June 2018

मेकअप

हमारा व्यक्तित्व बाह्य और आंतरिक रूप दोनों से मिलकर बना होता है | परंतु लोगों की दृष्टि पहले बाह्य रूप पर ही पड़ती है | आंतरिक गुण दिखने के लिए भी कई बार बाह्य मेक अप की जरूरत होती है |

लघु कथा -मेकअप 



विद्यापति जी की  शुरू से धर्म आध्यात्म में गहरी रूचि थी |  अक्सर मंदिर चले जाते और पंडितों के बीच बैठ कर धर्मिक चर्चा शुरू कर देते | धर्म धीरे -धीरे अध्यात्म की ओर बढ़ गया | मानुष मरने के बाद जाता कहाँ हैं , कर्म का सिद्धांत क्या है ? क्या ईश्वर में सबको संहित होना है आदि प्रश्न सर उठाने लगे | अब ये प्रश्न तो मंदिर  की चौखट के अन्दर सुलझने वाले नहीं थे | सो देशी -विदेशी सैंकड़ों किताबें पढ़ डाली | घूम -घूम कर प्रवचनों का आनंद लेते | कई लोगों की शागिर्दगी करी |ज्ञान बढ़ने लगा |



                           और जैसा की होता आया है जब कुछ बढ़ जाता है तो बांटने का मन होता है | विद्यापति जी का भी मन हुआ कि चलो अब ये ज्ञान बांटा जाए | लोगों को समझाया जाये की जीवन क्या है | आखिर उन्होंने जो इतनी मेहनत से हासिल किया है उसे आस -पास के लोगों को यूँ हीं दे दें , जिससे उनका भी उद्धार हो |


वैसे भी वो चेला ही क्या जिसकी गुरु बनने की इच्छा ही न हो | 


उन्होंने ये शुभ काम मुहल्ले के पार्क से शुरू किया | जब भी वो कुछ बोलते चार लोग उनकी बात काट देते | कोई पूरी बात सुनने को तैयार ही नहीं था | यहाँ तक की अम्माँ भी घर में उनकी बात सुनती नहीं थीं |


विद्यापति जी बड़े परेशान  हो गए | बरसों के ज्ञान को घर में अम्माँ चुनौती देती तो बाहर  पड़ोस के घनश्याम जी | बस तर्क में उलझ कर रह जाते | अहंकार नाजुक शीशे की तरह टूट जाता और वो टुकड़े मन में चुभते रहते |

मन में 'मैं ' जागृत हुआ | मैंने इतना पढ़ा फिर भी मुझे कोई नहीं सुनता |किसी को कद्र ही नहीं है | वही बात टी वी पर कोई कहे तो घंटों समाधी लगाए सुनते रहेंगें |

वो तो मन से भी आध्यात्मिक हैं फिर कोईक्यों नहीं सुनता | 


पत्नी समझदार थी | पति की परेशानी भाँप गयी , बोली ,  " सारा दोष आपके मेकअप का है , ये जो आप ब्रांडेड कपडे पहन कर टाई लगा कर और पोलिश किये जूते चटकाकर ज्ञान बांटते हो तो कौन सुनेगा आपको | लोगों को लगता है हमारे जैसे ही तो हैं फिर क्या बात है ख़ास जो हम इन्हें सुने | थोडा मेकअप करना पड़ेगा ... हुलिया बदलना पड़ेगा |


बात विद्यापति जी को जाँच गयी | अगले दिन सफ़ेद धोती -कुरता ले आये | एक झक सफ़ेद दुशाला और चार -पांच रुद्राक्ष की माला भी खरीद  ली |दाढ़ी -बाल बढाने  शुरू हो गये  |


कुछ दिन बाद पूरा मेकअप करके माथे पर बड़ा तिलक लगा कर निकले तो पहले तो माँ ही सहम गयीं , " अरे ई तो सच्ची में साधू सन्यासी हो गया | उस दिन माँ ने बड़ी श्रद्धा से उनके मुंह से रामायण सुनी |


विद्यापति जी का आत्मविश्वास बढ़ गया | 


घर के बाहर निकलते ही चर्चा आम हो गयी | विद्यापति जी बड़े ज्ञानी हो गए हैं | साधारण वस्त्र त्याग दिए | हुलिया ही बदल लिया , अब ज्ञान बांटते हैं |


आज पार्क में भी सबने उन्हें ध्यान  सुना |


धीरे -धीरे पार्क में उन्हें सुनने वालों की भीड़ बढ़ने लगी |


आज विद्यापति जी के हाथों में भी रुद्राक्ष  की मालाएं  लिपटी होती हैं , पैरों में खडाऊं  आ गए हैं .... अब उन्हें सुनने दूसरे शहरों  से भी लोग आते हैं |


नीलम गुप्ता



* मित्रों हम जो भी काम करें उसके अनुरूप परिधान होने चाहिए | उसके बिना बिना हमारी बात का उतना प्रभाव नहीं पड़ता | फिल्मों में भी किसी चरित्र को निभाने से पहले उसके गेट अप में आना पड़ता है |असली जिंदगी में भी यही होता है | आप जो भी करे आप के वेशभूषा उसी के अनुरूप हो |

यह भी पढ़ें ........




 आपको    " मेकअप "कैसी लगी   | अपनी राय अवश्य व्यक्त करें | हमारा फेसबुक पेज लाइक करें | अगर आपको "अटूट बंधन " की रचनाएँ पसंद आती हैं तो कृपया हमारा  फ्री इ मेल लैटर सबस्क्राइब कराये ताकि हम "अटूट बंधन"की लेटेस्ट  पोस्ट सीधे आपके इ मेल पर भेज सकें |



keywords: short stories , very short stories, makeup,personality, spiritual guru

                               
3 गलतियाँ जिसके कारण relationship counseling आपकी मदद  नहीं कर पाती



एक समय था जब पति -पत्नी में झगडे होते थे तो परिवार के बड़े बुजुर्ग संभाल लेते थे | परन्तु आज परिस्थितियाँ अलग हैं | आज एकल परिवार है और उस पर भी " my life my rules " के चलते बड़े -बूढों की दखलंदाजी पूर्णतया निषिद्ध कर दी गयी है | ऐसे में छोटे झगड़ों के तलाक तक  पहुँचते देर नहीं लगती है | पर तलाक हमेशा समस्या का समाधान नहीं होता | ये हमेशा जरूरी भी नहीं होता |   हर किसी का अपने जीवन साथी में बहुत बड़ा " emotional investment " होता है | ये बहुत पीड़ा दायक प्रक्रिया है , खासकर तब जब बच्चे हो चुके हो , जिन्हें माँ या पिता के बीच में से एक को चुनना पड़ता है | इसलिए आजकल दम्पत्ति टूटते रिश्तों को सँभालने के लिए  relationship counselling की मदद लेते हैं |


3 गलतियाँ जिसके कारण relationship counseling आपकी मदद  नहीं कर पाती


relationship counselling  नए ज़माने का शब्द है और शायद नए ज़माने के लोगों को ही इसकी ज्यादा जरूरत भी है | लोग इस आशा से  काउंसलर के पास जाते हैं कि उनके रिश्ते में फिर से पहली वाली बात आ जाए , या जो भी गलतफहमी आपस में  हो गयी है वो ठीक हो जाए | अक्सर ऐसा होता भी है | एक अच्छी सलाह के साथ दोनों वापस आते हैं और ख़ुशी -ख़ुशी अपनी जिन्दगी शुरू करते हैं |


 relationship  therapist मधुरिमा बजाज कहती हैं कि  एक दूसरे को सुनना , समझना या बात करना एक स्किल है जिससे थेरेपी की जाती है | बहुत से लोग छोटे झगड़ों में ही आ जाते हैं और समस्या आसानी से सुलझ जाती है | पर बहुत से लोग बात तलाक तक पहुँचने पर आते हैं वो बहुत आहत होते हैं उनमें एक दूसरे के प्रति गुस्सा बहुत भरा  होता है | ऐसे में उनको संभालना मुश्किल होता है | परन्तु कई लोग इस मन: स्थिति के साथ आते हैं कि सब प्रयास कर लिए चलो इसे भी  आखिरी दांव की तरह कर के देख लेते हैं | उनको देख कर यह तय करना मुश्किल हो जाता है की क्या वो वास्तव में अपना रिश्ता बचाना चाहते हैं ?


जाहिर है ऐसे रिश्तों को बचाना मुश्किल हो जाता है |

अगर आप भी किसी relationship  counseling के लिए जाना चाहते हैं | तो अपना समय , पैसा और ताकत बर्बाद होने से बचने के लिए उन तीन गलतियों से दूर रहना होगा  जिन्हें करने वाले लोगों की counselling कोई मदद नहीं कर पाती |


1) वो  एक दूसरे की गलतियां देखने से बाज नहीं आते


                                                       ऋतिक और सान्या  जब काउंसलर के पास गए तो वो दोनों वहीँ झगड़ पड़े | ऋतिक सान्या पर  आरोप लगाये जा रहा था और सान्या  ऋतिक पर | दोनों दूसरे का पक्ष सुनने को तैयार ही नहीं थे | यही तो वो घर में करते थे फिर काउन्सलिंग की फीस देने और यहाँ आने से क्या फायदा | दरअसल जब आप काउंसेलर के पास जाने का मन बनाये तो अपना " rigid attitude " लेकर न जाएँ | ये सोच कर न जाए कि ये केवल दूसरे की गलती है जिस कारण रिश्ते में समस्या आ रही है | यहाँ जरूरी है की आप खुले दिमाग से जाए , आप सुनाने नहीं सुनने जा रहे हैं | सुना तो आप घर में भी लेते थे | यहाँ ये सोच कर जाइए कि आपको खुले दिल से दूसरे की बात समझनी है |


बीना को   नौकरी करने का मन था , उसे लगता था उसकी शिक्षा व्यर्थ हो गयी है | किशोर चाहता था वो घर  में ही रहे | अक्सर वो बीना से कहता कि तुम्हें तो तफरी करने कला शौक है , घर में पैर बंधते नहीं है | और बीना उस पर मिडल क्लास मेंटेलिटी का लेबिल लगा देती | जिससे झगडा बढ़ जाता | जब दोनों खुले दिमाग से कोउन्लर के पास  गए तब किशोर को पता चला कि बीना अपनी सहेलियों के सामने छोटा महसूस करती है जो आज बाहर जा कर काम कर रहीं हैं व् पैसे कमा रहीं हैं , जबकि पढाई में वो उससे बहुत पीछे थीं | बीना को भी पता चला कि किशोर को भय है कि कामवाली ठीक से बेटे का  ध्यान नहीं रखेगी | बचपन में उसका चचेरा भाई बाथ  तब में गिर जाने के कारण दुनिया से चला गया , उस समय उसकी चाची पड़ोसन के घर में बैठ शादी का वीडियो देख रही थीं |

दोनों ने एक दूसरे के पक्ष को समझा | जिसे वो घर में बहस के बीच नहीं समझते थे | बीच का रास्ता निकला | बीना ने एक ऐसे स्कूल में नौकरी की जिसमें छोटे बच्चों की डे केयर की सुविधा थी | बीना को सम्मान मिला और किशोर  भय मुक्त हुआ | 


ऐसा तभी संभव हुआ जब दोनों ने एक दूसरे को सुना | एक दूसरे के प्रति खुले दिल से व् अपने को कुछ हद तक बदलने के वादे  के साथ गए | लेकिन अगर कोई जोड़ा सिर्फ अपनी बात सिद्ध करने के उद्देश्य से आता है तो उसकी शादी को बचना मुश्किल है |


2) ये केवल दो लोगों के बीच का मामला नहीं है 

                                                           ऐसे लोगों की counseling भी मुश्किल होती है | जो ये सोचते हैं की ये हमारे बीच का झगडा है और हम सुलझा लेंगे | दरअसल दो लोग नहीं लड़ रहे होते हैं दो बिलीफ सिस्टम लड़ रहे होते हैं | वो बिलिफ सिस्टम जो बचपन में अपने परिवार की परवरिश द्वारा बनते हैं | इसीलिए पहले लोग परिवार पर बहुत ध्यान देते थे | आज के बच्चे खुद चयन करते हैं और सोचते हैं परिवार के सत्यह रहना तो है नहीं फिर उनपर ध्यान देने कसे क्या लाभ | लेकिन किसी भी व्यक्ति के स्वाभाव की जेड उसके परिवार में होती हैं | लतिका  के माता -पिता का रिश्ता बहुत प्यार भरा था | उसके पिता उसकी माँ को कभी ऊँचे स्वर में कुछ नहीं कहते थे | दीपेश के माता -पिता के झगडे के बीच दोनों के पुरखे भी तार दिए जाते थे | बाद में सॉरी -सॉरी से बात आई गयी हो जाती |


दीपेश  को लगता वो कुछ भी कह दे बाद में सॉरी से बात खत्म हो जायेगी पर लतिका के लिए एक -एक कडवा शब्द जिन्दगी भर का नासूर बन जाता | वो दीपेश से कटने लगती | दीपेश को ये नागवार गुज़रता |झगडा खिचता जाता | बात छोटी होती दूरियाँ बढती जा रहीं थीं | विवाह के बाद हम नए इंसान नहीं बन जाते ... हम अपने पिछले जिए जीवन का प्रोडक्ट होते हैं | बेहतर  है कि जब काउंसेलर बचपन के जीवन में जाए तो उसे रोकें नहीं , क्योंकि समस्या के बीज कई बार वहां होते हैं | ऐसे में उपरी तौर पर सब ठीक दिखने के बाद भी कुछ ठीक नहीं होता |

ये गांठे खोलने में समय लगता है | ये प्रक्रिया जल्दी खत्म हो इसके लिए अधीर लोग counseling बीच में ही छोड़ देते हैं और फिर वैसे ही लड़ -झगड़ कर अलग हो जाते हैं |


3) काउंसलर सब ठीक कर देगा 


                                       ये एक बहुत बड़ी गलती है जो अक्सर लोग करते हैं | ये वो लोग हैं  थेरेपिस्ट के ऑफिस में खुल कर बात करते हैं , एक दूसरे को सुनते हैं , गांठे खोलने की इजाजत भी देते हैं |उन्हें लगता है थेरेपिस्ट सब ठीक कर देगा | लेकिन ऐसा होता नहीं है | एक रिश्ता दो लोगों के बीच की आपसी समझदारी है जो सिर्फ थेरेपिस्ट के ऑफिस में दिखा  देने से काम नहीं चलेगा | असली शुरुआत तो घर आने के बाद है क्योंकि ये आपको करना है | यहाँ कोई दवाइयां नहीं है | सिर्फ सलाह है जिस पर चल कर खुद में और घर के वातावरण में सुधार करना है | वहां जहाँ थेरेपिस्ट नहीं है |


व्योम व् मेधा को लगता कि थेरेपिस्ट सब कुछ ठीक कर देगा | वो ६ महीने तक काउंसेलिंग सेशन लेते रहे ... पर घर में वो पूर्ववत ही रहे | ये कोई जादू  की छड़ी नहीं थी | यहाँ इच्छा और ईमानदार प्रयास की जरूरत थी | अफ़सोस उनके रिश्ते को थेरेपिस्ट व् थेरेपी भी नहीं बचा सकी |


                     अगर आप भी ये गलतियां कर रहे हैं तो इसका मतलब ये नहीं है कि ये रिश्ता टूटना ही टूटना है | कोशिश करिए ये गलतियां न करें | ये भी सही है कि शुरू में सब को लगता है की उनका रवैया सही है , पर धीरे -धीरे समझिये | खुद भी प्रयास करिए | एक खूबसूरत रिश्ते से बेहतर कुछ भी नहीं होता , और इसे बचाना आपकी प्राथमिकता होनी चाहिए |

वंदना बाजपेयी 
फाउंडर ऑफ़ अटूट बंधन .कॉम 

लेखिका



यह भी पढ़ें ...





आपको    " लतियां जिसके कारण   relationship counseling  मदद  नहीं कर पाती   "कैसा लगा    | अपनी राय अवश्य व्यक्त करें | हमारा फेसबुक पेज लाइक करें | अगर आपको "अटूट बंधन " की रचनाएँ पसंद आती हैं तो कृपया हमारा  फ्री इ मेल लैटर सबस्क्राइब कराये ताकि हम "अटूट बंधन"की लेटेस्ट  पोस्ट सीधे आपके इ मेल पर भेज सकें |



keywords -Relationship Counseling, couples, three mistakes of couples , relationship, Family and relationship issues


               
कर नहीं तो डर नहीं


कितना आसन होता है किसे औरत के दामन पर दाग लगा देना | औरतें अक्सर ऐसे इल्जामों के बाद डर कर बैठ जाती हैं , पर राधा उन औरतों में से नहीं थी उसका कहना था " कर नहीं तो डर नहीं " | राधा के लिए ये हिम्मत दिखाना आसान नहीं था जबकि मायके और ससुराल में उसका साथ देने वाला कोई नहीं था |


कहानी -कर नहीं तो डर नहीं 




 करीब 25 -30 साल पहले की बात है |   जिला कानपुर के गाँव सह्जौरा के गिरिजा शंकर पांडे जी के चौथे लड़के के पोते का मुंडन था | काम काज का घर था |अफरा तफरी मची थी |जौ किन्ने रख दौ , वो कहाँ रख दौ की पुकार मची थी | घर के  सभी लड़के इधर -उधर दौड़ रहे थे पर घर में चार -चार बहुए होते हुए भी तीसरे नंबर की बहु ही काम करती नज़र आ रही थी | देवेन्द्र पांडे की पत्नी राधा तीसरे नंबर की बहु थी | दो -दो जेठानियाँ और एक देवरानी के होते हुए भी घर का सारा काम उसके ऊपर था | होता भी क्यों न , सब के सब मायके सम्पन्न  थे | एक  वही गरीब घर की थी , उस पर माँ सौतेली | कहते हैं जब माँ दूसरी हो तो बाप तीसरा हो जाता है | माँ -पिता का बस इतना कर्तव्य था की उसे ब्याह दे और उऋण हो जाए | ब्याहने के बाद उन्हें कोई मतलब ही नहीं था कि वो ससुराल में कैसे रहती है | पिताजी कभी तीज त्यौहार पर आते भी तो ससुर जेठ से मिलकर चले जाते | कोई कहता भी की बिटिया से मिल लो तो कहते , " जब घर ऐहेये , तबही मिलिहें , अबैय तो आप लोगन की कुशल समाचार पूछही की खातिर आए हैं |न उसका मायके जाने  मौका आता न ही मुलाक़ात होती |


     इस बात से राधा के   पिताजी की तो इज्ज़त भले ही बढ़  जाती पर घरमें सबको समझते देर न लगती कि राधा की मायके में कोई इज्ज़त नहीं है |  सौतेली माँ के डर से  पिता भी बेटी से बात करने से कतराते हैं | बुढ़ापे में भाग्य से जवान बीबी मिली है उसे खुश रखे या बिटिया को | जाहिर है बीबी का पलड़ा भारी हो जाता |



राधा ने भी इसे अपनी किस्मत समझ लिया था |  कोई शिकायत नहीं थी | ससुराल में दौड़ -दौड़ सबका काम करती | भगवान् ने देह भी बहुत फुर्तीली दी थी | चिड़िया सी फुदकती रहती | कभी कोई काम में कमी भी निकलता तो हँस कर  टाल देती , " अपने ही तो है , कह दिया तो कह दिया  "|

क्योंकि राधा सबका काम करती थी तो उसको थोडा बहुत प्यार मिल ही जाता था | कम से कम मायके से तो ज्यादा ही मिलता था |

 वो इसी में खुश थी |


      पाण्डेय कुनबा बहुत पैसे वाला नहीं था |  वैसे ही  घर में थोड़ी तंगी थी ऊपर से विधि की मार गिरिजा शंकर पाण्डेय जी को लकवा मार गया | सेवा तो राधा के हिस्से में आई पर इलाज का खर्चा बढ़ जाने से बजट बिगड़ने लगा | कटौती खाने -पीने में भी हुई | राधा अपने हिस्से की दाल-सब्जी  भी पति और जेठ को खिला देती | खुद सूखी रोटी से सब्र कर जाती | देह सूखने लगी | पर उसने उफ़ तक न की | वैसे ही हँस कर काम करती रहती | बड़े जेठ को जब बात पता चली तो उन्हें भय हुआ बीमार पड़ गयी तो पिताजी व घर का काम कौन करेगा | आफत आ जायेगी |


दिमाग दौड़ाया | पति देवेन्द्र पांडे हाज़िर किये गए |

  अतरिक्त आय के लिए ये फैसला हुआ कि रसोई  के पास वाला कमरा किराए पर उठा दिया जाए | हाँ  ये जरूर तय हुआ था कि दिया किसी ब्राह्मण को ही जाए | कहीं मीट  -माँस खाने वाला हुआ तो घर का धर्म भ्रष्ट होगा | लेकिन ब्राह्मण किरायेदार मिलना मुश्किल था | अव्वल तो ब्राह्मणों के पास किराया देने का पैसा होता नहीं , ऊपर से कंजूसी खून में मिली हुई होती है | गाँव से शहर नौकरी करने आने वाले अपने किसी रिश्तेदार के घर ही टिक जाते , किट -किट होती रहे तो क्या  शहर पैसा जोड़ने आये हैं , लुटाने नहीं | गिरिजाशंकर के बेटे भी तो जब गाँव से आये थे तब रिश्तेदारों के यहाँ ही टिके थे , मान -अपमान सब सहा पर हिले नहीं | जब चार पैसे जोड़ कर एक कच्चे -पक्के घर का इंतजाम कर लिया तभी रिश्तेदार का घर छोड़ा | खैर राम -राम कर के एक किरायेदार मिला |


नया किएराए दार जीवन चतुर्वेदी गाँव से आया था | अभी अकेला ही था , हालांकि ब्याह पक्का हो गया था | एक कारखाने में नौकरी करता था | सुबह ९ -१० का गया , देर रात लौटता | जवान उम्र थी नींद जल्दी खुलती नहीं थी | ऊपर से खुद का भोजन बनाना | पंडित जो ठहरा , बाहर का खाना खाता  नहीं था | आलम ये था कभी दाल जलती कभी चावल , कभी दोनों ऐसे बनते कि काग़ज़ की नाव तैरा  लो |



राधा रसोई से देखती  तो उसका दिल आद्र हो उठता | इतनी मेहनत करता है बनाने वाली कोई है नहीं | जल्दी ब्याह काहे नहीं कर लेता , बनी बनायी खाने को मिलेगी |


एक दिन राधा रसोई के बाहर बैठ  जूठे बर्तन मल  रही थी | तभी जीवन आ गया | उसके हाथ में जला हुआ पतीला था | राधा की ओर देख कर बोला , " भाभी  थोड़ी राख  मिलेगी  , आज  पतीला ज्यादा ही जल गया है , कालिख छूट नहीं रही  | राधा ने उसके चेहरे पर बेचारगी देख कर  कहा , देवर जी , यहीं रख दीजिये , हम धो देंगे | उम्र में छोटे हैं आप हमसे | काहे परेशान  होंगे, ये आदमियों के काम नहीं  | जीवन ने पतीला वहीँ रख दिया |


जीवन शाम को लौटा तो पतीला हीरे सा चमक रहा था | ये तो नए से भी ज्यादा चमक रहा था |  झट से राधा को धन्यवाद देने पहुँच गया |

राधा हंस कर बोली , " काहे  धन्यवाद देते हैं देवर जी , ये कोई बड़ा काम थोड़ी ही है |औरत का जन्म तो काम करने की खातिर ही हुआ है | एक पतीला और मांज दिया तो का फर्क पड़ता है |

अरे नहीं भाभी , "हम जानते  हैं आप  आप बहुत कमेरी हैं | किरायेदार हूँ तो क्या हुआ देखता तो रहता हूँ आप दिन भर अकेले सारा काम करतीं हैं उस पर मेरे बर्तन भी धोये | इस बात की परवाह किये बैगैर की आप के परिवार वाले छोटी सोच के हैं  , पता नहीं क्या -क्या बात बनाए |

राधा फिर हंसी , " क्या देवर जी ,ई तो इंसानियत की खातिर | हमारी अम्माँ समझाया करती थीं | आदमी  के काम ही न आये तो जीना ही बेकार है |  फिर आप तो मेरे छोटे भाई जैसे हैं | कोई काहे कुछ कहेगा | फिर भी ऐसी बातों के लिए  हम तो इतना जानते हैं कि "कर  नहीं तो डर नहीं" |


जीवन की हिम्मत थोड़ी बढ़ गयी | एक दिन राधा से बोल उठा , " भाभी सबका खाना बना कर अपनी ही बटलोई में थोड़ी दाल , चावल उबाल दिया करो , मुझसे ठीक से बनती नहीं | कच्चा -पक्का खा कर सेहत बिगड़ रही है | काम नहीं करूँगा तो  गृहस्थी कैसे चलेगी ? गृहस्थी तो छोड़ो , शादी कैसे होगी | बस इतनी मदद कर दो  फिर देखना जब ब्याह  के बाद हमारी घरवाली आएगी तो तुम्हारी कितनी सेवा करवाएंगे |

ठीक है , ठीक है देवर जी , हम भी देखेंगे कितनी सेवा करवाओगे ? कह राधा मुस्कुरा देती |

जीवन 10 किलो दाल -चावल खरीद कर राधा को दे गया | अब  अपने घर परिवार की  दाल -चावल बना कर रोज जीवन के लिए दाल -चावल बनाना राधा का कर्तव्य हो गया | राधा को इसमें संतोष मिलता | किसी मनुज की मदद करने का संतोष , वही जो  उसकी अम्माँ ने सिखाया था | कभी -कभी आसमान की तरफ देख कर राधा खुद से बडबडाती , " अम्माँ , " देखो तुम्हार बिटिया घर -परिवार , सास ससुराल सब का ठीक से संभल रही है और एक  मनुज की भी मदद कर रही है  " | ऐसा कह कर राधा को बहुत संतोष हो जाता कि उसकी माँ उसके साथ है |

जीवन आता  , दाल -चावल ले के चला जाता | कभी राधा ही घर के किसी बच्चे के हाथ से भिजवा  देती | ज्यादा बातचीत उन दोनों के बीच नहीं होती थी |



शुरू में तो किसी ने कुछ  नहीं कहा,  किराया जो मिल रहा था | धीरे -धीरे जेठानियों के बीच कानाफूसी होने लगी ... " कुछ तो है , जो दाल के साथ पक रहा है | " ताने उलाहने दिए जाने लगे |


रसोई से जीवन का कमरा दूर नहीं था | उसे भी भनक लग ही गयी | अगले दिन उसने राधा के पास जा कर दाल-चावल  बनाने से मना  कर दिया |


काहे देवर जी , जो कहा हमसे कहा , आप क्यों दिल पर लेते हैं | उनकी सोच नीच है तो हम का करें , हमने तो पहले ही कह दिया था " कर नहीं तो डर नहीं "|  सर का पल्ला सँभालते हुए राधा ने कहा |


पर भाभी , जीवन कुछ कह पाता  उससे पहले राधा ने दाल- चावल  का पतीला आगे कर दिया |


देवरानी पास ही खड़ी थी | उसे लगा गज़ब औरत है , मायके में कोई खैरख्वाह नहीं तब भी समाज का डर नहीं , इसे तो सीधा करना ही पड़ेगा , कल को कोई ऊँच -नीच हो गयी तो ? उस ने सारी  बातें नमक मिर्च लगा कर जेठ-जेठानी  को बता दी | सुनते ही जेठ आग बबूला हो गए | शाम को जैसे ही राधा का पति  घर आया उन्होंने उसे बुला कर कहा , " जरा ठोंक पीट कर अपनी पत्नी  को समझा दो , ये भले लोगों क घर है, यहाँ ये सब शोभा नहीं देता |   पराये मर्द से मुँह लगाए फिरती है , उसकी सेवा -टहल करती है |  अभी बात घर के अन्दर है , कल को बाहर जायेगी | ये इश्कबाजी यहाँ चलेगी नहीं |



जेठ का सारा गुस्सा पति की आँखों  में उतर आया | सीधा कमरे में जाकर  बेल्ट उतार  कर राधा की चमड़ी उधेड़ दी | राधा , "हमने कुछ नहीं किया , हमने कुछ नहीं किया " की गुहार लगाती रही पर पति का गुस्सा उसे अधमरा कर के ही उतरा | दूसरे दिन कमरे में ही पड़ी रही | शरीर से ज्यादा चोट आत्मा पर थी | पहली बार उसने भाग्य को कोसा | मायके में कोई होता तो क्या ये लोग यूँ जानवर की तरह पीट पाते |  या औरत का शरीर ही ना मिला होता , भगवान् चिड़िया , कौव्वा कुछ भी बना देता तो इस तरह बिला वजह अपमानित तो न होना पड़ता |



अगले दिन हिम्मत कर के रसोई में पहुंची | घर का खाना  बना , दाल -चावल बना कर जीवन के कमरे में स्वयं गयी | आज पहली बार जीवन में कमरे में गयी थी  | उसे देख जीवन सकपका गया | जीवन ने उसकी पिटाई की खबर  सुनी थी पर उसके हाथों व् मुंह में नीले साये देखकर उसकी आँखे भर आयीं  | आँसू पोंछते  हुए बोला , " भाभी हमने मना  किया था ना , पर आप ने ही ये कह कर बात काट दी  कि " कर नहीं तो डर  नहीं " देखिये कितना मारा आपको , कसाईं  की तरह | अब हम ये कमरा खाली कर देंगे | तब तक आप दाल-चावल  ना बनाना हमारे लिए |


ये मार उस मार से ज्यादा गहरी है देवर जी  , राधा धीरे से बोली |

क्या मतलब भाभी , जीवन ने आश्चर्य से पूंछा |


देवर जी मैं रोज ऐसे ही दाल-चावल  बनाउंगी आपके लिए | मैंने वादा किया था आपसे , आपका ब्याह होने तक छोटे भाई की तरह आप का भोजन का इंतजाम मेरा रहेगा "  मैं अपने वचन से कैसे  फिर जाऊं  | मैंने पहले ही कहा था ना, " कर नहीं तो डर नहीं "जब मेरी और आपकी आत्मा पवित्र है तो इलज़ाम लगाने वाले चाहे जो कहें जितना मारे ... शरीर को ही तो चोट देंगे , आत्मा को नहीं | लेकिन अगर आप चले गए या मैंने दाल-चावल  बनाना छोड़ दिया तो ये सिद्ध हो जाएगा की कुछ तो गलत था जो मार कर ठीक कर दिया | ये घाव आत्मा पर होगा जो कभी नहीं भरेगा | माना की मेरा कोई नहीं है पर मैं इतनी कमजोर नहीं हूँ देवर जी कि मार के डर से उनके झूठ को सच  बना दूँ |

ये मेरा युद्ध है , देर सवेर मेरी सच्चाई साबित हो ही जायेगी | 


कह कर राधा चली गयी | जीवन उसके साहस के आगे नतमस्तक  हो गया | राधा दाल -चावल बनाती रही , पिटती रही, पति -पत्नी में बातचीत बंद थी | देवेन्द्र पाण्डेय जितनी देर उससे बोलते पीटने में ही बोलते | देवारी , जेठानी उससे काम तो करवाती पर पास बैठने न देतीं जैसे वो कोई अछूत हो | वो हर दर्द सहती  पर हर बार इल्जाम लगने पर उसका ये ही कहना होता " कर नहीं तो डर नहीं" |


जीवन अपरोक्ष रूप से उसके इस युद्ध में साथ था | वो जानता था कि घर के लोग जानते हैं कि राधा ने कुछ किया नहीं है , फिर भी वो उसे अपनी अहमियत और उसकी औकात दिखाने के लिए सता रहे हैं | जब  राधा संघर्ष कर रही है तो वो कैसे घर छोड़ के जा सकता है | वैसे भी किराए की वजह से उससे सीधे कोई घर छोड़ने को कहेगा नहीं | हालांकि उसकी आत्मा चीत्कारती कि कब तक यह चलेगा | वो कारखाने से छुट्टी  लेकर महीने भर के लिए  गाँव चला गया |


महीने भर बाद जीवन का ब्याह हो गया | वो अपनी पत्नी ज्योति को लेकर घर आया | राधा ने आरती उतार  कर गृह प्रवेश कराया  ज्योति ने राधा के पाँव  छू  कर आशीर्वाद लिया |


अब राधा जीवन के लिए  दाल-चावल  नहीं बनाती थी | जीवन के लिए ज्योति ही पूरी रसोई बनाती थी |  ज्योति को जीवन ने सब बता दिया था  | ज्योति के मन में राधा के लिए बहुत इज्ज़त थी | वो हर दिन पूजा के बाद राधा के पाँव छूती | राधा मना करती तो कहती , छूने दो जीजी , ये सिर्फ जेठानी के आशीर्वाद के लिए नहीं करती हूँ | आप की हिम्मत के लिए झुकती हूँ जो आपने दिखाई है | राधा हँस कर उसे गले लगा कर कहती , हिम्मत ही तो दिखानी  हम औरतों को , मैने तो शुरुआत की है | ज्योति  और राधा में  अपनापन बढ़ते देख जेठानियों  के बीच खुसुर -पुसुर भी बंद हो गयी थी | सब कहने लगीं , हमीं   ने गलत समझा था, इसके और जीवन के बीच तो कुछ था ही  नहीं  |

देवेन्द्र पाण्डेय  को भी लगने लगा बेकार ही डांटा -मारा  ये तो निर्दोष है | उस रात कई दिन बाद वो राधा के लिए गजरा  ले कर आया , उसके आगे रख कर बोला , " राधा हमी गलत समझे थे , तू तो हमारी ही है तन से भी और मन से भी |  राधा गजरे का मतलब खूब समझती थी | इसीलिए उसने भी रात को पति के दूध में बादाम पीस कर डाल  दी | एक बार फिर वो स्वीकार्य थी | वो पूनम की रात थी और जाने कितनी अमावसों का अँधेरा दूर करके उसके जीवन में चांदनी फिर से झिलमिला उठी थी |


 राधा निर्दोष साबित हो गयी थी |

निर्दोष साबित हो गया था वो वाक्य जिस पर स्त्री स्वाधीनता संघर्ष की अनाम योद्धा  राधा को अटूट विश्वास था जिसका हाथ थाम  कर उस अनाथ ने इतना साहस किया था ...

   " कर नहीं तो डर नहीं "

वंदना बाजपेयी 

फाउंडर ऑफ़ अटूट बंधन .कॉम 
लेखिका




यह भी पढ़ें ...

चंपा का मोबाइल

अंतिम इच्छा

घूरो , चाहे जितना घूरना है

किट्टी पार्टी


   आपको    "  कर नहीं तो डर नहीं "कैसी लगी   | अपनी राय अवश्य व्यक्त करें | हमारा फेसबुक पेज लाइक करें | अगर आपको "अटूट बंधन " की रचनाएँ पसंद आती हैं तो कृपया हमारा  फ्री इ मेल लैटर सबस्क्राइब कराये ताकि हम "अटूट बंधन"की लेटेस्ट  पोस्ट सीधे आपके इ मेल पर भेज सकें |



keywords - story, hindi story, story in hindi, fear, women issues     


टैम्पोवाली


             ये सही है कि जमाना बदल रहा है पर स्त्रियों के प्रति सोच बदलने में समय लगेगा | ये बात जहाँ निराशा उत्पन्न करती है वहीँ कई लोग ऐसे भी हैं जो आशा की किरण बन कर उभरते हैं | एक ऐसे ही किरण चमकी टैम्पो वाली की जिंदगी में 


लघुकथा -टैम्पोवाली



सुबह का अलार्म जो बजता है उसके साथ ही दिन भर का एक टाइम टेबल उसकी आँखों के सामने से गुजर जाता । जल्द ही काम सिमटा कर  बूढ़ी माँ की अाज्ञा ले सिटी के मुख्य चौराहे परअपना टैम्पो को खड़ा कर लेंती थी यहाँ पर और भी टैम्पो खड़े होते थे लेकिन महिला टैम्पो वाली नाक के बराबर थी इन रिक्शे वालों के बीच से घूरती कुछ आँखे उसके चेहरे पर आ टिक जाती थी एक सिहरन फैल जाती उसके बाॅडी में । वो सिकुड़ रह जाती है। सोचने को मजबूर हो जाती कि भगवान ने पुरूष महिला के बीच भेद को मिटा क्यों नहीं दिया जो उसे लोगों की घूरती निगाहें आर-पार हो जाती है । 


                सिर से पैर तक अपने को ढके वो अपने काम में लीन रहती हर रेड लाइट पर रूक उसको ट्रेफिक पुलिस से भी दो चार होना पड़ता , यह पुलिस भी गरीब को सताती है और अमीर के सामने बोलती बंद हो जाती है ।


     शादीशुदा होने के बावजूद उसको पति का हाथ बँटाने के लिए यह निर्णय लेना पड़ा पति जो टैम्पो चालक था सिटी के मुख्य रेलवे स्टेशन पर टैम्पो खड़ा कर देता था चूँकि वह एक पुरूष था इसलिए सब कुछ ठीक चलता लेकिन टैम्पो वाली दो चार ऐसी खड़ूस सवारी मिल जाती थी जो पाँच के स्थान पर तीन रूपये ही देती और आगे बढ जाती । 


       दिन प्रतिदिन यही चलता शाम को घर लौटने पर बेटी बेटे की देख रेख करना और सासु के साथ हाथ बँटाना रात थक बच्चों के साथ सो जाना । वाकई रोटी का संकट भी विचित्र होता है सब कुछ करा देता है । सुबह से शाम तक सिटी के चौराहों की धूल फाँकना सवारी को बैठाना और उतारना और कहीँ कहीँ पुरुष की सूरत में  बैठने वाले कुत्तों से दो चार होना यहीँ जीवन चर्या थी । 

          एक बार उसका टैम्पो कई दिन तक नहीं निकला तो उसकी रोजमर्रा की सवारी थी उसमें से एक जो उसके टैम्पों से आफिस जाया करता था बरबस ही उसके विषय में सोचने लगा कि "ऐसा क्या हुआ जो वो दिखाई नहीं देती " पर पता न होने के कारण ढूढ़ भी नही सका ।


                  टैम्पोवाली का  बीमारी से शरीर बहुत दुर्बल हो गया था एक रोज जब वह किसी दोस्त से मिलने जा रहा था तो वही टैम्पो खड़ा देखा जिस पर अक्सर बैठ आफिस जाता था पूछताछ करने पर पता लगा कि वो पास ही रहती है ।

                पता कर घर पहुँचा तो माँ बाहर आई "बोली , बाबू किते से आये हो और किस्से मिलना है " संकुचाते हुए उसने टैम्पो वाली के विषय में पूछा तो पता लगा , बीमार है और पैसे न होने के कारण इलाज नहीं हो सकता  , बताते हुए माँ सिसकने लगती है " वो व्यक्ति कुछ पैसे निकाल देता है इलाज के लिए । 

         बच इसी बीच उसका पति अपना टैम्पो ले आ जाता है वस्तुस्थिति को समझते हुए पति हाथ जोड़ पैर में गिर पड़ता है और सोचने लगता है कि दुनियाँ में नेक लोगों की कमी नहीं ।

डॉ . मधु त्रिवेदी 

लेखिका

यह भी पढ़ें ...

गलती किसकी

टिफिन 

आपको    "टैम्पोवाली "कैसी लगी   | अपनी राय अवश्य व्यक्त करें | हमारा फेसबुक पेज लाइक करें | अगर आपको "अटूट बंधन " की रचनाएँ पसंद आती हैं तो कृपया हमारा  फ्री इ मेल लैटर सबस्क्राइब कराये ताकि हम "अटूट बंधन"की लेटेस्ट  पोस्ट सीधे आपके इ मेल पर भेज सकें |



keywords: short stories , very short stories, tempo, short story in hindi

                 
Midlife Crises क्या है और इससे कैसे बाहर निकलें



  एक तरफ बुजुर्ग होते माता -पिता की जिम्मेदारी दूसरी तरह युवा होते बच्चों के कैरियर व्  विवाह की चिंता और इन सब से ऊपर अपने खुद के स्वास्थ्य का गिरते जाना या उर्जा की कमी महसूस होना | midlife जिसे हम प्रौढ़ावस्था भी कहते हैं  वो समय है जब लगातार काम करते -करते व्यक्ति को महसूस होने लगता है कि उसकी जिन्दगी काम के कभी खत्म न होने वाले चक्रव्यूह में फंस गयी है |तबी कई भावनात्मक व् व्यवहारात्मक परिवर्तन होने लगते हैं | जिसे सामूहिक रूप से midlife क्राइसिस के नाम से जाना जाता है |


Midlife Crises क्या है और इससे कैसे बाहर निकलें 


     याद है जब पहला सफ़ेद बाल देखा था ... दिल धक से रह गया होगा | क्या बुढ़ापा आने वाला है ? अरे हम तो अपने लिए जिए  ही नहीं अब तक | तभी किसी हमउम्र की अचानक से मृत्यु की खबर आ गयी |कल तक तो स्वस्थ था आज अचानक ... क्या हम भी मृत्यु की तरह बढ़ रहे हैं| क्या इतनी जल्दी सब कुछ खत्म होने वाला है |45 से 65 की उम्र में अक्सर लोगों को एक मनोवैज्ञानिक समस्या का सामना करना पड़ता है , जिसे midlife crisis के नाम से जाना जाता है | इसमें मृत्यु भय , अभी तक के जीवन को बेकार समझना , जैसा जी रहे थे उससे बिलकुल उल्ट जीने की इच्छा , बोरियत , अवसाद , तनाव या खुद को अनुपयोगी समझना आदि शामिल हैं | ये मनोवैज्ञानिक समस्या शार्रीरिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती है |



                             उदहारण के तौर पर  कल रास्ते में  साधना जी मिल गयीं | बहुत थकी लग रहीं थी | धीमे -धीमे चल रही थीं | मैंने हाल चल पूंछा तो बिफर पड़ी , " क्या फायदा हाल बताने से ,  डायबिटीज है , पैरों में ताकत नहीं लगती ऊपर से अभी घुटने का एक्स रे कराया तो पता चला कि हड्डी नुकीली होना शुरू हो गयी है | डॉक्टर के मुताबिक अभी अपना ध्यान रख लो तो  जल्दी ऑपरेशन करने की नौबत नहीं आएगी  अब आप ही बताइये सासू माँ का हिप रिप्लेसमेंट हुआ है , बेटे के बोर्ड के एग्जाम चल रहे हैं , बाकी रोज के काम तो हैं ही ऐसे में तो लगता है कि जिन्दगी बस एक मशीन बन कर रह गयी है |



                   ऐसा नहीं है कि ये समस्या सिर्फ महिलाओं के साथ है पुरुष भी इससे अछूते नहीं हैं | रमेश जी  ऑफिस से लौटे ही थे कि पत्नी ने नए सोफे  के लिए फरमाइश कर दी | बस आगबबुला हो उठे | तुम लोग बस आराम से खर्चा करते रहो और मैं गधो की तरह कमाता रहूँ | अपने लिए न मेरे पास समय है न ही  तुम लोगों के बिल चुकाते -चुकाते पैसे बचते हैं |


                ये दोनों ही mid life crisis के उदाहरण हैं |इसके अतिरिक्त भी बहुत सारे कारण होते हैं | जैसे महिलाओं का मेनोपॉज व् माता -पिता की मृत्यु या किसे हम उम्र प्रियजन को खोना , अपने सपनों के पूरा न हो पाने का अवसाद ( इस उम्र में व्यक्ति को लगने लगता है कि उसके सपने अब पूरे नहीं हो पायेंगे क्योंकि उम्र निकल गयी है |



Midlife Crises के सामान्य लक्षण 


                                 यूँ तो midlife crisis के अनेकों लक्षण होते हैं जो अलग -अलग व्यक्तियों के लिए अलग होते हैं पर यहाँ हम कुछ सामान्य लक्षणों की चर्चा कर रहे हैं |

mood swings _ये लक्षण सामान्य तौर पर सबमें पाया जाता है | लोग जरा सी बात पर आप खो बैठते हैं | इसका बुरा प्रभाव रिश्तों पर भी पड़ता है |

अवसाद और तनाव - इसका शिकार लोग दुखी restless या तनाव में रहते हैं |

खुद के लुक्स पर ज्यादा ध्यान -  उम्र बढ़ने को नकारने के लिए खुद पर ज्यादा ध्यान देने लगते हैं | स्रि

बोरियत - ऐसा लगता है कि वो जीवन में कहीं फंस गए हैं जहाँ से निकलने का कोई रास्ता नहीं है | जीवन का उद्देश्य समझ नहीं आता |

मृत्यु के विचार - दिमाग पर अक्सर  मृत्यु के विचार छाए रहते हैं |

midlife crisis से निकलने के उपाय 
          
                   midlife crisis से निकलने के लिए कुछ सामान्य  उपाय अपनाए जा सकते हैं |

संकल्प -

                         बीमारी कोई भी हो सुधर का पहला रास्ता वो संकल्प है जिसके द्वारा ह्म ये स्वीकार करते हैं कि मेरी जिंदगी जैसे है वैसे नहीं रहनी चाहिए मुझे इसे बदलना है | अगर आप भी ये संकल्प ले लेते हैं तो समझिये आधा रास्ता तय हो गया |

ध्यान 


                          ध्यान एक बहुत कारगर उपाय है जो आपको अपनी तात्कालिक समस्याओं के कारण उत्त्पन्न तनाव व् अवसाद को दूर करने में सहायक है | दिमाग का स्वाभाव है कि वो एक विचार से दूसरे विचार में घूमता रहता है | कभी नींद न आ रही हो तो आपने भी ध्यान दिया होगा कि इसकी वजह ये नहीं थी कि आप रकिसी एक विचारपर केन्द्रित थे बल्कि आपका दिमाग एक विचार से दूसरे विचार पर कूद रहा था | जिसे आम भाषा में " monkey mind" कहते हैं | नेयुरोलोजिस्ट के अनुसार ये DMN या DEFAULT MODE NETWORK
है | ध्यान  मेडिटेशन हमें किसी एक विचार पर ध्यान  केन्द्रित अ सिखाता है | जिस कारण विचार भटकते नहीं है और गुस्सा , अवसाद व् तनाव जो कि अनियंत्रित विचारों का खेल है काफी हद तक कम हो जाता है | 



ख़ुशी की तालाश छोड़ दें 


                                 सुनने में अजीब लगेगा पर midlife crisis की एक बड़ी वजह ख़ुशी की तलाश है | लोग सोचते हैं कि कुछ ऐसा हो जिसमें वो खुश हो जाए | जब खुद छोटे थे तो ख़ुशी थी , युवा थे तो सपनों की ख़ुशी थी |बच्चे छोटे थे तो उनकी बातों में ख़ुशी थी |  प्रौढ़ अवस्था में ये सब खुशियाँ नहीं रहती तो लोग कारण तलाशते हैं कि ऐसा कुछ हो जाए तो खुश हो जाए , वैसा कुछ हो जाए तो खुश हो जाए | परन्तु ऐसा कुछ होता नहीं ... जिन्दगी अपनी गति से चलती है | ऐसे में ख़ुशी का इंतज़ार करने के स्थान पर ख़ुशी का निर्माण करना चाहिए | कितनी भी विपरीत परिस्तिथियाँ हों एक दिन छुट्टी लेकर सहेलियों के साथ निकल कर देखिये | एक -एक पल का आनन्द लें सोच पर खुद ब खुद असर पड़ने लगेगा | 



अपनी हॉबी विकसित करिए 

                                इस उम्र तक आते -आते हम भूल जाते  हैं कि हमारी भी कोई हॉबी थी | हॉबी वो काम है जिसे करने में हमें आनंद आता है |  जब जीवन से जीवंतता चली जाए तो याद करना चाहिए कि बचपन में हम ऐसा क्या करते थे कि हमें आनंद आता था | चित्रकला , लेखन , सिलाई , बुनाई , संगीत कुछ भी जो आप बचपन में करते थे उसे फिर से शुरू करिए | 



जीवन को उत्सव समझिये 


                                 जीवन अपने आप में उत्सव है | ये एक चमत्कार है कि इस समय हम जिन्दा हैं | ओशो के अनुसार जीवन के उत्सव में पूरी तरह से लीं हो जाइए | यहाँ कुछ बनना या पाना ही नहीं सिर्फ होना भर काफी है | आप के पास साँसे हैं तो आप अनुभूति कर पा रहे हैं |  सुख या दुःख , ख़ुशी या बोरियत इस अनुभूति का ही तो हिस्सा हैं | इसलिए जो कुछ मिला है उसके लिए शुक्रिया करते हुए जीना सीखिए | 



याद रखिये कि अभी भी कुछ नया कर सकते हैं 

उम्र बढ़ने का अर्थ जिंदगी खत्म होना नहीं है | कई लोगों ने प्रौढ़ावस्था से ही अपनी जिन्दगी को एक नया मतलब दिया | 

बोमन इरानी ने ४५ की उम्र में पहली फिल्म की |

मैत्रेयी पुष्पा जी की पहली कहानी छपी तब उनकी उम्र ४० के ऊपर थी |
सैम वाल्टन ने वालमार्ट की स्थापना ४४ की उम्र में की |
च्र्ल्स डार्विन ने ५० की उम्र में अपना रिसर्च वर्क पब्लिश किया |

                                  उम्र एक नंबर है | इससे ज्यादा कुछ नहीं | कभी भी नया करने की शुरुआत कर सकते हैं | 




                       जैसा की पहले भी कहा है midlife crisis एक मनोवैज्ञानिक समस्या है इसलिए मन को दुरुस्त रखने से ये अपने आप ठीक रहेगी | 


सरिता जैन 



लेखिका

यह भी पढ़ें ...







आपको  लेख "Midlife Crises क्या है और इससे कैसे बाहर निकलें " कैसा लगा  | अपनी राय अवश्य व्यक्त करें | हमारा फेसबुक पेज लाइक करें | अगर आपको "अटूट बंधन " की रचनाएँ पसंद आती हैं तो कृपया हमारा  फ्री इ मेल लैटर सबस्क्राइब कराये ताकि हम "अटूट बंधन"की लेटेस्ट  पोस्ट सीधे आपके इ मेल पर भेज सकें | 


filed under- midlife, midlife crisis, problems of middle aged persons


और ...पासा पलट गया

एक कहावत है , " बड़ा कौर खा ले पर बड़ी बात बोले " | कहावत बनाने वाले बना गए पर लोग जब -तब जो मन में आया बोलते ही रहते हैं .... इस बात से बेखबर की जब पासे पलटते हैं तो उन्हीं की बात उन के विपरीत आ कर खड़ी हो जाती है |

और ...पासा पलट गया 


श्रीमती देसाई मुहल्ले में  गुप्ता जी की बड़ी बेटी श्यामा के बारे में सब से  अक्सर कहा करतीं , " अरे देखना उसकी शादी नहीं होगी | रंग देखा है तवे सा काला है | कोई अच्छे घर का लड़का तो मिलेगा ही नहीं |हाँ पैसे के जोर पर कहीं कर दें तो कर दें, पर मोटी  रकम देनी पड़ेगी "|मैं तो करोंड़ों रुपये ले कर भी अपने मोहित के लिए ऐसे बहु न लाऊं कहते हुए वो अपने खूबसूरत बेटे मोहित को गर्व से देखा करतीं , जो वहीँ माँ के पास खेल रहा होता | मोहित माँ को देखता फिर खेलने में जुट जाता |


मुहल्ले वाले हाँ में हाँ मिलाते , हाँ रंग तो बहुत दबा हुआ है | पर क्या पता पैसे जोड़ रही हों | तभी तो देखो किसी से मिलती -जुलती नहीं | अपने में ही सीमित रहती हैं | अब आने जाने में खर्चा तो होता ही है |


मुहल्ले की इन बातों से बेखबर श्रीमती गुप्ता अपनी बेटी श्यामा को अच्छी शिक्षा व् संस्कार देने में लगी हुई थीं |क्योंकि वो कहीं जाती नहीं थीं , इसलिए उन्हें पता ही नहीं था कि श्रीमती देसाईं उनके बारे में क्या कहती हैं | कुछ साल बाद उनका तबादला दूसरे शहर में हो गया |


अब श्रीमती देसाई का शिकार मुहल्ले की कोई दूसरी महिला हो गयी थी |


समय पंख लगा कर उड़ गया | 


युवा मोहित ने माँ के सामने  श्यामा के साथ शादी की इच्छा जाहिर की | श्यामा  , अब IIT से  इंजिनीयरिंग करने के बाद उसी MNC में काम करती थी जिसमें मोहित था | कब श्यामा के गुणों पर मोहित फ़िदा हो गया किसी को पता नहीं चला | मोहित ने सबसे पहले बताया भी तो माँ को , वो भी इस ताकीद के साथ कि अगर ये शादी नहीं हुई तो कभी शादी नहीं करेगा |


माँ की मिन्नतों और आंसुओं का मोहित पर कोई असर नहीं हुआ | मजबूरन श्रीमती देसाई को  हाँ बोलनी पड़ी |


शादी के रिसेप्शन में चर्चा आम थी ....

" लगता है श्रीमती देसाई को करोंड़ों रूपये मिल गए हैं तभी तो वो श्यामा से मोहित की शादी के लिए राजी हुई | "

नीलम गुप्ता 

यह भी पढ़ें ...







 आपको    " और ...पासा पलट गया "कैसी लगी   | अपनी राय अवश्य व्यक्त करें | हमारा फेसबुक पेज लाइक करें | अगर आपको "अटूट बंधन " की रचनाएँ पसंद आती हैं तो कृपया हमारा  फ्री इ मेल लैटर सबस्क्राइब कराये ताकि हम "अटूट बंधन"की लेटेस्ट  पोस्ट सीधे आपके इ मेल पर भेज सकें |



keywords: short stories , very short stories, dice, life


चम्पा का मोबाइल

आज हर आम और खास के हाथ में मोबाइल जरूर होता है , परन्तु चंपा के मोबाइल में कुछ तो खास है जो पहले तो जिज्ञासा उत्पन्न करता है फिर संवेदना के दूसरे आयाम तक ले जाता है | आइये पढ़े आदरणीया दीपक शर्मा जी की  भावना प्रधान कहानी 

कहानी -चम्पा का मोबाइल


“एवज़ी ले आयी हूँ, आंटी जी,” चम्पा को हमारे घर पर हमारी काम वाली, कमला, लायी थी |गर्भावस्था के अपने उस चरण पर कमला के लिए झाड़ू-पोंछा सम्भालना मुश्किल हो रहा था|


चम्पा का चेहरा मेक-अप से एकदम खाली था और अनचाही हताशा व व्यग्रता लिए था| उस की उम्र उन्नीस और बीस के बीच थी और काया एकदम दुबली-पतली|

मैं हतोत्साहित हुई| सत्तर वर्ष की अपनी इस उम्र में मुझे फ़ुरतीली, मेहनती व उत्साही काम वाली की ज़रुरत थी न कि ऐसी मरियल व बुझी हुई लड़की की!

“तुम्हारा काम सम्भाल लेगी?” मैं ने अपनी शंका प्रकट की|

“बिल्कुल, आंटी जी| खूब सम्भालेगी| आप परेशान न हों| सब निपटा लेगी| बड़ी होशियार है यह| सास-ससुर ने इसे घर नहीं पकड़ने दिए तो इस ने अपनी ही कोठरी में मुर्गियों और अंडों का धन्धा शुरू कर दिया| बताती है, उधर इस की माँ भी मुर्गियाँ पाले भी थी और अन्डे बेचती थी| उन्हें देखना-जोखना, खिलावना-सेना.....”


“मगर तुम जानती हो, इधर तो काम दूसरा है और ज़्यादा भी है, मैं ने दोबारा आश्वस्त होना चाहा, “झाड़-बुहार व प्रचारने-पोंछने के काम मैं किस मुस्तैदी और सफ़ाई से चाहती हूँ, यह भी तुम जानती ही हो.....”

“जी, आंटी जी, आप परेशान न हों| यह सब लार लेगी.....”

“परिवार को भी जानती हो?”


“जानेंगी कैसे नहीं, आंटी जी? पुराना पड़ोस है| पूरे परिवार को जाने समझे हैं| ससुर रिक्शा चलाता है| सास हमारी तरह तमामघरों में अपने काम पकड़े हैं| बड़ी तीन ननदें ब्याही हैं| उधर ससुराल में रह-गुज़र करती हैं और छोटी दो ननदें स्कूल में पढ़ रही हैं| एक तो हमारी ही बड़ी बिटिया के साथ चौथी में पढ़ती है.....”


और पति?” मैं अधीर हो उठी| पति का काम-धन्धा तो बल्कि उसे पहले बताना चाहिए था|

“बेचारा मूढ़ है| मंदबुद्धि| वह घर पर ही रहता है| कुछ नहीं जानता-समझता| बचपन ही से ऐसा है| बाहर काम क्या पकड़ेगा? है भी इकल्ला उनपांच बहनों में.....”

“तुम घरेलू काम किए हो?” इस बार मैं ने अपना प्रश्न चम्पा की दिशा में सीधा दाग दिया|
“जी, उधर मायके में माँ के लगे कामों में उस का हाथ बँटाया करती थी.....”

“आज मैं इसे सब दिखला-समझा दूँगी, आंटीजी| आप परेशान न  हों.....”
अगले दिन चम्पा अकेली आयी| उस समय मैं और मेरे पति अपने एक मित्र-दम्पत्ति के साथ हॉल में बैठे थे|

“आजतुम आँगन से सफ़ाई शुरू करो,” मैं ने उसे दूसरी दिशा में भेज दिया|

कुछ समय बाद जब मैं उसे देखने गयी तो वह मुझे आँगन में बैठी मिली| एक हाथ में उस ने झाड़ू थाम रखा था और दूसरे में मोबाइल| और बोले जा रही थी| तेज़ गति से मगर मन्द स्वर में| फुसफुसाहटों में| उस की खुसुर-पुसुर की मुझ तक केवल मरमराहट ही पहुँची| शब्द नहीं| मगर उस का भाव पकड़ने में मुझे समय न लगा| उस मरमराहट में मनस्पात भी था और रौद्र भी|

विघ्न डालना मैं ने ठीक नहीं समझा और चुपचाप हॉल में लौट ली|

आगामी दिनों में भी मैं ने पाया जिस किसी कमरे या घर के कोने में वह एकान्त पाती वह अपना एक हाथ अपने मोबाइल के हवाले कर देती| और बारी बारी से उसे अपने कान और होठों के साथ जा जोड़ती|
अपना स्वर चढ़ाती-गिराती हुई|
कान पर कम|
होठों पर ज़्यादा|


“तुम इतनी बात किस से करती हो?” एक दिन मुझ से रहा न गया और मैं उस से पूछ ही बैठी|
“अपनी माँ से.....”


“पिता से नहीं? मैं ने सदाशयता दिखलायी| उस का काम बहुत अच्छा था और अब मैं उसे पसंद करने लगी थी| कमला से भी ज़्यादा| कमला अपना ध्यान जहाँ फ़र्श व कुर्सियों-मेज़ों पर केन्द्रित रखती थी, चम्पा दरवाज़ों व खिड़कियों के साथ साथ उन में लगे शीशों को भी खूब चमका दिया करती| रोज़-ब-रोज़| शायद वह ज़्यादा से ज़्यादा समय अपने उस घर-बार से दूर भी बिताना चाहती थी|

“नहीं,” वह रोआँसी हो चली|
“क्यों?” मैं मुस्कुरायी, “पिता से क्यों नहीं?”
“नहींकरती.....”
“वह क्या करते हैं?”

“वह अपाहिज हैं| भाड़े पर टैम्पो चलाते थे| एक टक्कर में ऐसी चोट खाए कि टांग कटवानी पड़ी| अब अपनी गुमटी ही में छोटे मोटे सामान की दुकान लगा लिए हैं.....”
“तुम्हारी शादी इस मन्दबुद्धि से क्यों की?”

“कहीं और करते तो साधन चाहिए होते| इधर खरचा कुछ नहीं पड़ा.....”
“यह मोबाइल किस से लिया?”
“माँ का है.....”

“मुझे इस का नम्बर आज देती जाना| कभी ज़रुरत पड़े तो तुम्हें इधर बुला सकती हूँ.....”
घरेलू नौकर पास न होने के कारण जब कभी हमारे घर पर अतिथि बिना बताए आ जाया करते हैं तो मैं अपनी काम वाली ही को अपनी सहायता के लिए बुला लिया करती हूँ| चाय-नाश्तातैयार करने-करवाने के लिए|

“इसमोबाइल की रिंग, खराब है| बजेगी नहीं| आप लगाएंगी तो मैं जान नहीं पाऊँगी.....”
मैंने फिर ज़िद नहीं की| नहींकहा, कम-से -कम मेरा नम्बर तो तुम्हारी स्क्रीन पर आ ही जाएगा|

वैसे भी कमला को तो मेरे पास लौटना ही था| मुझे उसकी ऐसी ख़ास ज़रुरत भी नहीं रहनी थी|

अपनी सेवा-काल का बाकी समय भी चम्पा ने अपनी उसी प्रक्रिया में बिताया|


एकान्त पाते ही वह अपने मोबाइल के संग अपनी खड़खड़ाहट शुरू कर देती- कभी बाहर वाले नल के पास, कभी आँगन में, कभी दरवाज़े के पीछे, कभी सीढ़ियों पर| अविरल वह बोलती जाती मानो कोई कमेन्टरी दे रही हो| मुझ से बात करने में उसे तनिक दिलचस्पी न थी| मैं कुछ भी पूछती, वह अपने उत्तर हमेशा संक्षिप्त से संक्षिप्त रखा करती| चाय-नाश्ते को भी मना कर देती| उसे बस एक ही लोभ रहता : अपने मोबाइल पर लौटने का|

वह उसका आखिरी दिन था| उसका हिसाब चुकता करते समय मैं ने उसे अपना एक दूसरा मोबाइल देना चाहा, “यह तुम्हारे लिए है.....”

मोबाइल अच्छी हालत में था| अभी तीन महीने पहले तक मैं उसे अपने प्रयोग में लाती रही थी| जब मेरे बेटे ने मेरे हाथ में एक स्मार्टफ़ोन ला थमाया था, तुम्हारे सेल में सभी एप्लीकेशन्ज़ तो हैं नहीं माँ.....” और जभी से यह मेरे दराज़ में सुरक्षित रखा रहा था|

“नहीं चाहिए,” चम्पा ने उस की ओर ठीक से देखा भी नहीं और अपना सिर झटक दिया|

“क्यों नहीं चाहिए?” मैं हैरान हुई| उस की उस ‘न’ के पीछे उसकी ज्ञान शून्यता थी या मेरे प्रति ही रही कोई दुर्भावना?

“क्या करेंगी?” उस ने अपने कंधे उचकाए और अपना सिर दुगुने वेग से झटक दिया, “नहीं लेंगी.....”

“इस से बात करोगी तो तुम्हारी माँ की आवाज़ तुम्हें और साफ़ सुनाई देने लगेगी.....” मैंने अपना मोबाइल उस की ओर बढ़ा दिया| अपने आग्रह में तत्परता सम्मिलित करते हुए|

“सिमके बिना?” उस ने अपने हाथ अपने मोबाइल पर टिकाए रखे| मेरे मोबाइल की ओर नहीं बढ़ाए|

“तुम्हारा यही पुराना सिमकार्ड इस में लग जाएगा,” मैं ने उसे समझाया|

“इस में सिम नहीं है,” वह बोली|

“यह कैसे हो सकता है,” मैं मुस्कुरा दी, “लाओ, दिखाओ.....”

बिना किसी झिझक के उसने अपना मोबाइल मुझे ला थमाया|

उस के मोबाइल की जितनी भी झलक अभी तक मेरी निगाह से गुज़री थी, उस से मैं इतना तो जानती ही थी वह खस्ताहाल था मगर उसे निकट से देख कर मैं बुरी तरह चौंक गयी!

उस की पट्टी कई खरोंचे खा चुकी थी| की-पैड के लगभग सभी वर्ण मिट चुके थे| स्क्रीन पूरी पूरी रिक्त थी| सिमकार्ड तो गायब था ही, बैटरी भी नदारद थी|

“बहुत पुराना है?” मैं ने मर्यादा बनाए रखना चाही|

“हाँ| पुराना तब भी था जब उन मेमसाहब ने माँ को दिया था, वह निरुत्साहित बनी रही|
“उन्होंने इस हालत में दिया था?” मैं ने सहज रहने का भरसक प्रयत्न किया|

“नहीं तब तो सिम को छोड़ कर इसके बाकी कल-पुरज़े सभी सलामत थे| सिम तो माँ ही को अपना बनवाना पड़ा था.....”

“फिर इसे हुआ क्या?”

“माँ मरीं तो मैं ने इसे अपने पास रखने की ज़िद की| बप्पा ने मेरी ज़िद तो मान ली मगर इसकी बैटरी और इसका सिम निकाल लिया.....”

“माँ नहीं है?” अपनी सहानुभूति प्रकट करने हेतु मैं ने उस की बांह थपथपा दी|

“हैं क्यों नहीं?” वह ठुमकी और अपनी बांह से मेरा हाथ हटाने हेतु मेरे दूसरे हाथ में रहे अपने मोबाइल की ओर बढ़ ली, “यह हमारे हाथ में रहता है तो मालूम देता है माँ का हाथ लिए हैं.....”
मैं ने उस का मोबाइल तत्काल लौटा दिया और अपने सेलफ़ोन को अपने दराज़ में पुनः स्थान दे डाला|

दीपक शर्मा 

लेखिका

वरिष्ठ  लेखिका दीपक  शर्मा जी हिंदी साहित्य का एक सशक्त हस्ताक्षर हैं | उनके अभी तक सोलह कथा संग्रह आ चुके हैं |कथादेश,  हंस आदि  साहित्यिक पत्रिकाओं में उनकी कहानियाँ अक्सर प्रकाशित होती रहती हैं | अंतरजाल पत्रिका अभिव्यक्ति में उनकी कुछ कहानियाँ आप पढ़ सकते हैं | अभी हाल में मीडीयावाला.कॉम  में प्रकाशित उनकी कहानी ऊँची बोली अपने कथ्य और शिल्प के कारण चर्चा में है | उनकी कहानियाँ अपने सहज प्रवाह व् अद्भुत भाषा शैली के कारण पाठकों को को बांधे रखती हैं | 

लेखिका परिचय 

नाम -दीपक शर्मा


जन्म : ३० नवम्बर, १९४६ (लाहौर, अविभाजित भारत)

लखनऊ क्रिश्चियन कालेज केस्नातकोत्तर अंग्रेज़ीविभाग से अध्यक्षा, रीडर के पद से सेवा-निवृत्त।

प्रकाशन : सोलहकथा-संग्रह :

१.    हिंसाभास (१९९३) किताब-घर, दिल्ली
२.    दुर्ग-भेद (१९९४) किताब-घर, दिल्ली
३.    रण-मार्ग (१९९६) किताब-घर, दिल्ली
४.    आपद-धर्म (२००१) किताब-घर, दिल्ली
५.    रथ-क्षोभ (२००६) किताब-घर, दिल्ली
६.    तल-घर (२०११) किताब-घर, दिल्ली
७.    परख-काल (१९९४) सामयिक प्रकाशन, दिल्ली
८.    उत्तर-जीवी (१९९७) सामयिक प्रकाशन, दिल्ली
९.    घोड़ा एक पैर (२००९) ज्ञानपीठ प्रकाशन, दिल्ली
१०.           बवंडर (१९९५) सत्येन्द्र प्रकाशन, इलाहाबाद
११.           दूसरे दौर में (२००८) अनामिका प्रकाशन, इलाहाबाद
१२.           लचीले फ़ीते (२०१०) शिल्पायन, दिल्ली
१३.           आतिशी शीशा (२०००) आत्माराम एंड सन्ज़, दिल्ली
१४.           चाबुक सवार (२००३) आत्माराम एंड सन्ज़, दिल्ली
१५.           अनचीता (२०१२) मेधा बुक्स, दिल्ली
१६.           ऊँची बोली (२०१५) साहित्य भंडार, इलाहाबाद
१७.           बाँकी(साहित्य भारती, इलाहाबादद्वारा शीघ्र प्रकाश्य)


यह भी पढ़ें ...

दो जून की रोटी -उषा अवस्थी 

गली नंबर दो -अंजू शर्मा 

खंडित यक्षिणी - रमा द्विवेदी 

ओटिसटिक बच्चे की कहानी लाटा -पूनम डोंगरा 

चूड़ियाँ-वंदना बाजपेयी 


आपको  कहानी   " चम्पा का मोबाइल " कैसी लगी   | अपनी राय अवश्य व्यक्त करें | हमारा फेसबुक पेज लाइक करें | अगर आपको "अटूट बंधन " की रचनाएँ पसंद आती हैं तो कृपया हमारा  फ्री इ मेल लैटर सबस्क्राइब कराये ताकि हम "अटूट बंधन"की लेटेस्ट  पोस्ट सीधे आपके इ मेल पर भेज सकें |

filed under:Hindi Stories, Mobile, Free Read, stories