July 2019
कहानी -मंगत पहलवान


अटूट बंधन में आप वरिष्ठ लेखिका दीपक शर्मा जी की कई कहानियाँ पढ़ चुके हैं | कई बार उनकी कहानियों में मुख्य कथ्य अदृश्य हो है जिस कारण वो बहुत मारक हो जाती हैं | प्रस्तुत कहानी मंगत पहलवान भी रहस्यात्मक शैली में आगे बढती है और पाठक को अंत तक बाँधे  रखती है | रहस्य खुलने पर हो सकता है आप ये कहानी दुबारा पढ़ें | तो आइये शुरू करते हैं ...

कहानी - मंगत पहलवान




‘कुत्ता बधा है क्या?’ एक अजनबी ने बंद फाटक की सलाखों के आर-पार पूछा|
फाटक के बाहर एक बोर्ड टंगा रहा- कुत्ते से सावधान!
ड्योढ़ी के चक्कर लगा रही मेरी बाइक रुक ली| बाइक मुझे उसी सुबह मिली थी| इस शर्त के साथ कि अकेले उस पर सवार होकर मैं घर का फाटक पार नहीं करूँगा| हालाँकि उस दिन मैंने आठसाल पूरे किए थे|
‘उसे पीछे आँगन में नहलाया जा रहा है|’ मैंने कहा|
इतवारके इतवार माँ और बाबा एक दूसरे की मदद लेकर उसे ज़रूर नहलाया करते| उसे साबुन लगाने का जिम्मा बाबा का रहता और गुनगुने पानी से उस साबुन को छुड़ाने का जिम्मा माँ का|
‘आज तुम्हारा जन्मदिन है?’ अजनबी हँसा- ‘यह लोगे?’
अपने बटुए से बीस रुपए का नोट उसने निकाला और फाटक की सलाखों में से मेरी ओर बढ़ा दिया|
‘आप कौन हो?’ चकितवंत मैं उसका मुँह ताकने लगा|
अपनी गरदन खूब ऊँची उठानी पड़ी मुझे|
अजनबी ऊँचे कद का रहा|
‘कहीं नहीं देखा मुझे?’ वह फिर हँसने लगा|
‘देखा है|’ –मैंने कहा|
‘कहाँ?’
ज़रूर देख रखा था मैंने उसे, लेकिन याद नहीं आया मुझे, कहाँ|
टेलीफोन की घंटी ने मुझे जवाब देने से बचा लिया|
‘कौन है?’ टेलीफोन की घंटी सुनकर इधर आ रही माँ हमारी ओर बढ़ आयीं| टेलीफोन के कमरे से फाटक दिखाई देता था|


कहानी -मंगत पहलवान

‘मुझे नहीं पहचाना?’ आगन्तुक हँसा|
‘नहीं| नहीं पहचाना|’
माँ मुझे घसीटने लगीं| फाटक से दूर| मैं चिल्लाया, ‘मेरा बाइक| मेरा बाइक.....’
आँगन में पहुँच लेने के बाद ही माँ खड़ी हुईं|
‘हिम्मत देखो उसकी| यहाँ चला आया.....|’
‘कौन?’ बाबा वुल्फ़ के कान थपथपा रहे थे| जो सींग के समान हमेशा ऊपर की दिशा में खड़े रहते|
वुल्फ़ को उसका नाम छोटे भैयाने दिया था- ‘भेड़िए और कुत्ते एक साझे पुरखे से पैदा हुए हैं|’ तीन साल पहले वही इसे यहाँ लाए रहे- ‘जब तक अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई करने हेतु मैं यह शहर छोडूँगा, मेरा वुल्फ़ आपकी रखवाली के लिए तैयार हो जाएगा|’ और सच ही में डेढ़ साल के अन्दर वुल्फ़ ने अपने विकास का पूर्णोत्कर्षप्राप्त कर लिया था| चालीस किलो वजन, दो फुट ऊँचाई, लम्बी माँस-पेशियाँ, फानाकर सिर, मजबूत जबड़े, गुफ़्फ़ेदार दुम और चितकबरे अपने लोम चर्मके भूरे और काले आभाभेद|
‘हर बात समझने में तुम्हें इतनी देर क्यों लग जाती है?’ माँ झाल्लायीं- ‘अब क्या बताऊँ कौन है? ख़ुद क्यों नहीं देख आते कौन आया है? वुल्फ़ को मैं नहला लूँगी.....|’
“कौन है?’ बाबा बाहर आए तो मैं भी उनके पीछे हो लिया|
‘आज कुणाल का जनमदिन है’- अजनबी के हाथ में उसका बीस का नोट ज्यों का त्यों लहरा रहा था|
‘याद रख कचहरी में धरे तेरे बाज़दावे की कापी मेरे पास रखी है| उसका पालन न करने पर तुझे सज़ा मिल सकती है.....’
‘यह तुम्हारे लिए है’-अजनबी ने बाबा की बात पर तार्किक ध्यान न दिया औरबेखटके फाटक की सलाखों में से अपना नोट मेरी ओर बढ़ाने लगा|
‘चुपचाप यहाँ से फुट ले’-बाबा ने मुझे अपनी गोदी में उठा लिया- ‘वरना अपने अलसेशियन से तुझे नुचवा दूँगा.....|’
वह गायब हो गया|
‘बाज़दावा क्या होता है?’ मैंने बाबा के कंधे अपनी बाँहों में भर लिए|
‘एक ऐसा वादा जिसे तोड़ने पर कचहरी सज़ा सुनाती है.....|’
‘उसने क्या वादा किया?’
‘अपनीसूरत वह हमसे छिपाकर रखेगा.....|’
‘क्यों?’
‘क्योंकि वह हमारा दुश्मनहै|’
इस बीच टेलीफोन की घंटी बजनी बंद हो गयी और बाबा आँगन में लौट लिए|
दोपहर में जीजी आयीं| एक पैकेट केसाथ|
‘इधर आ’-आते ही उन्होंने मुझे पुकारा, ‘आज तेरा जन्मदिन है|’
मैं दूसरे कोने में भाग लिया|
‘वह नहीं आया?’ माँ ने पूछा|
‘नहीं’-जीजी हँसी- ‘उसे नहीं मालूम मैं यहाँ आई हूँ| यही मालूम है मैं बाल कटवा रही हूँ.....|’
‘दूसरा आया था’-माँ ने कहा- ‘जन्मदिन का इसे बीस रूपया दे रहा था, हमने भगा दिया.....|’
‘इसे मिला था?’ जीजी की हँसी गायब ही गयी|
‘बस| पल, दो पल|’
‘कुछ बोला क्या? इससे?’
‘इधर आ’-जीजी ने फिर मुझे पुकारा- ‘देख, तेरे लिए एक बहुत बढ़िया ड्रेस लायी हूँ.....|’
मैं दूसरे कोने में भाग लिया|
वे मेरे पीछे भागीं|
‘क्या करती है?’ माँ ने उन्हें टोका- ‘आठवाँ महीना है तेरा| पागल है तू?’
‘कुछ नहीं बिगड़ता’-जीजी बेपरवाही से हँसी- ‘याद नहीं, पिछली बार कितनी भाग-दौड़ रही थी फिर भी कुछ बिगड़ा था क्या?’
‘अपना ध्यान रखना अब तेरी अपनी ज़िम्मेदारी है’-माँ नाराज़ हो ली- ‘इस बार मैं तेरी कोई ज़िम्मेदारी न लूँगी.....|’
‘अच्छा’-जीजी माँ के पास जा बैठीं- ‘आप बुलाइए इसे| आपका कहा बेकहा नहीं जाता.....|’
‘इधर आ तो’-माँ ने मेरी तरफ़ देखा|
अगले पल मैं उनके पास जा पहुँचा|
‘अपना यह नया ड्रेस देख तो|’ जीजी ने अपने पैकेट की ओर अपने हाथ बढ़ाए|
‘नहीं|’ –जीजी की लायी हुई हर चीज़ से मुझे चिढ़ रही| तभी से जब से मेरे मना करने के बावजूद वे अपना घर छोड़कर उस परिवार के साथ रहने लगी थीं, जिसका प्रत्येक सदस्य मुझे घूर-घूर कर घबरा दिया करता|
‘तू इसे नहीं पहनेगा?’ –माँ ने पैकेट की नयी कमीज और नयी नीकर मेरे सामने रख दी- ‘देख तो, कितनी सुंदर है|’
बाहर फाटक पर वुल्फ़ भौंका|

‘कौन है बाहर?’ बाबा दूसरे कमरे में टी.वी. पर क्रिकेट मैच देख रहे थे- ‘कौन देखेगा?’
‘मैं देखूँगी?’ –माँ हमारे पास से उठ गयीं- ‘और कौन देखेगा?’
मैं भी उनके पीछे जाने के लिए उठ खड़ा हुआ|
‘वह आदमी कैसा था, जो सुबह आया रहा?’ जीजी धीरे से फुसफुसायीं|
अकेले में मेरे साथ वेअकसर फुसफुसाहटों में बात करतीं|
अपने क़दम मैंने वहीं रोक लिए और जीजी के निकट चला आया| उस अजनबी के प्रति मेरी जिज्ञासा ज्यों की त्यों बनी हुई थी|
‘वह कौन है?’ मैंने पूछा|
‘एक ज़माने का एक बड़ा कुश्तीबाज़’-जीजी फिर फुसफुसायीं- ‘इधर, मेरे पास आकर बैठ| मैं तुझे सब बताती हूँ.....|’
‘क्या नाम है?’
‘मंगत पहलवान.....|’
‘फ्री-स्टाइल वाला?’ कुश्ती के बारे में मेरी जानकारी अच्छी रही| बड़े भैया की वजह से जिनके बचपन के सामान में उस समय के बड़े कुश्तीबाज़ों की तस्वीरें तो रहीं ही, उनकी किशोरा’वस्था के ज़माने की डायरियों में उनके दंगलों के ब्यौरे भी दर्ज रहे| बेशक बड़े भैया अब दूसरे शहर में रहते थे, जहाँ उनकी नौकरी थी, पत्नी थी, दो बेटे थे लेकिन जबभी वे इधर हमारे पास आते मेरे साथ अपनी उन डायरियों और तस्वीरों को ज़रूर कई-कई बार अपनी निगाह में उतारते और उन दक्ष कुश्तीबाज़ों के होल्ड (पकड़), ट्रिप(अड़ंगा) और थ्रो (पछाड़) की देर तक बातें करते|
‘हाँ| फ्री-स्टाइल’-जीजी मेरी पुरानी कमीज के बटन खोलने लगीं- ‘और वेट क्लास में सुपर हैवी-वेट.....|’
‘सौ के.जी. से ऊपर?’ मुझे याद आ गया| अजनबी मंगत पहलवान ही था| उसकी तस्वीर मैंने देख रखी थी| दस साल पहले,जो भी और जितनी भी कुश्तियाँ उसने लड़ी थीं, हर मुकाबले में खड़े सभी पहलवानों को हमेशा हराया था उसने| बड़े भैया की वे डायरियाँ दस साल पुरानी थीं, इसीलिए इधर बीते दस सालों में लड़ी गयी उसकी लड़ाइयों के बारे में मैं कुछ न जानता था|
‘हाँ एक सौ सात.....|’
‘एक सौ सात के.जी.?’ मैंने अचम्भे से अपने हाथ फैलाए|
‘हाँ| एक सौ सात के.जी.’, हँस कर जीजी न मेरी गाल चूम ली और अपनी लायी हुई नयी कमीज़ मुझे पहनाने लगीं|
‘वह हमारा दुश्मन कैसे बना?’
‘किसने कहा वह हमारा दुश्मन है?’
‘बाबा ने.....’
‘वहफिर आ धमका है’ –माँ कमरे के अंदर चली आयी- ‘वुल्फ़ की भौंक देखी? अब तुम इसे लेकर इधर ही रहना| उसी तरफ़ बिल्कुल मत आना.....|’
माँ फ़ौरन बाहर चली गयीं|
वुल्फ़की गरज ने जीजी का ध्यान बाँट दिया| नयी कमीज़ के बटन बंद कर रहे उनके हाथ अपनी फुरती खोने लगे| चेहरा भी उनका फीका और पीला पड़ने लगा|
अपने आपको जीजी के हाथों से छुड़ाकर मैंने बाहर भाग लेना चाहा|
‘नीकर नहीं बदलोगे?’ जीजी की फुसफुसाहट और धीमी हो ली- ‘पहले इधर चलोगे?’
‘हाँ|’ मैंने अपना सिर हिलाया|
दबेक़दमों से हम टेलीफोन वाले कमरे में जा पहुँचे|



मंगत पहलवान

फाटक खुला था और ड्योढ़ी में मंगत पहलवान वुल्फ़ के साथ गुत्थमगुत्था हो रहा था| उसके एक हाथ में वुल्फ़ की दुम थी और दूसरे हाथ में वुल्फ़ के कान| वुल्फ़ की लपलपाती जीभ लम्बी लार टपका रही थी और कुदक कर वह मंगत पहलवान को काट खाने की ताक में था|
‘अपने गनर के साथ फ़ौरन मेरे घर  चले आओ’-हमारी तरफ पीठ किए बाबा फोन पर बात कर रहे थे- ‘तलाक ले चुका मेरा पहला दामाद इधर उत्पात मचाए है.....|’
दामाद? बाबा ने मंगत पहलवान को अपना दामाद कहा क्या? मतलब, जीजी की एक शादी पहले भी हो चुकी थी? और वह भी मंगत पहलवान के संग?
मैंनेजीजीकी ओर देखा|
वह बुरी तरह काँप रही थीं|
‘माँ’ –घबराकर मैंने दरवाज़े की ओट में, ड्योढ़ी की दिशा में आँखें गड़ाए खड़ी माँ को पुकारा|
जीजी लड़खड़ाने लगीं|
माँ ने लपक कर उन्हें अपनी बाँहों का सहारा दिया और उन्हें अंदर सोने वाले कमरे की ओर ले जाना चाहा|
लेकिनजीजी वहीं फ़र्श पर बीच रास्ते गिर गयीं और लहू गिराने लगीं टाँगों के रास्ते|
‘पहले डॉक्टर बुलाइए जल्दी’ –माँ बाबा की दिशा में चिल्लायीं- ‘बच्चा गिर रहा है.....’
बाबा टेलीफोन पर नए अंक घुमाने लगे|



कहानी  -मंगत पहलवान

जब तक बाबा के गनर वाले दोस्त पहुँचे वुल्फ़ निष्प्राण हो चुका था और मंगत पहलवान ढीला और मंद|
और जब तक डॉक्टर पहुँचे जीजी का आधा शरीर लहू से नहा चुका था|
अगले दिन बाबा ने मुझे स्कूल न भेजा| बाद में मुझे पता चला उस दिन की अखबार में मंगत पहलवान कीगिरफ्तारीके समाचार के साथ हमारे बारे में भी एक सूचना छपी थी-माँ और बाबा मेरे नाना-नानी थे और मेरी असली माँ जीजी रहीं और असली पिता, मंगत पहलवान|

दीपक शर्मा 


लेखिका -दीपक शर्मा


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वियोग श्रृंगार के  दोहे

श्रृंगार रस के दो रूप होते हैं संयोग श्रृंगार और वियोग श्रृंगार ....वियोग में प्रेम की तीव्रता देखते ही बनती है | ऐसे में हम लायें हैं वियोग श्रृंगार रस में डूबे कुछ दोहे ........

वियोग श्रृंगार के  दोहे 


१..

पढ़ कर पाती प्रीत की , भीग रहे हैं नैन |
आखर -आखर बोलते , साजन हैं बेचैन ||

२...

मैं उनकी हो ली सखी , पर वो मेरे नाही |
एकतरफा अग्नि प्रेम की , नाहि  जाए बुझाहि  ||

३ ..

रूठे साजन से कहूँ , कैसे हिय की बात |
ऊँघत तारों के तले  , कटती है हर रात ||


४...

मुझे होता जो भान ये , साजन हैं चितचोर |
मनवा रखती  खींचकर , नहीं सौपती  डोर ||

५...

जबसे बालम ने किया , दूर देश में ठौर |
तबसे देखा है नहीं ,दर्पण करके गौर ||



६...
घड़ी चले घड़ियाल सी , इस वियोग में हाय |
तडपत हूँ दिन -रैन  मैं , पर साजन ना आय ||


७...

संदेशा तू  प्रेम का , बदरा ले जा साथ |
बूँदों -बूँदों में छिपा , कहना हिय की बात ||


8....

रिमझिम सावन भी गया , गयी घाम औ शीत |
दिवस -दिवस बढती रही , मेरे उर की प्रीत ||


9 ..

नून घुले ज्यूँ नीर में , घुलती है यूँ देह |
थामे रहतीं प्राण को , साँसें भर कर नेह ||

10...

तुम भी तो होगे पिया , उतने ही बेचैन |
लिखना खत हमको कभी , कटती कैसे रैन ||


11...

मैं हुई हलकान पिया , नाम तुम्हारा टेर |
अब तो आजा बालमा , नहीं करो अब देर ||

वंदना बाजपेयी 

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सावन एक अट्ठारह साल की लड़की है

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लघुकथा -महंगे काजू


काजू महँगे होते हैं इसमें कोई शक नहीं | पर क्या अपने नुकसान की भरपाई किसी दूसरे से कर लेना उचित है | पढ़िए लघुकथा ...

महँगे काजू 




यशोदा जी ने डिब्बा खोलकर देखा 150 ग्राम काजू बचे ही होंगे | पिछले बार मायके जाने पर बच्चों के लिए पिताजी ने दिए थे | कहा था बच्चों को खिला देना |

तब उसने काजू का भाव पूछा था |

"कितने के हैं पिताजी ?"

"1000 रुपये किलो"
 "बहुत महँगे हैं " उसने आँखें चौड़ी करते हुए कहा |

पिताजी ने उसके सर पर हाथ फेर कर कहा ," कोई बात नहीं बच्चों के लिए ही तो हैं , ताकत आ जायेगी |"

वो ख़ुशी -ख़ुशी घर ले आई थी |

बच्चे भी बड़े शौक से मुट्ठी-मुट्ठी भर के खाने लगे थे | १५ दिन में ८५० ग्राम काजू उड़ गए | इतने महंगे काजू  इतनी जल्दी खत्म होना उसे अच्छा नहीं लगा | सो डब्बे में पारद की गोली डाल  उसे पीछे छुपा दिया कि कभी कोई मेहमान आये तो खीर में डालने के काम आयेंगे, नहीं तो सब ऐसे ही खत्म हो जायेंगे  |



फिर वह खुद ही भूल गयी |

अभी आटे के लड्डू बनाते -बनाते उसे काजुओं के बारे में याद आया | उसने सोचा काजू पीस कर डाल देगी तो उसमें स्वाद बढ़ जाएगा |वर्ना रखे-रखे  खराब हो जायेंगे | उसने झट से काजू के डिब्बे को ग्राइंडर में उड़ेल कर उन्हें पीस दिया |

तभी सहेली मीता आ गयी और बातचीत होने लगी | दो घंटे बाद जब वो वापस लौटी और भुने आटे में काजू डालने लगीं तो उन्हें ध्यान आया कि जल्दबाजी में वो काजू के साथ पारद की गोली भी पीस गयीं हैं | अब पारद की गोली तो घुन न पड़ने के लिए होती है कहीं उससे बच्चे बीमार ना हो जाए  ये सोचकर उनका मन घबरा गया | पर इतने महँगे काजू फेंकने का भी मन नहीं हो रहा था |

बुझे मन से उन्होंने बिना काजू डाले लड्डू बाँध लिए | फिर भी महंगे काजुओं का इस तरह बर्बाद होना उन्हें खराब लग रहा था | बहुत सोचने पर उन्हें लगा कि वो उन्हें रधिया को दे देंगी | आखिरकार ये लोग तो यहाँ -वहाँ हर तरह का खाते रहते हैं | इन्हें नुक्सान नहीं करेगा |

सुबह जब उनकी कामवाली रधिया आई तो उन्होंने उससे कहा , " रधिया ये काजू  पीस दिए हैं अपने व् बच्चे  के लिए ले जा | बहुत मंहगे हैं संभल के  इस्तेमाल करना |

रधिया खुश हो गयी | शाम को उसने अपने बच्चे के दूध में काजू का वह पाउडर डाल दिया | देर रात बच्चे को दस्त -उल्टियों की शिकायत होने लगी |  रधिया  व् उसका पति बच्चे को लेकर अस्पताल भागे | डॉक्टर  ने फ़ूड पोईजनिंग  बतायी | महँगे -महंगे इंजेक्शन लगने लगे |

करीब ६ -सात हज़ार रूपये खर्च करने के बाद बच्चा  खतरे के बाहर हुआ |

रधिया ने सुबह दूसरी काम वाली से खबर भिजवा दी की वो दो तीन दिन तक काम पर नहीं आ पाएगी ...बच्चा बीमार है |

यशोदा जी बर्तन साफ़ करते हुए बडबडाती जा रहीं थी ... एक तो इतने महंगे काजू दिए , तब भी ऐसे नखरे | सही में इन लोगों का कोई भरोसा नहीं होता |


सरिता जैन

लेखिका -सरिता जैन




* किसी को ऐसा सामान खाने को ना दें जो आप अपने बच्चों को नहीं दे  सकते हैं |

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भागो लड़कियों अपने सपनों के पीछे भागो


अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के विधायक की पुत्री साक्षी के भागकर अजितेश से विवाह करने की बात मीडिया में छाई हुई है | भागना एक ऐसा शब्द है जो लड़कियों के लिए ही इस्तेमाल होता है | जब लड्का अपने मन से विवाह करता है तो भागना शब्द इस्तेमाल नहीं होता है | लेकिन इस प्रकरण ने स्त्री जीवन के कई मुद्दों को फिर से सामने कर दिया है | मुद्दा ये भी उठ रहा है कि लड़कियों को विवाह की अपेक्षा अपना कैरियर बनाने के लिए भागना चाहिए | 
आदरणीय मैत्रेयी पुष्पा  जी कहती हैं कि, " जब लड़की भागती है तो उसका उद्देश्य विवाह ही होता है अपने सपनों के लिए तो लड़की अकेले ही घर से निकल पड़ती है |" 
तो ..

भागो लड़कियों अपने सपनों के पीछे भागो 


सपनों के पीछे भागती लडकियाँ मुझे बहुत अच्छी लगती हैं | ऐसी ही एक लड़की है राखी,  जो मेरी घरेलु सहायिका आरती  की बेटी है | रक्षा बंधन के दिन पैदा होने के कारण उसका नाम राखी रख दिया गया | राखी का कहना है कि मैं घर में सबसे बड़ी हूँ इसलिए सबकी रक्षा मुझे ही तो करनी है | बच्ची का ऐसा सोचना आशा से मन को भरता है | समाज में स्त्री पुरुष का असली संतुलन तो यहीं से आएगा | 


राखी की माँ आरती निरक्षर है, लेकिन राखी सरकारी स्कूल में आठवीं कक्षा में पढ़ती हैं | अभी तक हमेशा प्रथम आती रही है, जिसके लिए उसे स्कूल से ईनाम भी मिलता है | कभी –कभी मेरे पास पढ़ने  आती है, तो उसकी कुशाग्र बुद्धि देख कर ख़ुशी होती है | आसान नहीं होता गरीबी से जूझते ऐसे घर मे सपने देखने की हिम्मत करना | जब कि हम उम्र सहेलियां दूसरों के घर में सफाई बर्तन कर धन कमाने लगीं हो और उनके पास उसे खर्च करने की क्षमता भी हो | तब तमाम प्रलोभनों से मन मार कर पढाई में मन लगाना | 


फिर भी राखी की आँखों में सपना है | उसका कहना है कि  बारहवीं तक की पढाई अच्छे नंबरों से कर के एक साल ब्यूटीशियन का कोर्स करके अपने इलाके में  एक पार्लर खोलेगी | पार्लर ही क्यों ? पूछने पर कहती है कि , “पार्लर   तो घर में भी खोला जा सकता है, महिलाएं ही आएँगी, माँ कहीं भी शादी कर देगीं तो इस काम के लिए कोई इनकार नहीं करेगा |” बात सही या गलत की नहीं है उसकी स्पष्ट सोच व् अपने सपने को पूरा करने की ललक है | 

मैंने अपनी सहायिका  को सुकन्या व् अन्य  सरकारी, गैर सरकारी  योजनाओं के बारे में बताया है | कई बार साथ भी गयी हूँ |आरती को मैं अक्सर ताकीद देती रहती हूँ उसकी पढ़ाई  छुडवाना नहीं | वो भी अब शिक्षा के महत्व को समझने लगी है | कई बार जरूरी कागजात बनवाने के लिए वो छुट्टी भी ले लेती है , जिससे बर्तनों की सफाई का काम मेरे सर आ जाता है, पर उस दिन वो मुझे जरा भी नहीं अखरता | एक बच्ची के सपने पूरे होते हुए देखने का सुख बहुत बड़ा है | 

खूब पढ़ो, मेहनत करो राखी तुम्हारे सपने पूरे हों |


#भागो_लड़कियों_अपने_सपने_के_पीछे_भागो 


नोट - भागना एक ऐसा शब्द है जो लड़कियों के ही साथ जुड़ा है , वैसे भी इसके सारे दुष्परिणाम लड़कियों के ही हिस्से आते हैं | मामला बड़े लोगों का हो या छोटे लोगों का, मायके के साथ संबंध तुरंत टूट जाते हैं | भागते समय अबोध मन को यह समझ नहीं होती कि कोई भी रिश्ता दूसरे रिश्ते की जगह नहीं ले सकता | फिल्मे चाहे कुछ भी कहें पर वो रिश्ते बहुत उलझन भरे हो जाते हैं जहाँ एक व्यक्ति पर सारे रिश्ते निभाने का भार हो | माता -पिता भाई बहन के रिश्ते खोने की कसक जिन्दगी भर रहती है | जिसके साथ गयीं हैं उसके परिवार वाले कितना अपनाएंगे कितना नहीं इसकी गारंटी नहीं होती | जिसको जीवनसाथी के तौर पर चुना है उसके ना बदल जाने की गारंटी भी नहीं होती | ऐसे में अधूरी शिक्षा के साथ अगर लड़की ऐसा कोई कदम भावावेश में उठा लेती है और परिस्थितियाँ आगे साथ नहीं देतीं तो उसके आगे सारे दरवाजे बंद हो जाते हैं | लड़कियों के लिए बेहतर तो यही होगा पहले आत्मनिर्भर हों , अपना वजूद बनाएं फिर अपनी पसंद के जीवन साथी के बारे में सोचें | ऐसे में ज्यादातर माता -पिता की स्वीकृति मिल ही जाती है और अगर नहीं मिलती तो भी भागना जैसा शब्द नाम के आगे कभी नहीं जुड़ता |

एक कैद से आज़ाद होने के ख्याल से दूसरी कैद में मत जाओ |

#भागो_लड़कियों_अपने_सपने_के_पीछे_भागो 


वंदना बाजपेयी 

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कहानी -ऊँट की पीठ



एक लोकगीत जो कई बार ढोलक की थाप पर सुना है, "विदा करके माता उऋण हुईं, सासरे की मुसीबत क्या जाने |" एक स्त्री के लिए हमारा समाज आज भी वैसा ही है | एक ओर ब्याह देने के बाद चाहें कितना भी दुःख हो वापस उसके लिए घर के दरवाजे नहीं खोले जाते  वहीँ दूसरी ओर अगर अगर ससुराल अच्छी नहीं है तो उसके पास घुट-घुट के जीने और मरने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचता | एक ऐसा ही दर्द उकेरती है दीपक शर्मा जी की कहानी "ऊँट की पीठ" अब इसमें कौन ऊँट है जिसकी पीठ तमाम कारगुजारियों के बाद ऊँची ही रहती है ये तो आप को कहानी पढने पर ही पता चलेगा ....


ऊँट की पीठ




“रकम लाए?” बस्तीपुर के अपने रेलवे क्वार्टर का दरवाज़ा जीजा खोलते हैं.

रकम, मतलब, साठ हज़ार रुपए.....

जो वे अनेक बार बाबूजी के मोबाइल पर अपने एस.एम.एस. से माँग रहे.....
बाबूजी के दफ़्तर के फ़ोन पर गिनाए रहे.....

दस दिन पहले इधर से जीजी की प्रसूति निपटा कर अपने कस्बापुर के लिए विदा हो रही माँ को सुनाए रहे, ‘दोहती आपकी. कुसुम आपकी. फिर उसकी डिलीवरी के लिए उधार ली गयी यह रक़म भी तो आपके नामेबाकी में जाएगी.....’

“जीजी कहाँ हैं?” मैं पूछता हूँ.

मेरे अन्दर एक अनजाना साहस जमा हो रहा है, एक नया बोध.

शायद जीजा के मेरे इतने निकट खड़े होने के कारण.


पहलीबार मैं ने जाना है अब मैं अपने कद में, अपने गठन में, अपने विस्तार में जीजा से अधिक ऊँचा हूँ, अधिकमज़बूत, अधिक वज़नदार. तीन वर्ष पहले जब जीजी की शादी हुई रही तो मेरे उस तेरह-वर्षीय शरीर की ऊँचाई जीजा की ऊँचाई के लगभग बराबर रही थी तथा आकृति एव बनावट उन से क्षीण एव दुर्बल. फिर उसी वर्ष मिली अपनी आवासी छात्रवृत्ति के अन्तर्गत कस्बापुर से मैं लखनऊ चला गया रहा और इस बीच जीजी से जब मिला भी तो हमेशा जीजा के बगैर.

“उसे जभी मिलना जब रक़म तुम्हारे हाथ में हो,” जीजा मेरे हाथ के मिठाई के डिब्बे को घूरते हैं. लिप्सा-लिप्त.

उन की ज़बान उनके गालों के भीतरी भाग में इधर-उधर घूमती हुई चिन्हित की जा सकती है. मानोअपनीधमकी को बाहर उछालने से पहले वे उस से कलोल कर रहे हों.

अढ़ाईवर्ष के अन्तराल के बाद. जिस विकट जीजा को मैं देख रहा हूँ वे मेरे लिए अजनबी हैं : छोटी घुन्नी आँखें, चौकोर पिचकी हुई गालें, चपटी फूली हुई नाक, तिरछे मुड़क रहे मोटे होंठ, गरदन इतनी छोटी कि मालूमदेता है उनकी छाती उनके जबड़ोंऔर ठुड्डी के बाद ही शुरू हो लेती है.

ऊँट की पीठ


माँ का सिखाया गया जवाब इस बार भी मैं नहीं दोहराता, “रुपयों का प्रबन्ध हो रहा है. आज तो मैं केवल अपनी हाई स्कूल की परीक्षा में प्रदेश भर में प्रथम स्थान पाने की ख़ुशी में आप लोगों को मिठाई देने आया हूँ.”
अपनी ही ओर से जीजी को ऊँचे सुर में पुकारता हूँ, “जीजी.....”
“किशोर?” जीजी तत्काल प्रकट हो लेतीहैं.
एकदम खस्ताहाल.
बालों में कंघी नहीं..... सलवारऔरकमीज़, बेमेल..... दुपट्टा, नदारद..... चेहरा वीरान और सूना.....
ये वही जीजी हैं जिन्हें अलंकार एवँ आभूषण की बचपन ही से सनक रही? अपने को सजाने-सँवारने की धुन में जो घंटों अपने चेहरे, अपने बालों, अपने हाथों, अपने पैरों से उलझा करतीं? जिस कारण बाबूजी को उन की शादी निपटाने की जल्दी रही? वे अभी अपने बी.ए. प्रथम वर्ष ही में थीं जब उन्हें ब्याह दिया गया था. क्लास-थ्री ग्रेड के इन माल-बाबू से.
“क्या लाया है?” लालायित, जीजी मेरे हाथ का डिब्बा छीन लेती हैं.

खटाखट उसे खोलती हैं और ख़ुशी से चीख़ पड़ती हैं, “मेरी पसन्द की बरफ़ी? मालूम है अपनी गुड़िया को मैं क्या बुलाती हूँ? बरफ़ी.....”


बरफ़ी का एक साबुत टुकड़ा वे तत्कालअपने मुँह में छोड़ लेती हैं.

अपने से पहले मुझे खिलाने वाली जीजी भूल रही हैं बरफ़ी मुझे भी बहुत पसन्द है. यह भी भूल रही हैं हमारे कस्बापुर से उनका बस्तीपुर पूरे चार घंटे का सफ़र है और इस समय मुझे भूख़ लगी होगी.
“जीजा जी को भी बरफ़ी दीजिए,” उनकी च्युति बराबर करने की मंशा से मैं बोल उठता हूँ.
“तेरे जीजा बरफ़ी नहीं खाते,” ठठाकर जीजी अपने मुँह में बरफ़ी का दूसरा टुकड़ा ग्रहण करती हैं, “मानुष माँस खाते हैं. मानुष लहू पीते हैं. वे आदमी नहीं, आदमखोर हैं.....”

“क्या यह सच है?” हड़बड़ाकर मैं जीजा ही की दिशा में अपना प्रश्न दाग देता हूँ.

“हाँ. यह सच है. इसे यहाँ से ले जा. वरना मैं तुम दोनों को खा जाऊँगा. सरकारी जेल इस नरक से तो बेहतर ही होगी.....”

“नरक बोओगे तो नरक काटोगे नहीं? चिनगारी छोड़ोगे तो लकड़ी चिटकेगी नहीं? मुँह ऊँट का रखोगे और बैठोगे बाबूजी की पीठ पर?”

“जा,” जीजा मुझे टहोका देते हैं, “तू रिक्शा ले कर आ. इसे मैं यहाँ अब नहीं रखूँगा. यह औरत नहीं, चंडी है.....”
“तुम दुर्वासा हो? दुर्वासा?” जीजी ठी-ठी छोड़तीहैं और बरफ़ी का तीसरा टुकड़ा अपने मुँह में दबा लेती हैं.
“जा. तू रिक्शा ले कर आ,” जीजा मुझे बाहर वाले दरवाज़े की ओर संकेत देते हैं, “जब तक मैं इस का सामान बाँध रहा हूँ.....”
भावावेग में जीजी और प्रचण्ड हो जाती हैं, “मैं यहाँ से कतई नहीं जाने वाली, कतई नहींजाने वाली.....”
“जा, तू रिक्शा ला,” जीजा की उत्तेजना बढ़ रही है, “वरना मैं इसे अभी मार डालूँगा.....”
किंकर्तव्यविमूढ़मैंउन के क्वार्टर से बाहर निकल लेता हूँ.

बाबूजीका मोबाइल मेरे पास है. उन के आदेश के साथ, ‘कुसुम के घर जाते समय इसे स्विच ऑफ़ कर लेना और वहाँ से बाहर निकलते ही ऑन. मुझे फ़ौरन बताना क्या बात हुई. और एक बात और याद रहे इस पर किसी भी अनजान नम्बर से अगर फ़ोन आए तो उसे उठाना नहीं.’
सन्नाटा खोजनेके उद्देश्य से मैं जीजी के ब्लॉक के दूसरे अनदेखे छोर पर आ पहुँचाहूँ.
सामने रेल की नंगी पटरी है.
उजड़ एवँ निर्जन.
माँ मुझे बताए भी रहीं जीजी के क्वार्टर से सौ क़दम की दूरी पर एक रेल लाइन है जहाँ घंटे घंटे पर रेलगाड़ी गुज़रा करती है.

बाबूजीके सिंचाई विभाग के दफ़्तर का फ़ोन मैं मिलाता हूँ.
हाल ही में बाबूजी क्लास-थ्री के क्लर्क-ग्रेड से क्लास-टू में प्रौन्नत हुए हैं. इस समय उनके पास अपना अलग दफ़्तर हैऔर अलग टेलीफ़ोन.
“हेलो,” बाबूजी फ़ोन उठाते हैं.

“जीजी को जीजा मेरे साथ कस्बापुर भेजना चाहते हैं.....”
“उसे यहाँ हरगिज़, हरगिज़ मत लाना,” ज़ोरदार आवाज़ में बाबूजी मुझे मना करते हैं, “वह वहीं ठीक है.....”
“नहीं,” मैं चिल्लाता हूँ, “वे बिल्कुल ठीक नहींहैं. उनका दिमाग़, उनकी ज़ुबान उनके वश में नहीं. जीजा उन्हें मार डालेंगे.....”

सरकार ने ऐसे सख़त कानून बना रखे हैं कि वह उसे मार डालने की जुर्रत नहीं कर सकता. वैसे भी वह आदमी नहीं, गीदड़ है. भभकी ही भभकी रखे है अपने पास.....”


कहानी -ऊँट की पीठ


“जीजी आत्महत्या भी कर सकती हैं.....” एक बिजली की मानिन्द जीजी मुझे रेल की पटरीपर बिछी दिखाई देती हैं और ओझल हो जाती हैं.
“नहीं. वह कुसुम को आत्महत्या नहीं करने देगा. वह जानता है उस की आत्महत्या का दोष भी उसी के मत्थे मढ़ा जाएगा और उसी की गरदन नापी जाएगी. तुम कोई चिन्ता न पालो. बस, घर चले आओ.....”
“लेकिन उधर वे दोनों मेरी राह देख रहे हैं. जीजा ने मुझे रिक्शा लाने भेजा था.....”

“बस-स्टैनड का रुख करो और चले आओ. कुसुम के पास अब भूल से भी मत जाना. और फिर, इधर तुम्हारे दोस्त तुम्हें पूछ रहे हैं. टी.वी. चैनल वाले तुम्हारे इनटरव्यूके साथ तुम्हारी माँ और मेरा इन्टरव्यू भी लेना चाहते हैं.....”
बाबूजी का कहा मैं बेकहा नहीं कर पाता.

लेकिन जैसे ही बस्तीपुर से एक बजे वाली बस कस्बापुर के लिए रवाना होती है मुझेध्यान आता है जीजी की बेटी के लिए माँ ने चाँदी की एक छोटी गिलासीमुझे सौंपी थी, ‘भांजी को पहली बार मिल रहे हो. उस के हाथ में कुछ तो धरोगे.’ वहगिलासीमेरे साथ वापिस चली आयीहै. भांजीको मिला कहाँ मैं?
बाबूजी का मोबाइल रास्ते भर बजता है. कई अनजाने नम्बरों से.

जीजा के नम्बर से भी. लेकिन तब भी जवाब में मैं उसे नहीं दबाता.
मुझे खटका है जीजी मेरे लिए परेशान हो रही हैं और बदले में जीजा को परेशान कर रही हैं. जीजी को बिना बताए मुझे कदापि नहीं आना चाहिए था. कहीं जीजी मुझे खोजने रेल की पटरी पर न निकल लें और ऊपर से रेलगाड़ी आ जाए!

उस खटके को दूर करने के लिए मोबाइल से मैं बाबूजी के दफ़्तर का नम्बर कई बार मिलाता हूँ किन्तुहर बार उसे व्यस्त पा कर मेरा खटका दुगुने वेग से मेरे पास लौट आता है.
शाम पाँच बजे बस कस्बापुर जा लगती है.
घर पहुँचता हूँ तो घर के सामने जमा स्कूटरों और साइकलों की भीड़ मुझे बाहर ही से दिखाई दे जाती है.
अन्दर दाख़िल होता हूँ तो माँ को स्त्रियों के एक समूह के साथ विलाप करती हुईं पाता हूँ.
जीजी रेल से कट गयीं क्या?
“तुम आ गए?” मुझे देखते ही पुरुषों के जमघट में बैठे बाबूजी उठ खड़े होते हैं और मुझे घर के पिछले बरामदे में लिवा लाते हैं.
यहाँ एकान्त है.
“हमें अभी बस्तीपुर जाना होगा,” वे मेरी पीठ घेर रहे हैं, “मज़बूत दिल से, मज़बूत दिमाग़ से. तुम रास्ते में थे, इसलिए तुम्हें फ़ोन नहीं किया बस में अकेले तुम अपने को कैसे सँभालोगे? क्या करोगे? कुसुम.....”
“मुझे खोजने वे घर से निकलीं और रेलगाड़ी ऊपर से आ गयी?” मैं फट पड़ता हूँ.
“उस मक्कार ने तुझे भी फ़ोनकर दिया?” बाबूजी चौकन्ने हो लेते हैं, “अपने को निरापराध ठहराने के लिए?”

“लेकिन यह सच है,” मैं बिलख रहा हूँ, “जीजी को मैं कहाँ बता कर आया मैं इधर लौटरहा हूँ? ठीक से मैं उन्हें मिला भी नहीं..... पहले जीजा ने तमाशा खड़ा किया. फिर जीजी आपा खो बैठीं. फिरआपने हुक़म दे डाला, वापिस आ जा, वापिस आ जा.....”

“शान्त हो जा,” बाबूजी मेरी कलाई अपने हाथ में कस लेते हैं, “शान्त हो जा. कुसुम को जाना ही जाना था. उस का कष्ट केवल काल ही काट सकता था. हम लोग नहीं. हम केवल उस की बिटिया की रक्षा कर सकते हैं. उस का पालन पोषण कर सकते हैं. उसे अच्छा पढ़ा-लिखा सकते हैं. और करेंगे भी. बस्तीपुर से लौटती बार उसे अपने साथ इधर लेते आएँगे.....”

सहसा बस्तीपुर वाली बिजली मेरे सामने फिर कौंध जाती है: लेकिन जीजी रेल की पटरीपर बिछी हैं..... लेकिनअब वे अदृश्य नहीं हो रहीं..... मुझे दिखाई दे रही हैं..... साफ़दिखाई दे रही हैं..... हमारे कस्बापुर की बरफ़ी अपने मुँह में दबाए.....

दीपक शर्मा 

लेखिका -दीपक शर्मा




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