October 2018
                                   
हैलोवीन -हँसता खिलखिलाता भूतिया  त्यौहार



 भूतिया  त्यौहार वो भी हँसता खिलखिलाता , जरूर आप भी  हैरत में पड़ गए होंगे | जब मैंने  भी हैलोवीन के बारे में पहली बार जाना तो मुझे भी कुछ ऐसा ही लगा | दरअसल पश्चिमी देशों में इसाई समुदाय द्वारा मनाया जाने वाला ये त्यौहार ही ऐसा है जहाँ लोग भूत बन कर  एक दूसरे को डराते  हैं और बदले में उन्हें मिलते हैं गिफ्ट | अब हमारे देश में होली में भी तो यही होता है , पहले रंग फेंकते हैं फिर गले मिल कर सारे गिले शिकवे भूल जाते हैं | तो आइये आज जानते हैं हैलोवीन के बारे में ...

हैलोवीन -हँसता खिलखिलाता भूतिया  त्यौहार


                         हैलोवीन के कई नाम है जैसे ...आल हेलोस इवनिंग , आल हेलोस ईव और आल सेंटर्स ईव |हैलोवीन को सेल्टिक कैलेंडर का आखिरी दिन भी होता है इसलिए सेल्टिक लोग इसे नए वर्ष के रूपमें भी मनाते हैं | पहले इसे सेल्ट्स लोग ही मनाते थे पर जैसे -जैसे ये लोग इंग्लैंड , स्कॉटलैंड अमेरिका में रहने लगे ये वहां भी ये त्यौहार मनाने लगे , जिससे वहां के निवासी भी इससे परिचित हुए | इस त्यौहार के रोमांच व् विनोदप्रियता को देखते हुए जल्दी ही और लोगों ने इसे अपना लिया | आज ये यूरोप और अमेरिका का प्रमुख त्यौहार बन गया है | आप ने भी अभी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रूप द्वारा हैलोवीन की शुभकामनाएं देने वाले सन्देश जरूर पढ़े होंगे |


कब मनाते हैं हैलोवीन


                         हैलोवीन का त्यौहार अक्टूबर महीने के आखिरी दिन मनाया जाता है | इस साल भी ये त्यौहार ३१ अक्टूबर को मनाया जायेगा |

क्यों मनाया जाता है हैलोवीन


                                 मुख्य रूप से हैलोवीन किसानों का त्यौहार है |  ये फसल पकने का समय है | इस समय किसानों को डर रहता है कि भूत -प्रेत आकर कहीं उनकी फसल को नष्ट ना कर दें , इसलिए वो स्वयं भूत -प्रेत बन कर उन्हें डराते का प्रयास करते हैं | इस पूरी तैयारी में बड़ा ही रोमांचक माहौल बन जाता है |

हैलोवीन का इतिहास


                        अगर इतिहास को खंगालें तो लगभग २००० साल पहले सेल्टिक त्यौहार आल सेंट्स डे एक नवम्बर को मनाया जाता है | इतिहास के अनुसार  गेलिक परम्परायों को मानने वाले  लोग जो सैम्हें का त्यौहार मनाते थे वो भी कुछ ऐसा ही होता था | वो लोग इसे ठण्ड की शुरुआत का पहला दिन मानते थे | उनके अनुसार ये ऐसा दिन था जिस दिन प्रेत आत्माएं धरती पर आती हैं और धरती वासियों के लिए बहुत मुश्किल खड़ी  करती हैं | इन्बुरी आत्माओं को डरा कर भगाने के लिए लोग राक्षसों जैसे कपडे पहनते हैं , जगह -जगह अलाव जलाते हैं व् एक दूसरे पर हड्डी आदि फेंक देते हैं |

                      इसी धर्म के आने के बाद ईसाईयों द्वारा आल सेंट्स डे से एक रात पहले आल हैलोवीम ईव मनाई जाती थी | कालांतर में ये दोनों त्यौहार एक हो गए और हैलोवीन का त्यौहार अपने आधुनिक रूप में अस्तित्व में आया |

कैसे मानते हैं हैलोवीन


पारंपरिक रूप से हैलोवीन मनाने के  लिए इन चार तरीकों का समावेश होता है |


ट्रिक और ट्रीटिंग
जैक ओ लेंटर्न बना कर
विविध वेश भूषा व् खेल
पारंपरिक व्यंजन


ट्रिक और ट्रीटिंग


              ये हैलोवीन का सबसे पुराना व मुख्य भाग है |इसमें लोग डरावने कपड़े पहनते हैं और घर -घर जा कर कैंडी बांटते हैं | इसमें बच्चे कद्दू के आकर के बैग लेकर घर -घर जाते हैं और दरवाजा खटखटा कर कहते हैं ट्रिक और ट्रीट | घर के लोग उन्हें तरह -तरह से डराते हैं और अंत में उन्हें उपहार देते हैं |

जैक ओ लेंटर्न बना कर


       पुरानी परम्पराओं के अनुसार इस दिन लोग जैक ओ लेंटर्न बना कर उसे ले कर चलते हैं | इसमें एक खोखले कद्दू में आँख , नाक ,मुँह बनाते हैं फिर उसके अन्दर एक मोमबती रखते हैं | इस समय वो अपना चेहरा डरावना बना लेते हैं | बाद में इस कद्दू को दफना दिया जाता है |

विविध वेश भूषा व् खेल


         जैसा की पहले बता चुके हैं कि इस त्यौहार की वेशभूषा डरावनी होती है | लोग भूत , पिसाच , चुड़ैल आदि की तरह कपडे पहनते हैं और तैयार होते हैं | इस दिन कई तरह के खेल खेले जाते हैं जिसमें एप्पल बोबिंग प्रमुख है | इसमें एक बड़े से तब में पानी भर कर एप्पल को तैराते हैं और लोगों को उन्हें मुँह से उठाना होता है |इसी तरह से एक खेल भविष्यवाणी करने का होता है | इसमें लोग सेब के छिलके को किसी साथी के कंधे से टॉस कर के जमीन पर फेंकते हैं , चिल्का जिस आकर में गिरता है वही उसके भविष्य के साथी का नाम का पहला अक्षर होता है, ऐसा माना जाता है | इसी तरह से कुवारी लडकियां एक खेल खेलती हैं जिसमें मान्यता है की अँधेरे कमरे में आईने के सामने टकटकी लगाकर देर तक बैठने से होने वाले जीवनसाथी की आकृति दिखाई दे जाती है |

 पारंपरिक व्यंजन


     अलग -अलग देश में हैलोवीन के अलग -अलग पारंपरिक व्ययंजन होते हैं | मुख्य रूप से कद्दू के आकर के केक , पुडिंग , पॉपकॉर्न , कद्दू के भुने बीज , आत्माओं की आकृतियों वाले केक होते हैं | देशों के हिसाब से पारंपरिक भोजन निम्न हैं ...

आयर लैंड ---बर्म ब्रेक , कैरमल कॉर्न

ग्रेट ब्रिटेन ....बौन्फायर टॉफी
उत्तरी अमेरिका.... कैंडी कद्दू , कैंडी एप्पल

स्कॉटलैंड .....मंकी नट्स 


                          विशेषतौर पर आजकल हैलोवीन एक फन दिवस  के तौर पर मनाया जाता है | लोग छुट्टी को पूरी तरह से एन्जॉय करते हैं | ग्लोबल विलेज के दौर में क्या पता कुछ समय बाद ये त्यौहार हमारे देश में भि९इ मनाया जाने लगे | 

आप सभी को हैलोवीन की शुभकामनाएं | 

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क्या आपने अपने mind का user manual ठीक से पढ़ा है ?


जब भी आप कोई गेजेट खरीदते  हैं तो उसका यूजर मैन्युअल जरूरार पढ़ते हैं | आखिर उसी में सारे दिशा निर्देश होते हैं उस को चलाने के लिए | ऐसा ही एक कमल का गेजेट है हमारा mind यानि की दिमाग या फिर थोडा और विस्तार में जाएँ तो मन | जो हमारा हो कर भी हमारा नहीं है | पलक झपकते ही यहाँ पलक झपकते ही वहाँ |हमें ये तो पता है कि शरीर को स्वस्थ रखने के लिए क्या क्या खाना चाहिए पर क्या हमने कभी अपने दिमाग का यूजर मैनुअल पढ़ा है ? पढ़िए और इसे सही से इस्तेमाल करना सीखिए ... देखिएगा आप कितने शांत व् प्रसन्न रहेंगे |


जानिये  अपने mind के  user manual के बारे में 



क्या आप ठीक हैं ?
हाँ ठीक तो हूँ , पर वो चार साल पहले की बात जब -तब याद आ जाती है तो मन से निकलती ही नहीं , कभी -कभी लगता है जैसे जीवन ही व्यर्थ है ... जब तक उस बात का ठीक ना कर लूँ तब तक दिमाग से निकलना मुश्किल है |

और आप ?
अजी क्या बताये , ये प्रश्न  मत पूछिए जब तक कार न आ जाये /मकान  न खड़ा हो जाए , बेटे की शादी ना हो जाए /बेटे की नौकरी ना लग जाए तब तक क्या खाक ठीक हैं ?

                                        हममे  से अधिकतर लोग अतीत की यादों या भविष्य की चिंता से जूझ रहे होते हैं | जबकि जीवन केवल इस पल है | दरअसल हमारा दिमाग तीन काल में चलता है भूत काल , वर्तमान काल और भविष्य काल | आप किसी ज्योतिषी के पास जाए तो वह आपके past या future के बारे में बताता है ... ऐसे लोगों को त्रिकाल दर्शी भी कहते हैं |

पर यहाँ हम बात कर रहे अपने mind की जो तीन स्तरों पर चलता है स्मृति , कल्पना और ये पल , यानि की memory, imagination और वर्तमान समय | अधिकतर लोगों को मेमोरी या इमेजिनेशन के कारण दुःख होता है | वर्तमान समय में उन्हें कोई खास दुःख नहीं होता फिर भी वो या तो पिछला या अगला सोच -सोच कर परेशां होते रहते हैं |

अतीत से छुटकारा 



मान लीजिये कि किसी के साथ कोई बहुत बड़ा हादसा हो गया वो उससे नहीं निकल पा रहा है ... तब तो कुछ हद तक बात समझ में आती है पर ज्यादातर लोग छोटे बड़े हादसों , बातों , किसी की गलती के बारे में इतना सोचते हैं कि वो वर्तमान समय का आनन्द उठा ही नहीं पाते |

आप जिसे महान जीवन समझते हैं वो पृथ्वी की नज़र में बस एक उपजाऊ मिटटी है जिसे एक फसल के बाद फिर से रौंद कर दूसरी फसल उगानी है ... सद्गुरु जग्गी वाशुदेव 

                                        जो घटना घट चुकी है अब उसका कोई अस्तित्व नहीं है वो केवल अतीत में थी | लेकिन हम उसे अपनी स्मृति में जिन्दा रखते हैं और उसी दुःख को जिसे एक बार भोग कर हम निकल आये थे बार -बार भोगते हैं | कितने लोग हैं जो अच्छी स्मृतियों को बार -बार दोहराते हैं और अगर दोहराते भी हैं तो एक कसक के साथ कि अब वो समय नहीं रहा |

जब आप कहते हैं कि मैं उसको माफ़ नहीं कर सकता मतलब आप उस व्यक्ति से सम्बंधित स्मृतियों को नहीं भुला पा रहे हैं , और खुद को बार -बार दंड दे रहे हैं |


भविष्य की चिंता से मुक्त 


                                 एक कहावत है सामान सौ बरस का ... खबर पल की नहीं |

जो हम आज हैं वो हमारे अतीत में किये गए कामों और फैसलों की वजह से हैं जो हम कल होंगे वो आज किये गए कामों और फैसलों की वजह से होंगे | बेहतर है कि हम सही काम आज करें न कि भविष्य की चिंता | हमारे सोचते रहने से कुछ होने वाला नहीं है |

 मेमोरी या इमेजिनेशन क्या है ... माइंड के एप्रेटस में आने वाले विचार ही तो हैं -संदीप महेश्वरी 



ऐसा नहीं हो सकता कि विचार ना आयें पर उन पर चिंतन ना करे ये आपके हाथ में है | इसके लिए जरूरी है कि आप इस प्रक्रिया को समझें | विचारों के बनने की प्रक्रिया को समझें , विचारों के बहुगुणित होने की प्रक्रिया को समझे | वर्तमान के जीवन को समझे ... समझे कि केवल वर्तमान ही हमारे हाथ में हैं .... जहाँ हम कुछ कर सकते हैं बाकि दुःख सब विचार रूप में हैं |


जिस दिन हम अपने mind का user manual समझ जायेंगे ... उस दिन से ही हम चिंता मुक्त ,सुखी जीवन जी पायेंगे |

नीलम गुप्ता

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लघु कथा -मतलब



सुनो , "ये करवाचौथ के क्या ढकोसले पाल रखे हैं तुमने ?"

कहीं व्रत रखने से भी कभी किसी की उम्र बढ़ी है ?
रहोगी तुम गंवार ही , आज जमाना कहाँ से कहाँ पहुँच गया है , और तुम वही पुराने ज़माने की औरतों की तरह ....इतनी हिम्मत तो होनी चाहिए ना कि परम्परा तोड़ सको |"

हर साल तुम्हें समझाता हूँ पर तुम्हारे कानों पर जूं  भी नहीं रेंगती |

हर साल करवाचौथ पर गुस्सा करवा -करवा कर तुम मेरी उम्र घटवाती हो , देखना एक दिन मैं  यूँही चीखते -चिल्लाते  चला जाऊँगा भगवान् के घर ....फिर रह जायेंगे तुम्हारे सारे ताम -झाम , नहीं मानेगा करवाचौथ इस घर में |

हर बार की तरह दीनानाथ जी के कटु वचनों से मंजुला घायल हो गयी | आँसू पोछते हुए बोली , " भगवान् के लिए आज के दिन शुभ -शुभ बोलो ,मेरी सारी  पूजा लग जाए,तुम्हारी उम्र  चाँद सितारों जितनी हो | माना की तुम्हें परम्परा में विश्वास नहीं है पर मेरी इसमें आस्था है .... तुम कुछ भी कहो इस घर में करवाचौथ हमेशा ऐसे ही पूरे विधि विधान से मनेगा |"

ओह इस मूर्ख औरत को समझाना व्यर्थ है , जब मैं नहीं रहूँगा तो खुद ही अक्ल आ जायेगी | तब नहीं मनेगा इस घर में करवाचौथ |

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रात को चाँद अपने शबाब पर था | हर छत पर ब्याह्तायें सज धज कर अपने पति के साथ चलनी से चाँद का दीदार कर रहीं थीं |

दीनानाथ जी ने पीछे मुड़ कर अपनी छत पर नज़र डाली | ना वहां चलनी थी , ना दीपक , ना चाँद के इंतज़ार को उत्सुक आँखे |


चार साल हो गए मंजुला को तारों के पास गए हुए , तब से इस घर में करवाचौथ नहीं मना | हमेशा करवाचौथ को अपनी उम्र से जोड़कर देखने वाले दीनानाथ जी ने आंसूं पोछते हुए कहा ,"वापस आ जाओ मंजुला अब कभी  नहीं कहूँगा करवाचौथ ना मनाने को | नादान था मैं हर करवाचौथ को तुम्हारा दिल दुखाता रहा ...नहीं पता था कि इस घर में करवाचौथ ना मनने का मतलब ये भी हो सकता है |

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नीलम गुप्ता
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                                                 वारिस


                                             

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अदृश्य हमसफ़र -अव्यक्त प्रेम की प्रभावशाली कथा





"अदृश्य हमसफ़र " जैसा की नाम से ही प्रतीत होरहा है किये एक ऐसी प्रेम कहानी है जिसमें प्रेम अपने मौन रूप में है | जो हमसफ़र बन के साथ तो चलता है पर दिखाई नहीं देता | ये अव्यक्त प्रेम की एक ऐसी गाथा है जहाँ प्रेम में पूर्ण समर्पण के बाद भी पीड़ा ही पीड़ा है पर अगर ये पीड़ा ही किसी प्रेमी का अभीष्ट हो उसे इस पीड़ा में भी आनंद आता हो ...

अदृश्य हमसफ़र 



 यूँ तो प्रेम दुनिया का सबसे  खूबसूरत अहसास है , पर जब यह मौन रूप में होता है तो पीड़ा दायक भी होता है,  खासतौर से तब जब प्रेमी अपने प्रेम का इज़हार तब करें जब उसकी प्रेमिका 54 वर्ष की हो चुकी हो और वो खुद कैंसर से अपने जीवन की आखिरी जंग लड़ रहा हो |

वैसे ये कहानी एक प्रेम त्रिकोण है पर इसका मिजाज कुछ अलग हट के है | प्रेम की दुनिया ही अलग होती | प्रेम  में कल्पनाशीलता होती है और इस उपन्यास में भी उसी का सहारा लिया गया है |  कहानी  मुख्य रूप से तीन पात्रों के इर्द -गिर्द घूमती है ... अनुराग , ममता और देविका |

अनुराग -चाँद को क्या मालूम चाहता है उसे कोई चकोर 


 जहाँ अनुराग  एक प्रतिभाशाली ब्राह्मण बच्चा है जिसे छुटपन में ही ममता के पिता गाँव से अपने घर ले आते हैं ताकि उसकी पढ़ाई में बाधा न आये | अनुराग स्वाभिमानी है वह इसके बदले में घर के बच्चों को पढ़ा देता है व् घर के काम दौड़ -दौड़ कर कर देता है | धीरे -धीरे अनुराग सबका लाडला हो जाता है | घर की लाडली बिटिया ममता को यूँ अपना सिंघासन डोलता अच्छा नहीं लगता औ वह तरह -तरह की शरारतें कर के अनुराग का नाम लगा देती है ताकि बाबा उसे खुद ही वापस गाँव भेज दें | ये पढ़ते हुए मुझे " गीत गाता चल "फिल्म के लड़ते -झगड़ते सचिन सारिका याद आ रहे थे , पर उनकी तरह दोनों आपस में प्यार नहीं कर बैठते | यहाँ केवल एकतरफा प्यार है -अनुराग का ममता के प्रति |अनुराग ममता के प्रति पूर्णतया समर्पित है | ये उसके प्रेम की ही पराकाष्ठा  है कि ममता के प्रति इतना प्रेम होते हुए भी वो बाबा से ममता का हाथ नहीं माँगता ताकि ममता के नाम पर कोई कीचड़ न उछाले | ममता के मनोहर जी से विवाह के बाद वो उससे कभी का फैसला करता है , फिर भी  वो अदृश्य हमसफ़र की तरह हर पल ममता के साथ है उसके हर सुख में , हर दुःख में |


ममता -दिल -विल प्यार -व्यार मैं क्या जानू रे 


ममता अनुराग के प्रेम को समझ ही नहीं पाती वो बस इतना जानती है कि अनुराग उसके पलक झपकाने से पहले ही उसके हर काम को कर देता  है | ममता अनुराग को अनुराग दा कह कर संबोधित करती है , पर रिश्ते की उलझन को वो समझ नहीं पाती कि क्यों उसे हर पल अनुराग का इंतज़ार रहता है , क्यों उसकी आँखें हमेशा अनुराग दा को खोजती है , क्यों उसके बार -बार झगड़ने में भी एक अपनापन है | वो मनोहर जी की समर्पित पत्नी है , दो बच्चों की माँ है , दादी है , अपना व्यवसाय चलाती है पर अनुराग के प्रति  अपने प्रेम को समझ नहीं पाती है | शायद वो कभी भी ना समझ पाती अगर 54 साल की उम्र में देविका उसे ना  बताती | तब अचानक से वो एक चंचल अल्हड किशोरी से गंभीर प्रौढ़ा बन जाती है जो स्थितियों को संभालती है |

देविका -तुम्ही मेरे मंदिर .....तुम्ही देवता हो 


          अनुराग की पत्नी देविका एक ऐसी  पत्नी है जिसको समझना आसान नहीं है | ये जानते हुए भी कि अनुराग ममता के प्रति पूर्णतया समर्पित है उसके मन में जो भी प्रेम है वो सिर्फ और सिर्फ ममता के लिए है देविका उसकी पूजा करती है उसे हर हाल में अपने पति का साथ ही देना है | वो ना तो इस बात के लिए अपने पति से कभी झगडती है कि जब ममता ही आपके मन में थी तो आपने मुझसे विवाह क्यों किया ? या पत्नी को सिर्फ पति का साथ रहना ही नहीं उसका मन भी चाहिए होता है | उसे तो ममता से भी कोई जलन नहीं | शिकायत नहीं है ये तो समझ आता है पर जलन नहीं है ये समझना मुश्किल है | देविका वस्तुत : एक लार्जर दे न  लाइफ " करेक्टर है , जैसा सच में मिलना मुश्किल है |

अदृश्य हमसफ़र की खासियत 

                      ये अलग हट के प्रेम त्रिकोण इसलिए है , क्योंकि इसमें ममता प्रेम और उसके दर्द से बिल्कुल् भी  प्रभावित नहीं है | हाँ अनुराग दा के लिए उसके पास प्रश्न हैं जो उसके मन में गहरा घाव करे हुए हैं , उसे इंतज़ार है उस समय का जब अनुराग दा उसके प्रश्नों का उत्तर दें | परन्तु प्रेम की आंच में अनुराग और देविका जल रहे हैं | ममता के प्रयासों से अन्तत : ये जलन कुछ कम होती है पर अब अनुराग के पास ज्यादा उम्र नहीं है , इसलिए कहानी सुखांत होते हुए भी मन पर दर्द की एक लकीर खींच जाती है और मन पात्रों में उलझता है कि 'काश ये उलझन पहले ही सुलझ जाती | '


कहानी में जिस तरह से पात्रों को उठाया है वो बहुत  प्रभावशाली है | किसी भी नए लेखक के लिए किसी भी पात्र को भले ही वो काल्पनिक क्यों न हो विकसित करना कि उसका पूरा अक्स पाठक के सामने प्रस्तुत हो आसान नहीं है , विनय जी ने इसमें कोई चूक नहीं की है |

कहानी  में जहाँ -जहाँ दृश्यों को जोड़ा गया है वहाँ इतनी तरलता है कि पाठक को वो दृश्य जुड़े हुए नहीं लगते और वो आसानी से तादाम्य बना लेता है |

जैसी कि साहित्य का उद्देश्य होता है कि उसके माध्यम से कोई सार्थक सन्देश मिले | इस कहानी में भी कई कुरितियों  पर प्रहार किया है | जैसे विधवा को किसी शुभ काम में सम्मलित ना करने की कुरीति | परन्तु ये प्रहार इतना सौम्य है कि वो कहानी का हिस्सा ही लगता है ... कहानी में ठूँसा  हुआ प्रवचन नहीं |

पूरे उपन्यास की जो खास बात है ...वो है इसका प्रवाह | कहानी पानी की तरह फिसलती है , और पाठक उसमें बहता जाता है | अंत तक इसकी रोचकता बनी रहती है | कहीं भी पाठक को ऐसा नहीं लगता कि कोई दृश्य खींचा गया है | 144 पेज की कहानी पाठक एक , दो या ज्यादा से ज्यादा तीन सिटिंग में पढ़ लेता है | किसी भी नए लेखक के लिए ये गर्व का विषय है कि उसका पहला उपन्यास ही पाठक द्वारा अपने को पूरा पढवा ले |


चलते -चलते 



                                      आज प्रेम कहानियों में बहुत सारे प्रयोग हो रहे है | प्रेम एक भावना जरूर है पर उसका बहुत विस्तार है , क्योंकि प्रेम के साथ व्यक्ति का मनोविज्ञान जुड़ा है | उस तरीके से देखा जाए तो कहानी में नयापन नहीं है , हाँ  प्रस्तुतीकरण अच्छा और प्रभावशाली  है | कई जगह लगा कि लेखिका ने थोड़ी जल्दबाजी की है , मनोभावों के स्तर पर थोडा ठहराव से लिखा जाता तो कहानी में भावनाओं का सम्प्रेष्ण और अच्छे से हो पाता | इसमें कोई शक नहीं कि लार्जर देन लाइफ करेक्टर लोकप्रिय साहित्य की ओर ले जाते रहे हैं , निसंदेह ये उपन्यास भी लोगों द्वारा सराहा जाएगा |हालंकि समय की नब्ज कह रही है कि सिनेमा हो या साहित्य आज लोग उन पात्रों से ज्यादा जुड़ पा रहे हैं जो उनके आस -पास हो , एक आम इंसान  जो इंसानी बुराइयों और अच्छाइयों के साथ हो |


 लेखिका का ये पहला उपन्यास है इसलिए वो बधाई की पात्र हैं | पहले उपन्यास में उनका प्रवाह व  सम्प्रेष्ण देखते हुए भविष्य में उनसे  और बेहतर लेखन की उम्मीद है |


विनय पंवार जी को हार्दिक शुभकामनाएं

उपन्यास -अदृश्य हमसफ़र
पृष्ठ -144
कीमत -199 रूपये
प्रकाशक - कौटिल्य प्रकाशन



वंदना बाजपेयी


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करवाचौथ


पति -पत्नी के प्रेम का प्रतीक  करवाचौथ का व्रत सुहागिनें निर्जल रहा करती हैं और चंद्रमा पर जल का अर्घ्य चढ़ा कर ही जल ग्रहण करती हैं | समय के साथ करवाचौथ मानाने की प्रक्रिया में कुछ बदलाव भी आये पर मूल में प्रेम ही रहा | आज उसी प्रेम को चार काव्य अर्घ्य के रूप में समर्पित कर रहे हैं | 


करवा चौथ पर चार काव्य अर्घ्य 



१—
जोड़ियाँ 

कहते हैं 
बनती हैं जोड़ियाँ
ईश्वर के यहाँ 
आती तभी 
धरती पर 
पति-पत्नी के रूप में..!
ईश्वर के 
वरदान सदृश 
बंधे हैं जब
इस रिश्ते में 
तो आओ आज 
कुछ अनुबंध कर लें...!!
जैसे हैं 
बस वैसे ही 
अपना कर 
एक-दूजे को 
साथ चलते रहने का 
मन से प्रबंध कर लें....!!!
अपने “ मैं” को 
हम में मिला कर 
पूरक बनने का 
दृढ़ संबंध कर लें.....!!!!
पति-पत्नी के साथ ही 
आओ 
कुछ रंग
बचपन के 
कुछ दोस्ती के 
कुछ जाने से 
कुछ अनजाने से 
आँचल में भर कर
इस प्यारे से रिश्ते को 
और प्यारा कर लें.....!!!!!
———————————

२– 
करवाचौथ पर 
——————

मीत!
सुना तुमने..?

बन रहा 
इस बार 
विशेष संयोग 
सत्ताइस वर्षों बाद 
इस करवाचौथ पर....!

मिलेंगी जब 
अमृत सिद्धि 
और स्वार्थ सिद्धि 
देंगी विशेष फल
हर सुहागिन को....!!

लगता 
हर दिन ही 
मुझे करवाचौथ सा 
जब से 
मिले तुम 
मुझे मीत मेरे!

ये मेरा 
सजना-सँवरना
है सब कुछ तुम्हीं से 
राग-रंग 
जीवन के 
हैं सब तुम्हीं में....!!!

पूजा कर 
जब चाँद देखेंगे 
छत पर 
हम दोनों मिलकर 
माँगेंगे आशीष 
हम चंद्रमा से 
सदा यूँ ही 
पूजा कर 
निहारे उसे 
हर करवाचौथ पर.....!!!
———————————

३– 
सुनो चाँद!
—————

सुनो चाँद!
आज कुछ 
कहना चाहती हूँ तुमसे 
ये पर्व 
मेरे लिए 
उस निष्ठा 
और प्रेम का है 
जिसे 
जाना-समझा 
अपने माता-पिता को 
देख कर मैंने 
कि प्रेम और संबंध में 
कभी दिखावा नहीं होता 
होता है तो बस 
अनकहा प्रेम 
और विश्वास 
जो नहीं माँगता 
कभी कोई प्रमाण 
चाहत का......!

मैं 
तुम्हारे सम्मुख 
अपने चाँद के साथ 
कहती हूँ तुमसे..,

मुझे 
प्यारा है 
अपने मीत का 
अनकहे प्रेम-विश्वास का
शाश्वत उपहार 
अपने हर 
करवाचौथ पर....!!

तुम 
सुन रहे हो न 
चाँद........!!!
————————
४—
अटका है..!
—————

मेरी 
प्रियतमा!
कहना चाहता हूँ 
आज तुम्हें 
अपने हृदय की बात...,

सुनो!
आज भी 
मुझे याद है 
पहला करवाचौथ 
जब हम 
यात्रा के मध्य थे,
स्टेशन पर 
रेल से उतर कर 
चाँद को 
अर्ध्य दिया था तुमने...!

वो 
सादगी भरा 
मोहक रूप 
पहले करवाचौथ का 
आज भी 
मेरी आँखों में 
वैसा ही बसा है...!!

मेरा हृदय 
सच कहूँ तो 
आज भी वहीं 
करवाचौथ के 
चाँद के साथ 
तुम्हारी 
उसी भोली सी 
सादगी पर अटका 
स्टेशन पर 
अब भी वहीं खड़ा है....!!!

सुन 
रही हो न 
तुम मेरी प्रियतमा....!!!!
———————————
डा० भारती वर्मा बौड़ाई

लेखिका -डॉ. भारती वर्मा 'बौड़ाई'

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करवाचौथ -पति -पत्नी के बीच प्रेम की अभिव्यक्ति का विरोध क्यों ?




करवाचौथ आने वाला है , उसके आने की आहट के साथ ही व्हाट्स एप पर चुटकुलों की भरमार हो गयी है | अधिकतर चुटकुले उसे व्यक्ति , त्यौहार या वस्तु पर बनते हैं जो लोकप्रिय होता है | करवाचौथ आज बहुत लोकप्रिय है इसमें कोई शक नहीं है | यूँ तो भारतीय महिलाएं जितनी भी व्रत रखतीं हैं वो सारे पति और बच्चों के लिए ही होते हैं , जो मन्नत वाले व्रत होते हैं वो भी पति और बच्चों के लिए ही होते हैं |


फिर भी खास तौर से सुहाग के लिए रखे जाने वाले व्रतों में तीज व् करवाचौथ का व्रत है | दोनों ही व्रत कठिन माने जाते रहे हैं क्योकि ये निर्जल रखे जाते हैं | दोनों ही व्रतों में पूजा करते समय महिलाएं नए कपडे , जेवर आदि के साथ पूरी तरह श्रृंगार करती हैं ... सुहाग के व्रतों में सिंदूर , बिंदी , टीका , मेहँदी , महावर आदि का विशेष महत्व होता है , मान्यता है कि विवाह के बाद स्त्री को करने को मिलता है इसलिए सुहाग के व्रतों में इसका महत्व है | दोनों ही व्रतों में महिलायों की पूरी शाम रसोई में पूजा के लिए बनाये जाने वाले पकवान बनाने में बीतती रही है | जहाँ तक मुझे याद है ... करवाचौथ में तो नए कपड़े पहनने का भी विधान नहीं रहा है , हां कपडे साफ़ हों इतना ध्यान रखा जाता था |


करवाचौथ का आधुनिक करवाचौथ के रूप में अवतार फिल्मों के कारण हुआ | जब सलमान खान और ऐश्वर्या राय ने बड़े ही रोमांटिक तरीके से " चाँद छुपा बादल में " के साथ इसे मनाया तो युवा पीढ़ी की इस पर नज़र गयी | उसने इसमें रोमांस के तत्व ढूंढ लिए और देखते ही देखते करवाचौथ बेहद लोकप्रिय हो गया | पहले की महिलाओं के लिए जहाँ दिन भर प्यास संभालना मुश्किल था आज पति -पत्नी दोनों इसे उत्साह से कर रहे हैं | कारण साफ है ये प्रेम की अभिव्यक्ति का एक सुनहरा अवसर बन गया |


लोकप्रिय होते ही बुजुर्गों ( यहाँ उम्र से कोई लेना देना नहीं है ) की त्योरियां चढ़ गयी | पति -पत्नी के बीच प्यार ये कैसे संभव है ? और विरोध शुरू हो गया | करवाचौथी औरतों को निशाने पर लिया जाने लगा , उनका व्रत एक प्रेम का नाटक नज़र आने लगा | तरह तरह के चुटकुले बनने लगे |आज जो महिलाएं ४० वर्ष से ऊपर की हैं और वर्षों से इस व्रत को कर रहीं हैं उनका आहत होना स्वाभाविक है , वो इसके विषय में तर्क देती हैं | इन विरोधों और पक्ष के तर्कों से परे युवा पीढ़ी इसे पूरे जोश -खरोश के साथ मना रही है |

दरअसल युवा पीढ़ी हमारे भारतीय सामाज के उस पूर्वाग्रहों से दूर है जहाँ दाम्पत्य व् प्रेम दोनो को अलग -अलग माना जाता रहा है | ये सच है कि माता -पिता ही अपने बच्चों की शादी जोर -शोर से करते हैं फिर उन्हें ही बहु के साथ अपने बेटे के ज्यादा देर रहने पर आपत्ति होने लगती है | बहुत ही जल्दी 'श्रवण पूत' को 'जोरू के गुलाम' की उपाधि मिल जाती है | मेरी बड़ी बुआ किस्सा सुनाया करती थी कि विवाह के दो -चार महीने बाद उन्होंने फूफाजी के मांगने पर अपने हाथ से पानी दे दिया था तो घर की औरतें बातें -बनाने लगीं , " देखो , कैसे है अपने पति को अपने हाथ से पानी दे दिया | " उस समाज में ये स्वीकार नहीं था कि पत्नी अपने पति को सबके सामने अपने हाथ से पानी दे , अलबत्ता आधी रात को पति के कमरे में जाने और उजेला होने से पहले लौटने की स्वतंत्रता उसे थी |


ऐसा ही एक किस्सा श्रीमती मिश्रा सुनाती हैं | वो बताती हैं कि जब वो छोटी थीं तो उनकी एक रिश्तेदार ( रिश्ते के दादी -बाबा) पति -पत्नी आये जिनकी उम्र ७० वर्ष से ऊपर थी | पहले जब भी वो आते तो दादी उसके कमरे में व् बाबा बैठक में सोते थे | उस बार उसकी वार्षिक परीक्षा थीं , उसे देर रात तक पढना था तो दादी का बिस्तर भी बैठक में लगा दिया |


दादी जैसे ही बैठक में सोने गयीं उलटे पाँव वापस आ कर बोली , " अरे बिटिया ये का करा , उनके संग थोड़ी न सोइए |" उसने दादी की शंका का समाधान करते हुए कहा , " दादी कमरा वही है पर बेड अलग हैं , यहाँ लाइट जलेगी , मुझे पढना है |" दादी किसी नयी नवेली दुल्हन की तरह लजाते हुए बोली , ना रे ना बिटिया , तुम्हरे बाबा के साथ ना सोइए , हमका तो लाज आवत है , तुम लाइट जलाय के पढो , हम का का है , मुँह को तनिक पल्ला डारि के सो जैहेये |" श्रीमती मिश्रा आज भी जब ये किस्सा सुनाती हैं तो उनका हँसते बुरा हाल हो जाता है , वह साथ में बताना नहीं भूलती कि दादी बाबा की ९ संताने हैं फिर भी वोप्रेम को सहजता से स्वीकार नहीं करते और ऐसे नाटकीय दिखावे करते हैं |


कारण स्पष्ट है उस समय पति -पत्नी का रिश्ता कर्तव्य का रिश्ता माना जाता था , उनके बीच प्रेम भी होता है इसे सहजता से स्वीकार नहीं किया जाता था | औरते घर के काम करें , व्रत उपवास करें ... पर प्रेम चाहे वो पति से ही क्यों न हो उसकी अभिव्यक्ति वर्जित थी | यही वो दौर था जब साहब बीबी और गुलाम टाइप की फिल्में बनती थीं ... जहाँ घरवाली के होते भी बाहर वाली का आकर्षण बना रहता था | पत्नी और प्रेमिका में स्पष्ट विभाजन था |



आज पत्नी और प्रेमिका की विभाजक रेखा ध्वस्त हो गयी है | इसका कारण जीवन शैली में बदलाव भी है | आज तेजी से भागती -दौड़ती जिन्दगी में पति पत्नी के पास एक दूसरे को देने का पर्याप्त वक्त नहीं होता , वही इन्टरनेट ने उनके पास एक दूसरे को धोखा देने का साधन भी बस एक क्लिक दूर कर दिया है | ऐसे में युवा पीढ़ी प्रेम के इज़हार के किसी अवसर को खोना नहीं चाहती है | करवाचौथ परंपरा व् अभिव्यक्ति के एक फ्यूजन के तौर पर आया और उन्होंने झपट कर उसे अपना लिया |

यहाँ ध्यान देने की बात है कि अभी भी ये व्रत निर्जल ही रहा जाता है और पूजा का भी वही विधान है | पुराने जोड़े इस त्यौहार को अभी वैसे ही मना रहे हैं |बस नए जोड़े इसमें गिफ्ट का आदान -प्रदान व् रात को पूजा के बाद होटल में डिनर भी जोड़ देते हैं | देखा जाए तो भाई -बहन के बीच रक्षा बंधन में भी गिफ्ट का आदान -प्रदान होता है उस पर उंगुली नहीं उठती | जबकि पति -पत्नी के बीच कई अवसरों पर गिफ्ट का आदान होता ही रहता है , इसमें भी अगर वो अपनी ख़ुशी से देते लेते हैं तो हर्ज ही क्या है ? जरूर दें ही ऐसा कोई रिवाज भी नहीं है |

करवाचौथ पति -पत्नी के बीच प्रेम की अभिव्यक्ति का त्यौहार है और नयी पीढ़ी इस परंपरा को विशुद्ध धर्मिक रूप देने के स्थान पर थोडा अपने तरीके से मना रही है तो इसमें हर्ज ही क्या है |आखिर ये त्यौहार दाम्पत्य प्रेम को सुरक्षित रखने के लिए ही तो बनाया गया है | ख़ुशी की बात ये हैं कि आज की पीढ़ी भी लिव इन के इस दौर में दाम्पत्य प्रेम को बरक़रार रखना चाहती है |


अगर आप भी पति -पत्नी के बीच प्रेम की इस अभिव्यक्ति का विरोध कर रहे तो जरा स्वयं से ही प्रश्न करिए ... आखिर इसमें गलत क्या है ? हम भी तो यही चाहते हैं की हमारी परंपरा बनी रहे | करवाचौथ भले ही निशाने पर हो पर ऐसा कौन सा त्यौहार बचा है जो आज भी बिलकुल पुराने तरीके से मनाया जाता है | रात , चलनी और चाँद की परम्परा के साथ दाम्पत्य प्रेम की इस आधुनिक अभिव्यक्ति इसे और खूबसूरत बना रही है और ग्राह्य भी |

वंदना बाजपेयी


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सोहम या सोsहं ध्यान साधना

आज के तनाव युक्त जीवन में हम बहुत कम आयु में ही तमाम मनोशारीरिक रोगों का शिकार हो रहे हैं | एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ तनाव , जीवनशैली में बदलाव आदि इसके कारण हैं |  ऐसे में जरूरी है कि शुरू से ही इस ओर ध्यान दिया जाए | ध्यान या मेडिटेशन के द्वारा हम अपने मनोभावों को नियंत्रित कर सकते हैं व् तनाव रहित बेहतर जिन्दगी जी सकते हैं | सोहम या सोsहं  साधना ध्यान की एक ऐसी ही विधि है |

सोहम या सोऽहं ध्यान साधना 


                                        जब हम प्राण शब्द का इस्तेमाल करते हैं तो हमारा सबसे पहले ध्यान साँसों पर जाता है | सांस अन्दर लेने और बाहर निकालने की प्रक्रिया ही जीवन है | सांस लेना छोड़ते ही व्यक्ति मृत हो जाता है | जीवन जीने के लिए साँसों का बहुत महत्व है और इन्हीं साँसों का इस्तेमाल हम सोहम या सोऽहं ध्यान साधना में करते हैं |


सबसे पहले तो हमें ये समझना होगा कि ध्यान का अर्थ है अपने को या अपनी असीमित उर्जा को पहचानना | जिस तरह से मानुष का बच्चा मनुष्य , घोड़े का बच्चा घोडा , गाय का बच्चा गाय ही होता है उसी तरह से परमात्मा जिसे हम परमपिता भी कहते हैं की संतान हमारी आत्मा भी बिलकुल उन्हीं की तरह है यानि परमात्मा की तरह ही हमारी आत्मा भी सर्वशक्तिमान है पर हम उसे पहचान नहीं पाते हैं क्योंकि हम अपनी शारीरिक पहचान में खोये रहते हैं | ध्यान के द्वारा हम अपनी असली पहचान को जान पाते हैं | हम जान पाते हैं कि हम सब अमर  व् असीमित उर्जा स्वरुप  परमात्मा हैं ...सोऽहं  जैसा वो वैसे ही हम |अगर विज्ञानं की भाषा में कहें तो ये कुछ breathing techniques हैं , जिसके द्वारा हम अपनी साँसों को नियंत्रित करते हैं |

कैसे करते हैं सोहम या सोऽहं ध्यान साधना 


                                        सोहम या सोऽहं ध्यान साधना  में अपनी साँसों पर ध्यान देना है | प्रकृति में हर चीज में एक ध्वनि है चाहें वो हमें सुनाई दे या ना दे | एक छोटे से इलेक्ट्रान और भूकंप की ध्वनि को भले ही हम ना सुन पाए पर हम सब जानते हैं कि उसका अस्तित्व है | कहते हैं कि ॐ एक ऐसे ध्वनि है जिस पर पूरा ब्रह्माण्ड कम्पन कर रहा है , इसे अंतर्नाद भी कहते हैं | हमारी सासों में भी एक ध्वनि है जो उसी ब्रह्मांडीय ध्वनि का एक रूप है | जब हम अपनी साँसों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं तो हमें महसूस होता है कि हम सां लेते समय सो अ अ अ अ की धवनि होती है अ अ अ की ध्वनि जब वायु का आदान प्रदान हमारे फेफड़े के कोशों के बीच में हो रहा हो तब होता है | वायु के निकलते समय हं कि ध्वनि होती है | जैसे जैसे ध्यान गहरा होता जाता है ये साफ़ -साफ़ सुनाई देने लगती है |

सोहम या सोऽहं  ध्यान साधना की विधि 


                               वैसे तो आप इसे किसी भी समय कर सकते हैं पर सूर्योदय का समय सबसे अच्छा रहता है ..
१ ) सूर्योदय के समय किसी खुले स्थान पर बैठ जाएँ |अगर पद्मासन में नहीं बैठ पा रहे हैं तो कुर्सी पर बैठ जाएँ और पैरों से क्रॉस बनाएं , हाथों की उँगलियों को आपस में फंसा कर रखें |  सुनिश्चित करें की आप एक आरामदायक अवस्था में बैठे हैं और आपका सारा शरीर मन , दिमाग सुकून में है , तभी आप् साँसों पर ध्यान केन्द्रित कर पाएंगे |
२)  अपनी रीढ़ की हड्डी सीढ़ी रखें | इससे पेल्विस, फेफड़े और सर एक सीढ़ी रेखा में आ जाते हैं और साँस निर्विघ्न व् दिमाग ज्यादा चेतन और रिलैक्स अवस्था में रहता है |
3) सांस अंदर लें और सो s s की ध्वनि पर ध्यान केन्द्रित करें |
4) सांस  थोड़ी देर रोकें |
5) सांस बाहर करते हुए हं कि ध्वनि पर ध्यान केन्द्रित करें |
6) सोहम या सोsहं मतलब जो तुम हो वाही हम हैं ... सांस लेते समय महसूस करें की सांस के साथ ईश्वर आपके अन्दर प्रवेश कर रहा है और जो निकल रहा है वो आप हैं ... दोनों में अंतर नहीं है , आप ही ईश्वर का रूप हैं |


सोहम या सोSहं ध्यान साधना के लाभ 

                                       सोहम ध्यान साधना मन मष्तिष्क और शरीर तीनों के लिए लाभप्रद है | आइये जानते हैं इसके विभिन्न लाभों के बारे में ...

आध्यात्मिक लाभ 


                   आज का जीवन तनाव युक्त जीवन है | सोहम ध्यान साधना मन व् विचारों को थामती है जिससे तनाव कम हो जाता है , गुस्सा कम आने लगता है व् मन शांत रहने लगता है | एक बार ब्रह्मकुमारी शिवानी ने अपने प्रवचन में कहा था कि आश्रम में आपका मन क्यों शांत रहता है ? लोगों का उत्तर था क्योंकि यहाँ तनाव पैदा करने वाले कारक नहीं होते | शिवानी जी ने कहा , नहीं यहाँ हम ध्यान द्वारा मन को संयमित करना करते हैं , तो कारक हावी नहीं हो पाते , बाहर जा कर करक हावी हो जाते हैं | इस कारण ध्यान जरूरी है चाहें आश्रम  में रहे या बाहर |

खून का सही प्रवाह 

                                 जिन लोगों को भी कमर या घुटने के दर्द की तकलीफ है उन्होंने महसूस किया होगा कि जब वो तनाव करते हैं तो दर्द बढ़ जाता है | दर्द बढ़ने का कारण मांस पेशियों में तनाव के कारण हुआ खिंचाव है | सोहम ध्यान विधि से  सांस पूरी और सही तरीके से जाती है , सुबह की खुली हवा में प्रयाप्त ओक्सिजन मिलती है , मन के रिलैक्स होते ही खून का प्रवाह सही होता है , मांस-पेशियों का तनाव भी कम होता है जिस कारण दर्द में आराम मिलता है | 

दिमाग व् शरीर के मध्य समन्वय 

                                     सोऽहं साधना से मन व् शरीर के बीच समन्वय स्थापित हो जाता है | ध्यान करते समय हम पूरे शरीर को रिलैक्स करते हैं जिस कारन मांस -पेशियाँ तनाव रहित हो जातीहैं | साँसों पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए मन को पूरी तरह से थामना होता है | 


मन को थामने के लिए शरीर व् मन के बीच में एक पुल स्थापित होना जरूरी होता है | यह पुल नर्व कोशिकाओं से स्थापित होता है | जैसे -जैसे हम ध्यान में आगे बढ़ते जाते हैं नर्वस सिस्टम बेहतर पुल बनाने लगता है | जिससे मन व् शरीर में एकात्म स्थापित हो जाता है | ऐसा भ्रम  होता है कि शरीर हैं ही नहीं | 

सद्गुरु जग्गी वशुदेव अपना अनुभव बताते हैं कि एक बार वो ध्यान में गए और जब उन्होंने आँखे खोलीं तो आस -पास भीड़ इकट्ठी हो गयी थी जबकि उन्हें लगा कि कुछ पल ही गुज़रे हैं , उन्होंने लोगों से पुछा तो पता चला कि १३दिन बीत गए हैं | यानि १३ दिन तक उन्हें अपने शरीर का भ्रम  तक नहीं हुआ | ऐसा केवल मन और शरीर के समन्वय से ही हो सकता है | इसमें शरीर को चलने के लियेंयुनतम उर्जा की आवश्यकता होती है |



आज लोग मोटापे से परेशान हैं क्योंकि वो मन की भूख मिटाने का प्रयास करते हैं जो कभी मिटती नहीं जबकि ध्यान करने वाले को ज्यादा भोजन की आवश्यकता ही नहीं होती |

किसी काम पर फोकस करने की क्षमता बढ़ना 

                                    
                                               आने देखा होगा कि कोई संगीतकार जब धुन बना रहा हो , कोई लेखक कुछ लिख रहा हो , कोई चित्रकार जब चित्र बना रहा हो या कोई वैज्ञानिक जब किसी सूत्र को पूरे मनोयोग से खोज रहा हो तो उसका अपने काम में फोकस इतना ज्यादा होता है कि उसे बाहर की कोई आवाज़ सुनाई ही नहीं देती | एक तरह से वो ध्यान की अवस्था में होता है | इसके विपरीत सोऽहं ध्यान में हम साँसों पर ध्यान लगा लार किसी काम पर फोकस ही सीखते हैं | एक ध्यान लगाने वाला व्यक्ति जिस भी काम को करेगा उसका फोकस काम पर ही केन्द्रित होगा | जीवन की छोटी बड़ी गुत्थियां जिनमें आम लोग उलझे रहते हैं उन्हें वो एकनिष्ठ फोकस के माध्यम से आसानी से सुलझा लेगा | एक निष्ठ फोकस सफलता का सूत्र भी है |

मानसिक  क्षमताओं का विकास 

                                 जब व्यक्ति ध्यान करता है तो मन शरीर में एकात्म स्थापित होने , फोकस होने पर उसे अपने प्रश्नों के उत्तर मिलने लगते हैं जैसे वो कौन है | हम् में से अधिकतर अपने शरीर की पहचान को ही अपनी पहचान मानते हैं | तमाम रिश्ते नाते , जान -पहचान के लोग आदि हमारे सुख -दुःख का कारण होते हैं | दूसरों द्वारा किया गलत व्यवहार हम भुला नहीं पाते और बार -बार उन्हीं बातों के चक्रव्यूह में घूम कर दुखी होते रहते हैं | ध्यान द्वारा अपनी वास्तविक पहचान जानने से सारे रिश्ते बस सहयात्री लगने लगते हैं | उनकी बातें अस्थिर लगने लगतीं हैं उन पर सोचना कम हो जाता है | इसके अतरिक्त हम किसी समस्या को भावुक हुए बिना गहराई से सोच कर किसी नतीजे पर आसानी से पहुँच सकते हैं |

खुशनुमा जिन्दगी की ओर 

                                 संसार में सब कुछ कम्पन शील है , स्थिर कुछ नहीं है जब हमारी साँसे और हमारी आत्मा के कम्पन के बीच तादाम स्थापित हो जाता है तो हामरी सोच का जीवन का स्वास्थ्य का आयाम बढ़ जाता है और हम एक स्वस्थ , सुखद जीवन की ओर बढ़ जाते हैं | 

                                                तो सोऽहं मंत्र द्वारा अपनी चेतना का विस्तार करिए और एक स्वस्थ व् सुखद जीवन को पाइए | 


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मूल्य



रद्दी वाले ने रख दिए
मेरे हाथ में 150 रुपये 
और पीछा करती रहीं मेरी भरी हुई आँखें 
और निष्प्राण सी देह 
उस रद्दी वाले का 
 वो बोरा  ले जाते हुए 
जब तक आँखों से ओझल नहीं हो गया 
इस बार की रद्दी मामूली नहीं थी पुराने अखबारों की बासी ख़बरों की तरह 
इस बार की रद्दी में किलो के भाव में बिक गया था मेरा स्वाभिमान 
जिसे विवाह में अपने साथ लायी थी 
इस रद्दी में कैद थी मेरी अनगिनत  जागी हुई राते 
जो गवाह थी मेरे अथक परिश्रम का 
वो सहेलियों के बीच एक एक -एक नंबर से आगे बढ़ने की होड़ 
वो टैक्सोनामी की किताबे 
जिसके पीले पड़े पन्नों में छोटे बड़े कितने चित्रों को बना कर 
पढ़ा था वर्गीकरण का इतिहास 
वो जेनेटिक्स की किताबें 
जो बदलना चाहती थीं आने वाली पीढ़ियों का भविष्य 
वो फोसिल्स की किताबे
जाते -जाते कह गयीं कि 
कि कुछ चीजों के अवशेष भी नहीं बचते 
इन्हीं हाँ इन्हीं किताबों में कैद था मेरा इंतज़ार 
कि बदल जाएगा कभी ना कभी वो वाक्य 
जो प्रथम मिलन पर तुमने कहा था 
हमारे घर की औरतें 
बाहर जा कर काम नहीं करतीं मर्दों की दुनिया में 
मैं नहीं तोड़ सकता तुम्हारे लिए परम्पराएं 
हमारे घर की औरतों की 
जो रसोई के धुएं में 
सुलगती रहतीं हैं धुँआ हो जाने तक 
कुंदन से पवित्र घर ऐसे ही तो बनते हैं


उसी दिन .... हां उसी दिन से शुरू हो गयी थी 
मेरी आग में ताप कर कुंदन बन जाने की प्रक्रिया 
इतिहास गवाह है भरी हुई आँखों व्  
हल्दी और नमक और आटे  से सने हाथों को अपने आंचल से पोछते हुए 
ना जाने कितनी बार दौड़ कर देख आती थी 
अपनी किताबों को 
सुरक्षित तो हैं ना 
हर साल दीवाली की सफाई में झाड -पोछ कर फिर से अलमारी में सजा देती अपने इंतज़ार को 
शायद इस इंतज़ार की नमीं ही 
मुझे रोकती रही 
रसोई के धुएं में धुँआ हो जाने से


पहले वो अक्सर सपनों में आती थीं
अपने दर्द की शिकायतें  कहने
नहीं लायीं थी तुम इन्हें सेल्फ में बंद करने को
तुम्हें संवारना था बच्चों का भविष्य
फिर क्यों कर रही हो हमारी बेकद्री
फिर धीरी -धीरे वो भी मौन हों गयीं
क्योंकि उन्होंने सुन लिए थे तुम्हारे ताने
चार किताबें पढ़ कर मत समझो अपने को अफलातून
आज भी तुम्हारी जगह रसोई में है
चूल्हे से देहरी तक
वहाँ  ही मनाओं  आज़ादी का जश्न
और मैं कैद में मनाती  रही नाप -तौलकर दी गयी आज़ादी का जश्न
मेरे साथ तुमने भी तो भोगा है परतंत्रता का दंश
अपराधी हूँ मैं तुम्हारी
इसीलिये देह की कारा  छोड़ने से पहले
कर दी तुम्हारी भी मुक्ति
ये १५० रुपये गवाह है कि कुछ तो समझीं कबाड़ी वाले ने
मेरे ज्ञान की कीमत
पर तुमने ....

वंदना बाजपेयी


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#Metoo से डरें नहीं साथ दें

#Metoo के रूप में समय अंगडाई ले रहा है | किसी को ना बताना , चुप रहना , आँसू पी लेना इसी में तुम्हारी और परिवार की इज्ज़त है | इज्ज़त की परिभाषा के पीछे औरतों के कितने आँसूं  कितने दर्द छिपे हैं इसे औरतें ही जानती हैं | आजिज़ आ गयी हैं वो दूसरों के गुनाहों की सजा झेलते -झेलते ,इसी लिए उन्होंने तय कर लिया है कि दूसरों के गुनाहों की सजा वो खुद को नहीं देंगी | कम से कम इसका नाम उजागर करके उन्हें मानसिक सुकून तो मिलेगा | 

#Metoo से डरें नहीं साथ दें 


#Metoo के बारे में उसे नहीं पता हैं , उसे नहीं पता है कि इस बारे में सोशल मीडिया पर कोई अभियान चलाया जा रहा है , उसे ये भी नहीं पता है कि स्त्रियों के कुछ अधिकार भी होते हैं , फिर भी उसके पास एक दर्द भरा किस्सा है कि आज घरों में सफाई -बर्तन करने आते हुए एक लड़के ने साइकिल से आते हुए तेजी से उसकी छाती को दबा दिया , एक मानसिक और शारीरिक पीड़ा से वो भर उठी | वो जानती है ऐसा पहली बार नहीं हुआ है तब उसने रास्ता बदल लिया था , उसके पास यही समाधान है कि अब फिर वो रास्ता बदल लें | उसे ये भी नहीं पता वो कितनी बार रास्ता बदलेगी?वो जानती है वो काम पर नहीं जायेगी तो चूल्हा कैसे जलेगा , वो जानती है कि माँ को बाताएगी तो वो उसी पर इलज़ाम लगा देंगीं ... काम पर फिर भी आना पड़ेगा | उसके पास अपनी सफाई का और इस घटना का कोई सबूत नहीं है ... वो आँखों में आँसूं भर कर जब बताती है तो बस उसकी इतनी ही इच्छा होती है कि कोई उसे सुन ले | 


लेकिन बहुत सी महिलाएं घर के अंदर, घर के बाहर सालों -साल इससे कहीं ज्यादा दर्द से गुजरीं हैं पर वो उस समय साहस नहीं कर पायीं , मामला नौकरी का था , परिवार का था रिश्तों का था , उस समय समाज की सोच और संकीर्ण थी , चुप रह गयीं , दर्द सह गयीं | आज हिम्मत कर रहीं हैं तो उन्हें सुनिए , भले ही आज सेलेब्रिटीज ही हिम्मत कर रहीं हैं पर सोचिये जिनके पास पैसा , पावर , पोजीशन सब कुछ था , मंच था वो सालों -साल सहती रहीं तो सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि आम महिला कितना कुछ सहती रही होगी | आज ये हिम्मत कर रहीं हैं तो उम्मीद की जा सकती है शायद कल को वो भी बोले ... कल को एक आम बहु बोले अपने ससुर के खिलाफ, एक बेटी बोले अपने पिता या भाई के खिलाफ .... समाज में ऐसा बहुत सा कलुष है जिसे हम कहानियों में पढ़ते हैं पर वो कहानियाँ जिन्दा पात्रों की ही होती हैं ना |

इस डर से कि कुछ मुट्ठी भर किस्से ऐसे भी होंगे जहाँ झूठे आरोप होंगे हम 98 % लोगों को अपनी पीड़ा के साथ तिल -तिल मरते तो नहीं देखना चाहेंगे ना | कितने क़ानून हैं , जिनका दुरप्रयोग हो रहा है , हम उसके खिलाफ आवाज़ उठा सकते हैं पर हम कानून विहीन निरंकुश समाज तो नहीं चाहते हैं | क्या पता कल को जब नाम जाहिर होने का भय व्याप्त हो जाए तो शोषित अपराध करने से पहले एक बार डरे |
इसलिए पूरे विश्वास और हमदर्दी के साथ उन्हें सुनिए ....जो आज अपने दर्द को कहने की हिम्मत कर पा रहे हैं
वो भले ही स्त्री हो , पुरुष हों , ट्रांस जेंडर हो या फिर एलियन ही क्यों न हो
उन्हें अपने दर्द को कहने की हिम्मत दीजिये |

एक पीड़ा मुक्त बेहतर समाज की सम्भावना के लिए हम इतना तो कर ही सकते हैं ... हैं ना ?

वंदना बाजपेयी

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