March 2019
कहानी -चचेरी



सिबलिंग राइवलरी एक ऐसा शब्द है जिससे  कोई अनभिज्ञ नहीं हैं | मामला दो चचेरी बहनों का हो तो ये और भी कहर ढाने वाला हो जाता है | ये बिना बात की जलन ऐसी ,कि जरूरत हो ना जरूरत हो दूसरे के काम को बनता देख दिल में उथल -पुथल शुरू हो जाती है  और दिमाग टांग अडाने की तकनीके सोचने लगता है | आज हम आपके लिए लाये हैं दो चचेरी बहनों की इर्ष्या  पर आधारित एक ऐसे ही कहानी | ये कहानी 2015 में हंस में प्रकाशित हो चुकी है | आइये पढ़ें वरिष्ठ लेखिका दीपक शर्मा जी की कहानी ...

चचेरी 


“प्रभात कुमार?” वाचनालय के बाहर वाले गलियारे में अपने मोबाइल से उलझ रहे प्रभात कुमार को चीन्हने में मुझे अधिक समय नहीं लगा|
“जी..... जी हाँ,” वह अचकचा गया|

“मुझे उषा ने आपके पास भेजा है.....”

“वह कहाँ है?” उसे हड़बड़ी लग गयी, “उसका मोबाइल भी मिल नहीं रहा.....”

“कल शाम दोनों बरिश में ऐसे भीगे कि उषा को बुखार चढ़ आया और उस का मोबाइल ठप्प हो गया,” मैं मुस्कुरायी|
कल शाम उषा ने प्रभात कुमार ही के साथ बिताई थी|

चंडीगढ़ में पांच दिन के लिए आयोजित की गयी इस साहित्यिक गोष्ठी में हम चचेरी बहनें लखनऊ से आयी थीं और प्रभात कुमार कोलकाता से| किन्तु दूसरे दिन के पहले सत्र में ‘आधुनिक साहित्य-बोध’ के अन्तर्गत हुई चर्चा में उषा की भागीदारी ने प्रभात कुमार पर ऐसी ठगोरी लगायी थी कि वह अगले ही सत्र में उसके अरे-परे आकर बैठने लगा था| परिणाम, उषा का सुनना-सुनाना फिर गोष्ठी से हटकर प्रभात कुमार पर जा केन्द्रित हुआ था| तीसरा दिन दोनों ने विश्वविद्यालय के इस वाचनालय में बिताया था और चौथे दिन, यानी कल, दोपहर ही में वे सैर-सपाटे के लिए बाहर निकल लिए थे|

“कितना बुखार है?” प्रभात कुमार का स्वर तक तपने लगा|
“एक सौ चार| इसीलिए डॉक्टर ने दिसम्बर की इस हाड़-कंपाने वाली सर्दी में उसे बाहर निकलने से सख़्त मना किया है.....”
“मगर मेरा उससे मिलना बहुत ज़रूरी था| कोलकाता का मेरा टिकट कल सुबह के लिए बुक्ड है और वह आज ही बाहर नहीं निकल पा रही,” प्रभात कुमार रोने-रोने को हो आया|
“जभी तो उसने यह पत्र आपके नाम भेजा है,” उषा द्वारा तैयार किया गया लिफाफा मैंने उसकी तरफ़ बढ़ा दिया|
“लाइए,” उसने लिफाफा खोला और अन्दर रखे पत्र पर झपट पड़ा|
“तुम फ़िल्म ज़रूर देखना,” उचक कर उषा की कलम-घिसटती लिखाई में प्रभात कुमार के साथ मैंने भी पढ़ा, “और दूसरी टिकट पर रेवा को साथ ले जाना| वह मेरे ताऊ की बेटी है| औरफ़िल्मों की शौकीन| आज हमारा मिलना ज़रूर असम्भव रहा है मगर यह अन्त नहीं है| स्पेन की उस कहावत को याद रखते हुए जो कल तुम मुझे सुना रहे थे : ‘लव विदाउट एंड हैज़ नो एंड’ (मनसूबा बांधे बिना किया गया प्यार कभी विदा नहीं लेता)- तुम्हारी उषा|”
“आइए|” प्रभात कुमार वाचनालय के मुख्य द्वार की ओर लपक पड़ा|
“वुडी एलन की ‘मिडनाइट इनपेरिस’ देखी थी, तभी उसकी यह ‘ब्लु जैसमीन’ मेरे लिए देखना ज़रूरी हो गया था,” प्रभात कुमार की हड़बड़ीपूर्ण तेज़ी के साथ कदम मिलाते हुए मैंने वातावरण के भारीपन को छितरा देना चाहा|

पढ़िए -हकदारी

प्रभात कुमार ने कोई उत्तर नहीं दिया|
“आपको वुडी एलन पसन्द नहीं क्या?”
“स्कूटर,” प्रभात कुमार चिल्लाया और स्कूटर पर चढ़ लिया|
और जब उसने ‘ब्लु जैसमीन’ बिनाबोले गुज़ार दी तो मैंने अपने भीतर एक उत्सुक जिज्ञासा को जागते हुए पाया|

“क्या कहीं घूमा जाए?” सिनेमा-हॉल से बाहर निकलते ही मैंने सुझाया|
“कहाँ घूमेंगे?” प्रभात कुमार की आँखें और वीरान हो उठीं|
“जहाँ उषा के साथ घूमना था,” मैंनेउसे डोर पर लाना चाहा, “जहाँ उसके साथ डोलना-फिरना था.....”
“उसने आपको बताया था?”
“बिलकुल,” मैंने झूठ कह दिया, “मत भूलिए, हम दोनों चचेरी बहनें हैं और अपने अपने जयपत्र एक-दूसरे के संग साझे तो करती ही हैं.....”

कहानी -चचेरी

मगर सच पूछें तो ऐसा कतई नहीं था| उषा और मैं बहनेली कभी नहीं रही थीं| कारण पारिवारिक मनमुटाव था| जो सन् चौरासी के दिसम्बर में शुरू हुआ था| जिस माह दादा ने चाचा से उनकी भोपाल वाली नौकरी छुड़वाकर उन्हेंलखनऊमें एक कारखाना खरीद दिया था, परिवार की सांझी पूंजी से|
“तो क्या पिंजौर चलेंगी आप?” प्रभात कुमार ने पहली बार मुझे अपनी पूरी नज़र में उतारा|


“क्यों नहीं?” अपने स्वर में चोचलहाई भरकर मैंने कहा, “नए लोग और नयी जगहें मुझे बेहद आकर्षित करती हैं| जभी तो मैं उषा के साथ चंडीगढ़चलीआयी वरना साहित्य और साहित्य-बोध में मेरी लेश मात्र भी रूचि नहीं.....”

“आप ने अभी जिस जयपत्र शब्द का प्रयोग किया उसका प्रसंग मैं समझ नहीं पाया,” पिंजौर की ओर जाने वाली बस में सवार होते ही प्रभात कुमार ने उत्सुकता से मेरी ओर देखा|
“प्रसंग उषा की विजय का है, बल्कि महाविजय का है.....”
“महाविजय? कैसी महाविजय?”

“इतने कम समय में आप जैसे यशस्वी व युवा कवि का मन जीत लेना उसकी महाविजय नहीं तो और क्या है?”

“मन तो उसने मेरा जीता ही है| जो दृढ़संकल्प और आत्मविश्वास उसने मेरे भीतर जगाया है, उसने तो मेरा जीवन ही पलट दिया है,” वह लाल-सुरख़ हो चला|

“वह स्वयं भी तो दृढ़-संकल्प व आत्मविश्वास की प्रतिमूर्ति है,” अपनी डोर मज़बूत रखने के लिए मैंने तिरछी हवा का सहारा लिया, “बचपन से लेकर अब तक जो पढ़ाई में लगी है, सो लगी है| स्कूल-कॉलेज के समय उसे अगले साल के लिए छात्रवृत्ति पानी होती और अब अपनी अध्यापिकी में उसे ऊँचा स्केल पाने के लिए पी. एच. डी. करनी है.....भाई की इंजीनियरिंग और बहन की आई. आई. एम. का र्चा तब तक उठाती रहेगी जब तक उन की पढ़ाई पूरी न हो लेगी और वह आर्थिक निर्भरता हासिल न कर लेंगे.....”

“मगर उसके पिता का तो लखनऊ में अपना कारखाना है.....”
“है तो! मगर वह शुरू ही से डांवाडोल स्थिति में रहा है| चाचा उसे लीक पर ला ही नहीं पाए| असलमें अपनी इंजीनियरिंग केबाद भोपाल में वह अच्छी नौकरी पा गए थे और वह नौकरी उन्हें कभी छोड़नी नहीं चाहिए थी.....”


“हाँ, उषा बता रही थी सन चौरासी की जिस दो दिसम्बर के 
दिन उसके माता-पिता लखनऊ में विवाह-सूत्र में बंध रहे थे, उसी दिन यूनियन कारबाइड की उस इनसैक्टिसाइड फैक्टरी में हुए गैस-स्त्राव ने पूरे भोपाल को अपनी चपेट में लिया था और वैसी परिस्थितियों में उनका भोपाल जाना स्थगित होता चला गया था,” प्रभात कुमार अभी भीदुर्ग की उसी चौकी पर डटा खड़ा था जिसे उषा चीन्ह गयी थी| उसकी पहरेदारी का कार्यभार सौंप गयी थी|


“वह गैस-स्त्राव तो लखनऊ में बने रहने का बहाना भर था,” मैंने एक लम्बा डग भरा, “समूचे का समूचा भोपाल थोड़े न उस गैस-स्त्राव से ग्रस्त हुआ था| इतने तो ताल हैं भोपाल में| उनके पानियों ने बहुत बड़ी मात्रा में वह ज़हरीली गैस सोख ली थी और कुछ ही दिनों में हवा साफ़ हो गयी थी| असली कारण तो हमारे दादा का पुत्र-प्रेम था जिसने उन्हें यहीं रोक लिया था और चाचा को पेंट्स का वह कारखाना खरीद दिया था जो उस समय अच्छा लाभ दे रहा था| मेरे पिता तो अकसर कहा करते हैं, “बाबूजीवह कारखाना यदि मुझे ले दिए होते तो मेरे पेंट्स का मार्का बाज़ार के कई ऊंचे नामों कोभांज रहा होता.....”

“आपके पिता क्या करते हैं?”


“तिमंजिला एक जनरल स्टोर चलाते हैं| जिसकी ऊपर वाली दो मंज़िलें उन्होंने अपने हाथों खड़ी की हैं| हमारे दादा के देहान्त के बाद| अपनी व्यापारिक सूझ-बूझ औरदूरदर्शिता के बूते पर| जहाँ पहले केवल घी-तेल, दाल-अनाज और साबुन-फ़िनाएल बिका करते थे अब वहां तरह-तरह के डिब्बे-बंद पनीर, धान्य और दलिए से लेकर ताज़े फल-सब्जी भी सजे हैं देशीय-विदेशीय, सब| दूसरी मंज़िल पर बच्चों का माल रखा गया है| उनकी पोशाक, उनकी गेम्ज़, उनके खिलौने, उनकी कौटस, बाइक्स, बाबा-गाड़ियाँ सब उसी एक छत के नीचे उपलब्ध हैं.....”

पढ़िए -अरक्षित


“और तीसरी मंज़िल पर?” प्रभात कुमार का स्वर कुतुहली रहा|
“वहां महिलाओं का हाटलगाया गया है” मैंने अपना कदम आसमान पर जा टिकाया, “उनकी सज्जा-सामग्री से लेकर हैंडबैग्ज़और बेल्ट्स जैसी सभी एक्सेसरीज, उपसाधन, वहां उपलब्ध हैं.....”
“आपके पिता सचमुच ही एक कर्मठ व उद्यमी व्यक्ति हैं,” उसने एक सीटी छोड़ी| थोड़ी मौजी, थोड़ी विनोदी|


“आप चाहें तो उनसे मिल भी सकते हैं,” मैं उसकी मौज पर सवारहो ली, “हमारी वाली गाड़ी कोलकातातक तो जाती ही है| आपकल सुबह जाने की बजाय हमारे साथ परसों चलिएगा और लखनऊ स्टेशन पर हमें लिवानेआए मेरे पिता से मिल.....”
“मगर परसों मेरा कोलकाता में उपस्थित रहना बहुत ज़रूरी है.....”
“तलाक की तारीख लगी है?” मैंशरारत पर उतर आई|
“नहीं, नहीं, मेरी शादी ही अभी कहाँ हुई है?” वह बौखला उठा|
“तो क्या शादी की तारीख है?” अपनी चुहलबाज़ी मैंने जारी रखी|
“नहीं, नहीं| शादी के लिए मेरे मन में अभी न तो कोई इच्छा-विचार है और न ही कोई संकल्प-विकल्प| मेरी परिस्थितियाँ तो उषा से भी अधिक दु:साध्य हैं| उसके पास पिता हैं, पारिवारिक पूंजी है, स्थायी नौकरी है जबकि मेरे पास ज़िम्मेदारियों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं| न पिता, न मकान, न नौकरी.....”

“मतलब?” मैं आसमान से नीचे आ गिरी| उषा की जमा-बाकी अभी भी उससे ऊपर थी|

“मतलब यह कि मुझे कहीं से भी कोई नियमित अथवा निश्चित राशि नहीं मिलती| यों समझिए, भाड़े का मज़दूर हूँ| मालिक कहता है, हाज़िर हो, रोकड़ लो और लोप हो जाओ और रोकड़ मुझे चाहिए ही चाहिए| अपनी विधवा माँ के लिए, स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई कर रही अपनी तीन बहनों के लिए| इसीलिए एक साथ कई काम पकड़े हूँ| दसवीं जमात वाले बच्चों को एक कोचिंग सेन्टर में पढ़ाने का, इन्टर कॉलेज के एक प्रिंसिपल से ‘डिक्टेशन’ लेकर उनके कम्प्यूटर पर उनके शासकीय पत्र तैयार करने का, उसी कॉलेज के पुस्तकालय में नयी-पुरानी किताबों पर नए लेबल चिप
काने का, एक प्रिंटिंग प्रेस के प्रूफ़ पढ़ने का.....”
“आपने यह सब उषा को बताया?” मेरा सिर घूमने लगा| ऐसा भयंकर नामे-खाता!
“हाँ, बताया, सब बताया|”
“और उसने क्या कहा?”
“उसने कहा यह सब पारिस्थितिक है| परिवर्तनीय है, चिरस्थायी नहीं| कॉलेज में पढ़ रही मेरी बहन अधिक समय तक मेरी आश्रित नहीं रहेगी| निकट भविष्य ही में मेरी सहायक बनकर मुझे अपनी बांह की छांह देगी और मैं अपनी मूलभूत परियोजनाओं कोआगे बढ़ा सकूंगा-श्रेष्ठ शिक्षा की, उत्तम नौकरी की, प्रफुल्ल जीवन की.....”

“छांह देने के लिए उषा ने अपनी बांह नहीं बढ़ाई?” मैंने उलटा धड़ बांधा, ‘आप होंगे कामयाब’ कहा और कतरा कर आगे निकल ली| राजा के लिए नए कपड़े बुने जा रहे हैं मगर करघा खाली है| दुर्ग के बाहर पहरा बिठलाया गया है और दुर्ग छूछा है.....”

कहानी -चचेरी

“आप ऐसा समझती हैं?” प्रभात कुमार ने चतुराई तौली|
"बिलकुल ऐसा ही समझती हूँ,” जिस घात की ताक में मैं रही थी वह घात मुझे मिल गयी थी|

“फिर आप कहिए, कैसे होऊंगा मैं ‘कामयाब’? कब होऊंगा मैं ‘कामयाब’?”
“आप पहले मुझे एक ‘मिस्ड कॉल दीजिए,” अपना फ़ोन मैंने हवा में जा लहराया|
“मेरे नम्बर से क्या होगा” अस्थिर हो रहे अपने स्वर को सँभालने में उसे प्रयास करना पड़ा|
“आपका नम्बर इसमें ‘सेव’ करूंगी| फिर लखनऊ पहुँचते ही अपने पिता से आपकी बात करवाऊंगी| कोलकाता से उनका माल कई जगह से आता है| वहां उनके तमाम परिचित हैं| उनमें से शायद कोई आपको कच्ची सड़क पर जा पहुंचाए| मेरे पिता बाजू देने परआते हैं तो फिर पीछे नहीं हटते.....”

जानती थी मेरे पिता उसके हिताहित को बातों में उड़ा देंगे| किन्तु बातें गढ़ने में हर्ज ही क्या था? उषा ने भी तो प्रभात कुमार को बातों ही में बहलाया-फुसलाया था|

“अपना नम्बर बताइए|” उसने अपनी जेब से अपना मोबाइल हाथमें ले लिया|

“पिंजौर आ गया|”बस के कंडक्टर ने जैसे ही घोषणा की हम दोनों एक साथ खड़े हो लिए|
बस से नीचे उतरने में पहल प्रभात कुमार ने की|
“आइए,” और उतरते ही अपना हाथ मेरी ओर बढ़ा दिया|
“बस से मुझे नीचे उतारने के लिए|”

“धन्यवाद,” मैंने अपना हाथ उसके हाथ में दे दिया और बस को पीछे, बहुत पीछे छोड़कर हम फूलों की ओर निकल पड़े|

दीपक शर्मा 

लेखिका -दीपक शर्मा


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दहेज़ नहीं  बेटी को दीजिये  सम्पत्ति में हक


हमारी तरफ एक कहावत है , “ विदा करके माता उऋण हुई, सासुरे की मुसीबत क्या जाने” अक्सर माता –पिता को ये लगता है कि हमने लड़के को सम्पत्ति दी और लड़की को दहेज़ न्याय बराबर , पर क्या ये सही न्याय है ?

 दूसरी कहावत है भगवान् बिटिया ना दे, दे तो भागशाली दे |” यहाँ भाग्यशाली का अर्थ है , भरी पूरी ससुराल और प्यार करने वाला पति | निश्चित तौर पर ये सुखद है , हम हर बच्ची के लिए यही कामना करते आये हैं करते रहेंगे , पर क्या सिर्फ कामना करने से सब को ऐसा घर मिल जाता है ? 


 विवाह क्या बेटी के प्रति माता पिता की जिम्मेदारी का अंत हो जाता है | क्या ससुराल में कुटटी -पिटती बेटियों को हर बार ,अब वो घर ही तुम्हारा है की घुट्टी उनके संघर्ष को कम कर देती है ? क्या विवाह के बाद बेटी के लिए मायके से मदद के सब दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाने चाहिए ? 

दहेज़ नहीं  बेटी को दीजिये  सम्पत्ति में हक 


आंकड़े कहते हैं  घरेलु महिलाओं द्वारा की गयी आत्महत्या , किसानों द्वारा की गयी आत्महत्या के मामलों से चार गुना ज्यादा हैं | फिर भी ये कभी चर्चा का विषय नहीं बनती न ही नियम-कानून  बनाने वाले कभी इस पर खास तवज्जो देते हैं | उनमें से ज्यादातर 15 -39 साल की महिलाएं हैं , जिनमें विवाहित महिलाओं की संख्या 71% है | ये सवाल हम सब को पूछना होगा कि ऐसी स्थिति क्यों बनती है कि महिलाएं मायका होते हुए भी इतनी असहाय क्यों हो जाती हैं कि विपरीत परिस्थितियों में मृत्यु को गले लगाना ( या घुट –घुट कर जीना ) बेहतर समझती हैं ?



बेटियों को दें शिक्षा  


 मेरे ख्याल से बेटियों को कई स्तरों पर मजबूत करना होगा | पहला उनको शिक्षित करें , ताकि वो अपने पैरों पर खड़ी हो सकें | इस लेख को पढने वाले तुरंत कह सकते हैं अरे अब तो हर लड़की को पढ़ाया जाता है | लेकिन ऐसा कहने वाले दिल्ली , मुंबई , कानपुर , कलकत्ता आदि बड़े शहरों के लोग होंगे | MHRD की रिपोर्ट के मुताबिक़ हमारे देश में केवल ३३ % लडकियां ही 12th का मुँह देख पाती हैं | दिल्ली जैसे शहर में किसी पब्लिक स्कूल में देखे तो ग्यारहवीं में लड़कियों की संख्या लड़कों की तुलना नें एक तिहाई ही रह जाती है | गाँवों की सच्चाई तो ये हैं कि 100 में से एक लड़की ही बारहवीं का मुँह देख पाती है | इसकी वजह है कि माता -पिता सोचते हैं कि लड़कियों को पहले पढ़ने में खर्च करो फिर दहेज़ में खर्च करो इससे अच्छा है जल्दी शादी कर के ससुराल भेज दो , आखिर करनी तो शादी ही है , कौन सी नौकरी करानी है ? अगर नौकरी करेगी भी तो कौन सा पैसा हमें मिलेगा ? ये दोनों ही सोच बहुत खतरनाक हैं क्योंकि अगर बेटी की ससुराल व् पति इस लायक नहीं हुआ कि उनसे निभाया जा सके तो वो उसे छोड़कर अकेले रहने का फैसला भी नहीं ले पाएंगी | एक अशिक्षित लड़की अपना और बच्चों का खर्च नहीं उठा पाएगी, मजबूरन या तो उस घुटन भरे माहौल में सिसक -सिसक कर रहेगी या इस दुनिया के पार चले जाने का निर्णय लेगी | 


बेटी में विकसित करें आत्मसम्मान की भावना 


 घर में भाई –बहनों में भेद न हो , क्योंकि ये छोटे –बड़े भेद एक बच्ची के मन में शुरू से ही ये भावना भरने लगते हैं कि वो कमतर है | कितने घर है जहाँ आज भी बेटे को प्राइवेट व् बेटी को सरकारी स्कूल में दाखिला करवाया जाता है , बेटे को दूध बादाम दिया जाता है , बेटियों को नहीं | कई जगह मैंने ये हास्यास्पद तर्क सुना कि इससे बेटियाँ जल्दी बड़ी हो जाती हैं , क्या बेटे जल्दी बड़े नहीं हो जाते ? कई बार आम मध्यम वर्गीय घरों में बेटे की इच्छाएं पूरी करने के लिए बेटियों की आवश्यकताएं मार दी जाती हैं | धीरे -धीरे बच्ची के मन में ये भाव आने लगता है कि वो कुछ कम है |  जिसके अंदर कमतर का भाव आ गया उसको दबाना आसान है ,मायके में शुरू हुआ ये सिलसिला ससुराल में गंभीर शोषण का रूप ले लेता है तो भी लड़की सहती रहती है क्योंकि उसे लगता है वो तो सहने के लिए ही जन्मी है |  पूरे समाज को तो हम नहीं  बदल सकते पर कम से कम अपने घर में तो ऐसा कर सकते हैं |


बेटी को दें सम्पत्ति में हिस्सा 




 जहाँ तक सम्पत्ति की बात है तो मेरे विचार से को सम्पत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए , उसके लिए ये भी जरूरी है कि दहेज़ ना दिया जाए | ऐसा मैं उन शिक्षित लड़कियों को भी ध्यान में रख कर कह रही हूँ जो कल को अपने व् बच्चों के जीविकोपार्जन कर सकती हैं | कारण ये है कि जब कोई लड़की लम्बे समय तक शोषण का शिकार  रही होती है , तो पति का घर छोड़ देने के बाद भी उस भय  से निकलने में उसे समय लगता है , हिम्मत इतनी टूटी हुई होती है कि उसे लगता है वो नहीं कर पाएगी ... इसी डर के कारण वो अत्याचार सहती रहती है | 

जहाँ तक दहेज़ की बात है तो अक्सर माता –पिता को ये लगता है कि हमने लड़के को सम्पत्ति दी और लड़की को दहेज़ न्याय बराबर , पर क्या ये सही न्याय है ? जब कोई लड़की अधिकांशत : घरों में जो दहेज़ लड़की को दिया जाता है उसमें उसे कुछ मिलता नहीं है | माता –पिता जो दहेज़ देते हैं उसमें 60: 40 का अनुपात होता है यानि तय रकम में से 60% रकम ( सामान , साड़ी , कपड़ा , जेवर केरूप में ) लड़की के ससुराल जायेगी और 40 % विवाह समारोह में खर्च होगी | सवाल ये है कि जो पैसे विवाह समारोह में खर्च हुए उनमें लड़की को क्या मिला ? यही पैसे जब माता –पिता अपने लड़के की शादी के रिसेप्शन में खर्च करते  हैं तो उसे लड़के को दी हुई रकम नहीं मानते हैं | 

कुछ जो अपने को उदार समझते हैं वो लिए जाने वाले दहेज़ में से कुछ  कम ले कर अपने रिशेप्शन का भार  लड़की वालों पर डाल देते हैं | खैर जो भी सामान लड़की ले कर आई है वो ससुराल का हो जाता है | जेवर और कपड़े  ही लड़की के हिस्से में आते हैं उनमें भी जेवर अगर आ सके तो , मैंने ऐसे कई विवाह देखे हैं जहाँ विवाह टूटने की स्थिति में कोर्ट द्वारा सामान लौटाए जाने का निर्णय देने पर भी ससुराल वाले सारा सामान तोड़ कर देते हैं जो किसी भी तरह से इस्तेमाल में नहीं आता | 

वैसे भी दहेज़ एक बार दिया जाता है , वो भी उस समय जब ससुराल में लड़की बिलकुल नयी व् अकेली होती है , वो उस पैसे में से कुछ भी निवेश नहीं कर पाती , लेकिन अगर उसके पास सम्पत्ति में हिस्सा है तो बेवजह पिटने , शारीरिक मानसिक अत्याचार की स्थिति में एक कड़क फैसला  लेने की हिम्मत कर  सकती है | 

बहुत से लोग ये तर्क रख सकते हैं कि बेटियों को तो पहले से ही कानूनन ये हक मिला है | जी हाँ , जरूर मिला है पर उसका प्रयोग कितनी लडकियां कर पाती हैं | कई ऐसी लड़कियों की आपबीती सुन चुकी हूँ , जिनके माता -पिता के पास ज्यादा पैसा है वो शादी से पहले ही लड़की से स्टाम्प पेपर पर हस्ताक्षर करवा लेते हैं कि , " मैं सम्पत्ति पर अपना हक छोड़ रही हूँ | " वैसे भी ज्यादातर माता -पिता आज भी दहेज़ ही देते हैं | जब ससुराल में बेटी की स्थिति ख़राब होती है तो वो मायके से संबंध बिलकुल भी नहीं बिगाड़ना चाहती क्योंकि नए सिरे से खड़े होने के लिए उसे भावनात्मक संबल की भी जरूरत होती है | ऐसे में कानूनी अधिकार काम नहीं आते |इसके लिए सामजिक पहल की जरूरत है , शुरुआत अपनी ही बेटी से करनी होती है | 

ये हमारी बेटियाँ है , अगर हम चाहते हैं कि वो हमेशा खुश रहे तो पुरानी परम्पराओं को तोड़ कर नए सामाजिक सुधार हमें ही करने होंगे | 

वंदना बाजपेयी 

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कहानी -दलदल

  
यूँ तो दलदल हर चीज को निगल जाता है , इसलिए बहुधा हम दलदल केपास जाने से  बचते हैं पर एक दलदल और है जो हमारे व्यक्तित्व को निगल जाता है वो है डर का दलदल | डर जो हमें अपने अंदर खींचता रहता है और आगे बढ़ने से  रोक देता है, जरूरत है इस दलदल से बाहर निकलने की | पढ़िए वरिष्ठ कथाकार सुशांत सुप्रिय की कहानी -दलदल 

 कहानी -दलदल 

" मैं उस समय बारह साल का था । वह दस साल का रहा होगा । वह -- मेरा सबसे अच्छा मित्र सुब्रोतो । " बूढ़े की भारी आवाज़ कमरे में गूँज उठी । वह हमें अपने जीवन की सत्य-कथा सुना रहा था ।
      
 कुछ पल रुक कर बूढ़े ने फिर कहना शुरू किया , " मेरा जन्म सुंदरबन इलाक़े के पास एक गाँव में हुआ । गाँव से दो मील दूर दक्षिण में दलदल का इलाक़ा था । पिता मछुआरे थे जो गाँव के उत्तर में बहती नदी से मछलियाँ पकड़ने का काम करते थे । पिता बताते थे कि पच्चीस-तीस मील दूर जा कर यह नदी एक बड़ी नदी में मिल जाती थी । गाँव के पूरब और पश्चिम की ओर घने जंगल थे ।
     

मेरा मित्र सुब्रोतो बचपन में ही अपाहिज हो गया था । पोलियो की वजह से उसकी एक टाँग हमेशा के लिए बेकार हो गई थी । पर मेरी सभी शरारतों और खेलों में वह मेरा भरपूर साथ निभाने की कोशिश करता था । सुब्रोतो की आवाज़ बहुत सुरीली थी । वह बहुत मीठे स्वर में गीत गाता था । उसके गाए गीत सुन कर मैं मस्त हो जाता था ।
      

हमें गाँव के दक्षिण में स्थित दलदली इलाक़े की ओर जाने की सख़्त मनाही थी ।उस दलदल के भुतहा होने के बारे में अनेक तरह की कहानियाँ प्रचलित थीं । हम बच्चे अक्सर गाँव के उत्तर में बहती नदी के किनारे जा कर खेलते थे । मैं नदी में किनारे के पास ही तैरता रहता जबकि सुब्रोतो किनारे पर बैठा नदी के पानी में एक कोण से चपटे पत्थर फेंक कर उन्हें पानी की सतह पर फिसलता हुआ देखता ।
     

अपने हम-उम्र बच्चों के बीच मैं बड़ा बहादुर माना जाता था । दरअसल मैंने एक बार गाँव में घुस आए एक लकड़बग्घे पर पत्थर फेंक-फेंक कर उसे गाँव से बाहर भगा दिया था । एक बार नदी किनारे खेलते-खेलते गाँव के कुछ बच्चों ने मुझे चुनौती दी कि क्या मैं गाँव के दक्षिण के दलदली इलाक़े में अकेला जा सकता था ? बात जब इज़्ज़त पर बन आई तो मैंने चुनौती मान ली । हालाँकि सुब्रोतो ने मुझे ऐसा करने से मना किया पर तब तक मैंने हामी भर ली थी । यह तय हुआ कि कल मैं गाँव के दक्षिण में स्थित दलदली इलाक़े में जाऊँगा और सकुशल लौट कर दिखाऊँगा ।
     

  नियत दिन सुबह गाँव के सभी बच्चों की टोली गाँव के दक्षिणी छोर पर पहुँची । मैं और सुब्रोतो भी उन सब के साथ थे । मुझे दो मील दूर के दलदली इलाक़े में जा कर कुछ समय वहाँ बिताना था और फिर सकुशल वापस लौट कर दिखाना था । सबूत के लिए मुझे दलदल की कुछ गीली मिट्टी साथ ले जाए जा रहे थैले में भर कर वापस लानी थी । बाक़ी बच्चे वहीं मेरा इंतज़ार करने वाले थे । उस दलदली इलाक़े में जाने से सभी डरते थे ।

       
लेकिन ऐन मौक़े पर मुझे भी उस दलदली इलाक़े में अकेले जाने में डर लगने लगा । मैंने बाक़ी बच्चों से इजाज़त माँगी कि मेरा प्रिय मित्र सुब्रोतो भी मेरे साथ जाएगा । बाक़ी बच्चे बड़ी मुश्किल से माने पर सुब्रोतो ने दलदली इलाक़े में जाने से साफ़ इंकार कर दिया । जब मैंने उसे हमारी मित्रता का वास्ता दे कर भावुक किया तब जा कर वह मेरे साथ चलने के लिए तैयार हुआ ।
       

आख़िर उस सूर्य-जले दिन हमने अपना सफ़र शुरू किया । दो-ढाई मील चल कर अंत में हम दोनों उस इलाक़े में पहुँच गए । सामने खदकता हुआ दलदल था जिसमें डरावने बुलबुले फूट रहे थे और अजीब-सी भाफ़ उठ रही थी । दलदल के किनारे से कुछ दूर पहुँच कर हम दोनों बैठ गए । सुब्रोतो लँगड़ा कर चलने की वजह से बेहद थक गया था और हाँफ रहा था । लेकिन असली काम तो अभी बाक़ी था । सबूत के तौर पर हमें दलदल की थोड़ी गीली मिट्टी साथ लाए थैले में भर कर वापस ले जानी थी ।
     
  सुब्रोतो को वहीं छोड़ कर मैं दलदल की ओर आगे बढ़ा । ज़मीन घास, मरे हुए पत्तों और फिसलन भरी काई से ढँकी हुई थी । ठीक से कुछ पता नहीं चल रहा था कि कहाँ ठोस ज़मीन ख़त्म हो गई थी और गहरा दलदल शुरू हो गया था ।

       
अगला क़दम ज़मीन पर रखते ही मैंने पैर को धँसता हुआ महसूस किया । इससे पहले कि मैं सँभल पाता , मेरा दूसरा पैर भी दलदल में धँसने लगा था ।

       
मैं सुब्रोतो का नाम ले कर ज़ोर से चिल्लाया । लेकिन जब तक सुब्रोतो लँगड़ाते हुए मेरे पास पहुँचता , मैं कमर तक दलदल में धँस गया था । जैसे नदी में डूबता हुआ आदमी तिनके को भी सहारा समझ कर बचने के लिए व्याकुल हो कर छटपटाता है , उसी तरह मैंने भी सुब्रोतो के अपनी ओर बढ़े हुए हाथ को कस कर अपने हाथों में पकड़ लिया और व्याकुल हो कर छटपटाते हुए ख़ुद को किसी तरह दलदल से बाहर निकालना चाहा । लेकिन जब मैंने उसके हाथ के सहारे दलदल से बाहर निकलने की कोशिश की तो इस खींच-तान में सुब्रोतो के पैर की किनारे पर से पकड़ ढीली हो गई और वह भी मेरे साथ ही उस दलदल में आ गिरा । देखते-ही-देखते वह भी दलदल में कमर तक धँस गया । दलदल हर पल हम दोनों पर अपना शिकंजा कसते हुए हमें नीचे खींचता जा रहा था ।


     
घबरा कर मैंने  इधर-उधर देखा । किनारे पर उगे एक बरगद के पेड़ की शाखाएँ दलदल के ऊपर फैली थीं । वहाँ से कुछ लम्बी जटाएँ नीचे दलदल की ओर आ रही थीं ।

मैं पूरा ज़ोर लगा कर ऊपर की ओर उचका और मैंने अपने दोनों हाथ उन जटाओं की ओर फैलाए । पता नहीं यह मेरे उचकने का असर था या जटाओं को ही मुझ पर दया आ गई थी , नीचे दलदल की ओर लटकी एक मज़बूत जटा मेरी हथेलियों की गिरफ़्त में आ गई । उस जटा की पकड़ के सहारे मैं किसी तरह धीरे-धीरे ख़ुद को दलदल से बाहर खींचने में कामयाब हो गया । मैं वैसे भी शरीर से हृष्ट-पुष्ट था । जटा को पकड़ कर मैं ऊपर बरगद की शाख़ा पर चढ़ गया । तब तक सुब्रोतो छाती तक दलदल में धँस चुका था ।

     
मुझे पता था , यदि मैंने सुब्रोतो को बचाने के लिए जल्दी ही कुछ नहीं किया तो दलदल उसे साबुत निगल जाएगा । लेकिन मेरे हाथ-पैर ठीक विपरीत दिशा में काम कर रहे थे । डर ने मुझे जकड़ रखा था । मेरी देह जल्दी-से-जल्दी उस दलदल की पहुँच से दूर भाग जाना चाहती थी ।

     
मुझे ख़ुद भी नहीं याद , किस तरह मैं पेड़ से उतर कर किनारे पर पहुँचा । जब मुझे होश आया , तब तक सुब्रोतो गले तक दलदल के भीतर जा चुका था । लेकिन उसके हाथ अब भी बाहर थे । मैंने भाग कर पेड़ से लटकती एक लम्बी जड़ तोड़ कर उसकी ओर फेंकी । पर शायद तब तक बहुत देर हो चुकी थी । हालाँकि सुब्रोतो ने जटा अपने हाथों में पकड़ी और मैंने उसे बाहर खींचने की कोशिश भी की किंतु वह जटा सुब्रोतो के अशक्त हाथों से बार-बार छूट जाती थी । संभवत: वह उस दलदल में बहुत गहराई तक धँस चुका था । शायद उसकी देह में अब अधिक ऊर्जा नहीं बची थी । या फिर कोई अथाह शक्ति हमारी तमाम कोशिशों के बावजूद उसे धीरे-धीरे नीचे खींचती चली जा रही थी ।

     
देखते-ही-देखते सुब्रोतो दलदल में ग़ायब होने लगा । मेरी आँखों के सामने ही उस राक्षसी दलदल ने उसे ज़िंदा निगल लिया । नीचे जाते समय उसके चेहरे पर एक अजीब कातर भाव था , जैसा भाव मारने के लिए ले जाए जा रहे बकरे के चेहरे पर होता है । एक अजीब-सी आवाज़ हुई और सुब्रोतो का सिर दलदल के भीतर ग़ायब हो गया । दलदल की सतह पर पहले जहाँ सुब्रोतो था , वहाँ कुछ पल बड़े-बड़े बुलबुले फूटते रहे ।

फिर एक ऐसी मनहूस सघन चुप्पी वहाँ छा गई जैसे सारे विश्व की आवाज़ें किसी दानवी शक्ति ने सोख ली हों ।

     
मैं सन्न रह गया । सब मेरी ही ग़लती थी । सुब्रोतो तो इस दलदली इलाक़े में आना ही नहीं चाहता था । मैं ही उसे मौत के मुँह में घसीट लाया । मैं अपनी जगह पर जड़ हो गया था ।
     
सुब्रोतो को दलदल में ग़ायब हुए एक-दो मिनट बीत चुके थे । तभी एक अजीब-सी भयावह आवाज़ हुई -- जैसे गले में कुछ फँस जाने पर कोई चिल्लाने की मर्मांतक कोशिश कर रहा हो ।

     
अब मैं आप को जो बताऊँगा , उस पर आप यक़ीन नहीं करेंगे । मुझे मालूम है, आप को यह असम्भव लगेगा । आप कहेंगे -- वह मेरा भ्रम था । वहम था । पर नहीं । मैं अपने पूरे होशो-हवास में था । यही सच है ।

     
दलदल में पूरा धँस कर ग़ायब हो जाने के लगभग दो मिनट बाद एक अजीब-सी भयावह आवाज़ के साथ अचानक सुब्रोतो का कीचड़ से सना सिर और दोनों हाथ दलदली मिट्टी से ऊपर निकल आए ! जी हाँ , मेरा सबसे अच्छा मित्र सुब्रोतो , जिसे कुछ देर पहले दलदल पूरा का पूरा लील गया था , उसने एक झटके से अपना कीचड़-सना सिर और अपने दोनों हाथ दोबारा दलदल से बाहर निकाल लिए थे । क्या उसने अपनी समस्त संचित ऊर्जा केंद्रित करके जीवित बचे रहने का एक अंतिम महा-प्रयास किया था ? क्या वह मौत के पंजों में छटपटा रहे जीवन की एक अंतिम फड़फड़ाहट थी ? या वह कुछ और ही था जो मेरी समझ और कल्पना , दोनों से परे था ? ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि सुब्रोतो का चेहरा उसका अपना चिर-परिचित चेहरा नहीं लग रहा था । यह मेरा वह मित्र नहीं लग रहा था जिसे मैं बरसों से जानता था ।

     
दरअसल सुब्रोतो के कीचड़-सने चेहरे पर एक विकृत मुस्कान फैली थी जिसके भीतर से उसकी दो खुली आँखें किसी अतिरिक्त ऊर्जा से चमक रही थीं । दहकते अंगारों-सी लाल आँखें ! मेरी दिशा में फैले उसके दोनों हाथ मदद माँगते-से नहीं लग रहे थे बल्कि मुझे पकड़ कर उस भुतहे दलदल में खींच लेने को आतुर-से लग रहे थे । बल्कि यदि मैं पास होता तो वे हाथ मुझे निश्चित-ही दबोच लेते ।

     
मैं बेहद डर गया और थर-थर काँपने लगा । हालाँकि मेरा ज़हन मुझे कह रहा था कि मैं फिर से पेड़ से तोड़ी गयी लम्बी जड़ उसकी ओर फेंक कर उसे बचाने का प्रयास करूँ , किंतु मेरी पूरी देह इस सोच के विरुद्ध एकजुट हो गई थी । बदहवास-सा मैं पलटा और वहाँ से सरपट भागा ।बहुत दूर जा कर ही मैंने हाँफते हुए मुड़ कर देखा । सुब्रोतो का सिर अब दोबारा दलदल में नीचे धँसने लगा था । किंतु उसके दोनों हाथ अब भी मुझे अपनी ओर बुलाते प्रतीत हो रहे थे ...

     
जब मेरी आँख खुली तो मैं गाँव में अपने घर के बिस्तर पर पड़ा था । मेरी माँ मेरे सिरहाने बैठी थी । पिता बगल में खड़े थे । मैं उन्हें सुब्रोतो के साथ हुई दुर्घटना के बारे में बता कर रोने लगा । यह सुन कर माँ ने मुझे सीने से लगा लिया । तब पिता ने बताया कि जब मैं कई घंटों तक नहीं लौटा तो गाँव के बच्चे बड़ों को ले कर दलदली इलाक़े की ओर गए । मैं उन्हें  दलदल से कुछ दूर ज़मीन पर बेहोश पड़ा मिला था । तेज़ बुखार में तपता हुआ । वे सब मुझे उठा कर गाँव ले आए । 

पिता ने बताया कि मैं तीन दिनों तक नीम-बेहोशी की हालत में बिस्तर पर पड़ा सुब्रोतो का नाम बड़बड़ाता रहा था । गाँव का ओझा आ कर अपना यत्न कर गया था । उसका कहना था कि उस भुतहा दलदल वाले इलाक़े में जाने की वजह से मेरे अंदर किसी प्रेत का वास हो गया था । लेकिन अंत में पड़ोसी गाँव के वैद जी के देसी उपचार से ही तीन दिन के बाद आज मुझे होश आया था ।
      

उस त्रासद घटना के बाद मेरा जीवन पहले जैसा नहीं हो पाया । सुब्रोतो के पिता इस सदमे से पागल-से हो गए । वे मुझे अक्सर गाँव के दक्षिणी दलदली इलाक़े की ओर बौराए-से भटकते दिखते । मैं इस दुर्घटना के लिए ख़ुद को कभी माफ़ नहीं कर पाया । मुझे लगता, मैं सुब्रोतो को बचा सकता था । लेकिन मैं कायर निकला । भयभीत मैं उसे दलदल में धँसता हुआ छोड़ कर भाग आया । उसकी वह अंतिम छवि मेरे स्मृति-पटल पर सदा के लिए अंकित हो गई थी : दलदली कीचड़ से सना उसका चेहरा ... उसकी विकृत मुस्कान ... अंगारों-सी दहकती उसकी आँखें ... मेरी ओर फैले उसके दोनों हाथ ... । चाह कर भी मैं उस मारक छवि से मुक्ति नहीं पा सका ।
     

अक्सर सुब्रोतो मेरे दु:स्वप्नों में आता । मेरी ओर फैले उसके दोनों हाथ मुझे दबोच लेते और अपने साथ उस भुतहा दलदल में खींच ले जाते । सर्दियों की रात में डर की कँपकँपी के कारण मेरी नींद खुल जाती और मैं ख़ुद को पसीने से तरबतर पाता । यह भावनात्मक सदमा मुझे चैन से जीने नहीं दे रहा था । जब मैं आईने में देखता तो मेरी छवि अपना मुँह मोड़ लेना चाहती । मेरा जीवन जैसे उस दलदल का बंधक बन कर रह गया था । मैं अपने दु:स्वप्नों के भीतर फँसा छटपटाता रहता ।
      
मेरी ऐसी हालत देख कर पिता ने मुझे पढ़ने के लिए एक रिश्तेदार के पास कलकत्ता भेज दिया । पढ़ाई के बाद मेरी नौकरी दिल्ली में लग गई । मैं फिर कभी गाँव नहीं गया । दरअसल मैंने अपना गाँव हमेशा के लिए छोड़ दिया था । मुझे दु:स्वप्न आने कम हो गए लेकिन पूरी तरह बंद नहीं हुए । मैं गाँव से दूर चला आया था लेकिन गाँव की स्मृतियाँ मुझसे पूरी तरह दूर नहीं हो सकी थीं ।
   


   मैंने शहर की एक लड़की से शादी कर ली । फिर मेरे घर बेटे ने जन्म लिया । समय बीतता गया । कई बरस बाद माँ-बाबूजी भी चल बसे । पर मैं वापस गाँव नहीं गया । उन्हीं दिनों मैंने यह कविता लिखी थी : " तुम डरते हो / एड्स से / कैंसर से / मृत्यु से / मैं डरता हूँ / उन पलों से / जब जीवित होते हुए भी / मेरे भीतर कहीं / कुछ मर जाता है ...।"
    

  धीरे-धीरे मेरा बेटा दस साल का हो गया । वह भी बहुत सुरीली आवाज़ में गाना गाता था । उसके गाए गीत सुन कर मुझे सुब्रोतो की बहुत याद आती । कभी-कभी मुझे लगता जैसे सुब्रोतो ने ही मेरे घर में बेटे के रूप में जन्म ले लिया है । पता नहीं आप इसके बारे में क्या कहेंगे लेकिन धीरे-धीरे मेरे दिल की यह धारणा मज़बूत होती जा रही थी ।
      
अंत में मैंने फ़ैसला किया कि मैं वापस गाँव जाऊँगा । अब मैं चालीस साल का हो गया था । आख़िर कब तक मैं उस त्रासद घटना का बोझ सलीब-सा अपने कंधों पर ढोता रहता ?
      

गर्मी की छुट्टियों में मैं तीस बरसों का लम्बा अंतराल पार करके गाँव चला आया ।
मेरी पत्नी और बेटा भी मेरे साथ थे । दूर से देखा मैंने गाँव के अपने घर को , गोया अंतरिक्ष से देखा मैंने धरती उर्वर को । मन में एक धुकधुकी भी थी कि मेरी अधेड़ आँखें मेरे बचपन के दृश्यों का सामना अब न जाने कैसे कर पाएँगी । मेरे ज़हन में बचपन के मधुर दिनों की स्मृतियाँ लौटने लगीं । लेकिन गाँव अब पहचाना भी नहीं जा रहा था । वह जैसे एक बाज़ार में तब्दील हो चुका था । अब घरों में घुस आया था बाज़ार । बाज़ार में खो गए थे घर ।अब पक्की गलियों वाले कस्बेनुमा स्वरूप में बदल चुके मेरे गाँव में जगह-जगह कोका-कोला और पेप्सी बेचने वाली दुकानें खुल गई थीं ।

दुकानों में वोडाफ़ोन , एयरटेल और आइडिया कनेक्शन के सिम-कार्ड बिकने लगेथे । गाँव में डिश टी. वी. , टाटा- स्काइ और केबल-कनेक्शन पहुँच चुका था । सुनने में आया कि ' वालमार्ट ' भी उस इलाक़े में अपना आउटलेट खोलने वाला था । कई और बहु-राष्ट्रीय कंपनियों के आउटलेट तो गाँव में पहले ही खुल चुके थे । गाँव अब बाज़ार की गिरफ़्त में जा चुका था । वह मेरा पहले वाला गाँव नहीं रहा था । वह अपना अक्षत क्वाँरापन खो चुका था ।
      
गाँव के पूरब और पश्चिम में उगा जंगल काट दिया गया था । वहाँ कारें बनाने वाली एक विदेशी कंपनी ने अपना प्लांट लगा लिया था । इस कंपनी ने हर तरह के हथकंडे अपना कर कई गाँववालों से भी उनकी ज़मीन ख़रीद ली थी । उत्तर में बहती नदी पर बाँध बन गया था । इस की चपेट में आने से हमारा गाँव तो बच गया था लेकिन उत्तर में बसे कई गाँव बाँध के पानी में डूब गए थे और वहाँ के लोग विस्थापित हो गए थे ।
      
लेकिन जो बात आपको चौंका देगी, अब वह सुनिए । गाँव से दो मील दूर दक्षिण में स्थित दलदल को टनों मिट्टी डाल कर बिल्कुल भर दिया गया था । इस ठोस बना दी गई ज़मीन पर विदेशी सामान बेचने वाली कई दुकानें खड़ी हो गई थीं । उस पुराने दलदल के स्थान पर अब बाज़ार मौजूद था । बाज़ार का नया ' दलदल ' -- मैंने सोचा ।

पढ़िए -दूसरे देश में       
ख़ैर । समय कब का करवट बदल चुका था । फिर मैं अपने दु:स्वप्नों के जाल में अब तक क्यों फँसा हुआ था? वहाँ खड़े-खड़े मैं बहुत देर तक यही सब सोचता रहा ।
  
    मैं सुब्रोतो की याद में कुछ करना चाहता था । मैंने गाँव में ज़मीन ख़रीद कर एक अस्पताल बनाने का फ़ैसला किया । मैंने वही ज़मीन ख़रीद ली जहाँ पहले दलदल हुआ करता था और अब दुकानें थीं । दुकानें तुड़वा कर मैंने वहीं अपने बचपन के मित्र के नाम पर ' सुब्रोतो मुखर्जी चैरिटी अस्पताल ' बनवाया । अब इस अस्पताल में इलाक़े के ग़रीब और बीमार लोगों की मुफ़्त देख-भाल होती है ।"

                                    

इतनी कहानी सुना कर बूढ़ा ख़ामोश हो गया । मैंने खिड़की से बाहर देखा । बाहर हवा चुप थी । सामने मैदान में खड़े ऐंठे पेड़ चुप थे । वहीं बेंच के नीचे बैठा रोज़ अपनी ही दुम से झगड़ने वाला लँगड़ा कुत्ता चुप था । एक सिमसिमी ख़ामोशी चू-चू कर सड़क की छाती पर बिछती जा रही थी । और सड़क चुप्पी की केंचुल उतार फेंकने के लिए कसमसा रही थी ।

   
आख़िर सघन चुप्पी को रौंदते हुए बूढ़े की भारी आवाज़ फिर गूँजी ," अपने डर से कभी मत डरो । डर को देख कर अपनी आँखें कभी मत मूँदो क्योंकि जो डर गया, समझो वह जीते-जी मर गया । आपके मामले में वह डर क्या है, मुझे नहीं पता । पर मेरे मामले में वह डर दलदल था । "

                           ------------
०------------
 सुशांत सुप्रिय
       

         
इंदिरापुरम ,
         ग़ाज़ियाबाद - 201010
         (
उ. प्र . )


                         
लेखक -सुशांत सुप्रिय '


यह कहानी अटूट बंधन पत्रिका में प्रकाशित है 





लेखक परिचय -



 परिचय
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नाम : सुशांत सुप्रिय
जन्म : 28 मार्च , 1968
शिक्षा : एम.ए.(अंग्रेज़ी ), एम . ए. ( भाषा विज्ञान ) : अमृतसर ( पंजाब ) ,  दिल्ली में 
प्रकाशित कृतियाँ :
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हत्यारे ( 2010 ) , हे राम ( 2013 ) , दलदल ( 2015 ) , ग़ौरतलब कहानियाँ
( 2017 ) , पिता के नाम ( 2017 , मैं कैसे हँसूँ ( 2019 ) : छह कथा-संग्रह 
इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं ( 2015 ) , अयोध्या से गुजरात तक ( 2017 ) , कुछ समुदाय हुआ करते हैं ( 2019 ) : तीन काव्य-संग्रह 
विश्व की चर्चित कहानियाँ ( 2017 ) , विश्व की श्रेष्ठ कहानियाँ ( 2017 ) , विश्व की कालजयी कहानियाँ ( 2017) : तीन अनूदित कथा-संग्रह 
सम्मान :
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भाषा विभाग ( पंजाब ) तथा प्रकाशन विभाग ( भारत सरकार ) द्वारा रचनाएँ पुरस्कृत  कमलेश्वर-स्मृति ( कथाबिंब ) कहानी प्रतियोगिता ( मुंबई ) में लगातार दो वर्ष प्रथम पुरस्कार  स्टोरी-मिरर.कॉम कथा-प्रतियोगिता , 2016 में कहानी पुरस्कृत  साहित्य में अवदान के लिए साहित्य-सभा , कैथल ( हरियाणा ) द्वारा 2017 में सम्मानित 
अन्य प्राप्तियाँ :
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कहानी ‘ दुमदार जी की दुम ‘ पर प्रतिष्ठित हिंदी  मराठी फ़िल्म निर्देशक विनय धूमले जी हिंदी फ़िल्म बना रहे हैं ।
# सितम्बर-अंत , 2018 में इंदौर में हुए एकल नाट्य प्रतियोगिता में सूत्रधार संस्था द्वारा मोहन जोशी नाम से मंचित की गई मेरी कहानी हे राम को प्रथम पुरस्कार मिला । नाट्य-प्रेमियों की माँग पर इसका कई बार मंचन किया गया ।
# पौंडिचेरी विश्वविद्यालय के Department of Performing Arts ने मेरी कहानी एक दिन अचानक के नाट्य-रूपांतर का 4 अगस्त व 7 अगस्त , 2018 को मंचन किया ।
# पीपल्स थिएटर ग्रुप के श्री निलय रॉय जी ने हिंदी अकादमी , दिल्ली के सौजन्य से मेरी कहानी खोया हुआ आदमी का मंचन 7 फ़रवरी , 2019 को दिल्ली के प्यारे लाल भवन में किया ।
कई कहानियाँ  कविताएँ अंग्रेज़ी , उर्दू , नेपाली , पंजाबीसिंधी , उड़ियामराठीअसमिया , कन्नड़ , तेलुगु  मलयालम आदि भाषाओं में अनूदित  प्रकाशित  कहानी " हे राम ! " केरल केकलडी वि.वि. ( कोच्चि ) के एम.. ( गाँधी अध्ययन ) पाठ्य-क्रम में शामिल  कहानी " खोया हुआ आदमी " महाराष्ट्र स्कूल शिक्षा बोर्ड की कक्षा दस के पाठ्य-क्रम में शामिल  कहानी " एक हिलाहुआ आदमी " महाराष्ट्र स्कूल शिक्षा बोर्ड की ही कक्षा नौ के पाठ्यक्रम में शामिल  कहानी " पिता के नाम " मध्यप्रदेश  हरियाणा के स्कूलों के कक्षा सात के पाठ्यक्रम में शामिल  कविताएँ पुणेविविके बी.( द्वितीय वर्ष ) के पाठ्य-क्रम में शामिल  कहानियों पर आगरा विवि. , कुरुक्षेत्र विवि. , पटियाला विवि. ,  गुरु नानक देव विवि. , अमृतसर आदि के हिंदी विभागों मेंशोधार्थियों द्वारा शोध-कार्य 
आकाशवाणी , दिल्ली से कई बार कविता  कहानी-पाठ प्रसारित 
लोक सभा टी.वीके " साहित्य संसार " कार्यक्रम में जीवन  लेखन सम्बन्धी इंटरव्यू प्रसारित 
अंग्रेज़ी  पंजाबी में भी लेखन  प्रकाशन  अंग्रेज़ी में काव्य-संग्रह ' इन गाँधीज़ कंट्री ' प्रकाशित  अंग्रेज़ी कथा-संग्रह '  फ़िफ़्थ डायरेक्शन ' प्रकाशनाधीन 
लेखन के अतिरिक्त स्केचिंग , गायन , शतरंज  टेबल-टेनिस का शौक़ 
संप्रति : लोक सभा सचिवालय , नई दिल्ली में अधिकारी 
 -मेल : sushant1968@gmail.com


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