क्या आप जानते हैं कि आप के सोचने का आप के रिश्तों पर असर होता है | रिश्तों के बारे में आप जितना नकारात्मक सोचते हैं वो उतना ही बिगड़ते हैं |

                                 
   हम सब चाहते हैं कि हमारे सभी रिश्ते अच्छे चले , चाहते न चाहते कुछ रिश्तों में खटास आ ही जाती है | कई बार उन रिश्तों को सँभालने की कोशिश भी करते हैं पर खाई बढती ही जाती है और एक दिन वो अजीज रिश्ता इतनी दूर हो जाता है कि  लाख कोशिश करके भी उसे पहले जैसा नहीं बनाया जा सकता | आप को ये जान कर आश्चर्य होगा कि रिश्तों में यह दूरी हमारे  लगातार उस रिश्ते के बारे में नकारात्मक सोचने के कारण आती है |

आप के रिश्तों पर होता है आपके सोचने का असर

 आप के रिश्तों पर होता है आपके सोचने का असर        

                              एक बार एक महिला ने सुबह उठ कर बड़े प्यार से अपने पति के लिए नाश्ते में कई चीजे बनायीं | पति जो बहुत व्यस्त  रहते थे | जल्दी -जल्दी से उठे  नहाना धोना कर के नाश्ते की टेबल पर पहुंचे वहां अखबार के साथ जल्दी -जल्दी नाश्ता मुंह में ठूंस कर  बैग उठा ऑफिस जाने लगे | पत्नी जिसने बड़े प्यार से नाश्ता बनाया था  और प्रतीक्षा कर रही थी कि पति तारीफ़ के दो शब्द कहेंगे | पर पति ने कुछ नहीं कहा तो उसने ही आगे बढ़ कर पूँछ लिया , जरा उनका संवाद पर गौर करिए ...
पत्नी - "क्यों , नाश्ता कैसा बना था ?"
पति :  ऊऊ ... क्या बनाया था आज नाश्ते में ?
पत्नी : लो , मैंने सुबह चार बजे उठ कर इतनी मेहनत कर के नाश्ता बनाया , कुछ कहना तो दूर आप को ये तक याद नहीं है कि क्या बना था , जबकि आप ने खा भी लिया | 
पति : दिमाग पर जोर देते हुए बोला .... अच्छा अच्छा वो ... हां ठीक बना था , पर मेरी माँ का ज्यादा अच्छा बनता है |

कह कर पति तो चला गया और ऑफिस के काम में भूल गया पर पत्नी दिन भर बैठ कर वही सोचती रही ,  "मैंने इतनी मेहनत से बनाया उन्होंने देखा तक नहीं क्या बना है , तारीफ के दो शब्द भी नहीं कहे ऊपर से कहते हैं , माँ ज्यादा अच्छा बनाती हैं , तो जाएँ न वहीं खाएं , माँ के हाथ का पसंद है तो मुझसे क्यों  मेहनत करवाते हैं | मेरी इस घर में तो कोई कदर ही नहीं है |मैंने इनके लिए क्या -क्या नहीं किया | नौकरी छोड़ी , घर में नौकरानी बनी पर इनको तो मेरी कद्र ही नहीं | "


तभी उसकी बहन का फोन आ गया | उसने सारी बातें अपनी बहन को बतायी | उसकी बहन ने भी हाँ में हां मिलाई | अब तो उस स्त्री को पूरा विश्वास हो गया कि वो सही सोच रही थी | उसके पति को उसकी कदर नहीं है वह बस उसे घर में नौकरानी बना कर लाया है | काफी देर तक वो रोई उसने खाना भी नहीं खाया |


शाम को जब उसका पति घर आया तब तक वो सारी  बात भूल चुका था , पर पत्नी का मूड ऑफ था | पति ने डिनर के समय पत्नी से पूंछा ,  " क्या बात है , इतना मूड क्यों ऑफ़ है ?
पत्नी गुस्से से फट पड़ी , " अच्छा तो अब आप को पता ही नहीं कि मेरा मूड क्यों ऑफ़ है | क्या ये भी मुझे बताना पड़ेगा | मैंने तो आपके लिए नौकरी छोड़ी पर आप को सिर्फ अपनी नौकरी की कद्र है | मेरी तो कोई कद्र ही नहीं है | मैं तो बेकार हूं |

झगडा शुरू हो गया , और दोनों बिना खाए सो गए | कई दिन तक बातचीत बंद रही | फिर घर गृहस्थी के कामों के कारण बातचीत तो शुरू हुई पर एक गाँठ तो पड़ ही गयी थी |


ऐसी न जाने हम कितनी गांठे अपने रिश्तों में डालते रहते हैं  और अकेले होते चले जाते हैं |


मित्रों , ये कहानी हमने ब्रह्म कुमारी शिवानी जी के प्रवचन से ली है | उपरी तौर पर इस कहानी में पति की गलती लगती है , हम कह सकते हैं कि उसे ऐसा नहीं बोलना चाहिए था , पर ये भी हो सकता  है कि जल्दी की वजह से उसे ध्यान ही न रहा हो कि उसने क्या खाया | क्या ये स्वाभाविक नहीं है | या फिर ये भी हो सकता है कि उसे अपनी माँ के हाथ की बनायीं वो डिश ज्यादा पसंद हो | तब तो उसने सच ही बोला |


                        उसे ऐसे कहना चाहिए था या नहीं इस पर तर्क हो सकते हैं , फिर भी पति ने सिर्फ एक बात कही और पत्नी ने अपने खिलाफ पूरे दिन हजारों बातें कही |

1) मेरी मेहनत की तो किसी को कद्र ही नहीं है |
2)मुझे नौकरानी समझ रखा है |
3) मैंने उनके लिए क्या -क्या किया और उन्होंने ऐसे कहा ... ऐसे
4) अगर मैं भी नौकरी कर रही होती तो मैं भी इनकी किसी प्यार भरी बात पर ध्यान न दे कर बदला ले लेती , पर मैं तो घर में हूँ , बेकार हूँ |
5) हमेशा माँ से मेरी तुलना करते रहते हैं ... उन्हीं के  पास रहे ...

                                                                                        ये सारी  बातें एक कैसिट  की तरह रिवाइंड हो -हो कर उसके दिमाग में चलती रहीं |हजारों  बार खुद को कोसने से उसका स्वमान  कम हुआ | मित्रों , क्या ये हम सब के घर की कहानी नहीं है |

तस्वीर पलट कर देखिये 


अब तस्वीर का दूसरा रुख देखिये | वो महिला ऐसे भी सोच सकती थी |

 1)मैंने अच्छा नाश्ता तैयार करके अपना प्यार दिखा दिया है | जरूरी नहीं वो तारीफ करें या मेरे सोचे तरीके से ही अपना प्यारा  दिखाए | वो अपने तरीके से अपना प्यार  दिखाएँगे |

2) उनको अगर अपनी माँ के हाथ का खाना ही अच्छा लगता है तो कोई बात नहीं ... ये उनकी निजी पसंद हो सकती है | बचपन से वही खाया है , निश्चित तौर पर वो स्वाद मन में बसा है | इसका मतलब ये नहीं है कि मैंने अच्छा नहीं बनाया |

3) अगर उन्हें माँ के हाथ का पसंद है तो मैं वैसा ही सीख लूंगी |


4) मेरे बनाने का तरीका सासू माँ के तरीके से अलग है , मैं शाम को कह दूँगी कि तुलना से बेहतर है जब वो  माँ के पास जाए तो उनके हाथ के फ्लेवर का आनंद लें व् मेरे साथ हों तो मेरे हाथ के फ्लेवर का |

5) आगे से मैं सुबह नाश्ते में इतनी मेहनत करने के स्थान पर डिनर बेहतर तैयार करुँगी , क्योंकि तब हम दोनों के पास इत्मीनान से साथ बैठकर खाने का समय होता है |

                                                                     दूसरी स्थिति  में उस महिला ने थोड़ी देर अपना मूड ठीक कर लिया | आराम से खाना खाया , बच्चों को पढाया , सहेलियों से गप्पे मारी और वो सब किया जो उसे करना था | शाम कोपति आये तो कोई झगडा भी नहीं हुआ |

क्यों बिगड़ते हैं रिश्ते 


                                          रिश्ता पति पत्नी का हो या कोई अन्य उसमें दूरी की वजह दो ही बातें होती है ...

1) हमारी अपेक्षाएं
2) किसी बात  के बुरा लगने पर हम उसे कैसे मेनेज करते हैं | क्या हम उस बारे में बहुत देर नकारात्मक बोलते रहते हैं या हम उस नाकारात्मकता को किसी सकारात्मक  वाक्य से बदल कर अपना मूड ठीक कर लेते हैं | हम कुछ कहें या न कहें जितनी नकारात्मकता हम किसी के बारे में अपने मन में रखते हैं उस उस रिश्ते में दिखाई देने लगती है | कई  बार आश्चर्य होता है कि हमने   इतने अच्छे से बात की पर उन्हें कैसे बुरा लगा |


                                               जब भी हम नकारात्मकता रखते हैं या खुद से नकारात्मक बोलते हैं , उस का असर रिश्तों पर पड़ता ही है | साथ ही हमारे मानसिक व् शारीरिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है |

क्या करे रिश्तों को संवारने के लिए 


                           रिश्तों को संवारने के लिए बेहतर है कि जब हमें किसी की बात बुरी लग जाए तो उसके खिलाफ दिन भर बुरा सोचने के स्थान पर किसी और काम में मन लगाए | उस वाक्य को किसी सकारात्मक वाक्य से बदल दें | अगर कोई बात इतनी बुरी लगी है कि समझ में आ रहा है कि इस व्यक्ति से अब रिश्ता चल ही नहीं सकता क्योंकि उसने बहुत दिल दुखाया है तो भी उसके प्रति नकारात्मकता रखने के स्थान पर निश्चय करें कि आपको उस व्यक्ति से रिश्ता नहीं रखना है |  किसी एक रिश्ते के बारे में बहुत नकारात्मक सोचने से और रिश्ते भी बिगड़ने लगते हैं | क्योंकि तब हम नकारत्मक एंटीना बन जाते हैं  | और उसी  आवृत्ति  पर अपने हर रिश्ते को परखने लगते हैं | ऐसे में जो ठीक -ठाक या अच्छे रिश्ते होते हैं वो भी नकारात्मकता की चपेट में आ जाते हैं | और हम एक रिश्ते के एवज में १० प्रिय रिश्ते खो देते हैं |

                                    मित्रों हम सब चाहते हैं कि हमारे रिश्ते अच्छे चले ,परन्तु उसके लिए हमें सिर्फ अपनी सोच को  बदलना है | क्योकि  आप के रिश्तों पर आपके सोचने का असर होता है |

अटूट बंधन परिवार


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Atoot bandhan

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2 comments so far,Add yours

  1. बहुत सुन्दर सटीक....
    सकारात्मक सोच से बनते हैं रिश्ते....

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  2. धन्यवाद सुधा जी

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