July 2019

लघुकथा -महंगे काजू


काजू महँगे होते हैं इसमें कोई शक नहीं | पर क्या अपने नुकसान की भरपाई किसी दूसरे से कर लेना उचित है | पढ़िए लघुकथा ...

महँगे काजू 




यशोदा जी ने डिब्बा खोलकर देखा 150 ग्राम काजू बचे ही होंगे | पिछले बार मायके जाने पर बच्चों के लिए पिताजी ने दिए थे | कहा था बच्चों को खिला देना |

तब उसने काजू का भाव पूछा था |

"कितने के हैं पिताजी ?"

"1000 रुपये किलो"
 "बहुत महँगे हैं " उसने आँखें चौड़ी करते हुए कहा |

पिताजी ने उसके सर पर हाथ फेर कर कहा ," कोई बात नहीं बच्चों के लिए ही तो हैं , ताकत आ जायेगी |"

वो ख़ुशी -ख़ुशी घर ले आई थी |

बच्चे भी बड़े शौक से मुट्ठी-मुट्ठी भर के खाने लगे थे | १५ दिन में ८५० ग्राम काजू उड़ गए | इतने महंगे काजू  इतनी जल्दी खत्म होना उसे अच्छा नहीं लगा | सो डब्बे में पारद की गोली डाल  उसे पीछे छुपा दिया कि कभी कोई मेहमान आये तो खीर में डालने के काम आयेंगे, नहीं तो सब ऐसे ही खत्म हो जायेंगे  |



फिर वह खुद ही भूल गयी |

अभी आटे के लड्डू बनाते -बनाते उसे काजुओं के बारे में याद आया | उसने सोचा काजू पीस कर डाल देगी तो उसमें स्वाद बढ़ जाएगा |वर्ना रखे-रखे  खराब हो जायेंगे | उसने झट से काजू के डिब्बे को ग्राइंडर में उड़ेल कर उन्हें पीस दिया |

तभी सहेली मीता आ गयी और बातचीत होने लगी | दो घंटे बाद जब वो वापस लौटी और भुने आटे में काजू डालने लगीं तो उन्हें ध्यान आया कि जल्दबाजी में वो काजू के साथ पारद की गोली भी पीस गयीं हैं | अब पारद की गोली तो घुन न पड़ने के लिए होती है कहीं उससे बच्चे बीमार ना हो जाए  ये सोचकर उनका मन घबरा गया | पर इतने महँगे काजू फेंकने का भी मन नहीं हो रहा था |

बुझे मन से उन्होंने बिना काजू डाले लड्डू बाँध लिए | फिर भी महंगे काजुओं का इस तरह बर्बाद होना उन्हें खराब लग रहा था | बहुत सोचने पर उन्हें लगा कि वो उन्हें रधिया को दे देंगी | आखिरकार ये लोग तो यहाँ -वहाँ हर तरह का खाते रहते हैं | इन्हें नुक्सान नहीं करेगा |

सुबह जब उनकी कामवाली रधिया आई तो उन्होंने उससे कहा , " रधिया ये काजू  पीस दिए हैं अपने व् बच्चे  के लिए ले जा | बहुत मंहगे हैं संभल के  इस्तेमाल करना |

रधिया खुश हो गयी | शाम को उसने अपने बच्चे के दूध में काजू का वह पाउडर डाल दिया | देर रात बच्चे को दस्त -उल्टियों की शिकायत होने लगी |  रधिया  व् उसका पति बच्चे को लेकर अस्पताल भागे | डॉक्टर  ने फ़ूड पोईजनिंग  बतायी | महँगे -महंगे इंजेक्शन लगने लगे |

करीब ६ -सात हज़ार रूपये खर्च करने के बाद बच्चा  खतरे के बाहर हुआ |

रधिया ने सुबह दूसरी काम वाली से खबर भिजवा दी की वो दो तीन दिन तक काम पर नहीं आ पाएगी ...बच्चा बीमार है |

यशोदा जी बर्तन साफ़ करते हुए बडबडाती जा रहीं थी ... एक तो इतने महंगे काजू दिए , तब भी ऐसे नखरे | सही में इन लोगों का कोई भरोसा नहीं होता |


सरिता जैन

लेखिका -सरिता जैन




* किसी को ऐसा सामान खाने को ना दें जो आप अपने बच्चों को नहीं दे  सकते हैं |

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भागो लड़कियों अपने सपनों के पीछे भागो


अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के विधायक की पुत्री साक्षी के भागकर अजितेश से विवाह करने की बात मीडिया में छाई हुई है | भागना एक ऐसा शब्द है जो लड़कियों के लिए ही इस्तेमाल होता है | जब लड्का अपने मन से विवाह करता है तो भागना शब्द इस्तेमाल नहीं होता है | लेकिन इस प्रकरण ने स्त्री जीवन के कई मुद्दों को फिर से सामने कर दिया है | मुद्दा ये भी उठ रहा है कि लड़कियों को विवाह की अपेक्षा अपना कैरियर बनाने के लिए भागना चाहिए | 
आदरणीय मैत्रेयी पुष्पा  जी कहती हैं कि, " जब लड़की भागती है तो उसका उद्देश्य विवाह ही होता है अपने सपनों के लिए तो लड़की अकेले ही घर से निकल पड़ती है |" 
तो ..

भागो लड़कियों अपने सपनों के पीछे भागो 


सपनों के पीछे भागती लडकियाँ मुझे बहुत अच्छी लगती हैं | ऐसी ही एक लड़की है राखी,  जो मेरी घरेलु सहायिका आरती  की बेटी है | रक्षा बंधन के दिन पैदा होने के कारण उसका नाम राखी रख दिया गया | राखी का कहना है कि मैं घर में सबसे बड़ी हूँ इसलिए सबकी रक्षा मुझे ही तो करनी है | बच्ची का ऐसा सोचना आशा से मन को भरता है | समाज में स्त्री पुरुष का असली संतुलन तो यहीं से आएगा | 


राखी की माँ आरती निरक्षर है, लेकिन राखी सरकारी स्कूल में आठवीं कक्षा में पढ़ती हैं | अभी तक हमेशा प्रथम आती रही है, जिसके लिए उसे स्कूल से ईनाम भी मिलता है | कभी –कभी मेरे पास पढ़ने  आती है, तो उसकी कुशाग्र बुद्धि देख कर ख़ुशी होती है | आसान नहीं होता गरीबी से जूझते ऐसे घर मे सपने देखने की हिम्मत करना | जब कि हम उम्र सहेलियां दूसरों के घर में सफाई बर्तन कर धन कमाने लगीं हो और उनके पास उसे खर्च करने की क्षमता भी हो | तब तमाम प्रलोभनों से मन मार कर पढाई में मन लगाना | 


फिर भी राखी की आँखों में सपना है | उसका कहना है कि  बारहवीं तक की पढाई अच्छे नंबरों से कर के एक साल ब्यूटीशियन का कोर्स करके अपने इलाके में  एक पार्लर खोलेगी | पार्लर ही क्यों ? पूछने पर कहती है कि , “पार्लर   तो घर में भी खोला जा सकता है, महिलाएं ही आएँगी, माँ कहीं भी शादी कर देगीं तो इस काम के लिए कोई इनकार नहीं करेगा |” बात सही या गलत की नहीं है उसकी स्पष्ट सोच व् अपने सपने को पूरा करने की ललक है | 

मैंने अपनी सहायिका  को सुकन्या व् अन्य  सरकारी, गैर सरकारी  योजनाओं के बारे में बताया है | कई बार साथ भी गयी हूँ |आरती को मैं अक्सर ताकीद देती रहती हूँ उसकी पढ़ाई  छुडवाना नहीं | वो भी अब शिक्षा के महत्व को समझने लगी है | कई बार जरूरी कागजात बनवाने के लिए वो छुट्टी भी ले लेती है , जिससे बर्तनों की सफाई का काम मेरे सर आ जाता है, पर उस दिन वो मुझे जरा भी नहीं अखरता | एक बच्ची के सपने पूरे होते हुए देखने का सुख बहुत बड़ा है | 

खूब पढ़ो, मेहनत करो राखी तुम्हारे सपने पूरे हों |


#भागो_लड़कियों_अपने_सपने_के_पीछे_भागो 


नोट - भागना एक ऐसा शब्द है जो लड़कियों के ही साथ जुड़ा है , वैसे भी इसके सारे दुष्परिणाम लड़कियों के ही हिस्से आते हैं | मामला बड़े लोगों का हो या छोटे लोगों का, मायके के साथ संबंध तुरंत टूट जाते हैं | भागते समय अबोध मन को यह समझ नहीं होती कि कोई भी रिश्ता दूसरे रिश्ते की जगह नहीं ले सकता | फिल्मे चाहे कुछ भी कहें पर वो रिश्ते बहुत उलझन भरे हो जाते हैं जहाँ एक व्यक्ति पर सारे रिश्ते निभाने का भार हो | माता -पिता भाई बहन के रिश्ते खोने की कसक जिन्दगी भर रहती है | जिसके साथ गयीं हैं उसके परिवार वाले कितना अपनाएंगे कितना नहीं इसकी गारंटी नहीं होती | जिसको जीवनसाथी के तौर पर चुना है उसके ना बदल जाने की गारंटी भी नहीं होती | ऐसे में अधूरी शिक्षा के साथ अगर लड़की ऐसा कोई कदम भावावेश में उठा लेती है और परिस्थितियाँ आगे साथ नहीं देतीं तो उसके आगे सारे दरवाजे बंद हो जाते हैं | लड़कियों के लिए बेहतर तो यही होगा पहले आत्मनिर्भर हों , अपना वजूद बनाएं फिर अपनी पसंद के जीवन साथी के बारे में सोचें | ऐसे में ज्यादातर माता -पिता की स्वीकृति मिल ही जाती है और अगर नहीं मिलती तो भी भागना जैसा शब्द नाम के आगे कभी नहीं जुड़ता |

एक कैद से आज़ाद होने के ख्याल से दूसरी कैद में मत जाओ |

#भागो_लड़कियों_अपने_सपने_के_पीछे_भागो 


वंदना बाजपेयी 

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कहानी -ऊँट की पीठ



एक लोकगीत जो कई बार ढोलक की थाप पर सुना है, "विदा करके माता उऋण हुईं, सासरे की मुसीबत क्या जाने |" एक स्त्री के लिए हमारा समाज आज भी वैसा ही है | एक ओर ब्याह देने के बाद चाहें कितना भी दुःख हो वापस उसके लिए घर के दरवाजे नहीं खोले जाते  वहीँ दूसरी ओर अगर अगर ससुराल अच्छी नहीं है तो उसके पास घुट-घुट के जीने और मरने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचता | एक ऐसा ही दर्द उकेरती है दीपक शर्मा जी की कहानी "ऊँट की पीठ" अब इसमें कौन ऊँट है जिसकी पीठ तमाम कारगुजारियों के बाद ऊँची ही रहती है ये तो आप को कहानी पढने पर ही पता चलेगा ....


ऊँट की पीठ




“रकम लाए?” बस्तीपुर के अपने रेलवे क्वार्टर का दरवाज़ा जीजा खोलते हैं.

रकम, मतलब, साठ हज़ार रुपए.....

जो वे अनेक बार बाबूजी के मोबाइल पर अपने एस.एम.एस. से माँग रहे.....
बाबूजी के दफ़्तर के फ़ोन पर गिनाए रहे.....

दस दिन पहले इधर से जीजी की प्रसूति निपटा कर अपने कस्बापुर के लिए विदा हो रही माँ को सुनाए रहे, ‘दोहती आपकी. कुसुम आपकी. फिर उसकी डिलीवरी के लिए उधार ली गयी यह रक़म भी तो आपके नामेबाकी में जाएगी.....’

“जीजी कहाँ हैं?” मैं पूछता हूँ.

मेरे अन्दर एक अनजाना साहस जमा हो रहा है, एक नया बोध.

शायद जीजा के मेरे इतने निकट खड़े होने के कारण.


पहलीबार मैं ने जाना है अब मैं अपने कद में, अपने गठन में, अपने विस्तार में जीजा से अधिक ऊँचा हूँ, अधिकमज़बूत, अधिक वज़नदार. तीन वर्ष पहले जब जीजी की शादी हुई रही तो मेरे उस तेरह-वर्षीय शरीर की ऊँचाई जीजा की ऊँचाई के लगभग बराबर रही थी तथा आकृति एव बनावट उन से क्षीण एव दुर्बल. फिर उसी वर्ष मिली अपनी आवासी छात्रवृत्ति के अन्तर्गत कस्बापुर से मैं लखनऊ चला गया रहा और इस बीच जीजी से जब मिला भी तो हमेशा जीजा के बगैर.

“उसे जभी मिलना जब रक़म तुम्हारे हाथ में हो,” जीजा मेरे हाथ के मिठाई के डिब्बे को घूरते हैं. लिप्सा-लिप्त.

उन की ज़बान उनके गालों के भीतरी भाग में इधर-उधर घूमती हुई चिन्हित की जा सकती है. मानोअपनीधमकी को बाहर उछालने से पहले वे उस से कलोल कर रहे हों.

अढ़ाईवर्ष के अन्तराल के बाद. जिस विकट जीजा को मैं देख रहा हूँ वे मेरे लिए अजनबी हैं : छोटी घुन्नी आँखें, चौकोर पिचकी हुई गालें, चपटी फूली हुई नाक, तिरछे मुड़क रहे मोटे होंठ, गरदन इतनी छोटी कि मालूमदेता है उनकी छाती उनके जबड़ोंऔर ठुड्डी के बाद ही शुरू हो लेती है.

ऊँट की पीठ


माँ का सिखाया गया जवाब इस बार भी मैं नहीं दोहराता, “रुपयों का प्रबन्ध हो रहा है. आज तो मैं केवल अपनी हाई स्कूल की परीक्षा में प्रदेश भर में प्रथम स्थान पाने की ख़ुशी में आप लोगों को मिठाई देने आया हूँ.”
अपनी ही ओर से जीजी को ऊँचे सुर में पुकारता हूँ, “जीजी.....”
“किशोर?” जीजी तत्काल प्रकट हो लेतीहैं.
एकदम खस्ताहाल.
बालों में कंघी नहीं..... सलवारऔरकमीज़, बेमेल..... दुपट्टा, नदारद..... चेहरा वीरान और सूना.....
ये वही जीजी हैं जिन्हें अलंकार एवँ आभूषण की बचपन ही से सनक रही? अपने को सजाने-सँवारने की धुन में जो घंटों अपने चेहरे, अपने बालों, अपने हाथों, अपने पैरों से उलझा करतीं? जिस कारण बाबूजी को उन की शादी निपटाने की जल्दी रही? वे अभी अपने बी.ए. प्रथम वर्ष ही में थीं जब उन्हें ब्याह दिया गया था. क्लास-थ्री ग्रेड के इन माल-बाबू से.
“क्या लाया है?” लालायित, जीजी मेरे हाथ का डिब्बा छीन लेती हैं.

खटाखट उसे खोलती हैं और ख़ुशी से चीख़ पड़ती हैं, “मेरी पसन्द की बरफ़ी? मालूम है अपनी गुड़िया को मैं क्या बुलाती हूँ? बरफ़ी.....”


बरफ़ी का एक साबुत टुकड़ा वे तत्कालअपने मुँह में छोड़ लेती हैं.

अपने से पहले मुझे खिलाने वाली जीजी भूल रही हैं बरफ़ी मुझे भी बहुत पसन्द है. यह भी भूल रही हैं हमारे कस्बापुर से उनका बस्तीपुर पूरे चार घंटे का सफ़र है और इस समय मुझे भूख़ लगी होगी.
“जीजा जी को भी बरफ़ी दीजिए,” उनकी च्युति बराबर करने की मंशा से मैं बोल उठता हूँ.
“तेरे जीजा बरफ़ी नहीं खाते,” ठठाकर जीजी अपने मुँह में बरफ़ी का दूसरा टुकड़ा ग्रहण करती हैं, “मानुष माँस खाते हैं. मानुष लहू पीते हैं. वे आदमी नहीं, आदमखोर हैं.....”

“क्या यह सच है?” हड़बड़ाकर मैं जीजा ही की दिशा में अपना प्रश्न दाग देता हूँ.

“हाँ. यह सच है. इसे यहाँ से ले जा. वरना मैं तुम दोनों को खा जाऊँगा. सरकारी जेल इस नरक से तो बेहतर ही होगी.....”

“नरक बोओगे तो नरक काटोगे नहीं? चिनगारी छोड़ोगे तो लकड़ी चिटकेगी नहीं? मुँह ऊँट का रखोगे और बैठोगे बाबूजी की पीठ पर?”

“जा,” जीजा मुझे टहोका देते हैं, “तू रिक्शा ले कर आ. इसे मैं यहाँ अब नहीं रखूँगा. यह औरत नहीं, चंडी है.....”
“तुम दुर्वासा हो? दुर्वासा?” जीजी ठी-ठी छोड़तीहैं और बरफ़ी का तीसरा टुकड़ा अपने मुँह में दबा लेती हैं.
“जा. तू रिक्शा ले कर आ,” जीजा मुझे बाहर वाले दरवाज़े की ओर संकेत देते हैं, “जब तक मैं इस का सामान बाँध रहा हूँ.....”
भावावेग में जीजी और प्रचण्ड हो जाती हैं, “मैं यहाँ से कतई नहीं जाने वाली, कतई नहींजाने वाली.....”
“जा, तू रिक्शा ला,” जीजा की उत्तेजना बढ़ रही है, “वरना मैं इसे अभी मार डालूँगा.....”
किंकर्तव्यविमूढ़मैंउन के क्वार्टर से बाहर निकल लेता हूँ.

बाबूजीका मोबाइल मेरे पास है. उन के आदेश के साथ, ‘कुसुम के घर जाते समय इसे स्विच ऑफ़ कर लेना और वहाँ से बाहर निकलते ही ऑन. मुझे फ़ौरन बताना क्या बात हुई. और एक बात और याद रहे इस पर किसी भी अनजान नम्बर से अगर फ़ोन आए तो उसे उठाना नहीं.’
सन्नाटा खोजनेके उद्देश्य से मैं जीजी के ब्लॉक के दूसरे अनदेखे छोर पर आ पहुँचाहूँ.
सामने रेल की नंगी पटरी है.
उजड़ एवँ निर्जन.
माँ मुझे बताए भी रहीं जीजी के क्वार्टर से सौ क़दम की दूरी पर एक रेल लाइन है जहाँ घंटे घंटे पर रेलगाड़ी गुज़रा करती है.

बाबूजीके सिंचाई विभाग के दफ़्तर का फ़ोन मैं मिलाता हूँ.
हाल ही में बाबूजी क्लास-थ्री के क्लर्क-ग्रेड से क्लास-टू में प्रौन्नत हुए हैं. इस समय उनके पास अपना अलग दफ़्तर हैऔर अलग टेलीफ़ोन.
“हेलो,” बाबूजी फ़ोन उठाते हैं.

“जीजी को जीजा मेरे साथ कस्बापुर भेजना चाहते हैं.....”
“उसे यहाँ हरगिज़, हरगिज़ मत लाना,” ज़ोरदार आवाज़ में बाबूजी मुझे मना करते हैं, “वह वहीं ठीक है.....”
“नहीं,” मैं चिल्लाता हूँ, “वे बिल्कुल ठीक नहींहैं. उनका दिमाग़, उनकी ज़ुबान उनके वश में नहीं. जीजा उन्हें मार डालेंगे.....”

सरकार ने ऐसे सख़त कानून बना रखे हैं कि वह उसे मार डालने की जुर्रत नहीं कर सकता. वैसे भी वह आदमी नहीं, गीदड़ है. भभकी ही भभकी रखे है अपने पास.....”


कहानी -ऊँट की पीठ


“जीजी आत्महत्या भी कर सकती हैं.....” एक बिजली की मानिन्द जीजी मुझे रेल की पटरीपर बिछी दिखाई देती हैं और ओझल हो जाती हैं.
“नहीं. वह कुसुम को आत्महत्या नहीं करने देगा. वह जानता है उस की आत्महत्या का दोष भी उसी के मत्थे मढ़ा जाएगा और उसी की गरदन नापी जाएगी. तुम कोई चिन्ता न पालो. बस, घर चले आओ.....”
“लेकिन उधर वे दोनों मेरी राह देख रहे हैं. जीजा ने मुझे रिक्शा लाने भेजा था.....”

“बस-स्टैनड का रुख करो और चले आओ. कुसुम के पास अब भूल से भी मत जाना. और फिर, इधर तुम्हारे दोस्त तुम्हें पूछ रहे हैं. टी.वी. चैनल वाले तुम्हारे इनटरव्यूके साथ तुम्हारी माँ और मेरा इन्टरव्यू भी लेना चाहते हैं.....”
बाबूजी का कहा मैं बेकहा नहीं कर पाता.

लेकिन जैसे ही बस्तीपुर से एक बजे वाली बस कस्बापुर के लिए रवाना होती है मुझेध्यान आता है जीजी की बेटी के लिए माँ ने चाँदी की एक छोटी गिलासीमुझे सौंपी थी, ‘भांजी को पहली बार मिल रहे हो. उस के हाथ में कुछ तो धरोगे.’ वहगिलासीमेरे साथ वापिस चली आयीहै. भांजीको मिला कहाँ मैं?
बाबूजी का मोबाइल रास्ते भर बजता है. कई अनजाने नम्बरों से.

जीजा के नम्बर से भी. लेकिन तब भी जवाब में मैं उसे नहीं दबाता.
मुझे खटका है जीजी मेरे लिए परेशान हो रही हैं और बदले में जीजा को परेशान कर रही हैं. जीजी को बिना बताए मुझे कदापि नहीं आना चाहिए था. कहीं जीजी मुझे खोजने रेल की पटरी पर न निकल लें और ऊपर से रेलगाड़ी आ जाए!

उस खटके को दूर करने के लिए मोबाइल से मैं बाबूजी के दफ़्तर का नम्बर कई बार मिलाता हूँ किन्तुहर बार उसे व्यस्त पा कर मेरा खटका दुगुने वेग से मेरे पास लौट आता है.
शाम पाँच बजे बस कस्बापुर जा लगती है.
घर पहुँचता हूँ तो घर के सामने जमा स्कूटरों और साइकलों की भीड़ मुझे बाहर ही से दिखाई दे जाती है.
अन्दर दाख़िल होता हूँ तो माँ को स्त्रियों के एक समूह के साथ विलाप करती हुईं पाता हूँ.
जीजी रेल से कट गयीं क्या?
“तुम आ गए?” मुझे देखते ही पुरुषों के जमघट में बैठे बाबूजी उठ खड़े होते हैं और मुझे घर के पिछले बरामदे में लिवा लाते हैं.
यहाँ एकान्त है.
“हमें अभी बस्तीपुर जाना होगा,” वे मेरी पीठ घेर रहे हैं, “मज़बूत दिल से, मज़बूत दिमाग़ से. तुम रास्ते में थे, इसलिए तुम्हें फ़ोन नहीं किया बस में अकेले तुम अपने को कैसे सँभालोगे? क्या करोगे? कुसुम.....”
“मुझे खोजने वे घर से निकलीं और रेलगाड़ी ऊपर से आ गयी?” मैं फट पड़ता हूँ.
“उस मक्कार ने तुझे भी फ़ोनकर दिया?” बाबूजी चौकन्ने हो लेते हैं, “अपने को निरापराध ठहराने के लिए?”

“लेकिन यह सच है,” मैं बिलख रहा हूँ, “जीजी को मैं कहाँ बता कर आया मैं इधर लौटरहा हूँ? ठीक से मैं उन्हें मिला भी नहीं..... पहले जीजा ने तमाशा खड़ा किया. फिर जीजी आपा खो बैठीं. फिरआपने हुक़म दे डाला, वापिस आ जा, वापिस आ जा.....”

“शान्त हो जा,” बाबूजी मेरी कलाई अपने हाथ में कस लेते हैं, “शान्त हो जा. कुसुम को जाना ही जाना था. उस का कष्ट केवल काल ही काट सकता था. हम लोग नहीं. हम केवल उस की बिटिया की रक्षा कर सकते हैं. उस का पालन पोषण कर सकते हैं. उसे अच्छा पढ़ा-लिखा सकते हैं. और करेंगे भी. बस्तीपुर से लौटती बार उसे अपने साथ इधर लेते आएँगे.....”

सहसा बस्तीपुर वाली बिजली मेरे सामने फिर कौंध जाती है: लेकिन जीजी रेल की पटरीपर बिछी हैं..... लेकिनअब वे अदृश्य नहीं हो रहीं..... मुझे दिखाई दे रही हैं..... साफ़दिखाई दे रही हैं..... हमारे कस्बापुर की बरफ़ी अपने मुँह में दबाए.....

दीपक शर्मा 

लेखिका -दीपक शर्मा




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सावन की बुंदियां


सावन के आते ही अपनी धरती ख़ुशी से झूम उठती है , किसान अच्छी फसल की उम्मीद करने लगता है और बावरा मन गा उठता है .....

सावन की बुंदियां



उमड़ - घुमड़ कर
श्याम मेघ , अम्बर छाए
संकुल नभ गलियां
रिमझिम गिरे सावन की बुंदियां

शीतल , मृदुल फुहारें गिरतीं
अमृत सम मधुमय जल झरतीं
भरतीं पोखर , झीलें , नदियां
रिमझिम गिरे सावन की बुदियां


तप्त हुई बेचैन धरा की
है जलधर ने प्यास बुझाई
कृषकों के चेहरों पर खुशियां
रिमझिम गिरे सावन की बुंदियां


अट्टालिका गगनचुंबी हित
वृक्ष कटें वन , उपवन के नित
झूला किस पर डाले मुनिया ?
रिमझिम गिरे सावन की बुंदियां

उषा अवस्थी

लेखिका -उषा अवस्थी


पढ़ें सावन पर कुछ भीगती हुई कवितायें -


सावन में लग गयी आग कि दिल मेरा (कहानी )

सावन पर किरण सिंह की कवितायें

सावन एक अट्ठारह साल की लड़की है

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कहानी -जीवन का सत्य

"संसार से भागे फिरते हो भगवान् को तुम क्या पाओगे" चित्रलेखा फिल्म का यह लोकप्रिय गीत जीवन के सत्य को बहुत कुछ उजागर करता है | यूँ तो मन की शांति के लिए बहुत सारे आश्रम हैं जहाँ लोग जाते हैं , ध्यान संयम सीखते हैं , परन्तु क्या कोई गृहस्थ अचानक से संन्यास ले ले तो उसके मन में पीड़ा नहीं होगी ? क्या उसकी घर -गृहस्थी बिखरेगी नहीं ? कर्म को प्रधानता देने वाला हमारा धर्म कर्म से भागने का सन्देश नहीं देता | पढ़िए जीवन के इसी सत्य को उजागर करती किरण सिंह जी की लोकप्रिय कहानी ...

जीवन का सत्य 

अरे – अरे यह मैं कहाँ आ गई? अपनी हमउम्र श्याम वर्णा तराशे हुए नैन नक्श वाली साध्वी को अपनी खाट के बगल में काठ की कुर्सी पर बैठे हुए देखकर मीना कुछ घबराई हुई सी उससे पूछ बैठी। साध्वी वृक्ष के तना के समान अपनी खुरदुरी हथेली उसके सर पर फेरती हुई बोली बहन घबराओ नहीं तुम सुरक्षित स्थान पर आ गई हो।
मीना – लेकिन कहाँ? और फिर मैं यहाँ कैसे आ गई?

साध्वी बगल में रखे हुए एक केतली में से तुलसी पत्ता, अदरक और गुड़ का काढ़ा स्टील के गिलास में उड़ेलती हुई बोली उठो बहन पहले काढ़ा पी लो मैं सब बताती हूँ। वैसे भी इतनी ठंड है और तुम नदी में… अपने प्रश्न को अधूरा छोड़ते हुए ही साध्वी दूसरा प्रश्न कर बैठी आखिर ऐसी कौन सी मुसीबत आन पड़ी थी बहन कि ईश्वर का दिया हुआ इतना सुन्दर उपहार को ही समाप्त करने जा रही थी वो तो अच्छा हुआ कि तुम्हें बचाने के लिए अपने दूत प्रेमानन्द को ईश्वर ने भेज दिया था वर्ना………

इतना सुन्दर शरीर ईश्वर ने दिया है तुम्हें और जहाँ तक मैं तुम्हें समझ पा रही हूँ अच्छे – खासे घर की लग रही हो साध्वी किसी ज्योतिषाचार्य की भांति मीना का भूत, भविष्य और वर्तमान गिन रही थी और काढ़ा के एक – एक घूंट के साथ – साथ मीना की कड़वी यादें भी उसके मन जिह्वा को कसैला कर रहीं थीं और आँसू पलकों में आकर अटक गये थे जो ज़रा भी भावनाओं के वेग से टपक पड़ते।

गलत कहते हैं लोग कि स्त्री ही स्त्री की शत्रु होती हैं सच तो यह है कि पुरुष ही अपनी अहम् तथा स्वार्थ की सिद्धि के लिए एक स्त्री के पीठ पर बंदूक रखकर चुपके से दूसरी स्त्री पर वार करते हैं जिसे स्त्री देख नहीं पाती और वह मूर्खा स्त्री को ही अपनी शत्रु समझ बैठती है। सोचते – सोचते अविनाश के थप्पड़ की झनझनाहट को वह भी दूसरी औरत के लिये उसके गालों पर पुनः महसूस होने लगे और अश्रु बूंदें टपककर उसके घाव पर मरहम लगाने लगे लेकिन पीड़ा अधिक होने पर मरहम कहाँ काम कर पाता है और उसमें भी अपनो से मिली हुई पीड़ाएँ तो कुछ अधिक ही जख्म दे जाती हैं।

मीना सोचती है कि मायके भी तो माँ से ही होता है न। आज मेरी माँ जिन्दा होती तो क्या मुझे मायके से इस कदर लौटाती जैसे पिता जी ने समझा बुझाकर मुझे उसी घर में जाने को बोल दिया जहाँ से पति थप्पड़ मार कर खदेड़ दिया हो? नहीं, नहीं माँ एक स्त्री थी वह जरूर मेरे दुख, दर्द, तथा भावनाओं को समझती।
अपनी माँ को याद करते – करते मीना को अचानक अपने बच्चे याद आ गये और वह तड़प उठी। मीना सोचने लगी इस उम्र में मैं अपनी स्वर्गवासी माँ को याद करके रो रही हूँ और मैं खुद एक माँ होते हुए भी जीते जी अपने बच्चों को कसाई के हवाले कर आई। क्या अविनाश (बच्चों के पिता) बच्चों पर हाथ न उठायेंगे? ओह मैं भी कितनी स्वार्थी निकली। मीना अपनी कायरता से खिन्न विवश साध्वी के गले लग कर फूट-फूट कर रो पड़ी।

साध्वी मीना को समझाते हुए बोली मत रो बहन,अब तुम ईश्वर के शरण में आ गई हो इसलिए मोह माया का त्याग करो। मान लो तुम यदि डूब गई होती तो..? तो कौन तुम्हारे बच्चों को देखता? जिस ईश्वर ने जन्म दिया है वही पालन पोषण भी करेगा तुम आराम करो अभी ।

देखो तो तुम्हारा वदन कितना तप रहा है। साध्वी के स्पर्श में एक अपनापन था इसलिए मीना उसकी बात मान कर सोने का प्रयास करने लगी।
मीना जब सुबह उठी तो कुछ ठीक महसूस कर रही थी। तभी साध्वी फिर वही काढ़ा लिये पहुंचती है और पूछती है कैसी हो बहन?
मीना – अब कुछ अच्छी हूँ बहन
साध्वी – तो चलो आज मैं तुम्हें गुरू जी से मिलाती हूँ।
मीना अपने आँखों से ही हामी भर दी।
साध्वी गेरूआ रंग का वस्त्र देते हुए मीना से बोली नहा लो फिर चलते हैं।

जीवन का सत्य

मीना नहा धोकर गेरुआ वस्त्र लपेटे बिल्कुल साध्वी लग रही थी। वह यन्त्रवत साध्वी के पीछे – पीछे चलने लगी। साध्वी एक कमरे में ले गई जहाँ पूरे घर में मटमैले रंग की दरी बिछी हुई थी जिसपर करीब सौ साध्वी और साधु जिनकी उम्र भी करीब – करीब पच्चीस से पचास वर्षों के बीच की होगी। कमरे के एक तरफ ऊँची सी चौकी जिसपर सफेद रंग का मखमली चादर बिछा हुआ था। चादर के ऊपर दो मसनद जिसपर गेरूआ मखमली खोल लगा था। गुरु जी मसनद के सहारे बैठे थे। साध्वी उनके सामने जाकर पहले पाँव छूकर प्रणाम की तो पीछे से मीना ने भी नकलची बन्दरों की तरह ठीक वैसे ही प्रणाम कर लिया। गुरु जी अपने दाहिने हाथो को आशिर्वाद मुद्रा में ले जाकर दोनो को आशिर्वाद दिये और बैठने का इशारा कर दिये।

साध्वी गुरु जी के उपदेश का पालन करते हुए एक तरफ मीना के साथ बैठ गई। गुरु जी का उपदेश चालू था। मीना मन्त्र मुग्ध हो सुनी जा रही थी। अशांत चित्त को कुछ शांति मिल रही थी। गुरु जी का प्रवचन समाप्त हुआ। सभी उठ कर जाने लगे तो गुरु जी के इशारे पर साध्वी ने मीना को रोक लिया। साध्वी भी कमरे में से जाने लगी तो मीना को थोड़ी घबराहट हुई तो साध्वी उसे भांपकर बोली घबराओ मत बहन मैं बाहर ही हूँ। आज तुम्हें गुरु जी दीक्षा देंगे मतलब तुम्हारे कान में मंत्र बोलेंगे जिसे तुम याद कर लेना। बहुत किस्मत से ही ऐसे गुरु मिलते हैं कहकर साध्वी बाहर चली गई। गुरु जी ने मीना के कान में मंत्र बोला और कोई एक फल छोड़ने को कहा।

इधर मीना के पति अविनाश परेशान हर रिश्ते 1नाते तथा दोस्त मित्रों से पूछते रहे लेकिन मीना का पता ठिकाना किसी से भी पता नहीं चला । थक हारकर अविनाश थाने में रपट लिखाने के लिए जैसे ही जाने को हुए वैसे ही मोवाइल पर रिंग हुई जो कि किसी आश्रम से था।

अविनाश मोवाइल से बात करने के तुरंत बाद जैसै तैसे अपनी गाड़ी निकाले और आश्रम पहुंचे । आश्रम में मीना को देखकर उसे अपने आप पर बहुत ग्लानि हुई। कहाँ मीना के माँग में सिंदूरी गंगा बह रही थी जिसे उसी ने अपनी चुटकियों से उतारा था आज बालू की रेत उफ…घर चलने को कहता भी तो किस मुंह से फिर भी वह मीना को मनाने की कोशिश किया बच्चों का भी वास्ता दिया लेकिन पाषाणी बनी मीना का दिल नहीं पिघला। बल्कि उसने जो भी गहने पहने थे उसे एक पोटली में बांधकर अविनाश को देते हुए कहा इसे भी लेते जाइये। अब यह सब मेरे काम का नहीं है।

अविनाश एक हारे हुए जुआरी की तरह वापस अपने घर लौट आया।

प्रति माह गुजारा भत्ता के रूप में आश्रम में दो हजार रुपये भेज देता था जो कि आश्रम का फीस था।

आश्रम के कठोर नियम का निर्वहन करते- करते कभी-कभी मीना परेशान भी हो जाती थी। कितना भी कोशिश करती लेकिन बच्चों की यादें उसके हृदय में लहर बनकर उठती थीं और आँखों के रास्ते छलक ही आती थीं। मन होता था कि अपने घर वापस चली जाये लेकिन उसका स्वाभिमान उसके पाँवों को जकड़ लेता था।
कभी-कभी सोचती थी कि गलती चाहे स्त्री करे चाहे पुरुष, दोनो ही दशा में भुगतना स्त्री को ही पड़ता है। माँ सीता को राम ने छोड़ा था और मैं स्वयं घर छोड़ आई वनवासी जीवन व्यतीत कर रही हूँ।

इस तरह आश्रम में रहते – रहते मीना के करीब तीन वर्ष बीत गये। अचानक मीना की तबियत बहुत बिगड़ गई। उपचार आश्रम में ही चल रहा था लेकिन कोई फायदा नहीं हो रहा था। उसे लग रहा था कि अब इस धरती से जाने का समय आ गया है। मीना अपने मोवाइल से अविनाश को सूचित कर मुर्छित अवस्था में चली गई।
जब मीना को होश आया तो एक बहुत बड़े अस्पताल में अपने को पाया जहाँ सामने उज्वल वस्त्रों में नर्स बड़े मीठे स्वरों में बोली कैसी हैं मैम..?

मीना – ठीक हूँ लेकिन कहाँ हूँ मैं.?

मैम आप हास्पिटल में हैं तीन दिनों से आपके पति हास्पिटल से हिले भी नहीं। बहुत लकी हैं आप जो आपको ऐसे पति मिले ।

तब तक अविनाश हास्पिटल के रूम में प्रवेश करते हैं। आते ही मीना के सिर पर हाथ फेरते हुए हाल पूछते हैं।
पति के स्निग्ध स्पर्श से मीना की पीड़ा कुछ कम हो रही है। तब तक सीनियर डाॅक्टर के साथ दो और असिस्टेंट डाॅक्टर राऊंड पर आते हैं और मीना का रिपोर्ट देखकर बोले आप कल डिस्चार्ज हो रही हैं।
मीना का दिल चाह रहा था कि कुछ दिनों तक यहीं रहे। कम से कम पति के साथ तो है। उसे आश्रम जाने का बिल्कुल मन नहीं हो रहा था।

शाम को जब बच्चे मिलने आये तो उसका हृदय और भी पसीज गया। वह चाह रही थी कि बच्चे उसे घर चलने को कहें लेकिन शायद वह मीना के बिना रहने के आदी हो गये थे इसलिये वह मिलकर चले गये।
हास्पिटल से डिस्चार्ज का समय हो रहा था। तभी नर्स एक पैकेट लिये आती है और कहती है मैम आपका ड्रेस चेंज करना है आज आप डिस्चार्ज हो रही हैं। मीना 'हूँ' कहकर बैठ गई। नर्स पैकेट खोलती है जिसमें मीना का मन पसंद रंग की गुलाबी साड़ी और उसी से मैचिंग चूड़ियाँ, बिंदिया और साथ में सिंदूर। मीना चुपचाप तैयार हो रही थी।



जीवन का सत्य

नर्स चली गई तो अविनाश अन्दर प्रवेश किये दोनों की आँखें आपस में टकराई और फिर मीना की पलकें झुक गईं। मानों वे पहली बार मिल रहे हों। अविनाश अपनी जेब से एक डिब्बा निकाला जिसमें मीना के लौटाये हुए गहने थे। उसमें से मंगलसूत्र निकालकर मीना को पहना दिया। मीना अविनाश के गले से लिपटकर सिसक पड़ी। सारे गिले शिकवे आँसुओं में बह गये।
मीना ने कहा मुझे घर ले चलिये। अविनाश ने कहा घर तो तुम्हारा ही है।
©किरण सिंह
यह कहानी दैनिक भास्कर पटना में प्रकाशित है 

                                        
लेखिका किरण सिंह


परिचय -
जन्मस्थान - ग्राम - मझौआं  , जिला- बलिया
उत्तर प्रदेश 
जन्मतिथि 28- 12 – 1967
शिक्षा - स्नातक, गुलाब देवी महिला महाविद्यालय, बलिया (उत्तर प्रदेश)
संगीत प्रभाकर ( सितार ) 
प्रकाशित पुस्तकें - मुखरित संवेदनाएँ ( काव्यसंग्रह ) प्रीत की पाती ( काव्य संग्रह) अन्तः के स्वर ( दोहा संग्रह ) प्रेम और इज्जत ( कथा संग्रह )
शीघ्र  प्रकाश्य - मुखरित संवेदनाएँ ( द्वितीय संस्करण) अन्तर्ध्वनि, ( कुंडलिया संग्रह), शगुन के स्वर ( विवाह गीत संग्रह ), देव दामिनी ( प्रबंध काव्य ) 
उपलब्धियाँ - विभिन्न राष्ट्रीय तथा अन्तरराष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाएँ एवम् आकाशवाणी तथा दूरदर्शन पर रचनाओं का प्रसारण!
लेखन विधा - गीत, गज़ल, छन्द बद्ध तथा छन्मुक्त पद्य, कहानी, आलेख, समीक्षा, व्यंग्य !


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