October 2019

भाई -दूज पर मुक्तक

दीपावली के दूसरे दिन भाई दूज का त्यौहार मनाया जाता है | इस दिन बहनें अपने भाई के माथे पर रोली अक्षत का टीका लगा कर उसके लिए दीर्घायु की प्रार्थना करती हैं | कहा जाता है कि इसी दिन मृत्यु के देवता यमराज अपनी बहन यमी के निमंत्रण पर वर्षों बाद उसके घर भोजन करने गए थे | तभी यमी ने संसार की सभी बहनों के लिए ये आशीर्वाद माँगा था कि जो भी भाई आज के दिन अपनी बहन का आतिथ्य स्वीकार कर उसके यहाँ भोजन करने जाए उसे वर्ष भर यमराज बुलाने ना आयें | इसी लिए आज के दिन का विशेष महत्व है | फिर भी बदलते ज़माने के साथ बहनें इंतज़ार करती रह जाती हैं और भाई अपने परिवार में व्यस्त हो जाते हैं | जमाना बदल जाता है पर भावनाएं कहाँ बदलती है | बहनों की उन्हीं भावनाओं को मुक्तक में पिरोने की कोशिश  की है | 

भाई -दूज पर मुक्तक 



कि अपने भाई को देखो बहन  संदेश लिखती है
चले आओ  कि ये आँखें  तिहारी राह तकती हैं
सजाये थाल  बैठी हूँ तुम्हारे ही लिए भाई
तुम्हारी याद  में आँखें घटाओं सम बरसतीं हैं

.................................................


तुझे भी याद तो होंगी पुरानी वो सभी दूजे
बहन के सात भाई चौक पर जो थे कभी पूजे
बताशे हाथ में देकर सुनाई थी कथा माँ ने
सुनाई दे रहीं मुझको न जाने क्यों अभी गूँजें
------------------------------------------------


वर्ष बीते  मिले  हमको गिना है क्या कभी तुमने
पलों को  भी  जरा सोचो    लगाया है   गले      हम ने 
खता हुई      बताओ क्या  जरा  सी  बात पर रूठे                       

कि आ जाओ मनाउंगी   उठाई   है कसम  हमने 
----------------------------------------


बने भैया    बहन आठों       धरा पे  चौक  आटे से 
लगे ना चोट पाँवों  में     कभी  राहों के    काँटे  से 
चला मूसर कुचल दूँगी     अल्पें तेरी   मैं  राहों की 
बटेगा   ना  कभी     बंधन    हमारा  प्रभु    बांटे से 

वंदना बाजपेयी
मुक्तक –मु –फाई-लुन -1222 x 4




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प्रेम -दीपक
फोटो क्रेडिट -livedharm.com





करेगी रोशिनी जगमग , अँधेरे को मिटा देंगे 
लाखों जुगनुओं से हम अमावस को हरा देंगे 
धरा हो जायेगी स्वर्णिम, करेंगे देवता वंदन 
जो जलाकर'मैं'को हम , प्रेम -दीपक बना देंगे |

वंदना बाजपेयी 

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दीपोत्सव

दीपावली मानने के तमाम कारणों में एक है राम का अयोध्या में पुनरागमन | कहते हैं दीपावली के दिन प्रभु श्री 
राम 14 वर्ष का वनवास काट कर पुन: अयोध्या लौटे थे | इस ख़ुशी में लोगों ने अपने घरों में दीप जला लिए थे |
राम सिर्फ एक राजा ही नहीं थे | बल्कि आदर्श पुत्र , एक पत्नीव्रत का निर्वाह करने वाले , स्त्रियों की इज्ज़त 
करने वाले भी थे | हम दीपावली प्रभु राम के अयोध्या वापस आने की ख़ुशी में तो मना लेते हैं पर क्या राम को
 अपने व्यक्तित्व में उतार पाते हैं | 

दीपोत्सव 



जगमगाती दीपमालाएँ लगीं भाने
राम जैसे बन के दिखलाओ तो हम जानें

टूट कर गृह कलह से बिखरे नहीं परिवार
पिता के वचनों को निभाओ तो फिर मानें
राम जैसे बन के दिखलाओ तो हम जानें

राम सीता के न रह पाए बहुत दिन साथ
उन सा पत्नी एक व्रत , धारो तो फिर मानें
राम जैसे बन के दिखलाओ तो हम जानें

दूसरों की पत्नियाँ हों, बहन, या बेटी
अपनी माँ, बहनों सा ही जानो तो फिर मानें
राम जैसे बन के दिखलाओ तो हम जानें

गुरूजन, माता-पिता, अपने जो हैं कुल श्रेष्ठ
उनके चरणों में झुके जो शीश,  फिर मानें
राम जैसे बन के दिखलाओ तो हम जानें

जगमगाती दीपमालाएँ लगीं भाने
उषा अवस्थी

                                      
लेखिका -उषा अवस्थी















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चलो जलाए आज हम , सखि द्वारे पर दीप।
तम को जो मेटे सदा , उजला सौम्य प्रदीप।
उजला सौम्य प्रदीप , स्वास्थ्य का सुख धन लाये ।
रोग-व्याधि हों दूर , कमलिनी मन हर्षाये ।
देख स्वास्थ्य सुख शांति , पास यमदूत न आयें।
धन्वंतरि को पूज , चलो हम दीप जलायें।।

धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएं

वंदना बाजपेयी
विभोम स्वर व् शिवना साहित्यकी मेंरी नज़र में


शिवना प्रकाशन की दो पत्रिकाएँ ‘विभोम स्वर’और ‘शिवना साहित्यिकी’ प्राप्त हुईं | अभी थोड़ी ही पढ़ीं हैं, फिर भी उन पर लिखने का मन हो बन ही गया | पूरी पढ़कर और लिखूँगी | सबसे पहले बात करुँगी ‘शिवना साहित्यिकी” की | कवर पेज पर ही बना बच्चा और भगवत रावत जी की कविता मन मोह लेती है | एक अंश ...

अलमुनियम का वह दो डिब्बों वाला कटोरदान
बच्चे के हाथ से छूट कर
नहीं गिरा होता सड़क पर
तो कैसे पता चलता
कि उसमें चार रूखी रोटियों के साथ-साथ
प्याज की एक गाँठ और दो हरी मिर्चे भी थीं

विभोम स्वर व् शिवना साहित्यकी मेरी नज़र में 

(वर्ष-4 अंक -15 )

विभोम स्वर व् शिवना साहित्यकी मेरी नज़र में

             
इस अंक की खास बात है गीता श्री जी का पारुल सिंह द्वारा लिया गया साक्षात्कार | जितने चुटीले सवाल पारुल जी ने पूछे उतने ही दिलकश जवाब गीताश्री जी ने दिए | गीता श्री जी का स्पष्ट दृष्टिकोण, बेबाक और अपनेपन से भरा अंदाज पाठकों को ख़ासा लुभाता है | गीताश्री जी एक पत्रकार रहीं हैं | पत्रकारिता ने उनके अनुभवों को विस्तार दिया हैं और साहित्य प्रेम में शब्दों और भावों पर पकड़ | इस कारण न उनके पास विषयों की कमी होती हैं ना उन्हें अभिव्यक्त करने के अंदाज की | साक्षात्कार लम्बा है, फिर भी कुछ बातें मैं आप सब से साझा कर रही हूँ | जो मेरे ख्याल से आप के अनुभवों में भी कुछ इजाफ़ा करेंगी | पुरुस्कारों के बारे में वो कहती हैं कहती हैं कि, “ पुरूस्कार मुझे उत्साहित  करते हैं और बेहतर करने को उकसाते हैं |” हालांकि वो साहित्य की तुलना जलेबी दौड़ से करती हैं | बचपन में हम सब ने जलेबी दौड़ में हिस्सा लिया है | इसमें हाथ पीछे बंधे होते हैं और धागे में बंधी जलेबी का एक टुकडा  काट कर आगे भागना होता है | गीता श्री जी कहती हैं कि जो छोटा टुकडा काट कर आगे भाग जाते हैं उन्हें पुरूस्कार मिल जाते हैं और वो पूरी जलेबी खाने के लोभ में वहीँ खड़ी रहती हैं तो उनका मुँह मिठास से भर  जाता है | कितनी सुन्दर बात कही है उन्होंने, भले ही पुरूस्कार उत्साहित  करते हैं पर  रचनात्मक संतुष्टि की मिठास किसी पुरूस्कार से कम तो  नहीं | स्त्रियों के मामले में वो एक ऐसे समाज को स्वप्न देखती हैं जहाँ स्त्री समाज से टकराकर रूढ़ियों को तोड़ कर समानता के आधार पर एक संतुलित समाज की नींव रखती है | उनकी कहानियों की नायिकाएं ऐसी ही हैं | वो बार –बार प्रयोग करने का जोखिम उठा कर अपनी रेंज का विस्तार करती हैं | किसी भी रचनाकार के लिए जरूरी है कि वो अपने द्वारा स्थापित मानकों में कैद होकर ना रह जाए |


डॉ. कमल किशोर गोयनका जी का शोध आलेख “गांधी की पत्रकारिता का भारतीय मॉडल” विचारों का परिमार्जन करने वाला एक अवश्य पठनीय आलेख है | वो लिखते हैं कि , “नाथूराम गोडसे ने गांधी को तीन गोलियों से मारा था | पर हम उन्हें विगत 70 वर्षों सीसंख्य गोलियों से मारते आ रहे हैं , परन्तु गांधी हैं कि मरते ही नहीं | गांधी ने मशीनी सभ्यता के दुष्परिणामों के विरुद्ध जगत को चेताया था तथा ग्रामीण व् प्राकर्तिक जीवन के निरंतर नाश सेसे उत्पन्न होने वाले संकटों से सावधान किया था, परन्तु विज्ञानं एवं तकनीकी जिस प्रकार जीव सृष्टि के लिए संक्सत पैदा कर रही है तब हमें गांधी याद आते हैं और तब हम उनके विचारों में सामाधान ढूँढने लगते हैं |” मंजुश्री के कहानी संग्रह “जागती आँखों का सपना” की डॉ. रमाकांत शर्मा द्वारा व् योगेन्द्र शर्मा जी के उपन्यास ‘कितने अभिमन्यु’ की वेदप्रकाश अमिताभ जी द्वारा की गयी समीक्षा प्रभावित करती है |केंद्र में पुस्तक “जिन्हें जुर्म –ए –इश्क पर नाज था कि मनीषा कुलश्रेष्ठ, पंकज पराशर, शुभम तिवारी , ब्रिजेश राजपूत, कविता वर्मा, दिनेश पाल की समीक्षाएं पुस्तक पढने के प्रति रुझान उत्पन्न  करती है | मैंने भी इसे अपनी ‘विश लिस्ट’ में रख लिया है | 

 इसी अंक में मेरे द्वारा प्रज्ञा  जी के कहानी संग्रह “मन्नत टेलर्स” की समीक्षा भी प्रकाशित हुई है | जिसे पढ़कर  बताने का काम आप पाठकों का है |

विभोम स्वर 



“विभोम स्वर” एक बेहतरीन साहित्यिक पत्रिका है | जिसके उत्तम स्वरुप लेने में सुधा ओम ढींगरा जी व् पंकज सुबीर जी की मेहनत दिखती है | साहित्य में विचारधाराओं की गुटबाजी पर  अपने सम्पादकीय में सुधा जी लिखती हैं, “साहित्य में विचारधाराओं ने क्या किया ? सिर्फ अपने लेखक स्थापित करने के अतिरिक्त साहित्य और भाषा की समृद्धि की ओर किसने देखा ?”
विभोम स्वर व् शिवना साहित्यकी मेंरी नज़र में



डॉ. हंसा दीप का सुधा जी द्वारा लिया गया साक्षात्कार बहुत ही रोचक व् प्रेरणादायक है |  टोरंटो में लेक्चरार के पद पर कार्यरत डॉ.हंसा जी विदेशियों को हिंदी भाषा सिखाने में होने वाली दिक्कतों के बारे में बताती हैं व् इस बात पर जोर देती हैं कि हिंदी को विश्व व्यापी करने के लिए उसका सरलीकरण बहुत जरूरी है | अभी हिंदी दिवस के आस –पास ट्विटर पर यह बहस भी चल रही थी | सच्चाई यही है कि भारत में भी बहुत क्लिष्ट भाषा आज  का युवा समझता नहीं है | सबसे पहले जरूरी है कि युवाओं को हिंदी से जोड़ा जाए | प्रवासी भारतीयों के लेखन के बारे में वो कहती हैं कि रोजी रोटी की व्यवस्था करने बाद ही वो अपनी रचनात्मक भूख शांत कर पाते हैं | इसमें एक लम्बा अंतराल आ  जाता है | फिर भी कैनवास व्यापक  हुआ है | सृजनात्मकता बढ़ी है | स्त्री लेखन, प्रवासी लेखन के वर्गीकरण को वो नहीं मानती पर वो ये मानती हैं पर पश्चिमी व् भारतीय स्त्री के प्रति मूलभूत मानसिकता वही है को स्वीकार करती हैं |

विभोम स्वर व् शिवना साहित्यकी मेंरी नज़र में


विशाखा मुलमुले  की कवितायें गहरे भाव संप्रेषित करती हैं | ये कवितायें हमें जीवन का  आइना दिखाती हैं | ये एक रूपक के माध्यम से अपनी बात कहती हैं और दोनों को तराजू के दो पलड़ों में रखकर सोचने पर विवश कर देती हैं | कहीं ये रूपक विज्ञान से होते हैं तो कहीं जीवन से | जीवन पर उनकी गहरी दार्शनिक पकड़ है | जो सूक्ष्मता से आम जीवन को देखती हैं |उनमें काफी संभावनाएं हैं |  कहानी में ऐसा ही प्रयोग दीपक शर्मा जी की कहानियों में  मिलता हैं | कुछ कविताओं के अंश दे रही हूँ |


चावल चुनने की प्रक्रिया में
 हम चावल नहीं चुनते  
चुनते हैं कंकण

इस तरह का बर्ताव
हम अन्य अनाजों के साथ भी करते हैं
कहते कुछ हैं, करते कुछ हैं

यही आदतें कब बन जाती हैं हमारा स्वभाव
हम बूझ नहीं पाते हैं
आहिस्ता –आहिस्ता
सुख –दुःख की थाली से हम
चुनने बैठते हैं सुख
और दुःख चुन लेते हैं

घास नहीं डालती कभी हथियार
उग ही आती है पाकर रीती जमीन
कुछ घास की तरह ही होते हैं बुरे दिन
जड़ें जमा ही लेते हैं अच्छे दिनों के बीच
कविता –पुनर्नवा का अंश
................................................


इसी तरह भावनाहीन मशीनी मानव
भी
गाहे –बगाहे उगलते रहते हैं अपने शब्दों के रसायन
आबदार कई व्यक्तित्व आते रसायन की चपेट में
कभी-कभी तो रसायन इतना सान्द्र
की आँख का पानी भी ना कर पाता  इसे तनु
कविता –रसायनशास्त्र का एक अंश

.


विवेक मिश्रा जी की कहानी दुर्गा अच्छी लगी | विवेक जी अपनी  कहानियों में सूक्ष्म डिटेल्स में जाते हैं | कहानी का अंत चौकाने वाला है | ज्योति जैन की कहानी “जुड़े गाँठ पड़ जाए ‘ में  हिन्दू मुस्लिम युवाओं का प्रेम है | परन्तु ये लव-जिहाद जैसा नहीं है | ये कहानी विश्वास पर आधारित है | विश्वास टूट जाए तो रिश्ता बचता नहीं है | जो आपको थोडा बदलने कहता है वो पूरा बदलने पर भी संतुष्ट नहीं होगा | अर्चना पैन्यूली की कहानी “हम पहुँच जायेंगे तेरी शादी में भारत” अपने ही देश में भगौलिक बँटवारे के आधार पर बच्चों की पसंद पर विवाह की स्वीकृति देने में माँ की कशमकश को दिखाया है | आज जमाना बदल रहा है फिर भी रफ़्तार धीमी है | डॉ . प्रदीप उपाध्याय की लघुकथा ‘परख’ व् सुमन कुमार की  लघुकथा ‘बेटे होकर’ प्रभावित करती है | अमृता प्रीतम पर वीरेन्द्र जैन जी का लेख “अनाम रिश्तों की चितेरी” उनके रचनात्मक जीवन के कुछ अनकहे  पहलुओं पर प्रकाश डालता है |

एक अच्छे अंक के लिए पंकज सुबीर जी व् सुधा ओम ढींगरा जी को बधाई |

वंदना बाजपेयी 
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डूबते को तिनके का सहारा




कहते हैं 'डूबते को तिनके का सहारा होता है |" कई बार हमारी छोटी सी मदद, छोटी सी बात , या छोटा सा सहयोग किसी दूसरे की जिन्दगी बदल सकता है | ये ऐसे होता है कि हमें पता भी नहीं चलता | संभावना इस बात की भी नहीं होती कि अनजाने हमने जिसकी मदद कर दी है वो कभी हमें मिलेगा भी | फिर भी कुछ किस्से ऐसे होते हैं जो दूसरों की मदद कर उनकी जिन्दगी संवारने के हमारे विश्वास को दृण कर देते हैं | 



डूबते को तिनके का सहारा 


कभी-कभी कुछ अप्रत्याशित घटनाएं आपकी सोच को एक दिशा देती हैं | कल भी एक ऐसी ही घटना घटी | घटना का जिक्र करने के लिए दो साल  पीछे जाना पड़ेगा | 

मैं अपनी बेटी के साथ डॉक्टर के यहाँ ब्लड टेस्ट के लिए गयी हुई थी | वहाँ  अन्य महिलाएं भी अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहीं थी | उन्हीं में से वो महिला भी थी | जो अपनी फर्स्ट प्रेगनेंसी के लिए अल्ट्रासाउंड कराने आई थी | वो महिला बहुत खूबसूरत और साधारण परिवार से थी | महिला रंग गहरा साँवला या काला कहा जाए तो ज्यादा उचित होगा, था | बगल में बैठा उसका पति जो काफी गोरा चिट्टा था, लगभग हर गोरी महिला को घूर रहा था | ये घूरना इतना स्पष्ट था की उसे नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता था | बीच –बीच में वो उपेक्षा से अपनी पत्नी से कुछ कह देता जो हम लोग सुन नहीं पा रहे थे पर समझ रहे थे | हालाँकि वो हौले –हौले मुस्कुरा रही थी | क्योंकि हम सब को समय काटना था | तो कोई किताब पढने लगा कोई बातों में व्यस्त हो गया | मेरी बेटी एक कागज़ पर स्केचिंग करने लगी | कुछ फूल पत्ती बनाने के बाद उसने उस महिला का स्केच बनाया | हमारी बारी पहले आई और हम जाने लगे तो बेटी ने वो स्केच उसे देते हुए कहा, “आप बहुत ही खूबसूरत हैं, इसलिए मैं ये स्केच बनाने से खुद को रोक नहीं पायी | आप अपनी स्माइल को हमेशा बनाए रखियेगा |”  उसके चेहरे पर आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी के भाव छोड़कर हम घर आ गए |


अभी कल वो अचानक से मिल गयी | दूर से देख कर जोर से हाथ हिलाया | मुझे पहचानने में थोड़ा वक्त लगा, उतने में वो मेरे पास आ कर बोली, “नमस्ते आंटी बेटी कैसी है आपकी ? मेरे भी बेटी हुई है |” मैंने उसे बधाई दी | वो फिर मुस्कुराते हुए बोली, “उस दिन आप की बेटी ने मेरा स्केच बनाया था | उसको धन्यवाद भी नहीं दे पायी | रंग की वजह से मैं अपने को काफी बदसूरत समझती थी | मेरे पति और परिवार वाले भी यही समझते थे |कई बार ताने मिलते थे | मेरा आत्मसम्मान और आत्मविश्वास बहुत लडखडाया हुआ था | उस दिन पहली बार महसूस हुआ कि मैं भी सुंदर लग सकती हूँ | ऐसा ही शायद मेरे पति को भी लगा | उनके ताने कम होने लगे | आज भी वो स्केच मेरे पास है | जब कभी आत्मविश्वास डिगता है तो उसे देख लेती हूँ और “अपने चहेरे पर ये स्माइल बनाए रखियेगा” ये शब्द याद कर लेती हूँ | मेरी तरफ से उसे धन्यवाद दे दीजियेगा |”

कई बार हमारा आत्मविश्वास हमारे अपने तोड़ते हैं | ऐसे में किसी के शब्द बहुत हिम्मत दे जाते हैं | कल से महसूस हुआ कि जब भी जहाँ भी मौका लगे ये तिनका बननेकी कोशिश करनी चाहिए | 

जीना इसी का नाम है ...

वंदना बाजपेयी 


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चिराग़-गुल


ये कहानी पढ़कर फिल्म पाकीजा का एक गीत ख्यालों में चला आ रहा है | 
"ये चिराग़ बुझ रहे हैं मेरे साथ जलते -जलते"
          दीपावली का मौका है और बुझते चिरागों की बात करना अच्छा नहीं लगता | फिर भी ये एक ऐसी स्त्री की कहानी है  जिसकी जिन्दगी के बुझते चिराग को बचाने की कोशिश किसी ने नहीं की ...ना पति ने न पिता या भाई ने और भाभी ने ...उसको तो खैर जाने ही दीजिये | 
वरिष्ठ लेखिका दीपक शर्मा की ये कहानी है एक ऐसी स्त्री की कहानी है जिसको एक बिमारी पति से मिली है पर मायका उसके साथ इसलिए नहीं खड़ा है क्योंकि आखिरकार सम्बन्ध टूटने की वजह लोगों को बताएँगे क्या ? स्त्री स्वास्थ्य की उपेक्षा का गंभीर मुद्दा उठाते हुए ये कहानी भावनाओं के गुल होते हुए चिरागों के बारे में बहुत कुछ कह  जाती है ...

चिराग़-गुल



बहन की मृत्यु का समाचार मुझे टेलीफोन पर मिला.

पत्नी और मैं उस समय एक विशेष पार्टी के लिए निकल रहे थे.
पत्नी शीशे के सामने अपना अन्तिम निरीक्षण कर रही थी और मैं तैयार कबाबों से भरे दो हॉट-केस व बर्फ़ की तीन बाल्टियों को गाड़ी में टिका कर पत्नी को लिवाने कमरे में लौटा था.
“टेलीफ़ोन सुनें या रहने दें?” टेलीफ़ोन की घंटी की ओर मेरा ध्यान पत्नी ने ही आकर्षित किया था.
“तुम बताओ.” आधुनिक यन्त्रों में मैं सबसे अधिक टेलीफ़ोन से घबराता हूँ.

“चलो, सुन लेते हैं,” पत्नी मुस्करायी, “रेणु का हुआ तो कह देना बस पहुँच ही रहे हैं.”

पार्टी पत्नी की बड़ी बहन के घर पर आयोजित थी. पत्नी की बड़ी बहन के पति मुझसे सर्विस में आठ साल सीनियर हैं तथा मैं उनका बहुत सम्मान करता हूँ.
“हलो,” मैंने टेलीफ़ोन उठाया.

“मैं राजेश बोल रहा हूँ,” उधर से आवाज़ आयी, “आपको यहाँ तुरन्त पहुँचना चाहिए. शशि की आज अस्पताल में मृत्यु हो गयी है.....”
“कैसे?” मैं चीख पड़ा.
“सब खैरियत तो है?” पत्नी ने लपक कर मेरे हाथ से टेलीफ़ोन ले लिया, “हलो..... हाँ..... हाँ..... मैं समझ रही हूँ.....”
बाक़ी समाचार पत्नी ने ही ग्रहण किए.
मैं अपना मुँह छिपा कर रोता रहा.
“राजेश ने क्या कहा?” मैंने थूक निगला.

“बोला, शशि का पैलविक एब्सैस (श्रोणीय फोड़ा) उसके पेट में फूट गया था और खून में जहर भर जाने से उसकी हालत बहुत ख़राब.....”
“तो उस धूर्त ने हमें क्यों नहीं बुलाया?” क्रोधावेश में मैं अपना सन्तुलन खो बैठा.
“कल सब अचानक ही तो हुआ. शशि ने पेट में दर्द की शिकायत की तो उसे तुरन्त अस्पताल ले जाया गया.....” पत्नी बहन से आठ साल छोटी रही मगर पत्नी के समाज में बच्चों को छोड़कर सब लोग - मर्द क्या, औरत क्या, बड़े क्या, छोटे क्या – सबके सब एक-दूसरे को नाम से अथवा सर या मै’म के सम्बोधन से पुकारते हैं- ‘जीजी’, ‘भैया’, ‘चाचा’, ‘काकी’ जैसे सभी आदरसूचक शब्द प्रयोग करने की उन्हें सख्त मनाही है.

“जरूर उस नीच ने अपनी सरगरमी फिर से शुरू करनी चाही होगी और बेचारी शशि अपना बचाव करने में असमर्थ रही होगी.....”
पिछले चार वर्षों में बहन मुझे केवल दो बार ही मिली थी : एक बार दो वर्ष पहले मेरी शादी पर तथा दूसरी बार चार महीने पहले माँ की मृत्यु पर.

दोनों बार ही राजेश उसके साथ रहा था और परिस्थितियाँ असामान्य! मेरे विवाह का आयोजन एक सार्वजनिक क्लब में होने के कारण बहन एक औपचारिक अतिथि से अधिक कुछ न रही थी और माँ की मृत्यु पर अतिथि मैं रहा था. पत्नी का संक्रामक गर्भ-सुख मुझे अपने शहर में शीघ्र लौटा ले गया था.

हाँ, इधर, जब से अपने निरन्तर बिगड़ रहे गले के इलाज के लिए बाबूजी कस्बापुर से मेरे पास चले आए थे, बहन फोन पर अक्सर मुझसे भी दो-चार बात करती रही थी. बाबूजी के गले को लेकर वह बहुत चिंतित रहने लगी थी.

चिराग़-गुल


“मुझे डर है, मैं फिर बीमार हो रही हूँ,” पिछले सप्ताह बहन की जब मुझसे फोन पर बात हुई थी तो उसने मुझे चेताया था.

“तुम घबराना नहीं,” मैंने उसे ढाँढस बँधाया था, “इधर रेवा अस्पताल में है. जैसे ही वह कुछ ठीक हुई मैं आकर तुम्हें यहाँ अपने पास ले आऊँगा.....”
“रेवा को क्या हुआ?” बहन घबरा उठी थी.
“उसका केस बिगड़ गया है,” एक लेट-पार्टी के बाद पत्नी का गर्भपात हो गया था, “डॉक्टर बच्चे को नहीं बचा पायी और रेवा को अस्पताल में अभी दो-तीन दिन गुज़ारने पड़ेंगे.”
“तुम अभी रेवा को देखो,” बहन शोकार्त्त होकर रो पड़ी थी, “उसे कहना, निराश न होए, भगवान के घर में उसके नाम का टोकरा बहुत बड़ा है..... उसकी झोली में सब कुछ आएगा..... वह धीरज रखे.....”

जिन दिनों बहन की शादी हुई थी, मैं आई. ए. एस. की प्रवेश परीक्षा की तैयारी में व्यस्त था. भूगोल में एम. ए. कर लेने के बाद बहन लखनऊ के एक महिला कॉलेज में पढ़ाने लगी थी. अख़बार के एक विज्ञापन द्वारा ही बहन को राजेश का परिचय मिला था. राजेश जर्मनी से इंजीनियरिंग की एक उच्च डिग्री लेकर अभी हाल ही में लौटा था तथा उत्तर प्रदेश में ही स्थित किसी इंजीनियरिंग कॉलेज में प्राध्यापक की नौकरी करने का इरादा रखता था.

एक प्राइवेट इंटर कॉलेज के प्रिंसीपल के पद से रिटायर हो रहे बाबूजी को राजेश व राजेश का परिवार बहन के लिए ठीक-ठाक ही लगा था.
बहन ने विवाह की तिथि निश्चित होते ही अपने प्रॉविडेंट फण्ड के लोभ में नौकरी छोड़ दी थी और अपनी मनपसन्द साड़ियाँ बटोरनी शुरू कर दी थीं.

राजेश के भयंकर छुतहा रोग का रहस्य तो शादी के बाद ही उद्घाटित हुआ था जब हमें शादी के दसवें दिन बहन की रुग्णावस्था का तार मिला था.


बाबूजी और माँ बहन को तुरन्त घर पर लिवा भी लाए थे, परन्तु अभी बहन स्वास्थ्य लाभ ही ग्रहण कर रही थी कि राजेश अनेक डॉक्टरी सर्टिफिकेटों के साथ हमारे घर पर आ धमका था. राजेश के डॉक्टरों ने उसे पूर्णरूपेण निरोग बताते हुए विवाहित जीवन के योग्य घोषित किया था. डॉक्टरोंकी इस घोषणा के साथ राजेश ने अपनी मृदुल विनयशीलता जोड़ ली थी और बाबूजी बहन को राजेश के साथ वापस भेजने के लिए सहमत हो गए थे. आने वाले अमंगल का पूर्वसंकेत मैंने बाबूजी को दिया भी था किन्तु बाबूजी ने सिर हिलाकर अपनी मजबूरी बतायी थी, “लड़के में कोई और कमी रही होती तो हम लड़की को घर बिठाने या दोबारा ब्याहने के सौ तर्क दे डालते, पर यहाँ बाधा इतनी दुर्बोध व वीभत्स है कि बात उठाने की बजाय अब चुपचाप पी जानी पड़ेगी. अब तो हाथ जोड़कर भगवान से यही मनाएँगे कि राजेश अपने वादे पर अटल रहे और शशि को हर जोखिम से बचाकर रखे!”
उस दिन हमारी पार्टी की वजह से बाबूजी ने खाना जल्दी ले लिया था और अपने कमरे में बंद हो गए थे.
पत्नी का आग्रह था कि बाबूजी भी हमारी तरह रात में अपने कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद रखा करें.
दरवाज़े की चिटकनी थाम कर बाबूजी दरवाज़े पर खड़े हो गए.

“बाबूजी,” मैंने उन्हें दरवाज़े से हटाने की खातिर अपने अंक में ले लिया.
“क्या हुआ?” बाबूजी चौंके, “सब कुशल-मंगल तो है न!”
“नहीं बाबूजी,” मैं रो पड़ा, “शशि चली गयी है.”
बाबूजी ने तुरन्त अपने आपको मेरे अंक से मुक्त कर लिया और अपनी कुर्सी पर बैठ गए.
“क्या फ़ोन आया था?” बाबूजी बुरी तरह काँपने लगे.
“हाँ,” मैंने कहा. “राजेश ने बताया, मृत्यु आज ही अस्पताल में हुई......”
“मैं अभी रात की गाड़ी से वहाँ जाऊँगा,” बाबूजी उठकर कपड़े बदलने लगे.
 “आप यहाँ रहिए. आपकी तबीयत ढीली है. यात्रा करने योग्य नहीं. वहाँ मैं जा रहा हूँ. लौटकर सब विस्तार से आपको बताऊँगा.....”
“नहीं, मैं ज़रूर जाऊँगा,” बाबूजी अड़ गए.
कपड़े बदल कर बाबूजी बाथरूम से अपना ज़रूरी सामान ले आए.
“रेवा यहाँ अकेली कैसे रहेगी?” मैंने पत्नी की अस्वस्थता की ओर संकेत किया.
“मेरी ये चीज़ें अपने सूटकेस में रख लेना,” बाबूजी ने मेरे प्रश्न को कोरी बकवाद मानकर उसे नज़र-अन्दाज़ कर दिया.
“ठीक है,” जब से माँ की मृत्यु हुई है, मैंने बाबूजी से बहस करना एकदम छोड़ रखा है.
अपने शेविंग किट में शेव की सब चीज़ें रखते समय मेरे कानों ने फ़ोन पर पत्नी की आवाज़ पकड़ी. पत्नी अपनी बड़ी बहन से कह रही थी, “तो क्या अब हाथ खाली हैं? बुढ़ऊ पूरी-पूरी सेवा और हाजिरी माँगता है..... हाँ, ख़ैर, वह डर तो अब छूट गया..... भावुक होकर वह कभी भी बहन को यहाँ बुला तो सकता था..... क्या हुआ..... मैं अभी आती हूँ.....”
“कुछ गिरा है क्या?” पत्नी मेरे बाथरूम के दरवाज़े तक चली आयी.””’
“कुछ नहीं,” मैंने कहा, हालाँकि आफ़्टर-शेव की एक कीमती शीशी अपने किट में धरते समय मेरे हाथ से छूट कर नीचे गिर गयी थी.
“कुछ गिरने की आवाज़ तो आयी थी,” पत्नी झल्लायी.
“तुम्हें आयी होगी. मुझे तो कोई आवाज़ नहीं आयी,” मैंने पत्नी को जानबूझ कर चिढ़ाया.
“तुम और तुम्हारे तमाशे मेरी समझ से बाहर रहते हैं,” पत्नी ने बाथरूम के अंदर झाँकना चाहा तो मैंने तत्काल आगे बढ़कर बाथरूम का दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया.

चिराग़-गुल

“मुझसे मत पूछो क्या हुआ था,” पत्नी अपने टेलीफोन पर लौट गयी, “हाँ-हाँ, क्यों नहीं..... हलो..... हाय, सुमेर, हाऊ आर यू? .....लॉन्ग टाइम, नो सी..... अस्पताल से? .....आज मिल तो रहे हैं..... ख़ैर मैं उतनी बुरी अवस्था में तो नहीं..... देखकर बताना क्या अन्तर आया है..... हाँ, बहुत दुर्भाग्यपूर्ण रही..... स्त्री होने की बेचारी को इतनी बड़ी सज़ा मिली..... राजेश अपने परीक्षण तो हर चौथे महीने करवा लेता था मगर उसे शशि की तनिक परवाह न थी..... वही एच. एस. वी. टू..... शायद इसे ही ‘हरपीज सिम्पलेक्स वाइरस टू’ कहते हैं..... इसमें उपचार से ज्यादा परहेज की ज़रुरत रहती है..... जहाँ परहेज छूटा नहीं स्त्री की बीमारी फिर शुरू..... नहीं, इसी की वजह से ही नहीं, निस्संतान रहने को बाध्य रहीं वे..... बच्चा तो जन्म से ही फिर दोषपूर्ण स्वास्थ्य लेकर पैदा होगा..... हाँ-हाँ..... मैं तो आ ही रही हूँ..... रात को फिर वहीं रुकूँगी..... स्टेशन से सीधे वहीं आऊँगी.....”
“नहीं, तुम इस समय कार नहीं चलाओगी,” मैंने बाथरूम से बाहर आकर पत्नी को टोक दिया, “तुम वहाँ पार्टी में भी नहीं जाओगी.....”
“नहीं, कोई नहीं है. कबाब और बर्फ़ तो ला ही रही हूँ..... अभी रखती हूँ..... मिलने पर बाक़ी बात होगी.”
“वहाँ न गई तो वे लोग कबाब और बर्फ़ का कहाँ से प्रबन्ध करेंगे? जानते हो न, मुख्यमंत्री के सचिव भी उस पार्टी में आ रहे हैं. तुम न कहते थे- सुमेर से आज कहेंगे, तुम्हारी विदेश यात्रा को मुख्यमंत्री के सचिव से ओके करवा दें.....?”
“मैंने अपना इरादा बदल लिया है. मैं अब विदेश नहीं जाना चाहता. शशि के न रहने से बाबूजी पहले ही परेशान हैं, मेरे विदेश जाने पर बहुत अकेले पड़ जाएँगे.....”
“नन्दन..... नन्दन..... स्टेशन यहाँ से बहुत दूर है,” बाहर के बरामदे से बाबूजी ज़ोर से चिल्लाए! बाबूजी जब भी उत्तेजित होते हैं, उनका स्वर प्रबल महाघोष में परिवर्तित हो उठता है “हमें अब तुरन्त चल देना चाहिए......”
“स्टेशन पर विदा कहने के बाद मैं रेणु के घर चली जाऊँगी,” पत्नी ने उठकर कमरे का दरवाज़ा खोल दिया.
“मैं तैयार हूँ, बाबूजी,” मैंने बाबूजी को अपने कमरे में बुला लिया, “आप तनिक रुकिए. मैं सूटकेस तैयार कर रहा हूँ.”
“रामलोचन,” तभी पत्नी बाथरूम से चिल्लायी, “इधर आओ, रामलोचन.”
अर्दली तत्क्षण प्रकट हो लिया.
“क्या कर रहे थे?” पत्नी अर्दली पर कड़की, “तुम्हें इतनी आवाज़ें क्यों देनी पड़ीं?”
“हम आ रहे थे, मेम साहब.”
“क्या कर रहे थे?”
“खाना खा रहे थे, मेम साहब,” अर्दली झेंप गया.
“खाना बाद में खाना,” पत्नी ने उसे आदेश दिया, “पहले झाड़ू लेकर बाथरूम से काँच उठाओ. वहाँ एक शीशी टूट गयी है.”
“जी साहब,” अर्दली झाड़ू लेने लपका. वह पत्नी से बहुत डरता था.
“मालूम है?” पत्नी मेरी ओर देख कर चेहरे पर उदार भाव ले आयी, “यह ऑफ़्टर-शेव कौन लाया था? कहाँ से लाया था? भारत में कहीं मिलेगा क्या?”
पत्नी का एक भाई मर्चेन्ट-नेवी में कप्तान रहा. विदेशी सामान व विदेशी प्रसाधन-श्रृंगारण की दीवानी पत्नी समय-समय पर अपने भाई से विदेशी सामग्री मँगवाती रहती थी.

“तुम जानती हो शाम के समय झाड़ू नहीं लगाना चाहिए,” अर्दली को झाड़ू के साथ कमरे में प्रविष्ट होते देख कर मैंने उसे बाहर रहने का आदेश दिया, “माँ झाड़ू का बहुत वहम रखती रही हैं और फिर बाबूजी बुरा मानते हैं..... मैं बुरा मानता हूँ.....”

“आज का अपशगुन तो घटित हो चुका है,” पत्नी ने बाबूजी का तनिक लिहाज नहीं रखा और लापरवाही दिखाने लगी, “अब क्या डर है?”
“बताऊँ क्या डर है?” सूटकेस में उस समय मैं अपनी रात वाली चप्पल रखने जा रहा था, वही चप्पल लेकर मैं पत्नी पर झपट पड़ा.....
“यह क्या कर रहे हो, नन्दन?” बाबूजी ने तुरन्त मेरा हाथ छेंक दिया, “तुम्हें होश क्यों नहीं रहता, नन्दन? हमें अभी गाड़ी पकड़नी है.....”
‘भगवान ने हमारे साथ बहुत बुरी की है, बाबूजी,” मैंने पत्नी पर यों पहली बार चप्पल उठायी थी और पत्नी की घबराहट दूर करने के लिए अब हरजाने की एवज में बौखलाहट का स्वाँग रचना ज़रूरी हो गया था, “पहले माँ को छीन लिया, अब शशि को.....”
बाबूजी से अपना हाथ छुड़ा कर मैं दीवार से अपना सिर टकराने लगा.
“होश में आओ, नन्दन,” बाबूजी ने खींच कर मुझे मेरे पलंग पर बिठा दिया, “हमें अब और देर नहीं करनी चाहिए. फ़ौरन स्टेशन के लिए निकल लेना चाहिए. अभी हमें टिकट भी लेनी है.....”
“स्टेशन पर मैं आपको छोड़ आऊँगी,” स्वयं को हानि पहुँचाने की मेरी प्रक्रिया पत्नी को उसकी दहल से बाहर खींच लाने में सफल रही थी अथवा अपनी बहन की पार्टी में उपस्थित रहने की उसकी अभिलाषा अति दृढ़, मैं नहीं जानता, किन्तु पत्नी लगभग सामान्य हो चली थी.

“आपको स्टेशन पर विदा कहने मैं आपके साथ आ सकती हूँ,” अपनी बड़ी बहन के घर के सामने गाड़ी रोक कर पत्नी ने चौथी बार दुहराया.
“नहीं,” मैंने चौथी बार भी अपना स्वर तीता होने से बचा हीलिया और अपने वाक्यों की ज्यों की त्यों पुनरावृत्ति की, “तुम रेणु की स्टाफ-कार में हमें स्टेशन छुड़वा दो. यह गाड़ी यहीं पार्क्ड रहे तो बेहतर रहेगा.”
“तुम और तुम्हारी ये मनमानियाँ,” पत्नी ने पास खड़े एक अर्दली को इशारे से अपने पास बुलाया और कबाब के हॉट-केस तथा बर्फ़ की बाल्टियाँ उसके हाथ में थमा दीं.
“गाड़ी कहीं छूट न जाए,” बाबूजी अधीर हो उठे, “हमारा स्टेशन पर जल्द पहुँचना बहुत ज़रूरी है.”
“मुझे तुम्हारी बहुत चिन्ता रहेगी,” पत्नी मेरी ओर देख कर घनिष्ठता से मुस्करायी. बाह्याचार का उसे अच्छा अभ्यास है.

“मुझे भी,” औपचारिकता से मैं भी अनभिज्ञ नहीं, “अपना ख़्याल रखना.”
“तुम्हारे फ़ोन का मुझे इन्तज़ार रहेगा,” पत्नी गाड़ी से नीचे उतर गई.
“हाँ,” मैंने कहा, “मैं वहाँ पहुँचते ही तुम्हें फ़ोन करूँगा.”

“आपकी यात्रा शुभ हो,” बाबूजी की दिशा में मुस्करा कर पत्नी अपनी बड़ी बहन के लॉन में बिछी कुर्सियों व अतिथियों की भीड़ में सम्मिलित होने आगे बढ़ चली.

“ड्राइवर जल्दी भेजना, बेटी,” बाबूजी ने पत्नी को पीछे से पुकारा, “हमारी गाड़ी छूटने में बहुत कम समय बचा है.....”
रेलवे स्टेशन पर हम ठीक समय से पहले ही जा पहुँचे.
रेलवे पुलिस चौकी का दारोगा मुझे जानता था.

दूसरे दर्जे के वातानुकूलित शयन-यान में हमें शयनिकाएँ दिलाने में दारोगा ने मुस्तैदी दिखाई और रेलगाड़ी के प्लेटफ़ॉर्म पर लगते ही बाबूजी ने और मैंने अपनी-अपनी निर्धारित व्यवस्था सँभाल भी ली.
जैसे ही रेलगाड़ी ने आगे बढ़ कर दारोगा का मुस्तैद चेहरा मेरी आँखों से ओझल किया, मैं फूट-फूट कर रोने लगा. बहन की संकटावस्था के निमित्त छोटी पहुँच की मेरी और बाबूजी की समस्त आशंकाएँक्यों सदा के लिए यों ठिठक गयी थीं और दीर्घ पहुँच के हमारे सभी भय अन्ततोगत्वा क्यों सहीसिद्ध हुए थे?

दीपक शर्मा 

लेखिका -दीपक शर्मा


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