September 2019

हंस अकेला रोया -ग्रामीण जीवन को सहजता के साथ प्रस्तुत करती कहानियाँ

 “गाँव” एक ऐसा शब्द जिसके जुबान पर आते ही अजीब सी मिठास घुल जाती है | मीलों दूर तक फैले खेत, हवा में झूमती गेहूं की सोने सी पकी बालियाँ, कहीं लहलहाती मटर की छिमियाँ, तो कहीं छोटी –छोटी पत्तियों के बीच से झाँकते टमाटर, भिन्डी और बैगन, कहीं बेल के सहारे छत  पर चढ़ इतराते घिया और कद्दू, दूर –दूर फैले कुछ कच्चे, कुछ पक्के घर, हवा में उड़ती मिटटी की सुवास, और उन सब के बीच लोक संस्कृति और भाषा में रचे बसे सीधे सच्चे लोग | यही तो है हमारा असली रूप, हमारा असली भारत जो जो पाश्चात्य सभ्यता में रचे शहरों में नहीं बम्बा किनारे किसी गाँवों में बसता है |


पर गाँव के इस मनोहारी रूप के अतिरिक्त भी गाँव का एक चेहरा है...जहाँ भयानक आर्थिक संकट से जूझते किसान है, आत्महत्या करते किसान हैं, धर्म और रीतियों के नाम पर लूटते महापात्र, पंडे-पुजारी हैं | शहरीकरण और विकास के नाम पर गाँव की उपजाऊ मिटटी को कंक्रीट के जंगल में बदलते भू माफिया और ईंट के भट्टे | गाँव के लोगों की छोटी –मोटी लड़ाइयाँ, रिश्तों की चालाकियाँ, अपनों की उपेक्षा से जूझते बुजुर्ग | जिन्होंने गाँव  नहीं देखा उनके लिए गाँव केवल खेत-खलिहान और शुद्ध जलवायु तक ही सीमित हैं | लेकिन जिन्होंने देखा है वो वहाँ  के दर्द, राजनीति, निराशा, लड़ाई –झगड़ों और सुलह –सफाई से भी परिचित हैं | बहुत से कथाकार हमें गाँव के इस रूप से परिचित कराते आये हैं | ऐसी ही एक कथाकार है सिनीवाली शर्मा जो गाँव पर कलम चलाती हैं तो पाठक के सामने पूरा ग्रामीण परिवेश अपने असली रूप में खड़ा कर देती हैं | तब पाठक कहानियों को पढ़ता नहीं है जीता है | सिनीवाली जी की जितनी कहानियाँ मैंने पढ़ी हैं उनकी पृष्ठभूमि में गाँव है | वो खुद कहती हैं कि, ‘गाँव उनके हृदय में बसता है |” शायद इसीलिये वो इतनी सहजता से उसे पन्नों पर उकेरती चलती हैं |


अपने कहानी संग्रह “हंस अकेला रोया” में सिनीवाली जी आठ कहानियाँ लेकर आई हैं | कहने की आवश्यकता नहीं कि ये सारी कहानियाँ ग्रामींण पृष्ठभूमि पर आधारित हैं | इस संग्रह के दो संस्करण आ चुके हैं | उम्मीद है कि जल्दी तीसरा संस्करण भी आएगा | तो आइये  बात करते हैं संग्रह की कहानियों की |

हंस अकेला रोया -ग्रामीण जीवन को सहजता के साथ प्रस्तुत करती कहानियाँ


हंस अकेला रोया की लेखिका -सिनीवाली शर्मा




सबसे पहले मैं बात करुँगी उस कहानी की जिसके नाम पर शीर्षक रखा गया है यानि की  “हंस अकेला रोया” की | ये कहानी ‘परिकथा’ में प्रकाशित हुई थी | ये कहानी है एक ऐसे किसान विपिन की, जिसके पिता की मृत्यु हुई है | उसके पिता शिक्षक थे | आस –पास के गाँवों में उनकी बहुत इज्ज़त थी | पेंशन भी मिलती थी | लोगों की नज़र में उनका घर पैसे वाला घर था | लेकिन सिर्फ नज़र में, असलियत तो परिवार ही जानता था | रही सही कसर उनकी बीमारी के इलाज ने पूरी कर दी | कहानी शुरू होती है मृत्यु के घर से | शोक का घर है लेकिन अर्थी से लेकर तेरहवीं में पूरी जमात को खिलाने के लिए लूटने वाले मौजूद हैं | अर्थी तैयार करने वाला, पंडित , महापात्र, फूफा जी यहाँ तक की नाउन, कुम्हार, धोबी सब लूटने को तैयार बैठे हैं | आत्मा के संतोष के नाम पर जीवित प्राणियों के भूखों मरने की नौबत आ जाए तो किसी को परवाह नहीं | जो खाना महीनों एक परिवार खा सकता था वो ज्यादा बन कर फिकने की नौबत आ जाए तो कोई बात नहीं, आत्मा की शांति के नाम पर खेत बिके या जेवर  तो इसमें सोचने की क्या बात है ? ये कहानी मृत्यु के उपरान्त किये जाने वाले पाखंड पर प्रश्न उठाती है पर इतने हौले से प्रहार करती है कि कथाकार कुछ भी सीधे –सीधे नहीं कहती पर पाठक खुद सोचने को विवश होता है |



ऐसा नहीं है कि ये सब काम कुछ कम खर्च में हो जाए इसका कोई प्रावधान नहीं है | पर अपने प्रियजन को खो चुके  दुखी व्यक्ति को अपने स्वार्थ से इस तरह से बातों के जाल में फाँसा जाता है कि ये जानते हुए भी कि उसकी इतनी सामर्थ्य नहीं है, फिर भी व्यक्ति खर्चे के इस जाल में फँसता जाता है | ये सब इमोशनल अत्याचार की श्रेणी में आता है जिसमें सम्मोहन भय या अपराधबोध उत्पन्न करके दूसरे से अपने मन का काम कराया जा सकता है | जरा सोचिये ग्रामीण परिवेश में रहने वाले भोले से दिखने वाले लोग भी इसकी कितनी गहरी पकड़  रहते हैं | एक उदाहरण देखिये ...


“किशोर दा के जाने के बाद  विपिन के माथे पर फिर चिंता घूमने लगीं | दो लाख का इंतजाम तो किसी तरह हो जाएगा | पर और एक लाख कहाँ से आएगा ? सूद पर ...? सूद अभी दो रुपया सैंकड़ा चल रहा है | सूद का दो हज़ार रुपया महीना कहाँ से आएगा...सूद अगर किसी तरह लौटा भी दिया तो मूल कहाँ से लौटा पायेगा |

वहीँ दूसरी तरफ ...

“अंतर्द्वंद के बीच सामने बाबूजी के कमरे पर विपिन की नज़र पड़ी ...किवाड़ खुला है,  सामने उनका बिछावन दिख रहा है |

उसे लगा एक पल में जैसे बाबूजी उदास नज़र आये.. नहीं नहीं बाबूजी मैं भोज करूँगा | जितना मुझसे हो पायेगा | आज नहीं  तो कल दिन जरूर बदलेगा पर अप तो लौट कर नहीं आयेंगे ...हाँ, हाँ करूँगा भोज |”

कथ्य भाषा और शिल्प तीनों ही तरह से ये कहानी बहुत ही प्रभावशाली बन गयी है | एक जरूरी विषय उठाने और उस पर संवेदना जगाती कलम चलने के लिए सिनीवाली जी को बधाई |


“उस पार” संग्रह की पहली कहानी है | इस कहानी बेटियों के मायके पर अधिकार की बात करती है | यहाँ बात केवल सम्पत्ति पर अधिकार की नहीं है (हालांकि वो भी एक जरूरी मुद्दा है-हंस जून 2019 नैहर छूटल  जाई –रश्मि  ) स्नेह पर अधिकार की है | मायके आकर अपने घर –आँगन को देख सकने के अधिकार की है | इस पर लिखते हुए मुझे उत्तर प्रदेश के देहातों में गाया जाने वाला लोकगीत याद आ रहा है ...

“ जो मेरी ननदी प्यार करेगी, जल्दी ब्याह रच दूंगी |
जो मेरी ननदी लड़े-लड़ाई मैके को तरसा दूँगी ||”


लोकगीत लोक भावना के प्रतीक होते हैं | अगर ननद अपने कहे अनुसार चलती है तो ठीक है वर्ना उसको मायका देखने को ही प्रतिबंधित कर देना वो अत्याचार है जो महिलाएं ही महिलाओं पर करती हैं | मंगला भी एक ऐसी ही भाभी है जो अपने ससुर द्वारा अपनी ननद के घर में कुछ पैसे दे देने के कारण कोहराम मचा देती है | बात इतनी बिगड़ती है कि पिता खुद उसे नदी के उस पार ससुराल के गाँव जाने के लिए ऑटो में बिठा देते हैं | मायके से लडकियां बड़े मान के साथ विदा की जाती हैं | पैरों में आलता, हाथों में नयी चूड़ी और कोंछे में पड़े चावल जिसके कुछ दाने आँचल में बंधे रहते हैं | परन्तु यहाँ एक बेटी को इस तरह अपमानित होना पड़ता है | ये कई बेटियों का सच है | शहरों में भले ही बेटियाँ हक की बात करने लगीं हो पर गाँवों में ये बयार अभी नहीं पहुँची है | कहानी पढ़ते हुए आप सुनैना के साथ इतना जुड़ जायेंगे कि उसके दर्द को स्वयं महसूस करेंगे |


विशेष रूप से मैं बात करना चाहूँगी कहानी ‘नियति’की | आजकल इन्सेस्ट पर बहुत बात हो रही है | घर की चारदीवारी के अंदर रिश्तों को कलंकित करते कितने अपराध हो रहे हैं | रिश्तों को बचाए रखने की खातिर कितनी स्त्रियाँ मौन का कफ़न ओढ़ कर जीवन की लाश को घसीटती हैं, ये सच किसी से छुपा नहीं है |  ये कहानी भी ससुर द्वारा बहु से जबरन बनाये गए संबंधों पर आधारित है | कहानी में जिस खूबसूरती और कलात्मकता से इन संबधों का वर्णन किया है उससे आम पाठक हो या साहित्यिक पाठक केवल उसकी संवेदना से जुड़ता है | किसी अन्य तरह का भाव उसके मन में नहीं आता | कहानी है एक ऐसी स्त्री की जिसका पति कालाआजार से पीड़ित है | महीनों से अशक्त पड़े पुत्र की पत्नी यानि अपनी पुत्र वधु पर घर के मुखिया की बुरी नज़र है | एक दिन सास की अनुपस्थिति में वो ...| दर्द, अपमान, घृणा सी पीड़ित वो स्त्री हाँफते हुए उस अपराध को अपने पति को बता देती है | अशक्त बीमार पति सहन नहीं कर पाता और आत्महत्या कर लेता है | श्वेत वस्त्र धारण करने के बाद अभी भी वो उस घर में रहने को विवश है | क्योंकि यही तो हमारी परम्परा है ...”जिस घर में डोली जाती है अर्थी भी वहीँ से जाती है |” पर नियति उसके साथ एक और खेल खेलती है | वो अभागी माँ बनने वाली है | यहाँ पर कहानी नए मोड़ लेती है | किस तरह से लिंग जांच के बाद गर्भ हत्या की बात पर वो स्त्री अपने साथ हुए अत्याचार पर अब मौन ना रह कर सबको बताने का प्रयास करती है | पर क्या उसकी बात सुनी जाती है ? या फिर समाज पीडिता को ही अपराधी बना कर कटघरे में खड़ा कर देता है | ये तो जब आप कहानी पढेंगे तब जान पायेंगे | लेकिन हमारे समाज का सच यही है | हम और आप कितनी बार सुन चुके हैं ...


“ लड़कों से तो भूल हो ही जाती है |”
“ लडकियाँ ऐसे उठती –बैठती, चली फिरती क्यों हैं ?”
“ पुरुष के अंदर तो होता ही जानवर है | सचेत तो लड़कियों को रहना चाहिए |”


ये कहानी उसी की एक कड़ी है, लेकिन ऐसी कड़ी जो एक बार जरूर आपको हिला कर रख देगी | कहानी की सबसे खास बात है उसका शिल्प | एक बोल्ड सब्जेक्ट पर लिखते समय शिल्प को साधना ही कथाकार की सबसे बड़ी विशेषता है | जरा देखिये ...
“पति को सुलाकर धीरे से कमरे के बाहर आकर वो आँगन में खटिया पर लेटी ही थी | पता नहीं कब आँख लग गयी | न जाने रात का वो कौन सा पहर था , जो उसके जीवन में ग्रहण लगा गया |”



“विसर्जन” कहानी यूँ तो गाँव में दशहरे के अवसर पर होने वाले नाटक से शुरू होती है पर असल में यहाँ  से गाँव में कुछ और ही नाटक चलता है | ये कहानी गाँव की प्रतिस्पर्धा, झगड़ों, राजनीति की बयानी है | बात दरअसल ये है कि गाँव में साल भर में मुख्य तीन आयोजन होते हैं | जिसमें गाँव वाले जमकर चंदा देते हैं और बहुत धूम –धाम से मनाते हैं | इसमें से एक है दशहरे  के अवसर पर होने वाला नाटक , दूसरा दीपावली का लक्ष्मी –गणेश पूजन और तीसरा छठ  पूजन | इन आयोजनों को सफल बनाने के लिए  गाँव को तीन टोलों में बाँटा गया है | जिसमें पूर्वी टोला दशहरे पर आयोजित तीन दिवसीय मेला व् नाटक की व्यवस्था करता है | पश्चिमी टोला दीपावली पर लक्ष्मी जी की मूर्ति बिठाने व् पूजा की और गद्दी टोला छठ  पर सूर्यदेव की प्रतिमा पूजन व् घाटों की व्यवस्था का | अब तीन तोले हैं तो उनमें प्रतिस्पर्द्धा भी होगी ही | जिस टोले  का कार्यक्रम सञ्चालन सबसे अच्छा होता है साल भर तक सारे गाँव में उसी का डंका बजता है | ऐसे सुअवसर को भला कौन अपने हाथ से जाने देना चाहेगा | तीनों अपने –अपने तरीके से मेहनत करते हैं | यहीं से शुरू होती है गाँव की राजनीति | किसी लकीर को छोटा करने के लिए उससे बड़ी लकीर खींचनी पड़ती है | लेकिन अगर बड़ी लकीर खींचते ना बने तो ? तो आसान है कि बड़ी लकीर को थोड़ा मिटाने की कोशिश की जाए | गाँव हो या शहर पर्तिस्पर्द्धा के दौर में यही तो होता आया है | दूसरे का काम और नाम खराब कर दो |


तो कहानी में पूर्वी टोला के नाटक को बिगाड़ने का काम पश्चिमी टोले  वाले करते हैं और उनकी लक्ष्मी पूजा में व्यवधान डालने का प्रयास पूर्वी तोले वाले | ऐन लक्ष्मी विसर्जन के दिन तीनों टोलों के मध्य चल रहे इस गुरिल्ला युद्ध का क्या नतीजा निकलता है इसे तो आप कहानी पढ़कर ही जान पायेंगे पर कहानी के साथ –साथ गाँव की भाषा, चालाकियाँ, योजनायें, चतुराई आदि से जिस तरह रूबरू होते हैं उससे गाँव का एक दृश्य आँखों के सामने खींचता जाता है |  

‘घर’ कहानी एक अलग तरीके की कहानी है | जिसमें घर की कल्पना ईंट गारे का बना हुआ ना होकर एक एक ऐसे बुजुर्ग  से की गयी है जिसके पास भी आत्मा है | भले ही वो कुछ बोल नहीं पाता पर हर दर्द को, हर अलगाव को, हर कुटिलता को महसूस करता है | जब –जब घर का बंटवारा होता है वो भी रोता है, तड़पता आहत होता है पर उसे काट-छांट कर उसके अंदर अपने –अपने अलग –अलग घर बना लेने की ख्वाइश में हम उसका दर्द  कहाँ सुन पाते हैं | कहानी का ताना- बाना संवेदना के जिस स्तर पर बुना गया है उसे पढ़कर शायद आप अपने घर की बेआवाज़ चीखें सुन पाएं |

सिकड़ी कहानी गले में पहने जाने वाले जेवर की कहानी है | वर्षों पहले राम किशोर की कनिया की मायके में साँप के काटने से मृत्यु हो गयी थी तब उसने गले में सिकड़ी पहनी हुई थी परन्तु घंटे भर में सिकड़ी उसके गले से गायब हो गयी | तमाम रोने तड़पने  वाले रिश्तों में से आखिर किसने मृत देह से सिकड़ी उतारने का काम किया ? वर्षों बरस कभी दबी –छुपी तो कभी महिला मण्डली में मुखर होकर ये सिकड़ी रहस्य कांड  चलता रहा | आखिर सिकड़ी का हुआ क्या ? सिकड़ी का जो भी हुआ हो पर इस बहाने गाँव की औरतों के बतरस का लाभ पाठक जरूर उठाएंगे | और जब सिकड़ी का रहस्य  खुलेगा तब ...| आँखों देखा हाल गाँव में होने वाले क्रिकेट  मैच का वर्णन है | ये थोड़ी हलकी फुलकी मनोरंजक कहानी है |


“चलिए अब”  ...संग्रह की आखिरी कहानी है और बुजुर्गों के शोषण पर आधारित है | कहते हैं कि बुढापे में पैसा अपने हाथ में जरूर रहना चाहिए वर्ना अपने ही छीछालेदर करने में कोई कसर नहीं रखते | कहानी  एक ऐसे ही बुजुर्ग की है जो पुत्री और पत्नी की मृत्यु के बाद अकेला रह गया है | उसको धनवान समझकर दोनों भाइयों में उसकी जिम्मेदारी लेने की होड़ मचती है | लेकिन जैसे ही ये रहस्य खुलता है कि उसके पास ज्यादा पैसे नहीं हैं | अपमान और उपेक्षा के दंश शुरू हो जाते हैं | कहानी  की एक खास बात मुझे अच्छी लगी जिसमें इस वास्तविकता को दिखाया गया है कि जो लोग घर में बुजुर्ग का शोषण कर रहे हैं वो दूसरों के आने पर भले होने का नाटक करने लगते हैं | परिवार वालों के इस दोहरे चरित्र के कारण उपेक्षित बुजुर्गों का दर्द बाहर वाले या शुभचिंतक  समझ नहीं पाते | हालांकि कि कहानी का अंत सकारात्मक है जो आश्वस्त करता है कि अपनों में न सही किसी में तो संवेदना अभी भी बाकी है | इंसानियत पूरी तरह मरी नहीं है | वैसे ये सब्जेक्ट कई बार उठाया गया है | पर इसे बार-बार उठाये जाने की जरूरत है | क्योंकि मशीन में बदलते मानव को ऐसी कहानियाँ दिशा दिखाती हैं | विवेक मिश्रा जी की ‘एल्बम’, प्रज्ञा जी की ‘उलझी यादों के रेशम’ और ‘चले अब’ का विषय बुजुर्गों की समस्या ही है | परन्तु सबका प्रस्तुतीकरण अलग है जो उन्हें खास बनाता है |



अंत में यही कहूँगी कि गाँव के जीवन को अपनी कलम से पन्नों में उतारने में सिनीवाली जी पूर्णतया सफल  हुई हैं | आजकल लेखकों द्वारा आत्मकथ्य  लिखने का चलन है | इधर कई पुस्तकों में उसे पढ़कर मेरी आदत सी बन गयी है कि लेखक अपनी किताब के बारेमें क्या कहना  चाहता है | उसकी कमी मुझे थोड़ी से खली | आशा है सिनीवाली  जी अगले संस्करण में आत्मकथ्य भी शामिल करेंगी |  मेरे पास इस पुस्तक का मलयज प्रकाशन से प्रकाशित दूसरा संस्करण है | जिसके  कवर पेज पर बना दुखी किसान और मंडराती चील शीर्षक को सार्थक कर रहे हैं | 96 पेज के इस संग्रह में संपादन त्रुटी रहित है |

अगर आप सशक्त कथ्य –शिल्प के साथ गाँव को पुन: जीना चाहते हैं तो ये संग्रह आपके लिए मुफीद है |

हंस अकेला रोया –कहानी संग्रह
लेखिका-सिनीवाली शर्मा
प्रकाशक – मलयज प्रकाशन
पृष्ठ -96
मूल्य -100 रूपये (पेपर बैक )
पुस्तक मंगवाने के लिए –
मलयज प्रकाशन
शालीमार गार्डन एक्स्टेंशन -1
गाजियाबाद -201005(उत्तर प्रदेश )


वंदना बाजपेयी 
                       
लेखिका -वंदना बाजपेयी






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फिल्म ड्रीम गर्ल के बहाने   -एक तिलिस्म है पूजा





ड्रीम गर्ल यानि स्वप्न सुंदरी | बरसों पहले इसी नाम से एक फिल्म आई थी जिसमें हेमामालिनी ने अभिनय किया था | इस फिल्म में उनकी खूबसूरती और अभिनय का जादू कुछ ऐसा चला कि कि दर्शक दीवाने हो गए | उसके बाद  हेमा मालिनी को ड्रीम गर्ल टाइटल  से ऐसा नवाजा गया कि आज तक जब ड्रीम गर्ल शब्द का प्रयोग कोई करता है तो सबसे पहले हेमा मालिनी का चेहरा ही याद आता है | 2019 में फिर से एक फिल्म उसी नाम ड्रीम गर्ल से दर्शकों के सामने आई है | ये फिल्म हेमामालिनी की ख़ूबसूरती को मिले खिताब ड्रीम गर्ल को तो टक्कर नहीं देती लेकिन कॉल सेंटर  इंडस्ट्री के एक हिस्से द्वारा रचाए गए ड्रीम गर्ल के तिलिस्म पर अपनी बात रखती है | फिल्म कॉमेडी के माध्यम से हँसाते -हँसाते भी अकेलेपन से जूझते समाज एक गंभीर मसला उठाती है और गहराई से सोचने पर विवश करती है | तो आइये बात करते हैं पूजा के बारे में जो महज एक नाम नहीं एक तिलिस्म है ....


फिल्म ड्रीम गर्ल के बहाने -एक तिलिस्म है पूजा 


फिल्म -ड्रीम गर्ल
बैनर -बालाजी टेलीफिल्म्स लिमिटेड 
निर्माता -एकता कपूर , शोभा कपूर 
निर्देशक -राजा शांडिल्य 
संगीत -मीता ब्रदर्स 
कलाकार - आयुष्मान खुराना , अनू कपूर , नुसरत भरूच , मनजोत सिंह , विजय राय 
समय -दो घंटे बारह मिनट 29 सेकंड 


 २०१९ की 'ड्रीम गर्ल का निर्देशन किया है राजा शांडिल्य ने | वो 'कपिल शर्मा शो' में भी काम कर चुके हैं | कपिल शर्मा शो एक ऐसा शो है जहाँ पुरुष पात्र महिला भेष में आते हैं | एक अनुमान ये है कि उनको फिल्म का आइडिया वहीँ से मिला | हालांकि उनका कहना है कि ये आइडिया उन्हें अपने एक दोस्त से मिला जो महिलाओं की आवाज़ में  फोन पर बातें किया करता था |



फिल्म की कहानी शुरू होती है  एक माध्यम वर्गीय परिवार से जिसमें विधुर अनू कपूर अपने बेटे आयुष्मान खुराना के साथ रहता है | अनू कपूर की एक छोटी सी दुकान है | जिसके  सहारे ही उसका घर चलता है | पत्नी के बहुत साल पहले उसे छोड़ कर ईश्वर के घर चले जाने से उसकी जिन्दगी में एक खालीपन है और साथ में हैं बहुत सारे लोन | यहाँ तक कि उसका घर भी गिरवी रखा हुआ है | ऐसे में उसे आशा और उम्मीद की सुई अपने बेटे पर टिकी हुई है जो एक पढ़ा -लिखा बेरोजगार है | और देश के लाखों बेरोजगारों की तरह अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद बार -बार प्रतियोगी परीक्षाएं देता है , इंटरव्यू देता है पर नतीजा शिफर ही रहता है | ऐसे में उसके पॉकेट मनी का सहारा है उसकी आवाज़ ....जी हाँ उसकी आवाज़ की ये खासियत है कि वो  महिला  या कहें कि महिलाओं की आवाज़ में भी बात कर सकता है | इसी कारण उसे मुहल्ले में होने वाले राम लीला या जन्माष्टमी आयोजन में सीता या राधा का रोल मिल जाता है | जिससे उसे कुछ पैसे तो मिलते हीं हैं , कुछ बख्शीश भी मिल जाती है |  पर इस उम्र में जब उसे अपने भावी परिवार व पिता की जिम्मेदारियों को अपने कन्धों पर लेना है ये नाकाफी है | और यही उसकी चिंता का सबब भी है |


ऐसे में एक इंटरव्यू  से रिजेक्ट होकर वो  बस से घर लौट रहा होता है तो उसकी नज़र एक विज्ञापन पर पड़ती है | जिसमें लिखा होता है कि हर महीने 70, 000 कमायें |  धन और नौकरी का लोभ उसे वहां खींच ले जाता है और उसके सामने आता है एक ऐसी इंडस्ट्री का सच जिसके बारे में उसे पता नहीं था | "बातें ही बातें , प्यार भरी बाते , या फिर दोस्ती " जैसे विज्ञापन हम भी अक्सर देख कर आगे बढ़ जाते हैं | पर यहाँ हम इसकी असलियत से रूबरू होते हैं | जहाँ काम करने वाली लड़कियों को प्रेम भरी या कस्टमर के इंटरेस्ट की बातें कर उनका फोन का बिल बढ़ाना होता है | यही बढ़ा हुआ बिल कॉल सेंटर्स की कमाई  का जरिया है | इस इंडस्ट्री में बहुत लडकियाँ काम कर रही हैं | ये सही है या गलत ...पर ये है | एक लड़की पूजा के ना आने से मालिक परेशान  है | ऐसे में आयुष्मान उसका फोन अटेंड कर स्त्री की आवाज़ में बातें करने का अपना हुनर दिखाता है | मालिक तुरंत उसे काम पर रख लेता है |


यहाँ से शुरू होती है आयुष्मान की दोहरी जिन्दगी | एक तरफ वो पिता व् परिचितों से  झूठ बोल कर कि वो कॉलगेट कम्पनी में काम करता है पूजा बन कर कॉल सेंटर में काम करता है दूसरे वो उस पैसे से तमाम लोंन  चुकाता  है और घर की हालत सुधरती है |  इधर पूजा के दीवानों की संख्या बढ़ने लगती है | बूढ़े से लेकर कम उम्र नौजवान सब उससे बात करना चाहते हैं और उधर आयुष्मान की निजी जिन्दगी की उलझने | यानि इन तमाम स्तिथियों में पहले हास्य पैदा होता है फिर कन्फ्यूजन | और अंत में कन्फ्यूजन तो खत्म होना ही है | होता है ..पर एक खूबसूरत नोट के साथ | यहीं से हम शुरू करेंगे एक हास्य फिल्म की गंभीर चर्चा |



" आज लोग फॅमिली फोटोग्राफ नहीं खींचते | ज्यादातर लोगों के फोन सेल्फी से भरे होते है | "


                                     ये समस्या है अकेलेपन की | आज रिश्तों -नातों , मित्रों , फेसबुक इन्स्टाग्राम के होने बावजूद भी हर आदमी तन्हाँ है | उसे एक दोस्त चाहिए ...ऐसा दोस्त जिसके आगे वो अपने दिल की हर बात कह सके | आखिर ऐसा क्यों है कि हम हमें अपनों की भीड़ में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिलता जिसके सामने हम पारदर्शी रह सकें | उत्तर आसान है ...हमें नकारे जाने का डर होता है | हमारे अपने हमें ऐसे रूप में देखना पसंद करते हैं जो उन्हें सही लगता है | इनके -उनके सही में हमारा असली चेहरा कहीं खो जाता है | जिसका असली चेहरा जितना खो जाता है वो अपनों की भीड़ में उतना ही अकेला होगा और उसको पूजा की जरूरत सबसे ज्यादा होगी |


लेकिन क्या सिर्फ हमें नकारे जाने का भय होता है या हम भी दूसरों को नकारते चलते हैं ...उत्तर हम सब जानते हैं | बहुत सी चीजें हम जान कर भी नहीं मानना चाहते हैं | औरतों के बारे में तो खास बात ये रही है कि उसको त्याग की मूर्ति बना कर रख दिया गया | उसके अंदर के इंसान की सहज अभिव्यक्ति मार दी गयी | फेसबुक फ्रेंड के उन्मुक्त विचारों पर अपनी सहमति की मोहर लगा कर सबसे झगड पड़ने वाले पुरुष ( क )की अपनी पत्नी घर के चार सदस्यों के बीच में भी घूँघट में रहती है | तो असली (क ) कौन है ? फेसबुक वाला , या घर में रहने वाला | क्या आप बता सकते हैं ? क्या वो खुद बता सकता है ? एकाकी जीवन व्यतीत करने वाले आयुष्मान खुराना (फिल्म में ) के पिता अन्नू कपूर के मन में जीवन साथी की कामना है पर वो ये बात अपने बेटे को नहीं बता पाते | अलबत्ता एक पूजा से फोन पर बतिया जरूर लेते हैं | क्या वो अपने बेटे से यह बात कर लेते तो बेटा उनका अकेलापन समझ कर भी मना  कर देता ? जब आयुष्मान फिल्म की नायिका को बताते हैं कि वो ये काम लोन भरने की मजबूरी में करते रहे | तो बात उसकी समझ में आ जाती है | पर सारी फिल्म इस छिपाने को लेकर ही आगे बढती है | गलत तो पहले  बताना भी नहीं था |



बहुत समय पहले मैंने इसी विषय पर एक कहानी लिखी थी ..."पुरूस्कार ' जिसमें पत्नी अपने पति से अपना लेखन छिपाने के लिए काल्पनिक नाम से लिखती है | क्योंकि उसके पति को लिखना नहीं पसंद है | आखिरकार दो रूपों में से उसे एक रूप चुनना पड़ता है | लेकिन तब तक भयंकर पीड़ा और घुटन से वो गुज़रती है | हम सब सच कहने का साहस इसलिए नहीं कर पाते कि हमारे अपनों से हम दूर ना हों लेकिन सच्चाई में हम बहुत ज्यादा दूर हो जाते हैं |


जो लोग आध्यात्म में जाते हैं उन्हें सबसे पहले यही सिखाया जाता है कि अपने प्रति सच्चे हो | जब तक अपने प्रति सच्चे नहीं होंगे तो किसी के प्रति सच्चे नहीं हो सकते | उस झूठ उस दिखावे से भरे अकेलेपन में हमेशा एक पूजा का स्कोप बना रहेगा | पूजा एक तिलिस्म रचती है | झूठ का तिलिस्म ...एक ऐसा शख्स जो आपके दिल की हर बात सुन लेता है | हर समय जब आप चाहें वो उपलब्द्ध है | जैसा आप  चाहते हैं वैसा ही आप से बात करता है | पर पूजा कभी मिल नहीं सकती क्योंकि  पूजा को बातें करने के पैसे मिल रहे हैं | सामने आते ही ये तिलिस्म टूट जाएगा | उसकी अपेक्षाएं होंगी ,उम्मीदें होंगी और हमारी अपनी | ये रिश्ता चल पायेगा ?


पूजा के तिलिस्म पर चलती इस इंडस्ट्री को समझना तो हमें ही होगा |
अकेलेपन से जूझना भी हमें ही होगा |
और खुद से दोस्ती करने का हुनर भी हमें ही सीखना होगा |


जब हम खुद को उस रूप में स्वीकार कर पायेंगे जैसे हम हैं तो दूसरों को भी कर पायेंगे |



वापस फिल्म पर आते हैं | अभिनय की दृष्टि से आयुष्मान खुराना व् अन्नू कपूर छाए रहे | नायिका के पास ज्यादा करने को कुछ था नहीं | कॉमेडी टाइमिंग बहुत अच्छी थी | काफी संवाद द्विअर्थी थे | सब्जेक्ट के हिसाब से वो चल गए | निर्देशन और सिनेमैटोग्राफी ने प्रभावित किया | फिल्म में मथुरा की बोली का असर मिठास से भर गया | इंटरवेल के बाद फिल्म थोड़ी ढीली हो जाती है | उसे और प्रभावशाली बनाया जा सकता था |

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श्राद्ध की पूड़ी




श्राद्ध  पक्ष यानी अपने परिवार के बुजुर्गों के प्रति सम्मान प्रगट करने का समय | ये सम्मान जरूरी भी है और करना भी चाहिए | पर इसमें कई बार श्रद्धा के स्थान पर कई बार भय हावी हो जाता है | भय तब होता है जब जीवित माता -पिता की सेवा नहीं की हो | श्राद्ध पक्ष में श्रद्धा के साथ -साथ जो भय रहता है ये कहानी उसी पर है |

श्राद्ध की पूड़ी 



निराश-हताश बशेसरी  ने आसमान की ओर देखा | बादल आसमान में मढ़े  हुए थे | बरस नहीं रहे थे बस घुमड़ रहे थे | उसके मन के आसमान में भी तो ऐसे ही बादलों के बादल घुमड़ रहे थे , पर बरस नहीं रहे थे | विचारों को परे हटाकर उसने हमेशा की तरह लेटे -लेटे पहले धरती मैया के पैर छू कर,"घर -द्वार, परिवार  सबहीं की रक्षा करियो धरती मैया " कहते हुए  दाहिना पैर जमीन पर रखा | अम्मा ने ऐसा ही सिखाया था उसको | एक आदत सी बना ली है | पाँच -छ : बरस की रही होगी तब से धरती मैया के पाँव छू कर ही बिस्तरा छोड़ती है |


पर आज उठते समय चिंता की लकीरे उसके माथे पर साफ़ -साफ़ दिखाई दे रहीं थी | आज तो हनाय कर  ही रसोई चढ़ेगी | रामनाथ के बाबूजी का श्राद्ध जो है | पाँच  बरस हो गए उन्हें परलोक गए हुए |  पर एक खालीपन का अहसास आज भी रहता है | श्राद्ध पक्ष  लगते ही जैसे सुई से एक हुक सी  कलेजे में पिरो देता है | पिछले साल तक तो सारा परिवार मिल कर ही श्राद्ध करता था | पर अब तो बड़ी बहु अलग्ग रहने लगी है | कितना कोहराम मचा था तब | मझले गोविन्द से अपनी  बहन के ब्याह की जिद ठाने है | अब गोविन्द भी कोई नन्हा लला है जो उसकी हर कही माने | रहता भी कौन सा उसके नगीच है | सीमापुरी में रहता है | वहीँ डिराइवरी का काम मिला है | रोज तो मिलना होता नहीं | मेट्रो से आने -जाने में ही साठ रुपैया खर्चा हो जाता है | दिन भर की भाग -दौड़ सो अलग | ऐसे में कैसे समझाए | फिर आज -कल्ल के लरिका-बच्चा मानत हैं क्या बुजर्गन की | अब उसकी राजी नहीं है तो वो बुढ़िया क्या करे ? पर बहु को तो उसी में दोष नज़र आता है | जब जी आये सुना देती है | सात पुरखें तार देती है |


यूँ तो सास -बहु की बोलचाल बंद ही रहती है पर मामला श्राद्ध का है | मालिक की आत्मा को तकलीफ ना होवे ई कारण कल ही तो उसके द्वारे जा कर कह आई थी कि,  "कल रामनाथ के बाबूजी का श्राद्ध है , घरे आ जइयो, दो पूड़ी तुम भी डाल दियो तेल में | रामनाथ तो करिए ही पर रामधुन  बड़का है , श्राद्ध  कोई न्यारे -न्यारे थोड़ी ही करत है | आखिर बाबूजी कौरा तो सबको खिलाये रहे | पर बहु ने ना सुनी तो ना सुनी | घर आई सास को पानी को भी ना पूछा | मुँह लटका के बशेसरी अपने घर चली आई |


बशेसरी ने स्नान कर रसोई बनाना शुरू किया | खीर,  पूड़ी , दो तरह की तरकारी, पापड़ ...जब से वो और रामनाथ दुई जने रह गए हैं तब से कुछ ठीक से बना ही नहीं | एक टेम का बना कर दोनों टेम  का चला लेती है | हाँ रामनाथ की चढ़ती उम्र के कारण कभी चटपटा खाने का जी करता है तो ठेले पर खा लेता है | उसका तो खाने से जैसे जी ही रूसा गया है | खैर  विधि-विधान से रामनाथ के हाथों श्रद्ध कराया | पंडित को भी जिमाया | सुबह से दो बार रामधुन की बहु को भी टेर आई | पर वो नहीं आई |


इंतज़ार करते -करते भोर से साँझ हो आई | पोते-पोती के लिए मन में पीर उठने लगी | बाबा को कितना लाड़ करते थे | अब महतारी के आगे जुबान ना खोल पा रहे होंगे | बहुत देर उहापोह में रहने के बाद उसने फैसला कर लिया कि वो खुद ही दे आएगी  उनके घर | न्यारे हो गए तो क्या ? हैं तो इसी घर का हिस्सा |  बड़े-बड़े डोंगों में तरकारी और खीर भर ली | एक बड़े से थैले में पूरियाँ भर ली | खुद के लिए भी नहीं बचायी | रामनाथ तो सुबह खा ही चुका  था | लरिका -बच्चा खायेंगे | इसी में घर की नेमत है | दिन भर की प्रतीक्षारत आँखें बरस ही पड़ीं आखिरकार |


जाते -जाते सोचती जा रही थी कि कि बच्चों के हाथ में दस -दस रूपये भी धर देगी | खुश हो जायेंगे | दादी -दादी कह कर चिपट पड़ेंगे | जाकर दरवाजे के बाहर से ही आवाज लगायी, " रामधुन, लला , तनिक सुनो तो ..." रामधुन ने तो ना सुनी | बहु चंडी का रूप धर कर अवतरित हो गयी |

"काहे-काहे चिल्ला रही हो |"

" वो श्राद्ध की पूड़ी देने आये हैं |"

" ले जाओ, हम ना खइबे | लरिका-बच्चा भी न खइबे | बहु तो मानी  नहीं हमें | तभी तो हमारी बहिनी से गोविन्द का ब्याह नहीं कराय रही हो | अब जब तक हमरी  बहिनी ई घर में ना आ जाए हमहूँ कुछ ना खइबे तुम्हार घर का | ना श्राद्ध, न प्रशाद | कह कर दरवाजे के दोनों कपाट भेड़ लिए | बंद होते कपाटों से पहले उसने कोने में खड़े दोनों बच्चे देख लिए थे | महतारी के डर से आये नहीं | बुढ़िया की आँखें भर आयीं | पल्लू में सारी  लानते -मलालते समेटते हुए घर आ आई |


बहुत देर तक नींद ने उससे दूरी बनाये रखी | पुराने दिनों  की यादें सताती रहीं | क्या दिन थे वो जब मालिक का हुकुम चलता था | मजाल है कि बहु पलट कर कुछ कह सके | आज मालिक होते तो बहु की हिम्मत ना होती इतना  कहने की | सोचते -सोचते पलकें झपकी ही थीं कि किसी  द्वार खटखटाने की आवाज़ आने लगी | आँखें मलती हुई उठी तो सामे रामधुन खड़ा था |

" अम्मा, बाबूजी के श्राद्ध की पूड़ी दे दो, जल्दी |"

"ऐ टाइम पर ? का बात का भई है ?"उसने आश्चर्य से आँखें फाड़कर पूछा |

" बाबूजी ने तुम्हारी बहु को ऐंठ दिया है | श्राद्ध की पूड़ी नहीं ली ना उसने | कल शाम से ही पेट में ना जाने कैसी पीर हो रही है | ठीक होने का नाम नहीं ले रही है | अस्पताल में भर्ती है | कितनी तो जाँचे करा लीं | पर दर्द कम होने का नाम ही नहीं ले रहा | अधमरी हुई जा रही है | अभी तनिक होश आया तो पाँव पड़  कर बोली अम्मा से पूड़ी ले आओ | वर्ना बाबूजी हमें साथ ही ले चलिए |"कहकर रामधुन रूआसा ही गया |

" सोच का रही हो अम्मा, पूड़ी दो |"

बसेशरी घबरा गयी | "क्षमा करो मालिक, बहु से गलती हो गयी | क्षमा करो | अब कभी तुम्हार निरादर ना करिहै" आँखों में आँसू भर कर हाथ जोड़ -जोड़ कर वो थैले में पूड़ी भरने लगी  |
उसने पूड़ी थैले में लीं और बोली,  "हमहूँ चलिहैं |"

"ठीक है |" रामधुन ने सहमती जताई |


अस्पताल पहुँचते ही देखा कि बहु का दर्द से बुरा हाल है | अस्पताल के बिस्तर पर इधर -उधर करवट बदल रही है | बसेशरी और रामधुन को देख कर वहीँ से चिल्लाई , "अम्मा जल्दी पूड़ी दो | क्षमा करो हमका, बाबूजी ऐठे दे रहे हैं | "


बसेशरी ने पूड़ी निकाल कर दी | बहु झट-झट खाने लगी | चार कौरे में दो पूड़ी गटक गयी |  पानी पी कर लेटी  तो चेहरे पर शांति का भाव था |

थोड़ी देर में दर्द ऐसे गायब हुआ जिसे गधे के सर से सींग |

बसेशरी बहुत खुश थी | मालिक के द्वारा बहु को दंड देने से भी और पूड़ी खा कर बहु के ठीक हो जाने से भी | ख़ुशी के मारे बसेशरी डॉक्टर को बताने गयी | ताकि जल्दी से बहु को घर ले जा सके | जब जाकर डॉक्टर को अपने मालिक के द्वारा बहू को श्राद्ध की पूड़ी ना खाने पर ऐंठ देने की बात बताई तो डॉक्टर के चेहरे पर मुस्कान फ़ैल गयी |

"अम्मा, तुम्हारी बहु को भय का दर्द था | तभी सब रिपोर्ट नार्मल आ रहीं थी | उसे लग रहा था कि पूड़ी लौटा कर उसने कुछ गलत किया है | तभी उसके ससुर की आत्मा उसे दंड दे रही है | पूड़ी खा कर वहम दूर हुआ और दर्द भी दूर |"


डॉक्टर की बात सुन कर बसेशरी जैसे  आसमान से जमीन पर आ गयी |  इतनी देर में उसने क्या कुछ नहीं सोच लिया था | कैसे वो मालिक से बहु को ऐठा कर न्यारा चूल्हा , साझा करवा लेगी | कैसे बहु को अपनी बहिन के साथ गोविन्द की शादी से मन कर देगी | और भी ना जाने क्या -क्या |पर अब ...अब तो एक क्षण में उसका स्वप्न संसार  फिर से हिल गया |



 "डॉक्टर साहब बहु को ना बताइयेगा | " बसेशरी ने हाथ जोड़ कर कहा और बहु की तरफ चल दी |


बहु के बालों पर  हाथ फेर -फेर कर कहने लगी, " देखा अभी तो श्राद्ध की पूड़ी का निरादर करे पर बाबूजी छोड़ दिए हैं पर आइन्दा से निरादर ना करना , वर्ना ..."


वंदना बाजपेयी

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डॉटर्स डे-जिनके जन्म पर थाली नहीं पीटी जाती



डॉटर्स डे, बहुत ही खूबसूरत शब्द है | पर हमारे देश में जहाँ बेटियाँ गर्भ में मार दी जाती हों | उनके जन्म पर उदासी छा जाती हो | घर में भेदभाव होता हो ...वहां डॉटर्स डे सिर्फ मनाने का त्यौहार नहीं है बल्कि संकल्प ले ने का दिन है कि हम अपनी बेटियों को  समान अधिकार दिलवाएंगे | 


डॉटर्स डे-जिनके जन्म पर थाली नहीं पीटी जाती 


जानती हूँ,
आज डॉटर्स डे है
सब दे रहे है बेटियों को जन्म की बधाइयाँ ,
ऐसे में ,
एक बधाई तो तुम्हे भी बनती है
मेरी प्यारी बेटी,
ये जानते हुए भी क़ि तुम्हारे जन्म पर
नहीं पीटी गयीं थी थालियाँ ,
न ही मनी थी छठी या बरहीं,
सब के बीच घोषित कर दी गयी थी मैं,
पुत्री जन्म की अपराधिनी,
जिसने ध्यान नहीं रखा था,
चढ़ते -उतरते दिनों का,
खासकर चौदहवें दिन का,
कितना समझाया गया था,फिर भी...
सबके उदास लटके चेहरे,और कहे -अनकहे ताने
पड़ोसियों के व्यंग -बाण,
“सुना है पहलौटी कि लड़की होती है अशुभ”
के बीच दबे हुए मेरे  प्रश्न
“क्या पहली बेटी के बाद दूसरी हो जाती है शुभ?”
जानती थी उत्तर,फिर भी...
जैसे जानती हूँ क़ि “दुर्गा आयी है,लक्ष्मी आयी है”
के बाहरी उद्घोष के बीच में
घर की चारदीवारी के अंदर,बड़ी ख़ूबसूरती से दबा दी जाती है
दोषी घोषित की गयी माँ की सिसकियाँ,
किससे शिकायत करती
सब अपने ही तो थे,
अपने ही तो हैं,फिर भी...
उस समय दबा कर उपेक्षा की वेदना को 
मैं अकेली ही सही
खड़ी हुई थी तुम्हारे साथ,दी थी खुद को बधाई
तुम्हारे जन्म की 
और तुम्हारी वजह से ही,
समझी हूँ दर्द नकारे जाने का
इसलिए  
आज मैं खड़ी हूँ
उन लाखों बेटियों के साथ
जिनके जन्म पर थाली नहीं पीटी जाती

वंदना बाजपेयी

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मन्नत टेलर्स –मानवीय संवेदनाओं पर सूक्ष्म पकड़

 आज का दौर बाज़ारों का दौर है | ये केवल अपनी जगह सीमित नहीं है | ये बाज़ार हमारे घर तक आ गए हैं | ये हमें कहीं भी पकड़ लेते हैं | हम सब इसकी जद में है | टी.वी, रेडियो, मोबाइल स्क्रीन से आँख हटा कर जरा दूर देखने की कोशिश करें तो किसी ना किसी होर्डिंग पर कुछ ना कुछ खरीदने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है | आज हमारे पास पहले से ज्यादा कपड़े है, महंगे मोबाइल हैं, गाड़ियाँ हैं, लोन पर लिए ही सही पर अपने फ़्लैट हैं | हम सब अपने बढ़ते जीवन स्तर की झूठी शान से खुश हैं | उपभोक्तावाद की अंधी दौड़ में भागते हुए हमें कहाँ ध्यान जाता है गिरते हुए मानव मूल्यों का, टूटते रिश्तों का और आपसी सौहार्द का | ये सब लिखते हुए मुझे याद आ रहा है महान वैज्ञानिक  न्यूटन का तीसरा नियम...क्रिया की प्रतिक्रिया जरूर होती है | ठीक उतनी ही लेकिन विपरीत दिशा में | आप सोच रहे होंगे कि विज्ञान का यहाँ क्या काम है | लेकिन भौतिकी का  ये नियम उपभोक्तावाद की संस्कृति में भी मौजूद है | जरा गौर कर के देखिएगा...बाज़ार से हमारी दूरी जितनी घट रही है, आपसी रिश्तों की दूरी उतनी ही बढ़ रही है | ठीक उतनी ही लेकिन विपरीत दिशा में |

“उसकी साड़ी मेरी साड़ी से सफ़ेद कैसे” से आपसी रिश्तों में इर्ष्या के बीज बोती इस उपभोक्तावादी संस्कृति का असर सिर्फ इतना ही नहीं है | “मेरे घर के बस दस कदम की दूरी पर मॉल है”, “मेट्रो तो मेरे घर के बिलकुल पास से गुज़रती है”, “हम तो सब्जियाँ  भी अब ऐ.सी . मार्किट से ही खरीदते हैं...भाई कौन जाए सब्जी मंडी में झोला उठाकर पसीने बहता हुआ” जब हम बड़ी शान से ऐसे वाक्य कहते हुए विकास का जय घोष करते हैं तो हम बड़ी ही बेरहमी में उन लोगों की पीड़ा के स्वरों को दबा देते हैं जिनकी रोजी –रोटी छिन गयी है | जिनके बच्चों की पढाई छूट गयी है | जिनकी झुगगियाँ तोड़ दी गयी हैं | इस संवेदनहीनता में हम सब शामिल हैं | बाजारवाद की भेंट चढ़े उन्हीं मानवीय रिश्तों, जीवन मूल्यों और रोजी-रोटी से महरूम किये गए दबे कुचले लोगों के प्रति संवेदना जगाने के लिए प्रज्ञा जी लेकर आई है “मन्नत टेलर्स” | इस कहानी संग्रह की हर कहानी कहीं ना कहीं आपको अशांत करेगी, सोचने पर विवश करेगी, और विवश करेंगी उन प्रश्नों के उत्तर खोजने को भी जो आपके मन में प्रज्ञा जी हलके से रोप देती हैं |


यूँ तो बहुत तरह की कहानियाँ लिखी जाती है पर साहित्य का उद्देश्य ही अपने समय को रेखांकित करना है, संवेदना जगाना और समाधान ढूँढने को प्रेरित करना है | आज जब महिला लेखिकाओं पर लोग आरोप लगाते हैं कि वो केवल स्त्री संबंधित  मुद्दों पर ही लिखती है तो मुझे लगता है कि ‘मन्नत टेलर्स’ जैसे कथासंग्रह उन सारे आरोपों का जवाब है | जहाँ ना सिर्फ बाज़ारवाद  पर सूक्ष्म पकड है बल्कि उसके दुष्प्रभावों पर संवेदना जगाने की ईमानदार कोशिश भी | जैसा की अपने आत्मकथ्य में प्रज्ञा जी कहती हैं कि, “ जब धरती बनी तो उस पर रास्ते नहीं थे| पर जब बहुत सारे लोग एक ही दिशा की ओर चलते चले गए तो रास्ते बन गए | समाज की कठोर परिस्थियों और निराशाओं के अंधेरों की चट्टान के नीचे मुझे हमेशा एक नए पौधे की हरकत दिखाई दी है | ये कहानियाँ साधारण से दिखने वाले लोगों के असाधारण जीवट की कहानियाँ हैं |”

मन्नत टेलर्स –मानवीय संवेदनाओं पर सूक्ष्म पकड़ 

लेखिका -प्रज्ञा

लो बजट’ इस संग्रह की पहली कहानी है | ये कहानी है प्रखर की जो अपने दोस्त संभव के साथ दिल्ली में एक ‘लो बजट’ का फ़्लैट ढूढ़ रहा है | प्रखर अपनी पत्नी व् दो बच्चों के साथ अभी किराए के मकान में रहता है | उसका भी सपना वही है जो किराए के मकानों में रहने वाले लाखों लोगों का होता है ...एक अपना घर हो, छोटा ही सही लेकिन जिसकी दीवारें अपनी हों और अपनी हो उस की सुवास | और फिर फ़्लैट अपने होने से  हर महीने दिए जाने वाले किराए से भी छुट्टी मिलती है |  कहानी की शुरुआत फ़्लैट ढूँढने में होने वाली परेशानियों से होती है | आये दिन प्रॉपर्टी डीलर फ़्लैट देखने के लिए बुला लेता है | संडे की एक सुकून भरी छुट्टी बर्बाद होती है | फिर भी फ़्लैट पसंद नहीं आता | किसी की फर्श चीकट है तो किसी के किचन का स्लैब बहुत नीचा और किसी की अलमारियाँ दीमकों का राजमहल बनी हुई हैं | घर ढूँढने की शुरूआती परेशानियों के बाद  जैसे-जैसे कहानी आगे बढती है भू माफियाओं के चहरे बेनकाब करती चलती है | किस तरह से उपभोक्ताओं का शोषण हो रहा है | किस तरह से तंग गलियों में ऊँचे –ऊँचे फ़्लैट बन कर महंगे दामों में बेचे जा रहे हैं | किस तरह से बिना नक्शा पास कराये फ्लैस जब तोड़े जाते हैं तो नुकसान सिर्फ और सिर्फ खरीदार को होता है | एक उदहारण देखिये ...

“ आप क्या समझ रहे हैं मकान खरीदने को ? इतना आसान है क्या ? फ़्लैट पसंद आ भी गया तो उसके साथ रजिस्ट्री की कीमत जोड़ो | हमारे दो परसेंट कमीशन को जोड़ो | फिर कागज़ बनवाने के साथ अथॉरिटी से कागज़ निकलवाने का खर्चा जोड़ो | और फिर असली कीमत तो तय होगी मालिक के साथ टेबल पर |”


जिन्होंने  भी फ़्लैट खरीदे  हैं या प्रयास किया है वो सब इस दौर से गुज़रे होंगे | कहानी यहीं नहीं रूकती | उसका फैलाव उन खेतों तक पहुँचता है जिन पर भू माफियाओं की नज़र है | जहाँ किसान की मजबूरी खरीदी जा रही है या उन्हें बड़े सपने बेच कर कृषि योग्य भूमि खरीदी जा रही है | बड़ी ही निर्ममता से हरी फसलों से लदे खेतों को कंक्रीट के जंगलों में बदला जा रहा है | कृषि योग्य भूमि की कमी हो रही है | किसान आत्महत्या कर रहे हैं | पर इसकी चिंता किसे है कि उपजाऊ जमीन और अन्नदाता को मृत्यु की ओर धकेल कर वो भविष्य में खायेंगे क्या ? क्या ये ईट गारा उनका पेट भर सकेगा ? दरअसल  अपना घर का सपना है ही इतना हसीन की हम सब उसके तिलस्म में बंधे दौड़ते चले जा रहे हैं | जो कल होगा उसे कल सोचे कि जगह क्या ये जरूरी नहीं है कि हम उस पर आज सोचे और उस भयावह कल से बच सकें | प्रखर का ‘लो बजट’ घर का सपना पूरा हुआ या नहीं ये तो आपको कहानी पढ़ कर ही पता चलेगा | पर इस कहानी को पढने के बाद आप घर का सपना देखते लाखों लोगों की समस्याओं, सरकारी तंत्र और प्रॉपर्टी डीलर्स की मिली भगत और कृषियोग्य भूमि पर भूमाफियाओं की लपलपाती जीभ के सत्य से अवश्य रूबरू होंगे |



 ‘मन्नत टेलर्स’ इस संग्रह की सातवीं कहानी है पर इसकी बात पहले इसलिए कर रही हूँ क्योंकि ये कहानी आज की लोकप्रिय कहानियों में अपना स्थान बना चुकी है | इस कहानी की विशेषता है इसका बाजारवाद और उपभोक्तावाद का सटीक चित्रण | ये कहानी आज के समय की कहानी है | हम सब इस कहानी को अपने आस पास देख भी रहे हैं और कुछ हद तक जी भी रहे हैं | कहानी पुराने कारीगरों और हुनरमंद लोगों को बाज़ार द्वारा लील लिए जाने के अवसाद से शुरू होती है | यहाँ इसे दर्शाने का माध्यम बनते हैं रशीद भाई जो मन्नत टेलर्सनाम से दर्जी की दुकान चलाते थे | समीर द्वारा “मन्नत टेलर्स के रसीद भाई को याद करते हुए उस समय को याद किया गया है जब ग्राहक और दुकानदार के बीच रिश्ता महज कीमत चुकाओ और सामान खरीदों जितना सतह तक सीमित नहीं था | ये रिश्ते बड़े आत्मीय थे | जो एक दूसरे को पारिवारिक स्नेह के बंधन में बांधते थे | कहानी में आज के स्लिम फिट युग में रेगुलर फिट की चाह  रखते हुए समीर  उसी समय को याद कर जब मन्नत टेलर्स को खोजता तो साथ में समेटता चलता  है आत्मीय रिश्तों से भरी उन दुकानों की यादों को जहाँ सामान  खरीदने का मतलब खुद ही किसी ढेर से अपनी पसंद की चीज उठा कर  काउंटर पर बिल पे कर देना भर ही नहीं होता | एक दृश्य देखिये ...
“ऐसा करिए मास्साब ! अलग –अलग पीस के बजाय एक ही थान ले लीजिये | गुप्ता जी की दूकान से मेरा नाम लेकर |” अचकचाकर  उन्हें देखते हुए पिताजी बोले “यार हँसी उड़वाओगे हमारी ? लोग शादी में सिर्फ एक थान के परिवार की वजह से याद रखेंगे |”
उस समय रसीद भाई ने मायूसी के बादल छांटते हुए कहा,”इत्मीनान रखें आप !एक थान आपको सस्ता पड़ेगा और मैं ऐसा बना दूँगा कि कोई बता ना पायेगा कि कपड़ा एक है ...और दु कानदार को पैसा देने की जल्दी न कीजियेगा | शादी का मामला ठहरा, सौ खर्च होंगे घर के, मैं बात कर लूँगा |”

समीर ये सब याद करते हुए वहाँ पहुँचता है जहाँ तब “मन्नत टेलर्स हुआ करती थी,  और वहाँ जो वो देखता है उसमें जो ख़ुशी और दुःख का जो सम्मिश्रण है वो कहानी की जान है | इस अवसाद को पकड़ पाना इतना सहज नहीं है | इसमें छिपा है हुनरमंद कारीगरों का दर्द जो बाजारवाद के हत्थे चढ़ गए | हम भी कहाँ सोचते हैं चमचमाते हुए शो रूम से कुछ खरीदते समय उनके बारे में जिनके हुनर को इन बाजारों ने खरीद लिया है | इस कहानी की विशेषता ये है कि वो शब्दों से निकल कर दृश्य रूप ले लेती है ...और घटनाए सामने घटने लगती है | कथाकार की विशेषता होती है कि वो एक शब्द या पंक्ति में बहुत कुछ अनकहा कह दे | ऐसा ही एक शब्द मेरे जेहन में उभर रहा है वो है पॉलीथीन की चुररम चू ...यह चुररम चू बहुत कुछ कह देती है जिसे समीर छिपाना चाहता है



‘बतकुच्चन’ एक सॉफ्ट सी कहानी है जो दो बहनों की फोन पर बातचीत के माध्यम से आगे बढती है | इस कहानी को पढ़कर आप अपने रिश्तों की गर्माहट को जरूर महसूस करेंगे | महिलाओं पर अक्सर आक्षेप लगते रहते हैं कि वो बुराई करती रहती हैं या निंदा रस में मशगूल रहती हैं | पर यहाँ इस बुराई को भी बहुत सकारात्मक  रूप में लिया गया है | दरअसल रिश्तों में रहते हुए हम छोटी –छोटी बातों पर आहत होते रहते हैं और ये बात ना सिर्फ आपस में कहते भी रहते हैं बल्कि ये भी कहते रहते हैं कि, “अब हम उनके यहाँ नहीं जायेगे”, “उनसे बात नहीं करेंगे”| लेकिन ये गुस्सा केक के ऊपर  लगे चेरी की तरह केवल सतह पर सीमित रहता है | अंदर अभी भी प्यार का दरिया बह रहा होता है | जिसे इंतज़ार रहता है कि कोई जरा सा बस पूछ ले और हम इस नाराज़गी का झूठा खोल फाड़ कर एक बार फिर प्यार से गले मिल लें | प्रज्ञा जी ने इस कहानी के माध्यम से प्यार के इस दरिये के बहाव में मन को ऐसा बहाया कि भावनाओं का सागर उसे अपने अंक में भर लेने को मचल पड़ा | इस कहानी को पढने के बाद आपको अपने उन रिश्तों की जरूर याद आएगी जिनसे छोटे –मोटे गिले –शिकवे हैं पर जिन्हें आपने और उन्होंने अहंकार का प्रश्न बना लिया है | बस ये ख्याल आते ही देखिएगा कि कैसे ये दीवार भडभडा कर गिरेगी | आज जब रिश्ते जरा –जरा सी बात पर टूट रहे हैं ऐसे में प्रज्ञा जी इस कहानी माध्यम से उसकी दिली गहराई को फिर से स्थापित करती हैं |जो बहुत सुखद है | इसके लिए उन्हें बधाई |


रिश्तों पर आधारित एक अन्य कहानी है “उलझी यादों के रेशम” | ये कहानी इतनी बेहतरीन है कि इसे पढने के बाद मेरी भावनाओं का ज्वर भाटा तो फूटा ही,  मुझे दो दिन तक कुछ और पढने का मन नहीं किया | किसी के लिए अपने पिता को खोना एक बहुत बड़े दर्द का सबब होता है | लेकिन समय के साथ इंसान उस दर्द से निकलता है परन्तु अगर किसी के पिता लापता हो जाएँ तो... ? यकीनन उसकी रेशमी यादें अन्तकालीन इंतज़ार में उलझ कर रह जाती हैं | ऐसी ही एक बेटी है बिट्टू ...जिसके वृद्ध पिता अचानक से कहीं चले गए हैं और वो अपने लापता पिता के वीरान पड़े आशियाने में अपना वही पुराना घर ढूँढने आती है जिसमें गुज़रते वक्त की गर्त में जाले लग गए हैं ...और उन जालों में उलझ कर रह गयीं हैं रेशमी यादें | ये कहानी एक लापता पिता के माध्यम से बुजुर्गों के अकेलेपन और उससे उपजी समस्याओं से दो –चार कराती चलती है | आखिर क्या –कारण है कि तीन बच्चों के पिता आज अकेले वीरान पड़े घर में जीवन काट रहे हैं ? जिन्होंने अपने तीनों बच्चों को पालने में पूरा जीवन लगा दिया उनके जीवन के अंतिम पड़ाव में सब इतने व्यस्त हो गए कि उनके पास अपने पिता के हाल –चाल पूछने का समय भी नहीं रहा | पिता के अचानक से गुम हो जाने पर बच्चे जिस गिल्ट से भरते हैं, जिस तड़प से गुज़रते हैं उस कारण ये कहानी बुजुर्गों पर लिखी अन्य कहानियों से बिलकुल अलग हो जाती है | इस घनघोर नकारात्मकता के पीछे भी सकारात्मकता प्रज्ञा जी खोज लेती हैं | बच्चे बुरे नहीं हैं ...बस जिन्दगी की भागदौड़ में आगे और आगे दौड़ते हुए पिता पीछे छूटते चले गए | ये कब और कैसे हुआ समझ ही नहीं आया | सफलता की दौड़ में आगे दौड़ते हुए हम बहुमूल्य रिश्तों की कितनी बड़ी कीमत चुकाते हैं ये कहानी उसी पर प्रकाश डालती है | भावनाओं के ज्वार से निकलने के बाद जब आप ठहर कर सोचेगे तो अब तक पाया हुआ बहुत कुछ बेमानी लगने लगेगा | ये बेमानी लगना और रिश्तों की अहमियत को समझना ही इस कहानी की सफलता है |


अगर आप के बच्चे टीन एजर हैं या हाल ही में उन्होंने इस उम्र को पार किया है तो “तेरहवीं दस्तक’ कहानी आपको अपने घर की कहानी लगेगी | सारी  घटनाएं आपके अपने घर की घटनाएं होंगी जो आपकी स्मृति की रील में एक बार फिर से घूम जायेंगी | “हमारी भी तो यही उम्र थी कभी, पर हम तो ऐसे नहीं थे” कहकर जब हम आज के उदंड,वाचाल, मनमौजी और कुछ हद तक अवज्ञा करने वाले बच्चों पर लगाम लगाना चाहते हैं तो एक तरह से हम उनके साथ बातचीत करने के सारे द्वार बंद कर देते हैं | एक माता –पिता के रूप में हम सब किशोर बच्चो के व्यवहार से परेशान हैं पर क्या कभी हम इसकी गहराई में उतर कर देखना चाहते हैं कि आज के बच्चे किन तनावों से गुज़र रहे हैं | उन पर पढाई का, साइंस स्ट्रीम लेने का, प्रतियोगी परीक्षाओं का दवाब तो है ही , आज सोशल मीडिया के कारण सार्वजानिक जीवन का विस्तार हो जाने के कारण सुंदर दिखने, पॉपुलर होने, हर क्षेत्र में बेस्ट होने का जो दवाब है उससे बच्चे कितने तनाव के शिकार हो रहे हैं ये कहानी उन मुद्दों को भी उठाती है | प्रोफेशनेलिज्म की अंधी दौड़ में हमने बच्चों को अपने सपनों की रेस का घोड़ा बना दिया है | हम ये तो कह देते हैं कि बच्चों में सहनशीलता नहीं रही वे जरा सी बात पर आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं | पर क्या ये बात जरा सी होती है है या तनाव का एक ढेर जिस पर वो बैठे हैं उस पर एक छोटा सा तनाव भी उनकी सहनशक्ति को तोड़ देता है ? ये कहानी बच्चों के साथ आपसी संवाद पर जोर देती है ...साथ ही आगाह करती है कि संवाद के लिए एक दोस्ती नुमा माहौल हमें ही बनाना पड़ेगा |  



कभी आप के किसी परिचित का फोन आने के बाद वो कहे कि, “उसकी तो जिन्दगी ही बर्बाद हो गयी है”, “आज का दिन उसकी जिन्दगी का सबसे खराब दिन था” और उसके बाद फोन कट जाए | लाख मिलाने पर भी ना मिले, तो आप क्या सोचेंगे ? जाहिर है एक से एक बुरे ख्याल आपके जेहन में तैरने लगेंगे | हो सकता है भगवान् भी मनाने लगें | प्रार्थना उपवास भी मान लें | किसी आकस्मिक मदद के लिए पैसे भी निकाल लें | ऐसी ही भावनाओं की जद्दोजहद से गुज़रती है कहानी ‘तबाह दुनिया की दास्तान” | लेकिन जब कहानी मुकम्मल होती है तो ...आप अपने साथ घटे किसी ऐसी  एक वाकये को जरूर याद करेंगे |


“एक झरना जमींदोज” में किस्सागोई इतनी बेहतरीन है कि आप उसके प्रभाव में आये बिना नहीं रह सकते | इस तरह की किस्सागोई साधना कोई आसान काम नहीं है | लेकिन जिस तरह से उसे साधा गया है वो वाकई काबिले तारीफ़ है |  किस्से के माध्यम से हम मिलते हैं एक प्रश्न पूछती  स्त्री और निरुत्तर होते पुरुष से|  ये किस्सा है दो प्रेमियों गुल और बहार का | जहाँ  एक के लिए इश्क कोरी लफ्फाजी है तो दूसरे के लिए समर्पण |  जब सच सामने आता है तो क्या इंसान वहीँ खड़ा रह सकता है ? रिश्तों में सिर्फ लफ्फाजी  नहीं चलती, कितनी भी बहारे हों, कितने भी गुल खिले हों पर झूठ पर ऐतबार का मौसम बीतना ही होता है | कई बार  सच के साथ जीने की ख्वाइश में झूठ से उपजाई गये भावनाओं के झरने को जमींदोज करना ही पड़ता है ....थोड़ा आगे बढ़  कर कहूँगी कि करना ही चाहिए |  



“अँधेरे के पार” पढ़ते हुए मुझे बार-बार एक गीत याद आ रहा था...

”दुनिया में कितना गम है,मेरा गम कितना कम है,
औरों का गम देखा तो,मैं अपना गम भूल गया ||

यूँ तो  हम सब को अपना दुःख ज्यादा लगता है | लेकिन कई बार आप दूसरे के दुःख को देखंगे तो पायेंगे कि सबके आँगन में दुःख पसरा हुआ है | कई बार जो व्यक्त नहीं करते उनका दुःख भी बहुत बड़ा होता है | जीवन जीने का एक तरीका ये भी है और यहीं से होती है सच्ची सहानुभूति  की शुरुआत | अँधेरे के पार देख पाना आसान नहीं है पर प्रज्ञा जी ऐसे बिम्ब रचती हैं कि उस पार साफ़ दिखाई देने लगता है | ये कहानी है दो ऐसे बुजुर्गों (एक स्त्री एक पुरुष ) की जो पड़ोस में रहते हैं | जिनके जीवनसाथी बहुत पहले उन्हें छोड़ कर चले गए थे | एक दूसरे की मित्रवत मदद करते हुए उन्होंने अपने बच्चे पाले, बड़े किये लायक बनाये और फिर ...| ये कहानी दो मुद्दों को लेकर आगे बढती है | एक तरफ तो ये उन बुजुर्गों की बात करती है जिनके बच्चे उन्हें अकेला छोड़ कर अपनी जिन्दगी में व्यस्त हो गए औरे दूसरी तरह ये उन बुजुर्गों की समस्या पर भी बात करती है जिनके बच्चे उनके साथ रह रहे हैं पर उन पर आश्रित है | जिन बुजुर्गों के बच्चे उनके पास हैं पर किसी न किसी कारण से आश्रित हैं उन्हें वृद्धवस्था में भी जिम्मेदारियों से मुक्ति नहीं मिल पाती | यहीं पर ये कहानी बुजुर्गों के अकेलेपन पर लिखी हुई तमाम कहानियों से अलग हो जाती है | अँधेरे के उस पार के जिस सूत्र पर प्रज्ञा जी संवेदनाओं की रोशिनी डाली है उसके लिए वो बधाई की पात्र हैं |


जब हम पितृसत्ता की बात करते हैं तो हम इसका सीधा मतलब पुरुषों द्वारा  स्त्रियों पर  किये गए अत्चाचार समझ लेते हैं | लेकिन सत्ता तो सत्ता ही होती है और अगर ये सत्ता एक स्त्री के हाथ में हो तो... तो एक स्त्री भी पितृसत्तावादी सोच  में ढल जाती है और दूसरी स्त्रियों के प्रति सामन्ती व्यवहार करने लग जाती है | अक्सर इसके ऊपर जो कहानियाँ लिखी गयीं वो जा तो मालिक और मुलाजिम के रिश्ते पर थीं या सास-बहु, नन्द-भाभी आदि रिश्तों पर | लेकिन क्या माँ-बेटी का रिश्ते में भी ऐसा हो सकता है ? “परवाज़” कहानी कुछ ऐसी ही कहानी है जिसका अंत एक झटका देता है | ये फार्मूला कहानी नहीं है | ये सच्चाई के करीब की कहानी है | अगर आप आज की युवा लड़कियों से बात करेगी तो कई का सच (भले ही उनके कारण अलग –अलग हों ) इस कहानी के करीब है | पितृसत्ता का जो स्त्री चेहरा उभर कर आया है ये कहानी उस और ध्यान आकर्षित करती है |



कहानी ‘पिछली गली’ बढ़ते मॉल कल्चर के लोकल हाट पर प्रभाव को दर्शाती है | जहाँ पहले साप्ताहिक सब्जी बाज़ार लगता था वहां अब मॉल बनना है | इसलिए तमाम सब्जी वाले वहाँ  से विस्थापित  कर पिछली गली में वो बाजार लगाने को विवश है |  किस तरह से वो वहाँ पर समस्याओं से जूझते हैं इसका सटीक चित्रण है | विकास के नाम पर पूंजीपतियों की जेब भरने के क्रम में सर्वहारा गरीब जनता का रोजगार किस तरह से छीना जा रहा है | एक दृश्य देखिये ...
“क्या हम ही बदनुमा दाग हैं इस शहर पर? सड़क सिर्फ इन गाड़ियों के लिए है ? हम कहाँ जायेंगे ?”
“जाने दो ना मम्मा ! ऑनलाइन सब मिलता है | यू डोंट वरी न !न कहीं जाने का झंझट न कोई परेशानी और आपको खुद ही लाना है तो कितने वीजी स्टोर्स भी हैं न ?”


“जिन्दगी के तार”कहानी दो स्त्रियों की कहानी है जिनकी जिन्दगी के तार समस्याओं में उलझ गए हैं | उनमें से एक हिम्मत कर के खुद ही निकलती है फिर दूसरी के लिए प्रेरणा भी बनती है | अगर दमन स्त्री से जीवन का एक सच है तो तो उससे निकलने की जद्दोजहद भी उसी को करनी होगी | किसी मसीहा की प्रतीक्षा करने के स्थान पर उसे खुद ही संघर्ष करके अपनी गृहस्थी को संवारना होगा | और वो ऐसा कर सकती है बस उसे अपने ऊपर और अपनी मेहनत पर विश्वास करना सीखना होगा |



और अंत में मैं यही कहूँगी कि प्रज्ञा जी के इस कहानी संग्रह 'मन्नत टेलर्स'में हर कहानी किसी समस्या के प्रति संवेदना जगाने में और उसके समाधान को खोजने के प्रयास में है | ये कहानियाँ काल्पनिक नहीं हैं | ये आम जीवन की कहानियाँ हैं जिसे हम-आप रोज देखते हैं, सुनते हैं, जीते हैं पर सोचते नहीं हैं | इनके प्रति  गंभीरता से चिंतन करने को विवश करती प्रज्ञा  जी एक सच्चे साहित्यकार के धर्म का पालन करती हैं | ये कहानियाँ  किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं हैं ये एक विशाल वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं | इस संग्रह की खास बात ये हैं कि हर कहानी एक दूसरे से भिन्न है | इनमें कहीं भी दोहराव नहीं है | साहित्य भण्डार से प्रकाशित 148 पन्नों में सिमिटी 11 कहानियों को आप एक झटके में आसानी से नहीं पढ़ पायेंगे | क्योंकि हर कहानी आपको रोकेगी, अपने मंथन का एक जरूरी समय लेगी | उस ठहराव के बाद ही आप अगली कहानी पर बढ़ पायेंगे |


अगर आप सार्थक साहित्य के अनुरागी हैं तो ये "मन्नत टेलर्स"  आपके लिए मुफीद है |


मन्नत टेलर्स – कहानी संग्रह
लेखिका –प्रज्ञा
प्रकाशक –साहित्य भंडार
पृष्ठ -148
मूल्य – 125 (पेपर बैक )
किताब मँगवाने  का पता –
साहित्य भंडार
5, चाह्चंद (जीरो रोड ),
प्रयागराज -211003  
मोबाईल -09335155792,9415214878

समीक्षा -वंदना बाजपेयी

                                         
समीक्षक -वंदना बाजपेयी


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