December 2018
                       
लेख -सच -सच कहना यार मिस करते हो कि नहीं : एक चिंतन




 शायद आपको याद हो अभी कुछ दिन पहले मैंने गीता जयंती पर एक पोस्ट डाली थी , जिस में मैंने उस पर कुछ और लिखने की इच्छा व्यक्त की थी | इधर कुछ दिन उसी के अध्यन में बीते | " जीवन क्या है , क्यों है या सहज जीवन के प्रश्नों का मंथन मन में हो रहा था | इसके विषय में कुछ लेख atootbandhann.com में लिखूँगी , ताकी जिनके मन में ऐसे सवाल उठते हैं, या इस विषय में रूचि हो,  वो उन्हें आसानी से पढ़ सकें | वास्तव में यह लेख नहीं एक परिचर्चा होगी जहाँ आपके विचारों का खुले दिल से स्वागत होगा |

सच -सच कहना यार मिस करते हो कि नहीं : एक चिंतन 



                                 पर आज कुछ लिखने का कारण शैलेश लोढ़ा जी ( तारक मेहता , वाह -वाह क्या बात है , फ्रेम ) की कविता है , जो मैने  यू ट्यूब पर सुनी | कविता का शीर्षक है , " सच -सच कहना यार मिस करते हो कि नहीं |" दरअसल ये कविता एक आम मध्यम वर्गीय परिवार से सफलता की ऊँचाइयों पर पहुंचे व्यक्ति की है | ये कविता उनके दिल के करीब है | इस कविता के माध्यम  से वो अपने बचपन के अभावों वाले दिनों को याद करते हैं और आज के धन वैभव युक्त जीवन से उसे बेहतर पाते हैं | बहुत ही मार्मिक बेहतरीन कविता है |  हम सब जो  उम्र के एक  दौर को पार कर चुके हैं कुछ -कुछ ऐसा ही सोचते हैं | मैंने भी इस विषय पर तब कई कवितायें लिखी हैं जब मैं अपने गृह नगर में सभी रिश्ते -नातों को छोड़ कर महानगर के अकेलेपन से रूबरू हुई थी |



क्योंकि इधर मैं स्वयं की खोज में लगी हूँ इस लिए कविता व् भावनाओं की बात ना करके तर्क की बात कर रही हूँ |  शायद हम किसी निष्कर्ष पर पहुँचे  | आज हम गुज़रा जमाना याद करते हैं पर जरा सोचिये  हम खतों की खुश्बू को खोजते हैं , भावुक होते हैं लेकिन जैसे ही बेटा दूसरे शहर पहुँचता  है तुरंत फोन ना आये , तो घबरा जाते हैं | क्या खत के सुख के साथ ये दुःख नहीं जुड़ा था , कि बेटे या किसी प्रियजन के पहुँचने का समाचार भी हफ़्तों बाद मिलता था | जो दूर हैं उन अपनों से कितनी बातें अनकही रह जाती थीं |

क्या ये सच नहीं है कि साइकिल पर चलने वाला स्कूटर और कार के सपने देखता है | इसके लिए वो कड़ी मेहनत करता है |

सफल होता है , तो स्कूटर खरीदता है , नहीं सफल होता है तो जीवन भर निराशा , कुंठा रहती है |  वहीँ कुछ लोग इतने सफल होते हैं कि वो मर्सिडीज तक पहुँच जाते हैं | फिर वो याद करते हैं कि सुख तो साइकिल में ही था | लेकिन अगर सुख होता तो आगे की यात्रा करते ही क्यों ? क्यों स्कूटर, घर, बड़ा घर , कार , बड़ी कार के सपने पालते , क्यों उस सब को प्राप्त करने के लिए मेहनत करते | जाहिर है सुख तब भी नहीं था कुछ बेचैनी थी जिसने आगे बढ़ने को प्रेरित किया | किसने कहा था मारुती ८०० लेने के बाद मर्सीडीज तक जाओ | जाहिर है हमीं ने कहा था , हमीं ने चाहा था , फिर दुःख कैसा ? क्योंकि जब उसे पा लिया तो पता चला यहाँ भी सुख नहीं है | कुछ -कुछ ऐसा ही हाल नौकरी की तलाश में दूसरे शहर देश गए लोगों का होता है | पर अपने शहर में, देश में वो नौकरी होती तो क्या वो जाते |अगर वहां बिना नौकरी के रह रहे होते तो क्या वहां पर वो प्यार या सम्मान मिल रहा होता जो आज थोड़े दिन जाने पर मिल रहा है | क्या वहां रहने वाले लोग ये नहीं कहते , "अच्छा है आप तो यहाँ से निकल गए |"


पिताजी कहा करते थे , ईश्वरीय व्यवस्था ऐसी है कि दोनों हाथों में लड्डू किसी के नहीं होते | जो हमारे पास होता है उसके लिए धन्यवाद कहने के स्थान पर जो हमारे पास नहीं होता है हम उस के लिए दुखी है | तभी तो नानक कहते हैं , " नानक दुखिया सब संसारा |"लेकिन हम में से अधिकतर लोग नौस्टालजिया में जीते हैं ....जो है उससे विरक्ति जो नहीं है उससे आसक्ति | मुझे अक्सर संगीता पाण्डेय जी की कविता याद आती है , " पास थे तब खास नहीं थे |"मृगतृष्णा इसी का नाम है .... हर किसी को दूर सुख दिख रहा है , हर कोई भाग रहा है |


ख़ुशी शायद यात्रा में है , जब हम आगे बढ़ने के लिए यात्रा करते हैं ख़ुशी तब होती है ... कुछ पाने की कोशिश में की जाने वाली यात्रा का उत्साह  होता है | पर शर्त है ये यात्रा निराशा कुंठा के साथ नहीं प्रेम के साथ होनी चाहिए | यह तभी संभव है  जब ये समझ हो कि ख़ुशी आज जहाँ हैं वहीँ  जो अभी मिला हुआ है उसी में निराश होने  के स्थान पर खुश रहने में हैं | ख़ुशी ये समझने में है कि जब हम -आप अपने बच्चों के साथ ठेले पर  गोलगप्पे खाते हुए पास से गुज़रती मर्सीडीज को देख कर आहे भर रहे होते हैं, ठीक उसी समय वो मर्सीडीज वाला बच्चों के साथ समय बिताते , जिन्दगी के इत्मीनान और लुत्फ़ का आनंद उठाते हुए हम को -आपको देख कर आह भर रहा होता है | तो क्यों ना हम तुलना करने के स्थान पर आज  अभी जो हमें मिला है उस पल का आनंद लेना सीखे ... क्योंकि किसी के लिए वो सपना है , भले ही जीवन की दौड़ में वो उससे पीछे हो या आगे , क्योंकि पीछे की यात्रा संभव नहीं |

जब ये समझ आ जायेगी तो संतोष आएगा और कुछ भी मिस करने की जरूरत नहीं पड़ेगी |




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वंदना बाजपेयी

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कहानी -सही इलाज

विवाह के बाद अक्सर कुछ समस्याएं आती हैं , जिन्हें परिवार के लोग अपने अनुभव से सुलझाते हैं | ऐसी ही एक कहानी पढ़िए जहाँ बहु -बेटे की टूटती गृहस्थी को कैसे सही इलाज से बचाया गया 

कहानी - सही इलाज 

महानगर की भीड-भाड़ से दूर वो नवयुवक एक छोटे से कस्बे मे रहता था।पढ लिख कर अपने पैरो पर खडा था,यानि नौकरी करता था।एकाएक समय ने करवट ली।मंहगाई को देख वो आगे बढने के चक्कर मे एन.सी.आर मे नौकरी करने की लालसा करने लगा।क्योकि कस्बे मे रहकर पैकिज बढाना सम्भव नही था।
एक सुखद भविष्य की कल्पना मे वो दूर निकल गया घर से।एक मल्टीनेशनल कम्पनी मे ज्याब पाकर वो निहाल हो गया।पर ये क्या------पैकेज तो बढा,पर किराये के फ्लैट ने सारा मजा किरकिरा कर दिया था।
माता-पिता को भी साथ नही रख सकता था क्योकि अभी नौकरी से भी पूरी तरह संतुष्ट नही हुआ था।माता-पिता अपनी थोडी जी जरूरतो मे ही खुश थे।
इधर आजादी की बयार नवयुवक को ऐसी लगी थी कि बंधन अब कबूल ना था।पहले-पहल दोस्तो के संग वक्त गुजरता मजे मे। पर अब उमर हो रही थी,सभी दोस्तो की शादियो मे जा जाकर उस नवयुवक के मन मे भी विवाह करने की हसरत किलकारियां मार रही थी।कस्बे मे रह रहे माता-पिता से मिलने एकाध बार चक्कर लगा लेता पर अब मन करता था अपनी भी गृहस्थी जमे।।
इस बार जब वो घर आया तो अपनी मां से कहने लगा-
बेटा-मां अब मेरा ब्याह कर दो।क्या बुढापे मे मेरा विवाह करोगे?
मां-बेटा,हम तो खुद यही चाहते है कि कोई बहू बेटी बनकर हमारे घर आंगन मे घूमे।
बेटा-देखो ना मां,मेरे सभी दोस्तो की शादियां हो गयी,मै अकेला ही रह गया हूं!
मां-बेटा,बता तेरी नजर मे कोई है क्या?
बेटा-नही मां,आप ही देखो।
मां-बेटा,इस कस्बे की तो तुम्हे पसन्द आयेगी नही,फिर तुम्हारी पसन्द--------
बेटा-फिर क्या?
ऐसा है मां,आप मेरा एन सी आर मे ही मंदिर मे विवाह हेतु नाम लिखवा दो। वही की लडकी ढीक रहेगी।
मां-ढीक है बेटा।हम तो किसी को जानते नही,तुम्ही जाकर ये काम करो।
बेटा-ढीक है मां,मै ही ये काम कंरुगा।।
संयोगवश वहां भी एक परिवार ऐसा आया,जिसे इस नवयुवक का बायोडाटा जंच गया!इकलौता लडका था वो भी घर से दूर,,,,,
उनकी बेटी शादी की उमर क़ो भी पार कर चुकी थी बतीस बरस की हो गयी थी।कोई रिश्ता उन्हें जमा नही था।क्योकि तीन-तीन बेटियां थी,देने के लिये दहेज भी नही था।ऐसे वर की तलाश थी जो बिना दहेज ही उनकी बेटी ब्याह ले।घर बैठै-बैठे उनकी बेटी एम बी ए कर गयी थी,पर कोई भी नौकरी हेतु आवेदन करती,घबरा जाती व नौकरी छोड घर लौट आती।आत्मविश्वास की कमी थी उसमे।माता-पिता भी कब तक घर बैठाकर रखते,उन्हें भी अपनी जिम्मेदारी उतारनी थी।इस नवयुवक का बायोडाटा उन्हे जम रहा था।इसीलिये उन्होने तुरन्त लडके को फोन कर दिया।
लडका संस्कारी था उसने आदर से अपनी मां का फोन नं देते हुऐ वार्तालाप करने को कहा।पर लडकी के पिता को इतनी जल्दी थी कि वो लडके को देखने उसके आफिस ही पहुंच गये।
लम्बा उंचा कद,गोरा रंग,स्मार्ट लडके को देखते ही लडकी वालो की बाछे खिल गयी,!अब वो सोच रहे थे कोन सा पल हो ये रिश्ता हो जाये।
आननफानन मे उन्होने शहद मे घुली बाते की,लडके की मां से।और उन्हे अपने घर अपनी बेटी दिखाने को न्योता दिया।
शरीफ व सीधे सादे लोग उनकी शहद भरी मीठी बातो मे आ गये,बिना किसी रिश्तेदारों की सलाह लिये वो दोनो ही रेलगाड़ी से जैसे ही स्टेशन पहुंचे,लडकी का पिता गाडी लेकर उनके सामने था।आदरपूर्वक अपने घर ना ले जाकर किसी दर्शनीय स्थल पर ले आया था।लडके की मां ने घर देखने की मंशा जतायी,लेकिन वो बडी चालाकी से टाल गये थे।वही लडके को बुलाकर लडकी दिखा दी गयी।कस्बे के भोलेभाले लोग भावविभोर हो गये,उनकी खातिरदारी देख कर।सब कुछ जल्दीबाजी मे तय हो गया।दो ही दिन बाद लडकी वाले पूरे परिवार संग लडके वालो के घर थे।तुरन्त रौका कर दिया गया।लडके वाले चाहकर भी अपने रिश्तेदारों को इतनी जल्दी बुला नही पाये।एक माह बाद ही शादी का दिन तय कर दिया ।लडके वालो ने कहा-अभी थोडा समय दो!पर लडकी वालो ने दलील दी,हमे अपनी दूसरी लडकी की भी शादी करनी है!उसके रिश्ते भी आ रहे है,जबकि बाद मे तीन साल बाद दूसरी बेटी की शादी की थी।लडके वाले अपने बेटे की शादी बडी धूमधाम से अपने कस्बे मे ही करना चाह रहे थे पर लडकी वालो ने मना कर दिया,और अपनी जिद करके एन सी आर मे ही शादी हेतु आने को कह दिया,।सारे रिश्तेदार सीधे वही आ जायेगे,रेलगाडियों की आवागमन अच्छी है,तुरन्त शादी निपटाकर लौट जायेगे,आपको कोई परेशानी नही होगी,आप बस अपनी गाडी करके दुल्हन ले जाओ हम वहां सारा इन्तजाम बढिया कर देगे।अब किसी को भी ना कहने की गुजाईश ही नही थी।
जून माह की आग बरसाती गरमी मे विवाह सम्पन्न हुआ।भूख से ज्यादा प्यास सबको सता रही थी।
इधर वहां पहुचने पर खराब इन्तजाम देख लडके के माता पिता का माथा ठनका।खुद लडका भी परेशान हो गया,नहाना छोड पीने का पानी भी नही था।सारे बारातियों को परेशान देख कर सीधे-सादे माता पिता का सिर शर्म से पानी-पानी हो गया।वो कोस रहे थे उस दिन को कि वो क्यों लडकी वालो की बातो मे आ गये!इससे बेहतर वो लडकी वालो को अपने कस्बे मे बुलाकर विवाह सम्पन्न कराते।
विवाह के फेरे होते ही सब रिश्तेदार खिसकने शुरु हो गये।लडकी वाले अपनी बेटी की डोली घर से देगे,ये ऐलान कर अपने घर खिसक लिये।केम्न्टीसैन्टर पर हम दुल्हन संग कुछ लोग ही रह गये।उन्हे हमारे नाश्ते कि भी फिक्र नही थी।बाजार से हमने पानी की बोतले मंगवाई।इधर गाडी का डाइवर व फोटो वाला दोनो परेशान हो गये,वो लडके वालो पर दबाब बनाने लगे कि उन्हे दूसरी बुकिग पर जाना है।हार कर हम ही बिदा कर दुल्हन लेकर अपने घर लौट आऐ।

धीरे-धीरे लडकी वालो की असलियत सामने आ गयी थी।उन्हे सिर्फ लडके मे रुचि थी,उसके माया पिता मे नही।
क्योकि उन्होने अपनी बेटी को कोई संस्कार नही दिये थे।रसोई मे भी वो घुसने से डरती।खाना बनाना नही आता था।लाड प्यार मे बिगाड दिया था बेटी को।इसीलिये बेटी एन सी आर मे हमारी आंखो के सामने
रहे यही सोच ऐसा लडका चुना था।
ससुराल आकर बेटी का मन ना लगा।वो इस कस्बे मे कैसे रहेगी यही सोच लडकी की पिता पच्चीस दिनो मे ही बेटी को विदा कराने आ गया।सास ससुर को झूठ ही कह दिया कि इसका नौकरी के लिये काल लैटर आने वाला है। 
दुखी मन से लडके के माता पिता ने भेज दिया।पर उनके तो सपने ही टूट गये थे।सबसे बडी गाज तो लडके पर पडी थी,जिस लडकी को वो अपनी जीवनसंगिनी बनाकर लाया था वो त़ उसके माता-पिता को एक आंख पसन्द नही करती थी,ना ही वो कभी उनके संग रहना चाहती थी।बेटे की खुशियो को ध्यान मे रखकर बहू को रहने की इजाजत दे दी थी।बीमार व बूढे माता-पिता चाहते थे बस बहू बेटा खुश रहे।पर भीतर ही भीतर उनका दिल रो रहा था कि इकलौते बेटे के बिना हम कैसे जीवेगे?उनके बेटे के ये सपने थे कि हम हमेशा एक साथ रहे,।बेटा भी चाहता था कि मै अपने माता-पिता के संग एक आदर्श परिवार की रचना कंरू।पर अब सब बेकार हो गया था।बहू बेटे के संग आजादी मे रहना चाहती थी,जब बेटा डयूटी चला जाता वो भी मायके खिसक जाती,हर दम उसका ध्यान अपने परिवार पर लगा रहता।सास ससुर के प्रति अपनी जिम्मेदारी से उसने पल्ला झाड लिया था।
कुछ दिनो से बेटे बहू मे अब बजने लगी थी,सास ससुर फिर भी बहू का पक्ष लेते और अपने बेटे को समझाते।
देखते ही देखते चार बरस बीत गये।घर मे कोई भी वार त्योहार होते बहू ना आती।कस्बे मे अब कानाफूसी होने लगी थी।बहू का हरदम मायके भागना,सास ससुर को संदेह मे डाल रहा था,बहू बेटे की गृहस्थी किस मोड पर जाकर रूकेगी,इसी चिन्ता मे उन्होने एक फैसला लिया और अपने बेटे को एन सी आर की नौकरी छोडकर कही दूर साऊथ की और जाने की समझाईश दी।बहू मायके से दूर हो जायेगी,तो तेरी गृहस्थी सही से चल पढेगी।बेटे को माता पिता की बात जंच गयी ।देखते ही देखते बेटा एन सी आर को छोडकर हैदराबाद की ओर निकल गया,और अब मजबूरन बहू का मायके का मोह छोडकर बेटे संग हैदराबाद जाना पडा।सही इलाज के चलते बहू बेटे का घर टूटने से बच गया था।और एक नयी खुशी ने उनके जीवन मे दस्तक दे दी थी।नन्ही सी फूल जैसी बेटी को पाकर वो दोनो खुश थे।देखते ही देखते सारे मोती मिलकर माला का रूप ले चुके थे।।

रीतू गुलाटी(ऋतु)

लेखिका -रितु गुलाटी


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आधुनिक आध्यात्मिक गुरु -टील स्वान


टील स्वान एक लेखिका वक्ता और सोशल मीडिया स्टार हैं |  वो लोगों को जीवन के विभिन्न पहलुओं के बारे में बताती कर उनके व्यक्तित्व को परिमार्जित करने का प्रयास करती हैं | उनका मुख्य उद्देश्य लोगों को ये सिखाना है कि वो कैसे अपना भावनात्मक , शारीरिक , मानसिक और आध्यात्मिक विकास कर सकते हैं | इसके लिए वो देश विदेश की यात्रा भी करती हैं , उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखी हैं | यहाँ हम टील स्वान के कुछ विचारों का हिंदी अनुवाद दे रहे हैं | आशा है जीवन को समझने में आपको सहायता मिलेगी |


टील स्वान के 21 अनमोल विचार 



1)आप कितनी भी कोशिश करें आप अँधेरे को नहीं हटा सकते | क्योंकि अँधेरे को हटाने के लिए ये समझना जरूरी है कि अँधेरा कहीं है ही नहीं | दरअसल प्रकाश का आभाव अँधेरा है | इसलिए अँधेरे को हटाने के स्थान पर कोशिश प्रकाश को लाने की होनी चाहिये |


2)अगर आप किसी चीज से भावनात्मक रूप से अलगाव चाहतें हैं तो चाहें कितनी भी कोशिश करे यह संभव नहीं होगा | इसके लिए आपको उसमें खुद को देखना या खुद से जोड़ना बंद करना होगा .... भावनात्मक अलगाव खुद ब खुद हो जाएगा |

3)रिश्ते ही हमारी ख़ुशी का सबसे बड़ा कारण होते हैं और रिश्ते ही हमारे दुःख का सबसे बड़ा कारण होते हैं | रिश्तों में दुःख तब शुरू होते हैं जब हम ये उम्मीद करने लगते हैं की दूसरा व्यक्ति हमें अपने विशेष व्यवहार से खुशियाँ प्रदान करे | जिस समय हम दूसरे व्यक्ति से अपनी खुशियों का कारण बनने को कहते हैं या चाहत हैं उसी समय से हम उस व्यक्ति की दया पर निर्भर हो जाते हैं | हम उम्मीद करते हैं कि वो हमारे द्वारा स्थापित ख़ुशी की परिभाषा के अनुसार जीवन जियें ना की अपनी मर्जी से | यही वो समय है जब हम उस रिश्ते को खोना शुरू कर देते हैं जो सबसे महत्वपूर्ण है ... यानि खुद से खुद का रिश्ता | 
आप का खुडी से रिश्ता जितना अच्छा होगा औरों से भी उतना ही अच्छा होगा | 


4)अविश्वास भी एक तरह का विश्वास ही है | फर्क बस इतना है कि अविश्वास की प्रकृति नकारात्मक है जबकि विश्वास की सकारात्मक |

5)किसी भी रिश्ते का सबसे बड़ा सच ये है कि आपुसके साथ कैसा महसूस करते हैं जब कोई देख न रहा हो |


6)आपकी कोई इच्छा नहीं होरही है , इसके दो ही कारण हो सकते हैं ...
१)आप अपने सोचने, विश्वास करने या काम करने में खुद ही कोई अवरोध उत्पन्न कर रहे हैं |
2) वो आप की इच्छा है ही नहीं , उस इच्छा को पाने की कोशिश केवल अपनी असली इच्छा को छुपाये रखना , उस पर ध्यान ना देना है | क्योंकि ब्रह्माण्ड ये जानता है कि ये आपकी असली इच्छा नहीं है इसलिए वो कोई परिणाम नहीं देता |
पहले अपनी असली इच्छा को समझिये ... उस पर सोचने , विश्वास करने काम करने में कोई अवरोध मत पैदा करिए | तीनों में एक् लयात्मकता होनी  चाहिए |

आप पायेंगे , कुछ भी पाना असंभव नहीं है |


7)आज का आधुनिक समय ये तो वादा करता है कि आप स्त्री हैं फिर भी आप सब कुछ पा सकती हैं पर वो ये डिस्क्लेमर लगाना भूल जाता है कि आप सब कुछ करते हुए ही सब कुछ पा सकती हैं |

8)इससे ज्यादा ख़राब बात कोई नहीं है कि कोई स्त्री अपने लिए कमजोर पुरुष की कामना नहीं करती |


9)आपका असली चेहरा इस विचार के नीचे छुप गया है  है कि अगर आप अगर आप एक खास तरीके से नहीं चलेंगे तो आप वो प्राप्त नहीं कर सकते जो आप चाहते हैं | अपने को नकारना, एक आंतरिक मुखौटा है , जिसके नीचे आपका असली व्यक्तित्व  छुपा हुआ है | इसको पहचानने का सबसे अच्छा तरीका फीलिंग्स या भावनाएं हैं | ये एक तरह का कम्पास है | आप किस काम में कैसा महसूस कर रहे हैं | अगर आप अच्छा महसूस कर रहे हैं तो आप को कोई जरूरत नहीं है कि आप दूसरे लोगों की राय लें | लेकिन अगर आप वही कर रहे हैं जो दूसरे चाहते हैं तो आप खुद से अपने तार तोड़ रहे हैं ... इसकी शुरुआत भी अपनी भावनाओं को कुचलने से होती है | आप देखेंगे की आप पा तो बहुत रहे हैं पर खुश नहीं हैं |

आपकी भावनाएं आपकी खुशियों का पता बताती हैं |

10)लोग जो आप के अन्दर नकारात्मक इमोशन संप्रेषित करते हैं ....वो लोग मात्र सूचना वाहक है , आप के उन घावों के जो अभी तक भरे नहीं हैं | 

11)ख़ुशी बच्चों में तब तक व्याप्त रहती है , जब तक बड़े आकर उन्हें ख़ुशी के किसी  जटिल संस्करण से अवगत नहीं कराते हैं और उन पर अपनी बात स्वीकार करने का दवाब नहीं बनाते हैं |

12)हम धरती पर अलगाव के एक भ्रम को जीने आये हैं , लेकिन अगर हम इस बारे में जागरूक हो जाते हैं तो हम इस सारी  प्रक्रिया को उल्टा कर सकते हैं | अगर ध्यान से देखें तो हम सब इस प्रकार बने हैं कि हम दर्द का अवरोध कर ख़ुशी ढूँढें | जब भी दर्द होता है हम ख़ुशी की तलाश में घूमने लगते हैं | ये उस दर्द का अवरोध है एक ऐनालजेसिक (पेन  किलर ) है | जो दर्द को कुछ समय को दबा तो देता है पर खत्म नहीं करता | अगर हम अपने सेंसर इस तरह से रखे कि दर्द आते ही हम उसे समझने की कोशिश करें न कि भागने की , तो हम पायेंगे कि दर्द से ज्यादा प्रेरणादायक कुछ नहीं है |दर्द का अवरोध कर हम अपने आत्म विस्तार का अवरोध करते हैं | हर दर्द ये बताता है कि कुछ बदलाव जरूरी है पर उसे समझने के स्थान पर उस सेंसर को ही नाश करने पर तुले रहते हैं |

बेहतर है आप अपना नरक देखने की हिम्मत करें , क्योंकि यहीं से आपके स्वर्ग का रास्ता खुलेगा या फिर नरक को ही स्वर्ग समझने के भरम में जीते रहिये |


13)आप अपना हाथ पकडाए बिना किसी का हाथ नहीं पकड़ सकते |


14)नकारात्मकता को नकारने के लिए सकारात्मकता का इस्तेमाल मत करिए |


15)हम मनुष्य अपने जीवन को देखकर कर सोचते हैं कि हम में कुछ तो गलत है | फिर हम संसार के हर कोने में जाकर ( शारीरिक रूप से ना सही , अध्यन व् जानकारी के तौर पर ) पता करने की कोशिश करते हैं कि हममे क्या गलत है | ये जानने के बाद कि हम में क्या गलत है हम संसार भर में जा कर पता करते हैं कीसे कैसे ठीक करें | लेकिन कोई फायदा नहीं होता | फिर हम संसार भर में जा कर पता करते हैं कि आखिर ये उपाय क्यों काम नहीं किया | दरअसल केवल एक ही उपाय काम कर सकता है ... वो है ये समझ कि हममें कुछ गलत है |

हमें बदलने की नहीं ये समझने की जरूरत है |

16)पूर्ण विश्वास केवलज्ञान के आभाव में ही पनप सकता है |

17)अतीत को पकडे रहना हमेशा दुःख का कारण है .... भले ही वो अतीत बहुत खुशनुमा क्यों न हो |

18) लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन सही है | लेकिन आपकी किसी इच्छा को आप तक आने में जो बफर टाइम है उस्कसाही सदुपयोग जरूरी है | कोई चीज जो दूसरे डाईमेंशन में है उसे आप केवल उसके बारे में सोचकर यूँही नहीं खींच सकते | आप अगर उस बफर टाइम में हर समय नेगेटिव इमोशन में घिरे रहते हैं तो उसका पास आना और मुश्किल है | आपको करना क्या है .... बस छोटी छोटी खुशियों और पॉजिटिव इमोशन में रहना हैं , यही वो रस्सी है जो उसे खींचेगी | 

इसलिए अपनी पहली प्राथमिकता उन वस्तुओं को बनाइये जो पॉजिटिव इमोशन को उत्पन्न  करती हैं |

19)अहंकार ज्ञान को एक ढाल , एक , तलवार और एक बचाव के कम्बल की तरह इस्तेमाल करता है |

20)हम केवल ये कह सकते हैं कि कोई अनुभव अच्छा या बुरा था , जब तक हम ये नहीं समझ लेते की उस अनुभव का हमारे विकास में क्या योगदान था |

21)एक बार मुझसे एक बहुत ही अच्छा सवाल पूंछा गया | सवाल था , " हम सही निर्णय कैसे लें |जवाब है , " मैं अपने दिल के दरवाजे किसी चीज के लिए बंद नहीं करूंगा |

फोटो क्रेडिट -टील स्वान फेसबुक पेज
अगर आप टील स्वान के और विचारों को जानना चाहते हैं तो आप उनकी किताब The Anatomy of loneliness पढ़ सकते हैं या फिर teal swan की साईट पर जाकर उनके विचारों को और अधिक जान सकते हैं |


टीम -अटूट बंधन

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कहानी -मिर्गी

मनुष्य केवल एक शरीर ही नहीं मन भी है |  आपने कई किस्से सुने होंगे जब बुरी तरह बीमार शरीर भी मन की मजबूती के कारण असाध्य बीमारी से लड़ कर बाहर आ गया, वहीँ घायल मन ने स्वस्थ शरीर में बीमारी के ऐसे लक्षण पैदा कर दिए कि डॉक्टर भी समझने में भूल कर जाए | वरिष्ठ लेखिका दीपक शर्मा जी की कहानी मिरगी एक मनोशारीरिक समस्या को झेलती बच्ची की कहानी है | अपनी हर कहानी की तरह दीपक शर्मा जी ने इस कहानी को भी तथ्यों की काफी पड़ताल के बाद लिखा है | वहीँ एक मासूम बच्ची के मन में उतरते हुए उनकी लेखनी  पाठक को थोड़ी देर को स्थिर कर देती है | आप भी पढ़ें ...

कहानी -मिरगी 


उस निजी अस्पताल के न्यूरोलॉजी विभाग का चार्ज लेनेके कुछ ही दिनों बाद कुन्ती का केस मेरे पास आया था|

“यहपर्ची यहीं के एक वार्ड बॉय की भतीजी की है, मैम|” उस दिन की ओपीडी पर मेरे संग बैठे मेरे जूनियर ने एक नयी पर्ची मेरे सामने रखते हुए कहा|

“कैसा केसहै?” मैंनेपूछा|

“वार्डबॉय मिरगी बता रहा है| लड़की साथ लेकरआया है.....”

“ठीकहै| बुलवाओउसे.....”

वार्ड बॉय ने अस्पताल की वर्दी के साथ अपने नाम का बिल्ला पहन रखा था: अवधेशप्रसादऔर पर्ची कुन्ती का नाम लिए थी|

“कुन्ती?” मैंने लड़की को निहारा| वह बहुत दुबली थी| एकदम सींकिया| “क्या उम्र है?”

“चौदह”, उसने मरियल आवाज में जवाब दिया|

“कहीं पढ़ती हो?” मैंने पूछा|

“पहले पढ़ती थी, जब माँ थी, अब नहीं पढ़ती|” उसने चाचा को उलाहना भरी निगाह से देखा|
“माँ नहीं है?” मैंने अवधेश प्रसाद से पूछा|

“नहीं, डॉ. साहिबा| उसे भी मिरगी रही| उसी में एक दौरे के दौरान उसकी साँस जो थमी तो, फिर लौटकर नहीं आयी.....”

“और कुन्ती के पिता?
“पत्नी के गुजरने के बाद फिर वह सधुवा लिए| अब कोई पता-ठिकाना नहीं रखते| कुन्ती की देखभाल अब हमारे ही जिम्मे है.....”
“कब से?”

“चार-पांच माह तो हो ही गए हैं.....”

“तुम्हें अपनी माँ याद है?” मैं कुन्ती की ओर मुड़ ली|
“हाँ.....” उसने सिरहिलाया|
“उन पर जब मिरगी हमला बोलती थी तो वह क्या करती थीं?”

कुन्ती एकदम हरकत में आ गयी मानो बंद पड़े किसी खिलौने में चाबी भर दी गयी हो|

तत्क्षण वह जमीन पर जा लेटी| होंठ चटकाए, हाथ-पैर पसारे, सिकोड़े, फिर पसारे और इस बार पसारते समय अपनी पीठ भी मोड़ ली, फिरपहले छाती की माँसपेशियाँ सिकोड़ीं और एक तेज कंपकंपी के साथ अपने हाथ-पैर दोबारा सिकोड़ लिए, बारी-बारी से उन्हें फिर से पसारा, फिर से सिकोड़ा| बीच-बीच में कभी अपनी साँस भी रोकी और छोड़ी कभी अपनी ज़ुबान भी नोक से काटी तो कभी दाएं-बाएं से भी|

कुन्तीके मन-मस्तिष्क ने अपनी माँ की स्मृति के जिस संचयन को थाम रखा था उसकामुख्यांश अवश्य ही उस माँ की यही मिरगी रही होगी, जभी तो ‘टॉनिक-क्लौनिक-सीजियर’ के सभी चरण वह इतनी प्रामाणिकता के साथ दोहरा रही थी!
“तुम कुछ भी भूली नहीं?” मैंने कहा|

“नहीं”, वह तत्काल उठ खड़ी हुई और अपने पुराने दुबके-सिकुड़े रूप में लौट आयी|
“और तुम्हारी माँ भी इसी तरह दौरे से एकदम बाहर आ जाया करती थीं?” मैंने उसकी माँ की मिरगी की गहराई नापनी चाही क्योंकि मिरगी के किसी भी गम्भीर रोगी को सामान्य होने मेंदस से तीस मिनट लगते ही लगते हैं|

उत्तर देने की बजाय वह रोने लगी|
“उसका तो पता नहीं, डॉक्टर साहिबा, मगर कुन्ती जरूर जोर से बुलाने पर या झकझोरने पर उठकर बैठ जाती है|” अवधेश प्रसाद ने कहा|
“इस पर्ची पर मैं एक टेस्ट लिख रही हूँ, यह करवा लाओ|” कुन्तीकी पर्ची पर मैंने ई.ई.जी..... लिखते हुए अवधेश प्रसाद से कहा|
"नहीं, मुझेकोई टेस्ट नहीं करवाना है| टेस्ट से मुझे डर लगता है|” कुन्ती काँपने लगी|
“तुम डरो नहीं|” मैंने उसे ढांढस बंधाया, “यह ई.ई.जी. टेस्ट बहुत आसान टेस्ट है, ई.ई.जी. उस इलेक्ट्रो-इनसे-फैलोग्राम को कहते हैं जिसके द्वारा इलेक्ट्रो-एन-से-फैलोग्राफ नाम के एक यंत्र से दिमाग की नस कोशिकाओं द्वारा एक दूसरे को भेजी जा रही तरंगें रिकॉर्ड की जाती हैं| अगर हमें यह तरंगें बढ़ी हुई मिलेंगी तो हम तुम्हें दवा देंगे और तुम ठीक हो जाओगी, अपनी पढ़ाई फिर से शुरू कर सकोगी.....”
“नहीं|” वह अड़ गयी और जमीन पर दोबारा जा लेटी| अपनी माँसपेशियों में दोबारा ऐंठन और फड़क लाती हुई|
“बहुत जिद्दी लड़की है, डॉक्टर साहिबा|” अवधेश प्रसाद ने कहा, “हमीं जानते हैं इसने हम सभी को कितना परेशान कररखा है.....”

“आप सभी कौन?” मुझे अवधेश प्रसाद के साथ सहानुभूति हुई|

“घर पर पूरा परिवार है| पत्नी है, दो बेटे हैं, तीन बेटियाँ हैं| सभी का भार मेरे ही कंधों पर है.....”“आप घबराओ नहीं| अपने वार्ड में अपनी ड्यूटी पर जाओ और कुन्ती को मेरे सुपुर्द कर जाओ| इसके टेस्ट्स का जिम्मा मैं लेती हूँ|”
कुन्ती का केस मुझे दिलचस्प लगा था और उसे मैं अपनी नयी किताब में रखना चाहती थी|
“आप बहुत दयालू हैं, डॉक्टर साहिबा|” अवधेश प्रसाद ने अपने हाथ जोड़ दिये|
“तुम निश्चिन्त रहो| जरूरत पड़ी तो मैं इसे अपने वार्ड में दाखिल भी करवा दूँगी|” मैंने उसे दिलासादिया और अपने जूनियर डॉक्टर के हाथ में कुन्ती की पर्ची थमा दी|


कहानी मिर्गी

कुन्ती का ई.ई.जी. एकदम सामान्य रहा जबकि मिरगी के रोगियों के दिमाग की नस-कोशिकाओं की तरंगों में अतिवृद्धि आ जाने ही के कारण उनकी माँसपेशियाँ ऐंठकरउसे भटकाने लगती हैं और रोगी अपने शरीर पर अपना अधिकार खो बैठता है|
ई.ई.जी. के बाद हमने उसकी एम.आर.आईऔर कैट स्कैन से लेकर सी.एस.एफ, सेरिब्रल स्पाइनल फ्लुइड और ब्लड टेस्ट तक करवा डाले किन्तु सभी रिपोर्टें एक ही परिणाम सामने लायीं-कुन्ती का दिमाग सही चल रहा था| कहीं कोई खराबी नहीं थी|
मगर कहीं कोई गुप्त छाया थी जरूर जो कुन्ती को अवधेश प्रसाद एवं उसके परिवार की बोझिल दुनिया से निकल भागने हेतु मिरगी के इस स्वांग को रचने-रचाने का रास्ता दिखाए थी|
उस छाया तक पहुँचना था मुझे|
“तुम्हारी माँ क्या तुम्हारे सामने मरी थीं?” अवसर मिलते ही मैंने कुन्ती को अस्पताल के अपने निजी कक्ष में बुलवा भेजा|
“हाँ|” वह रुआँसी हो चली|
“तुम्हारे पिता भी वहीं थे?”
“हाँ|”
“मिरगी का दौरा उन्हें अचानक पड़ा?” मैं जानती थी मिरगी के चिरकालिक रोगीको अकसर दौरे का पूर्वाभास हो जाया करता है, जिसे हम डॉक्टर लोग‘औरा’ कहा करते हैं| हालाँकि एक सच यह भी है कि भावोत्तेजक तनाव दौरे को बिना किसी चेतावनी के भी ला सकता है|
“हाँ.....” उसने अपना सिर फिर हिला दिया|
“किस बात पर?”
“बप्पाउस दिन माँ की रिपोर्टें लाये थे और वे उन्हें सही बता रहे थे और माँ उन्हें झूठी.....”
“रिपोर्टेंमिरगी के टेस्ट्स की थीं? और उनमें मिरगी के लक्षण नहीं पाए गए थे?”
“हाँ|” वह फफककर रो पड़ी|
“और उन्हें झूठी साबित करने के लिए तुम्हारी माँ ने मिरगी का दौरा सचमुच बुला लिया था?”
कुन्ती की रुलाई ने जोर पकड़ लिया|
अपनी मेज कीघंटी बजाकर मैंने कुन्ती के लिए एक ठंडा पेय अपने कक्ष के फ्रिज से निकलवाया, उसे पेश करने के लिए|
उससे आगे कुछ भी पूछना उसकेआघातका उपभोग करने के बराबर रहता|
“कुन्ती के बारे में आप क्या कहेंगी, डॉक्टर साहिबा?” अवधेशप्रसाद मेरे पास अगले दिन आया|

"कुन्ती नहीं आयी?” मैंने पूछा|
“नहीं, डॉक्टर साहिबा| वह नहीं आयी| मिरगी के दौरे से गुजर रही थी, सो उसे घर ही में आराम करने के लिए छोड़ आया.....”
“और अगर मैं यह कहूँ कि उसे मिरगी नहीं है तो तुम क्या कहोगे? क्या करोगे?”

“हम कुछ नहीं करेंगे, कुछ नहीं कहेंगे|” हताश होकर वह अपने हाथ मलने लगा|
“हैरानी भी नहीं होगी क्या? भतीजी पर गुस्सा भी न आएगा?”
“हैरानी तो तब होती जब हम उसकी माँ का किस्सा न जाने रहे होते|”
“माँ का क्या किस्सा था?” मैं उत्सुक हो आयी|
“उसे भी मिरगी नहीं थी| वह भी काम से बचने के लिए मिरगी की आड़ में चली जाती थी|”
“किस काम से बचना चाहती थी?”


“इधर कुछेक सालों से भाई के पास ढंग की कोई नौकरी नहीं थी और उसने भौजाई को पांच छह घरों के चौका-बरतन पकड़वा दिए थे, और भौजाई ठहरी मन मरजी की मालकिन| मन होता तो काम पर जाती, मन नहीं होता तो मिरगी डाल लेती.....”

“यह भी तो हो सकता है कि ज्यादा काम पड़ जाने की वजह से उसका दिमाग सच ही में गड़बड़ा जाता हो, उलझ जाता हो और उसे सच ही में मिरगी आन दबोच लेती हो.....”

"यही मानकर ही तो भाई उस तंगहाली के रहते हुए भी भौजाई को डॉक्टर के पास लेकर गया थाऔर डॉक्टर के बताए सभी टेस्ट भी करवा लाया था.....”

“और टेस्ट्समें मिरगी नहीं आयीथी?" कुन्तीके कथन का मैंने पुष्टिकरण चाहा|
“नहीं, नहींआयी थी|"
“मगर तुमने तो मुझे आते ही कहा था मिरगी ही की वजहसे तुम्हारी भौजाई की साँस रुक गयी थी.....”

कहानी मिर्गी



“अब क्या बतावें? और क्या न बतावें? उधर भाई के हाथ में रिपोर्टें रहीं और इधर भौजाई ने स्वांग भर लिया| भाई गुस्सैल तो था ही, तिस पर एक बड़ी रकम के बरबाद हो जाने का कलेश| वह भौजाई पर टूट पड़ा और अपना घर-परिवार उजाड़ बैठा.....” अवधेश प्रसाद के चेहरे पर विषाद भी था और शोक भी|
“तुम्हारा दुख मैं समझ सकती हूँ|” मैंने उसे सांत्वना दी|
“साथ ही कुन्ती का भी, बल्कि उसके दुख में तो माँ की मौत की सहम भी शामिल होगी| तभी तो वह आज भी सदमे में है और उसी सदमे और सहम के तहत वह माँकी मिरगी अपने शरीर में उतार लाती है| मेरी मानो तो तुम उसकी पढ़ाई फिर से शुरू करवा दो..... स्कूल का वातावरण उसके मन के घाव पर मरहम का काम करेगा और जब घाव भरने लगेगा तो वह मिरगी विरगी सब भूल जाएगी.....”
“मैं उसे स्कूल भेज तो दूँ मगर मेरी पत्नी मुझे परिवर के दूसरे खरचे न गिना डालेगी!” अवधेश प्रसाद ने मुझे विश्वास में लेते हुए कहा| उसका भरोसा जीतने में मैं सफल रही थी|
“उसकी चिन्ता तुम मुझ पर छोड़ दो| उसकी डॉक्टर होने के नाते उसके स्कूल का खर्चा तो मैं उठा ही सकती हूँ.....”

दीपक शर्मा 

लेखिका -दीपक शर्मा


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दीपक शर्मा जी का परिचय -

जन्म -३० नवंबर १९४६

संप्रति –लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज के अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर पद से सेवा निवृत्त

सशक्त कथाकार दीपक शर्मा जी सहित्य जगत में अपनी विशेष पहचान बना चुकी हैं | उन की पैनी नज़र समाज की विभिन्न गतिविधियों का एक्स रे करती है और जब उन्हें पन्नों पर उतारती हैं तो शब्द चित्र उकेर देती है | पाठक को लगता ही नहीं कि वो कहानी पढ़ रहा है बल्कि उसे लगता है कि वो  उस परिवेश में शामिल है जहाँ घटनाएं घट रहीं है | एक टीस सी उभरती है मन में | यही तो है सार्थक लेखन जो पाठक को कुछ सोचने पर विवश कर दे |

दीपक शर्मा जी की सैंकड़ों कहानियाँ विभिन्न पत्र –पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं जिन्हें इन कथा संग्रहों में संकलित किया गया है |


प्रकाशन : सोलहकथा-संग्रह :

१.    हिंसाभास (१९९३) किताब-घर, दिल्ली
२.    दुर्ग-भेद (१९९४) किताब-घर, दिल्ली
३.    रण-मार्ग (१९९६) किताब-घर, दिल्ली
४.    आपद-धर्म (२००१) किताब-घर, दिल्ली
५.    रथ-क्षोभ (२००६) किताब-घर, दिल्ली
६.    तल-घर (२०११) किताब-घर, दिल्ली
७.    परख-काल (१९९४) सामयिक प्रकाशन, दिल्ली
८.    उत्तर-जीवी (१९९७) सामयिक प्रकाशन, दिल्ली
९.    घोड़ा एक पैर (२००९) ज्ञानपीठ प्रकाशन, दिल्ली
१०.           बवंडर (१९९५) सत्येन्द्र प्रकाशन, इलाहाबाद
११.           दूसरे दौर में (२००८) अनामिका प्रकाशन, इलाहाबाद
१२.           लचीले फ़ीते (२०१०) शिल्पायन, दिल्ली
१३.           आतिशी शीशा (२०००) आत्माराम एंड सन्ज़, दिल्ली
१४.           चाबुक सवार (२००३) आत्माराम एंड सन्ज़, दिल्ली
१५.           अनचीता (२०१२) मेधा बुक्स, दिल्ली
१६.           ऊँची बोली (२०१५) साहित्य भंडार, इलाहाबाद
१७.           बाँकी(साहित्य भारती, इलाहाबादद्वारा शीघ्र प्रकाश्य)


ईमेल- dpksh691946@gmail.com