10 फरवरी 2006


वेदना पिघल कर आँखों से छलकने को आतुर थीं.. पलकें अश्रुओं को सम्हालने में खुद को असहाय महसूस कर रही थीं...जी चाहता था कि कोई अकेला कुछ देर के लिए छोड़ देता कि जी भर के रो लेती..........फिर भी अभिनय कला में निपुण अधर मुस्कुराने में सफल हो रहीं थीं ..बहादुरी का खिताब जो मिला था उन्हें....! कैसे कोई समझ सकता था कि होठों को मुस्कुराने के लिए कितना परिश्रम करना पड़ रहा था...! किसी को क्या पता था कि सर्जरी से पहले सबसे हँस हँस कर मिलना और बच्चों के साथ घूमने निकलना , रेस्तरां में मनपसंद खाना खाते समय मेरे हृदय के पन्नों पर मस्तिष्क लेखनी बार बार एक पत्र लिख -लिख कर फाड़ रही थी... कि मेरे जाने के बाद.................!


11 फरवरी 2006


11 फरवरी 2006 रात करीब आठ बजे बहन का फोन आया... पति ने बात करने के लिए कहा तब आखिरकार छलक ही पड़े थे नयनों से नीर.... और रूला ही दिए थे मेरे पूरे परिवार को... नहीं सो पाई थी  उस रात को मैं .. कि सुबह ओपेन हार्ट सर्जरी होना था.... सुबह स्ट्रेचर आता है... उसपर मुझे लेटा दिया जाता है.... कुछ दूर चलकर स्ट्रेचर वापस आता है कि सर्जरी आज नहीं होगा......! कुछ लोगों ने तो अफवाह फैला दी  थी  कि डॉक्टर नरेश त्रेहान इंडिया पाकिस्तान का क्रिकेट मैच देखने पाकिस्तान जा रहे हैं..!
सर्जरी से तो डर ही रही थी | मुझे  बहाना मिल गया था हॉस्पिटल से भागने का........ गुस्से से चिल्ला पड़ी थी मैं .. डॉक्टरों की टीम आ पहुंची थी मुझे समझाने के लिए | तभी डॉक्टर नरेश त्रेहान भी आ पहुंचे थे ,और समझाने लगे थे कि मुझे इमर्जेंसी में बाहर जाना पड़ रहा है... मैं चाहता हूँ कि मेरे प्रेजेन्स में ही आपकी सर्जरी हो............... .....!

13 फरवरी 2006

13 फरवरी 2006 सुबह करीब ९ बजे स्कार्ट हार्ट हॉस्पिटल की नर्स ने जब स्ट्रेचर पर लिटाया और ऑपरेशन थियेटर की तरफ ले जाने लगी थी तो मुझे लग रहा था कि जल्लाद रुपी परिचारिकाएं मुझे फांसी के तख्ते तक ले जा रही हैं......... हृदय की धड़कने और भी तेजी से धड़क रही थी....
मन ही मन मैं सोंच रही थी शायद यह मेरे जीवन का अन्तिम दिन है.......जी भर कर देखना चाहती थी दुनिया को......... पर नजरें नहीं मिला पा रही थी परिजनों से कि कहीं मेरी आँखें छलककर मेरी पोल न खोल दें.......मैं खुद को बिलकुल निर्भीक दिखाने का अभिनय करती रही थी


परिचारिकाएं ऑपरेशन थियेटर के दरवाजे के सामने स्ट्रेचर रोक देती हैं.. और तभी किसी यमदूत की तरह डाक्टर आते हैं..  स्ट्रेचर के साथ साथ डॉक्टर भी ऑपरेशन थियेटर में मेरे साथ चल रहे थे.... चलते चलते वे अपनी बातों में उलझाने लगे थे ..जैसे किसी चंचल बच्चे को रोचक कहानी सुनाकर बातों बातों में उलझा लिया जाता है.. !


डाक्टर  ने कहा किरण जी लगता है आप बहुत नाराज हैं..! मैने कहा हाँ.. क्यों न होऊं...? और मैं हॉस्पिटल की व्यवस्था को लेकर कुछ कुछ उलाहने.देने लगी थी . तथा इसी प्रकार की कुछ कुछ बातें किये जा रही थी..!
मैने डाक्टर से पूछा बेहोश करके ही ऑपरेशन होगा न..? डाक्टर ने मजाकिया अंदाज में कहा अब मैं आपका होश में ही ऑपरेशन करके आपपर एक नया एक्सपेरिमेंट करता हूँ..! बातों ही बातों में डॉक्टर ने मुझे बेहोशी का इंजेक्शन दे दिया उसके बाद मुझे क्या हुआ कुछ पता नहीं..!

14 फरवरी 2006


करीब ३६ घंटे बाद १४ फरवरी  को मेरी आँखें रुक रुक कर खुल रही थी ..! आँखें खुलते ही सामने पतिदेव को खड़े देखा तब .मुझे विश्वास नहीं हो पा रहा था कि मैं सचमुच जीवित हूँ...!कहीं यह स्वप्न तो नहीं है यह सोचकर मैने  अपने पति के तरफ अपना हाँथ बढ़ाया..जब पति ने हांथ पकड़ा तब विश्वास हुआ कि मैं सचमुच जीवित हूँ..! तब मैं भूल गई थी उन सभी शारीरिक और मानसिक यातनाओं को जिन्हे मैंने सर्जरी के पूर्व झेला था ..! उस समय जिन्दगी और भी खूबसूरत लगने लगी थी ..वह हास्पीटल के रिकवरी रूम का वेलेंटाइन डे सबसे खूबसूरत दिन लग रहा था..!

अपने भाई , बहनों , सहेलियों तथा सभी परिजनों का स्नेह.., माँ का अखंड दीप जलाना......, ससुराल में शिवमंदिर पर करीब ११ पंडितों द्वारा महामृत्युंजय का जाप कराना..,...... पिता , पति , और पुत्रों के द्वारा किया गया प्रयास... कैसे मुझे जाने देते इस सुन्दर संसार से..! वो सभी स्नेहिल अनुभूतियाँ मेरे नेत्रों को आज भी सजल कर रही हैं .... मैं उसे शब्दों में अभिव्यक्त नहीं कर पा रही...हूँ !
आज मुझे डॉक्टर देव , नर्स देवी , और स्कार्ट हार्ट हास्पिटल एक मंदिर लगता है..!

एक सकारात्मक परिवर्तन की शुरुआत थी 13 फरवरी 2006


मुझे यही अनुभव हुआ कि समस्याओं से अधिक मनुष्य एक भयानक आशंका से घिर कर डरा होता है और ऐसी स्थिति में उसके अन्दर नकारात्मक भाव उत्पन्न होने लगता है जो कि सकारात्मक सोंचने ही नहीं देता है |  उसके ऊपर से हिन्दुस्तान में सभी डॉक्टर ही बन जाते हैं....!
मैं अपने अनुभव के आधार पर यही कहना चाहती हूं कि स्वास्थ्य  सम्बन्धित समस्याओं के समाधान हेतु डॉक्टर के परामर्श पर चलें.... विज्ञान बहुत आगे बढ़ चुका है इसलिए भरोसा रखें डाॅक्टर पर.......... आत्मविश्वास के लिए ईश्वर पर भी भरोसा रखें....... और सबसे पहले डॉक्टर और हास्पिटल का चयन में कोई समझौता न करें .!
***************
किरण सिंह


मित्रों सकारात्मक सोंच बहुत कुछ बदल देती है | जरूरी है हम ईश्वर  पर और अपने ऊपर विश्वास बनाये रखे | किरण सिंह जी का यह संस्मरण आपको कैसा लगा ? पसंद आने पर शेयर करें व् हमारा फेसबुक पेज लाइक करें | फ्री ई मेल सबस्क्रिप्शन लें ताकि हमारी नयी पोस्ट सीधे आपके ई मेल पर पहुंचे | 

यह भी पढ़ें ........

कलयुग में भी होते हैं श्रवण कुमार

गुरु कीजे जान कर

एक चिट्ठी साहित्यकार / साहित्यकार भाइयों बहनों के नाम

२० पैसा

Share To:

Atoot bandhan

Post A Comment:

1 comments so far,Add yours

  1. आपका कहानी काफी मर्मस्पर्शी है. हर कैंसर, ह्रदय के बीमार से पीड़ित व्यक्ति,नायिका के मनोभावों के दौर से गुजरता ही जबतक हम स्वस्थ रहते है,तबतक हम साहस, निडरता का लम्बा चौड़ा व्याख्यान दे सकते है. पर जब हम पर गुजरती है, धड़कने, सोच,मन पर क्या क्या असर होता है, उस हाल से गुजरने वाला ही बता सकता है. आपने सच्चाई को काफी रोचक शब्दों में पिरोये हैं. एक और बात भी सही है कि डाक्टर और अस्पताल चयन में सवधानी बरतनी होगी।

    ReplyDelete