#metoo एक ऐसा अभियान है जिसमें औरतें अपनी चुप्पी तोड़ कर अपने ऊपर हुए यौन शोषण के खिलाफ बोल रहीं हैं |


#metoo-सोशल मीडिया पर दिशा से भटकता आन्दोलन


सबसे पहले तो आप सब से एक प्रार्थना जो भी अपना दर्द कह रहा है चाहे वो स्त्री हो , पुरुष हो , ट्रांस जेंडर हो या फिर एलियन ही क्यों ना हो उसे कहना का मौका दें , क्योंकि यौन शोषण एक ऐसा मुद्दा है जिस के ऊपर बोलने से पहले शोषित को बहुत हिम्मत जुटानी होती है |


अब जरा इस तरफ देखिये .....


#metoo आज से सालों पहले मेरी सास ननद ने मुझे दहेज़ का ताना दिया था |
स्कूल में मेरी सहेलियों ने मुझे धोखा दिया वो कहती थीं कि वो पढना नहीं चाहती ताकि मैं न पढूँ और वो चुपके से पढ़ लें और मुझसे आगे निकल जाए |जिस दिन मुझे उनकी इस शातिराना चाल का पता चला मैं अंदर से टूट गयीं |
मेरी अपनी ही बहने , भाभियाँ , सहेलियां मेरा लम्बा/नाटा , मोटा/पतला, पूरब/पश्चिम , उत्तर/ दक्षिण का होने की वजह से मुझे अपने ग्रुप से अलग करती रहीं और मेरा मजाक बनाती रहीं |
ऑफिस में साहित्य-जगत में महिलाओं ने अपने तिकड़मों द्वारा मेरे कैरियर को आगे बढ़ने से रोका |

ये सारी बातें हम सब को बहुत तकलीफ देती हैं इसका दर्द मन में जीवन भर रहता है ,ताउम्र एक चुभन सी बनी रहती है | पर माफ़ कीजियेगा ये सारी बातें metoo हैश टैग के अंतर्गत नहीं आती ये प्रतिस्पर्द्धा हो सकती है , जलन हो सकती है , छोटी सोच हो सकती है , ये सारे शोषण स्त्रियों द्वारा स्त्रियों पर करे हो सकते हैं पर ये यौन शोषण नहीं है | क्या सफलता /असफलता का दर्द एक रेप विक्टिम के दर्द बराबर है ? क्या उस ट्रामा के बराबर है जिससे भुक्तभोगी हर साँस के साथ मरती है | तो फिर इस के अंतर्गत ये सारी बातें करके हम एक महिला को दूसरी महिला के विरुद्ध खड़ा करके उस हिम्मत को तोड़ रहे हैं जो महिलाएं अपने ऊपर हुए यौन शोषण के खिलाफ बोलने का दिखा रही हैं | दुर्भाग्य से सोशल मीडिया पर ये हो रहा है |



इस बात से कभी इनकार नहीं किया जा सकता कि मानसिक शोषण बहुत पीड़ादायक होता है | ये समाज इस तरह से बना है कि हम किसी को रंग , वजन , लम्बाई , कम बोलने वाला/ ज्यादा बोलने वाला , इस प्रदेश का , आदि मापदंडों पर उसे कमतर महसूस करा कर उसका मानसिक शोषण करते हैं इस तरह का शोषण पुरुष व् महिलाएं दोनों झेलते हैं जो निंदनीय है | ये भी सही है कि महिलाएं भी महिलाओं का शोषण करती हैं | कार्य क्षेत्र में आगे बढ़ने की होड़ में कई बार वो इस हद तक गिर जाती हैं कि दूसरे को पूरी तरह कुचल कर आगे बढ़ जाने में भी गुरेज नहीं करती | जो नौकरी नहीं करती , वहाँ सास-बहु इसका सटीक उदाहरण हैं | ये सब हम सब ने भी झेला है पीड़ा भी बहुत हुई है | जिसके बारे में कभी अपनी बहन को , कभी पति को , कभी किसी दूसरी सहेली को खुल कर बताया भी है | उनके सामने रोये भी हैं |


लेकिन #metoo आन्दोलन यौन शोषण के खिलाफ है जिस विषय में महिलाएं (या पुरुष भी) अपनी बहन को नहीं बता पाती , माँ को नहीं बता पाती , सहेली को नहीं बता पातीं अन्दर ही अंदर घुटती हैं क्योंकि इसमें हमारा समाज शोषित को ही दोषी करार दे देता है | आज महिलाएं मुखर हुई हैं और वो किस्से सामने ला रहीं हैं जो उन्होंने खुद से भी छुपा कर रखे थे , जो उन्हें कभी सामान्य नहीं होने देते , एक लिजलिजे घाव को छुपाये वो सारी उम्र चुप्पी साधे रहती हैं |


खास बात ये हैं स्त्री ने अपनी शक्ति को पहचाना है | #metoo आन्दोलन के रूप में महिलाएं अपने शोषण के वो किस्से ले कर सामने आ रहीं हैं जिसे वो खुद से भी छुपा कर रखतीं थी | एक शोषित अपने ऊपर हुए यौन शोषण के बारे में बोल नहीं सकती थी क्योंकि पूरा समाज महिलाओं के खिलाफ था , बोलने पर उसे सजा मिलनी थी , उसकी पढाई छुड़ा दी जाती , नौकरी छुडा दी जाती , उसकी जल्दी से जल्दी शादी करा दी जाती | उसके कपड़ों , चाल -चलन बातचीत पर दोष लग जाता था | उसके पास दो ही रास्ते थे या तो वो बाहर जा कर अपने अस्तित्व की लड़ाई लडती रहे या घर में कैद हो जाये | सजा शोषित को ही मिलनी थी | जैसा की पद्मा लक्ष्मी ने कहा कि जब उन्होंने सात साल की उम्र में एक परिचित का अभद्र व्यवहार अपनी माँ को बताया तो उनकी माँ ने उन्हें एक साल के लिए दादी के पास भारत भेज दिया | फिर उन्होंने माँ से कभी इस बारे में कुछ साझा नहीं किया | आज ये चुप्पी टूट रही है महिलाएं ये सब कहने का साहस जुटा रहीं हैं | कई नाम से और कई गुमनाम हो कर पोस्ट डाल रहीं हैं | वहीँ महिलाओं पर ये प्रश्न लग रहे हैं तब क्यों चुप थीं ? आश्चर्य है की इस प्रश्न को पूछने वाली महिलाएं भी हैं और एक रेप विक्टिम को अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के जज की कुर्सी पर 49 /51 से जीता कर बैठने वाली भी | आखिर क्यों हम एक दूसरे की ताकत नहीं बनना चाहते ?




कुछ पुरुष जिनका यौन शोषण हुआ है वो भी सामने आ रहे हैं | दुर्भाग्य से पुरुषों ने उनका साथ नहीं दिया , वो उनका मजाक उड़ाने लगे कि पुरुषों का भी कहीं यौन शोषण होता है | प्रसिद्द कॉमेडी शो ब्रुक्लिन९९ के टेरी ने जब एक हाई प्रोफाइल व्यक्ति पर यौन शोषण का आरोप लगाया था तो उसका यही कहना था कि इस दर्द से गुज़र कर मैंने ये जाना कि महिलाएं , हर जगह कितना झेलती हैं और किस कदर अपने दर्द के साथ चुप रह कर जीती हैं | तभी उन्होंने फैसला लिया कि वो अपना किस्सा सबके सामने लायेंगे ताकि महिलाएं भी हिम्मत करें वो कहने की जिसमें वो शोषित हैं , दोषी नहीं हैं | उन्हें मृत्यु की धमकी मिली पर व् लगातार लिखते रहे | हालांकि सोशल मीडिया पर ऐसे पुरुषों की आवाज़ बहुत कम है | उन्हें खुलने और भी समय लगेगा | अभी जो इक्का दुक्का आवाजें आ रहीं है उन्हें भी पुरुषों का समर्थन नहीं मिल रहा बल्कि वो भी मुद्दे को भटकाने के प्रयास में हैं | ये उस दर्द का तमाशा बनाने का प्रयास है जो एलिज़ाबेथ टेलर के डाइवर ने उन पर लगाया था कि कभी कभी वो अपने पति से नाराज़ होकर अचानक उनके कमरे में आधी रात को आकर उसे नींद से जगा कर उसका यौन शोषण करती थीं |

दुखद ये है कि पिंक फिल्म पर "ना का मतलब ना " के अभिताभ बच्चन के डायलॉग पर तालियाँ बजाने वाला समाज फिल्म इंडस्ट्री से जुडी औरतों के किस्से सामने आने पर अरे ये औरते तो ऐसी होती ही हैं कह कर मुँह फेर लेते हैं ... हम कंसेंट शब्द का मतलब बिसरा देते हैं ? फेसबुक में ऐसे किस्सों की भरमार है कि महिलाएं प्रोवोक करती हैं सही है .... मेनका , उर्वशी रम्भा से हमारा इतिहास भरा पड़ा है पर फिर भी प्रोवोक करनेको जबरदस्ती करने के अंतर्गत नहीं लाया जा सकता |



जरूरत है #Metoo के अंतर्गत सिर्फ यौन शोषण पर बात हो ताकि एक भयानक मानसिक दर्द से महिलाएं बाहर आ सकें अन्य शोषण इसके साथ जुड़ने से यह हल्का हो जाएगा |

जो महिला हिम्मत कर के कह रही है उस पर पहले से ही आरोप ना लगायें जैसे ये तो छोटे कपडे पहनती है , फिल्म इंडस्ट्री की है ... रेप एक अपराध है और इसे उसी तरह से लें |

कोई महिला अपनी बात सुनाती है तो उसे पूरी तरह सहनुभूति के साथ सुने |

आपकी बेटी , बहन , परिवार की कोई कम उम्र महिला कुछ बताती है ... जैसे एक लड़का मुझे घूर रहा था , या एक लड़का गंदे इशारे कर रहा था तो उसे ना टोंके कि जरूर तुम ज्यादा हंसी बोली होगी , या अब उस रास्ते से न जाना , तुम्हारा स्कूल बदल देंगे | ऐसा करके हम उसकी आगे बोलने की हिम्मत तोड़ देते हैं |

अपने बच्चों के साथ हर विषय पर बात करें ताकि वो अपनी पीड़ा खुल कर कह सकें |



आज इन सेलेब्रिटीज के किस्से पढ़ कर इसकी भयानकता को समझा जा सकता है , ये महिलाएं १० -बीस साल इस दर्द को पीती रहीं जिनके पास पैसा , पावर , पोजीशन सब कुछ था , मंच था तो सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि आम महिला कितना कुछ सहती रही होगी | आज ये हिम्मत कर रहीं हैं तो उम्मीद की जा सकती है शायद कल को वो भी बोले ... कल को एक आम बहु बोले अपने ससुर के खिलाफ, एक बेटी बोले अपने पिता या भाई के खिलाफ .... समाज में ऐसा बहुत सा कलुष है जिसे हम कहानियों में पढ़ते हैं पर वो कहानियाँ जिन्दा पात्रों की होती हैं | आप की आशंका नकार नहीं रही कि कुछ किस्से बनावटी हो सकते हैं पर मेरे विचार से हमें उन्हें भी बोलने का मौका देना चाहिए नहीं तो असली दर्द पर भी बनावटी का आरोप लग जाएगा और ९८ % असली दर्द फिर से अपने ताबूत में बंद हो जाएगा
#metoo समाज में बदलाव की एक सार्थक पहल है इसे स्त्री को स्त्री के विरुद्ध खड़ा करके हल्का ना करें बल्कि हाथ थाम कर साबित करें स्त्री ही स्त्री की शक्ति है |

वंदना बाजपेयी




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atoot bandhan

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  1. आदरणीय वन्दना जी -- आपके सारगर्भित लेख से बहुत सारी नई चींजे जानी | मैंने कहीं पढ़ा था कि सौ महिलाओं में से मात्र एक भी संदिग्ध महिला ही बचती है जो अपने जीवन के किसी दौर में किसी अभद्र व्यवहार का शिकार ना हुई हो | भारत जैसे कथित ; संस्कारी ' राष्ट्र में इस अनैतिकता भरे आचरण से यदि पीड़ित महिलाएं छद्म नकाब उतरना चाहती हैं तो ये बात आने वाली पीढ़ियों के लिए बहुत प्रेरक है | मानसिक प्रताड़ना भी बहुत दुखद और निंदिय हैं पर शारीरिक शोषण तो समाज और राष्ट्र पर एक बदनुमा धब्बा है | संसर नारी जाती के साथ एनी लोगों को भी इस तरह के भुगत्भोगियों के साथ हमकदम बन सहयोग देना चाहिए | चिंतन परक विषयात्मक लेख के लिए हार्दिक बधाई | सादर

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  2. सही कहा वंदना दी कि #Metoo आंदोलन में सिर्फ यौन शोषण की ही बात होनी चाहिए। नहीं तो ये अपने मुद्दे से भटक जाएगा। विचारणीय आलेख।

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