July 2018

मैं मेहनत के पैसे लेता हूँ , मदद के नहीं



अमीर लोगों का दिल कई बार बहुत छोटा होता है और गरीबों का बहुत बड़ा | ऐसे नज़ारे देखने को अक्सर मिल ही जाते हैं | परन्तु  कभी  -कभी कोई बहुत छोटी सी बात हमें बहुत देर तक खुश कर देती है और जीवन का एक सूत्र भी दे देती है |

मैं मेहनत के पैसे लेता हूँ , मदद के नहीं


किस्सा आज का ही है | यूँ तो दिल्ली में बंदर बहुत है | पर किस दिन किस मुहल्ले पर धावा बोलेंगे यह कहा नहीं जा सकता | जब ये आते हैं तो ये झुंड के झुंड आते हैं | ऐसे में सामान लाना मुश्किल होता है | क्योंकि ये हाथ के पैकेट छीन लेते हैं | पैकेट बचाने की जुगत में काट भी लेते हैं | 


आज शाम को जब मैं पास की बाज़ार से सामान लेने गयी तब बन्दर नहीं थे | अपनी कालोनी में घुसते ही बहुत से बंदर दिखाई दिए | मेरे दोनों हाथों में बहुत सारे पैकेट थे , उसमें कई सारे खाने -पीने के सामान से भरे हुए थे | मैं घर के बिलकुल पास थी पर मेरे लिए आगे बढ़ना मुश्किल था | उपाय यही था कि मैं वापस लौट जाऊं और आधा एक घंटा इंतज़ार करूँ जब बन्दर इधर -उधर हो जाए तब घर जाऊं |


 तभी एक रिक्शेवाला जो मेरी उलझन देख रहा था बोला , " लाइए आपको छोड़ दूँ | उसने मेरा सामान रिक्शे में रख दिया , मैं बैठ गयी | मुश्किल से पाँच -सात मिनट का रास्ता था पर मेरी बहुत मदद हो गयी थी इसलिए मैं घर पहुँच कर रिक्शेवाले को धन्यवाद देते हुए २० रुपये का नोट देने लगी | 


रिक्शेवाले ने नोट लेने से इनकार करते हुए कहा ,

 " ये मत दीजिये , मैं मेहनत के पैसे लेता हूँ , मदद के नहीं "| 


रिक्शेवाला तो चला गया पर उसका वाक्य मेरे दिमाग में अभी भी बज रहा है ... शायद मैं उस वाक्य को जिंदगी भर ना भूल पाऊं | आदमी छोटा बड़ा नहीं होता ... दिल छोटे बड़े होते हैं | कुछ खुशियों को पैसे में नहीं तोला जा सकता | वो सबके लिए सुलभ हैं फिर भी मैं , मेरा मुझसे में हम क्या -क्या खोते जा रहे हैं |आज बरबस ही राजकपूर जी पर फिल्माया गीत गुनगुनाने का जी कर रहा है ....
किसी को हो न हो हमें है ऐतबार , जीना इसी का नाम है .....

वंदना बाजपेयी 


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आई एम सॉरी विशिका


अगर आप भी किसे के प्रति आसानी से धारणा बना लेते हैं तो ये कहानी अवश्य पढ़ें , क्योंकि अंत में पछतावे के सिवा कुछ नहीं रहता | बेहतर हो समय रहते ही सजग हो जाएँ | 


कहानी -आई एम सॉरी विशिका 




रिंकू ...बेटा रिकू , चलो आज विशिका आंटी  घर जाना है |  मेरी आवाज सुनते ही रिंकू ने बुरा सा मुँह बना दिया | नहीं मम्मा  मैं उनके यहाँ नहीं जाऊँगा , मैं तो उन्हें ठीक से जानता भी नहीं | मैं तो घर पर ही दादी के  रहूँगा  कहते हुए १० साल का रिंकू खेल में लग गया |  यूँ तो विशिका को मैं भी ठीक से नहीं जानती थी, पति के साथ कुछ साल पहले बस एक बार पार्टी में मुलाकात हुई थी | उनका बेटा पीयूष रिंकू से दो साल छोटा है | जहाँ मैं रिंकू को हर समय खेलने के लिए मस्त छोड़ देती वो हर समय अपने बेटे के साथ लगी रहती | मुझे उनकी बच्चे की  परवरिश का ये ढंग बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा | इस कारण पहली ही मुलाकात से वो मुझे कुछ जमीं नहीं |


इंसान भी कितना अजीब है किसी के बारे मैं कितनी आसानी से धारणा  बना लेता है | मैंने भी पहली ही मुलाकात में धारणा  बना ली थी | इसीलिए फिर मिलने का मन भी नहीं किया |


पर पिछले दो दिन से मेरे पति  अमित उनके घर चलने को कह रहे थे | दरअसल अमित को काम के सिलसिले में विशिका के पति मयंक से जरूरी बात करनी थी | वो बात उन्हें ऑफिस में न करके घर में करना ज्यादा उचित लग रहा था | अब घर जाना था तो वो चाहते थे कि मैं भी साथ चलूँ | मुझे जाना पड़ा तो  मुझे लगा रिंकू को भी ले चलूँ ... शायद पीयूष और विशिका बदल गए हों |


चेन  रीएक्शन केवल एटम के न्यूकलियस के ही नहीं होते .... हम भी घरों में यही प्रयास करते हैं |


खैर रिंकू के मना करने के बाद मन मार के मैं जाने के लिए तैयार होने लगी | फिरोजी साड़ी , फिरोजी चूड़ियाँ , और फिरोजी बिंदी लगा कर जब शीशे में खुद को देखा तो अपनी ही प्रशंसा करे बिना न रह सकी |


अमित भी समय पर घर आ गए और हम कार से उनके घर रवाना हो गए |  सावन की हलकी फुहारे पड़ रहीं थी हमारा मन जो थोड़ी बोरियत महसूस कर रहा था सुहाने मौसम के कारण गुनगुना उठा |



 उनके घर पहुँचने पर विशिका ने एक फीकी मुस्कान से स्वागत किया | विशिका ने मामूली गाउन पहन रखा था | उसमें भी जगह -जगह हल्दी के दाग लगे थे | घर भी बेतरतीब था | उसे पता था हम आने वाले हैं , फिर भी उसका  ऐसा फीका स्वागत हमें अटपटा सा लगा |

हम ड्राइंग रूम में बैठ गए , बातें होने लगीं | मुझे पीयूष बहुत ही कमजोर लग रहा था | बहुत रोकने की कोशिश करते हुए भी मेरे मुंह से निकल गया .... पीयूष मेरे बेटे की उम्र का ही है पर  कमजोर होने के  कारण बहुत छोटा लगता है ... आप इसे कुछ खेल खेलने को कहें ... जैसे टेनिस , फुटबॉल , बैडमिन्टन , जिससे इसे भूख लगेगी और सेहत भी बनेगी |


मेरे इतना कहते ही विशिका जी क्रोधित हो गयीं और बोली , " आप अपने बेटे को पालने की टिप्स अपने पास रखिये ... ये जैसा है ठीक है |


माहौल थोडा संजीदा हो गया | मैंने  माहौल हल्का करने के लिए इधर -उधर की बातें की फिर भी बात बन नहीं पायी | अमित जिस काम के लिए बात करना चाहते थे , उसके लिए भी मयंक जी ने कोई रूचि नहीं दिखाई |


लौटते समय गाडी में मेरा मूड बहुत ख़राब था | मैं अमित पर फट पड़ी | क्या जरूरत थी मुझे साथ ले चलने की , काम  की बात ऑफिस में ही कर लिया करो |  खामखाँ में अपना और मेरा समय बर्बाद किया | देखा नहीं , कैसे मेरी  जरा सी राय पर गुस्सा गयीं | मुझे जो उचित लगा मैंने कहा , अब अच्छी राय देना भी गुनाह है क्या  .... रखें अपने लड़के को १६ किलो का मुझे क्या करना है ? ठीक से बच्चे की परवरिश करनी आती नहीं , पहनना -ओढना आता नहीं , मेहमानों का स्वागत करना आता नहीं ... ऐसे लोग किसी भी तरह से मिलने के काबिल नहीं हैं |


अमित ने मेरी बात में हाँ में हाँ मिलाई |

घर आकर मैं उन्हें लगभग भूल गयी | दिन गुज़रते गए | ऐसे ही करीब १० महीने बीत गए |

उस दिन रिंकू के स्कूल का एनुअल फंक्शन था | रिंकू को स्पोर्ट्स में कई सारे पुरूस्कार मिले थे | मैं एक गर्वीली माँ की तरह उसके तमगे सँभालने में लगी थी | मन ही मन खुद पर फक्र हो रहा था कि मैंने कितनी अच्छी शिक्षा दी है रिंकू को जो वो आज इतने पुरूस्कार जीत पाया | कितना ध्यान रखती हूँ मैं उसके खाने -पीने का , तभी तो इतना ऊँचा कद निकला है | पढाई में भी अच्छा कर रहा है |


एक गर्वीली माँ के गर्वीले विचारों को झकझोरते हुए मेरे साथ गयी निशा ने कहा , " विशिका से मिलने नहीं चलोगी ?


मेरे मुँह  का स्वाद बदल गया | फिर भी मैंने  पूंछा , " क्यों ?"

स्पोर्ट्स के पुरूस्कार उसी ने स्पोंसर करे  हैं , निशा ने बताया

क्या ??? मैंने मुश्किल से अपनी हँसी  रोकते हुए पूंछा औ उत्तर की प्रतीक्षा करे बिना कहना शुरू किया , " बड़े आदमियों के बड़े चोंचले ,अपने बेटे को तो स्पोर्ट्स खेलने नहीं देती और दूसरों के बच्चों को पुरूस्कार बाँट रही है | बच्चे पर ध्यान नहीं और खुद के लिए इतनी यश कामना .... देखा है उसका बेटा , १६ किलो से ज्यादा वजन नहीं होगा ....


अब उसका बेटा दुनिया में नहीं है , निशा ने मेरी बात काटते हुए कहा |

क्यायाययया , कब , कैसे , मुझे लगा पुरूस्कार मेरे हाथ से गिर जायेंगे |

तुम्हें नहीं पता , ६ महीने हो गए , कैंसर था उसे लंग्स का , करीब दो साल पहले डिटेक्ट हुआ था | बहुत इलाज करवाया पर कोई फायदा नहीं हुआ ..... बहुत शौक था उसे खेलने का , पर   कभी खेल नहीं पाया , जरा सा दौड़ते भागते सांस फूलने लगती , पहले तो विशिका ने कमजोरी ही समझीं , पर जब ... जब समस्या बढ़ी तब जाकर चेक करवाया .... बिमारी अपना अंतिम रूप ले चुकी थी | एक ही बेटा था बेचारी का ... पूरी दुनिया उजाड़ हो गयी अब खुद को संभाल रही है .... कहती है मेरा बेटा नहीं खेल पाया तो क्या हुआ , मैं दूसरे बच्चों को पुरूस्कार देकर प्रोत्साहित करुँगी ताकि वो खेले और स्वस्थ रहे .... कहीं न कहीं पीयूष भी ये सब देख रहा होगा और खुश हो रहा होगा |


मेरी आँखें नम हो गयीं | मैं रिंकू के पुरस्कार वहीँ कुर्सी पर रख कर विशिका से मिलने चल पड़ी | मुझे आश्चर्य था कि एक माँ की पीड़ा दूसरी माँ से छुपी कैसे रह गयी |



विशिका के पास पहुँचते ही मेरी रुलाई फूट गयी | मैंने आँसू पोछते हुए कहा , " पीयूष के बारे में पता चला , बहुत दुःख हुआ ईश्वर आप को शक्ति दे |

मुझे देखर उन्होंने एक गहरी  साँस ली फिर बोलीं , " ईश्वर की यही इच्छा थी , क्या कर सकते हैं ? फिर मेरी मेरी तरफ देख कर चहकते हुए बोलीं , " रिंकू ने तो  कमाल कर दिया , ऐसे प्रोत्साहित करिए अच्छा खेलता है , क्या पता कल देश का नाम ऊँचा करे , हाँ , थोड़ी प्रोटीन डाइट बढ़ा दीजियेगा | फिर देखिएगा  और अच्छा करेगा | इसके बाद वे और बच्चों के खेल व् पढाई की बातें करती रही | वो बीच -बीच में कभी हंसती , कभी मुस्कुराती |


उनसे विदा ले कर मैं निशा के साथ लौटने लगी | निशा ने कहा , बड़ा अजीब लगा वो पीयूष के बारे में कुछ बोली हीं नहीं |

मैंने निशा को टोंकते हुए कहा , " नहीं निशा ऐसे मत कहो , पीयूष एक कैंसर ले कर चला गया पर एक कैंसर अपनी माँ के लिए छोड़ गया है दर्द का कैंसर .... इसकी कोशिकाएं भी बहुत तेजी से बढती हैं ... बेरोकटोक , और दूसरी कोशिकाओं के हिस्से का सब खा जाती हैं | विशिका जानती है इसीलिये वो उस बात को कहने से बच रही है | हम तो थोड़ी देर में अपने घर लौट कर अपने कामों में लग जायेंगे पर विशिका को इस कैंसर से लड़ना होगा .... बहुत देर तक |

आई एम सॉरी  विशिका , इस बार मैं तुम्हारे  के प्रति धारणा बना लेने की गलती नहीं करना चाहती थी |

नीलम गुप्ता

लेखिका

                     
क्वाटर  नंबर २३ -  दीपक शर्मा 

दो चोर -विनीता शुक्ला 

गड़ा धन -निधि जैन 

वो २२ दिन -वंदना गुप्ता 

ढिंगली -आशा पाण्डेय ओझा 



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टाऊनहाल

दो वर्ष पहले की मेरी जनहित याचिका पर प्रदेश के उच्च न्यायालय ने आज अपना निर्णय सुना दिया है : हमारे कस्बापुर की नगरपालिका को प्रदेश के पर्यटन विभाग के साथ किए गए अपने उस समझौते को रद्द करना होगा जिस के अंतर्गत हमारे टाऊनहाल को एक ‘हेरिटेज होटल’ में बदल दिया जाना था।


मुझ से पूछा जा रहा है कि अठहत्तर वर्ष की अपनी इस पक्की उम्र के बावजूद नगरपालिका जैसी बड़ी संस्था को चुनौती देने की हिम्मत मैंने कैसे जुटा ली।

और इस प्रश्न के उत्तर में मैं वह प्रसंग दोहरा देता हूँ जब मेरे पिता ने इसी टाऊनहाल को बचाने हेतु अपने प्राण हथेली पर रख दिए थे।

सन् १९४२ की अगस्त क्रान्ति के समय।


सभी जानते हैं द्वितीय महायुद्ध में काँग्रेस से पूर्ण सहयोग प्राप्त करने हेतु मार्च १९४२ में ब्रिटिश सरकार के स्टैफ़र्ड क्रिप्स की अगुवाई में आए शिष्टमंडल के प्रस्ताव के विरोध में ८ अगस्त १९४२ के दिन काँग्रेस कमेटी ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की जब घोषणा की थी और अगले ही दिन जब पुणे में गांधीजी को हिरासत में ले लिया था। तो गांधी जी के समर्थन में देश भर की सड़कें ‘भारत छोड़ो’ और ‘करो या मरो’ के नारों से गूंजने लगी थी। बल्कि कहीं-कहीं तो समुत्साह में बह कर लोग बाग सरकारी इमारतों को आग के हवाले करने लगे थे। बिजली की तारें काटने लगे थे, परिवहन एवं संचार के साधन ध्वस्त करने लगे थे।

देश के अन्य शहरों के सदृश हमारे कस्बापुर निवासी भी काँग्रेस के झंडे ले कर सड़कों पर उतर लिए थे। कुछ उपद्रवी तो कुछ सभ्य।

कुछ का गन्तव्य स्थान यदि कलेक्ट्रेट रहा करता तो बहुधा का हमारा यह टाऊनहाल।
कारण, यह ब्रिटिश आधिपत्य का ज्यादा बड़ा प्रतीक था। एक तो उन दिनों इस का नाम ही विक्टोरिया मेमोरियल हाल था, दूसरे उसके अग्रभाग के ठीक बीचोबीच रानी विक्टोरिया की एक विशाल मूर्ति स्थापित थी। सैण्डस्टोन, बलुआ पत्थर, में घड़ी, जिस के दोनों हाथ एक बटूए पर टिके थे। वास्तव में इस टाऊनहाल के गठन की योजना इंग्लैण्ड की तत्कालीन रानी विक्टोरिया के डायमंड जुबली वाले वर्ष १८९७ में बनी थी। जब उस के राज्याभिषेक के ६० वर्ष पूरे हुए थे। और १९११ में जब एक यह पूरा बन कर तैयार हुआ था तो विक्टोरिया की मृत्यु हो चुकी थी। सन् १९०१ में। अत: बना विक्टोरिया मेमोरियल हाल।


टाउन हॉल



उस दिन उस जुलूस में सब से पहले रानी विक्टोरिया की इसी मूर्ति पर हमला बोला था उस के बटुए पर ढेलेबाज़ी शुरू करते हुए।

टाऊनहाल के अपने दफ़्तर में बैठे मेयर ने तत्काल उस जुलूस को वहाँ से हटाने के लिए अपने साथ तैनात पुलिस रक्षादल को उस के प्रदर्शनकारियों पर लाठी चार्ज का आदेश दे डाला था।
परिणाम विपरीत रहा था। जुलुसियों के हाथ के ढेले मूर्ति छोड़ सीधे टाऊनहाल की खिड़कियों पर लक्षित किये जाने लगे थे।

मेरे पिता उन दिनों टाऊनहाल ही में काम करते थे। वहाँ के पुस्तकालय में। उस की दूसरी मंज़िल पर। जिस की एक बालकनी टाऊनहाल के मुख्य द्वार के ऐन ऊपर बनी हुई थी।

बेकाबू हो रही भीड़ के विकट इरादे देख कर वे उसी बालकनी पर आन खड़े हुए थे। यदृच्छया ढेले फेंक रही क्रुध्द एवं उत्तेजित भीड़ को संबोधित करने। टाऊनहाल के पब्लिक ऐड्रस, पी. ए., सिस्टम की सुविधा का लाभ उठाते हुए। वह सिस्टम लोक भाषण एवं राजकीय अभिनंदन तथा जनहित घोषणाएं करने हेतु उपयोग में लाया जाता था। यहाँ यह बताता चलूँ कि हमारे इस टाऊनहाल में उस समय न केवल नगर-विषयक काम काज के दफ्तर थे मगर नगर के मतदान एवं महत्त्वपूर्ण परीक्षाएं भी वहीँ निष्पन्न की जाती थी। आपदा एवं विपत्ति तथा टीके-एवं स्वास्थ्य संबंधी घोषणाएं भी वहीँ से जारी होती थी।

विश्वयुद्ध में हताहत एवं मृत व्यक्तियों की सूचियाँ भी।

और ये घोषणाएं अकसर मेरे पिता द्वारा की जाती थी। स्वर संगति में पारंगत वे प्रभावोत्पादक एवं भावपूर्ण आवाज के स्वामी थे। जिस का प्रयोग करना वे बखूबी जानते थे।

“मैं आपका एक भाई बोल रहा हूँ”, बिना किसी पूर्वाज्ञा अथक पूर्व सूचना के प्रतिकूल उस वातावरण में अकस्मात जब उनकी आवाज गूंजी थी तो सभी अप्रतिम हो उन्हें सुनने लगे थे, पुलिसियों और जुलुसियों के हाथ एक साथ रुक लिए थे। “आप ही की तरह गांधीजी का भक्त मैं भी हूँ। जिन का रास्ता अहिंसा का है, अराजकता का नहीं, सविनय अवज्ञा, सहयोग का है, आक्रामक, कार्यकलाप का नहीं। हमें ‘चौरीचारा’ यहाँ दोहराना नहीं चाहिए। याद रखना चाहिए ५ फरवरी, १९२२ को जब यहाँ के पुलिस थाने पर हमारे भाईयों ने हिंसा दिखायी थी तो हमारे बापू को ५ दिन का उपवास रखना पड़ा था। क्या आप चाहते हैं बापू को उपवास पर फिर जाना पड़े? जब कि आज वे अधिक वृध्द हैं। शारीरिक रूप से भी अधिक क्षीण। और फिर यह भी सोचिए, मेरे भाईयों और बहनों, यह टाऊनहाल एक लोक-निकाय है, हमारे लोक-जीवन की जनोपयोगी सेवाओं का केन्द्र। यह हमारा है। इस के ये गोल गुम्बद, ये चमकीले कलश ये मेहराबदार छतरियां, ये घंटाघर और इस की ये चारों घड़ियाँ हमारी हैं। यह सब हमारा है। हम इन्हें क्यों तोड़े-फोड़े? क्यों हानि पहुँचाएँ? यह अंगरेज़ों का नहीं। उन्हें तो भारत छोड़ना ही है। आज नहीं, तो कल, कल नहीं तो परसों...”

जभी मेरे पिता के हाथ के माइक्रोफोन का संबंध पी. ए. सिस्टम से टूट गया।

किंतु वे तनिक न घबराए। यह जानते हुए भी कि ब्रिटिश सरकार अब उन्हें सेवामुक्त कर देगी।
शान्त एवं धीर भाव से उन्होंने अपने हाथ का माइक्रो फोन बालकनी के जंगले पर टिकाया और हाथ ऊपर उठा कर चिल्लाएं। ‘महात्मा गाँधी की जय।’

पुलिसियों ने भी अपनी लाठियां समेटीं और विघटित हो रही भीड़ को टाऊनहाल छोड़ते हुए देखने लगे।

मेरे पिता मुस्कुराए थे। मानो उन्हें कोई खज़ाना मिल गया हो। उनका टाऊनहाल अक्षुण्ण था और बचा रहा था वह संग्रहालय, जिस में शहर के ऐतिहासिक स्मारकों एवं विशिष्ट व्यक्तियों के चित्र एवं विवरण धरे थे। बची रही थीं, पुस्तकालय की दुर्लभ वे पुस्तकें जिन में संसार भर की विद्वत्ता जमा थी। और जिनका रस वे पिछले पन्द्रह वर्षों से लगातार लेते रहे थे।


दीपक शर्मा 

लेखिका

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फोटो क्रेडिट -शटरस्टॉक 



दीपक शर्मा जी का परिचय -

जन्म -३० नवंबर १९४६

संप्रति –लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज के अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर पद से सेवा निवृत्त

सशक्त कथाकार दीपक शर्मा जी सहित्य जगत में अपनी विशेष पहचान बना चुकी हैं | उन की पैनी नज़र समाज की विभिन्न गतिविधियों का एक्स रे करती है और जब उन्हें पन्नों पर उतारती हैं तो शब्द चित्र उकेर देती है | पाठक को लगता ही नहीं कि वो कहानी पढ़ रहा है बल्कि उसे लगता है कि वो  उस परिवेश में शामिल है जहाँ घटनाएं घट रहीं है | एक टीस सी उभरती है मन में | यही तो है सार्थक लेखन जो पाठक को कुछ सोचने पर विवश कर दे |

दीपक शर्मा जी की सैंकड़ों कहानियाँ विभिन्न पत्र –पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं जिन्हें इन कथा संग्रहों में संकलित किया गया है |


प्रकाशन : सोलहकथा-संग्रह :

१.    हिंसाभास (१९९३) किताब-घर, दिल्ली
२.    दुर्ग-भेद (१९९४) किताब-घर, दिल्ली
३.    रण-मार्ग (१९९६) किताब-घर, दिल्ली
४.    आपद-धर्म (२००१) किताब-घर, दिल्ली
५.    रथ-क्षोभ (२००६) किताब-घर, दिल्ली
६.    तल-घर (२०११) किताब-घर, दिल्ली
७.    परख-काल (१९९४) सामयिक प्रकाशन, दिल्ली
८.    उत्तर-जीवी (१९९७) सामयिक प्रकाशन, दिल्ली
९.    घोड़ा एक पैर (२००९) ज्ञानपीठ प्रकाशन, दिल्ली
१०.           बवंडर (१९९५) सत्येन्द्र प्रकाशन, इलाहाबाद
११.           दूसरे दौर में (२००८) अनामिका प्रकाशन, इलाहाबाद
१२.           लचीले फ़ीते (२०१०) शिल्पायन, दिल्ली
१३.           आतिशी शीशा (२०००) आत्माराम एंड सन्ज़, दिल्ली
१४.           चाबुक सवार (२००३) आत्माराम एंड सन्ज़, दिल्ली
१५.           अनचीता (२०१२) मेधा बुक्स, दिल्ली
१६.           ऊँची बोली (२०१५) साहित्य भंडार, इलाहाबाद
१७.           बाँकी(साहित्य भारती, इलाहाबादद्वारा शीघ्र प्रकाश्य)


ईमेल- dpksh691946@gmail.com




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सावन अट्ठारह साल की लड़की है


कविता के सौदर्य में उपमा से चार -चाँद लग जाते हैं | ऐसे में सावन की चंचलता , अल्हड़ता , शोख नजाकत भरी अदाएं देख कर क्यों न कवि उसे १८ साल की लड़की समझ बैठे | आइये पढ़ें एक रिमझिम फुहारों में भीगी सुन्दर कविता



सावन अट्ठारह साल की लड़की है

सावन----------- सीधे-साधे गाँव की, एक अट्ठारह साल की लड़की है. भाभी की चुहल और शरारत, बाँहों मे भरके कसना-छोड़ना, एक सिहरन से भर उठी------- वे सुर्ख से गाल की लड़की है. सावन-------- सीधे-साधे गाँव की, एक अट्ठारह साल की लड़की है. वे उसका धान की खेतों से तर-बतर, बारिश मे भीगते हुये, घर की तरफ लौटना, और उस लौटने मे उसके, पाँव की सकुचाहट, उफ! गाँव मे सावन-------- बहुत ही मादक और कमाल की लड़की है. सावन--------- सीधे-साधे गाँव की, एक अट्ठारह साल की लड़की है. न शायर,न कवि, न नज़्म, न कविता वे उर्दू और हिन्दी दोनो से कही ऊपर, किसी देवता,फरिश्ते के हाथ से छुटी, इस जमीं पे उनके-------- खयाल की लड़की है. सावन---------- सीधे-साधे गाँव की, एक अट्ठारह साल की लड़की है. @@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी. जज कालोनी, मियाँपुर जिला---जौनपुर--222002 (उत्तर-प्रदेश).

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गुरु पूर्णिमा : गुरूजी हम बादल तुम चन्द्र

गुरु पूर्णिमा एक ऐसा त्यौहार है | जब हम अपना स्नेह गुरु के प्रति व्यक्त कर सकते हैं | गुरु और शिष्य का अनोखा संबंध है | गुरु शिष्य को मांजता है , निखारता है और परमात्मा की ओर उन्मुख करता है | कई बार हम गुरु और शिक्षक में भ्रमित होते हैं | वास्तव में शिक्षक वो है जो हमें लौकिक जीवन में अग्रसर होने के लिए शिखा देता है और गुरु वो है हमारा आध्यात्मिक मार्ग प्रशस्त करता है | आज का दिन उसी गुरु के प्रति आभार व्यक्त करने का दिन है |  यूँ पूर्णिमा तो साल में बारह होती है | सब सुंदर , सब पवित्र फिर आसाढ़ पूर्णिमा को ही गुरु पूर्णिमा के रूप में क्यों मनाते हैं ? जबकि आसाढ़ में तो अक्सर बादल होने की वजह से चाँद पूरा दिखता भी नहीं हैं | ये प्रश्न हम सब के मन में उठता होगा | पौराणिक मान्यताओं के अनुसार क्योंकि आसाढ़ पूर्णिमा के दिन ही व्यास ऋषि का जन्म हुआ था  इसलिए | आसाढ़ पूर्णिमा को ही गुरु पूर्णिमा मनाते हैं |
     
आखिर  निर्णय लेने से घबराते  क्यों हैं ?


सुनिए ,  आज मीरा के घर पार्टी में जाना है , मैं कौन सी साड़ी पहनूँ | ओह , मेनू कार्ड में इतनी डिशेज , " आप ही आर्डर कर दो ना , कौन सी सब्जी  बनाऊं .... आलू टमाटर या गोभी आलू | देखने में ये एक पत्नी की बड़ी प्यार भरी बातें लग सकती हैं .... परन्तु इसके पीछे अक्सर निर्णय  न ले पाने की भावना छिपी होती है | सदियों से औरतों को इसी सांचे में ढला गया है कि उनके हिस्से का निर्णय कोई और लेता है और वो बस उस पर मोहर लगाती हैं | इसको Decidophobia कहते हैं | १९७३ में वाल्टर कॉफ़मेन ने इसके ऊपर एक किताब भी लिखी थी | ये एक मनोवैज्ञानिक रोग है जिसमें व्यक्ति छोटे से छोटे DECISION लेने में अत्यधिक चिंता , तनाव , बेचैनी से गुज़रता है |


आखिर  निर्णय लेने से घबराते  क्यों हैं ? /
How-to-overcome-decidophobia-in-hindi


मेरा नाम शोभा है | मेरी उम्र ७२ वर्ष है | मेरे चार बच्चे हैं | चारों  अपनी गृहस्थी में मस्त हैं | मैं -नाती पोते वाली,  दादी और नानी हूँ | मेरी जिन्दगी का तीन चौथाई हिस्सा रसोई में कटा है | परन्तु अभी हाल ये है कि मैं सब्जी काटती हूँ तो बहु से पूछती हूँ .... " भिंडी कितनी बड़ी काटू , चावल दो बार धोऊँ  या तीन बार , देखो दाल तुम्हारे मन की घुट गयी है या नहीं |  बहु अपना काम छोड़ कर आती है और बताती है , " नहीं मम्मी , नहीं ये थोडा छोटा करिए , दाल थोड़ी और घोंट लीजिये आदि -आदि | आप सोच रहे होंगे कि मैं अल्जाइमर्स से ग्रस्त हूँ या मेरी बहु बहुत ख़राब है , जो अपनी ही मर्जी का काम करवाती है | परन्तु ये दोनों ही उत्तर सही नहीं हैं | मेरी एक ही इच्छा रहती है कि मैं घरेलू काम में जो भी बहु को सहयोग दूँ वो उसके मन का हो | आखिरकार अब वो मालकिन है ना .... उसको पसंद न आये तो काम का फायदा ही क्या ? पर ऐसा इस बुढापे में ही नहीं हुआ है | बरसों से मेरी यही आदत रही है ... शायद जब से होश संभाला तब से |


बहुत पीछे बचपन में जाती हूँ तो जो पिताजी कहते थे वही  मुझे करना था | पिताजी ने कहा साड़ी पहनने लगो , मैंने साड़ी  पहनना शुरू किया | पिताजी ने कहा, " अब तुम बड़ी हो गयी हो , आगे की पढाई नहीं करनी है" | मैंने उनकी बात मान ली | शादी करनी है ... कर ली | माँ ने समझाया जो सास कहेगी वही करना है अब वो घर ही तुम्हारा है | मैंने मान लिया | मैं वही करती रही जो सब कहते रहे |


अच्छी लडकियां ऐसी ही तो होती हैं .... लडकियाँ पैदा होती हैं .... अच्छी लडकियां बनायीं जाती हैं | 


आप सोच रहे होंगे , आज इतने वर्ष बाद मैं आपसे ये सब क्यों बांटना चाहती हूँ ?


दरअसल बात मेरी पोती की है | कल मेरी बारह वर्षीय पोती जो अपने माता -पिता के साथ दूसरे शहर में रहती है  आई थी वो मेरे बेटे के साथ बाज़ार जाने की जिद कर रही थी , मैं भी साथ चली गयी | उसे बालों के क्लिप लेने थे | उसने अपने पापा से पूछा , " पापा ये वाला लूँ या ये वाला ?" .... ओह बेटा ये लाल रंग का तो कितना बुरा लग रहा है , पीला वाला लो | और उसने झट से पीला वाला ले लिया | बात छोटी सी है , परन्तु मुझे अन्दर तक हिला गयी | ये शुरुआत है मुझ जैसी बनने की .... जिसने अपनी जिन्दगी का कोई निर्णय कभी खुद लिया ही नहीं , क्योंकि मैंने कभी निर्णय लेना सीखा ही नहीं | कभी जरूरत ही नहीं हुई | धीरे-धीरे निर्णय लेने की क्षमता ही खत्म हो गयी |

वो कहते हैं न जिस मांस पेशी  को  इस्तेमाल ना करो वो  कमजोर हो जाती है | मेरी निर्णय  लेने की क्षमता खत्म हो गयी थी | मैंने पूरी जिंदगी दूसरों के मुताबिक़ चलाई | 



मेरी जिंदगी तो कट गयी पर ये आज भी बच्चों के साथ हो रहा है .... खासकर बच्चियों के साथ , उनके निर्णय माता -पिता लेते हैं और वो निर्णय लेना सीख ही नहीं  पातीं | जीवन में जब भी विपरीत परिस्थिति आती है वो दूसरों का मुंह देखती हैं, कुछ इस तरह से  राय माँगती है कि उनके हिस्से का  निर्णय कोई और ले ले | लड़के बड़े होते ही विद्रोह कर देते हैं इसलिए वो अपना निर्णय लेने लग जाते हैं |


निर्णय न  लेने की क्षमता के लक्षण 


1) प्रयास रहता है की उन्हें निर्णय न लेना पड़े , इसलिए विमर्श के स्थान से हट जाते हैं |
2) चाहते हैं उनका निर्णय कोई दूसरा ले |
3)निर्णय लेने की अवस्था में मनोवैज्ञानिक दवाब कम करने के लिए कुंडली , टैरो कार्ड या ऐसे ही किसी साधन का प्रयोग करते हैं |
4)छोटे से छोटा निर्णय लेते समय एंग्जायटी के एटैक पड़ते हैं
5) रोजमर्रा की जिंदगी मुश्किल होती है |

माता -पिता बच्चों को निर्णय लेना सिखाएं 


आज जमाना बदल गया है , बच्चों को बाहर निकलना है , लड़कियों को भी नौकरी करनी है .... इसी लिए तो शिक्षा दे रहे हैं ना आप सब | लेकिन उन्हें  लड़की  होने के कारण या अधिक लाड़ -दुलार के कारण आप निर्णय लेना नहीं सिखा रहे हैं तो आप उनका बहुत अहित कर रहे हैं | जब वो नौकरी करेंगी तो ५० समस्याओं को उनको खुद ही हल करना है | आप हर समय वहां नहीं हो सकते | मेरी माता पिता से मेरी ये गुजारिश है कि अपने बच्चों को बचपन से ही निर्णय लेने की क्षमता विकसित करें | छोटी -छोटी बात पर उनके निर्णय को प्रात्साहित करें , जिससे भविष्य में उन्हें निर्णय लेने में डर  ना लगे | अगर उनका कोई निर्णय गलत  भी निकले तो यह कहने के स्थान पर कि मुझे पता था ऐसा ही होगा ये कहें कि कोई  बात नहीं कोई भी निर्णय एक सिक्का उछालने के सामान है , जरूरी नहीं कि मैंने जो निर्णय लिया वो सही ही होता | गलती की संभावना  दोनों से है तो निर्णय लेने में हिचक क्यों ? अब आगे निर्णय लेने में तुम और सावधान हो जाओगे | बच्चा सीखने लगेगा कि हर बार निर्णय लेने से पहले उसे दूसरों का मुँह नहीं ताकना है |

वो बच्चे जो निर्णय लेने से घबराते हैं 


अगर आप बड़े हैं और अभी भी आप को लगता है कि आप को छोटी -छोटी बातों में निर्णय लेना नहीं आता है तो अभी भी आप इस कमी को दूर कर सकते हैं | निर्णय न लेने के पीछे कई कारण होते हैं जैसे आत्मविश्वास की कमी , असुरक्षा की भावना या भविष्य का डर |


जब भी कोई व्यक्ति निर्णय लेता है तो उसे इन तीनों से गुज़ारना पड़ता है | ये तीनों चीजें खुद ही दूर करनी पड़ती हैं | आत्मविश्वास कम है तो खुद से पूछना पड़ेगा कि आखिर ये क्यों कम है .... या विषय की जानकारी नहीं है या ये डर है की कहीं इससे बुरा न हो जाए |


अगर विषय की जानकारी नहीं है तो जानकारी बढाई  जा सकती है | मान लीजिये आप को टीवी लेना है और आपको पता नहीं है कि कौन सा टी वी अच्छा है ? तो आप मित्रों या इन्टरनेट के माध्यम से जानकारी एकत्र कर सकते हैं | एक -एक छोटी चीज के बारे में इससे जानकारी मिल जाती है |   आप जानकारी बढ़ा  कर फैसला ले सकते  हैं |


असुरक्षा की भावना के चलते कई बार निर्णय नहीं ले पाते हैं | ये कम्फर्ट ज़ोन की समस्या है , हमें लगता है हम जहाँ हैं जैसे हैं वहीँ सही हैं  | इस स्थिति में हम हर परिस्थिति से वर्तमान परिस्थिति से तुलना करते हैं और यथा स्थिति कोही बेहतर समझने  का प्रयास करते हैं | जबकि  हमारा मन जानता है कि ऐसा नहीं भी हो सकता है तभी तो लम्बे समय तक अनिर्णय की स्थिति में ही रहते हैं और रोज दिमाग की कसरत करते हैं |


बहुत देर तक अनिर्णय की स्थिति में रहने पर हम काम को न करने की और बढ़ जाते हैं | 


तीसरा भय ये कि कहीं कुछ गलत हो गया तो ? सोचिये ये जीवन इतना अस्थिर है कि हमें ये नहीं पता कि कल हम या हमारे सारे प्रियजन रहेंगे या नहीं ?कटु सत्य है कि हम सब को उस दौर से गुज़ारना है तो एक छोटे से निर्णय से जो  कुछ बदलाव आएगा वो निश्चित तौर पर इससे ज्यादा सामंजस्य नहीं मांगेगा | फिर भय किस बात का |

निर्णय लेने का सही तरीका 


निर्णय लेने का सही तरीका ये  है कि आप कॉपी पेन ले कर बैठ जाए दोनों के पक्ष में और विपक्ष के पॉइंट्स लिखें | जिसमें ज्यादा प्लस हों उस निर्णय को ले लें | फिर भी इस बात की गारंटी नहीं है कि हमेशा वो निर्णय सही ही हो ... पर क्या आज तक आपकी जिन्दगी में दूसरों द्वारा लिए गए निर्णय सही ही हुए है... फिर डर कैसा ... आगे बढिए और निर्णय लीजिये |

रीयल स्टोरी -शोभा शुक्ला
लेखिका -वंदना बाजपेयी




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हमारा जीवन अनेकों प्रकार की तकलीफों से भरा हुआ है | जब कोई तकलीफ अचानक से आती है तो लगता है काश कोई हमें इस मुसीबत से उबार ले , काश कोई रास्ता दिखा दे | परिस्तिथियों से लड़ते हुए कुछ टूट जाते हैं और कुछ अपनी समस्याओं पर कुछ हद तक काबू पा लेते हैं और दूसरों के लिए पथ प्रदर्शक भी साबित होते हैं |
जीवन की रातों से गुज़र कर ही जाना जा सकता है की एक दिया जलना ही काफी होता है , जो रास्ता दिखाता है | बाकी सबको स्वयं परिस्तिथियों से लड़ना पड़ता है | बहुत समय से इसी दिशा में कुछ करने की योजना बन रही थी | उसी का मूर्त रूप लेकर आ रहा है
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जिंदगी दो कदम आगे एक कदम पीछे


जिंदगी के छोटे छोटे सूत्र कहीं ढूँढने नहीं पड़ते वो हमारे आस पास ही होते हैं पर हम उन्हें नज़रअंदाज कर देते हैं ऐसे ही दो सूत्र मुझे तब मिले जब मैं मिताली के घर गयी | ये सूत्र था ...

जिंदगी दो कदम आगे एक कदम पीछे 
मिताली के दो बच्चे हैं एक क्लास फर्स्ट में और एक क्लास फिफ्थ में | दोनों बच्चे ड्राइंग कर रहे थे | उसकी बेटी सान्या जो छोटी है अपनी आर्ट बुक में डॉट्स जोड़ कर कोई चित्र बना रही थी | और बेटा राघव ड्राइंग फ़ाइल में ब्रश से पेंटिंग कर रहा था | जहाँ बेटी हर मोड़ पर उछल  रही थी क्योंकि उसे पता नहीं था की क्या बनने वाला है ... 

उसे बस इतना पता था की उसे बनाना है कुछ भी , इसलए बनाते हुए आनंद ले रही थी | गा रही थी हँस  रही थी |


बेटा बड़ा था उसे पता था कि उसे क्या बनाना है | वो भी आनंद ले रहा था | लेकिन जब भी उसे अहसास होता कि कुछ मन का नहीं हो रहा है वो दो तीन कदम पीछे लौटता दूर से देखता , सोचता , “ अरे ये रंग तो ठीक नहीं है , इसकी जगह ये लगा दे , ये लकीर थोड़ी सीधी  कर दी जाए , यहाँ कुछ बदल दिया जाए | फिर जा कर उसमें रंग भरने लगता बच्चे रंग भरते रहे और मैं जीवन के महत्वपूर्ण सूत्र ले कर घर वापस आ गयी |

जीवन एक  कैनवास जैसा ही तो है जिसमें हमें रंग भरने हैं पर इस रंग भरने में इतना तनाव नहीं भर लेना चाहिए कि रंग भरने का मजा ही चला जाए या बाहर से रंग भरते हुए हम अन्दर से इतने बेरंग होते जाए कि अपने से ही डर लगने लगे | चित्र बनाना है उस बच्ची की तरह हँसते हुए , गाते हुए ,हर कदम पर इस कौतुहल के साथ कि देखें आगे क्या बनने वाला है  पर क्योंकि अब हम बड़े हो गए हैं तो दो कदम पीछे हट कर देख सकते हैं , “ अरे ये गलती हो गयी , यहाँ का रंग तो छूट ही गया , यहाँ ये रंग कर दें तो बेहतर होगा |

पर क्या हम इस सुविधा का लाभ उठाते हैं ? 

शायद नहीं , आगे आगे और आगे बढ़ने का दवाब में जल्दी जल्दी रंग भरने में कई बार हम देख ही नहीं पाते कि एक रंग ने बाकी रंगों को दबा दिया है | जीवन भी एक रंग हो गया और सफ़र का आनंद भी नहीं मिला |पीछे हटने में कोई बुराई नहीं है पर मुश्किल ये है कि हम पीछे हट कर देखना नहीं चाहते हैं | जो बन गया , जैसा बन गया उसी पर रंग पोतते जाना है |




क्या जरूरी नहीं है हम दो कदम पीछे हट कर उसी समय जिंदगी को सुधार लें | भले ही आप का चित्र सबसे पहले न बन पाए पर यकीनन चित्र उसी का अच्छा बनेगा जो दो कदम आगे एक कदम पीछे में विश्वास रखता है | 
नीलम गुप्ता 

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