April 2017




विश्व भर में अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस “1 मईके दिन मनाया जाता है। जिस प्रकार एक मकान को खड़ा करने और सहारा देने के लिये जिस तरह मजबूत नीवकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है, ठीक वैसे ही किसी समाज, देश, उद्योग, संस्था, व्यवसाय को खड़ा करने के लिये कामगारों  की विशेष भूमिका होती है।इतिहास के अनुसार वर्ष 1886 में 4 मई के दिन शिकागो शहर के हेमार्केट चौक  पर मजदूरों ने अपनी मांगों को लेकर हड़ताल कर रखी थी |मजदूर चाहते थे कि उनसे दिन भर में आठ घंटे से अधिक काम न कराया जाए।व् दुर्घटना आदि होने पर उन्हें उचित मुआवजा मिले | तभी अचानक किसी अज्ञात व्यक्ति द्वारा भीड़ पर एक बम फेंका गया। इस घटना से वहाँ मौजूद शिकागो पुलिस नें मजदूरों की भीड़ को तितर-बितर करने के लिये एक्शन लिया और भीड़ पर फायरिंग शुरू कर दी।



बहुत पुरानी बात नहीं है। सिर्फ डेढ़ सौ साल पहले भारत के इतिहास ने एक अप्रत्याशित करवट ली थी। अंग्रजी राज के खिलाफ एक बड़ी बगावत पूरे उत्तर भारत में वेगवती आंधी बन उठी थी । अंग्रजी सेना के भारतीय सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया था। यह विद्रोह गांवों के किसानों और गढ़ियों के सामंतों तक फैल गया। अस्तंगत मुगल साम्राज्य के आखिरी बादशाह बहादुरशाह ज़फर को विद्रोहियों ने अपना नेतृत्व दिया।ज़फर बूढ़े थे, बीमार और कमजोर भी। पर उनकी कुछ खासियतें भी थीं। औरंगजेब ने धार्मिक कट्टरता की जो गांठ इस देश पर लगा दी थी, उसकी कुछ गिरहें ज़फर ने खोली थीं। वे अकबर की परम्परा और सूफी मिजाज के शख्श थे। अपनी सीमित शक्तियों और मजबूरियों के बावजूद उन्होंने अपने कार्यकाल में जो भी करने की कोशिश की, उससे पता चलता है कि वे इस देश से सचमुच प्यार करते थे और नितंांत प्रतिकूल समय में भी वे उस परम्परा के वाहक थे, जो हिन्दुस्तान की माटी से उपजी और विकसित हुइ थी।
बहादुरशाह ज़फर मुगल सल्तनत का उजड़ा हुआ नूर थे। वह सल्तनत जिसने पूरे हिंदुस्तान में अपना परचम लहराया था-जिसने हिंदूस्तान को एक नए रंग में ढाल दिया था – अब देश तो दूर, दिल्ली में भी बस नाम भर की थी। हकीकत तो यह है कि वह लाल किले तक महदूद थी।



अपने समय की सबसे खूबसूरत स्त्री कही जाने वाली हौलीवुड अभिनेत्री हेडी लेमार का आज १०१ जन्म दिन है | आज गूगल डूडल देख कर आप के मन में प्रश्न जरूर उठा होगा की उनमें ऐसा क्या ख़ास है जिसके कारण गूगल उन्हें ये सम्मान दे रहा है |९ नवम्बर १९१७ में ऑस्ट्रिया में जन्मी हेडी ने १७ वर्ष की उम्र में जर्मन फिल्म में पहली बार परदे पर आई | बाद में वो हेडी लेमार नाम से हौलीवुड की अभिनेत्री बनी | उन्होंने अनेकों यादगार रोल निभाए व् सफल फिल्में दी |
पर लेमार को केवल खूबसूरत चेहरे के लिए ही याद नहीं किया जाता |उन्होंने १९४२ में सीक्रेट कम्युनिकेशन सिस्टम के अपने आइडिया को पेटेंट कराया | जो आज मिलिटरी के प्राइवेट कम्युनिकेशन व् मोबाईल फोन की तकनीकी का आधार है | वह अपने मिलेट्री जानकारी के आधार पर द्वितीय विश्वयुद्ध में सैनिकों की मदद करना चाहती थी




कहानियाँ किसे नहीं पसंद होती | शायद कहानियाँ ही हैं जिसकी चाह  में बच्चे नानी – दादी के आस – पास घूमते रहते हैं |और वो भी तो पूरे चाव से परियों की कहानी सुनाती है तो कभी राजकुमार-राजकुमारी की। ऐसी ही कहानियों के बीच हमारा बचपन निकलता है। लेकिन इतिहास के पन्नों में आज ही के दिन एक ऐसी कहानी दर्ज़ है जो राजकुमार और राजकुमारी के अलग होने के बाद राजकुमारी के बहद दुखद अंत की कहानी है | पर अफ़सोस एक कहानी ही नहीं एक सच्चाई है | ३१ अगस्त की वो काली रात जब स्वप्नों की दुनियां से आई किसी पारी की तरह खूबसूरत राजकुमारी का दुखद अंत हुआ | उनको श्रधांजलि देते हुए आज व्ही कहानी दोहरा रहे हैं |





अगर आप गायन की बात करते हैं और खास कर फ़िल्मी गायन की तो जो नाम सबसे पहले जेहन में उभर कर आता है वह है लता मंगेशकर |आज लता मंगेशकर महज एक व्यक्ति का नाम नहीं सुरों का पर्याय है | जिसमें शामिल हैं न जाने कितने आरोह – अवरोह , न सिर्फ हिंदी सिनेमा के बल्कि 20 भाषाओं में 30,000 से भी अधिक गानों के |यूँ ही हम उन्हें स्वर कोकिला की उपाधि नहीं देते | ये उनकी गायकी का ही कमाल  है की एक बार अमिताभ बच्चन ने किसी कार्यक्रम में कहा था की पकिस्तान हमसे दो ही चीजे मांगता है कश्मीर और लता मंगेशकर , और हम दोनों नहीं देंगे | भारत रत्न लता मंगेशकर भारत की सबसे लोकप्रिय और आदरणीय गायिका हैं जिनका छ: दशकों का कार्यकाल उपलब्धियों से भरा पड़ा है। उनकी आवाज़ सुनकर कभी किसी की आँखों में आँसू आए, तो कभी सीमा पर खड़े जवानों को सहारा मिला। कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी की संगीत ही लता जी का जीवन है |उन्होंने स्वयं को पूर्णत: संगीत को समर्पित कर रखा है।




-डॉ. जगदीश गाँधी, शिक्षाविद् एवं संस्थापक-प्रबन्धक,
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ
सरल, उत्साही और प्रेरक व्यक्तित्व के धनी डा. कलाम :-
भारत के सबसे ज्यादा लोकप्रिय ग्यारहवें राष्ट्रपति डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को हुआ था। इनके पिता अपनी नावों को मछुआरों को देकर अपने परिवार का खर्च चलाते थे। अपनी आरंभिक पढ़ाई पूरी करने के लिए कलाम जी को घर-घर अखबार वितरण का भी काम करना पड़ा था। कलाम जी ने अपने पिता से ईमानदारी व आत्मानुषासन की विरासत पाई और माता से ईष्वर-विष्वास तथा करूणा का उपहार लिया। वे भारत को अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में दुनिया का सिरमौर राष्ट्र बनना देखना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने अपने जीवन में अनेक उपलब्धियों को भारत के नाम भी किया। कलाम साहित्य में रूचि रखते थे, कविताएं लिखते थे, वीणा बजाते थे और अध्यात्म से गहराई से जुड़े थे। 27 जुलाई 2015 को डा. कलाम जीवन की अंतिम सांसें लेने से ठीक पहले वह छात्रों से बातें कर रहे थे, वह शायद ऐसे ही संसार से विदा होना चाहते होंगे।


भोपाल। साठ महत्वयपूर्ण ग्रंथों के सर्जक एवं चार सौ चित्रों के चित्रकार स्व. अम्बिका प्रसाद दिव्य की स्मृति में, विगत उन्नीस वर्षो से दिये जा रहे दिव्य पुरस्कारों की घो‍षणा 16 मार्च, 2017 को दिव्य जी की, जन्म-जयन्तीू पर कोलार रोड, सांईनाथ नगर, सी-सेक्टर, भोपाल स्थित 'साहित्य सदन' में संयोजक श्री जगदीश किंजल्क द्वारा की गई । इस वर्ष साहित्य की सभी विधाओं में 122 पुस्त कें प्राप्त हुई थीं । उपन्यास विधा का दिव्य् पुरस्कार, श्रीमती राधा जनार्दन (पन्ना) को उनके उपन्यास 'द्वापर की नायिका', कहानी विधा के लिए श्रीमती नीता श्रीवास्ताव (महू) को उनके कहानी संग्रह 'अमृत दा ढाबा', काव्य विधा का दिव्य पुरस्कार श्रीमती श्रीति एवं श्री संदीप राशिनकर (इंदौर) को उनकी काव्य कृति 'कुछ मेरी, कुछ तुम्हारी', निबन्ध विधा का दिव्य पुरस्कार प्रो. वरूण कुमार तिवारी (वैशाली) को उनके निबन्ध संग्रह ''सृजन समीक्षा के अन्त'र्पाठ'',व्यंग्य् विधा का दिव्य पुरस्कार डॉ. रवि शर्मा मधुप (दिल्ली ) को उनकी कृति ''अंगूठा छाप हस्ता‍क्षर'' एवं बाल साहित्यु के लिए श्री घमंडीलाल अग्रवाल (गुडगांव)







प्रेस विज्ञप्ति : 27/4/2017


लखनऊ, 27 अप्रैल। सिटी मोन्टेसरी स्कूल, कानपुर रोड कैम्पस की छात्रा श्रेया वाजपेयी ने अपने उत्कृष्ट शैक्षिक रिकार्ड की बदौलत यूनिवर्सिटी ऑफ डेनवर, अमेरिका में स्नातक कोर्स हेतु चयनित होकर विद्यालय का नाम गौरवान्वित किया है। इसके साथ ही, श्रेया को 1,32,000 डालर की स्कॉलरशिप से भी नवाजा गया है, जो कि चार वर्षीय शिक्षा अवधि के दौरान प्रदान की जायेगी। यह जानकारी सी.एम.एस. के मुख्य जन-सम्पर्क अधिकारी श्री हरि ओम शर्मा ने दी है। श्री शर्मा ने बताया कि सी.एम.एस. कानपुर रोड कैम्पस की इस प्रतिभाशाली छात्रा को उत्कृष्ट ज्ञान-विज्ञान एवं नवीन अवधारणाओं के सृजन की अद्भुद क्षमता के आधार पर चयनित किया गया है।


लघुकथा एक ऐसी विधा है जिसमे शिल्प के साथ ही कथानक का होना जरूरी है क्योंकि यह कथानक ही भाव और संवेदना को पाठक तक ले जाता है। कथानक की संवेदना तीव्रता से पाठक तक पहुंचना भी जरूरी है लेकिन इसके लिए पाठकों पर विश्वास करते हुए बहुत धैर्य की जरूरत है। कथानक ना तो बहुत वर्णनात्मक हो और ना ही कथा का अंत बहुत खुला हुआ हो। सांकेतिक कथा विशिष्ठ प्रभाव छोड़ती है। क्षितिज की लघुकथा गोष्ठी में अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार सूर्यकांत नागर जी ने पढ़ी गई लघुकथाओं पर बात करते हुए कहा कि हर विधा के कुछ नियम होते हैं जिन्हें मानना जरूरी होता है लघुकथा में कल्पनाशीलता और कला का समावेशी होना बेहद जरूरी है। लघुकथा में कुछ अनकहा रह जाये जिसे पाठक आसानी से पकड़ ले यह कला लघुकथा लेखक में होनी चाहिए।


अभी हाल ही में श्री – श्री रवि शंकर ने आध्यात्म की कमी को आत्महत्या का कारण बताया है | यह  वक्तव्य उन्होंने चाहे जिस सन्दर्भ में दिया हो पर इससे इस विषय पर वाद विवाद जरूर आरम्भ हो गया है की  लोग आत्महत्या क्यों करते हैं ?  अपने जीवन को स्वयं समाप्त कर देना आसन नहीं है | फिर भी लोग ऐसा निर्णय लेते हैं उसके पीछे बहुत सारी मानसिक वजहें रहती हैं | आत्महत्या किसी भी कारण से की जाए वो है बहुत दुखद और उससे भी ज्यादा दुखद है की उनके पीछे छूटने वाले उनके प्रियजन जीवन भर  उसे न बचा सकने के अपराध बोध व् उसने ऐसा क्यों किया के प्रश्न के साथ जीते हैं | मनोविशेषज्ञों की माने तो आत्महत्या के पीछे ६ मुख्य कारण होते हैं |
हमारा अपने बच्चों के साथ
किया गया व्यवहार ही इस बात का निर्णय करता है कि
वो अपने बारे में क्या सोंचते हैं 




सरिता जैन
हार्मोंस और शारीरिक परिवर्तनों के दौर से गुजर रहे बच्चे के मन में इस दौर में ढेरों सवाल होते हैं और दूसरी ओर पैरेंट्स का अनुशासन और हिदायतों का शिकंजा और ज्यादा कसता जाता है। अगर आपका बेटा किशोरावस्था की दहलीज पर है तो वह शारीरिक और मानसिक सामंजस्य कैसे स्थापित करे, यह उसके लिए ही नहीं बल्कि आपके लिए भी एक बड़ा सवाल होता है।
लड़कों में होने वाले हार्मोंनल परिवर्तन की वजह से उन्हें गुस्सा ज्यादा आता है और चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है। थोड़े समय बाद दाढ़ी-मूँछ आना शुरू हो जाती है और आवाज में भी भारीपन आ जाता है जो कुछ समय बाद सही हो जाता है जिसका दूसरे बच्चे मजाक उड़ाते हैं। लड़कों को उनके शरीर में होने वाले परिवर्तनों के विषय में बताएँ।
इस उम्र में अक्सर वे अपनी सेहत और साफ-सफाई की ओर से लापरवाह हो जाते हैं तो ऐसे समय में उन्हें अपनी शारीरिक सफाई का ध्यान रखने के लिए समझाएँ। किशोरावस्था में बच्चों के मन में अनेक सवाल होते हैं। घर में टीवी और इंटरनेट एक ऐसा माध्यम है, जिनसे वे जो चाहें, वे सूचनाएँ मिनटों में हासिल कर सकते हैं।





 डॉ. भारती गांधी,
शिक्षाविद् एवं संस्थापक-संचालिका,
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ
बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से पाये ?:-
एक बार मैं रेलवे स्टेशन पर कहीं जाने के लिए खड़ी थी तो मैंने देखा कि एक नौजवान अपने बूढ़े पिता का हाथ पकड़कर घसीट कर ट्रेन की तरफ ले जा रहा था। इस घटना को देखकर मेरे अन्दर बहुत पीड़ा हुई। मुझे ताज्जुब हो रहा था कि इस नौजवान की कैसे हिम्मत हुई कि वह अपने लगभग 70 वर्षीय बूढ़े पिता को कितनी बेरहमी से घसीटे। इस ट्रेन को आये हुए अभी कुछ ही सेंकण्ड हुए थे और अभी इस ट्रेन को अगले कुछ मिनटों तक प्लेटफार्म पर ही खड़ी रहना था। इस घटना से मेरे दिमाग में एक बात आई कि जब यह बच्चा छोटा रहा होगा तो उनके माता-पिता ने हो सकता है कि अपने बच्चे के साथ में कड़ाई का बर्ताव किया हो? और बच्चे के दिल में एक कुंठा बन गई हो कि जो बुजुर्ग हैं उनके साथ कड़ाई का व्यवहार करना अनुचित नहीं है।



वैशाख माह में शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया अक्षय तृ‍तीया कहा जाता है. उस हिसाब से आज अक्षय तृतीय मनाई जा रही है |हिन्दुओं में  अक्षय तृतीया को एक पावन पर्व माना जाता है | भारतीय संस्कृति में इसका बड़ा महत्व है. माना जाता है कि अक्षय तृतीया के दिन ही पीतांबरा, नर-नारायण, हयग्रीव और परशुराम के अवतार हुए हैं, इसीलिए इस दिन इनकी जयंती मनाई जाती है. शास्त्रों के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं, उनका अक्षय फल मिलता है. अक्षय यानी जो जिसका कभी क्षय न हो या जो कभी नष्ट न हो. वैसे तो सभी बारह महीनों की शुक्ल पक्षीय तृतीया शुभ होती है, किंतु वैशाख माह की तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्तो में मानी गई है.  भारतीय काल गणना के सि‍द्धांत से अक्षय तृतीया के दिन त्रेता युग की शुरुआत हुई. इसीलिए इस तिथि को सर्वसिद्ध तिथि के रूप में मान्यता मिली हुई है. पद्म पुराण के अनुसार, अक्षय तृतीया के दोपहर का समय सबसे शुभ माना जाता है। इसी दिन महाभारत युद्ध की समाप्ति तथा द्वापर युग प्रारम्भ हुआ था। इसी तिथि से हिन्दू तीर्थ स्थल बद्रीनाथ के दरवाजे खोले जाते हैं। वृन्दावन के बांके बिहारी मंदिर में चरण दर्शन, अक्षय तृतीया  के दिन ही किए जाते हैं। ब्रह्मा पुत्र अक्षय कुमार का जन्म भी इसी दिन हुआ था।


एक खराब रिश्ता एक टूटे कांच के गिलास की तरह होता है | अगर आप उसे पकडे रहेंगे तो लगातार चोटिल होते रहेंगे | अगर आप छोड़ देंगे तो आप को चोट लगेगी पर आप के घाव भर भी  जायेंगे - अज्ञात 

                                                                                     मेरे घर में  मेरी हम उम्र सहेलियां  नृत्य कर रही थी | मेरे माथे पर लाल चुनर थी |  मेरे हाथों में मेहँदी लगाई जा रही थी | पर आने जाने वाले सिर्फ मेरे गले का नौलखा  हार देख रहे थे | जो मुझे मेरे ससुराल वालों ने गोद भराई की रसम में दिया था | ताई  जी माँ से कह रही थी | अरे छुटकी बड़े भाग्य हैं तुम्हारे जो  ऐसा घर मिला तुम्हारी  नेहा को | पैसों में खेलेगी | इतने अमीर हैं इसके ससुराल वाले की पूछों मत | बुआ जी बोल पड़ी ," अरे नेहा थोडा बुआ का भी ध्यान रख लेना , ये तो गद्दा भी झाड लेगी तो इतने नोट गिरेंगें की हम सब तर  जायेंगे | मौसी ने हां में हाँ मिलाई  और साथ में अर्जी भी लगा दी ," जाते ही ससुराल के ऐशो - आराम में डूब जाना , अपनी बहनों का भी ख्याल रखना | बता रहे थे  उनके यहाँ चाँदी का झूला है कहते हुए मेरी माँ का सर गर्व से ऊँचा हो गया |  तभी मेरी सहेलियों   ने तेजी से आह भरते हुए कहा ," हाय  शिरीष , अपनी मर्सिडीज में क्या लगता है , उसका गोद - भराई  वाला सूट देखा था एक लाख से कम का नहीं होगा | इतनी आवाजों के बीच , " मेरी मेहँदी कैसी लग रही है" के मेरे प्रश्न को भले ही सबने अनसुना कर दिया हो | पर उसने एक गहरा रंग छोड़ दिया था , .. इतना लाल ... इतना सुर्ख की उसने मेरे आत्म सम्मान के सारे रंग दबा लिए |






अजय कुमार श्रीवास्तव (दीपू)
लखनऊ
बात 1986 की है मैं उस समय हाईस्कूल का छात्र हुआ करता था। मेरी दोस्ती हुई राजीव मिश्रा नाम के एक सहपाठी के साथ। प्यार से उन्हें लोग टिल्लू भाई पुकारा करते थे। टिल्लू के साथ दोस्ती के बाद मैंने उनकी दो आदतों को अपनी आदतों में शामिल कर लिया। एक था उनके नाई अयूब भाई से बाल कटवाना और दूसरा उनके साथ मल्हू भाई के दुकान पर रोज जाकर दोहरा खाना। दोहरा खाने का एक सबसे बड़ा फायदा यह था कि घर पर किसी को पता नहीं चलता था कि मैं दोहरा (पान में पड़ने वाला मीठा मसाला) खाता हूँ। चूंकि इसमें पान, चूना या कत्था जैसी कोई चीज नहीं होती थी इसलिए मुँह में कुछ लगता नहीं था और मै घर अपनी माता जी से डांट खाने से बच जाता था।
मल्हू भईया के तीन और भाई थे। सबसे बड़े ज्ञान भईया, उसके बाद कल्लू भईया और सबसे छोट थे दिनेष। टिल्लू की दोस्ती और मल्हू भाई के दोहरे से मुझे ऐसा प्यार हुआ कि मैं शाम को कोचिंग से सीधे मल्हू भाई की दुकान पर पहुंच जाता और कुछ समय वहीं पर टिल्लू के साथ बिताता। धीरे-धीरे मल्हू भाई के साथ ही साथ उनके सभी भाईयों से मेरी दोस्ती हो गई। अब रोज मल्हू भाई की दुकान पर बैठकी होने लगी। उसी दुकान पर कुछ लोगों की एक अलग पार्टी भी बैठकी करती थी जिन्हें शायद मेरा वहां पर बैठना अच्छा नहीं लगता था। एक दिन किसी बहाने से वे मुझसे लड़ाई करने लगे बातचीत चल ही रही थी कि मुझे पीछे से किसी ने एक झापड़ रसीद दिया।

 चाह कर भी वापस नहीं ले सकते.


एक बार एक व्यक्ति ने कुछ लोगों को बाला बुरा कह दिया | बाद में गुस्सा शांत होने पर उसे दुःख हुआ कि बेकार में ही उसने कह दिया , न कहता तो सही रहता| अक्सर हमारे साथ भी तो यही होता है हम  गुस्से में अनाप -शनाप बोल जाते हैं , बाद में लगता है अरे , ये हम क्या बोल गए , ऐसा तो हम कहना ही नहीं चाहते थे | इसका मतलब तो ये भी निकल सकता है , दूसरा हर्ट हो सकता है | पर फिर कुछ हो नहीं पाता , जो हो गया सो हो गया सोंच कर पछताने के अलावा हाथ में कुछ नहीं रहता |


ऐसे ही वो व्यक्ति भी  पछता रहा था| उसने अपने दोस्तों से सॉरी भी बोली , पर वो बहुत हर्ट थे , उनका घाव हरा था , इसलिए उन्होंने मना कर दिया | अब तो उस व्यक्ति को और भी पछतावा हुआ , उसने मन में सोंचा की ये बात  उन साधू से कही जाए जो गाँव के बाहर रहते हैं | शायद वो कुछ चमत्कार कर सकें |

वो साधू के पास जा कर बोला , " हे महात्मा मैं अपने कहे हुए शब्द वापस लेना चाहता हूँ | महात्मा ने उसकी ओर देखा और कहा , " ठीक है पर अभी मैं व्यस्त हूँ , अच्छा सुनो , मेरा एक काम करो , वो टोकरी चौराहे पर रख दो |


उस व्यक्ति ने टोकरी उठा ली | उसमें कबूतर व् अन्य चिड़ियों के पंख भरे हुए थे | व्यक्ति ने वो टोकरी उठा कर चौराहे  पर रख दी | शाम को वो फिर साधू के पास गया | साधू ने कहा , " वो टोकरी उठा लाओ , देखना एक भी पर कम न हों , उसके बाद मैं तुम से बात करूंगा |


व्यक्ति टोकरी लेने गया ... पर वो तो खाली हो चुकी थी | सारे पर उड़ गए थे , उन्हें वापस टोकरी में भरना असंभव था | उसने साधू के पास जा कर उन्हें खाली टोकरी देते हुए कहा ,  " लीजिये , बस ये टोकरी बची है , पंख तो सब उड़ गए , अब उन्हें किसी भी प्रकार से इकट्ठा नहीं किया जा सकता |

साधू उसकी तरफ देख कर मुस्कुरा कर बोले,  " बस यही बात मैं तुम्हें बताना चाहता था ... निकले हुए शब्द कभी वापस नहीं हो सकते , उन्होंने कहाँ पर कितना बड़ा घाव बना दिया है तुम कभी नहीं जान सकते |


अब तुम चाह  कर भी अपनने शब्द वापस नहीं ले सकते ... पर आगे से सोंच कर जरूर बोल सकते हो |


प्रेरक कथाओं से

टीम ABC



इलाके में लगातार तीसरे साल सूखा पडा है अब तो जमींदार के पास भी ब्याज पर देने के लिए रूपये नहीं रहे । जमींदार भी चिंतित है अगर बारिश न हुई तो रकम डूबनी तय है । अंतिम दांव समझकर जमींदार ने हरिद्वार से पंडित बुलवाकर बारिश हेतु हवन करवाया । दान दक्षिणा समेटते हुए पंडित ने टोटका बताया कोई गर्भवती स्त्री अगर नग्न होकर खेत में हल चलाये तो शर्तिया बारिश होगी ।
मुंशीजी को ऐसी स्त्री की तलाश का जिम्मा सौंपा गया । मुंशीजी ने गांव में घर घर घुमने के बदले सबको एकसाथ पंचायत बुलाकर समस्या और पंडित जी के द्वारा बताया निदान बताया और गुजारिश की सहयोग करने की ।






वह दैहिक सम्बन्धों से अनभिज्ञ एक युवक था । उसके मित्रजन उसे इन सम्बन्धों से मिलने वाली स्वार्गिक आनन्द की अनुभूति का अतिशयोक्तिपूर्ण बखान करते। उसका पुरुषसुलभ अहम् जहाँ उसे धिक्कारता, वहीं उसके संस्कार उसे इस ग़लत काम को करने से रोकते थे । इस पर हमेशा उसके अहम् और संस्कारों में युद्ध होता था । एक बार अपने अहम् से प्रेरित हो वह एक कोठे पर जा पहुँचा। वहाँ पर वह अपनी मर्दांनगी सिद्ध करने ही वाला था कि, उसके संस्कारों ने उसे रोक लिया। चँूकि वह संस्कारी था, सो वह वापस आने के लिये उद्यत हो गया,





शरद जैन उज्जैन
एक माह जब घर का टेलीफोन का बिल बहुत आया तो परिवार के मुखिया ने घर के सब लोगों को बुलाया।
मुखिया : यह तो हद हो गई। इतना ज़्यादा बिल!…
मैं तो घर का फ़ोन यूज़ ही नहीं करता… सारी बातें ऑफ़िस के फ़ोन से करता हूँ।
माँ: मैं भी ज़्यादातर ऑफ़िस का ही फ़ोन यूज़ करती हूँ। सहेलियों के साथ इतनी सारी बातें घर के फ़ोन से करूंगी तो कैसे चलेगा







नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः 

  बहुत दुःख के साथ सूचित करन पड़ रहा है की अटूट बंधन एवं सचका हौसला मीडिया ग्रुप के प्रधान सम्पादक श्री ओमकार मणि त्रिपाठी जी का निधन दिनाक 16 फरवरी २०१७ को हो गया | ओमकार मणि त्रिपाठी जी की अत्यधिक संवेदनशील  लेखक , जूझारु पत्रकार व् प्रतिभावान संपादक रहे हैं | उन्होंने अपने २4  वर्षों के पत्रकारिता जीवन को पूरी निष्ठां व् ईमानदारी के साथ निभाया | उन्होंने देश को जगाने वाले कई संवेदनशील मुद्दों पर अपनी कलम चलायी | दैनिक अखबार हिंदी मिलाप , स्वतंत्र वार्ता , आज का आनंद व् बुलंद इण्डिया ( मगज़ीन ) में सब एडिटर  , न्यूज़ एडिटर , ब्यूरो चीफ व् प्रधान सम्पादक की भूमिका का बहुत कुशलता पूर्वक निर्वाहन किया |उनके ५०० से भी ज्यादा लेख देश भर की विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं | उन्होंने सेना पर फिल्माई गयी एक डोक्युमेंटरी फिल्म भी लिखी व् जैन धर्म की एक एक पुस्तक का भी संपादन किया | तत्कालीन समय में वो ज्योतिष शास्त्र का वैज्ञानिक तरीके से अध्यन  कर नया दृष्टिकोण देने की दिशा में प्रयासरत थे |  उन्होंने अपने जीवन काल में कमजोर व् गरीब तबके को न्याय दिलाने के लिए अनेकों संगठनों का निर्माण किया , व् कलम के माध्यम से अपनी बात जन - जन तक पहुँचाने का प्रयास किया | "बदलें विचार बदलें दुनिया " का नारा  दे कर के उन्होंने अटूट बंधन राष्ट्रीय हिंदी मासिक पत्रिका की नींव  रखी | अल्प  समय में ही जिसने देश के देश के 16 राज्यों में  अपनी पहचान बना ली | दैनिक अखबार " सच का  का हौसला " उसी कड़ी में उनका अभिनव प्रयास है 

                                                    श्री त्रिपाठी जी कहा करते थे की दीपक कोई भी किसी भी उदेश्य से जलाए उसका उजाला पूरे पथ  को आलोकित करता है | मुख्य बात है दीप जलना और एक संघठन खड़ा करना जो उस दीप  को निरंतर आलोकित रखे | मनुष्य का जीवन नश्वर है परन्तु उसके विचार अमर हैं | अच्छे विचारों का प्रचार - प्रसार इसलिए भी आवश्यक है की लोग निराशा के अँधेरे से निकल कर अपने जीवन में सकारात्मक दिशा में आगे बढें |  भारत के गरीब तबके , अनाथ बच्चों व् महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिलाने का स्वपन स्वप्न देखने वाले श्री ओमकार मणि त्रिपाठी जी   को हम सब से छीन ले जाने वाली मृत्यु  चाहे जितनी विकराल , वीभत्स और कठोर हो पर वो इतनी शक्तिशाली  भी नहीं की उनकी  स्मृतियों , विचारों और स्नेह को हम से छीन सके | अमूर्त रूप में वह सदा हम सब के साथ रहेंगे |"और हमें दिशा दिखाते रहेंगे |  बदलें विचार बदलें दुनिया " का दीप वो जला गए हैं | अब हमारा उत्तरदायित्व है की हम उस दीप की रक्षा करें व् व् उससे प्रकाशित होने वाले पथ पर  प्रकाश को मद्धम न होने दें |  

आमीन 
वंदना बाजपेयी 
कार्यकारी संपादक 
अटूट बंधन 
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- प्रदीप कुमार सिंह,
शैक्षिक एवं वैश्विक चिन्तक
            आज हम इंटरनेट तथा सैटेलाइट जैसे आधुनिक संचार माध्यमों से लैस हैं। संचार तकनीक ने वैश्विक समाज के गठन में अहम भूमिका अदा की है। हम समझते हैं कि मानव इतिहास में यह एक अहम घटना है। हम एक बेहद दिलचस्प युग में जी रहे हैं। आओ, हम सब मिलकर एक अच्छे मकसद के लिए कदम बढ़ाएं। पिछले कुछ साल से विभिन्न देशों की दर्दनाक घटनाएं इंटरनेट के जरिये दुनिया के सामने आ रही हैं। इनसे एक बात तो तय हो गई कि चाहे हम दुनिया के किसी भी कोने में हों, हम सब एक ही समुदाय का हिस्सा हैं। इंटरनेट ने मानव समुदाय के बीच मौजूद अदृश्य बंधनों को खोल दिया है। दरअसल हम सबके बीच धर्म, नस्ल और राष्ट्र से बढ़कर आगे भी कोई वैश्विक रिश्ता है और वह रिश्ता नैतिक भावना पर आधारित है। यह नैतिक भावना न केवल हमें दूसरों का दर्द समझने, बल्कि उसे दूर करने की भी प्रेरणा देती है। यह भावना हमें प्रेरित करती है कि अगर दुनिया के किसी कोने में अत्याचार और जुल्म हो रहा है, तो हम सब उसके खिलाफ खड़े हों और जरूरतमंदों की मदद करें।





उषा लाल 
                            जाने क्यूँ मुझको मेरी माँ 
                           मेरी बेटी लगती है !
घड़ी घड़ी जिज्ञासित हो कर
बहुत प्रश्न वह करती है 
भर कौतूहल आँखों में
हर नई वस्तु को तकती है !
बात बात पर घूम घूम फिर
वही सवाल उठाती है
उत्तर पा कर , याददाश्त को
वह दोषी ठहराती है !






आँखें फाड़ – फाड़ कर देखती है
घूंघट  वाली औरत
पड़ोस में आकर बसी
जींस पहनने वाली औरत को
याद आ जाते हैं
वो दो गज लम्बे दुप्पटे
जिन्हें भी तहा  कर रख आई थी
माँ की संदूक में
की अब बस साड़ी ही पहननी है
यही ससुराल का ड्रेस कोड है
इसके इतर कुछ पहनने पर
लग जायेंगे
उसके संस्कार पर प्रश्न चिन्ह ?
नाप दिए जायेंगे बाप – दादा
पर वो , कैसे पहन पाती है जींस
फिर अपने ही प्रश्न को
पलट देती है , तवे पर रोटी के साथ
फुर्सत में सोंचेगी
पहले सबको खाना तो खिला दे








 अर्थ डे  और मैं कविता लिखने की नाकामयाब कोशिश में लगी हूँ  | मीडिया पर धरती को बचाने  का शोर है  | मैं मन की धरती को बचाने में प्रयासरत | धरती पर पानी की कमी बढती जा रही है और मन में आद्रता की | सूख रही है धरती और सूख रही है कविता | हाँ  कविता ! जो  जीवन के प्रात: काल में उगते सूर्य के साथ लबालब भरे मन के सरोवर पर किसी कमल के फूल सी खिल उठती  है | कितनी कोमल , कितनी मनोहर |  भ्रमर  गीत गाती सी खिलाती है पत्ती – पत्ती माँ , बहन व् अन्य रिश्तों को सितार के तार सा  छेड़ते हुए आ जाती है प्रेम के पायदान पर और  फैलाने  लगती है सुगंध | पर जीवन सिर्फ प्रेम और वसंत ही तो नहीं | की जब बढ़ चलता है उम्र का सूर्य , खिल जाती है धूप तो नज़र आने लगती हैं जीवन की  विद्रूपताएं |सूख ही जाता है थोडा सा सरोवर , तभी ...


दो लोगों की तुलना नहीं हो सकती | जो रास्ता आपके लिए सही है , हो सकता है दूसरे के लिए गलत हो |हर किसी की अपनी विशेष यात्रा है |हम सब की यात्रा न सही है न गलत न अच्छी है न बुरी .... बस अलग है - डैनियल कोपके 
                           तुलना का इतिहास बहुत पुराना है | शायद जब से प्रकृति में दूसरा मानव बना तब से तुलना करना शुरू हो गया होगा | ये तुलना भले ही सही  हो या गलत पर जीवन के हर क्षेत्र में होती है | तुलना
करने से किसको क्या मिलता है , पता नहीं पर तुलना रंग -  रूप में होती है , आकार प्रकार में होती है | सफलता असफलता में में होती है |हालांकि तुलना करना न्याय संगत  नहीं है | क्योंकि दो लोगों की परिस्तिथियाँ व् सोंच , दृष्टिकोण अलग - अलग हो सकता है | उनके संसाधन भी अलग - अलग हो सकते हैं |  उस पर भी अगर बात दो पीढ़ियों की तुलना की हो , वो भी उनकी सफलता की  तो ?




रामलाल एक दफ्तर में चपरासी था | उसके   दो बेटे थे ।यही उसका सब कुछ थे | अर्धांगिनी तो बीमारी और गरीबी के चलते कब का उसका साथ छोड़ दूसरी दुनिया में चली गयी थी | अब वही माँ और पिता दोनों की भूमिका में था | दो बच्चों की जिम्मेदारी गरीबी और मामूली नौकरी ने उसे चिडचिडा बना दिया था | चाहते  न चाहते हुए भी कभी दफतर में , कभी पैसों की कमी के चलते पंसारी की दुकान वाले लाला जी तो कभी बच्चों की परवरिश के कारण पड़ोस की चाची का , वह सब का रुतबा मानने को विवश था |
बड़ा ही विरोधाभास था की उसकों दूसरों द्वारा रुतबा दिखाए जाने से नफ़रत थी | परन्तु यही एक तमन्ना भी थी जो उसके दिल में पल रही थी | गरीब रामलाल यही सोंचता था कि वह अपने दोनों बेटों को आईएएस अफसर बनाएगा । फिर उसके बच्चों का खूब रुतबा होगा | वह भी उनके माध्यम से यही रुतबा सब पर दिखाएगा |  उसने पूरी मेहनत से अपने बच्चों की पढाई का प्रबंध किया ।साथ ही वो बच्चों के मन में रुतबा दिखाने की मंशा भी भरने लगा |





रहिमन प्रिति सराहिए, मिले होत रंग दून । 
ज्यों जरदी हरदी तजै, तजै सफेदी चून

                                               प्रेम का एक अलग ही रंग होता है , जहाँ दोनों एक दूसरे के लिए अपना रंग त्याग देते हैं |तब एक  रंग बनता है , प्रेम का रंग | भले ही प्रेम के एकात्म भाव की फिलोसिफी में इसे सर्व श्रेष्ठ पायदान पर रखा गया हो परन्तु किसी रिश्ते में एक दूसरे के हिसाब से बदलाव की हद क्या हो | यह जरूर चर्चा का विषय है |  अक्सर किसी नव विवाहित जोड़े से मिलने के बाद हमारे मुँह से अनायास ही ये निकल पड़ता है ," अरे फलाने भैये तो ये सब्जी खाते ही नहीं थे , भाभी ने बदल दिया " या अमुक दीदी ये रंग तो कभी पहनती ही नहीं थी जीजाजी ने बदल दिया | " इसके बाद वातावरण नव विवाहित जोड़े की शर्मीली सी मुस्कान के साथ खुशनुमा हो जाता है | रिश्ता पति - पत्नी का हो, सास - बहू का या कोई और हम जिस भी रिश्ते को चलाना चाहते है उसमें पूरा प्रयास करते हैं की दूसरे के हिसाब से जितना




सूखे पेड़ को देख कर
हरे पेड़ ने ये कहा
शांत रहो , धैर्य धरो
मत रोओ
मत चिल्लाओ
बस समय परिवर्तन पर विश्वास करो



शब्द 
मीठे /कडवे 
बनाओं तो बन जाते  
शस्त्र 

तीखे बाण /कानों को अप्रिय 

आदेश 
हौसला ,ढाढंस ऊर्जा बढ़ाते 

- प्रदीप कुमार सिंह, शैक्षिक एवं वैश्विक चिन्तक
1. प्रभु के इस विश्वस्त सेवक का नाम है- दुःख:- 
            प्रभु जब किसी को अपना मानते हैं, उसे गहराइयों से प्यार करते हैं तो उसे अपना सबसे भरोसेमंद सेवक प्रदान करते हैं और उसे कहते हैं कि तुम हमेशा मेरे प्रिय के साथ रहो, उसका दामन कभी न छोड़ो। कहीं ऐसा न हो कि हमारा प्रिय भक्त अकेला रहकर संसार की चमक-दमक से भ्रमित हो जाए, ओछे आकर्षण की भूलभुलैयों में भटक जाए अथवा फिर सुख-भोगों की कँटीली झाड़ियों में अटक जाए। प्रभु के इस विश्वस्त सेवक का नाम है- दुःख। सचमुच वह ईश्वर के भक्त के साथ छाया की तरह लगा रहता है।’’


काका और काकी का झगडा कोई नयी बात नहीं है | काका अक्सर काकी के खाने में कुछ न कुछ नुस्ख  निकाल देते | रोज़ का वही नाटक ,” तुम कैसा खाना बनाती  हो इसमें स्वाद नहीं है हमारी अम्मा तो ऐसा बनाती थी | क्या  स्वाद था | अंगुलियाँ चाट जाने को जी करता था | काकी चुपचाप सुन कर सर झुका कर रसोई में आ जाती |मन ही मन सोंचती , बढती उम्र में सठिया गए हैं | इतनी मेहनत के द भी प्रसंशा के दो शब्द नहीं फूटते मुँह से | फिर मन मार कर काम में लग जातीं |  काकी ने आज बड़े जतन  से आंवलें का मुरब्बा बनाया |काका ने जुबान पर रखते ही कहा ,” ये कैसा बनाया है , इसमें तो स्वाद ही नहीं है | हमरी अम्मा तो  ऐसे बनाती थी | सुनते ही काकी का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया | आज उनसे भी नहीं रहा गया | तपाक से बोलीं






दफ्तर से लौटते समय सुरेश बाबू ने स्कूटर धीमी कर के देखा , हाँ  ! ये सोमेश जी ही थे | अब ऐसा क्या हुआ जो ये यहाँ आ गए | ये तो बहुत ख़ुशी या गम में ही पीते थे | चलो पूंछते हैं , साथ तो देना बनता है , सोंचते हुए सुरेश बाबू ने स्कूटर किनारे लगा दी और पहुँच गए सोमेश जी का साथ देने | कुर्सी खिसका कर बैठते ही प्रश्न दागा ," क्या रे सोमेश अब आज क्या हुआ ?
सोमेश ने एक बड़ा सा घूँट गटकते हुए कहा , " कुछ न पूंछो  ,  ?ये औरतें न हों न दो दुनिया का कोई मर्द शराब खाने की और रुख न करे | तुम्हारी भाभी हैं न, उन्ही को देखो ?
अब ऐसा क्या कर दिया भाभी ने , सुरेश जी रहस्य से पर्दा उठाने को बेताब हो गए | 
बहुत मुँह खुल गया है | मायके में किसी की शादी पड़ रही है | |


इस बार कामिनी के मायके आने पर कोई स्वागत नहीं हुआ | भाभियों ने मामूली दुआ सलाम कर रसोई की राह संभाली | बिट्टू के मनपसंद खाने के बारे में भी नहीं पूंछा | लौकी की सब्जी और तुअर दाल देख कर बिट्टू नाक - भौं बनाती , तब तक माँ की तरेरती आँखे देख चुपचाप वही गटक  लिया | पर बिट्टू हैरान थी की इस बार मामा ने भी कहीं घूमने चलने की बात नहीं कही | न ही दीदी , दीदी कर के उसकी माँ के इर्द - गिर्द घूमें | पर सब से ज्यादा आश्चर्य उसे नाना जी की बात सुन  कर हुआ जो नानी को डांटने के लहजे में कह रहे थे | ज्यादा बिटिया - बिटिया करती रहोगी तो बेटे बहुएं तुम्हारे खिलाफ हो जायेंगे |





-डाॅ. जगदीश गाँधी, शिक्षाविद् एवं संस्थापक-प्रबन्धक,
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ
            ‘‘स्कूल चार दीवारों वाला एक ऐसा भवन है जिसमें कल का भविष्य छिपा है’’ आने वाले समय में विश्व में एकता एवं शांति स्थापित होगी या अशांति एवं अनेकता की स्थापना होगी, यह आज स्कूलों में बच्चों को दी जाने वाली शिक्षा पर निर्भर करता है। एक शिल्पकार एवं कुम्हार की भाँति शिक्षकों का यह प्रथम दायित्व एवं कत्र्तव्य है कि वह बच्चों को आध्यात्मिक गुणों से इस प्रकार से संवारे और सजाये कि उनके द्वारा शिक्षित किये गये बच्चे विश्व का प्रकाशबनकर सारे विश्व को आध्यात्मिक प्रकाश से प्रकाशित कर सकें। महर्षि अरविंद ने शिक्षकों के सम्बन्ध में कहा है कि ‘‘शिक्षक राष्ट्र की संस्कृति के चतुर माली होते हैं। वे संस्कारों की जड़ों में खाद देते हैं और अपने श्रम से सींचकर उनमें शक्ति निर्मित करते हैं।’’ 









आइये जानते हैं विश्व प्रसिद्ध चित्रकार  जैमिनी रॉय के बारे में | आज गूगल डूडल के जरिए जिन की जयंती मना रहा है | जैमिनी रॉय का जन्म पश्चिमी बंगाल के एक छोटे से गाँव में 11 अप्रैल १८८७ में हुआ था | उन्होंने कोलकाता के सरकारी कला स्कूल से  शिक्षा प्राप्त की |उस पर उस समय ब्रिटिश कला का प्रभाव साफ़ दिखाई देता था |  पहले वो उसी प्रकार के चित्र बनाते थे जैसे उन्होंने स्कूल में सीखे थे | 




नन्हा सा था | तभी से तो इस घर में है | श्रीमती जुनेजा ने कितने प्यार से पाला था उसे , उसने भी तो माँ से कम नहीं समझा था उन्हें |उनका जरा सा स्पर्श पा कर कैसे ख़ुशी से झूम उठता था वह | पर अपने अंदर उठ रहे प्यार को इससे बेहतर तरीके से वो व्यक्त नहीं कर पाता  था | उसकी भी कुछ विवशताएँ थी | शारीरिक ही सही | पर प्यार तो प्यार होता है न | जिसकी अपनी ही भाषा होती है | जिसे बिना बोले बिना कहे लेने वाला व् देने वाला दोनों ही समझ लेते हैं |  पर इस बार ऐसा क्या हुआ ? न जाने क्यों श्रीमती . जुनेजा को छुट्टियों में मसूरी जाते समय उसका बिलकुल ख्याल नहीं आया |