April 2019

मृत्यु का समय  अटल है




मृत्यु एक अटल सत्य है | वो जब आनी है , जहाँ आनी है व्यक्ति को वहीँ खींच कर ले जाती है | कभी किसी ट्रेन एक्सीडेंट से थोडा ही पहले कोई व्यक्ति तिक्त कैंसिल करा कर बच जाता है और कोई उसी तिक्त को प्राप्त कर मारा जाता है...


मृत्यु का समय  अटल है 


बहुत समय पहले की बात है | एक बार गरुड़ क्षीर सागर के द्वार पर एक कबूतर से बात करने में व्यस्त थे | तभी वहां यमराज श्री हरिविष्णु सेमिलने आये और द्वार पर कबूतर को देखकर बोले ," अरे तुम यहाँ ? जैसे हरि इच्छा " और अंदर चले गए |


उनकी बात से कबूतर भय से कांपने लगा | उसने गरुण से कहा , लगता है मेरी मृत्यु निश्चित है | यमराज तो स्वयं किसी को देख भी लें तो वो प्राणी तो गया | औउर यहाँ तो वो साक्षात आये हैं | उन्होंने मुझे देखकर अरे तुम यहाँ कहा भी , मतलब वो प्रभु से मिलने के बाद मेरे प्राण ले कर ही जायेंगे |


कृपया कर के मुझे बचाइए | कहते हुए वो कबूतर गरुण के पैर पड़ने लगा |


ग्रौं को दया आ गयी | उसने कबूतर से कहा , " तुम चिंता ना करो , मुझसे ज्यादा तेज गति से उड़ने वाला कोई दूसरा पक्षी नहीं है | दो मिनट में मैं तुम्हें सुदूर हिमालय की एक गुफा में छोड़ कर वापस भी जाऊँगा | फिर तुम्हें यमराज कैसे ले जा पाएंगे |

कबूतर को बड़ी तसल्ली हुई | उसने कहा , " ठीक है , ठीक है जल्दी चलिए |

गरुड़ कबूतर को हिमालय की एक गुफा में छोड़ कर वापस आ गया और यमराज के लौटने का इन्तजार करने लगा |

करीब १० मिनट बाद यमराज वापस निकले |

गरुड़ ने उनको प्रणाम कर के पूछा , " प्रभु आप उस कबूतर को यहाँ देखकर क्यों बोले थे कि अरे तुम यहाँ , वो बेचारा बहुत डर गया था |

यमराज बोले ," हां मैं उसको यहाँ देखकर आश्चर्य में पड़ गया था क्योंकि उसकी मृत्यु ठीक दो मिनट बाद सुदूर हिमालय की एक गुफा में होनी  थी | वो कितनी भी ताकत लगा कर उड़े महीना भर से पहले वहां नहीं पहुँच सकता | "

तभी तो मैंने कहा था , "जैसी हरि की इच्छा "

यमराज तो चले गए पर गरुण वही सर पकड कर बैठ गए , कि कबूतर के वो प्राण बचना चाहते थे , उसे स्वयं मृत्यु के द्वार पर छोड़ कर आये थे |


होनी बहुत प्रबल होती है , मृत्यु व्यक्ति को खींच कर वहीं ले जाती है |

अटूट बंधन
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लुईस हे के 21 अनमोल विचार
www.louisehay.com से साभार 


लुइस हे एक अमेरिकन मोटिवेशनल ऑथर और हे हाउस की संस्थापक थी | उनका जन्म 8 अक्टूबर १९२६ में हुआ था और मृत्यु अगस्त ३० २०१७ में ,उन्होंने कई नए क्रांतिकारी विचारों वाली self help books लिखीं | जो जीवन में बदलाव कर शांति और सफलता बढ़ने में सहायक है | १९८६ में उनके द्वारा लिखी गयी किताब "you can heal your life'बहुत प्रसिद्द हुई |

उनका अपना खुद का जीवन बहुत से दुखों से भराहुआ था | उनका जन्म Los Angeles में हुआ था | उनकी माँ बहुत गरीब थीं जिन्होंने एक व्यक्ति से दूसरी शादी तब की जब वो बहुत छोटी थीं  थी | उनका सौतेला पिता उन्हें व् उनकी माँ को बहुत मारता -पीटता था | पांच वर्ष की आयु में उनके पड़ोसी ने उनका बालात्कार किया | आगे उन्हें हाई स्कूल से ड्राप लेना पड़ा क्योंकि वो गर्भवती  थीं | १६ वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी नन्ही बच्ची को गोद देने के लिए दे दिया | और शिकागो चली आयीं जहाँ वो बहुत कम तनख्वाह वाले काम करती थीं | १९५० में वो न्यू यॉर्क चली गयीं और मॉडलिंग करने लगीं | १९५६ में उन्होंने एक अंग्रेज व्यापारी एंड्रू हे से विवाह किया | १४साल के वैवाहिक जीवन के बादक अन्य स्त्री के कारण उन्होंने इन्हें छोड़ दिया | उस समय लुईस बिलकुल टूट गयीं |

तब उन्होंने जीवन बदलने वाले विचारों की पुस्तके पढ़ना शुरू किया | उन्होंने उसी समय माहिर्शी महेश योगी को भी पढ़ा व् जाना कि सकारात्मक विचारों से शरीर के घाव भी भरे जा सकते हैं |

उन्ही दिनों  उन्हें  सर्वाइकल कैंसर  हुआ | उन्हें लगा ये उस क्रोध को दबाये रखने के कारण है जो उन्होंने बचपन में पिता के अत्याचार और बलात्कार के प्रति दबाये रखा | उन्होंने  उस समय मेडिकल ट्रीटमेंट के स्थान पर भोजन शैली , रिलैक्स होने की थेरेपी और क्षमा व् आत्मुत्थान पर जोर दिया | वह ना सिर्फ कैंसर मुक्त हुई बल्कि उनके शरीर ने बहुत उर्जा महसूस की |

उसी के बाद उन्होंने पहली किताब 'Heal your body ' लिखी |  लिसे बाद में विस्तृत करके 'You can heal your life 'के रूप में १९८४ में प्रकाशित किया गया | ये किताब उस समय की बेस्टसेलर बनी | जिसका ३० भाषाओँ में अनुवाद हुआ और उसपर फिल्म भी बनी | आज भी ये किताब 50 क्लासिक सेल्फ हेल्प बुक्स के अंतर्गत आती है | इसकी ४० मिलियन सभी ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं |

उसी साल उन्होंने HIV /AIDS से ग्रस्त लोगों के सपोर्ट ग्रुप्स में काम करना शुरू किया | जिसे उन्होंने हे राइड्स का नाम दिया | इस ग्रुप के प्रति उनके समर्पण व् निष्ठां से उन्हें बहुत ख्याति मिली व् उन्हें ओप्रह विनफ्रे के शो व् अन्य प्रसिद्द कार्यक्रमों  में बुलाया जाने लगा |


२००८ में उन पर बनी फिल्म उनकी निजी जिंदगी पर आधारित है | वो बताती हैं कि उन्होंने इसमें कुछ नहीं छुपाया है , उन्होंने अपनी यात्रा अपने वैचारिक सिद्धांतों के बारेमें बताया है जो जीवन बदल सकते हैं और उनसे उन्होंने खुद का जीवन भी बदला है |

उनकी प्रमुख किताबें हैं ...

Heal your body

You can heal your life

The AIDS book

The garden of thoughts

Life loves you

Loving yourself to great health

Living perfect love

                                    आइये लुईस हे के जीवन में परिवर्तन लाने वाले 21 प्रमुख विचारों को जाने ...

जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने वाले लुईस हे के 21 अनमोल विचार 


1) तुम अपने अंतर्मन में बहुत समय से अपनी आलोचना कर रहे हो ,  ये तुम्हारे किसी काम नहीं आई | एक बार अपने को स्वीकार करो , फिर देखो क्या होता है |

2)इस अनंत जीवन में मैं कहाँ हूँ , जहाँ  सब कुछ  सही, समूचा और पूर्ण है | अब मैंने अपनी उस पुरानी विचारधारा पर विश्वास करना छोड़ दिया है कि दुनिया में सब कुछ सीमित है | अब मैंने अपने को उस नज़रसे देखना शुरू किया है जिस नज़र से ब्रह्माण्ड मुझे देखता है ...सही , समूचा और पूर्ण |

3)तुम्हारे पास अपने जीवन के घाव भरने की ताकत है , तुम्हें ये बात जानने की जरूरत हैं | हम कई बार सोचते हैं कि हम असहाय हैं पर ऐसा है नहीं , हमारे पास हमेशा अपने मष्तिष्क की शक्ति है | इस पर दावा बनाये रखो और इसे पूरी चेतना के साथ इस्तेमाल करो |


4)जब हम अपनी सोच और धारणा  का विस्तार करते हैं तो प्रेम मुक्त हो कर प्रवाहित होता है | जब हम  सोच के स्तर पर सिकुड़ते हैं तो हम अपने को ही बंद कर लेते हैं | क्या तुम्हें वो आखिरी समय याद है जब तुम प्रेम में थे और तुम्हारा ह्रदय कह रहा था , आह ! ये कितनी खूबसूरत भावना है | खुद को प्यार करना बिलकुल वैसा ही है , अंतर बस इतना है कि एक बार ये अहसास गहरे  उतर जाए तो ये भावना जिन्दगी भर साथ देती है , कभी छोड़ कर नहीं जाती , प्रेम का ये सुखद अहसास जिन्दगी भर बना रहता है |तो क्या आप नहीं चाहते कि आप वो सबसे खूबसूरत रिश्ता बनाए जो आप बना सकते हैं |

5)हमारा हर विचार जो हम सोचते हैं ,हमारा भविष्य बना रहा है |


6)मैं हर नकारात्मक विचार को 'बाहर निकलो 'कहती हूँ , जो मेरे दिमाग में घुसने की कोशिश कर रहा होता है | किसी व्यक्ति , वास्तु और स्थान की इतनी शक्ति नहीं है कि वो मुझ पर शासन  कर सके | अपने दिमाग के अंदर सोचने वाली केवल मैं हूँ | मैं अपनी वास्तविकता और उसमें रहने वाले हर व्यक्ति का  खुद सृजन करती हूँ |



लुईस हे के 21 अनमोल विचार


7)हर समय जब आप ध्यान लगाते हैं , हर समय जब आप जब आप अपने को heal करने के लिए कुछ विजुलाईज़ करते हैं , जब आप पूरे संसार के भले के लिए कुछ कहते हैं , हर उस क्षण आप पूरे विश्वके उसी तरह की विचारधारा वाले लोगों से मानसिक रूप से जुड़ जाते हैं | याद रखिये ये ऊर्जा का एक श्रोत बनता है जो विश्व का कुछ भला कर सकता है |

* विशेष - हमारे भारत में सुबह शाम की प्रार्थना में एक मन्त्र शामिल करने पर विशेष जोर दिया जाता है ....
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिन : सर्वे सन्तु निरामया |
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु  माँ कश्चिद्दु:खभागभवेत् 

अर्थ -सभी सुखी हों , सभी रोगमुक्त रहे , सभी मंगल घटनाओं के साक्षी बनें ,और किसी को भी दुःख का भागी ना बनना पड़ें | 

8)मुझे इस बात का कोई महत्व नहीं समझ में आता कि बच्चों को युद्ध की तारीखें याद करवाई जाएँ | ये मानसिक ऊर्जा का दुरप्रयोग लगता है |इसके स्थान पर उन्हें बताया जाए , ये दिमाग कैसे काम करता है , अपना अर्थ कैसे संभालें , आर्थिक सुरखा के लिए धन को कैसे invest करें , अच्छे रिश्ते कैसेबनायें , आत्मसम्मान को कैसे बनाये रखें , अपना मूल्य कैसे पहचाने | आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वयस्कों की अगली पीढ़ी कैसी होगी जब उन्हें अपने सिलेबस के विषयों के साथ ये सब भी पढ़ाया जाए |

9)जैसे ही मैं जिन्दगी को हाँ कहती हूँ ...जिन्दगी मुझे हाँ कहती है |

10) पहला कदम उठाने को तैयार रहिये , चाहें ये जितना भी छोटा क्यों ना हो इस बात पर पूर्ण ध्यान केन्द्रित करिए कि आप सीखने की इच्छा रखते हैं | फिर देखिये चमत्कार कैसे होते हैं |

11) हो सकता है हमें ये पता ना हो कि कैसे माफ़ किया जाए , हो सकता है हम दिल से माफ़ ना करना चाहते हों , लेकिन सच्चाई ये है कि जिस दिन आप ये इच्छा रखना शुरू करते हैं कि आप माफ़ करना चाहते हैं , आपके घाव भरना उसी दिन से शुरू हो जाते हैं |

12) अगर आप किसी सीमित करने वाली विचारधारा को स्वीकार करते हैं ...चाहें वो धन की हो , रिश्तों की हो या सफलता की हो ...तो ये आपके लिए सच होगी |

13)प्रेम में किसी भी पुराने से पुराने घाव को भर के जो हमारे ह्रदय काले घरे कोनों में छुपे होते हैं उन्हें भी ढूंढ कर फिर से स्वस्थ कर देने की सबसे ज्यादा ताकत होती है | क्योंकि प्रेम वो उज्जवल किरणे ले कर आता है जो हमारे दिमाग और दिल के अँधेरे कोनों में छुपे घावों को समझने में मदद करता है |

14)आध्यात्मिक होने के लिए मन की गांठे खोलना बहुत जरूरी है और ये तभी हो सकता है जब हम अपने जीवन की हर घटना की जिम्मेदारी खुद पर लें |

लुईस हे के 21 अनमोल विचार


* विशेष - बहुत से लोग आध्यात्मिक केन्द्रों में सालों साल जाने के बावजूद भी नहीं बदल पाते हैं या उन्हें शांति नहीं मिलती है इसका कारण ये है कि वो उन गांठों को नहीं खोलना चाहते जो परिस्थितियों की वजह से उनके मन में पड़ गयीं | यहां दूसरे के नहीं खुद के दोष ढूँढने होते हैं कि मैं उस समय ये कर /कह सकता था या शाब्दिक बाणों से ऐसे -ऐसे अपना बचाव कर सकता था | जैसे ही खुद पर जिम्मेदारी आती है क्रोध , जलन ., निराशा शांत होने लगती है |

15)खुद को स्वीकार कर्नौर खुद को पसंद करनावो सबसे बड़े मंत्र हैं जो जीवन के हर क्षेत्र में काम करते हैं |

16)मैं अपने माता -पिता को अपने छोटे बच्चों की तरह देखती हूँ , जिन्हें प्यार की आवश्यकता है | कोशिश करिए आप भी ऐसे ही देखे |

17)हर सुबह उठकर मैं अपने शरीर को ही भोजन नहीं देती मैं अप्पने मन को भी भोजन देती हूँ | यह तय करना हम सब का कर्तव्य है कि हम उसे क्या खिलाते हैं स्वास्थ्यवर्धक , पौष्टिक , विटामिन युक्त या बासी , सदा हुआ , जला हुआ ... ये चयन हर सुबह करना है |


18)अगर तुम अपने माता -पिता को अच्छे से समझना चाहते हो , तो उनसे उनके बचपन के बारे में जानो ,अगर आप समानुभूति के साथ सुनेगे तो आप समझेंगे कि उनके डर या उनका कठोर व्यवहार कहाँ से आ रहा है | 'वो लोग जिन्होंने आप सब के लिए ये सब कुछ अनचाहा खड़ा किया है ' वो भी अंदर से उतने ही भयभीत और डरे हुए हैं जैसे आप |


19)मुझे विश्वास है कि आप उन्हीं अनुभवों को बार -बार दोहराते हैं , जो उन बातों का प्रतिबिम्ब होती है जैसी आपने अपने बारे में धारणा बनायी होती है |

मुझे कोई प्यार नहीं करता में विश्वास करने वाले बार -बारैसे रिश्तों में पड़ते हैं जहाँ धोखा हो और उन्हें अपना विश्वास सही लगे कि उन्हें कोई प्यार नहीं करता |

इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि समस्या कितनी बड़ी थी कितनी पुरानी थी , यौसकी वजह से आप एक लम्बेसमी कितने भयभीत रहे थे , आपकी शक्ति केवल आपके अभी के पल में छुपी है , आप उन बातों , धारणाओं को मन में बार -बार दोहराने के स्थान पर नयी ख़ुशी देने वाली , साहस वाली, शांति वाली  धारणाओं को दोहराना शुरू कर दीजिये ... चमत्कार यहीं से होगा |

लुईस हे के 21 अनमोल विचार


20)  जिस क्षण आपकी मृत्यु होगी साड़ी बातें जो आपको आज परेशान कर रहीं हैं आप भूल जायेंगे | फिर नए सिरेसे नया कुछ आपको सीखना ही होगा ... तो इस जन्म में ही क्यों ना इसकी शुरुआत कर दी जाए |

21)व्यायाम -जैसेजैसे आप इसको पढ़ते जारहे हैं अपने आप को मुक्त करते जाइए ...

सबसे पहले एक गहरी सांस लीजिये और उच्छ्वास के साथ ...
सारे तनाव को  अपने शरीर से  की अनुमति दीजिये ...दोहराइए कि मैं मुक्त होना चाहता हूँ

मैं सारे तनावों को रिहा करता हूँ |
मैं  सारे दुखो को रिहा करता हूँ |
मैं सारे अपराध बोधों को रिहा करता हूँ |
मैंने सारे गुस्से को रिहा करता हूँ |
मैं सारी  सीमित करने वाली धारणा ओं को रिहा करता हूँ |

                              मैं तनाव मुक्त हूँ , शांत हूँ , सुरक्षित हूँ |

इस क्रिया को दिन में दो तीन बार किरिये और देखिये मुक्त होने में कितना आनंद छुपा है |

लुईस हे के बारे में और जानकारी विकिपीडिया से लें

अटूट बंधन

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लघुकथा -दुकानदारी

ए भैया कितने का दिया ?
100 रुपये का |

100 का , ये तो बहुत ज्यादा है लूट मचा रखी है | 50 का लगाओ तो लें |

अरे बहनजी ८० की तो खरीद है , क्या २० रुपये भी ना कमायें , सुबह से धूप में खड़े हैं |

ठीक है 70 का देना हो तो दो , वर्ना हम चले |

ठीक है , ठीक है , सिर्फ आपके लिए |
मोल -मोलाई की ये बातें हम अक्सर करते और सुनते हैं | ये सब दुकानदारी का एक हिस्सा है , जो थोड़ा सा झूठ बोल कर चलाई जाती है | पर क्या सब ये कर पाते हैं ?

लघुकथा-दुकानदारी

‌ये उन दिनो की बात है जब नौकरी से रिटायर्ड होने के बाद हमने नया-नया कोल्ड डिंक का काम शुरू किया!चूकि सरकारी नौकरी से रिटायर्ड थे।दुकानदारी के दाव-पेच मे हम कोरे पन्ने थे।पहले सीजन मे जोश-जोश मे खूब माल भर लिया था!अनुभव व चालाकी के अभाव मे ज्यादा सेल नही कर पाये,नतीजन माल बचा रहा,!

आफ सीजन नजदीक आता देख व बचे माल को देख हमे अपनी अक्ल पर पत्थर पढते दिखाई दिये।हमने आव देखा ना ताव,अपने सारे माल को लेकर उसी होलसेलर के पास जा पहुंचे पर ये क्या,वो तो माल लेने से बिल्कुल मुकुर गया!

मेरे यहाँ से ये माल गया ही नही?ये माल तो एक्सपायर हो गया है!इसकी डेट भी निकल चुकी है!कस्टमर तो लेगा ही नही।

हम भी आपे से बाहर हो गये,कभी दुकानदारी की नही थी ,सिर मुडाते ही ओले पढे,वाली हालत हो गयी थी हमारी।उसे कुछ भी कहना,कागज काले करने वाली बात थी।
एक्सपायरी माल हम तो बेच नही सकते थे। क्योंकि हमारा जमीर ही हमारा साथ नही दे रहा था।हारकर हमने उसे ही कोई हल बताने को कहा!उसने हंसकर कहा-एक बात हो सकती है....अगर तुम अपना सारा माल मुझे आधे दाम पर दे दो तो मै इसपर लिखी तारीख को तेजाब से साफ करके नये रेट से ही शराबखाने मे डाल मुनाफा कमा लूगा।क्योकि वहां आने वाले नशेडिय़ों, शराबियो ने कौन सी छपी तारीख पढनी है।हमे उसकी सलाह माननी पड़ी पर ये खरीद-बेच का गणित हमे समझ नही आया,और फिर हमे ये दुकानदारी बंद करनी पडी।।

सोचने लगे थे मुनाफे के चक्कर मे,अपनी दुकानदारी चमकाने के चक्कर मे इंसान कितना नीचे तक गिर सकता है,ये वाक्या हमे मुंह चिढा रहा था।। ऋतु गुलाटी

लेखिका -ऋतु गुलाटी


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गिरगिट

तीसरा कोण


गलती





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अक्षय कुमार –मोदी इंटरव्यू से सीखने लायक बातें
फोटो -दैनिक भास्कर से साभार 
व्यक्ति कोई भी हो क्षेत्र कोई भी हो जब कोई व्यक्ति सफल होता है तो उसके पीछे उसकी कुछ ख़ास आदतें या गुण होते हैं | atootbandhann.com का प्रयास रहा है कि अपने पर्सनालिटी डीवैलपमेंट सेक्शन में उन शख्सियतों के गुणों की भी चर्चा की जाए , जिससे हम सब सब उन गुणों को अपने व्यक्तित्व में शामिल कर सकें | यहाँ पर ये बाध्यता नहीं है कि हम व्यक्ति को पसंद करते  हैं कि नहीं पर आत्म विकास की राह में गुण ग्राही होना पहली शर्त है | प्रधानमंत्री मोदी जी के आलोचक भी उनकी लोकप्रियता और एक चायवाले से प्रधान मंत्री बनने की सफल यात्रा से इनकार नहीं कर सकते | अक्षय कुमार द्वारा लिए गए इंटरव्यू से कुछ ऐसेही आत्मविकास और  सफलता के सूत्र ले कर आई हैं नीलम गुप्ता जी ....


प्रधानमंत्री मोदी -अक्षय कुमार  इंटरव्यू से सीखने लायक बातें   

फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार द्वारा लिया गया प्रधानमंत्री मोदी का इंटरव्यू आजकल चर्चा में हैं | वैसे तो ये गैर राजनैतिक इंटरव्यू है पर इसका प्रभाव राजनैतिक दृष्टि से भी पड़ेगा इस संभावना  से इनकार नहीं किया जा सकता | ये  वीडियो वायरल हो गया है | जाहिर है पक्ष –विपक्ष वाले दोनों इसे देख रहे हैं और अपने –अपने हिसाब से आकलन कर रहे हैं | लेकिन मैं ये कहना चाहूँगी कि आप मोदी जी के पक्ष में हो या विपक्ष में लेकिन अगर इस इंटरव्यू से कुछ बातें सीखने को मिल रही हैं है तो उनसे सीखने में क्या हर्ज है | हम और आप में से बहुत से लोग फेंकू कह कर मोदी जी पर हंस सकते हैं पर उन शिक्षाओं पर अगर धयन दें तो अपने निजी जीवन में कुछ गुण जोड़ सकते हैं | तो आइये सीखते हैं ...

जिन्न पर नहीं कर्म पर भरोसा रखो


प्रधानमंत्री मोदी के इंटरव्यू में अक्षय कुमार का एक प्रश्न और उसका जवाब मुझे बहुत अच्छा लगा |
 प्रश्न था कि अगर आपके हाथ में अलादीन का चिराग आ जाए तो आप क्या माँगेंगे |

आम तौर पर इसी उत्तर की उम्मीद की जा सकती है कि ये मांगेंगे वो माँगेगे और क्योंकि बात मोदी जी कई है चुनाव का माहौल है तो मुझे उम्मीद थी कि वो कहेंगे कि अपने देश की खुशहाली मांगेंगे , बच्चों की शिक्षा या जवानों और किसानों के लिए कुछ मांगेंगे | परन्तु मोदी जी का उत्तर इन सबसे जुदा था | उन्होंने कहा कि , “ वो जिन्न से मांगेंगे कि जहाँ कहीं भी लिखी हैं उन सब को मिटा दो , कि कोई ऐसे शक्ति होगी जो हमें बैठे –बैठे सब कुछ दिला देगी , ऐसी कहानियाँ बच्चों को नकारा बनाती हैं | उन्हें सिर्फ ऐसी कहानियाँ सुनानी चाहिए कि जितनी मेहनत करोगे उतना ही फल मिलेगा |

प्रधानमंत्री मोदी -अक्षय कुमार  इंटरव्यू से सीखने लायक बातें


मुझे याद है कि कुछ समय पहले ऐसी ही एक फिल्म बनी थी सीक्रेट ... उसके ऊपर सीरिज़ में किताबें भी आयीं , बेस्टसेलर बनी खूब बिकीं | “Law of attraction” का नशा यूथ के सर चढ़ कर बोलने लगा | ऐसी ही मेरी एक रिश्तेदार की बेटी है जो उन दिनों कहा करती थी कि उसने सीक्रेट से लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन सीख लिया है जिसे वो प्रयोग में लाती है , उसका IIT में अवश्य चयन हो जाएगा | वो ज्यादा पद्थी नहीं थी पर उसे उस किताब की विज्युलाइजेशन टेक्नीक पर भरोसा था | वो रात को सोते समय रोज सोचती की वो IIT दिल्ली में पढ़ रही है , उस थ्रिल को , उस ख़ुशी को महसूस करती और सो जाती | 

मैंने उसे समझाया भी कि जितने लोग सेलेक्ट हुए हैं उन्हें उस परिणाम से तो प्यार् था ही , वो सपनों में तो अपने को वहाँ देखना चाहते ही थे पर उसके लिए कड़ी मेहनत  भी करते थे | क्या तुमने कभी किसी चयनित उमीदवार  का इंटरव्यू नहीं सुना ? उनमें से किसी ने नहीं कहा कि वो सब उन्हें सपने देखने से मिल गया | सबने एक ही सूत्र बताया , मेहनत , मेहनत  और मेहनत |


“वो मूर्ख थे “कहते हुए उसने मेरी बात काट दी | अगर यह सब कुछ बिना मेहनत के ही मिल जाए तो वो मूर्ख ही तो कहलायेगा जिसने उसके लिए जान झोंक दी |


कुछ समय बाद जब रिजल्ट निकला तो उसका कहीं चयन नहीं हुआ था , साथ ही बारहवीं के बोर्ड एग्जाम में भी उसके बहुत कम नंबर  आये थे | उसने मुझसे कहा कि मैंने विज्युलाइजेशन टेक्नीक तो अपनाई थी पर मेरे मन में कहीं न कहीं यह विश्वास भी था कि मैं पढ़ तो रही नहीं हूँ , क्या ये टेक्नीक वर्क करेगी |

मैंने कहाँ यहीं पर किताब में झोल है , वो विश्वास पढने से या मेहनत करने से ही आता है |


हमारे दिमाग की कार्यविधि ही ऐसे है | कहते हैं कि हमारे दिमाग का एक हिस्सा रेपटीलियन ब्रेन होता है | जिसे सुस्त  और आलसी रहना पसंद हैं | कभी देखा है घड़ियाल या मगरमच्छ को घंटों एक जैसा पड़े हुए ... वैसे ही हमारा दिमाग हर चीज यूँ ही पड़े –पड़े प्राप्त कर लेना चाहता है, या थोडा सा परिश्रम करने के बाद फिर अपने आलसी मोड में आ जाता है | जो लोग बहुत मेहनत करते हैं वो सब अपनी विल पॉवर का इस्तेमाल करते हैं | ऐसी कहानियाँ , किताबें फिल्में हमारी विल पॉवर को कमजोर करती हैं और दिमाग को फिर सुस्त हो जाने  को विवश करती हैं |

बेहतर हो हमारे बच्चे , युवा , बुजुर्ग भी ऐसी कल्पनाओं से बचें ताकि जीवन के यथार्थ को समझ सकें ... और मेहनत  में विश्वास कर सकें | 


सामूहिक खेलों से बढती है टीम भावना 

                         आजकल बच्चे टी वी या फिर फोन में उलझे रहते हैं | पार्क में खेलने के स्थान पर बच्चे वीडियो गेम्स की ओर झुक रहे हैं | लेकिन ये एकांत प्रियता उनके सर्वंगीड विकास में बाधा है |  बच्चे जब वो खेल खेलते हैं जिसमें टीम हो तो वो बहुत सी चीजें सीखते हैं | जैसे ...
उनमें परस्पर सहयोग की भावना आती है |
नेतृत्व  गुण आता है | 
हार और जीत में भागीदारी लेना आता है |
क्योंकि दूसरी टीम एक व्यक्ति नहीं है इसलिए उसके प्रति भी मन में सम्मान का भाव आता है | 
                                                उन्होंने RSS शाखाओं  में खिलाये जाने वाले खेल के बारे में बताया जहाँ सब लोग एक घेरा बना कर बैठ जाते हैं और हर व्यक्ति को अपने बगल में बैठे व्यक्ति की एक खूबी बतानी होती है | क्योंकि खेल है इसलिए लोग पहले से ही जानकारी इकट्ठी करते हैं हर किसी के बारे में जिससे बेगानापन दूर होता है | मान लीजिये कोई ऐसा व्यक्ति बगल में बैठा है जिससे मतभेद हैं लेकिन जब हम उसकी खूबी ढूंढते  है तो उसमें भी खूबियाँ नज़र आने लगती हैं | दरअसल हम किसी भी व्यक्ति को चाहें जितना नापसंद करें , हर व्यक्ति में कुछ ना कुछ खूबियाँ होती ही हैं | जरूरत है नजरिया बदलने की |  हर किसी में गुण देखने से हमारा फोकास बुराई की जगह अच्छाई पर जाता है | 

 अब जरा सोचिये एक फैमिली या मुहल्ले का गेट टुगेदर है , वहां पर ये खेल खेला जाए | सब को एक दूसरे का एक गुण बताना है |  सास जो सुबह बहु को डांट रही थी , गुण ढूँढने बैठेगी तो कहेगी अरे मेरी बहु में तो ये गुण भी है , बहु को भी सुन के अच्छा लगेगा | सबके बीच में तारीफ़ सुनने वाले के मन का कलुष धुलेगा व् करने वाले को दूसरे व्यक्ति को देखने का एक नया नजरिया मिलेगा | 

प्रधानमंत्री मोदी -अक्षय कुमार  इंटरव्यू से सीखने लायक बातें



स्वास्थ्य सबसे बड़ी नियामत है 



                   हमारे प्रधान मंत्रियों में से मोदी जी ही ऐसे रहे हैं जो अपने स्वास्थ्य पर शुरू से बहुत ध्यान देते रहे हैं | योग हो , घरेलु औषधियाँ हो, देसी भोजन हो या फिर जो आजकल कहा जाता है "मी टाइम " मोदी जी उनमें निवेश करते हैं ,वो  सब उनके स्वास्थ्य में परिलक्षित होता है | वो विशेष रूप से स्वक्षता पर ध्यान देते हैं इसलिए उन्होंने गाँव -गाँव में शौचालय बनाने पर जोर दिया है | आकाशी कुमार की टॉयलेट -एक प्रेम कथा भी इसी विषय पर बनी फिल्म थी | हालांकि वो एक सत्य कथा पर आधारित फिल्म थी | पहले स्वास्थ्य आता है तभी काम किया जा सकता है तभी धन कमाया जा सकता है | 

देश और विदेश में योगा को पुनर्जीवित करने का श्रेय मोदी जी को जाता है | 

 आज हम सब ने विदेशी जीवन शैली अपना ली है , देर से खाना , देर से सोना , देर से उठना यह सब बिमारियों की वजह है | कहते हैं शाम का भोजन सूर्यास्त सेपहले कर लेनाचाहिये पर कितने लोग ऐसा करते  है | ये सच है कि आज लाइफ स्पैन बढ़ा है पर वो मेडिकल सुविधाओं के कारण हुआ है | सच्चाई तो ये है कि आज बीमारियाँ उससे दोगुनी तेजी से बढ़ी हैं | बच्चों में मधुमेह व् उच्च रक्त चाप की बीमारियाँ बढ़ रहीं हैं | इस सब का कारण गलत जीवन शैली आहार विहार है | अगर हम देश के लिए , अपने परिवारके लिए या अपने लिए भी कुछ करना चाहते हैं तो सबसे पहलेअपने स्वास्थ्य पर ध्यान देना होगा | सही जीवन शैली अपनानी होगी | 

अपने गुस्से को काबू में रखना 


                 प्रधान मंत्री मोदी जी ने बताया कि उन्हें क्रोध नहीं आता है क्योंकि वो अपने गुस्से को काबू में रख लेते हैं | कोशिश करते हैं कि वो गुस्सा शब्दों में या भाव भंगिमा में ना उतरे | मन में ठहरे गुस्से पर नियंत्रण करने के लिए वो उसे लिखते हैं  , साक्षी भाव से लिखते हैं और तब तक लिखते हैं जब तक गुस्सा शांत  ना हो जाए | इसमें कई बार दूसरे का पक्ष भी समझ आता है और कई बार अपनी गलती भी समझ आती है | 

                   हम सब जानते हैं कि गुस्सा एक नकारात्मक उर्जा है | जब कोई गुस्से पर नियंत्रण ना करके तुरंत कुछ कटु बोल देता है तो उसका नकारात्मक प्रभाव बहुत दिनों तक मन पर रहता है | एक बार मोटिवेशनल स्पीकर संदीप माहेश्वरी जी ने बताया कि उनकी एक टीचर उन्हें नाकारा कहती थीं , ये भी कहती थीं कि वो जिन्दगी में कभी सफल नहीं हो सकते | इसका प्रभाव उनके मन पर पड़ा और शुरूआती दौर में वो कई बार असफल भी हुए | हमारे पुरखे कहते थे कि शब्द ब्रह्म है उन्हें सोच समझ कर खर्च करो | परन्तु गुस्से में अनाप -शनाप बोलते समय हमें संतुलन कहाँ याद रहता है , कई बार बाद  में खुद् भी पछतावा होता  है पर तीर निशाने से निकल चुका  होता है | 


अब शब्दों पर तो नियंत्रण कर लिया पर मन से गुस्सा निकालना भी जरूरी होता है क्योंकि ये हमारे लिए घातक होता है | जिसके लिए मोदी जी की तरह उसे लिख सकते हैं , अक्षय कुमार की तरह पंचिंग बैग पर निकाल सकते हैं , ध्यान द्वारा निकाल सकते हैं या किसीभी अन्य तरीके से निकाल सकते हैं | 

याद रखिये शांत  मन हमेशा सकारात्मक उर्जा से भरा रहता है | 


निदकों से कैसे निपटे 


                   हम सब लोगों की जब कोई निंदा करता है तो या तो हम उसे उल्टा -पुल्टा कुछ बोल देते हैं या अपने दिल से लगा कर खुद को हीन समझने लगते हैं |दोनों ही परिस्थितियाँ ठीक नहीं हैं | क्योंकि अगर हम कुछ बोलते हैं तो फिर दूसरा कुछ और बोलता है | और एक टेनिस मैच शुरू हो जाता है जो कभी खत्म नहीं होता | जो पहल करता है उसका उद्देश्य  ही ये होता है कि वो आपको चिढाये , आप कुछ बोले , वो फिर उसमें से कुछ  पकड़े | यही उसकी जीत है | प्रधानमंत्री  मोदी जी कहते हैं कि मैं ऐसी बातों पर कुछ नहीं कहता इससे उनकी खुद कहने (आरोप लगाने )  के बाद भी हार हो जाती है | 

याद रखिये आप का रीएक्शन उनकी खुराक है , उनकी जीत है , ऐसे में बिना कुछ कहे आप जीत रहे हो तो शब्द क्यों खर्च किये जाएँ | 

वहीँ दूसरी ओर ओर सोशल मीडिया पर अपने ऊपर बनाए गए तमाम कार्टून देख कर उन्हें लगता है कि आम लोग कितने रचनात्मक हैं जो क्षण भर में कितना कुछ सोच लेते हैं | 

                  हम सब आलोचना से डरते हैं , खासकर उनसे जिनका उद्देश्य नकारात्मक होता है | लेकिन जितने भी सफल व्यक्ति हुए हैं उन्होंने आलोचना को सकारात्मक रूप में लिया है | हमें ये ध्यान रखना है कि नकारात्मक आलोचना का मुँह बंद करने का तरीका उसका उत्तर ना देना है , और सकारात्मक  में उससे सीख कर खुद को सुधारना | 


प्रधानमंत्री मोदी -अक्षय कुमार  इंटरव्यू से सीखने लायक बातें


जरूरी है मी टाइम 


         जैसा की प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी ने बताया कि वो रोज सुबह का वक्त अपने साथ बिताते हैं , और पहले जब वो इतने व्यस्त नहीं थे तो दीपावली पर एक हफ्ते के लिए कहीं दूर चले जाते थे ,जहाँ एकांत में अपने साथ समय बिता सकें | 

             चाहें आप नौकरी करते हों , स्कूल में पढ़ते हों , व्यवसाय करते हों या गृहणी हों ये 'मी टाइम' हम सब के लिए जरूरी है | 'मी टाइम' एक तरह का मेडिटेशन भी है , खुद की खोज भी है और तनाव मुक्ति का एक आसान रास्ता भी |

आजकल कहते हैं कि खुदसे प्यार करो पर उससे पहले  खुद को समझना भी जरूरी है |आप भी इस भागमभाग की जिन्दगी में थोडा सा वक्त अपने साथ बिताइए , खुद समझिये ... जानिये कि आजकल उलझन क्यों हो रही है , गुस्सा क्यों बढ़ रहा है , रोना क्यों ज्यादा रहा है ? अपनी क्लास लेने के बाद आप जरूर एक परिणाम केसाथ वापस आयेंगे और जिन्दगी को ज्यादा बेहतर और अच्छे तरीकेसे जी पायेंगे | 

तो मित्रों , ये थे कुछ तरीके जो मैंने इस इंटरव्यू सेसीखे और आप के साथ बाँटे | स्वीकारना ना स्वीकारना आपके हाथ है | अलबत्ता इतना जरूर है कि इस अराजनैतिक इंटरव्यू की तरह ये लेख भी पूर्णतया अराजनैतिक है | 

नीलम गुप्ता 

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कहानी -डॉग शो

यूँ तो शहरों में डॉग शो आयोजित होते रहते हैं , पर ये डॉग शो कुछ अलहदा था , यहाँ पर बात सिर्फ उस डॉग शो की नहीं हो रही है जो प्रतियोगिता में विजयी हुआ था ....असली डॉग शो तो प्रतियोगिता के बाद शुरू हुआ , जानिये कैसे ....




कहानी -डॉग शो 




चन्द्ररूपिणी को उसके माता-पिता के साथ उसके नाना हमारे घर लाए थे|

सन् १९६८ में|

हमारी छत के एकल कमरे में उन्हें ठहराने|

हमारे दादा और उसके नाना एक ही राजनैतिक पार्टी के सदस्य थे और अच्छे मित्र भी| हमारे दादा उन दिनों सन् सड़सठ की लोकसभा के निर्वाचित सदस्य थे और उसके नाना हमारे प्रदेश की विधान-सभा के मनोनीत सदस्य|

“मेरी यह इकलौती बेटी मेरी दूसरी पत्नी की सौतेली है और ऊपर से रुग्णा भी,” चन्द्ररूपिणी के नाना ने ब्यौरा दिया था, “अपने जीते-जी अपनी पत्नी के हाथों बेटी की दुर्गति मुझ से देखे नहीं बनती.....”

कहानी -डॉग शो


चन्द्ररूपिणी ने हमें अधिक जानने में उत्सुकता दिखायी थी|
कह नहीं सकते उसे हमारे पास खींच लाने में किस कारक की भूमिका ज़्यादा बड़ी रही थी.....

ग्यारह-ग्यारह वर्ष का हमारा बालपन और पन्द्रह-वर्षीया उसकी किशोरावस्था?

अथवा हम दोनों भाइयों के एकरूप जुड़वां होने की विलक्षणता? और हमें एक दूसरे से अलग चिन्हित करने की जिज्ञासा?

या छत का वह एकल कमरा और उसमें बिछे तख़्त पर चौबीसों घंटे विराजमान उसकी माँ? जो उस समय तक असाध्य माने जाने वाले अपलास्टिक एनीमिया के अन्तर्गत कभी अपने नाक से रिस रहे खून को सम्भाल रही होतीं तो कभी अपने मसूड़ों से रिस रहे खून को? और ऊबती-घबराती चन्द्ररूपिणी वहां रुकना न चाहती? नीचे भाग आती?

या फिर उसके पिता की नौकरी? जो उन्हें दिन भर परिवार से दूर रखा करती? चन्द्ररूपिणी को ढेर सा खाली समय देती हुई? उसके पिता दिन भर की रसोई निपटा कर मुंह अंधेरे जो अपनी साइकल से पैंतीस मील दूर बसे कस्बापुर के एक इंटर कॉलेज में भौतिक विज्ञान तथा उसके प्रैक्टिकल की शिक्षा देने निकलते तो दोपहर बाद ही लौट पाते| चन्द्ररूपिणी के नाना ने क्या जान बूझकर ऐसा दामाद चुना था जिसे रईसी ने शुरू ही से किनारे रखे रहा था?

या फिर हमारे पप्स की नवीनता? जिन में मिस्टी स्याह काला था- कोयली काला- औरटफ़्फ़ी के शरीर के ऊपर के बाल काले थे और नीचे के लाल? और जो दोनों ही उन दिनों अपने दांत निकाल रहे थे? औरजिन का डॉग हाउस हमारे पिछवाड़े के उसी आँगन में स्थित था जहाँ चन्द्ररूपिणी अपनी साइकल टिकाया करती? वह दसवीं में पढ़ती थी और अपने स्कूल साइकल से आती जाती थी|

मैस्टिफ़ नस्ल की एक झोल में से अभी चार माह पहले हमारे दादा के एक मित्र ने हमें ये दो पप्स दिए थे| अपनी आँखें उन्होंने यहीं हमारे सामने खोली थीं| नवें-दसवें दिन| और अपने कान, पन्द्रहवें-सोलहवें दिन|

जब तक अपने पाँचवें महीने में उन दोनों ने अपने अपने बयालीस के बयालीस दांत निकाले, चन्द्ररूपिणी पूरी तरह से उन के संग घुल-मिल चुकी थी| वे दोनों उसे देखते ही अपनी पूँछ हिलाने लगते और अपने टहलुवे किशोरीलाल से भोजन ग्रहण करते समय उस के हाथ से भी खाद्य पदार्थ स्वीकार कर लेते|
“देखो तो,” फिर चन्द्ररूपिणी ही ने कुछ माह बाद अखबार का एक विज्ञापन हमारे सामने ला रखा, “अगले महीने एक डॉग शो होने जा रहा है| क्यों न हम इस दूसरे वर्ग के लिए अपने पप्स को उसमें भाग दिलाएँ?”
विज्ञापन पढ़ कर हम दोनों भी एक साथ उछल पड़े|
अमरीकन कैनल क्लब द्वारा निर्धारित नियमों के आधार पर उस वर्ग में ६ और बारह महीनों के बीच की आयु के पप्स की नस्ल और बाज़ीगरी परखी जानी थी|
“ये ज़रूर तुम भाइयों के लिए ट्रॉफ़ी जीत लाएँगे,” हमारी माँ भी हमारे साथ उत्साहित हो लीं, “इन के वज़न और ऊँचाई तो अमरीकन पैरामीटर्स के अपेक्षित ही है.....”
अपने उस ग्यारहवें महीने में मिस्टी और टिफ़्फ़ी सत्तावन-सत्तावन किलो वज़न तथा अढ़ाई-अढ़ाई फुट ऊँचाई पा चुके थे|
पप्स-विषयक एक किताब माँ के पास रहती थी जो सचित्र भी थी| उसीमें से माँ ने पप्स को सधाने व हाँकने के सूत्र भी हमें उपलब्ध करा दिए| 

हमारे पिता की तुलना में हमारी माँ हमारे पप्स से अधिक जुड़ी थीं| दोनों के स्नान व भोजन वह अपनी निगरानी में करवाती ही थीं, साथ ही उन्हें खूब दुलारतीं व पुचकारती भी रहतीं| किताब के उन सूत्रों को वेग दे रही चन्द्ररूपिणीको भी यदा-कदा सराह दिया करतीं|

चन्द्ररूपिणी को सराहते तो हमारे पिता भी थे| सच पूछें तो हमारे पप्स की दीक्षा से अधिक उन्हें चन्द्ररूपिणी में अधिक रूचि थी| उसे सामने पाते ही प्रश्नों की झड़ी लगा दिया करते, उस का स्कूल कैसा था? उसकी कक्षा में और कितनी लड़कियाँ थीं? वह उन्हें इधर घर पर क्यों नहीं लाती थी? क्या वे भी उस की तरह सुन्दर थीं? नाज़ुक थीं? लजीली थीं? बल्कि चन्द्ररूपिणी उन से घबराने भी लगी थी| वह घर पर होते तो वह हमारे कमरे में नहीं ही आती| हमारा कमरा उसी पिछवाड़े वाले आँगन के साथ सटा था और उस की खिड़कियाँ आँगन ही में खुलती थीं| चन्द्ररूपिणी हमें वहीं खिड़की से संकेत देती और आँगन से भी लोप हो जाती|


तथपि हमारा वह पूरा महीना चन्द्ररूपिणी की संगति मेंअपने पप्स के शारीरिक प्रशिक्षण में बीता| औरअन्ततःदोनोंजान गए, हमारे किस आदेश पर उन्हें भौंकना था, किस पर हम से हाथ मिलाना था, किस पर ज़मीन पर लोटना था, किस परदूर फेंके गए गेंद को हमारे पास लाना था, फिरक ना था या फिर अपनी पिछली टांगों पर खड़े होना था.....

प्रतियोगिता के दिन तक वे खूब तगड़े भी हो लिए थे- पुष्ट टॉपलाइन, ठोस, दबीज़ हड्डी तथा दूर तक भरी घनी छाती से युक्त|

डॉगशो का समय नौ बजे सुबह से था किन्तु हमारे पिता ने अपनी मोटर सात बजे ही पोर्च में ला खड़ी की थी|

उस समय हमारे घर पर दो मोटरें थीं किन्तु घर की दूसरी मोटर हमारे दादा के अनन्य प्रयोग के लिए आरक्षित रखी जाती थी| और उसे उनके ड्राइवर के अतिरिक्त कोई और नहीं छूता था|
अपनी इस मोटर पर हमारे पिता का आधिपत्य था और हमारी माँ उस में बहुत कम बैठती थीं| कारण, उसे हमारे पिता ही चलाते थे और हमारे माता-पिता शुरू से ही एक चुम्बक के प्रतिमुख छोर रहे| लेकिन ठीक आठ बजे उस दिन माँ अगली सीट पर हमारे पिता की बगल में जा बैठीं, अपनी बगल में चन्द्ररूपिणी को सहेजे|
पिछली सीट पर हम दोनों भाई, हमारे मिस्टी और टिफ़्फ़ी तथा उन के सामान के साथ उन का टहलूवा, किशोरीलाल बैठ लिए|
प्रतियोगिता के स्थल पर पहुँच कर चन्द्ररूपिणीने दर्शकों की पंडाल में हमारे माता-पिता के साथ अपना आसन ग्रहण नहीं किया|
हमारे साथ सीधी उस स्थान पर जा खड़ी हुई जहाँ कुत्ते व उनके संरक्षक जमा थे| उस जमाव में स्त्रियाँ और लड़कियाँ बहुत कम थीं फिर भी चन्द्ररूपिणी निस्संकोच हमारे साथ बनी रही|
भाग लेने वालों में उन दिनों के जिलाधीश का चुस्त-दुरुस्त कौमोन-डोर भी था किन्तु उसके कर्णधार दो अधेड़ चपरासी रहे थे| हमारी चन्द्ररूपिणी जैसी दक्षता व तत्परता उन में न थी|

मिस्टी और टिफ़्फ़ी ने अपनी पारी के सभी करतब चन्द्ररूपिणी की अगुवाई में जिस सिद्धता तथा फ़ुरतीलेपन से निबाहे उसे देखते हुए निर्णायक-गण के लिए उन्हें विजयी घोषित करना अनिवार्य हो गया|
वंश की विशुद्धता तथा कद-काठी के मानक पर वर्ग दो के प्रतियोगियों में हमारा मिस्टी ट्रॉफ़ी अपने नाम कर गया|

कहानी -डॉग शो

“भाई-बहन?” पुरस्कार वितरण कर रही ज़िलाधीश की पत्नी ने हम तीनों को कप व ट्रॉफ़ी लेने के लिए एक साथ बढ़ते हुए देखा तो पूछ बैठीं|
“बहन नहीं, मित्र,” चन्द्ररूपिणीने तपाक से उत्तर दिया|

“हमारी रिंगलीडर,” अभिभूत हो कर हम दोनों भाई भी बोल पड़े|

“गुड, वेरी गुड,” वहमुस्कुरायीं और बारी-बारी से हम तीनों की गाल थपथपा दीं|

अपने माता-पिता के पास लौटते समय हम भाइयों के हाथों में कप रहे और चन्द्ररूपिणी के हाथ में ट्रॉफ़ी| वह कप से ज़्यादा भारी भी थी|

मोटर में बैठे तो हमारे फूले हुए दम के संग अपना दम चढ़ाती हुई चन्द्ररूपिणी उल्लास-भरे स्वर में माँ से बोली, “आंटी जीआप की बात सच निकली| ट्रॉफ़ी हमीं ने जीती| कप हमीं ने जीते.....”
“हमीं? हमीं कहा तुमने? हमीं?” चोचलाए स्वर में माँ ने खींच कर कहा|
हमीं ही तो कहेगी?” हमारे पिता ने दांत निपोड़े, “तुम्हारे बेटों की मित्र है| वे उसे अपना रिंगलीडर मानते हैं| सोचते हैं वह कप, वह ट्रॉफ़ी उसी ने उन्हें दिलायी है.....”
“दिलायी है? या झपटी है?” माँ तीखी हो लीं, “बेटे तो दोनों मूर्ख हैं| भोले हैं| भूल जाते हैं पप्स हम पाले हैं| उन्हें खिलाते-पिलाते हम हैं| नहलाते-धुलाते हम हैं| उनके कप और ट्रॉफ़ी पर हमारा हक बनता है, सिर्फ़ हमारा| किसी दूसरे का नहीं|”
“आप ठीक कह रही हैं, आंटी जी,” चन्द्ररूपिणी का उल्लास दूर जा छिटका, “मुझ से भूल हुई| मैं भूल गयी टिफ़्फ़ी और मिस्टी आप के हैं, मेरे नहीं.....”
“यह बात तुम्हें उस समय भी ध्यान में रखनी चाहिए थी जब विजेताओं को मंच पर बुलाया जा रहा था,” माँ कड़कीं, “मगर नहीं| तुम्हें लोभ था| लोभ| चर्चा में आने का लोभ| अखबार में अपनी तस्वीर देखने का लोभ..... अपने को उनकी मालकिन दिखाने का लोभ.....”

“नहीं आंटी जी,” चन्द्ररूपिणी के बोल रुंध चले, “मुझे ऐसा लोभ कतई नहीं था.....”
“नहीं, माँ,” हम ने माँ को टोकना चाहा|

“तुम दोनों चुप रहो,” माँ चिल्लायीं,

“तुम दोनों भोले हो| बहुत भोले| इसकी चतुराई तुम्हारी समझ से बाहर है..... तुम दोनों भोले हो अभी.....”
“भोली तो यह नहीं ही है.....” हमारे पिता के स्वर की गम्भीरता संदिग्ध रही, “समझती सब है.....”
दिल मसोस कर चुप बने रहने के सिवा हम भाइयों के पास कोई रास्ता न था|
हमें अपने माता-पिता से दुलार कम मिला, दुराग्रह ज़्यादा| दोनों ही को अपनी मनमानी बोलने और चलाने की पूरी छूट थी| वह हमें कितना भी डपटते हम अपना मुंह खोलते नहीं, थामे रखते|
मोटरसे उतरते ही चन्द्ररूपिणी ने अपनी छत की सीध बाँधी|

न हमारी ओर देखा न हमारे मिस्टी व टिफ़्फ़ी की ओर|
“बड़ी बदतमीज़ लड़की है,” हमारी माँ हम से बोलीं, “खबरदार जो तुम बच्चों ने इस से कभी बात की या इसे अपने या अपने पप्स के पास फटकने दिया|”
ट्रॉफ़ी और कप जीत लाने का हमारा विजयोल्लास ओला हो गया|

कहानी -डॉग शो


उस पर पत्थर पड़ने अभी बाकी थे| जो उसी दिन की दोपहर ढलते ढलते हम पर बरसा गयी|
हमारी दोपहर की नींद उस समय तक पूरी भी न हुई थी कि हमें मिस्टी व टिफ़्फ़ी की संयुक्त भौंक के बीच अपने पिता का चीत्कार सुनाई दिया| हम भाइयों को बारी बारी से पुकारने के साथ साथ|

हम दोनों तत्काल आँगन में निकल आए|

देखा, हमारे पिता औंधे मुंह ज़मीन पर लोट रहे थे और मिस्टी व टिफ़्फ़ी उन्हें घेरे थे| मिस्टी उनकी बाँहों को दबोच रहा था और टिफ़्फ़ी उन के घुटनों को|

उन्हें फटकारते हुए हम अपने पिता की ओर लपक लिए|

उन्हें छुड़ाने|

ज़मीन से ऊपर खड़ा करने|
“यह हुल्लड़ कैसा है?” जब तक माँ भी आँगन में चली आयीं|

“यह पिल्ले पगला गए हैं,” हमारे पिता तमके, “इनका घर पर बने रहना अब खतरे से खाली नहीं..... इन्हें यहाँ से हटवाना ही पड़ेगा.....”

जभी मिस्टी व टिफ़्फ़ी अपनी भौंक छोड़कर उस साइकल के चक्कर काटते हुए रिरियाने लगे जो हमारे पिता की बगल में गिरी पड़ी थी|

साइकल चन्द्ररूपिणी की थी|
“यह साइकल यहाँ गिरी क्यों पड़ी है? और ये पप्स इस के गिर्द यह कैसा विलाप कर रहे हैं?”
“साइकल इन्हीं पागल कुत्तों ने इधर लुढ़कायी है| मैं बता रहा हूँ यह पागल हैं| इन्हें यहाँ से भेजना ही पड़ेगा| आज ही| अभी.....” हमारे पिता ने हठ पकड़ लिया, “पुलिस एनिमल कंट्रोल यूनिट को अभी बुलवाता हूँ.....”
“नहीं माँ,” हम ने माँ से विनती की, “इन्हें मत जाने देना| ये पागल नहीं हैं.....”
“मैं जानती हूँ| ये पागल नहीं हैं| पगलाया कोई और है| ये पूरे होशमन्द हैं| होश खोया कोई और है,” माँ ने व्यंग्य कसा|
“सम्भल कर बात करो,” हमारे पिता गरजे, “वरना तुम भी पागल करार कर दी जाओगी.....”
हमारे पिता हमारे दादा की इकलौती सन्तान थे और उन का कोई भी कहा वह बेकहा नहीं जाने देते थे|
पुलिस के पशु नियन्त्रण विभाग को हमारे दादा ने यकायक अपने स्टाफ़ से फ़ोन करवाया और एक घंटे केभीतर एक पुलिस जीप हमारे घर के फ़ाटक पर आन पहुँची|
पुलिस विभाग के पशु नियन्त्रण यूनिट के सदस्य लिए|
उन्हें आँगन का रास्ता दिखाने से पहले हम भाइयों को हमारे कमरे में बंद कर दिया गया| हमारेपिता के शब्दों के साथ, “मैं नहीं चाहता बाहरी वे लोग मेरे बेटों को गोहार मारते सुनें या देखें.....”
हमारी खिड़कियों ही ने हमें दिखाया..... पुलिसकर्मियों द्वारा मिस्टी व टिफ़्फ़ी को सी. ई. मिक्सचर, क्लोरो-फॉर्म व ईथर सुंघाते हुए.....

मिस्टी व टिफ़्फ़ी को अचेत होते हुए.....

पुलिसकर्मियों द्वारा उनकी अचेतावस्था की पुष्टि करते हुए.....
अन्ततः उन्हें उठा कर अपनेसाथ ले जाते हुए.....
अगली दोपहर हमारेलिए दूसरा आघात लायी|
स्कूल से लौटे तो छत की ओरजा रही सीढ़ियों के पास एक ठेले को खड़े पाया| उस में चन्द्ररूपिणीके परिवार का सामान लादा जा रहा था| उस के पिता की निगरानी में|
अपने बस्तों समेत हम ने उन के पैर जा छुए|

“खुश रहो,” उन्होंने हमें आशीर्वाद दिया| सहज भाव से| कटुता से रिक्त स्वर में|

‘चन्द्ररूपिणी के बगैर?’ मन में उठ रहे संदेह को हम ने गले में दबा दिया|

सीढ़ियों का रुख किया और चन्द्ररूपिणी के कमरे में जा पहुँचे|

वह अपनी माँ के साथ तख़्त पर बैठी थी : भौचक्की व आतंकित|

हमें देखते ही रो पड़ी|

हम भी अपनी रुलाई रोक नहीं पाए|

लेखिका -दीपक शर्मा 

लेखिका -दीपक शर्मा


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