इन्तजार 
कोई भी करे 
किसी का भी करे 
पीड़ादायी और कष्टदायी ही होता है 
लेकिन बदनसीब होते हैं वो लोग 
जिनकी जिन्दगी में किसी के इन्तजार
का अधिकार नहीं होता
क्योंकि इन्तजार 


रिश्तो की प्रगाढ़ता का पैमाना भी है
कोई गैरो का नहीं
सिर्फ अपनों का ही इन्तजार करता है
और जैसे - जैसे प्रगाढ़ होता जाता है कोई रिश्ता
उसी अनुपात में बढ़ता जाता है इंतजार
सूनी हो जाती हैं आँखे
जब उन आँखों को नहीं रहता
क्रिया पर प्रतिक्रिया या
किसी के आगमन
का इन्तजार
और ये सूनी आंखे ,भावशून्य आँखे
ह्रदय को संवेदनहीन बनाने लगती है
और शायद इसीलिये
इन्तजारविहीन आदमी
जिन्दा लाश बन जाता है
क्योंकि लाशो को किसी का भी
इन्तजार नहीं रहता


ओमकार मणि त्रिपाठी 


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Atoot bandhan

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