत्नी ने अपने खिलाफ पूरे दिन हजारों बातें कही |

1) मेरी मेहनत की तो किसी को कद्र ही नहीं है |
2)मुझे नौकरानी समझ रखा है |
3) मैंने उनके लिए क्या -क्या किया और उन्होंने ऐसे कहा ... ऐसे
4) अगर मैं भी नौकरी कर रही होती तो मैं भी इनकी किसी प्यार भरी बात पर ध्यान न दे कर बदला ले लेती , पर मैं तो घर में हूँ , बेकार हूँ |
5) हमेशा माँ से मेरी तुलना करते रहते हैं ... उन्हीं के  पास रहे ...

                                                                                        ये सारी  बातें एक कैसिट  की तरह रिवाइंड हो -हो कर उसके दिमाग में चलती रहीं |हजारों  बार खुद को कोसने से उसका स्वमान  कम हुआ | मित्रों , क्या ये हम सब के घर की कहानी नहीं है |

तस्वीर पलट कर देखिये 


अब तस्वीर का दूसरा रुख देखिये | वो महिला ऐसे भी सोच सकती थी |

 1)मैंने अच्छा नाश्ता तैयार करके अपना प्यार दिखा दिया है | जरूरी नहीं वो तारीफ करें या मेरे सोचे तरीके से ही अपना प्यारा  दिखाए | वो अपने तरीके से अपना प्यार  दिखाएँगे |

2) उनको अगर अपनी माँ के हाथ का खाना ही अच्छा लगता है तो कोई बात नहीं ... ये उनकी निजी पसंद हो सकती है | बचपन से वही खाया है , निश्चित तौर पर वो स्वाद मन में बसा है | इसका मतलब ये नहीं है कि मैंने अच्छा नहीं बनाया |

3) अगर उन्हें माँ के हाथ का पसंद है तो मैं वैसा ही सीख लूंगी |


4) मेरे बनाने का तरीका सासू माँ के तरीके से अलग है , मैं शाम को कह दूँगी कि तुलना से बेहतर है जब वो  माँ के पास जाए तो उनके हाथ के फ्लेवर का आनंद लें व् मेरे साथ हों तो मेरे हाथ के फ्लेवर का |

5) आगे से मैं सुबह नाश्ते में इतनी मेहनत करने के स्थान पर डिनर बेहतर तैयार करुँगी , क्योंकि तब हम दोनों के पास इत्मीनान से साथ बैठकर खाने का समय होता है |

                                                                     दूसरी स्थिति  में उस महिला ने थोड़ी देर अपना मूड ठीक कर लिया | आराम से खाना खाया , बच्चों को पढाया , सहेलियों से गप्पे मारी और वो सब किया जो उसे करना था | शाम कोपति आये तो कोई झगडा भी नहीं हुआ |

क्यों बिगड़ते हैं रिश्ते 


                                          रिश्ता पति पत्नी का हो या कोई अन्य उसमें दूरी की वजह दो ही बातें होती है ...

1) हमारी अपेक्षाएं
2) किसी बात  के बुरा लगने पर हम उसे कैसे मेनेज करते हैं | क्या हम उस बारे में बहुत देर नकारात्मक बोलते रहते हैं या हम उस नाकारात्मकता को किसी सकारात्मक  वाक्य से बदल कर अपना मूड ठीक कर लेते हैं | हम कुछ कहें या न कहें जितनी नकारात्मकता हम किसी के बारे में अपने मन में रखते हैं उस उस रिश्ते में दिखाई देने लगती है | कई  बार आश्चर्य होता है कि हमने   इतने अच्छे से बात की पर उन्हें कैसे बुरा लगा |


                                               जब भी हम नकारात्मकता रखते हैं या खुद से नकारात्मक बोलते हैं , उस का असर रिश्तों पर पड़ता ही है | साथ ही हमारे मानसिक व् शारीरिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है |

क्या करे रिश्तों को संवारने के लिए 


                           रिश्तों को संवारने के लिए बेहतर है कि जब हमें किसी की बात बुरी लग जाए तो उसके खिलाफ दिन भर बुरा सोचने के स्थान पर किसी और काम में मन लगाए | उस वाक्य को किसी सकारात्मक वाक्य से बदल दें | अगर कोई बात इतनी बुरी लगी है कि समझ में आ रहा है कि इस व्यक्ति से अब रिश्ता चल ही नहीं सकता क्योंकि उसने बहुत दिल दुखाया है तो भी उसके प्रति नकारात्मकता रखने के स्थान पर निश्चय करें कि आपको उस व्यक्ति से रिश्ता नहीं रखना है |  किसी एक रिश्ते के बारे में बहुत नकारात्मक सोचने से और रिश्ते भी बिगड़ने लगते हैं | क्योंकि तब हम नकारत्मक एंटीना बन जाते हैं  | और उसी  आवृत्ति  पर अपने हर रिश्ते को परखने लगते हैं | ऐसे में जो ठीक -ठाक या अच्छे रिश्ते होते हैं वो भी नकारात्मकता की चपेट में आ जाते हैं | और हम एक रिश्ते के एवज में १० प्रिय रिश्ते खो देते हैं |

                                    मित्रों हम सब चाहते हैं कि हमारे रिश्ते अच्छे चले ,परन्तु उसके लिए हमें सिर्फ अपनी सोच को  बदलना है | क्योकि  आप के रिश्तों पर आपके सोचने का असर होता है |

अटूट बंधन परिवार


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filed under- relationship issues, family & relatives,good relation, affect of thoughts on relations                       
              ताना मारना एक ऐसी कला है जो किसी स्कूल में नहीं पढाई जाती | इस के ऊपर कोई शास्त्र नहीं है | फिर भी ये पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक का सफ़र बड़ी आसानी से तय कर लेती है | ताना मरने की कला में कोई धर्म  , जाति, देश  का भेद भाव नहीं है , कोई नहीं कहता कि ये हमारे धर्म /देश का ताना है , देखो फलाने  धर्म /देश वाले ने हमारा ताना चुरा लिया |  तानों पर किसी का कॉपीराईट नहीं है , आप देशी -विदेशी , अमीर , गरीब किसी के ताने चुरा सकते हैं | ताना बनाने वाले की सज्जनता तो देखिये वो कभी नहीं कहेगा कि ये ताना मेरा बनाया हुआ है | आज जब हम अपनी चार लाइन की कविता के चोरी हो जाने पर एक दूसरे को भला बुरा कहते हैं,  तो ताना बनाने वालों के लिए मेरा मन श्रद्धा से भर उठता है |


तानाशास्त्र


तानाशास्त्र 


खैर पहला ताना किसने किसको दिया ये अभी शोध का विषय है | परन्तु तानों से मेरा  पहला परिचय दादी ने कराया | जब उन्होंने कहा , " धीय मार बहु समझाई जाती है "| मतलब आप बहु को न डांट  कर बेटी को डांट दीजिये ... बहु तक मेसेज पहुँच जाएगा | जैसे बहु ने बर्तन साफ़ नहीं धोये हैं तो आप बेटी को बुला कर कहिये कि , " कैसे बर्तन धोती हो , दाग रह गए , अक्ल कहाँ घुटने में है | अब बेटी भले ही कहती रहे , " माँ , मैंने तो बर्तन धोये ही नही |" हालांकि ये पुराना तरीका है , इसे अब मत आजमाइयेगा , नहीं तो बहु पलट कर कहेगी ... डाइरेक्ट मुझसे कहिये ना या ये भी हो सकता है कि बहु कह दे , ठीक है , कल से आप ही धोइयेगा | याद रखियेगा ये पुराना ज़माना नहीं है अब बहु की "नो का मतलब नो होता है "|


तानों के प्रकार 


 समय के साथ तानों का काफी तकनीकी विकास हो चुका है , नित नए अनुसन्धान हो रहे हैं |  अगर इतने अनुसन्धान मार्स मिशन पर होते आज हम मंगल गृह पर पॉपकॉर्न खा रहे होते | फिर भी मोटे तौर पर ताने दो तरह के होते हैं ...

तुरंता ताना - इस ताने में ताना मारने वाला ऐसे ताना मारता है कि उसे तुरंत समझ में आ जाता है कि उसे ताना मारा गया | सुनने वाले के चेहरे की भाव भंगिमा बदल जाती है | अब ये उसके ऊपर है कि वो इस ताने के बदले में कोई विशेष ताना मार पाता  है या नहीं | अगर वो भी अनुभवी खिलाड़ी हुआ तो "ताने ऊपर ताना " यानि की ताने की अन्ताक्षरी शुरू हो जाती है |

डे आफ्टर टुमारो ताना - ये ताने की विकसित शैली है | आमतौर पर ताना कला में डिग्री होल्डर ही इसका प्रयोग कर पाते हैं | इसमें आप किसी के घर में आराम से चाय -समोसों के साथ ताना खा कर आ जाते हैं , और आप को पता ही नहीं चलता | दो दिन बाद आपके दिमाग की बत्ती जलती है ... अरे ये तो ताना था |


विशेष प्यारक -मारक ताने 


                                                तानों पर अपने अनुभव के आधार पर एक अच्छा ताना वो है जो आपको तुरंत समझ भी आ जाए और आप जवाब में कुछ कह भी न सकें | ऐसी तानों का असर बहुत लम्बे समय तक रहता है |  ऐसे बहुत सारे ताने आपको भी मिले होगे , भूले तो नहीं होंगे | दुखी मत होइए दाद दीजिये कि क्या ताना था बाल काले से सफ़ेद हो गए पर ताना दिमाग में जहाँ बैठा है वहां से रत्ती भर भी नहीं हिला | जिनको इसका अनुभव नहीं है उन्हें उदाहरण के तौर  वो ताना शेयर कर रही हूँ जो ससुराल में मेरा पहला प्यारा , प्यारा  ताना था | हर पहली चीज की तरह वो भी मुझे बहुत अजीज है | हुआ यूं की शादी के बाद एक रिश्तेदार हमारे घर आयीं | उन्होंने पिताजी द्वारा भेंट किये गए सामान को दिखाने की इच्छा जाहिर की | सामान देखते हुए वो बड़े प्यार से मेरे सर पर हाथ फेरते  हुए बोलीं , " अरे , कैसा सामान दिया है तुम्हारे पिता ने ,  हमारी लाडली बहु के साथ नाइंसाफी की है | उनके तो दो-दो बेटियाँ है , तो छोटी क्यों लाडली होगी , पर हमारी तो एक एक ही बहु है | कम से कम ये तो ध्यान रखते  कि हमारी बहु हमें कितनी लाडली है | अब इस ताने के जवाब में एक पिता की दूसरी बेटी  यानि की प्यारी लाडली बहु कुछ कह ही नहीं सकती क्योंकि वो तो इकलौती है | तो उन्हें ज्यादा धक्का लगना  स्वाभाविक है | "

कोई और बहु होती तो शायद बुरा भी मानती पर मैं तो शुरू से ही ताना शास्त्र की मुरीद रही हूँ | इसलिए मेरे मुँह से बस एक ही शब्द निकला "वाओ " क्या ताना है | मन किया कि अभी उनके चरण छू लें , पर इससे ताने का अपमान होता | ताने के सम्मान में मैंने अपनी इच्छा मन में ही दबा ली | ऐसे प्यार भरे मारक ताने सुनने वाले अक्सर कहते   पाए जाते  हैं , " वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता /हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम | वैसे ताना मारने वालों में अक्सर " तानाशाही " के गुण आ ही जाते हैं | ये तानाशाह बिना तीर -तलवारके सर कलम करते चलते हैं |

तानाशास्त्र - ताना कला को बचाने की कोशिश 


तानों की इतनी महिमा जानने के बाद मैंने भी इस कला को सीखने की पूरी कोशिश की | कुछ ताने पति की खिदमत में पेश किये  कुछ आये गए की | हालांकि अभी तक घर के बाहर बहुत सफलता नहीं मिली | अक्सर लोगों ने उससे बड़ा ताना दे कर हमारे ताने पर पानी फेर दिया | पर हमने अभी हिम्मत नहीं हारी है , प्रयास जारी है | बच्चे छोटे थे तब तक उन पर तानों  का अच्छा प्रयोग किया परन्तु जैसे ही वो बड़े हुए तानों के विरुद्ध खड़े हो गए | उनके नए ताने हैं | तानों में भी जनरेशन गैप आ जाता है | अगर आप बच्चों के साथ चलना चाहते हैं तो आपको उनकी जीवनशैली के साथ उनके तानों को भी खुले दिल से अपनाना चाहिए |


        वैसे तो ताना कभी " इंडेंजर्ड  स्पीसीज " घोषित नहीं होगा | पर कल को नए तानों के साथ हम पुराने तानों को भूल ही न जाएँ | इसके लिए मैंने ताना शास्त्र लिखने का पुनीत कार्य शुरू किया है | अगर आप चाहते हैं की हमारी ये प्यारी कला यूँ ही फलती -फूलती रहे तो कृपया  अपने को मिले हुए व् दिए हुए तानों को मेरे पास tanashastr@gmail.com पर भेजे | और इस यज्ञ  में अपना योगदान दें |


वंदना बाजपेयी 


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वर्षों बाद ...

                           हर घटना जब घटती है तो हम उसे एक एंगल से देखते हैं , अपने एंगल से , लेकिन जब दूसरे का एंगल  समझ में आता है तो हम जिस उम्र परिस्थिति के हिसाब से सोच रहे हैं , दूसरा उससे अलग अपनी उम्र व् परिस्थिति के हिसाब से सोच रहा होता है | तब लगता है , गलत कोई नहीं होता , हर घटना का देखने का सबका एंगल अलग होता है .....अक्सर ये समझ वर्षों बाद आती है


लघु कथा -वर्षों बाद 


                                            मैं  हॉस्पिटल के बिस्तर पर  लेटी थी | ड्रिप चढ़ रही थी |  एक -एक पल मेरा मृत्यु से युद्ध चल रहा था | पता नहीं घर वापस जा भी पाउंगी या नहीं |  पर मृत्यु से भी ज्यादा मुझे कर रहा था अपनी बेटी का दुःख | मेरे बाद क्या होगा उसका | कितनी संवेदनशील है , किसी का दर्द सुन लें तो महीनों मन से निकाल नहीं पाती है | जब उसे ससुराल में पता चलेगा तो ... टूट जायेगी , सह नहीं पाएगी , कितना रोएगी , अभी बेटा छोटा है उसे पालना है , इतनी जिम्मेदारियां सब पूरी करनी है , ऐसे कैसे चलेगा |


                                           मैं अपने ख्यालों में खोयी हुई थी कि बेटी ने कमरे में प्रवेश किया | उसकी डबडबाई आँखे देख कर मैं टूट गयी , फूल सा चेहरा ऐसे मुरझा गया था जैसे कल से पानी भी न पिया हो | उसकी हालत देख कर मैंने मन को कठोर कर लिया और उससे बोली , " किसने खब कर दी तुमको , अभी बच्चा छोटा है उसको देखो , तुम्हारा भाई है तो मेरी देखभाल को ... बेटियाँ पराई  होती हैं उन पर ससुराल की जिम्मेदारी होती है | और इस तरह रो -रो कर मेरा अंतिम सफ़र कठिन मत करो | उसने मेरे मुंह पर हाथ रख दिया और बोली , " कुछ मत बोलो माँ , कुछ मत बोलो ... और वो मेरे सीने से लग गयी |


                   उसके सीने से लगी मैं अतीत में पहुँच गयी | ऐसे ही माँ  अपने अंतिम समय में गाँव में आँगन में खाट पर लेटी थीं | मैं दौड़ती भागती बच्चों को ले माँ को देखने पहुँची थी | मुझे देख कर माँ , जो दो दिन से एक अन्न का दाना नहीं खा पायी थीं , न जाने खान से ताकत जुटा  कर बोलीं , " हे , राम , इनको कौन खबर कर दीन , ए तो बच्चन को भी जेठ का माहीना में ले दौड्स चली आयीं , अब पराये घर की हो उहाँ की चिंता करो यहाँ की नहीं | अब  रो रो के हम्हूँ को चैन से न मरने दीन , चार दिन के जिए दो दिन माँ ही चले जाइये |" मैं माँ के पास से हट गयी थी | अगली सुबह माँ  का निधन हो गया |


                     वो अंतिम मिलन मुझे कभी भूलता ही नहीं था  | माँ क्या मुझे देखना ही नहीं चाहती थीं | क्या बेटियों की विदा कर के माँ उन्हें पराया मान लेती हैं | मैं जब भी माँ को याद करती उनके अंतिम शब्द एक कसक सी उत्पन्न करते | मैं आंसू पोछ  कर सोचती , जब माँ ही मेरा आना पसंद नहीं कर रहीं थीं तो मैं अब क्यों याद करूँ |


आज अचानक वही शब्द मेरे मुंह से अपनी बेटी के लिए निकल गए | तस्वीर आईने की तरह साफ़ हो गयी | ओह माँ , आप नहीं चाहती थी कि मैं आपके लिए ज्यादा रोऊँ , इसलिए आपने अंतिम समय ऐसा कहा था | सारी  उम्र मैं आपको उन शब्दों के लिए दोषी ठहराती रही | ऐसा कहते समय आपने कितनी पीड़ा कितना दर्द झेला होगा उसकी समझ भी मुझे आई तो आज ... इतने वर्षों बाद |


वंदना बाजपेयी


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सब कुछ हरा



   हम इस दुनिया को अपने हिसाब से ही देखना चाहते हैं | इसलिए सबको बदलना चाहते हैं ,क्या ये उचित हैं ? ये कहानी है ऐसे अमीर की जो सब कुछ हरा देखना  चाहता था | क्या ये संभव है ?

प्रेरक कहानी -सब कुछ हरा /Motivational story (in Hindi)-Sab kuch hra



                            बहुत समय पहले की बात है एक  बहुत अमीर आदमी था | यूँ तो वो बहुत खुश रहता था पर उसकी आँखों में एक अजीब सी बिमारी हुई , जिसके कारण उसकी आँखों में बहुत दर्द रहने लगा | अमीर आदमी ने देश विदेश जा कर अपना इलाज़ करवाया पर कोई फायदा नहीं हुआ |  लोगों ने बताया तो उसने नामी गिरामी वैद्ध को भी दिखाया व् होमोपैथी का इलाज़ भी कराया   पर समस्या जस की तस रही | अब वो आदमी बहुत परेशान  रहने लगा | उसे लगता अब सारा जीवन उसे ऐसे ही इस दर्द के साथ रहना पड़ेगा |  वो निराश रहने लगा , मन अवसाद में घिरने लगा |



एक दिन किसी ने बताया कि  बिठूर के पास एक साधू  रहते हैं वो शायद तुम्हें कोई उपाय बताये , अब तक तो जो भी उनके दरबार गया है उसका काम पूरा ही हुआ है |



ये सुन कर अमीर आदमी के चेहरे पर आशा की मुस्कान फ़ैल गयी | उसने तुरंत वहां जाने का निश्चय किया | वो अपने कुछ मित्रों के साथ उसी दिन बिठूर के लिए निकल गया | वहां पहुँच कर उसने देखा कि साधू महाराज कोई पूजा कर रहे हैं | वो वहीँ इंतज़ार करने लगे | थोड देर में साधू की पूजा समाप्त हुई | उन्होंने अमीर आदमी को देखकर उन्हें अपने पास बुलाया |


वो अमीर आदमी  साधू  के पैर पकड़ कर बोला , " महाराज , मेरी आँखों में बहुत दर्द होता है | देश -विदेश में इलाज करवाया , कोई फायदा नहीं हुआ | अब बड़ी आशा से आपके पास आया हूँ , कृपया मुझे इस तकलीफ से मुक्ति दे दें '|


साधू ने उस अमीर की आँखे देख कर कहा , " तुम्हारी आँखों का दर्द दूर हो जाएगा , बस तुम ज्यादा से ज्यादा हरा देखा करो "|


वो आदमी घर लौट आया | उसने अपने घर कइ बगीचे में कई पेड़ लगवा दिए | रोज सुबह उठ कर उन्हें देखता | उसकी आँखों के दर्द में कमी आने लगी | अब तो उसने घर के आस -पास कारखाने तक बहुत पेड़ लगवाये  |कुछ और आराम आया | खुश हो कर उसने  घर की दीवारे , परदे , बिस्तर , फर्नीचर , सामान सब हरा कर दिया गया | उसने हरे रंग के कपडे पहनना भी शुरू कर दिया व् घर के सभी लोगों को यहाँ तक की नौकरों को भी , हरे रंग के कपडे पहनने का आदेश दिया | अब उसकी आँखों का दर्द  बिलकुल ठीक हो गया था |



एक दिन वही साधू उसके शहर आये व् उससे मिलने भी आ गए | वो अन्दर जा ही रहे थे कि अमीर आदमी के नौकर का ध्यान साधू के कपड़ों पर गया | उन्होंने लाल रंग के कपड़े  पहन रखे थे | नौकर ने तुरंत एक बाल्टी पानी में हरा रंग घोल कर उनके ऊपर फेंक दिया | तभी अमीर आदमी आ गया | उसने नौकर की उस हरकत के लिए माफ़ी मांगी | उसने साधू  से कहा , " महात्मन मैं अपने नौकर की गलती के लिए शर्मिंदा हूँ | दरअसल आप ने मुझसे  हरा रंग ज्यादा देखने को कहा था | तो  देखिये यहाँ सब कुछ हरा ही हरा है | इससे मुझे बहुत आराम मिला | मेरा दर्द पूरी तरह चला गया | क्योंकि नौकर ने देखा कि आप ने लाल रंग के कपडे पहन रखे हैं , मेरी तकलीफ बढ़ न जाए , इसलिए उसने आपके कपड़ों पर हरा रंग डाल दिया |


उत्तर सुन कर साधु  हंसने लगा | उसने कहा , " ये तुमने क्या किया , सब कुछ हरा देखने के लिए तुमने अपने चारों  और हर वस्तु और लोगों को हरे रंग में रंग दिया , अरे तुम हरे कांच वाला चश्मा भी तो ले सकते थे | दुनिया जैसे थी वैसी ही रहती और तुम्हें भी सब कुछ हरा दिखाई देता |



                           मित्रों , हर प्रेरक कहानी में कुछ सन्देश छिपा रहता है | इस कहानी में भी एक बहुत सुंदर सन्देश छिपा है कि हमें दूसरों को बदलने के स्थान पर अपना नजरिया बदलना चाहिए | हममे से ज्यादातर लोग इस बात से दुखी रहते हैं कि वो ... ऐसा नहीं करता , वैसा नहीं करता , उसे ऐसा कहना चाहिए , वैसा कहना चाहिए हम दुनिया को अपने हिसाब से बदलना चाहते हैं इसी कारण  दुखी रहते हैं , इसी कारण  रिश्तों में विवाद होते हैं | दूसरों को बदलने के स्थान पर अगर अपना नजरिया बदल लें ... क्या हुआ ये अगर ऐसे रहना , उठना बोलना पसंद करता है , वो उसकी ख़ुशी है , मै जैसे रहना , उठाना बैठना पसंद करता हूँ वो मेरी ख़ुशी है | उसे अपनी जिन्दगी जीने देते हैं , मैं अपनी जिन्दगी अपनी तरह से जिऊँगा | उसके बावजूद हम अच्छे दोस्त रह सकते हैं | करके देखिये जीवन कितना आसन हो जाएगा |


ऐसे में सब कुछ हरा भले ही न हो पर आपका मन जरूर हरा भरा रहेगा |


अटूट बंधन परिवार

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Students "Adult Content " addiction से कैसे निकलें




   इस विषय पर लिखने का मन मैंने तब बनाया जब मेरे पास अमित ( परिवर्तित नाम ) की समस्या आयी | क्लास 6 th तक अमित एक पढने में होशियार , क्लास में फर्स्ट आने वाला , मासूम सा बच्चा था | एक दिन क्लास में दोस्तों ने ऐसा कुछ बताया की जिज्ञासा जगी , पर वो बीज वहीँ पड़ा रह गया | एक दिन किसी म्यूजिक वीडियो को देखते समय एक ऐड क्लिक हो गया और उसके सामने वो संसार खुल गया जो उसके लिए बिलकुल नया था | शुरू की जिज्ञासा धीरे -धीरे आदत बनने लगी | रोज उसकी  किशोर अँगुलियाँ उन साइट्स को क्लिक  कर ही देतीं  जो  "adult content " था | इसमें कोइ  आश्चर्य नहीं कि घर में किसी को इसका पता नहीं चला ,क्योंकि किसी के आने की आहट  सुनते ही वो पहले से खुली स्टडी मैटीरियल की साईट पर क्लिक कर देता | माता -पिता समझते कि बच्चा पढ़ रहा है , पर अमित पढाई में पिछड़ने लगा | फर्स्ट आने वाला बच्चा  बस पास होने लगा | उसके  अन्दर अपराध बोध भी होता था पर वो किसी शराबी की तरह  हर रोज उसी और दौड़ जाता |  अमित नवीं कक्षा में फेल हो गया | तब जा के अमित को होश आया | उसने डरते हुए अपनी समस्या अपने पिता को बताई | पहले तो उसके पिता के आश्चर्य की कोई सीमा नहीं रही , माता -पिता एक दूसरे पर बच्चे पर ध्यान न देंने का आरोप लगाते रहे | अंत में उन्होंने क्लिनिकल साइकोलोजिस्ट  को दिखाया | अमित इस  adiction से बाहर निकला | उसने अपनी पढाई को फिर से संभाला और अच्छे  नंबरों से पास होने लगा |

Students "Adult Content " addiction से  बाहर कैसे निकलें 


                                       हर बच्चा जो इस अँधेरी गुफा में घुस जाता है , वो अमित की तरह निकल नहीं पाता और अपनी शिक्षा के बेहतरीन वर्ष  " adult content" की भेंट चढ़ा सारा जीवन पछताता है | किशोर व् नव युवा उम्र के वो ८ , ९ साल हैं जो उसकी जिंदगी के बाकी ५० सालों का भविष्य तय करते हैं | अक्सर बड़े ऐसी समस्याओं के सामने आने पर बच्चों को रास्ता दिखाने के स्थान पर " हमारे समय में तो ऐसा नहीं होता था " कह कर इतिहास पढ़ने लगते हैं | जिसका  कोई भी फायदा नहीं | वो समय दूसरा था | ये आज की समस्या है और इसका सामाधान भी आज ही निकालना  होगा | मनोवैज्ञानिक अतुल भटनागर जी के अनुसार जो बच्चे " adult content addiction" में फंस गए हैं , वो भी थोड़े से प्रयास से  इससे निकल सकते हैं  और पुन: अपना कैरियर व् भविष्य बना सकते हैं |


क्यों होता है "Adult content addiction"


                                      ये सच है कि आज के ज़माने में बच्चों को इन्टरनेट से दूर नहीं रखा जा सकता | ये ज्ञान का भण्डार है |  उन्हें मनोरंजन , स्कूल के प्रोजेक्ट व् अन्य जानकारी के लिए इसकी बहुत जरूरत है | वहीँ ये भी सच है कि इन पोर्न  साइट्स पर पहली क्लिक जिज्ञासा में या अनजाने में होती है ,  पर धीरे -धीरे आदत में शुमार हो जाती है | बच्चों को  उसे नशे में बदलने से रोकना ही होगा |  इसके लिए जरूरी है कि ये समझा जाए कि " Adult content addiction क्यों होता है | दरअसल  विकास के साथ -साथ "human mind " में बहुत सारे परिवर्तन हुए | जिस तरहसे  हम अपने पोस्ट को अपडेट करते हैं वैसे ही इसान का दिमाग पुराने जीवों के दिमाग का अपडेटिड वर्जन है | वैज्ञानिकों के अनुसार  दिमाग की तीन लेयर हैं , जो पुरानी लेयर से अपडेट होकर बनी हैं ....

पहली लेयर रेपटिलीयन काम्प्लेक्स  - यानि रेपटीलिया का दिमाग ( सांप आदि रेंगने वाले जीव )
 दूसरी लेयर -पैलियोमैमेलियन काम्प्लेक्स - कुछ निचले स्तर के स्तनधारी जीव का दिमाग

तीसरी लेयर -नीओमैमेलियन काम्प्लेक्स  ( ऊँचे  लेवल के मैमल का दिमाग , जैसे मनुष्य का वर्तमान दिमाग जो की पिछली दो लेयर का अपडेटेड वर्जन है |


रेपटी लियन ब्रेन वो ब्रेन है जो सेक्सुअली ओरिएंटेड होता है |
पैलियोमैमेलियाँ ब्रेन वो ब्रेन है जो क्षणिक सुख को देखता है , वो बहुत दूर तक भविष्य के फायदे , नुक्सान को सोंच नहीं पाता | 

नीओ मैमेलियन ब्रेन वो ब्रेन है जो भविष्य की योजनायें बनाता है , भविष्य के बड़े सुखों के लिए छोटे सुखों को त्याग सकता है | यह प्रायोरिटी बेसिस पर काम करता है | इसके लिये परिवार , नौकरी , शिक्षा , कैरियर ज्यादा महत्वपूर्ण है | 

                               जब भी कोई porn content सामने आता है तो रेपटीलियन  और नीयो मैमेलियन लेयर एक्टिव हो जाती हैं और पैलियो मैमेलियन ब्रेन से सारा कण्ट्रोल अपने  हाथ में ले लेती हैं | जैसे ही इंस्टेंट प्लेजर का एक राउंड खत्म होता है  पुन : कण्ट्रोल पैलियोमेमिलीयन ब्रेन के हाथ में आ जाता है तब स्टूडेंट  को गिल्ट महसूस होती है उसे लगता है उसने बेकार में अपना समय ख़राब किया | इसके कुछ और भी नुक्सान हैं जैसे स्वाभाव में चिडचिड़ापन आता है , दिमाग फ़ोकस नहीं कर पाता , पढने से ध्यान हट जाता है , और छोटी छोटी बातों  भूलने लगता है |


            फिर भी स्टूडेंट कंट्रोल नहीं कर पाता , रोज देखता है और ये उसकी आदत बन जाती है | ये एक नशे की तरह है | परतु जैसे दूसरे नशे छुडाये जाते हैं इसे भी छोड़ा जा सकता है बस थोड़ी सी संकल्प शक्ति  बढ़ानी होगी |


students "Adult Content " addiction ऐसे बाहर निकलें 

एडल्ट कंटेंट एडिक्शन से निकलने के लिए स्टूडेंट्स कुछ तरीके इस्तेमाल कर सकते हैं | ये सभी तरीके मनो वैज्ञानिकों द्वारा सुझाए गए बहुत कारगर तरीके हैं | 

अपने कम्प्यूटर से वो सारा मैटीरियल डिलीट करें  

आपने जिस पेन ड्राइव , डीवीडी , हार्ड ड्राइव में या कोई फोल्डर  में वो मैटिरियल छुपा कर रखा है उसे डिलीट कर दें | डिलीट करते समय एक बार मन में ख्याल आएगा कि ये क्या कर रहे हैं , कहाँ से ढूंढ -ढूंढ कर इसे सेव किया था पर इसके अतिरिक्त कोई और उपाय नहीं है | जैसे की अगर आप को मिठाई पसंद  है और आप मिठाई का डिब्बा अपनी आँखों के सामने रखेंगे तो आप से कंट्रोल नहीं होगा | अगर मिठाई घर में ही न हो तो थोड़ी देर मन चलेगा फिर खुद ब खुद ध्यान हट जाएगा | इसी तरह जब आप के पास ऐसा मैटिरियल सेव ही नहीं होगा तो फिर आप  मन चलने पर भी देख नहीं पायेंगे |


इन्टरनेट फिल्टर्स को डाउन लोड करें 

                                                     इन्टरनेट ने ही  स्टूडेंट्स को पोर्न का आदी  बनाया है वो ही इसे रोकने में भी मदद करता है | बहुत से ऐसे एप हैं जो " adult content" को ब्लाक करते हैं | जैसे ...

picblok

blocksmart

safesearch

                          ये सारे एप उस  ADULT CONTENT  को ब्लाक कर देंगे , अब आप चाहे जितना मर्जी इन्टरनेट पर बैठिये ऐसी साईट  आपकी आँखों के सामने आयेंगी ही नहीं | तो आपका मन इंस्टेंट प्लेजर के लिए भागेगा ही नहीं |


कोई हॉबी डेवेलप  करें 


                                       इन साइट्स की तरफ बच्चे इसलिए आकर्षित होते हैं क्योंकि उनके पास खाली समय  होता है , खाली समय में वो अगर कोई हॉबी डेवेलप कर लें जैसे गाना गाना , पेंटिंग , डांस , कोई वाध्य यंत्र बजाना आदि तो उनका धयान उस तरफ जाएगा ही नहीं और आदत छूट जायेगी | वैसे बच्चे
 अपने परिवार के साथ खली समय में क्वालिटी टाइम भी बिता सकते हैं |  इससे रिश्तों की बोन्डिंग भी अच्छी होगी |

मेडिटेशन करें 


                       ध्यान या मेडिटेशन विचारों पर कण्ट्रोल सिखाता है , रोज सुबह दस मिनट का ध्यान काफी परिवर्तन ला सकता है | स्टूडेंट्स को ही सबसे ज्यादा मेडिटेशन की जरूरत होती है क्योंकि उनका किशोर मन ज्यादा भटकता है |

कोई ऊँचा लक्ष्य निर्धारित करें 

                                          अगर आपको क्रिकेट खेलना हो और कुछ घंटे बाद एग्जाम हो तो क्या आप वो समय खेलने में व्यर्थ करेंगे , नहीं क्योंकि आप को पता है की एग्जाम का लक्ष्य जीतना ज्यादा जरूरी है | इसी तरह से जब आप जीवन के अपने लक्ष्य ऊँचे  रखेंगे तो आप का ध्यान इस ओर न जाकर अपमे लक्ष्य में ही लगा रहेगा | एक कहावत है ...

develop the higher taste to discard the lower one 

                        मनुष्य जीवन में सुख के चार स्तर होते हैं  शरीर के स्तर पर , मन के स्तर पर , बुद्धि के स्तर पर व् आत्मा के स्तर पर | ये सुख क्रमवार ऊपर की और जाते हैं | जिसे बुद्धि के सुख की आदत लग गयी उसका ध्यान शारीरिक सुखों पर कम जाएगा | विद्यार्थी जीवन में पढाई पर ध्यान  लगा कर मन को भटकने से रोका जा सकता है  पढाई पर बहुत ध्यान लगे इसके लिए कुछ बनने का सपना देखना पड़ेगा | कोई लक्ष्य सामने होगा तो  उसी में दिन रात लगना  पड़ेगा तब शारीरिक स्तर पर मिलने वाले  सुखों की ओर ध्यान ही नहीं जाएगा |




                       तो स्टूडेंट्स ये थे कुछ टिप्स जिन्हें अपना कर आप adult content addiction से बच सकते हैं | याद रखिये विद्यार्थी जीवन बहुत महत्वपूर्ण है , इसी पर आप का पूरा भविष्य निर्भर है |


वंदना बाजपेयी
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