August 2018

अमृता प्रीतम - पति , साहिर और इमरोज , मुक्कमल प्रेम की तलाश मेंकरती एक बेहतरीन लेखिका
सुप्रसिद्ध पंजाबी कवियत्री अमृता प्रीतम, जिनके लेखन का जादू बंटवारे के समय में भी भारत और पकिस्तान दोनों पर बराबर चला | आज उनके जन्म दिवस पर आइये उन्हें थोडा करीब से जानते हैं | 

अमृता प्रीतम - मुक्कमल प्रेम की तलाश में करती  एक बेहतरीन लेखिका 



३१ अगुस्त १९१९ को पंजाब के गुजरावाला जिले में पैदा हुई अमृता प्रीतम को पंजाबी  भाषा की पहली कवियत्री माना  जाता है | उनका बचपन लाहौर में बीता व् प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा भी वहीँ हुई | उन्होंने किशोरावस्था से ही लिखना शुरू कर दिया था | कहानी , कविता , निबंध , उपन्यास हर विधा में उन्होंने लेखन किया है | उनकी महत्वपूर्ण रचनायें अनेक भाषाओँ में अनुवादित हो चुकी हैं | अमृता प्रीतम जी ने करीब १०० किताबें लिखीं जिसमें उनकी चर्चित आत्मकथा रसीदी टिकट भी शामिल है | 

रचनाओं व् पुरूस्कार का संक्षिप्त परिचय

उनकी चर्चित कृतियाँ निम्न हैं ...

उपन्यास –पांच बरस लम्बी सड़क , पिंजर ( इस पर २००३ में अवार्ड जीतने वाली फिल्म भी बनी थी ) , अदालत , कोरे कागज़ , उनचास दिन , सागर और सीपियाँ
आत्म कथा –रसीदी टिकट
कहानी संग्रह – कहानियाँ जो कहानियाँ नहीं हैं , कहानियों के आँगन में
संस्मरण –कच्चा आँगन , एक थी सारा

अमृता जी के सम्पूर्ण  रचना संसार के  बारे में विकिपीडिया से जानकारी ले सकते हैं 

प्रमुख पुरुस्कार –
१९५७ –साहित्य अकादमी पुरूस्कार
१९५८- पंजाब सरकार के भाषा विभाग द्वारा पुरुस्कृत
१९८८ -बैल्गारिया वैरोव पुरूस्कार
१९८२ – ज्ञानपीठ पुरूस्कार
अपने अंतिम दिनों में उन्हें पदम् विभूषण भी प्राप्त हुआ जो भारत सरकार द्वारा दिया जाने वाला दूसरा सबसे बड़ा सम्मान है |
उन्हें अपनी पंजाबी  कविता “अज्ज आँखा वारिस शाह नूं”  के लिए बहुत प्रसिद्धी प्राप्त हुई। इस कविता में भारत विभाजन के समय पंजाब में हुई भयानक घटनाओं का अत्यंत दुखद वर्णन है और यह भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में सराही गयी।

अमृता प्रीतम की शादी
                   
छोटी उम्र में ही अमृता प्रीतम की मंगनी हो गयी थी और जल्द ही सन १९३५ में उनका प्रीतम सिंह से विवाह हो गया |  वे अनारकली बाज़ार में होजरी व्यवसायी के बेटे थे | उनके दो बच्चे हुए | बंटवारे के बाद भारत आ कर  रिश्तों के दरकन से आजिज आ कर दोनों ने १९६० में  तलाक ले लिया किन्तु  अमृता प्रीतम ताउम्र  अपने पति का उपनाम "प्रीतम " अपने नाम के आगे लगाती रहीं |

अमृता प्रीतम और साहिर लुधियानवी  



अमृता जी जितना अपने साहित्य के लिए जानी जाती हैं उतना ही  साहिर लुधयानवी व् इमरोज से अपनी मुहब्बत के कारण जानी जाती है | कहने  वाले तो ये भी कहतें ही कि अमृता साहिर लुध्यानवी  से बेपनाह मुहब्बत करतिन थी  और इमरोज अमृता से | हालांकि ये दोनों मुहब्बतें पूरी तरह से एकतरफा नहीं थीं | जहाँ साहिर लुधियानवी ने अपने प्यार का कभी खुल कर इज़हार नहीं किया वहीँ अमृता ने इस पर बार –बार स्वीकृति की मोहर लगाई | उनकी दीवानगी का आलम ये थे कि वो उनके लिए अपने पति को भी छोड़ने को तैयार थीं | हालांकि बाद में उनके पति से उनका अलगाव हो ही गया | एक समय ऐसा भी आया जब वो साहिर के लिए दिल्ली में लेखन से प्राप्त तमाम प्रतिष्ठा भी छोड़ने को तैयार हो गयीं पर साहिर ने उन्हें कभी नहीं अपनाया | 

उन्होंने साहिर से पहली मुलाकात को कहानी के तौर पर भी लिखा पर साहिर ने खुले तौर पर उस बारे में कुछ नहीं कहा | जानकार लोगों के अनुसार साहिर लुधयानवी की माँ ने अकेले साहिर को पाला था | साहिर पर  उन बहुत प्रभाव था | वो साहिर के जीवन में आने –जाने वाली औरतों पर बहुत ध्यान देती थी | उन्हें अपने पति को छोड़ने वाली अमृता बिलकुल पसंद नहीं थी | साहिर ने अमृता को कभी नहीं अपनाया पर वो उन्हें कभी भुला भी नहीं पाए | जब भी वो दिल्ली आते उनके बीच उनकी ख़ामोशी बात करती | इस दौरान साहिर लगातार सिगरेट पीते थे | “ रसीदी टिकट “में एक जगह अमृता ने लिखा है ...

जब हम मिलते थे तो जुबां खामोश  रहती थी बस नैन बोलते थे , हम दोनों बस एक –दूसरे को देखा करते थे | 

साहिर के जाने के बाद ऐश ट्रे से साहिर की पी हुई सिगरेट की राख अमृता अपने होठों पर लगाती थीं और साहिर के होठों की छूअन  को महसूस करने की कोशिश करती थीं | ये वो आदत थी जिसने अमृता को सिगरेट की लत लगा दी थी।

 यह आग की बात है ,
 तूने ये बात सुनाई है
ये जिन्दगी की सिगरेट है
 तूने जो कभी सुलगाई थी
चिंगारी तूने दी थी
 ये दिल सदा जलता रहा
वक्त  कलम पकड़ कर
 कोई हिसाब लिखता रहा
जिन्दगी का अब गम नहीं , 
इस आग को संभाल ले
तेरे हाथों की खैर मांगती हूँ , 
अब और सिगरेट जला ले


साहिर ने अमृता से प्यार का इजहार कभी खुलेआम नहीं किया पर उनकी जिन्दगी में अमृता का स्थान कोई दूसरी महिला नहीं ले सकी | उन्होंने ताउम्र शादी नहीं की | संगीतकार   जयदेव द्वारा सुनाया गया एक किस्सा बहुत मशहूर है ....

जयदेव , साहिर के घर गए थे | दोनों किसी गाने पर काम कर रहे थे | तभी जयदेव की नज़र एक कप पर पड़ी वो बहुत गन्दा था | जयदेव बोले , “ देखो ये कप कितना गन्दा हो गया है लाओ इसे मैं साफ़ कर देता हूँ | साहिर ने उन्हें रोकते हुए कहा , “ नहीं उस कप को हाथ भी मत लगाना , जब अमृता आखिरी बार यहाँ आयीं थी तब उन्होंने इसी कप में चाय पी थी |

ना मिलने वाले दो प्रेमियों  का एक ये ऐसा अफसाना था  जिसे साहिर व् अमृता ने दिल ही दिल से निभाया |
जहाँ साहिर लिखते हैं ...

किस दर्जा दिल शिकन थे मुहब्बत के हादसे
हम जिंदगी में फिर कोई अरमां न कर सके

वहीँ अमृता को मिलने की आस है वो लिखती हैं ...

यादों के धागे
कायनात के लम्हों की तरह होते हैं
मैं उन लम्हों को चुनूंगी
उन्धागों को समेट लूंगी
मैं तुम्हें फिर मिलूँगी
कहाँ , कैसे पता नहीं
मैं तुम्हें फिर मिलूँगी  

इमरोज का अमृता के जीवन में आना

                सं १९६० के आसपास इमरोज अमृता के जीवन में आये | ये सिलसिला धीरे –धीरे शुरू हुआ | अमृता ने अपनी किताब के कवर पेज के लिए सेठी जी से बात करी , उन्होंने कहा वे एक लड़के को जानते हैं जिसका काम शायद आप को पसंद आये | वो इमरोज थे | अमृता को उनका काम पसंद आया | उन्होंने कवर पेज डिजाइन करके दिया | धीरे –धीरे मुलाकातों  का सिलसिला शुरू हो गया | ये प्यार भी एकतरफा था | इमरोज होना आसान नहीं है | उस स्त्री पर अपना जीवन कुर्बान कर देना जो मन से आप की कभी हो ही नहीं सकती .... ऐसा प्यार केवल इमरोज ही कर सकते थे | कहतें हैं अमृता इमरोज की पीठ पर साहिर का नाम लिखती थीं और इमरोज इसे अपने प्यार का प्रशाद मान कर इतराते थे |

आज लिव इन रिलेशन शिप पर बात तो होती है पर उन्हें अभी भी समाज द्वारा स्वीकार नहीं किया गया है पर अमृता उस ज़माने में इमरोज  के साथ लिव इन में रहीं | आखिर कुछ तो खास होगा इमरोज में जो अमृता के इतना करीब आ सके | कुछ लोग कहते हैं कि अमृता  और इमरोज एक घर में जरूर रहते थे पर अलग –अलग कमरों में |

जो भी हो उनका प्यार भी एक सच ही था | इमरोज इस बारे में बताते हैं कि अमृता उनसे कहते हैं कि एक बार उन्होंने इमरोज से कहा कि अगर साहिर उन्हें मिल गए होते तो तुम (इमरोज ) मुझे कभी न मिलते | इस पर इमरोज ने जवाब दिया, “ मैं तो तुमसे जरूर मिलता भले ही मुझे तुम्हें साहिर के घर से निकल कर लाना पड़ता | जब हम किसी से प्यार करते हैं तो रास्ते  मुश्किलों को नहीं गिनते हैं | जरा रूहानी प्रेम का एक रूप देखिये


मेरी सेज हाजिर है

पर जूते और कमीज की तरह

तू अपना बदन भी उतार दे

उधर मूढे पर रख दे

कोई खास बात नहीं

बस अपने –अपने देश का रिवाज है .....


इमरोज ने आखिरी वक्त तक उनका बहुत साथ दिया | बाथरूम में गिर जाने के कारण उनके कूल्हे  की हड्डी टूट गयी थी | इमरोज  ने उनकी बहुत सेवा की | वो उन्हें खिलाते –पिलाते , नहलाते , कपड़े पहनाते व् उनके लिए उनकी पसंद के फूल लाते | उन दिनों को भी इमरोज ने अमृता के लिए खुशनुमा  बना दिया |

अमृता की मृत्यु  के बाद इमरोज ने कहा , “ उसने जिस्म छोड़ा है साथ नहीं ... वो आज भी मेरे साथ है |

प्रीतम उनके पति जिनसे अलगाव होने के बाद भी उन्होंने उनका दिया सरनेम 'प्रीतम' नहीं छोड़ा .... साहिर जिससे वो तमाम उम्र बेपनाह मुहब्बत करती रहीं और इमरोज जिनसे उनका रूहानी रिश्ता था इन सब के बीच किसी मुक्कमल प्रेम की तलाश करती एक प्रतिभावान लेखिका ने ३१ अक्टूबर २००५ में इस दुनिया को अलविदा कह दिया | परन्तु अपने लिखे साहित्य के माध्यम से वो पाठकों के बीच सदा जीवित रहेंगी |

अब रात घिरने लगी तो तू मिला है 
तू भी उदास , चुप , शांत और अडोल 
मैं भी उदास , चुप , शांत और अडोल 
सिर्फ दूर बहते समुद्र में तूफ़ान है ....

फोटो क्रेडिट -saropama.com

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इंटरव्यू


कौन नहीं सफल होना चाहता , फिर विशिका के जीवन का सपना ही बॉस बनना था | उसने इसके लिए तैयारी बहुत की थी , फिर क्यों इंटरव्यू की तिथि पास आते ही वो इसे न देने के बहाने खोजने लगी |


इंटरव्यू




सुनील और विशु  एक ही ऑफिस में काम करते हैं | रैंक भी लगभग एक जैसी ही है | जहाँ विशु महत्वाकांक्षी  थी और जल्दी से जल्दी बॉस बनना चाहती थी, इसके लिए वो मेहनत भी बहुत कर रही थी | ऑफिस में सब को पता था |  वहीँ सुनील हमेशा आरामदायक तरीके से काम करने में विश्वास करता था | उसे न प्रोमोशन की जल्दी थी न आगे बढ़ने की , अगर किसी चीज की उतावली रहती थी तो ये कि लेटेस्ट मैच , मूवी न छूट जाए | जहाँ सुनील खुश मिजाज व जल्दी दोस्त बम्नाने वाला वहीं  विशु अंतर्मुखी  पर  ईश्वर  की इच्छा ,साथ काम करते हुए दोनों की दोस्ती हुई फिर दोनों के दिल मिल मिल गए | घरवालों को भी कोई दिक्कत नहीं थी | शादी के लिए हाँ कर दी |

इसी बीच विशु का इंटरव्यू आ गया | अगर वो इंटरव्यू क्लीयर कर लेती तो उसे सुनील का बॉस बन जाना था | सबको उसकी सफलता की उम्मीद थी | परन्तु जैसे -जैसे इंटरव्यू पास आ रहा था विशु इंटरव्यू न देने के बहाने खोजती जा रही थी | ऑफिस में सब को आश्चर्य था कि आखिर विशु को क्या हो रहा है | उस दिन इंटरव्यू था , सुबह से विशु दिखाई  नहीं दे रही थी | सुनील ने कई बार फोन किया विशु ने उठाया ही नहीं | सुनील परेशान था ... आखिर क्या कारण हो सकता है ? उसने अपने सहकर्मी के साथ विशु के घर जाने की सोची |

                                      दरवाजा विशु ने ही खोला , वो तैयार भी नहीं थी .... शायद नहाई तक नहीं थी , बेतरतीब कपडे बता रहे थे कि वो सुबह से बिस्तर  पर ही पड़ी थी | सुनील को देखते ही उसके गले लग गयी पर बताया कुछ नहीं | सुनील खुद चाय बना कर लाया , बहुत कुरेदने पर उसने कहा , " सुनील मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती , मुझे डर है कि मेरे बॉस बन जाने पर हमारे रिश्ते पर असर पड़ेगा | अपनी पत्नी को ऑफिस में अपने बॉस के रूप में देखना तुम्हारे लिए आसान नहीं होगा | हमारे रिश्ते बिगड़ जायेंगे | मुझे अपने रिश्तों की कीमत पर कोई सपना पूरा नहीं करना है | 


            अब गले लगने की बारी सुनील की थी | उसने विशु के सर पर  हल्की सी चपत मारते हुए कहा , " पगली , बॉस बनने का सपना मेरे तुम्हारी जिंदगी में आने से पहले ही था | मैं इस बात को जानता था , तब तो मुझे कोई आपत्ति नहीं थी | अगर तुमें लगता है कि पति बनते ही मैं बदल जाऊँगा तो तुम यकीनन मेरे जैसे  आदमी से शादी मत करो  . जो एक बात में बदल सकता है वो हर बात में बदल सकता है .... इसलिए दोनों ही हालत में तुम अपना कैरियर चुनो ,रही मेरी बात तो तुम्हारा सपना पूरा होना मेरी सबसे बड़ी ख़ुशी है , मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम मेरी ऑफिस में बॉस हो | 


           विशु खुश हो कर इंटरव्यू के लिए तैयार होने चली गयी |

वंदना बाजपेयी
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देहरी के अक्षांश पर - गृहणी के मनोविज्ञान की परतें खोलती कवितायें




कविता लिखी नहीं जाती है , वो लिख जाती है , पहले मन पर फिर पन्नों पर ....एक श्रेष्ठ कविता वही है जहाँ हमारी चेतना सामूहिक चेतना को व्यक्त करती है | व्यक्ति अपने दिल की बात लिखता है और समष्टि की बात उभर कर आती है | वैसे भी देहरी के अन्दर हम स्त्रियों की पीड़ा एक दूसरे से अलग कहाँ है ?


देहरी के अक्षांश पर - गृहणी के मनोविज्ञान की परतें खोलती कवितायें 

घर परिवार की
धुरी वह
फिर भी
अधूरी वह

मोनिका शर्मा जी के काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर पढ़ते  हुए न जाने कितने दर्द उभर आये , न जाने कितनी स्मृतियाँ ताज़ा हो गयीं और न जाने कितने सपने जिन्हें कब का दफ़न कर चुकी थी आँखों के आगे तैरने लगे | जब किसी लड़की का विवाह होता है तो अक्सर कहा जाता है ,"एक संस्कारी  लड़की की ससुराल में डोली जाती और अर्थी निकलती है "| डोली के प्रवेश द्वार और अर्थी के निकास द्वार के बीच देहरी उसकी लक्ष्मण रेखा है | जिसके अंदर  दहेज़ के ताने हैं , तरह -तरह की उपमाएं हैं , सपनों को मारे जाने की घुटन है साथ ही एक जिम्मेदारी का अहसास है कि इस देहरी के अन्दर स्वयं के अस्तित्व को नष्ट करके भी उसे सबको उनका आसमान छूने में सहायता करनी है | इस अंतर्द्वंद से हर स्त्री गुज़रती है | कभी वो कभी वो अपने स्वाभिमान और सपनों के लिए संघर्ष करती है तो कभी अपनों के लिए उन्हें स्वयं ही कुचल  देती है |

मुट्ठी भर सपनों
और अपरिचित अपनों के बीच
देहरी के पहले पायदान से आरभ होती है
गृहणी के जीवन की
अनवरत यात्रा

                  अक्सर लोग महिलाओं को कामकाजी औरतें और  घरेलु औरतों में बाँटते है परन्तु मोनिका शर्मा जी जब बात  का खंडन करती हैं तो मैं उनसे सहमत होती हूँ  .... स्त्री घर के बाहर काम करे या न करें गृहणी तो है ही | हमारे समाज में घर के बाहर काम करने वाली स्त्रियों को घरेलु जिम्मेदारियों से छूट नहीं है | स्त्री घर के बाहर कहीं भी जाए घर और उसकी जिम्मेदारियां उसके साथ होती हैं | हर मोर्चे पर जूझ रही स्त्री कितने अपराध बोध की शिकार होती है इसे देखने , समझने की फुर्सत समाज के पास कहाँ है |


                           विडम्बना ये है कि एक तरफ हम लड़कियों को शिक्षा दे कर उन्हें आत्मनिर्भर बनने के सपने दिखा रहे हैं वहीँ दूसरी और शादी के बाद उनसे अपेक्षा की जाती है कि वो अपने सपनों को  मन के किसी तहखाने में कैद कर दें | एक चौथाई जिन्दगी जी लेने के बाद अचानक से आई ये बंदिशें उसके जीवन में कितनी उथल -पुथल लाती हैं उसकी परवाह उसे अपने सांचे में ढाल लेने की जुगत में लगा परिवार कहाँ करता है ...

गृहणी का संबोधन
पाते ही मैंने
किसी गोपनीय दस्तावेज की तरह
संदूक के तले में
छुपा दी अपनी डिग्रियां
जिन्हें देखकर
कभी गर्वित हुआ करते थे
स्वयं मैं और मेरे अपने


                            फिर भी उस पीड़ा को वो हर पल झेलती है ...

स्त्री के लिए
अधूरे स्वप्नों को
हर दिन जीने की
मर्मान्तक पीड़ा
गर्भपात की यंत्रणा सी है

                   
                    एक सवाल ये भी उठता है कि माता -पिता कन्यादान करके अपनी जिम्मेदारियों से उऋण कैसे हो सकते हैं | अपने घर के पौधे को पराये घर में स्वयं ही स्थापित कर वह उसे भी पराया मान लेते हैं | अब वो अपने कष्ट अपनी तकलीफ किसे बताये , किससे साझा  करे मन की गुत्थियाँ | एक तरह परायी हो अब और दूसरी तरफ पराये घर से आई हो , ये पराया शब्द उसका पीछा ही नहीं छोड़ता | जिस कारण कितनी बाते उसके मन के देहरी को लांघ कर शब्दों का रूप लेने किहिम्मत ही नहीं कर पातीं | मोनिका शर्मा जी की कविता "देह के घाव " पढ़ते हुए सुधा अरोड़ा जी की कविता " कम से कम एक दरवाजा तो खुला रहना चाहिए " याद आ गयी | भरत के पक्ष में खड़े मैथिलीशरण गुप्त जब " उसके आशय की थाह मिलेगी की किसको , जनकर जननी ही जान न पायी जिसको " कहकर भारत के प्रति संवेदना जताते हैं | वही संवेदना युगों -युगों से स्त्री के हिस्से में नहीं आती | जैसा भी ससुराल है , अब वही तुम्हारा घर है कह कर बार -बार अपनों द्वारा ही पराई घोषित की गयी स्त्री देहरी के अंदर सब कुछ सहने को विवश हो जाती है |

अपनों के बीच
अपनी उपस्थिति ने
उसे पराये होने के अर्थ समझाए
तभी तो देख , सुन ये सारा बवाल
उसके क्षुब्ध मन में उठा एक ही सवाल
देह के घाव नहीं दिखते
जिन अपनों को
वो ह्रदय के जख्म कहाँ देख पायेंगे ?


                   संग्रह में आगे बढ़ते हुए पन्ने दर पन्ने हर स्त्री अपने ही प्रतिबिम्ब को देखती है | बार -बार वो चौंकती है अरे ये तो मैं हूँ | ये तो मेरे ही मन की बात कही है | माँ पर लिखी हुई कवितायें बहद ह्रदयस्पर्शी है | माँ की स्नेह छाया के नीचे अंकुरित हुई , युवा हुई लड़की माँ बनने के बाद ही माँ को जान पाती है | कितना भी त्याग हो , कितनी भी वेदना हो पर वो माँ  हो जाना चाहती है |

तपती दुपहरी , दहलीज पर खड़ी
इंतज़ार करती , चिंता में पड़ी
झट से बस्ता हाथ में लेकर
उसके माथे का पसीना पोछती हूँ
अब मैं माँ को समझती हूँ

                          देहरी स्त्री की लक्ष्मण रेखा अवश्य है पर उसके अंदर सांस लेती स्त्री पूरे समाज के प्रति सजग है | वो भ्रूण हत्या के प्रतिसंवेदंशील है , स्त्री अस्मिता की रक्षा के लिए आवाज़ उठाती है | बंदूकों के साए ,मनुष्यता के मोर्चे , मानुषिक प्रश्न , आखिर क्यों विक्षिप्त हुए हम आदि अनेक ऐसे रचनाएँ हैं जो घर परिवार को संभालती रसोई औ आँगन के बीच पिसती स्त्री की व्यापक सोच को दर्शाती हैं |


                          कुल मिला कर देखा जाए तो " देहरी के अक्षांश पर "जिस पर समस्त  सृष्टि टिकी हुई है ,  स्त्री मन की छोटी -छोटी बातें हैं जिनके गहरे और व्यापक अर्थ निकलते हैं | संग्रह की सारी  कवितायें पाठक को बाँध लेने की क्षमता रखती हैं , पाठक कविता पढने के बाद बहुत देर तक उसमें विचरता रहता है |  स्त्रियों को तो ये कवितायें बिलकुल अपनी सी लगती हैं पर मुझे लगता है स्त्रियों के साथ -साथ पुरुषों को भी ये संग्रह अवश्य पढना चाहिए | मोनिका जी जब अपनी बात रखती है तो बहुत उग्र नहीं हो जाती | उनका विरोध भी बहुत नम्र और मर्यादित है | जो बस ठहर कर सुने जाने और उस पर विचार करने की अपेक्षा रखती हैं  | आज स्त्री विमर्श के नाम पर जिस तरह से अमर्यादित साहित्य रचा जा रहा है उससे  आम पाठक जुड़ नहीं पाता क्योंकि वो उसे अपने घर की स्त्रियों की आवाज़ नहीं लगती | किसी भी परिवर्तन की शुरुआत जमीन से जुडी होनी चाहिए | स्त्री -पुरुष समानता की बातें तब आकर लेंगी जब  देहरी के अन्दर कैद स्त्रियों की  सिसकियाँ सुनी जाए | परिवर्तन की शुरुआत घर की देहरी से होनी है |

                   संग्रह का कवर पेज बहुत ही आकर्षक है  जो  अपने आप में बहुत कुछ कह देता है | बोधि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस संग्रह में त्रुटिहीन १०० पेज हैं |  अगर आप अपनी सी लगने वाली  कुछ सार्थक कवितायें पढना चाहते हैं तो यह संग्रह आप के लिए उपयुक्त विकल्प है|

वंदना बाजपेयी


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सोलमेट - असलियत या भ्रम

                              अभी कुछ दिन पहले एक विवाह समारोह में जाना हुआ |  दूल्हा दुल्हन स्टेज पर बैठे थे , और जैसा की होता है सब उन्ही को देख रहे थे | रंग रूप कद में दोनों एक दूसरे के बराबर थे , न कोई उन्नीस ना कोई बीस | हर कोई तारीफ़ कर रहा था, " भगवान् ने मिलाया है , कितनी परफेक्ट जोड़ी है |" तभी किसी ने कहा  अरे शिक्षा  और नौकरी में भी दोनों बराबर हैं , इसलिए ये परफेक्ट नहीं सुपर परफेक्ट जोड़ी है यानी की सोलमेट | सबने समर्थन में सर हिलाया | और मैं मन ही मन  सोलमेट की व्याख्या करने लगी |


सोलमेट - असलियत या भ्रम


सोल मेट , जैसा की शाब्दिक अर्थ से  कयास लगाया जा सकता है ... एक ऐसा व्यक्ति जो आपकी आत्मा का साथी हो | रिश्तों की नींव  ही साथ रहने की लालसा पर आधारित हैं | हम कई तरह के रिश्ते बनाते हैं | जब कोई नया रिश्ता बनता है ऐसा लगता है कि हम उसी को खोज रहे थे | साथ रहते -रहते उसमें भी कुछ दूरियाँ आने लगती हैं | मन -मुटाव होते हैं , झगडे होते हैं , रिश्ते टूटते हैं या सिर्फ चलने के लिए खींचे जाते हैं | क्योंकि ये सारे रिश्ते सांसारिक हैं , परन्तु आत्मा जो हमारा शुद्ध रूप है अगर हमें ऐसा कोई साथी मिल जाता है जिसके प्रेम का  अहसास हम आत्मा के स्तर पर महसूस करें , तो वही  होगा हमारा सोल मेट | " सोलमेट "एक ऐसी हकीकत या कल्पना जो हमें रोमांच से भर देती है |


क्या पति -पत्नी होते हैं सोलमेट



                                         बहुधा पति पत्नी को सोलमेट कहा जाता है | पर क्या ये सच हैं ? अगर देखा जाए तो मनुष्य तीन स्तरों पर जीवन जीता है ... शारीरिक , मानसिक , आत्मिक या आध्यात्मिक | वही संबध श्रेष्ठ संबंध होते हैं जो तीनों स्तरों पर स्थापित हों | पति -पत्नी का रिश्ता शारीरिक साथी के रूप में होता ही है | विवाह इसी कारण किया जाता है | परन्तु यह रिश्ता मानसिक स्तर पर भी जुड़े ये जरूरी नहीं है | कई बार देखा गया है कि पति पत्नी एक बहुत अच्छे साथी होते हुए भी आपस में ज्यादा देर तक बात नहीं कर पाते , कारण उनका मानसिक स्तर नहीं मेल खाता , रुचियाँ अलग हैं , सोच अलग है  , विचार अलग है | जो आपस में टकराव का कारण बनते हैं |  कलह -कुलह के बीच बीतते जीवन में मन ही नहीं मिलता फिर   आध्यात्मिक या आत्मा के स्तर पर तो और भी बड़ी बात है |


क्या है सोलमेट की परिभाषा


                    अमरीकी लेखक " रिचर्ड बैच" ने सोलमेट की परिभाषा दी है , उनके अनुसार ....

A soulmate is someone who has locks to fit our keys and keys to fit our locks. when we feel safe enough to open the locks , our truest self  steps out and we can be completely and honestly who we are .


"सोलमेट कोई ऐसा होता है जिसके पास हमारी सारी  चाभियों में फिट होने वाले ताले होते हैं और हमारे तालों में फिट होने वाली चाभियाँ होती हैं | जब हम तालों को खोलना सुरक्षित समझते हैं तब हमारा असल मैं बाहर आता है | तब हम इमानदारी से पूरी तरह वो हो सकते हैं जो हम हैं |"


                      जैसा कि परिभाषा से स्पष्ट है कि हम कितने भी रिश्ते बना लेते हैं परन्तु अपने शुद्ध रूप में किसी के सामने  नहीं रह पाते | इसका कारण ये है कि हर रिश्ते में समन्वय स्थापित करने के लिए कुछ न कुछ परिवर्तन करना पड़ता है | कई बार ये बदलाव इतना ज्यादा होता है कि हमारा असली रूप उसके पीछे कहीं खो सा जाता है | यहीं से शुरू होता है घुटन का एक अंत हीन सिलसिला | महिलाएं तो इसकी अधिकतर शिकार रहती हैं | परन्तु सोलमेट के साथ यह विडम्बना नहीं है | वहां किसी समन्वय की कोई जरूरत नहीं है | हम जैसे हैं वैसे रह सकते हैं | टकराव की कोई गुंजाइश ही नहीं है |

कौन हो सकता है हमारा सोलमेट


                            जैसा की ऊपर ही स्पष्ट कर दिया है कि सोलमेट कोई भी हो सकता है | जरूरी नहीं कि पति -पत्नी हीं  हों , माता -पिता , भाई- बहन , कोई मित्र , पड़ोसी , आपका गुरु , यहाँ तक की कोई दो साल का बच्चा भी | सोलमेट  वही है जिसे देखते ही लगे अरे आप इसे ही  ढूंढ रहे थे ... यही तो है आपकी आत्मा का साथी | सोलमेट के साथ उम्र का बंधन नहीं  होता , क्योंकि आत्मा की कोई उम्र नहीं होती |


क्यों मुश्किल होता है सोलमेट को खोजना


                                   जैसा की पहले ही बताया है कि सोलमेट यानि आत्मा का साथी | जरा सोचिये जब जीवन साथी  खोजने में इतनी मुश्किल होती है तो आत्मा का साथी खोजने में कितनी मुश्किल होगी | वैसे भी ज्यादातर मनुष्य शरीर के तल पर ही जीते हैं , मानसिक तल पर भी नहीं , इसलिए उन्हें जरूरत ही नहीं होती की आत्मा के साथी को खोजा जाए | ऐसा साथी जिसके साथ आप खुद को पूर्ण महसूस कर पाए | इसीलिए अधिकतर लोग ये अधूरापन महसूस करते हुए ही दुनिया से चले जाते हैं |


अब सवाल ये उठता है कि आत्मा के साथी को खोजा कैसे जाए | दरअसल उसे खोजने की जरूरत नहीं पड़ती |जब आप उसके साथ होते हैं तो आप को खुद ब खुद पता चल जाता है कि यही तो है वो जिसे आप खोज रहे थे | या जिसको मिलने के बाद कुछ और पाने या किसी और रिश्ते की जरूरत खत्म हो जाती है | मन शांत हो जाता है और आप खुद को पूर्ण महसूस करने लगते हैं |


कई लोग ये कह  सकते हैं कि जब हम कोई नया रिश्ता शुरू करते हैं तो ऐसा ही महसूस होता है , फिर इसमें खास क्या है | खास ये है कि अनबन के बाद अन्य रिश्ते टूटते हैं जब कि ये रिश्ता मन -मुटाव व् अनबन के बाद भी बना रहता है , उतनी ही स्थिरता के साथ ... क्योंकि यहाँ अलग होने की कल्पना भी नहीं होती |


क्या राधा -कृष्ण थे सोलमेट


              कहते हैं राधा -कृष्ण एक दूसरे के सोलमेट थे | राधा विवाहित होते हुए भी कृष्ण की दीवानी थीं और कृष्ण राधा को गुरु मानते थे क्योंकि उन्होंने प्रेम करना राधा जी से ही सीखा | वैसे तो प्रेम अपरिमित होता है | सोलमेट वो हैं जहाँ से प्रेम की धारा फूटती है और पूरे विश्व में बहती है | उसका कारण है कि अब व्यक्ति पूर्ण महसूस करता है , अब उसे प्रेम चाहिए नहीं बस देना है |


क्या वास्तव में होते हैं सोलमेट 

                                     मनोवैज्ञानिक अतुल नागर जी कहते हैं कि  एक बड़ी ही रूमानी सी कल्पना है सोलमेट | जरा फ़िल्मी  अंदाज में कहें तो ....


" जब ईश्वर ने ये कायनात बनायीं और आत्माओं को शरीर धारण करने के लिए भेजा तो उन्होंने हर आत्मा के दो टुकड़े कर दिए | वो दूसरा टुकड़ा चाहे जिस शरीर में हो हमारी ही आत्मा का अंश है | इसलिए वही है हमारा सोलमेट , जिसके पास हमारे हर  ताले की चाभी है |" 


                     दरसल मनुष्य हमेशा अपूर्ण महसूस करता है | चाहे व् कितने लोगों से कितना भी प्यार क्यों न करे उसे लगता नहीं कि उसने सब कुछ पा लिया है | एक खालीपन का अहसास रहता है और ये इच्छा भी कि कोई दूसरा आ कर इसे भर दे | इसी ने सोलमेट की कल्पना को जन्म दिया | भले ही हम उसे ढूंढ न पाए पर कोई है बिलकुल हमारे जैसा | ये सोच ही मन को शक्ति से भर देती है |

आध्यात्मिक गुरु डॉ . कोंड्विक के अनुसार , हर आत्मा अपने आप में पूर्ण है | उसे किसी ऐसे साथी की जरूरत ही नहीं है जो उसे पूर्ण करे | ये खालीपन दरअसल अपने आप को ना समझ पाने के कारण होता है | जब आप ध्यान में गहरे उतरते हैं तब आपको अपने आत्म स्वरुप की पूर्णता का अहसास होता है | जो पूर्ण है उसे क्या चाहिए .... वो सिर्फ देगा | सोलमेट का सिद्धांत ही अपूर्णता के सिद्धांत पर आधारित है .... जो आत्मा का स्वरुप है ही नहीं |

                                             खैर सोलमेट होते हैं  या नहीं होते हैं ये रूमानी कल्पना है या हकीकत इसके बारे में अभी कुछ ठीक से कहा नहीं जा सकता | फिर भी कुछ तो खास है इस कल्पना में जो एक सुकून का अहसास देता है | खोजते रहिये क्या पता आपको आप का सोलमेट मिल जाए और ....

वंदना बाजपेयी 



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रक्षाबंधन पर 5 वर्ण पिरामिड



रक्षा बंधन का पावन दिन जिस दिन भाई -बहनों के पुनीत प्रेम की  धारा में पूरा भारत बह रहा होता है तो कवि मन क्यों न बहे | प्रेम और स्नेह की इस सरिता में कुछ वर्ण पिरामिडों के पुष्प हम भी अर्पित कर रहे हैं ....


रक्षाबंधन पर 5 वर्ण पिरामिड 


ये 
पर्व
बहन 
भाई प्रेम 
रक्षाबंधन 
आता सावन में 
रहता हृदय में।
~~~~~~~~~~~
••
है 
बैठी 
प्रसन्न
राखी थाल 
सजाये बहन
आये कब भाई 
बाँधू राखी जो लाई।
~~~~~~~~~~~~~~~
••
ये
धागा 
नहीं है 
स्नेह सूत्र 
विभोर मन 
जुड़ाव मन का 
संबंध जीवन का।
~~~~~~~~~~~~~
••
मैं 
रहूँ 
कहीं भी
योजक ये 
रेशम सूत्र 
बनेगा बहना
कलाई का गहना।
~~~~~~~~~~~~
••
तू 
रहे 
स्वस्थ 
सदा मस्त 
धन समृद्ध 
हर्ष का चंदन 
मने रक्षाबंधन।
~~~~~~~~~~~~
डा० भारती वर्मा बौड़ाई

 रक्षाबंधन की अशेष हार्दिक शुभकामनाएँ।

लेखिका



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keywords: raksha bandhan, rakhi, bhai -bahan
 वारिस

अपने बेटे के विवाह के समय से माता -पिता के मन में एक सपना पलने लगता है कि इस घर को एक वारिस मिले जो खानदान के नाम और परंपरा को जीवित रखे | स्वाभाविक है , पर कभी कभी ऐसा भी होता है कि अपनी इस इच्छा की भट्टी में मासूम बहु की सिसकियों की आहुति उन्हें जरा भी नहीं अखरती | 


वारिस



शादी की पहली रात यानि सुहागरात वाले दिन ही मेरे पति ने मेरे ऊपर पानी से भरी एक बाल्टी उढ़ेल दी थी ।वो सर्दी की रात और ठन्डा पानी..मुझे अन्दर तक झकझोर गया था ।


कमरे में आते हुए जब शिव को मैंने देखा था तो चाल ढाल से समझ चुकी थी । कि जिसके साथ मुझे बाँधा गया है वो शायद मन्दबुद्धि है ।


मेरा शायद आज उसकी इस हरक़त से यक़ीन में बदल चुका था ।


मैं बिस्तर से उठकर कमरे के बगल वाली कोठरी में कपड़े बदलने पहुँची तो शिव पीछे-पीछे आ पहुँच था । मैं गठरी बन जाना चाहती थी शर्म से । लेकिन वो मुझे नचाना चाहता था ।


“ ऐ ..नाचो न .., नाचो ..न ..पार्वती ! इसी पेटीकोट में नाचो “ शिव ने जैसे ही कहा मैं हैरत से बोल उठी थी..
“ क्यों ? तुम अपनी पत्नि को क्यों नचाना चाहते हो “


“ वो ..न ... तब्बू तो ऐसे ही नाचती है न ..जीनत भी नाचती है ..मुंशी जी मुझे ले जाते हैं अपने साथ “ शिव बच्चे की तरह खिलखिलाकर बोल उठा था..।


और मुझे नौकरों के बूते पर पले बच्चे की परवरिश साफ नज़र आ रही थी ...जिसके घर पर शादी में रंडी नचाना रहीसी था , तो उसके बच्चे का हश्र तो ये होना ही था ।


मैं समझ चुकी थी आज से मेरे भाग्य फूट गये हैं । पिता जी को कितना बड़ा धोखा दिया था उनके ही रिश्तेदार ने ये सम्बन्ध करवा कर ।


जमींदार सेठ ईश्वरचंद के घर में उनके इकलौते बेटे को ब्याही पार्वती सिसक उठी थी ...
“ हे ईश्वर ये तूने क्या किया ..मेरी किस्मत तूने किसके साथ बाँध दी ...” अनायास ही उसके मुंह से निकल पड़ा था ...।
सुबह सेठानी के पैर छूने झुकी तो “ दुधो नहाओ.. पूतों फलो “ ये कहते हुये मुझे गले का हार देते हुये सेठानी बड़े मीठे स्वर में बोली .....धैर्य से काम लेना बहुरिया ।
पड़ोस में मुंह दिखाई का बुलावा देकर लौटी चंपा ने मुझे कनखियों से जैसे ही देखा मैं समझ गयी थी कि ये भी जानना चाहती है कुछ ..
“ काहे भाभी बिटवा कछु कर सके या कोरी ही लौट जईहो “ चंपा का सवाल मुझे बिच्छू के डंक की तरह लगा था । मैं चुप रह गयी थी ।
दूसरी बिदा में जब ससुराल आई थी तो सेठ जी ने पहले दिन ही कहला दिया था सेठानी से ..,,
“ हमारे घर की बहुएं मुंशी , कारिन्दों के आगे मुंह खोल कर नहीं रहती हैं कह देना बहू से । “


छह महीने बीत गये थे , शिव को कोई मतलब नहीं था मुझसे ..होता भी कैसे ? वो मर्द होता तो ही होता न .....
अचानक एक दिन ....
” बहू से कह दो सेठानी ..! हमारे दोस्त का लड़का आयेगा । उसकी तीमारदारी में कोई कमी न रखे “ सेठ जी ने कहा और अपने कमरे में चले गये..
मैं घूँघट की ओट में सब कुछ समझ चुकी थी ।
“ये दोगला समाज अपनी साख रखने के लिए अपनी बहू और बेटियों को दाव पर लगाने से भी नहीं चूकता । “
और , मैं उस रात एक अजनबी और उस व्यक्ति को सौंप दी गयी थी जो इस घर को वारिस दे सके.....

( कुसुम पालीवाल, नोयडा)


लेखिका


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keywords: short stories , very short stories,new born, varis



बाजा-बजन्तर


अगर आप संगीत के शौक़ीन हैं तो आप के यहाँ भी बाजा बजता ही होगा | कई बार ये शौक आपको वोल्यूम के बटन को प्लस पर दबाने को विवश भी कर देता होगा जिससे आपके साथ -साथ आपके पडोसी भी  आपके उन पसंदीदा गानों का लुत्फ़ ले सकें और अगर वो उनके पसंदीदा  गाने न हो तो  उन्हें भुगत सकें | जो भी हो किसी के घर से आने वाली संगीत की ये स्वरलहरियाँ उसके संगीत प्रेमी होने का ऐलान तो कर ही देती हैं | पर क्या आप जानते हैं कि कई बार बजते हुए बाजे की मनभावन धुनों के पीछे कुछ अलग ही कारण छुपे  होते हैं .... क्या आप सुनना चाहेंगे ?

बाजा-बजन्तर



बाजा अब बजा कि बजा दोपहर में|

नयी किराएदारिन को देखते ही मैं और छुटकू उछंग लेते हैं|

वह किसी स्कूल में काम करती है और सुबह उसके घर छोड़ते ही बाजा बंद हो जाता है और इस समय दोपहर में उसके घर में घुसते ही बाजा शुरू| छुट्टी वाले दिन तो, खैर, वह दिन भर बजता ही रहता है|

गली के इस आखिरी छोर पर बनी हमारी झोपड़ी की बगल में खड़ी हमारी यह गुमटी इन लोगों के घर के ऐन सामने पड़ती है| जभी जब इनका बाजा हवा में अपनी उमड़-घुमड़ उछालता है तो हम दोनों भी उसके साथ-साथ बजने लगते हैं; कभी ऊँचे तो कभी धीमे, कभी ठुमकते हुए तो कभी ठिठकते हुए| अम्मा जो धमकाती रहती है, “चौभड़ फोड़ दूँगी जो फिर ऐसे उलटे सीधे बखान ज़ुबान पर लाए| घरमें दांत कुरेदने, को तिनका नाहीं और चले गल गांजने.....”

“आप बाजा नहीं सुनते?” नए किराएदार से पूछ चुके हैं हम| हमारीगुमटीपर सिगरेट लेने वह रोज़ ही आता है|

“बाजा? हमारा सवाल उसे ज़रूर अटपटा लगे रहा? ‘क्यों? कैसे?”

“घर में आपका बाजा जभी बजता है जब आपकी बबुआइन घर में होती है, वरना नाहीं.....”
“हाँ.....आं.....हाँ.....आं| बाजा वही बजाती है| वही सुनती है.....”

“आप कहीं काम पर नहीं जाते?” हमयह भी पूछ चुकेहैं| इन लोग को इधर आए महीना होने को आए रहा लेकिन इस बाबू को गली छोड़ते हुए हम ने एक्को बार नाहीं देखा है|
“मैं घर से काम करता हूँ.....”

“कम्प्यूटर है का?” “जिन चार दफ्तरों में अम्मा झाड़ू पोंछा करती है सभी में दिन भर कम्प्यूटर चला करते हैं| यूँ तो इन लोग के आने पर अम्मा भी इनके घर काम पकड़ने गयी रही लेकिन इस बाबू ने उसे बाहर ही से टरका दिया रहाकाम हमारे यहाँ कोई नहीं| इधर दो ही जन रहते हैं|”

“हाँ.....आं.....हाँ.....आं..... कम्प्यूटर है, कम्प्यूटर है| लेकिन एक बात तुम बताओ, तुम मुझे हमेशा बैठी ही क्यों मिलती हो?”

“बचपनमें इसके दोनों पैर एक मोटर गाड़ी के नीचे कुचले गए थे, मेरी जगह छुटकू जवाब दिए रहा|”

“बचपन में?” “झप से वह हसे रहा, ‘तो बचपन पार हो गया? क्या उम्र होगी इस की? ज़्यादा से ज़्यादा दस? या फिर उस से भी कम?”

“अम्मा कहती हैं मैं, तेरह की हूँ और छुटकू बारह का.....”

“मालूम है? झड़ाझड़ उसकीहँसी बिखरती गयी रही, मैं जब ग्यारह साल का था तो मेरा भी एक पैर कुचल गया रहा| लेकिन हाथ है कि दोनों सलामत हैं| और सच पूछो तो पैर केमुकाबले हमारे हाथ बड़ी नेमत हैं| हमारे ज़्यादा काम आते हैं| पानी पीना हो हाथ उलीच लो, बन गया कटोरा| चीज़ कोई भारी पकड़नी हो, उंगलियाँ सभी साथ, गूंथ लो, बन गयी टोकरी.....”

“मगर आप लंगड़ाते तो हो नहीं?” पूछे ही रही मैं भी|

“हाँ.....आं.....हाँ.....आं.....लंगड़ाता मैं इसलिए नहीं क्योंकि मेरा नकली पैर मेरे असली पैर से भी ज़्यादा मजबूत है| और मालूम? तुम भी चाहो तो अपने लिए पैर बनवा सकती हो| कई अस्पताल ऐसे हैं, जहाँ खैरात में पैर बनाए जाते हैं.....”

“सच क्या?” मेरी आँखों में एक नया सपना जागा रहा| अपनी पूरी ज़िन्दगी में बीड़ी-सिगरेट और ज़रदा-मसाला बेचती हुई नहीं ही काटना चाहती| यों भी अपने पैरों से अपनी ज़मीन मापना चाहती हूँ| घुटनों के बल घिरनी खाती हुई नहीं|

सच, बिल्कुल सच| एकदम सच, वह फिर हंसे रहा, और मालूम? मेरा तो एक गुर्दा भी मांगे का है, दिल में मेरे पेसमेकर नाम की मशीन टिक-टिक करती है और मेरे मुँह के तीन दांत सोने के हैं.....”

“दिखाइए,” “छुटकूउनके रहा, ‘हम ने सोना कहीं देखा नाहीं.....”
“सोने वाले दांत अन्दर के दांत हैं, दिखाने मुश्किल हैं.....”

“नकली पैर के लिए कहाँ जाना होगा?” अपने घुटनों पर नए जोड़ बैठाने को मेरी उतावली मुझे सनसनाए रही|

“पता लगाना पड़ेगा| मेरा नकली पैर पुराना है| तीस साल पुराना.....”

“दो पैकिट सिगरेट चाहिए,” अपनी बबुआइन के स्कूल के समय वह आया है, लेकिन उधार.....

उसके हाथ में एक छोटा बक्सा है|
“बाहर जा रहे हैं?” छुटकू पूछता है|
“हाँ, मैं बच्चों के पास जा रहा हूँ|”
“वे आप के साथ नहीं रहते?”

“नहीं| उधरकस्बापुर में उन के नाना नानी का घर है| वहीं पढ़ते हैं| वहीं रहते हैं.....”
“ऊँची जमात में पढ़ते हैं?”

“हाँ| बड़ा बारहवीं में है और छोटा सातवीं में| इधर कैसे पढ़ते? इधर तो हम दो जन उन की माँ की नौकरी की ख़ातिर आए हैं| सरकारी नौकरी है| सरकार कहीं भी फेंक दे| चाहे तो वीरमार्ग पर और चाहे तो, ऐसे उजाड़ में”

“उजाड़ तो यह है ही” मैं कहती हूँ, “वरना म्युनिसिपैलटी हमें उखाड़ न देती? यह गुमटी भी और यह झोपड़ी भी|”

“सड़क पार वह एक स्कूल है और इधर सभी दफ्तर ही दफ्तर,” वह सिर हिलाता है|

“उधार चुकाएँगे कब?” छुटकू दो पैकेट सिगरेट हाथ में थमा देता है|

“परसों शाम तक,” वह ठहाका लगाता है, “इधर इन दो डिबिया में कितनी सिगरेट है? बीस| लेकिन मेरे लिए बीस से ऊपर है| मालूम है? एक दिन में मैं छः सिगरेट खरीद पीता हूँ और सातवीं अपनी कर बनायी हुई| छः सिगरेटों के बचे हुए टर्रों को जोड़कर|”

“उधरकस्बापुर में नकली पैर वाला अस्पताल है|” पैर का लोभ मेरे अन्दर लगातार जुगाली करता है| अम्मा की शह पर, “जयपुर नाम का पैर मिलता है| ताक में हूँ जैसे ही कोई तरकीब भिड़ेगी, तेरे घाव पुरेंगे| ज़रूर पुरेंगे|”

“कस्बापुर में? नाहीं..... नाहीं..... कस्बापुर कौन बड़ी जगह है?”

“आज बाजा नहीं बज रहा?” छुटकू धीर खो रहा है| बबुआइन को अपने स्कूल से लौटते हुए हम देखे तो रहे|

“जा कर पूछेगा?” मैं हँसती हूँ|
बबुआइन से हम भय तो खाते ही हैं|

बाजा-बजन्तर

फोटो क्रेडिट -विकिपीडिया ऑर्ग 


सुबह स्कूल जाते समय बंद दरवाज़ा खोलती है और एकदिश धारा की मानिन्द नाक अपनी सीध पर लम्बे-लम्बे डग भर कर गली से ओझल हो लेती है| इसी तरह दोपहर में दौड़ती हाँफती हुई बंद अपने दरवाज़े पर अपने कदम रोकतीहै और दरवाज़ा खुलते फिर ओझल हो जाती है| अपने से उसने कभी हमें पास बुलाए तोरहा नहीं और फिर जितना उसे दूर ही से देखा पहचाना है उसी से उस पर भरोसा तो नहीं ही जागता है|

“हो,” छुटकू चुटकी बजाता है, “सिगरेट का उधार माँगने के बहाने से जा तो सकता हूँ.....”
छुटकू के साथ वह भी हमारी गुमटी पर चली आती है|
“सिगरेट किस से ली थी?” उसकी आवाज़ में ऐंठ है, ठसकहै|

“मुझ से,” मैं कहती हूँ|
“यहाँ कोई और भी तो बैठता होगा? यह गुमटी है किस की?”
“हमारी है-”
“लेकिन इसे चलाता कौन है?”
“हमीं तो चलातो हैं-”
“मतलब? तुम्हारे साथ और कोई नहीं?”
“नहीं,” उसकी बेचैनी बढ़ते देख करमुझे ठिठोली सूझती है|

“यह कैसे हो सकता है?” अपनी खीझ वह दबा नहीं पा रही, “मुझे तो लगता है, इधर जब भी मेरी नज़र पड़ी है मुझे तुम अकेले तो कभी दिखाई नहीं ही दिए हो.....”

“वे सब हमारे ग्राहक होते हैं,” उसे खिजाने में मुझे मज़ा आ रहा है|
“और उनमें से कोई तुम्हें धोखा नहीं दे जाता? ज़ोर-ज़बरदस्ती या चकमे से सामान उठा नहीं ले जाता?”
“नाहीं.....कभी नाहीं.....”

“ज़रूर तुम झूठ बोल रही हो| अच्छा, यहबताओ, तुम्हारी माँ कहाँ है? पिता कहाँ है?”

“हमारा बाप हमें छोड़ भागा है, यकायक बप्पा और उसका रिक्शा मेरी आँखों के सामने चला आता है| रिक्शे में बप्पा की नयी घरवाली और दूसरे बच्चे बैठे हैं|

“ओह|” उसकी तेज़ आवाज़ मंदपड़ रही है,” और तुम्हारी माँ?”
“माँ है, “मैं अब रोआंसी हो चली हूँ,” माँ ही अब सब कुछ है.....”
“ओह!” वह और नरम पड़ जाती है|
“आज बाजा नहीं बज रहा?” छुटकू मौके का फायदा उठाता है|
“बाजा?”
“हाँ, बाजा| आप का बाजा|”
“बाजा? ओह, बाजा| बाजा सुनने के मेरे पति शौक़ीन हैं, मैं नहीं.....”

“लेकिन आप शौक़ीन नहीं तो फिर आप इतना बजाती क्यों हो?”

“मैं कहाँ बजाती हूँ? वही बजाते हैं-” फिर खट से पलट कर पूछती है,- “अच्छा एक बात बताओ| बाजा जभी बजता है जिस समय मैं घर पर नहीं रहती? मेरे पीछे क्या  वे बिल्कुल नहीं बजाते?”

“नाहीं| बिल्कुल नाहीं,” छुटकू हँस पड़ता है “आप इधर होती हैं, बाजा जभी बजता है.....”

“ओह|” “उसकी ऐंठ, उसकी ठसक गायब हो रही है|”
“अच्छा, आप हमें बतइयो,” मेरीज़ुबान से मेरे सवाल टपक रहे हैं, “आप के बाबू का एक पैर नकली हैका? एक गुर्दा मांगे का है का? दिल में मशीन फिट है का? तीन दांत सोने के हैं का?”
“मैं नहीं जानती,” वह ठिरा गयी है|

सिगरेट के पैसे दिए बिना ही अपने घर की दिशा में लपक ली है|
“फकड़ी है वह बाबू?” छुटकू से कम, अपने से ज्यादा पूछती हूँ, उस का पैर एक नकली नाहीं?”

“फकड़ीतो वह है ही,” छुटकू कहता है, तू यह सोच उस का नकली पैर अगर तीस साल पुराना है तो फिर उस के दूसरे के बराबर कैसे है?”

तीसरे दिन, दोपहर के समय बाबू हमें गली में दिखाई देता है|
ज़रूर वह लोकल से सड़क पर ही उतर लिया होगा|
इस बार उसके दोनों हाथ भरे हैं| पहले वाले छोटे बक्से के इलावा एक झोला भी पकड़े हैं|
सीधे वह हमारी गुमटी में आया है|

“सिगरेट है?” खरीदारी उसकी ऐसे ही शुरू हुआ करती है|

“अभी तो उधार भी है,” मेरा गुस्सा छलका जा रहा है| क्यों छकाए रहा यह मुझे?

“उसी उधार में यह डिबिया भी जोड़ लेना,” अपना झोला वह हमारी गुमटी में टिका रहा है, “इसे उधर अन्दर अभी नहीं ले जाऊँगा| बाद में यहीं से उठा लूँगा.....”
“इसमें क्या है?” छुटकू पूछता है|

“मेरे महीने का राशन.....”

“बबुआइन यहाँ आयी थी,” उसका कूट खोलने की मुझे बेचैनी है|

“मेरीसिगरेटका नामे खाता बंद कराने? मेरी हर ख़ुशी की तान तोड़ना उसे बहुत ज़रूरी लगता है|”
“उसने बताया आप के पास कोई कम्प्यूटर नहीं है,” अटकल पच्चू में तीर छोड़ती हूँ|

“यह नहीं बताया, अपनी नौकरी मैंने छोड़ी नहीं थी, मेरी नौकरी ने मुझे छोड़ा था| मेरे साथ और भी कितने लोगों की नौकरियाँगयी थीं| जिसटी.वी. कम्पनी में हम काम करते थे, वहीबंद कर दी गयी थी| हमारे काम में थोड़े न कोई कमी थी| बल्कि मुझे तो अपने काम में ऐसा कमाल हासिल था कि कंपनी की जिस भी टी.वी. मेंकैसी भी खराबी क्यों न होती, मैं फ़ौरन जान जाता था और सही भी कर देता था|  कम्पनी के एम.डी. कम्पनी के चेयरमैन सभी अफसर मुझे मेरे नाम से जानते थे| टी.वी. में कोई भी शिकायत होती, मेरे ही नाम की डिमांड आती, लालता प्रसादही को भेजना, वह अच्छा कारीगर है.....”

“बबुआइन ने बताया, बाजा आप बजाते हो, आप सुनते हो, छुटकू ने बाजे की कमी बहुत महसूस की है, पिछले पूरे दो दिन पूरा सन्नाटा रहा है| बाजा एकदम बज ही नहीं रहा|”

बजा -बजंतर



“बजेगा| बाजा अब बजेगा| भलामानुस हूँ इसलिए बाजा ही बजाता हूँ| कोई दूसरा होता तो उस औरत की कुड-कुड बंदकरनेके वास्ते उस की गरदन मरोड़ देता| ऐसी बेरहम औरत है, जब से मेरी नौकरी गयी है उसकी कुड-कुड ऐसीशुरू हुई हैकि बस एकदम बरदाश्त के बाहर है.....”

बाबू के जाने के बाद हम झोला खोलते हैं| झोले में शराब की कई बोतलें हैं|
बाजा बज रहा है|

लेकिन अब बाजा पकड़ने की बजाए मेरे कान बंद दरवाजे के पीछे की कुड-कुड आवाज़ पकड़ना चाहते हैं|

दीपक शर्मा 

लेखिका



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दीपक शर्मा जी का परिचय -

जन्म -३० नवंबर १९४६

संप्रति –लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज के अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर पद से सेवा निवृत्त

सशक्त कथाकार दीपक शर्मा जी सहित्य जगत में अपनी विशेष पहचान बना चुकी हैं | उन की पैनी नज़र समाज की विभिन्न गतिविधियों का एक्स रे करती है और जब उन्हें पन्नों पर उतारती हैं तो शब्द चित्र उकेर देती है | पाठक को लगता ही नहीं कि वो कहानी पढ़ रहा है बल्कि उसे लगता है कि वो  उस परिवेश में शामिल है जहाँ घटनाएं घट रहीं है | एक टीस सी उभरती है मन में | यही तो है सार्थक लेखन जो पाठक को कुछ सोचने पर विवश कर दे |

दीपक शर्मा जी की सैंकड़ों कहानियाँ विभिन्न पत्र –पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं जिन्हें इन कथा संग्रहों में संकलित किया गया है |


प्रकाशन : सोलहकथा-संग्रह :

१.    हिंसाभास (१९९३) किताब-घर, दिल्ली
२.    दुर्ग-भेद (१९९४) किताब-घर, दिल्ली
३.    रण-मार्ग (१९९६) किताब-घर, दिल्ली
४.    आपद-धर्म (२००१) किताब-घर, दिल्ली
५.    रथ-क्षोभ (२००६) किताब-घर, दिल्ली
६.    तल-घर (२०११) किताब-घर, दिल्ली
७.    परख-काल (१९९४) सामयिक प्रकाशन, दिल्ली
८.    उत्तर-जीवी (१९९७) सामयिक प्रकाशन, दिल्ली
९.    घोड़ा एक पैर (२००९) ज्ञानपीठ प्रकाशन, दिल्ली
१०.           बवंडर (१९९५) सत्येन्द्र प्रकाशन, इलाहाबाद
११.           दूसरे दौर में (२००८) अनामिका प्रकाशन, इलाहाबाद
१२.           लचीले फ़ीते (२०१०) शिल्पायन, दिल्ली
१३.           आतिशी शीशा (२०००) आत्माराम एंड सन्ज़, दिल्ली
१४.           चाबुक सवार (२००३) आत्माराम एंड सन्ज़, दिल्ली
१५.           अनचीता (२०१२) मेधा बुक्स, दिल्ली
१६.           ऊँची बोली (२०१५) साहित्य भंडार, इलाहाबाद
१७.           बाँकी(साहित्य भारती, इलाहाबादद्वारा शीघ्र प्रकाश्य)


ईमेल- dpksh691946@gmail.com




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