विजयश्री तनवीर के पहले कहानी संग्रह "अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार "की समीक्षा





दैनिक जागरण बेस्ट सेलर की सूची में शामिल "अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार " के बारे में में जब मुझे पता चला तो मेरी पहली प्रतिक्रिया यही रही कि ये भी कोई नाम है रखने के लिए , ये तो प्रेम की शुचिता के खिलाफ है | फिर लगा शायद नाम कुछ अलग हट कर है , युवाओं को आकर्षित कर सकता है , आजकल ऐसे बड़े -बड़े नामों का चलन है , इसलिए रखा होगा | लेकिन जब मैं किताब पढना शुरू किया तो मुझे पता चला कि लेखिका विजयश्री तनवीर जी भी इस  कहानी संग्रह का नाम रखते समय ऐसी ही उलझन  से गुजरी थीं | वो लिखती हैं ,

"मैंने सोचा और खूब सोचा और पाया कि बार -बार हो जाना ही तो प्यार का दस्तूर है | यह चौथी , बारहवीं , बीसवीं और चालीसवीं बार भी हो सकता है ...प्रेम की क्षुधा पेट की क्षुधा से किसी दर्जा कम नहीं है |"


जैसे -जैसे संग्रह की कहानियाँ पढ़ते जाते हैं उनकी बात और स्पष्ट , और गहरी और प्रासंगिक लगने लगती है , और अन्तत:पाठक भी इस नाम पर सहमत हो ही जाता है |

इस संग्रह में नौ कहानियाँ हैं | ज्यादातर कहानियाँ विवाहेतर रिश्तों पर हैं | जहाँ प्यार में पड़ने , टूटने बिखरने और दोबारा प्यार में पड़ जाने पर हैं | देखा जाए तो ये आज के युवाओं की कहानियाँ हैं , जो आज के जीवन का प्रतिनिधित्व करती हैं |


अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार -अनकहे रिश्तों के दर्द को उकेरती कहानियाँ 


" अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार " भी एक ऐसी ही कहानी है | अनुपमा गांगुली  अपने दुधमुहे बच्चे के साथ रोज  कोलकाता  लोकल का लंबा  सफ़र तय कर उस दुकान पर पहुँचती है जहाँ वो सेल्स गर्ल है | कोलकाता  की महंगाई से निपटने के लिए उसका पति एक वर्ष के लिए पैसे कमाने बाहर चला जाता है | अकेली अनुपमा इस बीच बच्चे को जन्म देती है , उसे पालती है और अपनी नौकरी भी संभालती है | इसी बीच उसके जीवन में एक ऐसे युवक का प्रवेश होता है जो कोलकाता    की लोकल की भरी भीड़ के बीच अपने बच्चे को संभालती उस हैरान -परेशां माँ की थोड़ी मदद कर देता है | अनुपमा उस मदद को प्रेम  या आकर्षण समझने लगती है | उसके जीवन में एक नयी उमंग आती है , काम पर जाने की बोरियत आकर्षण में बदलती है , कपड़े -लत्तों और श्रृंगार पर ध्यान जाने लगता है , उदास मन को एक मासूम  सा झुनझुना मिल जाता है , जिसके बजने से जिन्दगी की लोकल तमाम परेशानियों के बीच सरपट भागने लगती है | जैसा कि पाठकों को उम्मीद थी ( अनुपमा को नहीं ) उसका ये प्यार ...यहाँ पर सुंदर सपना कहना ज्यादा मुफीद होगा टूट जाता है | ये अनुपमा का चौथा प्यार था और इसका हश्र भी वही हुआ जो उसके पति के मिलने से पहले हुए दो प्रेम प्रसंगों का हुआ था | जाहिर है अनुपमा खुद को संभाल लेगी और किसी पाँचवे प्यार् को ढूंढ ही लेगी ....कुछ दिनों तक के  लिए ही सही |


वैसे जीवन में घटने छोटे -छोटे आकर्षणों को प्यार ना कह कर क्रश के तौर पर भी देखा जा सकता है , हालांकि क्रश में अगले के द्वारा पसंद किये जाने न किये जाने का ना तो कोई भ्रम होता है न इच्छा | इस हिसाब से " अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार " नाम सही ही है | इस मासूम सी कहानी में मानव मन का एक गहरा मनोविज्ञान छिपा है | पहला तो ये कि व्यक्ति की नज़र में खुद की कीमत तब बढती है जब उसे लगता है कि वो किसी के लिए खास है | जब ये खास होने का अहसास वैवाहिक रिश्ते में नहीं मिलने लगता है तो मन का पंछी इसे किसी और डाल पर तलाशने लगता है | भले ही वो इस अहसास की परिणिति विवाह या किसी अन्य  रिश्ते में ना चाहता हो पर ये अहसास उसे खुद पर नाज़ करने की एक बड़ी वजह बनता है | कई बार तो ऐसे रिश्तों में ठीक से चेहरा भी नहीं देखा जाता है , बस कोई हमें खास समझता है का अहसास ही काफी होता है | ये एक झुनझुना है जो जीवन की तमाम परेशानियों से जूझते मन रूपी बच्चे के  थोड़ी देर मुस्कुराने का सबब बनता है | ऐसे रिश्तों की उम्र छोटी होती है और अंत दुखद फिर भी ये रिश्ते  मन के आकाश में बादलों की तरह बार -बार बनते बिगड़ते रहते हैं |

आज की भागम भाग जिंदगी और सिकुड़ते रिश्तों के दरम्यान जीवन की परेशानियों से जूझती हजारों -लाखों अनुपमा गांगुली बार बार प्यार में पड़ेंगी ... निकलेंगी और फिर पड़ेंगी |

कहानी की सबसे खास बात है उसकी शैली .... अनुपमा गांगुली के साथ ही पाठक लोकल पकड़ने के लिए भागता है ...पकड़ता , आसपास के लोगों से रूबरू होता है | एक तरह से ये कहानी एक ऐसी यात्रा है जिसमें पाठक  को भी वहीं आस -पास होने का अहसास होता है |


"पहले प्रेम की दूसरी पारी " संग्रह की पहली कहानी है | ये कहानी उन दो प्रेमियों के बारे में है जो एक दूसरे से बिछड़ने , विवाह व् बच्चों की जिम्मेदारियों को निभाते हुए कहीं ना कहीं एक दूसरे के प्रति प्रेम की उस लौ को जलाये हुए भी हैं और छिपाए हुए भी हैं | कहा भी जाता है कि पहला प्यार कोई नहीं भूलता | खैर आठ साल बाद दोनों एक दूसरे से मिलते हैं | दोनों ये दिखाना चाहते हैं कि वो अपनी आज की जिन्दगी में रम गए हैं खुश हैं , पर कहीं न कहीं उस सूत्र को ढूंढते  रहते हैं जिससे उनके दिल को तसल्ली हो जाए ...कि वो अगले के दिल में कहीं न कहीं वो  अब भी मौजूद हैं ... कतरा भर ही सही , साथ बिताये  गए कुछ घंटे जो अपने पहले प्यार के अहसास को फिर से एक बार जी लेना चाहते थे , दोतरफा अभिनय की भेंट चढ़ गए | सही भी तो है विवाह के बाद उस प्रेम को स्वीकारना जो अभी भी धडकनों में हैं, मुश्किल है  ...क्योंकि दिल की चाहरदीवारी से बाहर निकलते ही उस दो घरौंदों के लिए खतरा है जहाँ उनका आज सुरक्षित है | यही कशमश है | लिहाज़ा एक बार फिर प्रेम की नदी को बाँहों में समेट लेने की ख्वाइश उस मुलाकात के बाद  हथेलियों से रेत सी फिसल जाती है ... रह जाता है एक गुदगुदा सा अहसास , जो  मन को सहलाता है पर हथेली पर टीस  बन के उभरता है | कहानी की खास बात ये हैं कि इसमें बहुत कुछ अनकहा है जिसे केवल महसूस किया जा सकता है | लेखिका पाठकों को उस धरातल पर ले जाने में सफल हुई हैं जहाँ वो ये महसूस कर सकें |


" भेड़िया " इस संग्रह की बेहतरीन कहानियों में से एक है | खास बात है इस कहानी को लिखने की शैली | कहानी उस लोककथा का आधार ले कर चलती हैं जहाँ एक गड़ेरिया बार -बार झूठ बोलता है कि भेड़िया आया , भेड़िया आया , गाँव वाले उसकी मदद को आते , पर वहां भेड़िया तो आया नहीं होता ... लेकिन एक एक दिन भेड़िया सचमुच आ गया |

कहानी विवाहेतर रिश्तों पर है | ये रिश्ते बन तो जाते हैं , और तब तक बने भी रहते हैं जब तक तथाकथित दूसरी औरत अपने अधिकारों की माँग नहीं करती | पुरुष के पास अधिकारों युक्त पत्नी , समाज  , रुतबा और प्रेम करने को एक स्त्री सब होते हैं | ये  तिलिस्म तब टूटता है जब वो दूसरी औरत ऐलान करती है कि तुम्हे मुझसे या पत्नी में से एक को चुनना होगा .... एक तरफ अकेली स्त्री दूसरी तरह पुरुष  का सारा राज समाज ... फिर शुरू होता समझाने मनाने और फुसलाने का दौर | स्त्री की की बढती हुई निराशा , कुंठा , बेचैनी और आत्महत्या की धमकी , रोज -रोज मिलने वाली इन धमकियों से लापरवाह होता पुरुष ... और एक दिन भेड़िया सचमुच आ जाता है ...एक दुस्वप्न जब मन के धरातल पर सच्चाई बन  कर ठोकर मारता है , तब शुरू होता है मानसिक विचलन | विवाहेतर रिश्तों में सब हारते हैं ... इसको जिस ख़ूबसूरती से उकेरा है वो काबिले तारीफ है | निश्चित तौर पर इस कहानी के लिए लेखिका  बधाई की पात्र हैं |


" खजुराहो "एक अलग ही मुद्दे को उठती हुई कहानी है | कहानी   एक मशहूर लेखक और उसकी पत्नी के इर्द गिर्द घूमती है | लेखक की नयी किताब खजुराहो बहुत सराही जा रही है | बहुत सी महिलाएं उसकी फैन हैं | लेखक ज्यादतर स्त्री प्रधान कहानियाँ लिखता है | स्त्री मनोभाभावों को सूक्ष्मता से पकड़ने के कारण वो पाठिकाओ में विशेष रूप से लोकप्रिय है | यही बात पत्नी की असुरक्षा का कारण है | वो एक सामान्य स्त्री हैं | सामान्य होना उसे खुद अपनी नज़र में कमतर साबित करता है , जिससे वो निराश और कुंठित होती है | यहाँ तक की एक गैंग रेप विक्टिम जिसने खुद को संभाला और फिर से जीना शुरू किया , अपने पति के मुँह से उसकी प्रशंसा भी उसे आहत करती है | कई बार उसे अहसास होता है कि स्त्री मन को समझने का दावा करने वाला उसका पति उसके मन को ठीक से नहीं समझता | और अन्तत : उसे  लगता है कि पति को केवल उसकी देह से मतलब है वो उसकी ना को हाँ में बदलवाने का हुनर जानता है , उसे भोगता है , इस्तेमाल करता है ...उसके अधकुचले अरमानों के साथ अपनी फंतासी की नायिकाओं की दुनिया रचता है , जिनके मन को पढने का उसे सम्मान प्राप्त है |

और जैसा की स्वाभाविक है नाराज् पत्नी  अपनी देह पर अपना अधिकार समझते हुए पति के स्पर्श से  इनकार करती है , उसका दिल समर्पण  चाहता है पर ... कहानी यहीं पर यू टर्न लेती है | पति उसका हाथ झटक कर कहता है ये मेरी ही नहीं तुम्हारी भी आवश्यकता है  क्या मैं तुम्हारे मनोभावों को नहीं पढ़ सकता | उस पर एक वज्रपात सा होता है | उसने इस तरह से तो कभी सोचा ही नहीं था | उसे तो लगा था कि उसकी देह एक हथियार है जिसे वो पति को अपने मन माफिक झुकाने के लिए इस्तेमाल कर सकती है |

पति अनिकेत का कहना , " खजुराहो तुम जैसी औरतों के लिए नहीं है ?" स्त्री विमर्श  के नए  द्वार खोलता है ...जहाँ पति पत्नी के शारीरिक  रिश्तों को केवल एक तरफ़ा नहीं दोतरफा होना स्वीकार गया | आम घरेलु औरतें अपनी पति से अपनी बात मनवाने के लिए देह को हथियार की तरह इस्तेमाल भी करती हैं .... परन्तु क्या ये सिर्फ पुरुष की जरूरत है ? पति -पत्नी संबंधों में लेखिका ने ये नया विषय उठाया है , संभव है आगे इस पर और विस्तृत चर्चा हो |

"खिड़की" कहानी में खिड़की एक माध्यम है समाज में व्याप्त अनैतिकता को दिखाने का | एक पत्नी एक माँ एक खिड़की के माध्यम  से जब अनैतिक रिश्तों का नंगा नाच देखती है तो  किस तरह  से बेचैन होती  है , अपने बच्चों में  उन चिन्हों को खोजती है  जो उनकी मासूमियत को लील सकते हैं | उनकी मासूमियत देखकर वो चैन की सांस लेती है पर खुद को आश्वस्त करने के लिए कि बाहर की ये हवा उसके घर की धूप -दीप की सुगंध को प्रदूषित ना कर दे वो खिड़की चुनवा देती है | ये कहानी जहाँ सभी समाज को बेपर्दा करती है वहीँ एक पत्नी एक माँ के खौफ का भी सटीक चित्रण  करती है |




"चिड़िया उड़ "कहानी स्त्री मन की दो विरोधाभाषी उड़ानों की अभिव्यक्ति हैं , जहाँ वो समझ नहीं पाती बंधन सही है या मुक्ति | कहानी में एक लेडी डॉक्टर के क्लिनिक पर दो अपरिचित महिलाएं  मिलती हैं | एक शादी कर घर गृहस्थी बच्चों में फंस कर अपना वजूद खो चुकी हैं तो दूसरी उन्मुक्त उड़ान भरने के बाद उसी  नीड़ पर अपना घोसला बनाना चाहती है | साथ रहने वाला पार्टनर नहीं , वो चाहती है एक ऐसा व्यक्ति जिसे वो ज़माने के सामने अपना कह सके , कानूनन उसकी पत्नी बच्चे की माँ बन सके , पर साथी को ये मंजूर नहीं |  वहीँ घर गृहस्थी वाली अपना खुद का वजूद तलाशना चाहती है, जो परिवार के बीच कहीं खो गया है  ... एक उड़ान भरना चाहती है ... पर उन्मुक्त नहीं जिसका छोर उसके घर की नींव में बंधा हुआ हो | ये कहानी दरअसल आज की स्त्री की उलझन दिखाती है ... अपने वजूद की तलाश में स्वछंद हुई स्त्री  के सामने प्रश्न एक ना एक दिन आता है कि क्या उसका  उन सुखों से महरूम होने का फैसला सही था जो एक बंधन में होते हैं ... प्रेम के बंधन में | उपाय मध्य मार्ग ही है | जहाँ बंधन हों ...पर प्रेम के और उनके मध्य स्त्री का वजूद भी स्थापित रहे | इसी विषय पर मैंने कुछ लेखिकाओ की  कहानियाँ और भी पढ़ी हैं पर सबका ट्रीटमेंट , कहन जुदा है | ये बात लेखिकाओ की प्रतिभा का परिचय देती है |


अन्य कहानियों में "समंदर  से लौटती नदी" भी विवाहेतर रिश्तों पर आधारित है | जिसमें अपनी पत्नी व् बच्चों को ना छोड़ सकने की विवशता को प्रेमिका शेफाली समझ लेती है और खुद ही दूर चली जाती है | " एक उदास शाम के अंत में " कहानी भी विवाहेतर संबंधों पर ही है जहाँ  प्रेमिका , प्रेमी के पास आने से इनकार कर देती है क्योंकि वर्षों बाद ईश्वरीय चमत्कार से वो माँ बनने वाली है | ये दोनों कहानियाँ यूँ तो अलग -अलग है पर विषय का दोहराव व् प्रेषण शैली से वो प्रभाव नहीं उत्पन्न  पाती जो संग्रह की बाकी कहानियों में है


 और अंत में अंतिम कहानी की बात करें तो उसमें कुछ छोटी -छोटी कहानियाँ हैं, जो  बेहद प्रभावशाली हैं | ये सब लघु कहानियाँ प्रेम पर ही हैं जो गुदगुदाती हैं और मधुर सा अहसास पीछे छोड़ जाती हैं | कहानी प्रेमी का पति हो जाना एक दुर्घटना है महिला पाठकों को अपने से जोड़ने में विशेष रूप से सक्षम है |

                   कुल मिला कर देखा जाए तो  विजयश्री तनवीर जी की कहानियाँ आज की सच्चाई बयां करती हैं | उनका लिखने  का ढंग ताज़ा हवाके झोंके की तरह है जो मन को पन्ना दर पन्ना उडाये लिए जाता है | उनकी भाषा में उर्दू की मिलावट बहुत प्रभावित करती है | हालाँकि वो कहती हैं की किसी किताब के अंतर्मन के दो पन्ने जिसमें लेखक अपने दिल की बात करता है  पढने का दिल नहीं करता पर उन्होंने उन पन्नों को भी दिलचस्प बना दिया है | ये उनका पहला कहानी संग्रह है | उनसे लेखन की लंबी और बेहतर पारी खेलने की उम्मीद है |

अगर आप आज के युवाओं के उलझते -सुलझते रिश्तों की कहानियाँ पढना चाहते हैं तो हिंदी युग्म से प्रकाशित १२० पेज का ये कहानी संग्रह आप जरूर पसंद करेंगे |

किताब का नाम -अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार
लेखिका -विजयश्री तनवीर
प्रकाशक -हिंदी युग्म
पृष्ठ -120
मूल्य :115(पेपर बैक )

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वंदना बाजपेयी 

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Atoot bandhan

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