पिंक फिल्म देकहते हुए जैसे मेरी समाधी लग गयी थी | एक एक दृश्य प्रभाव् में डूबते उतराते हुए फिल्म का आखिरी डायलाग” ना का मतलब ना होता है, ना अपने आप में पूरा वाक्य है, जिसे किसी तरह के तर्क, स्‍पष्टीकरण या व्याख्या की ज़रूरत नहीं होती, न मतलब स़िर्फ न होता है।” दिल पर एक गहरी चाप छोड़ गया | कितनी सच्चाई , कितनी इमानदारी और कितनी दमदार आवाज़ में अमिताभ बच्चन ने यह बात कह दी | हाल से बाहर निकलते समय फिल्म का एक हैंगोवर सा हो गया | शायद बाहर निकलती हुई हर औरत को हुआ होगा तभी तो सब सर ऊँचा कर के चल रहीं थी | जैसे सहगल सर ने कोर्ट में उन्हें भी ना कहने का अधिकार दिला दिया हो | एक ऐसा अधिकार जो भारतीय नारी के लिए दिवा स्वप्न ही है | तभी तो जब किसी के मोबाइल की रिंग टन बजी
” आ चल के तुझे मैं ले के चलूं एक ऐसे गगन के तले ,
जहाँ गम भी न हो आंसूं भी न हों बस प्यार ही प्यार पलें “||

तो मेरे साथ न जाने कितनी महिलाएं अर्श से फर्श पर आ गयीं | सच भारतीय महिलाओं के लिए न कहने का अधिकार एक दिवा स्वप्न ही तो है | आज महिलाएं शहरी क्षेत्रों में आत्म निर्भर हो रहीं हैं | शायद कुछ हद तक उन्हें न कहने का अधिकार मिला हो | पर आम भारत जो गाँवों कस्बो और छोटे शहरों में बसता है | वहां दैहिक संबंध तो छोडिये महिला के लिए किसी बात में न कहना आसान नहीं होता |
पति के साथ रात को सोयी महिला की शारीरिक चोटों पर देवरानी जेठानी हंसतीं हैं , ये बिलकुल स्वीकार्य है की पति किसी भी तरह अपनी पत्नी को चोटिल करे| वह उसका हक़ है | घर की अन्य महिलाएं भी उसका साथ देने के स्थान पर उसका आनंद लेती हैं | हमारे लोक गीतों में इसके दर्शन आसानी से हो जातें हैं |महिला का काम है पति को खुश रखना …. यही उसकी सुखी गृहस्थी का मूल मंत्र है | पति आवारा बदचलन ही क्यों न हो उसके लिए स्त्री ( वेश्या ) उपलब्द्ध करना पत्नी को महँ सटी की श्रेणी में लाकर खड़ा कर देता है |हालांकि घरेलू महिलाओं की सुरक्षा के लिए या न कहने के अधिकार के लिए कानून बन रहे हैं | पर ” जिस घर में डोली गयी है वहीँ से अर्थी निकले के गणित में उलझी ” भारतीय नारी के लिए घर की चाहर दिवारी के अन्दर असर खो देते हैं |
अपने आशिकों को न कहने वाली कितनी महिलाएं तेज़ाब का शिकार होती हैं , कितनी रेप का और कितनी सामाजिक आलोचना का इसके आंकड़े देने की आवश्यता नहीं है | भारतीय पुरुष को इस बात को समझने में बहुत समय लगेगा की स्त्री भी पुरुष की तरह एक इंसान है जिसे ना कहने का अपनी भावनाएं रहने का हक़ है | हालांकि फिल्म में न सिर्फ आपने ना कहने के अधिकार की वकालत की है बल्कि जो जो पॉइंट उठाये है की पुरुष शराब पी सकते हैं तो टीक , महिलाएं पिए तो चरित्र हीन , पुरुष हँस कर बात करें तो ठीक महिलाएं करें तो चरित्रहीन या महिला के चरित्र का पैमाना उसके कपड़ों की लम्बाई नहीं होनी चाहिए | ये सारे पॉइंट्स बिलकुल सही है ये सारे अधिकार महिलायों को मिलने चाहिए | और in सब के लिए उनके चरित्र पर लांछन नहीं लगना चाहिए |परन्तु सवाल यही है की जिस देश में बचपन से पुरुषों को यह समझाया जाता हो की महिला की ना का मतलब हाँ है वहां आप की ” पिंक ” को रेड सिग्नल कैसे मिले |

वंदना बाजपेयी
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Atoot bandhan

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