अक्षय तृतीया – जब मिलता है दान -पुन्य का अक्षय फल

0
96



वैशाख
माह में शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया अक्षय तृ‍तीया कहा जाता है.
उस
हिसाब से आज अक्षय तृतीय मनाई जा रही है |हिन्दुओं में  अक्षय तृतीया को एक पावन पर्व माना जाता है | भारतीय संस्कृति में इसका बड़ा महत्व है. माना जाता है कि
अक्षय तृतीया के दिन ही पीतांबरा
, नर-नारायण, हयग्रीव और परशुराम के
अवतार हुए हैं
, इसीलिए
इस दिन इनकी जयंती मनाई जाती है.
 शास्त्रों के अनुसार अक्षय
तृतीया के दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं
, उनका अक्षय फल मिलता
है. अक्षय यानी जो जिसका कभी क्षय न हो या जो कभी नष्ट न हो. वैसे तो सभी बारह
महीनों की शुक्ल पक्षीय तृतीया शुभ होती है
, किंतु वैशाख माह की
तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्तो में मानी गई है.
  भारतीय काल गणना के सि‍द्धांत
से अक्षय तृतीया के दिन त्रेता युग की शुरुआत हुई. इसीलिए इस तिथि को सर्वसिद्ध
तिथि के रूप में मान्यता मिली हुई है.
पद्म पुराण के अनुसार, अक्षय तृतीया के दोपहर का समय सबसे शुभ माना जाता है। इसी दिन महाभारत
युद्ध की समाप्ति तथा द्वापर युग प्रारम्भ हुआ था।
इसी तिथि से हिन्दू
तीर्थ स्थल बद्रीनाथ के दरवाजे खोले जाते हैं। वृन्दावन के बांके बिहारी मंदिर में
चरण दर्शन
, अक्षय तृतीया  के दिन ही किए जाते हैं। ब्रह्मा पुत्र अक्षय
कुमार का जन्म भी इसी दिन हुआ था।

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार अगर महिलाएं
अक्षय तृतीया पर वस्त्र, श्रृंगार का सामान या आभूषण आदि मां
लक्ष्मी पर अर्पण करने के बाद पहनती हैं तो उन्हें माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त
होती है.
  कदाचित इसी कारण इस
दिन सोना खरीदने की परंपरा है. मान्यता है कि इस दिन सोना खरीदने से समृद्धि आती
है.
  अक्षय तृतीया पर्व के
दिन स्नान
, होम, जप, दान आदि का अनंत फल
मिलता है
, कहा जाता है कि अक्षय
तृतीया के दिन दान जरूर करना चाहिए. भले ही आपके पास अधिक धन न हो
, तो भी अपनी क्षमता के
अनुसार दान करें. मान्यता है कि अक्षय तृतीया के दिन दान करने से दान करने वाले
व्यक्ति का आने वाला समय अच्छा होता है और उसके  दुख दूर होते हैं.

अक्षय
तृतीय की कथा

भविष्य पुराण के अनुसार, शाकल नगर
में धर्मदास नामक वैश्य रहता था। धर्मदास
, स्वभाव से बहुत ही
आध्यात्मिक था
, जो देवताओं व ब्राह्मणों का पूजन किया करता
था। एक दिन धर्मदास ने अक्षय तृतीया के बारे में सुना कि
वैशाख
शुक्ल की तृतीया तिथि को देवताओं का पूजन व ब्राह्मणों को दिया हुआ दान अक्षय हो
जाता है।
यह सुनकर वैश्य ने अक्षय तृतीया के दिन
गंगा स्नान कर
, अपने पितरों का तर्पण
किया। स्नान के बाद घर जाकर देवी- देवताओं का विधि- विधान से पूजन कर
, ब्राह्मणों को अन्न, सत्तू, दही,
चना, गेहूं, गुड़,
ईख, खांड आदि का श्रद्धा- भाव से दान किया।
धर्मदास की पत्नी, उसे बार- बार मना करती लेकिन धर्मदास अक्षय
तृतीया को दान जरूर करता था। कुछ समय बाद धर्मदास की मृत्यु हो गई। कुछ समय पश्चात
उसका पुनर्जन्म द्वारका की कुशावती नगर के राजा के रूप में हुआ। कहा जाता है कि
अपने पूर्व जन्म में किए गए दान के प्रभाव से ही धर्मदास को राजयोग मिला। अक्षय
तृतीया से जुड़ी कई कथाएं लोगों के बीच प्रचलित हैं।

प्रस्तुतकर्ता – अटूट बंधन 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here