January 2019
कहानी -99 क्लब का सदस्य


बहुत समय पहले की बात है एक राजा अपने मंत्रियों के साथ देश का भ्रमण कर रहा था | ज्यादातर लोग अपनी किसी ना किसी समस्या से परेशान  थे और उसी में उलझे हुए थे | वही उसे एक ऐसा व्यक्ति मिला जो बहुत खुश था | वो दिन भर खेत में कड़ी मेहनत  कर घर लौटता था | उसके कमाई तो ज्यादा नहीं थीं पर आवश्यकताएं सब पूरी हो रहीं थी | घर में प्रेम और विश्वास था | उसके घर के बाहर तक उनके हंसने की आवाजें आती थीं |


राजा के मंत्रियों ने राजा से कहा ,” राजन समझ में नहीं आ रहा कि ये व्यक्ति इतना खुश क्यों है ? प्रजा में ज्यादातर लोग धनाभाव का रोना रो रहे हैं पर यह अल्प आय में ही संतुष्ट है | परिवार में भी खुशहाली व् सामंजस्य है | हमारे पास इतना धन है फिर भी हम इसकी तरह से खुश नहीं है | आखिर इसका कारण क्या है ?

राजा ने उत्तर देते हुए कहा , “ ये व्यक्ति इसलिए खुश है क्योंकि ये 99 क्लब का सदस्य नहीं है |

“क्या मतलब ?” मंत्रियों ने समवेत स्वर में पूछा |
राजा ने कहा कि ऐसा करो एक थैले में 99 सोने के सिक्के लाकर इसके दरवाजे के बाहर एक थैले में रख दो .... फिर देखना खेल |
मंत्रियों  ने वैसा ही किया |

सुबह जब उस व्यक्ति ने उठ कसर दरवाजा खोला तो एक थैला रखा हुआ दिखाई दिया |
व्यक्ति ने थैला खोल कर देखा तो चौंक गया ... उसमें ढेर सारी स्वर्ण मुद्राएं थीं |

उसने मुद्राओं को गिनना शुरू किया | 50 तक पहुंचा था कि बीच में पत्नी आ गयी | संख्या भूल गया | पत्नी को मौन रहने का इशारा कर फिर से गिनना शुरू किया |
तभी बच्चे आ कर इतनी मुद्राएं देखकर चहकने लगे | गिनने में फिर व्यवधान आया |
व्यक्ति ने सबको डांट कर चुप कराया | फिर से गिनना शुरू किया | बड़ी मुश्किल से एक घंटे में वो गिन पाया कि 99 स्वर्ण मुद्राएं हैं |

उसे लगा उससे गिनने में कुछ भूल हुई है कोई 99 क्यों देगा सौ क्यों नहीं | फिर से गिना ... फिर गिना ... 99 ही  थीं |

उसे लगा आस –पास ही कहीं गिर गयीं होंगी | उसने ढूँढने की कोशिश की | सहायता के लिए पत्नी व् बच्चों को भी बुलाया | पर मुद्रा नहीं मिलनी थी तो नहीं मिलनी थी | दोपहर हो गयी | खेत में भी पानी देने नहीं जा सका था | बहुत ही निराश मन से उसने वो 99 स्वर्ण मुद्राएं अपनी अलमारी में रख लीं और मन ही मन सोचने लगा कि अब और मेहनत करूंगा और इन्हें पूरी 100 कर लूंगा |

अगले दिन से वो बहुत अधिक मेहनत करने लगा | दोपहर का खाना भी नहीं खाता , काम में ही लगा रहता | अलबत्ता शाम को आकर अपनी मुद्राएं गिनना नहीं भूलता |

एक दिन उसे दो मुद्राएं कम मिलीं | वो आगबबूला हो गया | फ़ौरन पत्नी को बुलाया |

पत्नी ने कहा कि घर  में कुछ जरूरी खर्च आ गया था | मैंने सोचा इतनी मुद्राय्वें तो रखी हैं इन्हीं में से दो ले लेते हैं | मैंने दो मुद्राओं में से ये परदे , खाने का सामान व् एक अंगूठी खरीदी है |
व्यक्ति का क्रोध बढ़ गया वो पत्नी पर पहली बार हाथ उठा कर बोला , “ नालायक औरत तेरे पास तो खर्च करने के आलावा कोई काम नहीं है | मैं कितनी मेहनत से इन्हें जमा कर रहा था और तूने बिना सोचे समझे दो उड़ा दी |


पत्नी रोने लगी |

व्यक्ति को अब तीन स्वर्ण मुद्राएं जमा करनी थीं | उसने मेहनत दुगनी कर दी |
इसी बीच उसने देखा कि दो मुद्राएं और कम हो गयीं हैं | इस बार वो मुद्राएं लेने वाले बच्चे थे |
बच्चों ने मासूमियत से कहा , “ पिताजी स्कूल की तरफ से आयोजन था | हमने अच्छे कपड़े लिए व् चंदे के लिए भी रूपये दिए | उसी में वो दो मुद्राएंमुद्राएं  खर्च हो गयीं |

अब तो उस व्यक्ति के गुस्से का परवार ही न रहा | अब उसे पूरी पांच मुद्राएं जमा करनी थी | सोच कर उसके दिमाग की नसे फटने लगीं |  गुस्से में चिल्लाते हुए उसने अपने बच्चों की पिटाई शुरू कर दी | बच्चे मम्मी बचाओ , मम्मी बचाओ , चिल्लाने लगे | बच्चों को बचाने के चक्कर में दो हाथ माँ को भी लग गए , वो गिर गयी , उसका सर फट गया | माँ का खून देखकर बच्चे पिता पर चिलाने लगे | पूरे घर में कोहराम मच गया |


ठीक उसी समय राजा अपने मंत्रियों के साथ उस घर में पहुंचा |

मंत्री हैरान थे | जो आदमी अपने परिवार के साथ इतना खुश रहता था | आज उसके घर में इतनी अशांति बिखरी हुई है | आखिर उन स्वर्ण मुद्राओं ने ऐसा क्या कर दिया ?
राजा मुस्कुरा कर बोला , “ कुछ नहीं , बस अब ये 99 क्लब का सदस्य बन गया |


मित्रों ये एक प्रेरक कथा है , जो हम सब को जीवन का आइना दिखाती है | हम सब भी कुछ जोड़ने के चक्कर में आज की खुशियाँ छोड़ते रहते हैं ... मसलन

कार आ जाए ... ख़ुशी तो उसमें है ... इसलिए उसके बाद खुश होऊंगा |
बच्चे का अच्छे स्कूल में सिलेक्शन हो जाए  उसके बाद खुश होऊँगा  |
IIT में सिलेक्शन के बाद खुश होऊंगा |
दादी बन जाऊं असली ख़ुशी तो तब आएगी |
खुशियाँ तो रिटायर मेंट के बाद की चीज है |


 ये सब यानि  कि हम सब 99 क्लब के सदस्य हैं जो अपनी खुशियाँ कल पर टालते रहते हैं .... इसलिए हमेशा ख़ुशी की कमी पड़ी रहती है | परिवार में झगडे होते हैं , मानसिक अशांति होती है , कई बार काम की अधिकता में शरीर के प्रति लापरवाही इतनी हो जाती है कि अनेक रोग घेर लेते हैं |
जब तक वो बहु प्रतीक्षित ख़ुशी मिलती है तब तक हम उसे भोगने लायक ही नहीं बचते या हमारे रिश्ते टूट चुके होते हैं | ऐसी ख़ुशी का क्या फायदा कह कर हम तब भी दुखी ही होते हैं |
तो जरूरत है आज और अभी छोटी –छोटी ख़ुशी पकड़ने की , उसको सँभालने की उसका मजा लेने की | आज का उगता सूरज , आज का डूबता सूरज , आज के बादल , ठंडी हवा या जाड़े की नर्म धुप सब विशेष है | उनका मजा आज ही लिया जा सकता है ... कल नहीं | याद रखिये ९९ का 100 कभी नहीं होगा ... पर हम 100 बनाने के चक्कर में कभी 99 का आनन्द भी नहीं ले पायेंगे|

अब ये कहानी पढ़कर आपको ख़ुशी हुई हो तो कमेंट कर हमारी भी ख़ुशी  बढाइये |

अटूट बंधन टीम 

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कहानी -गलती




आलीशान कोठी मे रहने वाले दम्पति की बडी खुशहाल फैमली थी।घर की साजो सामान से उनके रहन सहन का पता चलता था।घर के मालिक की उमर चालीस पैन्तालिस के आसपास थी।गठीले बदन घनी-घनी मूंछे उसके चेहरे का रौब बढा देती।रंग ज्यादा गोरा ना था पर फिर भी जंचता खूब था।अपना जमा जमाया बिजनेस था।घर मे विलासिता का सब सामान था।पत्नी भी सुन्दर मिली थी।होगी कोई चालीस बरस की।बडे नाजो मे रखी थी अपनी जीवन संगनी को।कुछ चंचल सी भी थी।पतिदेव को जो फरमाईश कर देती पूरी करवा कर दम लेती।कुल मिलाकर बडी परफैक्ट जोडी थी,यूं कहो मेड फार इच अदर थी।

शादी के दस साल बीत जाने के बाद भी जब कोई औलाद नही हुई तब उन दोनो ने एक बिटिया को गोद ले लिया था। बडा प्यार करते दोनो बिटिया को।मधुरिमा नाम रखा उसका।दिन रात वो दोनो बिटिया के आगे पीछे रहते।उसके लिये अलग कमरा,अलग अलमारी यानि जरूरतो का सारा सामान सजा रहता।दिन पर दिन वो बिटिया सुन्दर होती जा रही थी।गोरा सुन्दर रंग उस पर काले लम्बे बाल।सुन्दर सुन्दर पोशाको मे वो बिल्कुल परी जैसी दिखती।
मेरे पडोस मे ही उनकी कोठी थी। इस मिलनसार फैमली से मेरी खूब बनती।अक्सर छोटेपन मे मधुरिमा हमारे घर भी आती जाती।
समय पंख लगाकर उड रहा था।मधुरिमा अब दसवी क्लास मे पहुंच गयी थी।बडी मासूम व भोली मधुरिमा मुझे भी बहुत भाती।अच्छे स्कूल की कठिन पढाई से निजात पाने हेतु उसने दो-दो टयूशने भी लगा ली थी।सब बढिया चल रहा था।आये दिन उनके घर कोई ना कोई फंक्शन होता,पूरा परिवार चहकता दिखता। हर साल मधुरिमा का जन्मदिन बडे होटल मे मनाया जाता। उस दिन मुझे अचानक किसी काम से उनके घर जाना हुआ,तकरीबन ग्यारह बज रहे थे सुबह के।आतिथ्य सत्कार के बाद मै बैठी हुई थी कि मधुरिमा को उसकी मम्मी ने आवाज लगाई......
मंमी--बेटी उठ जा,ग्यारह बज चुके है!नाश्ता कर लो आकर। मधुरिमा---(चुपचाप सोती रही) मंमी--बेटी उठ जा,कितनी देर से जगा रही हूं!!! मधुरिमा--आंखे खोल कर,,,,मंमी की ओर मुंहकर गुस्से से चिल्लाई--मुझे नही करना नाशता वाशता। मुझे सोने दो,आज मेरी छुट्टी है,मुझे केवल टयूशन जाना है। मंमी झेप सी गयी व चुप हो गयी,और मेरे पास आकर बातचीत करने लगी।थोडी देर मे वो काटने के लिये सब्जियाँ भी उठा लायी और काटने लगी।तभी मैने उठना चाहा पर उन्होने जबरदस्ती से फिर मुझे अपने पास बिठा लिया।हम दोनो बातो मे लग गये।
‌देखते ही देखते दो घंटे बीत गये । मधुरिमा की मम्मी ने किचन मे आकर दोपहर का लंच भी तैयार कर दिया था क्योकि उनके पति का डिफिन लेने नोकर आने वाला था।अब एक बजे फिर से मधुरिमा की मम्मी ने बिटिया को उठाने का उपक्रम किया,मगर फिर वही ढाक के तीन पात।हार कर मैनै भी कह ही दिया कि ये इतना सोयेगी,तो कल क्या करेगी?जब स्कूल जाना होगा। उसकी मम्मी बतलाने लगी,छुट्टी के दिन तो ये हमारी बिल्कुल नही सुनती,कहती है मै तो आज ज्यादा सोऊगी।देखना,अभी टयूशन का टाईम होगा तो अपने आप उठेगी।एक बार तो मैने भी मधुरिमा के कमरे का जायजा लिया,देखती क्या हुं,मधुरिमा आंख खोल कर अपने मोबाईल पर टाईम देख ले रही है और फिर सो जाती।
‌अपने पति का टिफिन नौकर को देकर अब मधुरिमा की मम्मी ने मधुरिमा को उठाने का फैसला किया!लगता था अब उन्हे गुस्सा आ रहा था।हार कर अब मधुरिमा उठी और राकेट की तरह बाथरूम मे घुस गयी।तुरन्त नहाकर टयूशन जाने के लिये तैयार होने लगी।जब वो तैयार हो रही थी तभी उसे घर के बाहर किसी चाट पकोडी बेचने वाले की आवाज सुनाई दी,वो मुस्कुरा दी। ‌मम्मी ने बार-बार लंच करने को कहा,तो हंसकर मधुरिमा ने कहा-मुझे तो चाट-पकोडी खानी है।मम्मी ने समझाईश देनी चाही। मम्मी -बेटी मैने तेरी पसन्द का लंच बनाया,सुबह का नाश्ता भी तेरी पसन्द का बनाया,और तूने चखा भी नही।अब चाट-पकोडी की फरमाईश कर रही है। बिटिया-मम्मी मुझे कुछ नही पता,मैनै जो मांगा है वही मंगाकर दो।सुना आपने। हार कर मम्मी ने नोकर को भेजकर चाट-पकोडी मंगवाई जिसे लेकर वो मेरे सामने दूसरे कमरे मे बैठकर खाकर खुश होकर बुक्स हाथ मे लेकर अपनी स्कूटी स्टार्ट कर टयूशन के लिये निकल गयी।

मैं सोचने लगी,मधुरिमा जैसी लडकियां जो अपनी मां का कहना नही मानती,ससुराल मे जाकर किस तरह सेटल होगी,कुसूर किसका है?क्या मां बाप के ज्यादा लाड प्यार का?अथवा मां ने ज्यादा ही सिर पर बैठा लिया?

जो मां अपनी बेटी की जमीन शादी से पहले तैयार नही करती,क्या वो शादी के बाद ससुराल मे समायोजन कर पायेगी।मायके मे सब इतना नाज नखरा सहन करेगे क्या ससुराल मे भी ऐसा हो पायेगा?युवा होती इस बिटिया ने मेरे सामने किचन मे झांका तक नही,कया वो हकीकत की दुनिया मे अपने ससुराल जाकर किचन मे पारंगत हो पायेगी।माता-पिता अपने जीवन की सारी पूंजी लगाकर भी क्या अपनी बेटी की खुशियां खरीद पायेगे,हकीकत मे वो एक सुखद गृहस्थी की तारनहार हो पायेगी,?ऐसे अनसुलझे सवालो को लेकर मै अपने घर लौट आयी थी।

रीतू गुलाटी

लेखिका -रीतू गुलाटी

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प्रेरक कथा -विश्वास करें ये काम करता है


कल बच्चों का खेल देख रही थी | कुछ ईंटों जैसे ब्लॉक्स थे जो इस प्रकार रखे थे कि एक ईंट हटाते ही उसके आगे की सारी ईंटे एक -एक करके गिरने लगती थीं | जैसे लाल ईंट हटाई तो आगे कि सारी लाल ईंटे एक -एक कर गिरने लगती थीं यही हाल पीली नीली और सफ़ेद ईंटों का भी था | बच्चा बहुत सावधानी से खेल रहा था  क्योंकि एक भी गलत रंग की ईंट गिर गयी तो आगे ढेर सारी गलत ईंटों का गिरना रोका नहीं जा सकता था | थोड़ी देर तक देखने के बाद मुझे लगा ये खेल नहीं जिन्दगी है | कई बार -एक सही या गलत कदम थोड़े समय तक के लिए आगे के रास्ते बिलकुल तय कर देता है .... सारी ईंटे एक ही दिशा में गिरती जाती हैं हम चाह  कर भी रोक नहीं पाते | वो एक सही या गलत ईंट हमारी जिन्दगी की कुछ समय तक के लिए दिशा तय कर देती है | क्या ये सही ईंट गिराना हमारे हाथ में होता है ?कई लोग इसी डर से कि कहीं गलत ईंट ना गिर जाए खेल में प्रवेश ही नहीं करते | बहुत प्रतिभा और क्षमता होते हुए भी किनारे ही खड़े रह जाते हैं | ऐसे समय में बहुत जरूरत होती है किसी ऐसे व्यक्ति कि जो ईंट गिराने को तैयार खिलाड़ी से यह कह दे , " विश्वास करें , ये काम करता है |" समाज में जितना महत्व सफल व्यक्तियों का है उससे कम महत्व उन व्यक्तियों का नहीं है जो सही ईंट गिराने की प्रेरणा  देते हैं|

बहुत छोटे स्तर पर ही सही पर एक दूसरे को प्रोत्साहन देने की, उनमें विश्वास जगाने की ये कड़ी रुकनी नहीं चाहिए | आज एक ऐसी ही प्रेरक कथा ले कर आयीं हैं नीलम गुप्ता जी ...

विश्वास करें ये काम करता है


बहुत समय पहले ही बात है , इक व्यक्ति रेगिस्तान में रास्ता भटक गया |  उसके पास जितना पानी था था खत्म हो गया | प्यास के मारे उसका गला सूख रहा था पर दूर -दूर तक सिर्फ रेत ही रेत दिखाई दे रही थी | तभी दूर उसे एक झोपड़ी नज़र आई | पहले तो उसे लगा कि इस रेतीले इलाके में भला झोपड़ी कैसे होगी , हो न हो ये उसका मति भ्रम है | फिर भी उसके पास उस दिशा में आगे बढ़ने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं था | जैसे -तैसे वो अपनी पूरी शक्ति लगा कर आगे बढ़ने लगा | हर कदम पर अगला कदम उठाना मुश्किल हो रहा था | फिर भी उसने हिम्मत नहीं हारी और झोपडी की दिशा में आगे बढ़ गया |


जैसे -जैसे वो पास जा रहा था , झोपडी और साफ़ दिखाई देने लगी थी | अब उसे विश्वास हो गया किवहां झोपडी अवश्य है | उम्मीद जगी कि शायद  वहां कोई रहता हो , जो उसे पीने को पानी दे सके व्उसकी प्यास बुझा सके|
अब वो बची खुची शक्त का इस्तेमाल कर झोपडी की और बढ़ने लगा | झोपड़ी के पास पहुँचने  पर उसने देखा कि झोपडी के बाहर एक हैंड पंप लगा है | ख़ुशी के कारण उसकी चीख निकल गयी | वो जल्दी से जाकर हैंड पंप चलाने लगा .....पर पानी की एक बूँद भी ना निकली | वो और जोर लगाता .... और जोर ,पर पानी था कि निकलने  का नाम ही नहीं ले रहा था | वो पसीने -पसीने हो गया , उसकी रही सही हिम्मत भी जाती रही |



थक हार कर उसने पंप चलाना बंद कर दिया |  उसके शरीर का बहुत सारा पानी पसीने के रूप में निकल चुका था | वो समझ गया कि अब उसका बिना पानी के इस रेगिस्तान से निकलना नामुमकिन है | उसकी आँखें भर आयीं | निराशा में उसने झोपडी केव अंदर कुछ देर विश्राम करने का मन बनाया | वो दुखी मन से जब झोपडी के अंदर गया तो उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं  रहा , क्योंकि  वहां किसी ने एक हुक से एक बोतल लटका रखी थी जिसमें पानी भरा हुआ था | बोतल में कॉर्क लगी हुई थी | व्यक्ति की जान में जान आई | इतना पानी पी कर कम से कम वो कुछ दूर जा सकता था | आगे शायद और पानी मिल जाए , ये उम्मीद तो थी ही |


उसने झटके से बोतल हुक से निकाल ली | वो पानी पीने ही वाला था कि उसे बोतल पर एक स्लिप दिखाई दी | जिसमें लिखा था ," इस पानी को हैण्ड पम्प के ऊपरी छेद में डाल दें और जाते समय ये बोतल भर कर यहाँ ऐसे ही लटका दें |

नोट पढ़कर व्यक्ति घबरा गया | अगर उसने ये पानी भी छोड़ दिया तो उसकी मृत्यु निश्चित है | अगर उसने ये पानी पम्प में डाला और पम्प चल गया तो ना सिर्फ वो पेट भर पानी पी पायेगा बल्कि आगे के रास्ते के लिए भर भी पायेगा | व्यक्ति असमंजस में पड़ गया | क्या करें क्या ना करे | एक तरफ निश्चित मृत्यु दिखाई दे रही थी .... एक तरफ जीवन की सम्भावना थी |

बहुत देर तक अपने विचारों में जूझने के बाद उसने पानी पम्प में डालने का फैसला किया | पानी डालने के बाद उसने पम्प चलाया | पम्प से मोटी धार पानी की गिरने लगी | उसने ढेर सारा पानी पिया ,  आगे के सफ़र के लिए पानी अपने पास रखा , उस बोतल में पानी भरा और जब अन्दर बोतल को उसे हुक पर लटकाने आया तो उसे हुक के पास एक नोट दिखाई दिया | उसने गौर से देखा उस नोट में रेगिस्तान से बाहर निकलने का रास्ता दिया हुआ था | 


व्यक्ति ने बोतल की कॉर्क बंद करके उसेवैसे ही लटका दिया | वो झोपडी से बाहर निकलने जाने लगा , तभी ठिठका और बोतल उतार कर उस पर चिपके कागज़ के ऊपर उसने उस नोट के आगे लिखने शुरू किया , " मेरा विश्वास करें ये काम करता है |" उसके नीचे उसने अपने दस्तखत कर दिए . और आगे के सफर पर चल पड़ा |


मित्रों बोतल पर नोट तो पहले ही लिखा था पर जिस घबराहट व् भय से वो गुज़रा था , उससे किसी को दुबारा ना गुज़ारना पड़े इसके लिए उसने आगे नोट लिखा था ताकी मदद का ये सिलसिला टूटे नहीं | कई बार एक छोटा सा विश्वास इंसान से असंभव कार्य करवा देता है | हम सब किसी के अन्दर ये विश्वास भर सकें ... ताकि मानवता की ये कड़ी टूटे नहीं |

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कविता किताबें


ऑनलाइन पढने में और किताब हाथ लेकर पढने में वहीँ अंतर है जो किसी मित्र से रूबरू मिलने और फोन पर बात करने में है | ऑनलाइन रीडिंग की सुविधाओं के साथ कुछ तो है जो अनछुआ रह जाता हैं | एक तरफ हम  उन भावों की कमी से जूझते रहते हैं , दूसरी तरफ किताबिन शोव्केस में सजी हमारा रास्ता निहारी रहतीं हैं | क्या कहतीं हैं वो ....वक्त मिले तो पास बैठ कर सुनियेगा ....

किताबें 


किताबें  सबसे प्रिय मित्र ,संगी- साथी और मार्गदर्शक होते थे उन दिनों । 
बचपन में लोरी बन कर हमें हंसाते थे , गुदगुदाते थे , बहलाते थे , सुलाते थे ।

जवानी में लिपटकर सीने से 
कल के सपने सजाते थे
रूमानी ख़्वाब दिखाते थे तो कभी डाकिया बन जाते थे । 

बुढ़ापे के अकेलेपन में 
गीता के श्लोक सुनाते थे, जीने की राह दिखाते थे ,  ईश्वर से मिलाते थे । 

पर आजकल डिजिटल संसार में 
सबसे कोने वाली सेल्फ में 
सजी रहती है किताबें 
आते जाते सबको तकती रहती है किताबें 
ज़रा ग़ौर से सुनो तो 
कितना कुछ कहती रहती है किताबें । 

साधना सिंह
गोरखपुर


लेखिका साधना सिंह



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कहानी -वो व्हाट्स एप मेसेज

                     जिसने दो साल तक कोई खोज खबर न ली हो .... अचानक से उसका व्हाट्स एप मेसेज दिल में ना जाने कितने सवालों को भर देता है | क्या एक बार  रिश्तों को छोड़ कर भाग जाने वाला पुन : समर्पित हो सकता है |

वो व्हाट्स एप मेसेज 


३१ दिसम्बर रात के ठीक बारह बजे सुमी के मोबाइल पर व्हाट्स एप मेसेजेस की टिंग -टिंग बजनी शुरू हो गयी | मित्रों और परिवार के लोगों को हैप्पी न्यू  इयर का आदान -प्रदान करते हुए अचानक सौरभ के मेसेज को देख वो चौंक गयी | पूरे दो साल में यह पहला मौका था जब  सौरभ ने उससे कांटेक्ट करने की कोशिश की थी |

सुमी ने धडकते दिल से मेसेज खोला और मेसेज पढना शुरू किया , " हैप्पी न्यू इयर सुमी , मैं वापस आ रहा हूँ , तुम्हारे पास , फिर कभी ना जाने के लिए " उसके नीचे ढेर सारे दिल बने थे | ना चाहते हुए भी सुमी की आँखें भर आयीं | मन दो साल पीछे चला गया |

वो दिसंबर की ही कोई सुबह थी , जब वो गुनगुनी धूप में पूजा के लिए फूल तोड़ रही थी , तभी सौरभ ने आकर उसके जीवन में कोहरा भर दिया | सौरभ उसके पास आकर बोला , " सुमी , मैं कल अपनी सेक्रेटरी मीनल के साथ अमेरिका जा रहा हूँ | अब मैं वहां उसी के साथ रहूँगा ,तुम्हारे लिए बैंक में रुपये छोड़े जा रहा हूँ , अब मेरी जिन्दगी में तुम्हारी कोई जगह नहीं है | वहीँ की वहीँ खड़ी  रह गयी थी सुमी , सँभलने का मौका भी नहीं दिया उसने | सारे फोन कनेक्शन काट लिए , ना कोई प्रश्न पूछा और ना ही किसी बात का उत्तर देने का कोई मौका ही दिया |

दो साल ... हाँ पूरे दो साल इसी प्रश्न से जूझती रही कि तीन साल की सेजल और डेढ़ साल के गोलू  ,  -घर -परिवार और सौरभ की हर फरमाइश के लिए दिन भर चक्करघिन्नी की तरह नाचने के बावजूद आखिर क्या कमी रह गयी उसके प्रेम व् समर्पण में कि सौरभ उसके हाथ से फिसल कर अपनी सेक्रेटरी के हाथ में चला गया | महीनों बिस्तर पर औंधी पड़ी जल बिन मछली की तरह तडपती थी , उस वजह को जानने के लिए , ये सिर्फ प्रेम में धोखा ही नहीं था उसके आत्मसम्मान को धक्का भी लगा था  | सहेलियों ने ही संभाला था , उस समय  सेजल व् गोलू को | उसे भी समझातीं थीं ," वो तेरे लायक नहीं था , कायर था , आवारा बादल .... क्या कोई वजह होती तब तो बताता, तू भी सोचना छोड़, भूल जा उस बेवफा को  |

 धीरे -धीरे उसने खुद को संभाला , एक स्कूल में पढ़ाना  शुरू किया | जिन्दगी की गाडी पटरी पर आई ही थी कि ये मेसेज | थोड़ी देर मंथन के बाद अपने को संयत कर  उसने मेसेज टाइप  करना शुरू किया , " सौरभ , वक्त के साथ बहुत कुछ बदल जाता है , कल तुम आगे बढ़ गए थे पर आज मैं भी वहीँ खड़ी हुई नहीं  हूँ कि तुम लौटो और मैं मिल जाऊं , अब  मैंने  आत्मसम्मान से जीना सीख लिया है अब मेरी जिंदगी में तुम्हारी कोई जगह नहीं है |


मेसेज सेंड करने के बाद उसके मन में अजीब सी शांति मिली | खिड़की से हल्की -हलकी  रोशिनी कमरे में आने लगी नए साल का नया सवेरा हो चुका था |

वंदना बाजपेयी

सुरभि में प्रकाशित

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हिन्दी के पाणिनी आचार्य श्री किशोरीदास  बाजपेयी : संस्मरण


आचार्य श्री किशोरीदास बाजपेयी को हिंदी भाषा का पाणिनि भी कहा जाता है | उन्होंने हिंदी को परिष्कृत रूप में प्रस्तुत किया | उससे पहले खड़ी बोली का चलन तो था पर उसका कोई व्यवस्थित व्याकरण नहीं था | इन्होने अपने अथक प्रयास से व्याकरण का एक सुव्यवस्थित रूप निर्धारित कर हिंदी भाषा का परिष्कार किया और साथ ही नए मानदंड भी स्थापित किये , जिससे भाषा को एक नया स्वरुप मिला | 


        हिंदी के साहित्यकार व् सुप्रसिद्ध व्याकरणाचारी आचार्य श्री किशोरी दस बाजपेयी जी का जन्म १५ दिसंबर १८९५ में कानपूर के बिठूर के पास मंधना के गाँव रामनगर में हुआ था | उन्होंने न केवल व्याकरण क्षेत्र में काम किया अपितु आलोचना के क्षेत्र में भी शास्त्रीय सिधान्तों का प्रतिपादन कर मानदंड स्थापित किये | प्रस्तुत है उनके बारे में कुछ रोचक बातें .... 


हिन्दी के पाणिनी आचार्य श्री किशोरीदास  बाजपेयी :

                                               फोटो -विकिपीडिया से साभार

हिन्दी के पाणिनी आचार्य श्री किशोरीदास  बाजपेयी : संस्मरण


                         
हिन्दी के पाणिनी कहे जाने वाले 'दादाजी' यानी आचार्य श्री किशोरीदास जी बाजपेयी के बारे में तब पहली बार जाना जब वह हमारे घर पर अपनी छोटी बेटी (मेरी भाभी) का रिश्ता मेरे म॓झले भाई साहब के लिए लेकर आए।हमारे बड़े भाई साहब उनकी बातों से बहुत प्रभावित हुए। इस सिलसिले में शादी से पूर्व उनका कई बार हमारे घर आना हुआ
और हर बार वह अपने व्यक्तित्व की एक नई छाप छोड़ गए।तब हमने जाना कि वह बात के पक्के हैं और उनके व्यक्तित्व में एक ऐसा खरापन है जो सभी को ऊपनी ओर आकृष्ट करता है।
                         
उन्ही दिनों के आस-पास 'वैद्यनाथ' वालों की ओर से दादा जी का अभिनन्दन किया गया जिसमें उन्हे ग्यारह हजार रुपये प्रदान किए गए। इस अभिनन्दन के पश्चात जब वह हमारे घर आए तो उन्होने कहा कि वह यह ग्यारह हजार रुपये अपनी बेटी की शादी में खर्च करेगें और अगर यह रुपये चोरी हो गए तो कुछ भी खर्च नहीं करेगें।उनकी इस साफगोई और खरेपन को लेकर हमारे घर में कुछ दिनों खूब विनोदपूर्ण वातावरण रहा।
                            
उन्होने कहा,बारात कम लाई जाए लेकिन स्टेशन पर पहुँचने से लेकर वापिस स्टेशन आने तक वह हम लोगों से कुछ भी खर्च नहीं करवाएगें। बारात में कुल बीस- पच्चीस लोग ही गए।लेकिन उन्होने हरिद्वार स्टेशन पर उतरते ही सवारी से लेकर बैंड-बाजे आदि का कुछ भी खर्च हमारी ओर से नहीं होने दिया।उन्होंने शादी शानदार ढंग से निपटाई।भोजन और मिष्ठान्न सभी कुछ देशी घी में बने थे।जो मिठाई उन्होने हमारे घर भिजवाई,वह भी सब शुद्ध देशी घी में बनी थी।उनके द्वारा भिजवाई गई मिठाइयों में पूड़ी के बराबर की चन्द्रकला का स्वाद तो मुझे आज भी याद है।गर्मियों के दिन थे।उन्होने हमारे घर पर बहुत अधिक पकवान व मिठाइयाँ भिजवा दी थीं।माँ ने तुरन्त ही सब बँटवा दीं।आज भी सब रिश्तेदार और मुहल्ले वाले उन मिठाइयों की याद कर लेते हैं।
                          
गर्मियों की छुट्टियों मैं मैं एक महिने भाभी के साथ कनखल में रही। दादाजी सुबह चार बजे उठ जाते और भगोने में चाय चढ़ा देते। वह चाय पीकर मुझे जगा देते और अपने साथ टहलने ले जाते। हम ज्वालापुर तक टहलने जाते। टहलते समय दादा जी मुझे खूब मजेदार बातें बताते। वह कहते , 'जाको मारा चाहिए बिन लाठी बिन घाव, वाको यही सिखाइए भइया घुइयाँ पूड़ी खाव।' फिर हँस कर कहते कि उन्हे घुइयाँ पूड़ी बहुत पसंद हैं।
                                 
एक बार जब वे अंग्रेजों के समय जेल में बन्द थे, उनकी कचेहरी में पेशी हुई। पेशी के लिए जज के समक्ष जाते समय पेशकार ने पैसों के लिए अपनी पीठ के पीछे हाथ पसार दिए। दादा जी ने उसकी गदेली पर थूक दिया। वह तुरन्त अपना हाथ पोंछकर जज के सामने खड़ा हो गया।
                                   
जब हम टहल कर आते , दादा जी नाश्ते में पंजीरी (भुना आटा और बूरा ) में देशी घी डलवा कर लड्डू बनवाते जो एक गिलास ताजे दूध के साथ मुझे नाश्ते में मिलता। यह रोज का नियम था। वह मेरा विशेष ख्याल रखते। जब तक मैं कनखल में रही, दादा जी मेरे लिए मिठाई लाते और मिठाई में अक्सर चन्द्रकला होती।फलों में उन्हे खरबूजा , ककड़ी और देशी आम पसन्द थे। किन्तु हम सबके लिए केला, सन्तरा आदि मौसमी फल भी लाते। आम को वह आम जनता का फल बताते थे।खाने के साथ उन्हे अनारदाने की चटनी बहुत पसंद थी।
                                   
टहल कर आने के पश्चात दादा जी लिखने का कार्य करते। भोजन करके वह कुछ देर विश्राम करते।तत्पश्चात वह हरिद्वार,श्रवणनाथ ज्ञान म॓दिर पुस्तकालय जाते।यह उनका प्रतिदिन का नियम था। रात में वह कहीं नहीं जाते थे। वह कहते,'दिया बाती जले मद्द (मर्द) मानस घर में भले।'
                                    
जब वह हमारे घर कानपुर आते, हम सब उनसे मजेदार किस्से सुनने के लिए उन्हे घेर कर बैठ जाते। ऐसे ही एक समय उन्होने बताया कि एक बार जब वह ट्रेन से जा रहे थे तो उन्होने अपने सामने की सीट पर बैठे व्यक्ति से बात करने की गरज से पूछा कि वह कहाँ जा रहे हैं? उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। ऐसा तीन बार हुआ। अवश्य ही इस व्यक्ति ने धोती कुरता पहने हुए दादा जी को गाँव का कोई साधारण गँवार समझा होगा। जब उन्होने देखा कि यह व्यक्ति बात नहीं करना चाहता तो वह अपनी सीट पर बिस्तर बिछा कर सो गए। सुबह होने पर उन्होने एक केतली चाय, टोस्ट, मक्खन मँगाया और नाश्ता करने लगे।इसी बीच यह व्यक्ति दादा जी से पूछने लगा कि उन्हे कहाँ जाना है? दादा जी ने कोई जवाब नहीं दिया तथा उसकी ओर अपनी पीठ कर ली। ऐसा दो बार हुआ। तीसरी बार वह व्यक्ति जरा जोर से बोला, 'क्या आप ऊँचा सुनते हैं? 'अब दादा जी उसकी ओर मुँह घुमा कर बोले, 'आप मुझसे कहाँ बात कर रहे हैं? आप तो मेरे टोस्ट मक्खन सै बात कर रहे हैं।' रात को जब मैंने आपसे बात करने की कोशिश की, आपने कोई जवाब नहीं दिया। ' वह व्यक्ति बड़ा शर्मिन्दा हुआ।किन्तु पीछे की सीट पर बैठे हुए शुक्ला जी ने उनकी बात सुन ली और कहा, 'अरे यह तो बाजपेयी जी लगते हैं।' दादा जी ने जोर से कहा,'अब तुम्हे भी बाजपेयी जी दिखाई पड़ गए।'उनके इतना कहते ही कई लोग अपनी सीट से उतर कर उनके आस- पास जमा हो गए और उनसे कुछ नई बात बताने का आग्रह करने लगे। उन्होने कहा, 'गुरू-दक्षिणा देनी पड़ेगी।' सबने कहा,'मिलेगी।'इतना बताने के पश्चात दादाजी ने बड़े भाव विभोर होकरआदरणीय मालवीय जी को हाथ जोड़ कर नमन करते हुए कहा कि गीता के जिस श्लोक का अर्थ मालवीय जी ने उस तरीके से नहीं समझा जिसका अर्थ मुझे उसी समय ट्रेन में समझ में आया।ऐसा कह कर उन्होने वह श्लोक कहा (जो आज मुझे याद नहीं ) जिसका अर्थ यह था कि,' स्वतन्त्र कौन है?' फिर उन्होने उन सबको उसकी व्याख्या करके बताया। सभी व्यक्ति उनकी व्यख्या सुन कर अत्यन्त प्रसन्न हुए और स्टेशन आने पर उनका जो भी सामान था,सबने एक-एक उठा लिया । जब वह स्टेशन पर उतर कर खड़े हुए, लोगों ने मुस्करा कर कहा, 'गुरू जी ,आपकी दक्षिणा अदा हो गई या नहीं?' उन्होंने मुस्कराते हुए कहा ,'हो गई।'
                             मुझे बेटा होने की खबर जब उन्हे मिली तो उन्होने पत्र  लिखा ,'यह जान कर बड़ी प्रसन्नता हुई कि चिं0 उषा को 'प्रभात' मिला।बड़े भाई साहब ने कहा कि दादा जी द्वारा दिया गया नाम है।इस नाम के साथ दादा जी की याद जुड़ी रहेगी और उनका आशीर्वाद भी। हमने बेटे का नाम प्रभात रख दिया ।उनका आशीर्वाद खूब फला - फूला।
                      
एक बार भाई साहब के साथ वह मेरे घर मिलने आए।उन्होने मुझे रूपए दिए और कहा,'बच्चों के लिए मिठाई मंगा लेना,कुछ लेकर नहीं आया हूँ। मैने उन्हे नाश्ता कराया।कुछ देर बाद मुझे ध्यान आया कि सेब रक्खे रह गए,मैं काटना भूल गई। मैंने दादा जी से कहा,'मैं अभी सेब काट कर लाती हूँ तब उन्होने हंस कर कहा, 'रहने दे उषा, तुझे देने के लिए अब मेरे पास और पैसे नहीं हैं।'
                        
जब भारत के प्रथान-मंत्री द्वारा उनका अभिनंदन किया जा रहा था, स्टेज पर न जाकर वह  अपनी कुर्सी पर बैठे रहे, तब प्रधान मंत्री मोरार जी देसाई स्वयं मंच से उतर कर आए और उन्होने जहाँ पर वह बैठे थे, वहीं पर उन्हे सम्मानित किया ।
                 
ऐसे थे दादा जी।
                             
              
उषा अवस्थी
           
 गोमती नगर ,
          
लखनऊ ( उ0 प्र0 )


लेखिका -उषा अवस्थी


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कहानी -सिस्टर्स मैचिंग सेंटर

वरिष्ठ लेखिका दीपक शर्मा जी की कहानी सिस्टर्ज़ मैचिन्ग सेन्टर उनकी अन्य कहानियों की तरह अपने नाम को अर्थ देती है | दीपक शर्मा जी बेहतरीन  कहानियाँ ही नहीं लिखती वो उनके नामों पर भी बहुत मेहनत करती हैं | सिस्टर्ज़ मैचिन्ग सेन्टर भी एक ऐसी ही कहानी हुई जहाँ साड़ियों की मैचिंग के साथ -साथ दो बहनों के जीवन साथी की मैचिंग की भी कोशिश उनके पिता द्वरा की जाती है | बहुत कसी हुई ये कहानी जहाँ एक ओर अपनी बेटी के लिए अच्छा वर खोजने की पिता की कसक दिखाती है वहीँ बड़ी बहन का अपनी छोटी बहन को लायक  बनाने का संकल्प प्रदर्शित करती है | इस तरह से कहानी बहुत ही मुलायमियत से  पाठकों के मन में सपनों के लिए परम्पराओं से संघर्ष करती स्त्री की कोशिशों की गहरी चोट करती है | 

सिस्टर्ज़ मैचिन्ग सेन्टर



कस्बापुरके कपड़ा बाज़ार का ‘सिस्टर्ज़ मैचिग सेन्टर’ बाबूजी का है|
सन्तान के नाम पर बाबूजी के पास हमीं दो बहनें हैं : जीजी और मैं|


जीजी मुझ से पाँच साल बड़ीहैं और मुझे उन्हीं ने बड़ा किया है| हमारी माँ मेरेजन्मके साथ ही स्वर्ग सिधार ली थीं| हमारे मैचिनग सेन्टर व बाबूजी को भी जीजी ही सँभालती हैं| बाबूजी की एक आँख की ज्योति तो उनके पैंतीसवें साल ही में उन से विदा ले ली थी|

क्रोनिक ओपन-एंगल ग्लोकोमा के चलते|

और बाबूजी अभी चालीस पार भी न किए थे कि उनकेबढ़ रहे अंधेपन के कारण उस कताई के कारखाने सेउनकी छंटनी कर दी गयी थी जिस के ब्रेकर पर बाबूजीपूनी की कार्डिंग व कोम्बिंग से धागा बनाने का काम करते रहे थे| पिछले बाइस वर्षों से|
ऐसे में सीमित अपनी पूँजी दाँव पर लगा कर बाबूजी ने जो दुकान जा खोली तो जीजी ही आगे बढ़ीं| पढ़ाई छोड़ कर|


दुकानबीच बाज़ार में पड़ती है और घर हमारा गली में है| बाबूजीको घर से बाज़ार तक पहुँचाना जीजी के ज़िम्मे है| छड़ी थामकर बाबूजी जीजी के साथ साथ चलते हैं| जहाँ उन्हें ज़रुरत महसूस होती है जीजी उनकी छड़ी पकड़ लेती हैं या फिर उनका हाथ|

दुकान भी जीजी ही खोलती हैं| फ़र्श पर झाड़ू व वाइपर खुद ही फेरती हैंव मेज़ तथा कपड़ों के थानों पर झाड़न भी| जब तक बाबूजी बाहर चहलकदमी करते करते पास-पड़ोस केदुकानदारोंकी चहल-पहल व बत-रस का आनन्द ले लेते हैं|

स्कूल से मैं सीधी वहीं जा निकलती हूँ|

जीजी का तैयार किया गया टिफ़िन मेरे पहुँचने पर ही खोला जाता है| जीजी पहले बाबूजी को परोसती हैं, फिर मुझे| हमारे साथ नहीं खातीं| नहीं चाहतीं कोई ग्राहक आए और दुकान का कोई कपड़ा-लत्ता बिकने से वंचित रह जाए|

बल्कि इधर तो कुछ माह से हमारी गाहकतायी पच्चीस-तीस प्रतिशत तक बढ़ आयी है|
जब से फैनसी साड़ी स्टोर में एक नया सेल्ज़मैन आ जुड़ा है| बेशक हम दोनों की दुकानें कुल जमा चार गज़ की दूरीपर एक ही सड़क का पता रखती रही हैं, लेकिनयह मानी हुई बात है कि किशोर नाम के इस सेल्ज़मैन के आने से पहले हमारे बीचकोईहेल-मेल न रहा था| पिछले पूरे सभीतीन सालों में|

मगर अब फैनसी साड़ी स्टोर की ग्राहिकाए वहाँसेहमारेमैचिनग सेन्टरही का रुख लेती हैं|
कभी अकेली तो कभी किशोर की संगति में|

अकेली हों तो भी आते ही अपनी साड़ी हमें दिखाती हैं औरविशेष कपड़े की मांग हमारे सामने रखती हैं: “शिफ़न की इस साड़ी के साथ मुझे साटन का या क्रेप ही का पेटीकोट लेना हैऔर ब्लाउज़ भीडकरोन या कोडेल का.....”

किशोर साथ में होता है तो सविस्तार कपड़े के बारे में लम्बे व्यौरे भी दे बैठता है, “देखिए सिस्टर, इसऔरगज़ा के साथ तो आप डाएनेल का पेटीकोट और पोलिस्टर का ब्लाउज़ या फिर प्लेन वीवटेबी का पेटीकोट और ट्विलका ब्लाउज़ लीजिए, जिस के ताने की भरनी में एक सूत है और बाने की भरनी में दो सूत.....”

हम बहनें अकसर हँसती हैं,

कस्बापुर निवासिनियों कोयह अहसास दिलाने में ज़रूर किशोर ही का हाथ है कि साड़ी की शोभा उसके रंग और डिज़ाइन से मेल खाते सहायक कपड़े पहनने से दुगुना-चौगुना प्रभाव ग्रहण कर लेती है|

जभी साड़ीवाली कई स्त्रियों के बटुओं की अच्छी खासी रकम हमारे हाथों में पहुँचनेलगी है|
काउन्टर पर बैठे बाबूजी को रकम पकड़ाते समय मैं तो कई बार पूछ भी लेती हूँ, “फैनसी वाला यह सेल्ज़मैन क्या सब सही सही बोलता है या फिर भोली भाली उन ग्राहिकाओं को बहका लिवा लाता है?”

जवाब में बाबूजी मुस्करा दिया करते हैं, “नहीं जानकार तो वह है| बताया करता है यहाँ आने से पहले वह एक ड्राइक्लीनिंग की दुकान पर ब्लीचिंग का काम करता था औरलगभग सभी तरह के कपड़ों के ट्रेडमार्क और ब्रैनड पहचान लेता है.....”

कपड़े की पहचान तो बाबूजी को भी खूब है| दुकान के लिए सारा कपड़ा वही खरीदते हैं| हाथ में लेते हैं और जान जाते हैं, ‘यह मर्सिराइज़ड कॉटन है| इसे कास्टिक सोडा सेट्रीट किया गयाहै| इसका रंग फेड होने वाला नहीं.....”

या फिर, ‘यह रेयन है| असली रेशम नहीं| इसमें सिन्थेटिकमिला है, नायलोन या टेरिलीन.....’

या फिर, ‘यह एक्रीलीन बड़ी जल्दी सिकुड़ जाता है या फिर ताने से पसर जाता है.....’

“क्यों किशोरीलाल?” बाबूजी किशोर को इसी सम्बोधन से पुकारते हैं, “तुम यहाँ बैठना चाहोगे? हमारे साथ?”

उस दिन किशोर ने अपने फैनसी साड़ी स्टोर से दहेज़ स्वरुप खरीदी गयी एक ग्राहिका कीसात साड़ियों के पेटीकोट और ब्लाउज़ एक साथ हमारे मैचिनग सेन्टर से बिकवाए हैं और बाबूजी खूब प्रसन्न एवं उत्साहित हैं|

“किस नाते?” जीजीदुकान के अन्तिम सिरे पर स्टॉक रजिस्टर की कॉस्ट प्राइस और लिस्ट प्राइस में उलझे होने के बावजूद बोल उठी हैं, “हमारीहैसियत अभी नौकर रखने की नहीं.....”
“तुम अपना काम देखो,” बाबूजी ने जीजी कोडाट दियाहै, “हमआपसमेंबातकर रहे हैं.....”

थान समेट रहे मेरे हाथ भी रुक गए हैं|
जीजी के स्वर की कठोरता मुझे भीअप्रिय लगी है|

कहानी -सिस्टर्स मैचिंग सेंटर


“किशोरीलाल,” जीजी से दूरी हासिल करने हेतु बाबूजी किशोर को मेरे पास खिसकालाए हैं, “उषा की बात का बुरा न मानना| वह शील-संकोच कुछ जानती ही नहीं| माँ इनकी इन बच्चियों की जल्दी ही गुज़र गयी रही.....”
“जीजी मुझ से भी बहुत कड़वा बोल जाती हैं,” किशोर को मैं ढाँढस बँधाना चाहती हूँ|
उसका बातूनीपन तो मुझे बेहद पसन्द है ही, साथ ही उसकी तीव्र बुद्धि व भद्र सौजन्य भी मुझे लुभाता है|
“उषा मूर्ख है,” बाबूजी अपना स्वर धीमा कर लिए हैं, “उसे जब ब्याह दूँगा तो ज़रूर समझदारी से बोलना सीख जाएगी| उसकी बात का तुम बुरा मत मानना..... कहो तो उस काहाथ तुम्हारे हाथ में.....”
“बुरा क्यों मानूँगा, अंकल?” हुलस कर किशोर ने बाबूजी को अपनेअंक में भर लिया है, “अपनी माँ से मैं रोज़कहता हूँ, मेरीअब आठ सिस्टर्ज़हैं, इधरछः घर पर हैं और उधर दो सिस्टर्ज़मैचिनग सेन्टर पर.....”

“छः बहनें हैं तुम्हारी?” बाबूजी की फुसफुसाहट चीख में बदलली है|
“क्या बात है बाबूजी?” जी जी हमारे पास तत्काल चली आयीहैं|

“मैं अपने स्टोरसे फिर किसी कस्टमर को इधर लिवालाने का यत्न करता हूँ,” अप्रतिम किशोर जीजीको देखतेही लोप हो लिया है|


“तुम जानती थीं? उषा? किशोरी लाल की छःबहनेंहैं?” बाबूजीअपनीआँख मिचकाते हैं| पिछले वर्ष तक आतेआते उनकी दूसरी आँख भी अपनी ज्योति पूरी तरह गँवा चुकी है| रेटिनाऔरऑप्टिक नर्व की कोशिकाओं के निरन्तर ह्रास से उनकी आँखों में सम्पूर्ण रिक्तता भर तो दी है, लेकिन उत्तेजना में उनकी आँखों के गोलकपक्ष्म और पपोटे अजीब फुरतीलापन ग्रहण कर लेते हैं|
“हाँ जानती थी,” जीजी बाबूजीका हाथअपने हाथ में लेलेती है, “तो?”
“तुमने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?” बाबूजी की उत्तेजना बनी हुई है|
“उसकीअगर कोई बहन नभी होती तो भीमैं उसके संग शादी कभी न करती,” जीजी तुनकतीहैं|
“क्यों?”
“सेल्ज़ के इलावा उसका कोई लक्ष्य नहीं कोई इष्ट नहीं.....”
“हमारा है?” मैं भी तुनकली हूँ|

“हाँ| हमाराहै| हमें तुम्हें डॉक्टर बनाना है| छोटी दुकानदारी में नहीं लगाना, अपनी तरह.....”
मैं हथियार डाल देती हूँ| इसी साल मैं बारहवीं जमात के अपने इम्तिहान के साथ साथ सी.पी.एम.टी. की तैयारी में भी जुटी जो हूँ|
रात में हम बहनें जब सोने लगी हैं तो मैं जीजी के पास खिसक आतीहूँ, “आप जानती थीं किशोरीलाल की छः बहनें हैं?”
“बाबूजी को टालने के वास्ते वह झूठ बोल गया| वरना, उसकी दो बहनें हैं, छः नहीं.....”
“बाबूजी को उसने टाला क्यों?” मैं हैरान हूँ, जीजी से अच्छी पत्नी उसे और कहीं नहीं मिलने वाली है|
“क्योंकि वह तुमसे शादी करना चाहता था| मुझे एक दिन अकेली रास्ते में पा कर बोला, मैं निशा को चाहता हूँ| उस से मेरी शादी करवा दीजिए| मैं ने उसे खूब डा, निशा तुम जैसे छोटे आदमी से कतई शादी नहीं करेगी| उसे तो अभी कई ऊँचे पहाड़ चढ़ने हैं, गहरे कई समुद्र पार करने हैं.....”
“आप ने सही कहा, जीजी,” मैं जीजी के कंधे पर अपना सिर टिका देती हूँ, “मुझे डॉक्टर बनना है, उस सेल्ज़मैन की पत्नी नहीं.....”
अगली सुबह अवसर मिलते ही मैं बाबूजी को जा घेरती हूँ, “उस सेल्ज़मैनसे बात करने से पहले आपने जीजी से पूछा क्यों नहीं?”

उषा से मुझे कुछ भी पूछना-जानना नहीं था| जोपूछना-जानना था, उसी लड़के से पूछना-जानना था| उस के संग एक साँझे भविष्य की ओर जा रहे उषा के कदम पलट क्यों रहे थे? विपरीत दिशा क्यों पकड़ लिए थे?”

“साँझा भविष्य?” मैं हँस पड़ती हूँ, “आप गलत समझ रहे हैं, बाबूजी| जीजी के मन में किशोर के लिए कोई जगह नहीं| वह तो उसे बहुत ही तुच्छ, बहुत ही छोटा आदमी मानती हैं.....”

कहानी -सिस्टर्स मैचिंग सेंटर


“कतई नहीं,” बाबूजी के जबड़े कस लिए हैं और स्वर दृढ़ हो आया है, “मैं तुम से ज़्यादा समझ रखता हूँ| ज़्यादा जानता-बूझता हूँ| आँखें नहीं तो क्या? कान जो हैं| और वह भी तुम आँखों वालियों से दुगुने तेज़, चौगुने ग्रहणशील| मैं तो हवा तक में तैर रहे हर लहराव, हर कम्पन, हर स्पंदन पकड़ लेता हूँ और फिर उषा तो मेरी अपनी बच्ची है| किशोरीलाल के लिए उसका उत्साह भी मेरे पास पहुँचा है और उसका निरुत्साह भी..... और पीछे का सच मुझे किशोरीलाल ही बता सकता था, उषा नहीं.....”

“जी बाबूजी,” मैं चौकस हो ली हूँ| बाबूजी को पूरा सच बतलाना मेरे लिए असम्भव है|


दीपक शर्मा 

लेखिका -दीपक शर्मा




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