August 2019
 वो प्यार था या कुछ और था


जो मैं ऐसा जानती कि प्रीत किये दुःख होय ,
नगर ढिंढोरा पीटती , की प्रीत न करियो कोय 
                                              प्रेम , यानि हौले से मन के ऊपर दी गयी एक दस्तक और बावरा मन न जाने कैसे अपने ऊपर ही अपना हक़ खो देता है | आज कहा जा रहा है कि प्यार दो बार तीन बार ...कितनी भी बार हो सकता है पर पहला पहला प्यार आज भी ख़ास है | पहले प्यार का अहसास ताउम्र साथ रहता है | तभी तो निशा एक ब्याहता होते हुए भी बार -बार बचपन की गलियों में उजास की तलाश में भटकती फिरती है |


वो प्यार था या कुछ और था 





दिल की गलियाँ सूनी हैं
राहों पर ये
कैसा अंधकार सा छाया
आज ..तू ..!
तू मुझे बहुत याद आया .........
“ कमला ! कैसा लगा मेरा ये शेर तुझे ...बता न ... “ निशा ने कमला से पूछना चाहा और अपने पास बुला कर बैड पर बैठने का इशारा किया । कमला जानती थी कि आज बीबी जी का मूड फिर कोई पुरानी बात या घटना का जिक्र करना चाहता था उससे ....फिर अपनी वही पुरानी घिसी पिटी कहानी ......
“ कमला..! वो अक्सर आता था हमारे घर । अक्सर ..! नही .. नही , लगभग रोज ही । ...... वो रोज ही हमारे घर आता था । मैं नही जानती थी कि क्यों आता था । लेकिन उसका आना मेरे मन को बहुत भाता था । ये बात बहुत पुरानी है कमला जब मैं छोटी थी । जब ये भी समझ नही थी मुझे ..कि प्यार क्या होता है “ निशा ने बैड पर पड़े -पड़े अपने अतीत के सुनहरे पलों को कमला से फिर बताना चाहा था । निशा न जाने कितनी ही बार बता चुकी थी कमला को ये सब बातें ..लेकिन आज फिर कहना शुरु कर दिया था उसने ।
“ कमला ..! मैं जब भी उदास होती हूँ न ! तो न जाने वो कहाँ से मेरे ज़हन में चुपके से आ कर, मुझ पर पूरी तरह से छा जाता है “
“ बीबी जी ! अब बस करो ! कब तक पीती रहोगी । देखो न ! क्या हाल कर लिया है अपना । अब हो गयी न आपकी शादी जीतू साहब जी से , पुरानी बातें काहे नही भूल जाती हो “ कमला ने पास आकर निशा का हाथ पकड़ कर प्यार से कहा ।
“ कमला ! तुझे क्या मालुम प्यार क्या होता है ? तू क्या समझेगी ...ये तो मैं अब जाकर समझी हूँ ..पगली ... तूझे नही मालूम कमला... आज जि़न्दगी दुबारा फिर मुझे वहाँ पर बहाए ले जा रही है । जिस उम्र में न कोई चिंता होती है , और न ही किसी बात की फिकर “ ये कहते हुए निशा फिर विस्की से अपने गिलास को भरने लगी थी ।
आज निशा की आँखों से नींद कोसों दूर थी । वो डुबो देना चाहती थी अपने को पूरी तरह से रीतेश की यादों में ।
रात का तीन बज चुका था । जीतू अभी तक नही आये थे अपनी ड्यूटी से ...। पुलिस वालों को अक्सर देर हो ही जाती है । वो भी तब .....जब , वो जिम्मेदार पोस्ट पर होते हैं ।
“ बस करो बीबी जी ! भगवान के नाम पर बस ...करो ..” कमला ने निशा के हाथ से गिलास लेना चाहा तो निशा ने उसे परे धकेल दिया था । निशा के ऊपर विस्की का पूरा असर हो चुका था । वो पूरा रौब दिखाते हुए कमला से कह उठी थी ।
“ तू ..तू ! कौन है री .. मुझे रोकने वाली .. जिसको मेरा ध्यान रखना चाहिए जब वो नही रखता ...तो तू कौन है मेरी .. बता तो सही “ निशा कमला से पूछना चाहती थी । लेकिन कमला को बहुत गुस्सा आ रहा था निशा पर ..और आये भी क्यों न !.. बचपन से साथ है । वो निशा पर अपना पूरा अधिकार रखती थी । तभी तो तपाक से बोल उठी थी ।
“ जीबन है तो सब कुछ है बीबी जी । क्यों न रोके तुमको दारू पीने से ? तुम्हारे बिना हमारा है कौन ? छुटपन से तुमने ही तो हमारा ध्यान रखा है । हम नही देख सकते तुमको इस तरह से घुट- घुट कर मरते हुए “ कमला ने निशा की बात का तुरन्त जवाब तो दिया पर निशा के पास आ कर खड़ी हो गयी थी ।
कमला अच्छी तरह समझने लगी थी कि उसकी बीबी जी को अकेलापन खाये जा रहा है ।साहब जी को काम काज से फुर्सत नही है । अगर एक दो बच्चे होते तो शायद ध्यान भी बंटा रहता बीबी जी का । अब तक तो बच्चे भी बड़े हो चुके होते । हमारी बीबी जी की किस्मत में भी ईश्वर ने न जाने क्या लिखा है । सब कुछ तो है भगवान का दिया उनके पास ,लेकिन उनकी उदासी से ऐसा लगता है जैसे कुछ है ही नही उनके पास ...। कमला के मुँह से एक लम्बी और ठंडी साँस निकली थी ।
कमला को खूब याद है वो अक्सर देखती थी ...,कि पहले शौकिया साथ दे देती थीं बीबी जी पीने में साहब जी का ....लेकिन अब तो मुँह से ऐसी लगी है कि अकेलेपन से जब भी दुखी होती हैं तो अपने को भुलने के लिए पूरा डुबो देती हैं नशे में । साहब जी ने कितना मना किया था पर वो अब नही मानती हैं । शौक कब आदत बन जायेगा ये मालूम नही था उनको.......।
कमला पास जा कर उसके बालों को सहराने लगी थी । निशा को लग रहा था कि उस पर नशा चढ़ने सा लगा है पर कमला को पास पा कर उसकी सुप्त भावनाएँ फिर जागने लगी थीं । उसने फिर कमला से अपने अतीत की बातें दोहरानी शुरु कर दी थीं ।....
“ मालुम है कमला ! मुझे और रीतेश दोनों को ..शाम का इन्तज़ार रहता था । कब शाम आये और हम लोग कैरम खे...लें ..... “ ये कहते -कहते निशा की ज़बान लड़खड़ाने लगी थी और वो एक तरफ लुढ़कने लगी थी ।
“ बीबी जी ! सम्भालो अपने को ...हाय रब्बा .. क्या हाल कर लिया है आपने अपना “ ये कहते -कहते कमला ने बाँहों में भर लिया था निशा को ।
“ कमला ! ओ .. कमला ..! तू बड़ी अच्छी है .. तू कितना ख्या..ल रखती है मेरा ..
और एक तेरे साहब हैं ..हा..हा..हा.. देख न ! वो भी कितना ख्याल रखते हैं मेरा ....” और , ये कहते -कहते निशा हँस भी रही थी और रो भी रही थी । कमला के कंधे का सहारा उसको भावुक के साथ-साथ कमजोर भी कर गया था ।
सुबह का चार बज गया था । कमला ने निशा को कम्बल ओढ़ा कर सुला दिया था । खुद भी अपने कमरे में जा कर सो गयी थी । 


सुबह का सूरज सिर पर चढ़ आया था । निशा अपने कमरे में अभी सो रही थी । बाहर दूध बाले ने घंटी बजाई तो कमला भगोने में दूध वाले से दूध ले आई थी । दूध ला कर उसने रसोई में रखा और गैस पर चाय बनाने के लिए दूसरे भगोने में पानी चढ़ा दिया था । पानी में , दूध , चीनी सब कुछ डाल कर चाय खौलने का इन्तजार करने लगी । उसे लगा जैसे बाहर कोई गाड़ी रुकी है उसने खिड़की से झाँका तो देखा जीतू साहब की जीप है । उसने चाय को कप में छान कर ट्रे में रखा और ट्रे को निशा के कमरे में ले जाकर बैड के साइड स्टूल पर रख दिया था । कमरे में चाय रख कर बाहर निकली तो देखा जीतू साहब अन्दर आ रहे हैं । साहब को देख कर अचानक बोल उठी थी ।
“ बीबी जी सो रही हैं अपने कमरे में । आप दूसरे कमरे में बैठ जाओ साहब जी ..क्या आपके लिए चाय बनाएं “
जीतू ने कमला की ओर बिना देखे ही चाय के लिए नही का इशारा किया और वो दूसरे कमरे में सोने चला गया था । जीतू समझ चुका था कि , रात को निशा ने फिर विस्की ली थी शायद । इसी लिए अभी तक सो रही है । क्या हो गया है निशा को ? आखिर क्या चाहती है वो अपनी जिन्दगी से ?....मैंने किस चीज की कमी रखी है ? बस केबल समय ही तो नही दे पाता हूँ । कितना फर्क आ गया है आज की निशा में और कल की निशा में । जीतू के मन में कुछ अनसुलझे प्रश्न उठ रहे थे । अपने सिर पर हाथ रखे वो छत की ओर घूरने लगा था कि... ..वो लेटे-लेटे अपनी पहले वाली नई नवेली निशा को अपनी यादों में ढूँडने लगा था । शोख चंचल तितली की तरह घूमती थी सारे घर में , जब नई -नई शादी हुई थी हमारी । और कुछ दिन बाद निशा उसी के साथ ही तो चली आई थी । जिस जगह उसकी पोस्टिंग थी ।कितनी भोली कितनी मासूम थी निशा ..।
“ जीतू ..ओ..जीतू ....हम हमेशा ऐसे ही रहेंगे न ..हैं न ! बोलो न ..! यूँ ही एक दूसरे की बाँहों में “ निशा ने किस तरह मचल कर कहा था मुझसे उस दिन ..
“ क्यों नही ..मेरी जान ! मैं अब तुझसे दूर जा ही नही सकता , हाँ हम दोनों ऐसे ही रहेगे .. हमेशा ..हमेशा एक दूसरे की बाँहों में । तुम अपने जीतू के इस चौड़े सीने पर अपनी नाजु़क अंगुलियों से अठखेलियाँ करना । बिल्कुल उन चंचल लहरों की तरह , जो हमेशा मचलती हुयी दिखाई देती हैं गहरे और विशाल सागर केसीने पर.....” मैंने जैसे ही कहा था ..वो किस तरह मुझसे कस कर लिपट गयी थी ..। और मैं पुन: बोल उठा था ..
“ एई . पग्गल .. उठ । मुझे जाना है मेरी जान ... नही तो बॉस की खरीखोटी सुननी पड़ जायेगी “ और ये कहते हुए मैंने उसके साँवले -सलोने गाल पर अपने होठों का प्यारा सा बोसा रख दिया था ।
“ उँहु..हु..हु... आपके बॉस की बीबी नही है क्या ? कितना ज़ालिम है वो ...किस तरह लड़ियाते हुए उसने अपनी मासूम आँखों से मेरी ओर प्यार उड़ेलते हुए कहा था ।..
“ नही यार .. समझा करो निशा ! जाना जरूरी है । बहुत बड़ा मुजरिम पकड़ा है । पूछताछ करनी है । एक लाख का इनामी है मैडम ।एस पी , एस एस पी , और भी स्टॉफ के सभी लोग ऑफिस पहुँच रहे हैं । लिखा -पढी सभी कुछ औपचारिकताएँ पूरी करनी है “
“ ओके बॉस .. “ ये कह कर किस तरह से एक सैल्यूट ठोक दिया था उसने मेरी तरफ .। जैसे ही वो उठने लगी थी कि तभी मैं भी उठा था , और एक साथ दोनों ही ठहाका लगा कर हँस पड़े थे ।
कितने प्यारे दिन थे वो ...दिन सोने के थे हमारे और रात चाँदी की । कहाबतें शायद झूठी नही बनी थी ।हम दोनों का प्यार दिन रात एक दूसरे पर परवान चढ़ रहा था । निशा कितना खुश रहती थी उन दिनों ।
माँ -पिता दोनों ही गुज़र चुके थे । हमारी शादी को बीस साल हो चुके हैं। अब जो भी है मेरी ज़िन्दगी में वो मेरी निशा ही है । हम दोनों ने बहुत इलाज करवाया था । पर हमारी कोई सन्तान नही हुई थी । मैंने निशा को कभी भी इसका दोषी नही ठहराया था । मैं निशा को दिलो जान से बहुत प्यार करता था । मैं नही चाहता था कि निशा के दिल पर मेरी किसी भी बात से जरा भी चोट पहुँचे । मैं तो बस उसको खुश देखना चाहता था ।
निशा का अकेला पन देख कर ही तो निशा के माता-पिता ने कमला को निशा के पास रहने को भेज दिया था । अपनी बेटी निशा की सहायता के लिए । जब आई थी तो रही होगी आठ -दस साल की । पहले निशा के छोटे-मोटे काम करती थी , पर आज घर की जिम्मेदारी को उसने पूरी ईमानदारी के साथ निभाया हुआ है । निशा का कितना ध्यान रखती है मेरे पीछे ..।
कमला का कोई नही था । निशा के माता-पिता उसको लिखित रूप में अनाथ आश्रम से लाये थे । जब वो छैह साल की थी । निशा उसको बिल्कुल बच्चे की तरह प्यार करती थी । शुरु से ही वो निशा को बीबी जी कहती थी । सोचते -सोचते जीतू की आँख कब लगी उसे भी नही मालूम हुआ...
अचानक जीतू की आँख खुल गयी थी बाहर से आ रहे शोर को सुन कर । ध्यान से सुनने में लगा उसे कि निशा अपने बैडरूम से कमला को पुकार रही थी ।वो दूसरी ओर करबट लेकर सो गया था । सारी रात की जगार ने उसके बदन को वैसे भी तोड़ कर रख दिया था ।
कमला....कमला......निशा की चीखने की आवाज़ उसके बैडरूम से लगातार आ रही थी ।
“ जी ..बीबी ..जी ! “ कमला आलू से सने हाथों में ब्रेड को थामे दौड़ कर निशा के कमरे में पहुँची ।
“ कब से आवाज दे रही हूँ तुझे , कहाँ मर गयी थी “ निशा ने कमला से सवाल किया ।
“ ये लो ..! आपको तो कुछ याद नही रहता है बीबी जी ! पीने के बाद । खुद ही तो कहा था ..रात को ..सुबह ब्रेड -पकोड़ा बनाना है । तेरे हाथ का ब्रेड -पकोड़ा साहब को बहुत अच्छा लगता है । भूल गयीं का “ ये कहते हुए कमला ने निशा की ठुड्डी को अपने हाथों से ऊपर करते हुए बोला ।
“ मैंने ! ... मैंने ऐसा कहा था .. और तुझसे .. मुझे तो कुछ याद नही .....” निशा ने हैरत से कमला की ओर देखा ।
“ तब ही तो कहते हैं इतनी न पीआ करो , कछु याद रहता नही है “ ये कहते हुए कमला कमरे से निकल गयी थी ।


डाइनिंग टेबल पर नाश्ता लग चुका था । निशा ने देखा कि जीतू भी फ्रेश हो कर नहा -धोकर वर्दी में तैयार थे । निशा को थोड़ा पश्चाताप हो रहा था अपने ही व्यवहार पर .. फिर भी उसने आगे बढ़कर जीतू के हाथों को अपने हाथों में ले लिया था ।
“ गुड मॉर्निंग ..कब आये थे रात को ? .. निशा ने जीतू की ओर देखकर कहा .....
“ जब तुम टल्ली पड़ी थी “ जीतू ने निशा की आँखो में झाँककर कहा तो निशा की आँखे गीली हो उठी थी ।
“ ये क्या ? ... मैं मजा़क कर रहा था पगली ! “
“मज़ाक कर रहे थे .. या मेरा मज़ाक बना रहे हो । ये दोनों बातों में बहुत फर्क है जीतू “ ये कह कर निशा ने जीतू की ओर देखा ।
“ ओह ! निशा ! मुझे थोड़ा वक्त दो , यार अभी मेहनत नही करुँगा तो कब करुँगा ... आई लव यू निशा ...! “ ये कह कर जीतू ने निशा को अपने सीने से लगा लिया था ।
“ अरे ! सारे ब्रेड -पकोड़े ठंडे करने हैं बीबी जी ! .. लाओ ये वाले हमें दे दो , और ये गरम वाले लो “ ये कहते हुए कमला ने प्लेट में गर्मा गरम ब्रेड -पकोड़े रख दिये थे ।
“ कमला ! चटनी कहाँ है ? ये सॉस अच्छी नही लगती तेरे साहब जी को । तुझे इतना भी नही मालुम ? चटनी ला .. निशा ने जैसे ही कहा तो कमला को याद आया कि उसने चटनी भी तो पीसी थी वो भी सिल -बट्टे पर... उसे मालुम था कि साहब को मिक्सी से ज्यादा सिल -बट्टे पर पिसी चटनी बहुत पसन्द है ...
“ ओ..ह .. अभी लाई बीबी जी ! “ और ये कह वो चटनी लाने दौड़ पड़ी थी ।
निशा और जीतू दोनों ही नाश्ता कर चुके थे । जीतू ऑफिस जाने के लिए तैयार थे । निशा बाहर तक छोड़ने चली आई थी जीतू को ... ।
जीतू को जाता देख निशा को अपने ऊपर बहुत गुस्सा आ रहा था । वो समझ ही नही पाती थी कि आखिर वो क्या चाहती है ? जबकि उसे अच्छी तरह मालूम है कि पुलिस की नौकरी में पुलिस वालों के पास अपने परिवार को समय देने का कितना अभाव रहता है । और वो ये सोचते हुए ड्राइंग रूम में आ कर बैठ गयी थी । गाने सुनने का उसे बचपन से बड़ा शौक रहा है । वो भी लता मंगेश्कर के गाने ... बस ..! यही सोचकर वो सोफे से उठी और उसने लता की एक सीडी लगा दी सीडी प्लेयर में । लता की आवाज ड्राइंगरूम में गूँज उठी थी .....
यूँ हसरतों के दाग ...मुहब्बत में धो लिए
कुछ दिल से दिल की बात करी
और रो दिये........
निशा वापस सोफे पर जाकर बैठ गयी थी ।सोफे का सहारा लिए निशा गाना सुनते -सुनते फिर अपने अतीत के घरोंदे में जा बैठी थी । उसे वो दिन खूब अच्छी तरह याद आ रहा है ।जब रीतेश उसके घर आता था । तो वो और सब के सब रीतेश के साथ कैरम खेलने बैठ जाते थे । एक भाई मेरी तरफ और दूसरा भाई रीतेश का पार्टनर बनता ... रीतेश हमेशा कैरम में काली गोटी ही लेता था । इसका कारण निशा बहुत अच्छी तरह जानती थी । सारे भाई बहनों में सिर्फ उसका ही तो रंग थोड़ा दबा हुआ था । रीतेश जब भी क्वीन को जीतता था तो हमेशा की तरह उसकी ओर देख कर यही कहता था ।
“ ये रानी तो मेरी ही है और मेरी ही रहेगी “ और रीतेश की ये बात सुन कर उसका का चेहरा कैसे लाल हो जाता था शर्म से .... लेकिन वो खुद नही समझ पाती थी कि क्यूँ ?
चौदह साल की थी वो । उसे नही पता था प्यार क्या होता है ? समझती थी तो बस इतना कि रीतेश के द्वारा किसी खेल में खुद को जानबूझ कर हार जाना और उसे जिता देना , या फिर भाईयों से किसी बात पर लड़ाई होने पर रोता देख कर उसका पक्ष ले कर उसको खुश कर देना ..ही उसको रीतेश की तरफ खीच रहा था । अब
उसको रीतेश का साथ अच्छा लगने लगा था । अब हर समय ..उठते -बैठते , सोते -जागते उसे रीतेश ही याद आता था । एक दिन वो नही आता तो उसको बेचैनी होने लगती थी ...।
हम सभी बच्चों के स्कूल बन्द हो चुके थे । गर्मियों की छुट्टी थीं । रीतेश अपने नाना-नानी के घर गया हुआ था । और वो भी तो अपने मामा-मामी के घर पर गई हुयी थी... । छुट्टियों के पन्द्रह दिन बड़ी मस्ती में निकले...पर रीतेश वहाँ भी हमेशा याद आता रहा था उसको ..।
छुट्टी बिताकर निशा और घर के सभी लोग वापस घर पर आ चुके थे । मामा का बेटा संजू भी ज़िद करके उन्ही के साथ चिपक कर चला आया था । संजू निशा से दो साल बड़ा था । स्कूल को खुलने में अभी थोड़े दिन बचे थे ।
रीतेश को जैसे ही मालूम हुआ कि निशा और घर के सभी सदस्य आ चुके हैं ..तो हमेशा की तरह वो शाम को घर आया था । तभी निशा ने देखा था कि उसके हाथ में पट्टी बंधी हुई थी । पर पूछा न था । हम भाई -बहनों ने मामा के बेटे संजू का परिचय रीतेश से कराया । और वही पुराने खेल साँप-सीड़ी , लूडो , कबड्डी , छुप्पन-छुपाई और कैरम में से क्या खेलें ये हम लोग तय नही कर पा रहे थे । आखिर में हम लोगों ने छुप्पन -छुपाई को पसन्द किया था । लेकिन संजू भईया अड़ गये थे वो कैरम खेलना चाहते थे । तो हम सबने गोला बनाया और टॉस किया । टॉस में हमारी जीत हुई ..तो उस शाम को हम सभी छुप्पन छुपाई ही खेले थे और उसमें चोर बने थे संजू भईया । हम सभी के बीच में फिर से शुरु हो गये थे बही मस्ती भरे पुराने दिन ।
उसी दिन छुप्पन -छुपाई के खेल में अचानक एक जगह छिप कर बैठ गये थे हम दोनों । तभी रीतेश ने एक कागज दिया था ।
“ क्या है ये ??.. माथे पर सल डालते हुए ही तो धीमे से फुसफुसाते हुए पूछा था उसने .. जिससे कोई सुन न ले कि वो यहाँ छिपी बैठी है ।
“ पढ़ लेना .. खून से लिखा है तुम्हारे लिए “ रीतेश ने भी कैसे फुसफुसाते हुए कहा था ।
“ क्यों.? “ वो समझी ही नही थी रीतेश की बात को ...
“ तुम बिल्कुल पागल हो , बुद्धू कहीं की ...ये देखो ! मैंने अपने हाथ पर ब्लेड से कट मार कर लिखा है तुम्हारे लिए ये लैटर “ रीतेश ने कहा ही था , कि मामा के लड़के ने धप्पा कह कर उसको कैसे बाहर की ओर घसीट लिया था । उसने भी तो मुठ्ठी में बन्द लैटर को किस तरह कस कर भींच लिया था कि कहीं संजू भईया न देख लें । रीतेश को नही देख सके थे संजू भईया कि वो भी अन्दर की तरफ छिपा हुआ है ..।
मामा का बेटा उम्र में बड़ा था हम सभी से । वो रीतेश की बातों पर बड़ा ध्यान देता था । उसका तो जैसे जासूसी करना ही काम था कि हमारे ऊपर निगाह रखे.....।
उस दिन के बाद से मन एक अनजानी स्थिति से गुजर रहा था । दिमाग बार-बार यही सोचता रहता कि कब मौका लगे और वो जो रीतेश ने लैटर दिया है उसको पढ़े । मन सोचने पर बाध्य था ..कि, कैसे ? कब और कहाँ पढ़े....? मन में तीब्र जिज्ञासा पैदा हो चली थी कि क्या कोई खून से भी लैटर लिखता है ?
इस अबोध मन में कितने ही सवाल जिज्ञासा का रूप ले चुके थे । एक दिन चुपके से कमरा बन्द करके तिखाल में छुपाकर रखा गया लैटर निकाल कर पढ़ा था। ...
मेरी कल्लो परी !
मालूम है ? ये मैंने अपने खून से लिखा है । तुम सोच रही होगी कि कोई खून से भी लिखता है । अरे .. मेरी पग्गल ..! मैंने सिर्फ तेरे लिए लिखा है । आई लव यू वैरी मच ..... पत्र का उत्तर जरूर देना , और हाँ ..! शाम को छत पर इन्तज़ार करुँगा तुम्हारा..
तुम्हारा ..
तुम्हारा के नीचे बनाए हुए दिल को चीरता हुआ एक तीर ....उसको देख कर समझ ही नही आया था कि ये क्यों बनाया है रीतेश ने ..? पर इतना जरूर याद है कि , किस तरह उस समय दिल की धड़कन तेज हो गयी थीं । वो भी ये सोच कर कि कहीं ख़त माँ ने देख लिया तो क्या होगा ? ये क्यों लिखा है ? ....पिता जी तो जान से मार ही देंगे ... डर के कारण कुछ भी नही समझ पा रही थी ।उस लैटर को जिस जगह से निकाला था वो वापस वहीं अन्दर घुसा कर रख दिया था ।
“ ये ...लो ..बीबी जी ....ओ ..बीबी जी ! गाना कब से खतम हुई गया है , आप हैं कि , आपको कुछ सुध नही “ कमला ने जब उसको छुआ तो ..
“ ओ..ह ...अरे ..कमला ..! कितना बजा है ? निशा चोंक कर पूछ बैठी थी कमला से ।
“ दो बज गया है ..खाना लगा दें आपका “ कमला ने निशा से पूछा ।
“ हाँ ... लगा दे ...और सुन ! शाम को बस अपने लिए ही खाना बना लेना । हम और तेरे साहब कहीं बाहर खाना खाने जायेंगे “ ये कहते हुए उसने खुश हो कर कमला को देखा था ।
और कमला मन में सोच रही थी कि बीबी जी भी कितनी भोली हैं .. अरे ..बीबी जी ! अब आप क्यों नहीं स्वीकार कर लेती हैं कि साहब जी को ड्यूटी से समय मिल जायेगा तबहिन आपके साथ जायेंगे न । वो बिचारे खुद ही परेशान रहते हैं अपने काम धन्धे में और आप है कि समझती नही हैं । ये सोचते -सोचते बोल ही उठी थी ।
“ ठीक है .. साहब आयेगे तब ही न ... शाम की शाम को देखेंगे “ ये कह कर कमला तो चली गयी लेकिन उसका खुद का दिमाग हिल गया था ...
“अरे ...! इधर सुन ! तुझे कैसे मालूम ? ऐसा कैसे बोल सकती है तू ? तुझसे मना करके गये थे ? उसने गुस्से में कमला से न जाने कितने प्रश्न कर दिये ।
“ अरे ..! ई मा गुस्सा होने वाली कौन बात है ।हम तो देख ही रहे हैं इतने दिना से ! पाँच -छैह साल तो हुई गये होंगे ..कहीं देखा है हमने जाते हुए ...हाँ पहिले बहुत जाती थीं बीबी जी आप .और साहब जी ....ये कह कर कमला देखने लगी थी उसकी ओर ..
जब तन और मन दोनों में आग लगी हो तो किसी का कुछ कहना सुहाता नही है इन्सान को , बस वही हाल निशा का भी हो गया था कमला की बात को सुनकर ।वो अपने कमरे में जा कर जीतू का इन्तज़ार करने लगी थी । जीतू आज उससे वादा जो करके गये थे जल्दी आने का ......। उसे बोरियत का एहसास हो रहा था । तो
उसने कवर्ड में से पुरानी एलबम निकाली और पलटने लगी थी । माँ -पिता , भाईयों के फोटो देखकर मायके की याद ताजा हो गयी थी ..लेकिन उसमें जैसे ही रीतेश के साथ होली की एक फोटो सामने दिखी तो उसकी आँखों के सामने फिर से वही पुराने दिन दौड़ने लगे थे । .....

 वो प्यार था या कुछ और था


“ रुक जा ..निशा ..! नहीं तो पानी से पूरा भिगो दुँगा ...” ये कहते हुए रीतेश और उसके पीछे -पीछे अगल -बगल के बच्चे और हमारे ग्रेट संजू भईया ! जो कोई भी छुट्टी हुई नही कि दौड़ पड़ते थे हमारे घर की ओर ...और आज भी कैसे दौड़ लगा रहे थे उसके पीछे रंग भरी बाल्टी लेकर ..और वो भीगने के डर से बचने के लिए भाग रही थी इधर -उधर आँगन में । भागने में पैर ऐसा फिसला कि सारा घुटना छिल गया था उसका .इतने में मौका देख सारे के सारे लोग पिल पड़े थे उसके चेहरे पर रंग मलने के लिए ।उसकी चोट का किसी को ध्यान ही न था । सबने नीला , काला , हरा न जाने कितने रंग पोत डाले थे उसके मुँह पर और भाग लिए थे... पर रीतेश वही खड़ा रह गया था । रीतेश ने मौका देख कर उसकी माँग में सुर्ख लाल रंग का गुलाल भर दिया था । उस समय वो घबराकर कैसे रीतेश से बोल उठी थी....।
“ ये क्या किया रीतेश ? “ और वो पलभर के लिए ठिठक गई थी । किस तरह उसने रीतेश को देखा था । क्योकि बस उसको इतना तो मालूम था ..कि माँग भरने से शादी हो जाती है ।ये भी उसने पिक्चर में ही देखा था ।
“ कुछ भी तो नही “ ये कहते हुए रीतेश हँसने लगा था । और वो ....! उसे निहारती रह गयी थी । उसकी हँसी , उसकी मस्ती कितनी लुभावनी लग रही थी ..
“ हे...निशा ! क्या देख रही हो ? उस दिन छत पर क्यों नही आई थी “ रीतेश ने सवाल किया था ।
“ नही ... नही ....डर लगता है किसी ने देख लिया तो ? वो कैसे तुरन्त पूछ बैठी थी ।
“ आज शाम को आना न ..! प्लीज़ “ कैसे मिन्नत भरी आँखों से रीतेश ने कहा था ।
“ ठीक है शाम को साढ़े सात बजे आऊँगी ..” और उसने भी तो कैसे हामी भर ली थी । लेकिन , दिल ये सोचकर धड़क रहा था । किसी ने देख लिया तो लोग पिता जी के लिए कहीं बातें तो न बनाने लगेगें ...। वो ये सोच ही रही थी कि , अचानक दोनों ने देखा संजू भईया फिर बाल्टी लिए चले आ रहे थे उनकी ही ओर ..
हो...ली है ..ये कहते हुए रंगों की पूरी बाल्टी संजू भईया ने कैसे उसके सिर के ऊपर उड़ेल दी थी । रीतेश के द्वारा उसकी माँग में भरा रंग ...पलभर में धुल चुका था । लेकिन वो रंग उसके दिल में घुल कर अंग-अंग को भिगो रहा था ।
शाम को माँ-पिता जी को जाना था होली मिलने । माँ -पिताजी और दोनो भाई ही गये थे । माँ ने उससे भी बहुत कहा था तैयार हो जा । पर उसने किस तरह बहाना बना कर कह दिया था कि सिर में दर्द हो रहा है ।माँ से झूठ बोल रही हूँ पहली बार , ये सोच कर मन को कुछ अच्छा नही लग रहा था । घर से सभी लोग पाँच बजे चले गये थे क्योकि दो तीन घरों पर जाना था । उस दिन सिर्फ वही तो अकेली रह गयी थी घर पर ।
शाम का सात बजा था और वो हिम्मत करके छत पर जाने के लिए सीढ़ियाँ चढ़ने लगी थी कि सीढ़ी पर पड़ा काँच का टुकड़ा पैर की एड़ी में घुस गया । काँच चुभने के कारण उसकी रुलाई फूट पड़ी थी ।पर रीतेश को किया वादा पूरा करना था । तो किसी तरह छत पर आई और छत तक फेले पीपल की घनी शाखओं में उसने खुद को छिपा लिया था । अपने पैर को पकड़े वो कितनी बेताबी के साथ रीतेश का इन्तज़ार करने लगी थी ।पैर से खून बहे जा रहा था । उसकी समझ में नही आ रहा था करे ? मन में डर अभी भी समाया हुआ था कि कहीं नीचे बाहर सड़क की ओर से कोई देख न ले । इतने में उसने देखा था कि , रीतेश कूदता -फाँदता उसकी छत की ही ओर चला आ रहा था । रीतेश को इस तरह आते देख कर उसकी जान सूख रही थी । कही कोई देख न ले उसे ...और अगर किसी ने टोक दिया कि छत पर क्या कर रहे हो ? ....तो ..!
शायद उसकी सुबकने की आवाज को रीतेश ने सुन लिया था । किस तरह से बिल्कुल उसके पास में आकर बैठ गया था रीतेश । कैसे सबसे पहले उसकी आँखों से बहते आँसूओं को पोछा था रीतेश ने और फिर पैर की एड़ी में चुभे काँच के टुकड़े को एक झटके में खीच कर निकाल फेंका था ।दर्द की वो टीस इतनी तेज थी कि उसने कस कर रीतेश की बाँह पकड़ ली थी अपने दोनों हाथों से ..।
उसने देखा था रीतेश की आँखों में भी नमी छा गयी थी । रीतेश ने अपनी जेब से रुमाल निकाल कर उसकी एड़ी पर बाँध दिया था । दर्द में थोड़ा आराम लगा था । रीतेश ने पहली बार उसके  गालों पर अपने होठों से एक किस दे दिया था । उस समय नही समझ आ रहा था कि ये सब क्या हो रहा है ... लेकिन जो भी था ...वो उसको रीतेश की ओर खीचे ले जा रहा था । उसका किस करना उसे अच्छा लगा था । लेकिन तब वो ये कहाँ जानती थी कि शायद यही प्यार होता है । एक दूसरे के दर्द को समझना , एक दूसरे की भावनाओं का आदर करना ..।
सड़क पर किसी गाड़ी के रुकने की आवाज़ आई थी और साथ ही पिता जी की आवाज़ .... किस तरह उसकी जान सूखने लगी थी और वो जल्दी से लंगड़ाते -लंगड़ाते झीना उतर गयी थी । बैल लगातार बज रही थी । धीरे-धीरे दरवाजे़ पर पहुँच कर दरवाजा खोला तो ..तुरन्त माँ ने सवाल दाग दिया था ।
“ इतनी देर से क्या कर रही थी ? “
“ कुछ भी तो नही ..आ तो गयी “ किस तरह उसने झुंझलाते हुए जबाव दिया था । पैरों में दर्द इतना तेज़ था कि बोलने का मन भी नही था ।
“ ये लंगड़ा कै कैसे चल रही है ? “ माँ ने दुबारा प्रश्न किया ।
“ अरे ! कुछ नही तुम तो पुलिस वालों की तरह पूछने लगती हो “ किस तरह पहली बार माँ से झुंझलाकर बोला था उसने ।
लेकिन माँ तो माँ है । पकड़ लिया उसका हाथ और बैठा कर पूछने लगी थीं । दिखा तो सही कहाँ लगी है । किस तरह डरते -डरते पाँव आगे रख दिया था । और चोट देखकर माँ ने सारा घर उठा लिया था सिर पर ।
“ कुछ लगाया इस पर ? और ये रुमाल ? ये रुमाल अपना तो नही “ माँ ने झट से उसकी टाँग को अपने हाथ में लेते हुए पूछ था ..।और उसकी तरफ देख कर फिर से बड़बड़ाने लगीं थी ।
“ पन्द्रह साल की हो गयी है । अक्कल मारी गयी है इसकी । कल परसों शादी लायक हो जायेंगी महारानी ..अब भी घोड़ी की तरह कूदफाँद करा लो इनसे .” ..और उसी वक्त ऐलान कर दिया था ।
“ सुनो निशा ! अब ये कूदाफाँदी के खेल नही खेलोगी तुम “ माँ बोल रही थीं और उसकी घिघ्घी बंधी हुई थी ।
“ क्यो? क्या हुआ ? क्यों चिल्ला चिल्ली मचा रखी है तुमने “ कि तभी पिता जी का स्वर भी सुना था उसने ........
“ कुछ नही आपकी महारानी ने पैर में काँच का टुकड़ा घुसा लिया है “ माँ की बात सुन कर वो सोच रही थी क्या जानबूझ कर घुसाया है उसने , माँ ..कैसी बात पिता जी से बोल रही हैं । लेकिन सच कैसे बताऊँ ये सोच कर उसका कलेजा मुंह को आ रहा था ।
“ कहाँ है निशा ..? और काँच का डुकड़ा आया कहाँ से ..?“ अचानक पिता जी का स्वर गूँजा था । उसकी समझ में न आ रहा था कि क्या बहाना बनाए वो पिता जी से । आज तक कभी भी झूठ बोला नही है उसने अपने पिता जी से ..।
“ हाँ ...पिता जी ! “ उसने अपने को पिता जी के सामने सरेन्डर कर दिया था । पिता जी कैसी निगाह से देख रहे थे उसको ...उसे नही मालूम था । क्योकि उसकी निगाह तो अपने पैर की अँगुली के नाखून पर थी जो जमीन कुरेद रहे थे ।
“ ये कैसे लगी तुमको ? “ बस एक सवाल किया था पिता जी ने ...उस समय कुछ भी बोल न फूट सका था उसके मुँह से । उसका कुछ भी जवाब न मिलने पर पिता जी चले गये थे अपने कमरे में सोने के लिए । लेकिन उसकी  आँखों की नींद मानों अपने सवाल के अन्दर समेट कर ले गये थे । एक अनजाना सा डर समाया हुआ था मन में । कि कही देख न लिया हो किसी ने सड़क से छत पर और उसने अगर आज पिता जी को बता दिया तो खैर नही है तेरी निशा ! .. तेरा क्या होगा ? ये सोच -सोच कर उसका चेहरा ज़र्द पीला पड़ता जा रहा था ।
अगले दिन सुबह डाक्टर के यहाँ जा कर पट्टी हुई तब कहीं जा कर चैन मिला था पैर को । लेकिन माँ को न जाने क्यूँ ..उस दिन से रीतेश का अपने घर पर आना खलने सा लगा था ..। और उसको पूरा यकीन हो चला था ...हो न हो ये सब संजू भईया का किया धरा है शायद ! वो ही निगाह रखते है उसके ऊपर ....।शायद ..! माँ को उन्होने ही भड़काया होगा । वर्ना .. माँ को क्या आपत्ति थी ?
अब जब भी घर पर रीतेश आता था तो माँ रीतेश को बहाने से वापस करने लगी थी । कभी कहती कि निशा पढ़ रही है , कभी निशा होम वर्क कर रही है , कभी निशा कही गयी है ....कभी कुछ , कभी कुछ ....।
रीतेश का घर पर आना क्या कम हुआ कि सारे घर में जैसे मुर्दांन्गी सी छा गई थी।
समय कटता जा रहा था अपनी ही चाल में । उधर रीतेश बड़ा होता रहा और इधर उसकी उम्र भी बढ़ती गयी । उसका पाँच वर्ष का साथ आज छूट रहा था क्योकि पिता जी ने आज ऑफिस से आ कर बताया कि उनकी बदली यानि ट्रान्सफर हो गया है इलाहाबाद के लिए ....। उसके पैरों के नीचे से मानो ज़मीन सरक गयी थी ट्रान्सफर की सुन कर । एक टीस सी उठी थी मन में ....लेकिन वो टीस क्या थी उसकी समझ में न आई थी । बस उसे इतना मालुम था कि रीतेश का साथ उसे अच्छा लगता है ...।
रीतेश को जैसे ही खबर मिली कि निशा के पिता जी का ट्रान्सफर हो गया है । तो वो उससे मिलना चाहता था । बात करना चाहता था ।एक दिन वो जानबूझ कर घर पर बिना बैल किये अन्दर चला आया था । उस दिन माँ का एक बहाना न चल पाया था ...। जैसे ही रीतेश को देखा था उसने , वो तुरन्त दौड़कर अन्दर से अपनी वो वाली किताब उठा लाई थी जिसके अन्दर उसने रीतेश के नाम एक पत्र लिख कर दबाया हुआ था ।
रीतेश को देखते ही उसका पीला चेहरा गुलाब की तरह खिल उठा था । उसने रीतेश के हाथों में वो किताब दे दी थी । माँ की नज़रों से शायद कुछ छिप न सका था ।
“ अब कब मिलोगी निशा ! मैं तुम्हारा यहीं और इसी लखनऊ शहर में इन्जा़र देखुँगा “ और किताब को लेकर रीतेश एक मिनट भी नही रुका था ।
इलाहाबाद आये हुए छैह साल हो गये थे ।रीतेश घर में किसी को याद आता हो या न आता हो ..पर उसको याद आता रहा था हमेशा । पिता जी को अपनी बेटी की शादी की जल्दी थी । बेटी को एम ए कराया और अपने देस्त के बेटे जीतू से शादी करा दी थी । शादी के रिशेप्शन में भी उसकी आँखें रीतेश को ही ढ़ूँडती रहीं थी , पर रीतेश आता तो ही दिखाई देता न ..! उसको तो शायद बुलाया ही नही गया था । उसके बगल में बैठे हुए जीतू शायद उसकी आँखों की बेचैनी और उसकी हालत को देख कर पूछ बैठे थे ।
“ क्या हुआ निशा ? कुछ खो गया है या किसी को ढूँड रही हो ? क्या कोई आशिक -वाशिक तो आने वाला नही था ?” और ये कह कर जीतू ..जोर से हँस दिये थे ..।
“ आशिक नही .. वाशिक आने वाला था “ उसने माहौल को बनाए रखने के लिए तुरन्त मजाक में जवाब दिया था ।उसकी बात को सुनकर जीतू कैसे ज़ोर का ठहाका लगा उठे थे ..।
“ यार ! अपनी तो बहुत पटेगी निशा ! ...मुझे खुश दिल इन्सान बहुत पसन्द हैं “ ये कहते हुए जीतू ने किस तरह से उसके हाथ को अपने हाथों में ले लिया था ।

अचानक कुछ गिरने की आवाज़ पर उसका ध्यान भंग हुआ । और वो चौंक कर उठ बैठी थी ..उसने देखा एलबम उसकी गोद में रखी थी । उसने दोनों हाथों से एलबम को बन्द करके अलमारी में रख दिया और कमला को आवाज़ लगाई । .
“ क्या तोड़ दिया ..? कमला ..! ..ओ..हो..! अब न जाने क्या गिरा दिया ..लड़की ने ...ये बड़बड़ाते हुए निशा किचिन की ओर बढ़ गयी थी ।
“ क्या हुआ कमला ? बोलती क्यों नही क्या गिरा दिया ? “ ये पूछते हुए उसकी निगाह ज़मीन पर गयी । नीचे देखा तो काँच का गिलास टूटा पड़ा था ।
“ उठाकर फेंक ठीक से इनको.. नही तो तेरे पैर में भी चुभ जायेगा “ अचानक कमला से ये कहते-कहते उसे रीतेश याद आ गया था ।
“ कमला ! तेरे साहब अभी तक नही आये ...उन्होंने कहा था कि कही बाहर चलेंगे “ ये कहते हुए वो जीतू को फोन मिलाने के लिए रिसीवर हाथ में उठाने ही वाली कि ..फोन की घंटी घनघना उठी थी ।
“ ट्रिन .. ट्रिन ..ट्रिन... “ उसने तुरन्त फोन को उठाया ..।
“ हैलो ......कौन ?
“ हैलो ..हाँ ..निशा ..! सुनों ... निशा ! यार आज न आ सकुँगा ..मुझे लखनऊ से बाहर जा....ना ......” जीतू आगे बोलने जा ही रहा था कि उसने ठीक है कह कर रिसीवर पटक दिया था ।जीतू समझ चुके थे कि निशा को अच्छा नही लगा ... जीतू को क्या मालूम कि
वो तो जीतू की पूरी बात को सुनने से पहले ही फ्यूज हो गयी थी । उसका पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया था ..। रात के साढ़े नौ बज रहे थे । उसने अपने अकेले पन को भरने के लिए आव देखा न ताव झट से कबर्ड में से विस्की की वॉटल निकाली और गिलास भर कर बैडरूम में चली आई थी । । वो भूल जाना चाहती थी अपने खुद को ...उसकी आँखों से दर्द बाह कर निकलने को बेताब था और वो..........
एक अकेली औरत का समय कटना कितना मुश्किल होता है । वो भी तब ..जब उसकी कोई औलाद नही होती । कुछ करने के लिए नही होता पास में । उम्र का एक वही फेज निशा के साथ भी तो चल रहा था । जिस उम्र में इन्सान किसी का भावनात्मक प्यार चाहता है उस उम्र में उसके हिस्से में आया था अकेलापन । जिस्म नही लुभाता किसी को उतना उस उम्र में ..जितना कि किसी के साथ बैठ कर चार बातें करना लुभाता है । ये चालीस और पैन्तालीस की उम्र होती ही ऐसी है । इस उम्र में पति भी ढलने की कगार पर होता है और औरत ....औरत अकेलेपन को लेकर रोती रहती है । खास कर उन परिवारों में जहाँ नौकरी की व्यस्तता चरम सीमा पार कर चुकी होती है ।
लेकिन इसमें उसका क्या दोष था ????
उसका दिमाग तेजी के साथ चल रहा था । विस्की शरीर में अपना काम कर रही थी । वो जब -जब विस्की लेती थी न जाने कहाँ -कहाँ की बातें और उसका अतीत उसको अपने दामन से लपेट लेता था .. उसको उन पलों में सारी दुनिया अपनी दुश्मन नजर आने लगती थी । जिसमें जीतू !...जीतू उसको अपना सबसे बड़ा दुश्मन नज़र आता था । वही जीतू जो उसके प्यार में अगर बस चले तो आसमान के तारे तोड़ लाये उसके लिए , कोई गलत आँख उठा कर देख ले उसकी निशा की ओर ..तो आँख नोच ले ..दुनिया के हर उस शख्स से भिड़ जाए जो निशा के खिलाफ आवाज़ उठाए । लेकिन ...पीने के बाद उसे अगर कोई सही लगता था तो ..बस रीतेश ...।
अतीत की पिक्चर पूरी तरह सेट हो चुकी थी उसके दिमाग में ....उस दिन ......
उसका घर मेहमानों से भरा हुआ था । क्योंकि उसकी और जीतू की पच्चीसवीं मैरिज एनीवर्सरी थी ।आज निशा बहुत खुश थी । जीतू ने घर को फूलो से दुल्हन की तरह सजवाया हुआ था । एक -एक फूल उसकी अपनी निशा की पसन्द का जो था । जीतू ने भी जो अपने कपड़े सिलवाये थे वो भी निशा की पसन्द के थे । निशा जानती थी कि जीतू उस पर जान लुटाता है । वो भी तो आज जीतू की पसन्द का लहंगा पहने दुल्हन की ही तरह सजी बैठी थी अपने बैडरूम में । तभी माँ कमरे में आई थी उसको देखने कि उनकी गुड़िया कैसी लग रही है । इधर -उधर की बातें करने के बाद अचानक ही बोल उठी थीं ।
“ निशा ! एक दिन रीतेश घर आया था । क्या हाल कर रखा है उसने अपना ..” कैसे चौंक कर उसकी निगाह माँ की आँखों से टकरा गई थीं ।
“ क्यों क्या हुआ “ उसने भी पूछ डाला था ।
“ अरे ! उसने शादी नही की है अभी तक “ माँ रीतेश के वारें में बताती रही थीं और उसके कानों में रीतेश की कही बातें गूँज उठी थीं । वो किस तरह सुनती रही थी रीतेश के वारे में माँ से । दिल रो कर भी रो न सका था रीतेश के हालातों पर ...। पर माँ ने उसे एक बात और भी बताई थी कि , रीतेश भी आजकल लखनऊ में ही है ..पर कहाँ रहता है ? ..ये बात नही हुई थी उनकी ..।
“ रीतेश लखनऊ में ? “ कैसे उसके होठों से बिन बोले ही शब्द फिसल गये थे ।
“ अरे ..! ठीक है ..हमें क्या लेना देना .. तू क्यों दिमाग पर जोर डाल रही है । कहीं भी रहे वो “ ये कह कर माँ तो कमरे से निकल ली थीं । पर उस पर कितना बोझ रख गयी थी । उन्हें शायद एहसास नहीं था इस बात का या उसको आगे के लिए कुछ आगाह करके गई थीं ..? वो माँ के कहने का मतलब न समझ सकी थी ..।
बाहर से डी जे का शोर आना शुरु हो गया था और मेहमानों की चहलकदमी तेज हो चली थी । लेकिन उसका मन तो जैसे वीरान हुआ जा रहा था ।ये सोच कर कि , रीतेश ने अभी तक शादी नही की है । उसे याद आ रहा था वो पल जब पिता जी अलीगढ़ से इलाहाबाद जाने वाले थे । तभी तो उसने कहा था कि इन्तज़ार करुँगा तुम्हारा निशा यहीं ..और इसी शहर में ......ओ...ह रीतेश .. रीतेश ... अच्छा होता कि तुम शादी कर लेते .....ये तुमने ठीक नही किया रीतेश ..।
उसके ऊपर विस्की का असर इतना चढ़ चुका था कि उसको अपना होश ही न था ।और वो टेवल पर सिर रख कर ही लुढ़क गयी थी ।पास में गिलास लुढ़का पड़ा था और बोटल का ढक्कन मेज के नीचे गिरा पड़ा था ।



 वो प्यार था या कुछ और था

कमला ने निशा के कमरे में आकर देखा तो लगभग चीख उठी थी । उसने निशा को अपनी बाँहों का सहारा देकर बैड पर लिटाया । और खुद सिरहाने बैठ कर उसके माथे पर हाथ फेरने लगी थी ।कमला को निशा की ये तकलीफ बड़ी परेशान करने लगी थी । साहब जी की व्यस्तता को कमला नजर अन्दाज नही कर सकती थी । वो देखती थी कि साहब कितना व्यस्त हैं , पर अपनी बीबी जी को भी दुखी देखना उसको गवारा न था ।
कमला के हाथों का स्पर्श निशा अच्छी तरह पहचानती थी । निशा की आँखों से बहते आँसू कमला से छिप न सके थे । कमला ने देखकर भी कुछ न कहा और चुपचाप उसके सिर को सहलाती रही थी । जब मन की आग आँसुओं में ढलकर शान्त हुई । तब होश आया था निशा को ...
“ कमला ..! “ ऐसा लग रहा था कि कोई बहुत दूर से आवाज लगा रहा है ।
“ हुउउउउ..” कमला ने अपनी बीबीजी की बात का हुँकार में जवाब दिया .।
“ तेरे साहब आ गये क्या ? “ देख न कितनी रात हो गयी है और कमला के हाथ को अपने हाथों में ले लिया था ।
“ आप सो जाओ बीबी जी , उनकी तो रोज की ड्यूटी है , आप काहे रोज -रोज पी कर अपनी देह तपा रही हो , हालत देखी है आपने अपनी ..फूल की तरह काया थी । क्या हाल कर लिया है ? “ कमला कहे जा रही थी कि तभी निशा को बहुत तेज सीने में दर्द उठा और वो कराह उठी थी ।
“ क्या हुआ बीबी जी ...अरे ..अरे...” ये कहते हुए दौड़ कर कमला ने अपने हाथों में रिसीवर थाम लिया था और जीतू को फोन नम्बर मिला दिया था । जीतू लखनऊ से बाहर किसी देहात में दविश देने गये हुए थे । वो देहात में थे इसलिए नेटवर्क भी काम नही कर रहा था । इधर निशा का दर्द बढ़ता ही जा रहा था वो पसीने से बुरी तरह भीग चुकी थी । और इधर कमला भी लगातार फोन मिलाती रही थी कभी तो मिलेगा । आखिरकार घंटी पहुँच ही गई ..
“ हाँ ! निशा ..बोलो ...”लेकिन उधर से कमला की हड़बड़ाती आवाज सुन कर जीतू घबरा उठा था ।
“ हाँ..हाँ..बोलो कमला .. क्या हुआ “ ?
“ साहब जी ! बीबी जी की छाती में दर्द उठा है बहुत तेज ..आप जल्दी आ जाओ “ कमला ने ये कह कर फोन काट दिया था ।
रात का दो बज चुका था । अक्सर जीतू ढाई बजे तक आ ही जाते थे । लेकिन आज लखनऊ से दूर एक गाँव में थे , वो तुरन्त ही बिना देर किये चल दिये थे । निशा का दर्द बढ़ता जा रहा था । कमला को कुछ न सूझा तो कमला ने रात में ही घर के बगल में रहने वाले मि. चतुर्वेदी जी की बैल बजा दी थी । उसके बार -बार बैल बजाने पर मि. चतुर्वेदी जी बड़बड़ाते हुए बाहर आये ।
“ कौन है इतनी रात में आ रहा हूँ भाई ..आ रहा हूँ “
चतुर्वेदी जी ने देखा उनके बगल वाले मि. जीतू के यहाँ रहने वाली लड़की कमला है तो आँखे फाड़कर बोले ।
“ क्या हुआ ...बिटिया ?”
“ जल्दी चलो अंकल जी ! बीबी जी की छाती में बहुत तेज दर्द उठा है साहब कही बाहर हैं “ कमला की बात सुन कर चतुर्वेदी जी ने जल्दी से बाहर दरबाजे पर ताला मारा और कमला के साथ जीतू के घर पहुँच गये । उन्होंने निशा की हालत को जैसे ही देखा तुरन्त अपने घर की ओर भागे , घर का ताला खोल कर कुछ पैसे और गाड़ी की चावी उठा कर ताला लगाया और अपनी गाड़ी में निशा को डाल और कमला को साथ लेकर ...पास में ही हार्ट के “ सिटी हॉस्पीटल “ में तुरन्त बिना कुछ देरी किये एडमिट करा दिया था ।
इधर जीतू भी तुरन्त ही चल दिये थे देहात से तो वो भी दो घंटे बाद आ ही गये थे । हॉस्पीटल लाने के बाद निशा को एडमिट करने की सारी औपचारिकता पूरी कर दी थी चतुर्वेदी जी ने । साथ ही जीतू को सब कुछ बता दिया था और आश्वासन दिया था कि आप बिल्कुल परेशान न हो आपकी मिसेज को सिटी हॉस्पीटल मे एडमिट कर दिया है ।हॉस्पीटल अच्छा है वो तो कमला का शुकर मनाएँ कि उसने समय पर हिम्मत दिखाई ..बहुत हिम्मती बच्ची है ।...
डाक्टर सुधीर ने सारा चेकअप कर लिया था । एक हफ्ते के लिए अपनी ऑब्जर्वेशन में रखने को कहा और जीतू को अपने कमरे में आ कर मिलने के लिये कह कर डा. सुधीर आगे की ओर बढ़ गये थे ।
मिस्टर चतुर्वेदी जी भी हॉस्पीटल से अपने घर के लिए रवाना हो लिए थे ।
जीतू डाक्टर सुधीर के कमरे के बाहर ही खड़ा था कि किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा ।
“ क्या आप जीतू सिंह जी हैं “ जीतू ने पलट कर देखा
“ हाँ कहिये मैं ही जीतू सिंह हूँ । आप की तारीफ “ जीतू ये कह कर उस अजनवी व्यक्ति की ओर देखने लगे थे । जीतू को उसकी आँखों में दर्द का समन्दर लहलहाता नजर आ रहा था ।
” मैं ..रीतेश ...मैं भी अपना यहाँ चेकअप कराने आया था । आपको परेशान देखा तो ......मेरे लायक कोई सेवा हो तो ज़रूर बताईयेगा ... प्लीज संकोच बिल्कुल भी न करियेगा “ रीतेश का उताबलापन एक पुलिस वाले की निगाह से बच न सका था । वो सोचने लगा था ..या तो ये एक भला इन्सान है या इसने यहाँ किसी अपने को खो दिया है । जीतू ने तुरन्त कहा ..।
“ बिल्कुल ..लेकिन तुम यहाँ पर क्यों आये हो ? तुम्हारा कोई अपना एडमिट है या रूटीन चेकअप ? या कोई कॉम्पलीकेशन .? “ जीतू के एक साथ इतने प्रश्न पूछने पर रीतेश कुछ बोल न सका था । बस एक लम्बी साँस भर कर रह गया था । क्या कहे वो ..., क्या बता दे ? कि हाँ ..वो भी दिल का रोगी है । जिसको दिल दिया था । वो ही अपना न हो सका ...तो ....कुछ बोलने ही जा रहा था कि इतने में जीतू का नम्बर आ गया था और जीतू डा. सुधीर से मिलने अन्दर जा पहुँचे थे ।
“ आईये .. मि. जीतू सिंह जी “ ये कहते हुए कुर्सी की ओर इशारा किया था डा. सुधीर ने ..।
“ जी ..शुक्रिया .....डा. साहब क्या कुछ कॉम्पलीकेशन है निशा के साथ ??“ जीतू के माथे पर चिन्ता की लकीरें साफ उभर आई थीं ।
“ क्या आपकी वाइफ ड्रिंक करती हैं..? ये आपकी नॉलेज में है या नही ..मैं ये समझ नही पा रहा ...” डा. ने जीतू की तरफ देख कर कहा ।
“ जी...जी .. हाँ ! कभी -कभी ले लेती हैं “ जीतू बात खत्म भी नही कर पाये थे कि , डा. सुधीर पुन: थोड़ा तेज बोल उठे थे ।
“ कभी -कभी ..? या रोज ?.....” ये कह कर डा. सुधीर ने निशा की सारी रिपोर्ट जीतू की ओर टेबल पर ..लगभग फेंकते हुए अन्दाज में पटकी थी ।
“ मि. जीतू मैं जानता हूँ कि पुलिस की सर्विस एक टफ सर्विस जरूर है ..लेकिन , घर वाले सदस्यों का ध्यान तो आपको ही रखना होगा । भला कीजिये उस लड़की का ..जो ठीक समय पर ले आई ..वर्ना हम आपकी वाइफ को बचा नही पाते .......।
जीतू की निगाह नीचे झुक गयी थी । वो अच्छी तरह जानता था इस बात को कि निशा ने अपने अकेलेपन को नशे में ही डुबो दिया था । कितनी बार समझाया था , पर वो मानती ही नही थी । डा. सुधीर ने जब देखा कि जीतू निरुत्तर है । उसकी बात का कोई रिसपान्स नही दे रहे , तो वो समझ चुके कि जीतू को काफी तकलीफ है अपनी पत्नि को इस हाल में देख कर । उन्होंने जीतू के कन्धे पर हाथ रखा और फिर कहा ..।
“ पानी छोड़ कर किसी भी प्रकार का ड्रिंक आप निशा जी को नही लेने देंगे । उनका लीवर और किडनी अब इस लायक नही रही हैं कि वो ये सब और झेल सकें , मैने निशा जी की पर्ची में दवाईयाँ लिख दी हैं । वो दवाईयाँ अपना काम करेंगी .. लेकिन आप ज़रूर दुआ करें ईश्वर से ..और हाँ ! अगर आगे ऐसा कुछ दुबारा होता है तो हम निशा जी को खो बैठेंगे ..। डा. सुधीर की बातें सुन कर जीतू की आँखें अचरज से फैल उठी थीं ।
जीतू ने बाहर निकल कर अपनी आँखो में आये पानी को पोछने के लिए जेब से रुमाल निकालना चाहा था । उसने रुमाल निकालने के लिए जेब में हाथ डाला ही थी कि उसका पर्स जेब से नीचे गिर गया था और वो रुमाल से अपनी आँखें पोछने लगा था । पर्स गिरने से उसके अन्दर रखी निशा की फोटो फर्श पर गिर पड़ी थी । जीतू निशा की फोटो अपने पर्स में हमेशा रखता था । रीतेश की निगाह निशा के फोटो पर जा कर टिक गई थी और वो सोच रहा था कि जिस पुलिस वाले से निशा की शादी हुई थी वो क्या यही जीतू सिंह है ? उसने तुरन्त नीचे झुककर अपने हाथों में निशा की फोटो को थाम लिया था और वो गौर से देख कर यकीन करना चाहता था कि ये वही उसकी निशा है या कोई और ..?
रीतेश की हाथों में निशा की फोटो को देख जीतू बोल उठे थे ..
“ रीतेश ये जो तुम्हारे हाथों में है न ! यही है मेरी जिन्दगी ..मेरी निशा ..जिसने मेरी जिन्दगी बदल दी यार “ और ये कहते हुए जीतू ने रीतेश के हाथों से निशा का फोटो अपने हाथों में ले लिया था ।
“ क्या हुआ है इनको ?कहाँ हैं आपकी पत्नी ? कौन से वार्ड में ? “.. रीतेश का दिल उसके पास , उससे मिलने , उसका हाल देखने के लिए बेताब हो उठा था ।
“ तुम मिलना चाहते हो रीतेश तो मैं ज़रूर मिलवाऊँगा “ और दोनो वार्ड नम्बर 203 की ओर बढ़ गये थे । जीतू ने देखा कि नर्स निशा के कमरे से निकल कर बाहर की ओर आ रही है । दोनों ने एक साथ कमरे में प्रवेश किया तो देखा ..निशा आँख बन्द किये लेटी हुई थी । रीतेश आँखें फाड़ कर देख रहा था । न जाने कौन -कौन सी मशीनों के बीच घिरी अपनी उस निशा को जिसको उसके वारे में आज तक शायद कुछ पता भी नही है कि वो कैसा है किस परिस्थिति में है । रीतेश सोच रहा था निशा तो भूल चुकी होगी उसको । इतने में एक कराह निकली थी निशा के मुँह से । उसने अपनी आँखें खोली ही थीं तो वो यकायक अपनी ही आँखों पर विश्वास न कर सकी थी । कि, जिसके वारे में सोच रही थी वही रीतेश उसके सामने खड़ा है। वो सिर्फ एक बार देखना चाहती थी रीतेश को ....।
“ सुनों.......!” और उसकी सुनों पर दोनों ही दौड़ पड़े थे । जीतू ने एक हाथ पकड़ा हुआ था निशा का और दूसरा हाथ निशा का रीतेश की हाथों में था ।
“ जीतू ... “ प्लीज मत बोलो निशा ..! कुछ भी नही ..डाक्टर ने मना किया है । ज्यादा एक्साइटमेंट तुम्हारे लिए ठीक नही है डार्लिंग ..।
“ न.. ही .. मुझे बोलने दो जीतू ..आज नही बो..ली तो देर हो जायेगी । ये कहते हुए निशा ने जीतू की ओर प्यार से देखा था ..निशा की साँस तेज चलने लगी थी ...।
“ तुम्हे याद है जीतू जब तुमने हमारे शादी के रिशेप्शन पर मेरी हालत को देख कर पूछा था ..क्या किसी आशिक -वाशिक को ढूँड रही हो ? तुम्हें या..द है ..न !
और मैंनें कहा था कि आशिक को नही वाशिक को ढूँड रही हूँ “ निशा की साँस तेज और तेज चलने लगी थी ।
“ सु..नो ! जीतू .......ये रीतेश वही ...वाशिक है “ और निशा तेज -तेज हाँफने लगी थी । उसकी हालत को देख रीतेश बाहर भागना चाहता था डाक्टर को बुलाने के लिए लेकिन निशा ने हाथ नही छोड़ा था उसका ....वो एक टक घूर रही थी रीतेश को .....
निशा ..आ..आ..आ..आ...आ
रीतेश की चीख हॉस्पीटल में चारो ओर गूँज उठी थी । जीतू ने अपने हाथों से निशा की खुली पलकों को बन्द कर दिया था । और रीतेश के कन्धों को पकड़ कर उसे होश में लाने की कोशिश कर ही रहा था कि , जीतू के छूते ही वो एक तरफ लुढ़क गया था नीचे जमीन पर....कमरे में एक गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था ।
वहीं ...बाहर कहीं सड़क के किनारे पान वाले की दुकान पर गाना चल रहा था .....
जो मिलते रहते हैं
वो दिल में समा जाते हैं
जो मिल कर नहीं मिलते
वो याद बहुत आते हैं
ये प्यार था या कुछ और था
न तुझे पता न मुझे पता
ये प्यार था या कुछ और था
ये निगाहों का ही क़ुसूर था
न तेरी ख़ता न मेरी ख़ता
ये प्यार था या कुछ और था.....।।
कुसुम पालीवाल नॉएडा
                                         
लेखिका -कुसुम पालीवाल




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मुझे तुम्हारे जाने से नफरत है –संवाद शैली की खूबसूरत आदयगी

 
             
आजकल युवा लेखक बहुत अच्छा लिख रहे हैं | अपनी भाषा,प्रस्तुतीकरण और शिल्प सभी में वो खूब प्रयोग कर रहे हैं | वो जो देख रहे हैं महसूस कर रहे हैं वो बिना किसी लाग लपेट के, उन्हें खूबसूरत शब्दों का जामा पहनाये, वैसा का वैसा ही परोस देते हैं, जिसकी ताजगी की भीनी –भीनी खुशबु पाठक के मन को सुवासित कर देती है | शिल्प में भी कई प्रयोग हो रहे हैं, जिनमें से कई आगे अपनी एक नयी शैली में विकसित होंगे | वैसे भी साहित्य, जीवन की तरह किसी एक दायरे में बंधा हुआ ना होकर बहती हुई नदी की तरह निरंतर गतिशील होना चाहिए जो अपनी धाराओं में हर किसी को बहा ले जाए | जैसे –जैसे जीवन जटिल हो रहा है कहानियों के प्रस्तुतीकरण में सरलता आई है, ताकि पाठक आसानी से उस जटिलता को आत्मसात कर सके | ऐसे ही सरल से खूबसूरत प्रयोगों से युवा लेखक कई बार चौंका देते हैं ...ऐसे ही मुझे चौकाया 'प्रियंका ओम' ने अपनी किताब “ मुझे तुम्हारे जाने से नफरत है” के माध्यम से | प्रियंका ओम बिहार में जन्मी और पली बढ़ी हैं और फिलहाल दारे-सलाम, तंजानिया में रह रही हैं | ये उनकी दूसरी किताब है | उनकी पहली किताब “वो अजीब लड़की” है |

 मुझे तुम्हारे जाने से नफरत है –संवाद शैली की खूबसूरत आदयगी


लेखिका -प्रियंका om



“मुझे तुम्हारा जाना इतना बुरा नहीं लगता, जितना आना क्योंकि तुम हमेशा जाने के लिए ही आते हो, और मुझे तुम्हारे जाने से नफरत है |” ये वाक्य है संग्रह की प्रमुख कहानी “मुझे तुम्हारे जाने से नफरत है” का | जब हम किसी से प्रेम करते हैं तो उसका जाना अच्छा नहीं लगता | लगता है वो हमारे साथ ही रुक जाए हमेशा के लिए कितने फिल्मी गाने इस खूबसूरत अह्सास् से  भरे पड़े हैं | इसे लिखते समय मेरे जेहन में  अपने जमाने का एक बहुत प्रसिद्द गीत ‘अभी न जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं बजने लगा है  ...लेकिन मिलन का ये समय ठहरता कहाँ है ?  उसे जाना होता है, और जाता भी है ...लेकिन क्या हमेशा के लिए या फिर से लौट आने के लिये ? वैसे ही जैसे मौसम जाते हैं फिर से लौट आने के लिए ,पानी भाप बन कर उड़ जाता है फिर बदरी बन बरसने के लिए, सूरज और चन्दा जाते हैं अगले दिन फिर लौट आने के लिए | दरअसल ये कहानी जाने के दर्द पर विलाप करने की नहीं, बार –बार लौट आने के मर्म को समझने की है | जब कोई हमारी जिन्दगी में बार –बार पलट –पलट कर आ रहा है तो वो जाने के लिए नहीं जाता, वो रुकना चाहता है ठहरना चाहता है पर परिस्थितियाँ और हालत उसे मजबूर कर देते हैं |


 इस कहानी की शुरुआत बहुत ही दिलचस्प व् रहस्यमय है | इसमें कहानी के नायक को (जो अकेला , एकांत और निराश जिन्दगी बिता रहा होता है ) एक अजनबी लड़की का फोन आता है | हर फोन रहस्य को और गहरा कर देता है और नायक की बेचैनी को बढ़ा देता है | रहस्य से पर्दा उठातीं है नायक की दीदी और खुलता  है बचपन की स्मृतियों का पिटारा |  नायक -नायिका का बचपन का साथ  प्रेम की हल्की सी दस्तक बन कर मिट जाता है | क्योंकि अभिषेक की  सत्रह साल बड़ी दीदी जो उसकी माँ सामान हैं उसे  इस सब बातों में समय ना बर्बाद करके पढाई पर ध्यान लगाने को कहतीं है | अभिषेक  इस बात को भूल जाता है पर श्वेता ... श्वेता नहीं भूलती | एक बार फिर वो उसकी जिन्दगी में आती है, बहुत ही रोमांचक तरीके से | परिस्थितियाँ एक बार फिर बदलती हैं और अभिषेक एक बार फिर अपने एकांत में लीन  हो जाता है ....श्वेता फिर लौटती है ...पर फिर उलझती है गुत्थी कि आखिर वो क्यों आई है ?  जाने के लिए या रूकने के लिए ? क्या इस बार अभिषेक बार –बार लौट के आने के मर्म को समझता है ? एक नये अंदाज में नए एंगल पर फोकस करती ये कहानी अपनी लेखन शैली के कारण बहुत ही खूबसूरत बन पड़ी है | इस कहानी का दार्शनिक अंदाज में आगे बढ़ना बेहतरीन प्रयोग है | 


“और मैं आगे बढ़ गयी” प्रेम में अधिकार जताने व् समर्पित होने के अंतर को बखूबी स्पष्ट करती है | मुझे लगता है ये कहानी स्त्रियों के लिए बहुत खास है क्योंकि अधिकतर स्त्रियाँ प्रेम के शुरूआती दौर में इस अंतर को नहीं समझ पातीं फिर जीवन भर दर्द झेलती हैं | कहानी  एक ट्रेन में नायिका वनिता के अपने पुराने प्रमी आदित्य के साथ अचानक व् अनचाहे  सफ़र शुरू होती है | आज वनिता शादी शुदा है और एक बच्चे की माँ है जो अपने बच्चे के साथ ए .सी . टू टियर में अकेली है और आदित्य अभी भी अकेला और उदास है | जाहिर है, ऐसे में आपस में तानाकशी भी होगी और पुरानी यादें अपने बंद झरोखे खोल कर पुन : सामने भी आएँगी | कुछ अतीत और कुछ वर्तमान की ऐसी ही भागदौड़ के साथ कहानी आगे बढती है | वनिता और आदित्य का प्रेम बचपन का प्रेम था, प्रेम क्या था, उन्हें तो उनके माता-पिता ने बचपन में अपनी दोस्ती को पक्का रखने के लिए शादी के वादे  की डोर में ही बाँध दिया था | पड़ोस में रहने वाले दो बच्चे जो साथ खेलते, पढ़ते, और बढ़ते हैं ....शुरू से ही  एक दूसरे के प्रति आकर्षण में बंधे रहते हैं |


कहानी में जहाँ प्रेम की छुटपुट फुहारें मन को रूमानी करती हैं वहीँ वहीँ आदित्य और वनिता के स्वभाव में अंतर किसी अप्रिय भविष्य की तरफ भी इशारा करने लगता है | बच्चे जैसे –जैसे बड़े होते जाते हैं, उनके परिवारों की सोच और परवरिश का अंतर स्पष्ट नज़र आने लगता है | जहाँ वनिता का परिवार खुले विचारों का है, जिसमें पति –पत्नी दोनों को बराबर स्थान है, वहीँ आदित्य का परिवार पुरुषवादी अहंकार और पितृसत्ता का पोषक ...जहाँ घर की स्त्रियों का काम बस पुरुषों को खुश करना, उनकी सेवा करना है | पारिवारिक गुण धीरे –धीरे आदित्य में आने लगते हैं ...वनिता को घुटन मह्सूस होने लगती है | अन्तत: लव ट्राई  एंगल से गुज़रती हुई कहानी  निकेतन और वनिता के विवाह में परिणित होती  है | कहानी पढ़ते हुए पाठक वनिता के फैसले को सही ठहराते हुए भी कहीं ना कहीं प्रेम में अकेले छूट गए आदित्य के प्रति भी सॉफ्ट कॉर्नर रखता है, परन्तु कहानी के अंत में एक ऐसा जोर का झटका लगता है, कि पाठक पूरी तरह से वनिता के “और मैं आगे बढ़ गयी” के फैसले पर अपनी भी सही की मुहर लगा देता है | 

कहानी की खास बात ये है कि ये रिश्तों को पहचानने की समझ देती है | ये कहानी एक तरफ जहाँ अधिकार को प्यार समझ लेने की भूल के खिलाफ खड़ी होती है वहीँ इंसान का स्वाभाव  आसानी से नहीं बदलता का उद्घोष भी करती है | यहाँ पर ये कहानी फ़िल्मी कल्पनाओं और असली जिन्दगी के अंतर को स्पष्ट करती है | मेरे विचार से ये कहानी हर पाठक विशेषकर महिला पाठक के हृदय को छू लेगी |    


“लास्ट कॉफ़ी”  एक बेहद ही संजीदा कहानी है | जिसमें बच्चों के शारीरिक शोषण का गंभीर मुद्दा उठाया है | एक लिफ्ट में एडोल्फ से लेखिका की मुलाक़ात होती है | एडोल्फ जर्मन पिता व् भारतीय माँ की संतान है | उसके रहस्यमयी व्यक्तित्व के प्रति लेखिका की रूचि जगती है | दरअसल वो अपनी नयी कहानी के लिए एक ऐसा ही रहस्यमयी किरदार ढूंढ रही होती है | जहाँ लेखिका को एडोल्फ का रहस्य आकर्षित कर रहा है वहीँ एडोल्फ को  उसका छल-कपट रहित नेक दिल | कुछ मुलाकातें होती हैं और रहस्य और गहरा जाता है | एडोल्फ  वापस जर्मनी चला जाता है वहाँ  से एक किताब भेजता है | जैसे –जैसे वो किताब पढ़ती है तो एडोल्फ के किरदार का  कुछ –कुछ रहस्य खुलने लगता है | कहानी आगे बढ़ती है और  अन्तत: एडोल्फ  अपने दर्द से मुक्ति पाता है | वो रहस्य क्या है , मुक्ति क्या है ये आप कहानी पढ़ कर ही जानिये , पर फिलहाल मैं इतना कह सकती हूँ कि अपने कथ्य , शिल्प और प्रस्तुतीकरण की दृष्टि से ये एक बेजोड़ कहानी है | एडोल्फ़ का किरदार आपके मन में जगह बना लेता है | अपनी बात कहूँ तो ये कहानी, इस संग्रह की सबसे पसंदीदा कहानी है | 


‘प्रेम पत्र" इस संग्रह की पहली कहानी है | ये कहानी किशोरवय की कशिश, प्रेम और आकर्षण के ऊपर हैं | ये तीन सहेलियों की कहानी है ...मीनू , काजल और श्वेता ...जिसमें श्वेता सबसे खूबसूरत , अंग्रेजी में तेज , व् प्रभावशाली व्यक्तित्व की मालकिन है , मीनू ‘टॉम बॉय’ इमेज वाली गणित में तेज व् थोड़ी गुस्सैल है | काजल इन दोनों के बीच की | तीनों की दोस्ती इतनी गहरी है कि क्लास के और बच्चों की लाख कोशिशों के बाद भी नहीं टूटती | तभी काजल के दिल के दरवाजे पर अमर प्रेम की दस्तक देता है | तेजतर्रार मीनू से काजल को अलग करने के लिए अमर अपने रिश्ते के भाई स्वप्निल से मदद मांगता है |  स्वप्निल लड़कियों को ‘पटाने’में मास्टर है | वो ये चेलेंज स्वीकार कर लेता है | उसका प्लान मीनू को प्रेम के झूठे नाटक में फंसाकर उसे काजल और अमर  के बीच टांग अड़ा कर रोकने का है | प्लान काम करने लगता है ...टॉम बॉय मीनू  अपनी सख्त इमेज से एक नाजुक , कोमल लड़की में तब्दील होंने  लगती है | जाने क्यों मीनू को पढ़ कर मुझे ‘कुछ –कुछ होता है “ की काजोल याद आ रही थी |


खैर खून से लिखा एक प्रेमपत्र स्वप्निल मीनू को देता है  ऐसे ही कुछ प्रेम पत्रों से ढेर सारा कन्फ्यूजन पैदा होता है | दोस्तियाँ टूटती हैं जुडती हैं | बहुत सारे नाटकीय मोड़ों के बाद राज खुलता है ...और पाठक के चेहरे पर मुस्कान दौड़ जाती है|  इस कहानी को पढ़कर आप अपनी किशोर वय में एक बार जरूर घूम आयेगे | किशोर वय की पक्की दोस्ती -कच्ची दोस्ती, विपरीत लिंगी  आकर्षण और प्रेम की पहली दस्तक, जो व्यक्तित्व में ही परिवर्तन कर देती है | वो सब कुछ जो किशोर वय में होता है इस कहानी में बहुत सहज तरीके से व्यक्त हुआ है |  



कहानी काफी लम्बी है | रोमांटिक कहानियों को पसंद करने वालों को ये कहानी पसंद आएगी , अलबत्ता मेरे लिए एक मामले में ये कहानी ज्ञानवर्धक रही , क्योंकि इसी कहानी के माध्यम से मुझे पता चला कि प्रेमपत्र लिखने में केवल एक बूँद खून लगता है | सच में लडकियाँ  कितनी भावुक होती हैं, जो इसे बड़ी गंभीरता से लेती हैं, इससे ज्यादा खून तो लड़कियों के पिया के नाम की चूड़ियाँ चढाते उतारते हर बार निकल आता है | स्वाति का अहंकार कहीं ना कहीं खूबसूरत स्त्रियों की सोच को दर्शाता है , जिसमें उनके लिए ये सहन करना मुश्किल हो जाता है कि उनकी उपस्थिति में कोई किसी दूसरे को ज्यादा पसंद करे | हालांकि ये एक राय ही है कोई नियम नहीं | कुल मिला किशोर उम्र की भावनाओं को उजागर करती एक खूबसूरत प्रेम कहानी है | 

संग्रह की आखिरी कहानी 'वी.टी स्टेशन पर एक रात' एक छोटी सी क्यूट सी कहानी है | कहानी की कमाल  की किस्सागोई और  दृश्य वर्णन प्रभावित करता है | ये एक नवविवाहित जोड़े की कहानी है जिसे अनचाहे ही मुश्किल हालत में एक रात वी टी स्टेशन पर बितानी पड़ती है | दरअसल वो प्लेन का सफ़र ना करके ट्रेन से मुंबई से राँची जाने का मन बनाते हैं पर  उन्हें इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं होता कि ट्रेन का टिकट  मिलना इतना आसान नहीं है | रात का  समय , उनके पास कीमती सामान और स्टेशन की भीड़ में पल -पल मुश्किलों का सामना करता हुआ ये जोड़ा आपसी प्यार और समझ से वो रात बिताता है | ये रात जाते जाते उन्हें सबक भी दे जाती है कि आसान सी लगने वाली हर चीज आसान नहीं होती | 


‘मुझे तुम्हारे जाने से नफरत है' कहानी संग्रह में कुल पाँच  कहानियाँ हैं | इस की कुछ कहानियाँ  संवाद अदायगी की शैली में लिखी गयीं हैं, जो बहुत सुंदर लगती  है | वैसे  हर कहानी को लिखने की शैली अलग है | किसी एक लेखक की लेखन शैली में इतनी वैरायटी प्रभावित करती है | कई  कहानियों में किसी  एक किताब का जिक्र होता है , और उस किताब के साथ कहानी के किरदार थोड़ी बहुत साम्यता स्थापित करते हुए चलते हैं | कहानियों का प्रवाह इतना तेज है कि एक बार किताब उठाने के बाद  पाठक उसमें बहता चला जाता है और पूरी किताब पढ़ कर के ही उठने का प्रयास करता है |  भाषा कहानी के पात्रों के अनुरूप है | लास्ट कॉफ़ी में लेखिका कई भाषओं के वाक्यों का प्रयोग करतीं हैं जो कहानी को आकर्षक बनाता है | जैसा की प्रियंका ओम ने आत्मकथ्य में लिखा है कि, "उन्हें शब्द आकर्षित करते हैं", वैसे ही उन्होंने कहानियों में कई खूबसूरत शब्दों का प्रयोग किया है जो चमत्कार उत्पन्न करते हैं | कई जगह मुहावरों का भी प्रयोग  हुआ जो कहानियों की रोचकता को बढ़ाते हैं | भाषा नई  वाली हिंदी है | नई वाली हिंदी वैसे कोई अलग नहीं है पर ये वो भाषा है जो आज का युवा बोलता है | जिसमें हिंदी के साथ अंग्रेजी के शब्द भी सहज घुले -मिले हैं | ये हिंदी आज के नए पाठक वर्ग में स्वीकार्य भी है और लोकप्रिय भी | 




संग्रह का नाम बहुत सोच-समझ कर रखा गया है जो आकर्षित करता है | कवर पेज की डिजाइन लोकप्रिय किताबों की डिजाइन है , जिससे पाठक आकर्षित होता है | कवर देख कर ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि रहस्य से भरी कहानियाँ होगी |  कुल मिला कर ये कहानी संग्रह एक ताज़ा हवा के झोंके की तरह सुखद  अहसास कराता है |




मुझे  तुम्हारे जाने से नफरत है –कहानी संग्रह

प्रकाशक -रेड्ग्रैब बुक्स

लेखिका –प्रियंका ओम

पृष्ठ -183

मूल्य -175 रुपये



 समीक्षा -वंदना बाजपेयी 


समीक्षिका -वंदना बाजपेयी










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कुँजी


जैसे होने की उत्त्पत्ति ना होने से होती है , जीवन की मृत्यु से और प्रकाश की अन्धकार से ...वैसे ही कई बार विलपत स्मृतियाँ उस समय के अँधेरे में और स्पष्ट होकर दिखाई देने लगतीं है जब परिस्थितियाँ  हमें दुनियावी चीजों से ध्यान हटा अंतरतम में झाँकने को विवश कर देती हैं | ये कहानी ऐसी ही विस्मृत स्मृतियों की है जो कई साल बाद मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बाद चेतन मन के अंधकार में  अवचेतन मन की गहराई से ना केवल प्रकट हुई बल्कि स्पष्ट भी हुईं | एक बार बचपन की स्मृतियों में अपने अंधे -माता -पिता को याद करते हुए अपने प्रश्नों के उत्तर भी मिले | अवचेतन द्वारा उत्तर दिया जाना शोध का विषय हो सकता है पर खानी का विषय स्त्री शोषण की वो दास्ताँ है जिसे उस समय वो बच्चा भी नहीं समझ पाया था |


कुँजी


बीती वह पुरानी थी.....
लेकिन मोतियाबिंद के मेरे ऑपरेशन के दौरान जब मेरी आँखें अंधकार की निःशेषता में गईं तो उसकी कौंध मेरे समीप चली आई.....
अकस्मात्.....
मैंने देखा, माँ रो रही हैं, अपने स्वभाव के विरुद्ध.....
और गुस्से में लाल, बाबा हल की पट्टीदार खिड़की की पट्टी हाथ में पकड़े हैं और माँ को नीचे फेंक रहे हैं.....
अनदेखी वह कैसे दिख गई मुझे?
धूम-कोहरे में लिपटी माँ की मृत्यु ने अपनी धुँध का पसारा खिसका दिया था क्या?
अथवा मेरे अवचेतन मन ने ऑपरेशन की प्रक्रिया से प्रेरित मेरी आँख की पीड़ा कोपीछे धकेलने की ख़ातिर मुझे इस मानसिक दहल की स्थिति में ला पहुँचाया था?
मेरा चेतन मन हिसाब बैठाता है : माँ की मृत्यु हुई, 28 फरवरी, 1956 की रात और मेरा ऑपरेशन हुआ 28 फरवरी, 2019 की शाम.....
तिरसठ साल पीछे लौटता हूँ.....
बाबा दहाड़ रहे हैं, “वह कुँजी मुझे चाहिए ही चाहिए.....”
माँ गरज रही हैं, “वह कुँजी मेरे पास रहेगी. मेरे बाबूजी की अलमारी की है. मेरी संपत्ति है.....”
1904 में जन्मे मेरे नाना संगीतज्ञ थे. नामी और सफ़ल संगीतज्ञ. रेडियो पर प्रोग्राम देते, संगीत-गोष्ठियों में भाग लेते. विशिष्ट राष्ट्रीय कार्यक्रमों में बुलाए जाते.
अपनेअड़तीसवें वर्ष, 1942 में, उन्होंने अपनी पुश्तैनी इमारत की ऊपरी मंजिल पर अपना विद्यालय स्थापित किया : सुकंठी संगीत विद्यालय. बोर्ड के निचले भाग पर लिखवाया : शिष्याओं के लिए पृथक कक्ष एवं पृथक शिक्षिका की व्यवस्था.
लड़कियों को माँ पढ़ाती थीं. वे नाना की इकलौती संतान थीं और ‘सुकंठी’ उन्हीं का नाम था. अपने नाम के अनुरूप उनके कंठ में माधुर्य और अनुशासन का ऐसा जोड़ था कि जो भी सुनता, विस्मय से भर उठता.
लेकिन वे अंधी थीं.
ऐसे में 1946 में जब सत्रह वर्षीय बाबा नाना के विद्यालय में गाना सीखने आए तो नाना ने उन्हें अपने पास धर लिया. बीस वर्षीया अपनी सुकंठी के लिए बाबा उन्हें सर्वोपयुक्त लगे थे. बाबा अंधे थे. अनाथ थे. सदाचारी थे. तिस पर इतने विनम्र और दब्बू कि प्रतिभाशाली होने के बावजूद अहम्मन्यता की मात्रा उनमें शून्य के बराबर थी.
नाना उन्हें ‘नेपोलियन थ्री’ कहा करते. ‘नेपोलियन टू’ इसलिए नहीं क्योंकि वह उपाधि वे माँ को पहले दे चुके थे.
उन दिनों नेपोलियन को सफ़लता और दृढ़निश्चय का पर्याय माना जाता था और नेपोलियन की परिश्रम-क्षमता का एक किस्सा नाना सभी को सुनाया करते :
एक रात काउंसलर थककर ऊँघने लगे तो नेपोलियन ने उन्हें डांटा , ‘हमें जागते रहना चाहिए, अभीतो सिर्फ़ दो बजे हैं. अपने वेतन के बदले में हमें पूरा-पूरा काम देना चाहिए.’
नेपोलियन के एक भक्त उनकी बात सेबहुत प्रभावित हुएऔरअपने साथी काउंसलरों सेबोले, ‘ईश्वर ने बोनापार्ट बनाया और फिर आराम से चला गया.’
काम करने की ख़ब्त नाना, माँ और बाबा को बराबर की रही, लेकिन बाबा रात को देर में सोते थे और सुबह देर से उठते थे. इसकेविपरीत नाना और माँ रात में जल्दी सोने के आदी रहे और सुबह जल्दी जग जाने के.
माँऔरबाबाके तनाव का मुख्य बिंदु भी शायद यही रहा. आज स्वीकार किया जा रहाहै कि हममें से कुछ लोग फ़ाउलज(चिड़ियाँ), मॉर्निंग पीपल (प्रातः कालीन जीव) होते हैं और कुछ आउलज(उल्लू), नाइट पीपल(रात्रि जीव). किंतु बाबा को माँका जल्दी सो जाना अग्राह्य लगता. शायद इसीलिए उन्होंने शराब पीनी शुरू की. नाना के जीवनकाल में छुपकर और बाद में खुल्लमखुल्ला.
मेरा जन्म सन उनचास में हुआ था, माँ और बाबा की शादी के अगले वर्ष. मेरी प्रारंभिक स्मृतियाँ उषाकाल से जुड़ी हैं :
नाना के शहद-घुले गुनगुने पानी के भरे चम्मच से.....
नाना के हाथ के छीले हुए बादाम से, जोरात में भिगोए जाते थे.....
नानाऔरमाँकी संगति में किए गए सूर्य-नमस्कार से.....


कुँजी

माँ और नाना द्वारा गिने जा रहे और हस्तांतरित हो रहे रुपयों और सिक्को से.....
कब्ज़ेदार दो लोहे के पत्तरों की स्लेट के बीच काग़ज़ रखते हुए माँ के हाथों से.....
काग़ज़ पर ‘रेजड डॉट्स (ऊपर उठाए गए बिंदु) लाने के लिए उन पत्तरों में बने गड्ढों पर काग़ज़ दबाते हुए माँ के स्टाइलस से.....
माँ ब्रेल बहुत अच्छा जानती थीं.
और सच पूछिए तो मैंने अपने गणित के अंक और अंग्रेजी अक्षर अपने स्कूल जाने से पहले ब्रेल के माध्यम से सीख रखे थे. और ब्रेल मुश्किल भी नहीं. इसके कोड में तिरसठ अक्षर और बिंदु अंकन है. प्रत्येक वर्ण छह बिन्दुओं के एक सेल में सँजोया जाता है, जिसमें दो वर्टीकल, सीधे खानों में एक से लेकर छह ‘रेजड डॉट्स’ की पहचान से उसका विन्यास निश्चित किया जाता है.
अपने तीसरे ही वर्ष से मैं नाना के पास सोने लगा था.....
हॉल के दाएँ कमरे में.....
नाना की निचली मंजिल पर बनी चार दुकानों के ऐन ऊपर बना वह हॉल नाना ने तीन कक्षों में बाँट रखा था, दो छोटे और एक बड़ा. हॉल में चार आदम-कद, पट्टीदार खिड़कियाँ थीं, जो सड़क की तरफ़ खुलती थीं और हर एक खिड़की के ऐन सामने बीस फुट की दूरी पर एक-एक दरवाज़ा था जो अन्दर आँगन में खुलता. बड़ाकक्ष दो खिड़कियाँ और दो दरवाज़े लिए था और दाएँ-बाएँ के दोनों कक्ष एक-एक खिड़की और एक-एक दरवाज़ा. बाएँ कक्ष में नाना ने विद्यालय का दफ़्तर खोल रखा था और दाएँ कक्ष को वे निजी, अनन्य प्रयोग में लाते थे. उसी कक्ष में उनका पलंग था. उनके कपड़ों की घोड़ी थी, उनकी किताबों का रैक था, उनके निजी संगीत वाद्य थे और वह अलमारी जिसमें रूपया रहता था और जिसकी कुँजी वे अपनी जेब में रखा करते थे.
कहने-भर को मालिकी उनकी थी लेकिन सब कुछ माँ के नाम था, विद्यालयक्या, मकान क्या, दुकानें क्या. और सारा हिसाब-किताब भी माँ ही रखा करतीं. दुकानों के किराए और बकाए का; विद्यालयकीफ़ीस और निधि का; नौकर लोग के वेतनका; बाबा के जेब-खर्च का; पंसारी, बजाज और दर्ज़ी के बिल का; मेरे स्कूल की किताबों, बैगऔर बस के व्यय का.
सुबह के चार बजते ही आँगन पार कर माँ इधर हॉल के बीच वाले कमरे में चली आतीं. यहीं उन्होंने अपना मंदिर बना रखा था. अपनी शिष्याओं को संगीत भी वे यहीं सिखाती थींऔर बाबा के रूठने पर इधर सो भी जातीं. बाबा उधर आँगन पार बने अपने कमरे में रहते थे. उधर तीन कमरे थे. बायाँ बाबा का, दायाँ रसोई घर और बीच वाला विद्यालय का, जहाँ पुरुष जन संगीत सीखते थे. यह कमरा और हॉल के बीच वाला कमरा इस तरह एक-दूसरे के ऐन सामने पड़ते थे.
नाना की मृत्यु बिना चेतावनी के आई. स्नानगृह में स्नान करने गए. वहाँ ठोकर खाई या फिसले, किसी को नहीं मालूम. माँ को केवल उनका धड़ाम से गिरना सुनाई दियाऔर समस्या यह कि स्नानगृह की सिटकनी अंदर से बंद थी. जब तक माँ ने बाबा और रसोइए को जगाकर स्नानगृह का दरवाज़ा खुलवाया, नाना अपना शरीर त्यागचुके थे.
नाना की कुँजी अपने अधिकार में लेने का आग्रह बाबा ने उसी भोर से शुरू कर दिया.
“कुँजी मुझे दो. डॉक्टर इधर बुलवाया है. उसकी फ़ीस देनी होगी.....”
बाबा और माँ बेशक अंधे थे लेकिन दोनों सदैव स्वतःस्फूर्त रहे- शरीरसे भी और चित्त से भी. दोनों के हाथ-पैर पूरी तरह से उनके अधीन रहा करते. बिना कोई सहारा लिए, बिना कभी डगमगाए वे घर-भर में स्वच्छंद घुमते फिरते, उठते-बैठते. चित्त भी दोनों का बराबर- आत्मकेंद्रित और स्वसंगत!
“मैं सब देख लूँगी,” चिंतातुर, शोकाकुल उस अवस्था में भी माँ अपने को सभाले रहीं, “आप अपना देखिए.....”
डॉक्टर के जाते ही माँ ने मुझसे टेलीफ़ोन की अपनी कॉपी मँगवाई और उसमें से एक नंबरखोजकर मुझे टेलीफ़ोनमिलाने को कहा.
नंबर मिलते ही माँ ने मुझसे टेलीफ़ोन पर बृजभान काका को पूछा और बोली, “उन्हें बताइए, मास्टरजी नहीं रहे. वे तत्काल इधर चले आएँ.....”
नीचे वाली हमारी दुकानों में बृजभान काका की दुकान उन दिनों अच्छी पनप रही थी. उनके पास मरफ़ीरेडियो की एजेंसी थी और उनके रेडियो खूब बिकते थे.
बृजभान काका के आते ही माँ ने नाना की सारी ज़िम्मेदारी उन्हें सौंप दी. दाहकर्म की, फूल चुनने की, तेरहवीं के भोज की.
तेरहवीं की रस्म बीतते ही बाबा ने माँ को फिर घेर लिया, “मुझे कुँजी दो. मुझे ठेकेदारको रूपया देना है. नई सीढ़ियाँ बनवानी हैं. सड़क की तरफ़ से. उधर हमारे ग्राहकभटक जाते हैं.....”
“लेकिन सड़क में जगह कहाँ है?” माँ चिल्लाईं. चारों दुकानों के दोनों किनारे घिरे थे.
एक-दूसरे की बात का विरोध माँ और बाबा पहले भी करते रहे थे; माँ उग्र स्वर मेंऔर बाबा दबे स्वर में. किंतुनाना की मृत्यु के बाद बाबा का विरोध कर्णभेदी स्वर में फूटने लगा था, सो वे भी चिल्ला उठे, “बृजभान की दुकान ख़ाली करवाएँगे और उस जगह अपनी सीढ़ी बनवाएँगे.....”
“कभी नहीं,” माँ ने दृढ़ स्वर में कहा, “कभी नहीं. वैसे भी हमारी सीढ़ियाँ अहाते में ठीक हैं. बृजभान काका की दुकान कभी नहीं छेड़ी जाएगी.....”
ऊपर आने के लिए बनी हमारी सीढ़ियाँ अहाते में स्थित थीं. अहाता सड़क की दुकानों के पीछे था; महाकाय एवं कुंडलित. हमारी सीढ़ियों के अतिरिक्त उसमें ऊपरी मंजिल के दूसरे मकानों की सीढ़ियाँ भी रहीं. साथ ही कई बेतरतीब, बे-सिर-पैर, ठसाठस, सटे-सटे मकान.
“वे भी कोई सीढ़ियाँ हैं? पिछले पैरों पर खड़ीं? उन्हें तो हमें बदलना ही बदलना है. बृजभान को यहाँ से हटाना ही हटाना है..... रस्सी-वस्सी सब दूर फेंक देनी है.....”
नाना ने अहाते की उन सीढ़ियों के दरवाज़े पर दुफंदी साँकल लगवा रखी थी जिस पर दोतरफ़ी रस्सी बधी थी. रस्सी के दोनों सिरे ऊपर हमारे आँगन में टगी एक खूँटी पर टिके रहते. दरवाज़ा हमें खोलना होता तो रस्सी का पहला सिरा अपनी तरफ़ खींचलेते, बंद करना होता तो दूसरा.
“सीढ़ियाँ वे ठीक हैं. उन्हें नहीं बदला जाएगा.....” माँकी दृढ़ता दुगुनी हो ली.
“क्या पुरातनपंथी है?” बाबा दुगुने वेग से चिल्लाए, “सीढ़ियाँ वे ठीक नहीं हैं. ख़तरनाक हैं. वाहियात हैं. हमें नई सीढ़ियाँ चाहिए ही चाहिए.....”
“आप कानून नहीं जानते,” माँ ने बाबा को चुनौती दी, “वरना ऐसे नहीं कहते, ऐसे नहीं सोचते. कानून जानते होते तो मालूम रहता, मकान-मालिक की मर्ज़ी के बिना मकान की एक ईंट तक हिलाई नहीं जा सकती.....”
“धर्म कहता है, परिवार का मुखिया पति होता है, मकान का मालिक पति होता है.....” बाबा ने माँ की चुनौती खारिज़ कर दी.
“आप अपना धर्म थामे रखिए,” माँ के पास अपना तर्क था, “मेराकानून मुझे सभाल लेगा.....”
“इतना ऊँचा उछलोगी तो मुँह के बल गिरोगी.....” बाबा के पास धमकी थी.
आगामी दिन भयावह रहे. बाबा ख़ुलेआम शराब पीते और माँ को एलानिया आएँ-बाएँ, बुरा-भला सुनाते. कुँजी को लेकर.
कुँजी


“आप बाबा को कुँजी दे क्यों नहीं देतीं?” एक दिन सूर्य-नमस्कार के समय मेरा धैर्यहार खाने लगा.
“तेरे बाबा को पैसे की बहुत भूख़ है. कुँजी मिलते ही मुझे मार डालेंगे.....”
उस दिन, 29 फरवरी, 1956 की सुबह मुझे धूप ने जगाया था, माँ ने नहीं.
धूप को देखकर मैं चौंका था.....
सूर्य-नमस्कार कैसे चूक गया?
माँ कहाँ थीं?
बाहर लपका तो देखा लहूलुहान अवस्था में माँ आँगन में लेटी थीं और सड़क बुहारने वालीमाँ-बेटी पास बैठी आपस में कानाफूसी कर रही थीं.
“क्या बात है?” मैंने पूछा. हमारे घर के अंदर वे पहली बार आई थीं.
“सुबह सड़क पर झाड़ू लगाने आई तो बिटिया हमें वहाँ गिरी पड़ी मिलीं.....” बेटी की माँ बोली.
मैंने माँ को छुआ.
वे पत्थर थीं!
नाना की तरह लोप हो जाने के लिए?
अनजानी एक शिथिलता मेरे शरीर में उतरने लगी.
माँ की बगल में मैं जा लेटा.
अपनी आँखें मूँदकर.
उनके संग लोप हो जाने के लिए.....
“उठिए भैया जी, उठिए वहाँ से,” दोनों माँ-बेटी अपनी जगह से मुझे दुलराई. मुझे छूने का साहस उनमें न था. छुआछूत का अनुपालन कर रही थीं वे.
“क्या बात है?” बाबा की आवाज़ आँगन में उतरी.
“भैया जी बिटिया के पास आ लेटे हैं..... वहाँसे उठ नहीं रहे.....”
“गिरधर गोपाल!” बाबा ने मुझे पुकारा.
मैंने आँखें नहीं खोलीं.
“उठो, गिरधर गोपाल, इधर आओ,” बाबा के स्वर में क्रोध छलका.
“भैया जी को डािए नहीं, बाबूजी,” बेटीकी माँ ने कहा, “वे सदमे में हैं, गहरे सदमे में.....”
“औरअभीकच्ची उम्र है,” बेटी बोली, “नासमझ हैं, कुछ नहीं जानते.....”
“तुममाँ-बेटीयहाँ किस वास्ते रुकी हो?” बाबाने उन्हें डा, “बख्शीश के वास्ते?”
“हम छोटी जात की हैंगी,” बेटीकी माँ नेकहा, “मगर समझ तुमसे बड़ी रखती हैं. मौतकी मर्यादा बख्शीशसेऊपरहै.....”
“हम जा रही हैं,” बेटी ने कहा.
बाबा के हाथ मेरे कन्धों और एड़ियोंसे आ चिपके.
मैंने प्रतिवाद नकिया. मुझसे करते न बना.
अपनी बाँहों में भरकर वे मुझे नानाके कमरे में ले आए.
नानाकेपलंगपर.
मैं वहीं धँस गया.
जभी मुझे नाना की अलमारी के खुलने की आवाज़ आई.
मेरी आँखें भी खुललींऔरबाबा के कुर्ते की ऊपरी जेब पर जम गईं.
जेब से उस रुमाल का सिरा बाहर झाँक रहा था, जिसके एक कोने में माँ इस अलमारी की कुँजी बाँधे रखती थीं. 

दीपक शर्मा 

                     

लेखिका -दीपक शर्मा


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