सुपारी

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सुपारी

एक खूबसूरत कहावत है “नेकी कर दरिया में डाल ” क्योंकि हमारी नेकियों का हिसाब रखने वाला कोई है जो समय आने पर हमें हर मुश्किल सही से बचाता है | सुपारी कहानी सुपरिचित लेखिका हुस्न  तबस्सुम ‘‘निंहाँ‘‘जी की एक अनोखी कहानी है | एक तरफ तो ये एक ऐसे व्यक्ति की पीड़ा को दर्शाती है जो जीवन की तमाम विद्रूपताओं से परेशान हो स्वयं ही जीवन के उस पार की यात्रा करता है | उसकी छटपटाहट और बेचैनी में उसके अपने पराए हैं और पराए हितैषी  बन कर सामने आते है | बार-बार  क्यों होता है  ऐसा कि कोई एक तिनका उसे मृत्यु सागर में डूबने से बचा लेता है | आइए जानते हैं हुस्न  तबस्सुम‘‘निंहाँ‘‘ जी की  रहस्य और संवेदनाओं  से भारी कहानी सुपारी से ..

सुपारी 

ठीक रात के दो बजे सेठ नरोत्तम दास काली मण्डी पहुंचे। काली मण्डी, यानी कालू दादा का ठिया। खपरैल डाल कर बनाए गए तमाम छोटे-छोटे मिट्टी पुते घर। सभी आपस में मिले हुए और सारे मकानों को दोनों तरफ से घेरे हुए एक चैहद्दी। जैसे पूरी जगह को दोनों बाँहों में भरे हुए हो। अंत में बांस के बने हुए बड़े-बड़े गेट। गेट पर खड़े दो-चार प्रहरी। कह लो सुरक्षा गार्ड। जब सेठ नरोत्तम दास उधर बढ़े तो उन लोगों ने थाम लिया-

‘‘कहाँ घुसे जा रहे हो़…….पहले संदेसा भेजो अंदर, कहाँ से आए हो, क्या काम है?’’

‘‘ मैं सेठ नरोत्तमदास हूँ, मुझे कालू दादा को सुपारी देनी है’’

‘‘ठीक  है’’-कहते हुए उसने भीतर पुकारा-

‘‘अबे मन्नू उस्ताद से कहो सुपारी आई है’’

-कुछ देर बाद एक लड़का बाहर आया-

‘‘लड्डन भाई, सुपारी को भीतर उस्ताद ने बुलाया है।’’

‘‘……….जाओ सेठ’’

-सेठ जी भीतर चले गए लड़के के साथ। कई दालान व बरामदे पार करने के बाद कालू दादा का कमरा दिखाई पड़ा। एक बड़ा सा हॉल जिस पर नीचे ही दीवान बिछा था और उस पर कालू दादा गाव तकिए के सहारे बैठा हुआ था। हुक्के की नाल उसके मुँह में थी और वह हुक्का गुड़गुड़ाए जा रहा था। लड़का उन्हें वहीं छोड़ कर बाहर से ही चला गया। कालू दादा ने उनका बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया-

‘‘आओ सेठ जी इतनी रात गए कैसे आना हुआ। कुछ चाय पानी़………….’’

‘‘ नहीं, कुछ नहीं’’-कहते हुए सेठ जी वहीं दीवान पर ही बैठ गए।

‘‘अच्छा बताओ, किस के दिन पूरे कर रहे हो? किस हरामी ने आपका जीना दुश्वार कर रखा है…….कल ही काम लगवाता हूँ ’’

‘‘ठीक है  ये लो’’-कहते हुए सेठ ने उसकी ओर एक बैग बढ़ा दिया-

‘‘पूरे दस लाख हैं।’’

‘‘दस लाख, किसकी जान इतनी मंहगी है सेठ, तुम्हारा काम तो पाँच लाख में ही हो जाएगा।‘‘

‘‘……..नहीं रख लो’’

-सेठ के चेहरे पे अजब शून्यता और नारंगीपन था। चेहरे से नितांत हताशा टपक रही थी। जुबान बोलती कम थी लड़खड़ाती ज्यादह थी। अंतस बेजान हुआ जाता था। उनकी कैफियत समझ कर कालू दादा ने सांत्वना दी-

‘‘तुम नर्वस न हो सेठ। कोई नहीं जानेगा कि आप यहाँ आए हो। आप उस आदमी का नाम व पता बता दीजिए और निश्चिन्त हो जाईए। ‘‘

‘‘…….उसका नाम’’ सेठ जी की जुबान फिर लड़खड़ाई।

‘‘हाँ….हाँ…बोलिए…..’’ कालू ने जेब से कलम निकाला और बाजू में पड़ी हुई एक पुरानी सी नोटबुक उठा ली।

‘‘दरअसल… दर…..असल….मुझे ही मारना है।‘‘

‘‘हैं….ह…’’

कालू दादा के हाथ से पेन छूट गई और वह उछल पड़ा।-

‘‘सेठ जी आज कुछ ज्यादह चढ़ा ली है क्या….कमाल करते हो…’’

‘‘ नहीं ……मैं पीता नहीं’’

‘‘ तो?’’

‘‘…..मैं सही कहता हूं। बिल्कुल होश में हूँ।’’ 

‘‘ पर तुम्हें ऐसी कौन सी आफत आन पड़ी कि तुम अपनी ही जान के दुश्मन बन बैठे हो। तुम उसका नाम बता दो जिसने तुम्हें इस हाल तक पहुँचाया है। मैं उसी को न खत्म कर डालूँ ‘‘

‘‘नहीं….नहीं…ऐसा कभी मत करना कभी…’’ कालू दादा उसको देखता रह गया। 

‘‘असल में कालू दादा, मैं बहुत कायर  व्यक्ति हूँ। कई बार आत्महत्या की कोशिश की पर नाकाम रहा। अंत में ये सोंचा कि ये काम तुम्हें दे दूँ।’’

‘‘मगर क्यूं सेठ ….क्यूँ……? वह लगभग तड़प कर बोला।

‘‘…ये मत पूछो, अपने काम से मतलब रखो। बस मुझे इस हाड़-मांस से मुक्ति दिला दो’’

‘‘…ठीक है सेठ जी हो जाएगा काम। अब आप जाएं’’

-सेठ नरोत्तम दास उठे, कालू दादा भी उनके साथ खड़ा हो गया। बड़ी विनम्रता के साथ उनको नमन किया और एक लड़के को पुकार कर उन्हे गेट तक छोड़ने को कहा।

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रात के बारह साढ़े बारह बजे होंगे। कुत्तों ने सुरताल मिलानी शुरु कर दी थी। यहाँ-वहाँ झींगुर भी बोल पड़ते थे। काली रात। भयावह सन्नाटा। कि तभी सेठ नरोत्तम दास की कोठी के पीछे हंगामा बरपा हो गया। सेठ नरोत्तम दास के चैकीदार एक काले भुजंग बदमाश तुल्य व्यक्ति को बुरी तरह पीट रहे थे। सेठ तक खबर लगने से पहले ही वह व्यक्ति तुड़ा-फुड़ा कर भाग खड़ा हुआ।

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तीसरे दिन देर रात सेठ जी फिर काली मण्डी पहुंचे। कालू दादा वैसे ही दीवान पर पड़ा हुक्का गुड़गुड़ा रहा था। सेठ को देख कर उठ बैठा। सेठ जी ने आते ही रद्दा रखा-

‘‘यार किस बात के दादा हो, मेरा काम नहीं हुआ। आज तीसरा दिन है।’’

‘‘…अरे सेठ जी क्या बात करते हो। काम तो हो ही जाता, पर आपने इतने गुर्गे पाल रखे हैं कि कोई मारना तो दूर आपका बाल भी बांका नहीं कर सकता। उल्टे हमारे ही आदमी की अच्छी ठुंकाई कर दी सालों ने। उसकी मरहम-पट्टी करवानी पड़ी सो अलग।’’

-कालू दादा ने एक ही सांस में सफाई दे डाली। सेठ जी बगैर किसी औपचारिकता के उसके सामने उसी दीवान पर बैठ गए और शून्य निहारने लगे। दादा ने उन्हें कुरेदा-

‘‘सेठ जी , मगर ये बात हजम नहीं हो रही कि ऐसा भी क्या आन पड़ा….’’ कि सेठ जी ने दायां हाथ ऊपर उठा दिया-

‘‘नहीं कुछ भी नहीं….‘‘

कालू दादा चुप मार गए। कुछ देर इधर उधर खामोशी लहराती रही फिर कालू दादा ने ही खामोशी तोड़ी-

‘‘सेठ जी आप निश्चिंत हो कर जाएं। भगवान चाहेगा तो एक दो रोज में आपका काम जरुर हो जाएगा।‘‘

 ‘‘देखो दादा, कोई जरुरी नहीं कि ये काम तुम्हारे कारिंदे सन्नाटेदार रातों में ही करें। बाहर चलते फिरते दिन दहाड़े कहीं भी कर सकते हैं।’’

‘‘ठीक है सेठ जी, इस बार ऐसा ही होगा।’’-सेठ नरोत्तमदास उठ कर चले आए। इस बार भी बाहर खड़ा लड़का उन्हें गेट तक छोड़ने आया।

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सेठ नरोत्तम दास वास्तव में शहर के नामी-गिरामी हस्तियों में से थे। इनके पिता सेठ पुरुषोत्तम दास कभी आस पास के गांवों के जमीदार हुआ करते थे। तीन बेटियों के बाद चौथे नंबर पर नरोत्तम दास का जन्म हुआ था। उस दिन रियासतों में घी के दिए जले थे। गरीबों के लिए लंगर किया गया। और जाने क्या-क्या। इसके बाद इनके हर जन्मदिन पर एक बहुत बड़ा लंगर होता और सारा जमाना छक कर खाता। 

नरोत्तम दास की शिक्षा-दीक्षा भी बहुत अच्छी हुई। विदेश तक जा कर पढ़ाई की। चाहते तो बड़ी से बड़ी नौकरी में लग सकते थे किन्तु न उनकी रूचि थी नौकरी में न पिता ने ही चाहा। उनका यही कहना था, एक ही बेटा है नौकरी पे चला जाएगा तो जमीदारी कौन संभालेगा। करोंड़ों की जमीन। पेट्रोल पंप। ईंर्ट के भट्टे वगैरह सब बिलट जाएंगे। खैरियत इसी में है कि अपने ही कामों में वक्त व मेहनत की जाए। एक गरीब घर की लड़की से बगैर किसी ढोल तमाशे के नरोत्तमदास का ब्याह भी हो गया। आगे चल कर पिता के कारोबार को बेटे ने चैगुना बढ़ाया। इसी बीच उनके यहाँ एक बेटे ने जन्म लिया। नाम दिया गया सवोत्तम दास। पिता की तरह सर्वोत्तम भी मुँह में चाँदी का चम्मच ले के पैदा हुआ था। इकलौती औलाद। माँ-बाप का सिर चढ़ा। किन्तु इन सर्वोत्तम के लच्छन ही अलहदा थे। होश संभलते ही उन्हें शराब की लत लग गई। गलत संगत का असर। जो दौलत उनके आंगन में बरसा करती थी वही दौलत अब उन्हीं के आंगन से नालियों के रस्ते बाहर गटर व नालों में बहने लगी। शुरु में तो बाहर बाहर रहने के कारण सेठ नरोत्तम दास जान ही न सके। मगर जब जाना तो बहुत देर हो चुकी थी। हांलांकि उन्होंने काफी सख्ती की पर कब तक? जब बेटे के पांव में पिता का जूता आने लगे तो स्थिति वही नहीं रह जाती। फिर बीच में पत्नी का लाड़ भी आ जाता। पत्नी ने सदैव बेटे के कारनामों पर पर्दा डाले रखा जिससे उसकी बुरी आदतों को और हवा मिली। 

जब बेटे ने बीसवें साल में कदम रखा, पत्नी स्वर्ग सिधार गईं। दोनों का जीवन बेरंग हो उठा। पिता शोक में डूब गए, पु़त्र शराब में। दोस्तों ने सलाह दी-‘‘दूसरी शादी कर लो’’

-मगर उन्होने मना कर दिया।‘‘ नहीं, अब कुछ नहीं’’

हालांकि प्रायः उन्हें महसूस होता कि उनका अंतस उन्हें पुकार रहा है। किन्तु अपनी अंतधर्वनियों को उन्होंने यूं ही जाने दिया। कौन कहता है बृहम्चर्य साधा नहीं जा सकता ? 

वह ऐसा प्रायः सोंचते और अपने भीतर की आवाज को दबा ले जाते। सारा ध्यान अपना साधनाओं और अपने धन्धे में लगाना शुरू कर दिया। उधर बेटे को गुल छर्रे उड़ाने के और बेहतरीन अवसर मुहैय्या होने लगे। वह पिता की दौलत दोनों हाथों से लुटाने लगा। अब पिता का हस्तक्षेप भी कोई मायने नहीं रखता था। वह सुनता ही कब था? एक रोज अजीब ही घटना घटी। उस रात उनको अजीब सी बेचैनी हो रही थी। गई रात तक उनको आखिर नींद न आई तो वह अपनी बालकनी में आ कर टहलने लगे। कुछ क्षण बाद ही उन्होंने एक अजीब ही दृश्य देखा। एक युवती सवोत्तम के रूम से निकल कर जाती हुई दिखाई दे गई। वह चौंके फिर बाहर खड़े चौकीदारों को फोन करके उस लड़की को बाहर ही रोक लेने को कहा। कुछ देर बाद स्वयं उस स्थान पर पहुँचे। उस लड़की को बड़े ध्यान से देखा फिर पूछा-

‘‘बेटा, क्यूं अपना जीवन बर्बाद करने पे अमादा हो। इतनी रात गए घर वापस जा कर क्या बताओगी कि कहाँ गई थी?‘‘

‘‘नहीं अंकल, ऐसी बात नहीं है। मम्मी को पता है कि सर्वोत्तम मुझसे विवाह करने वाला है।‘‘

‘‘…..अगर उसे विवाह करना है तो फिर देर किस बात की, चलो मेरे साथ’’ -और वह उसकी बाँह पकड़ कर सवोत्तम के रूम की तरफ मुड़ गए। दरवाजा नॉक किया। कुछ देर बाद सवोत्तम बाहर आया। पर सामने पिता व उस लड़की को देखते ही ठिठक गया-

‘‘क्या बात है डैडी,…………और तुम…?‘‘

‘‘सर्व, ये अच्छी लड़की है। तुमसे शादी करना चाहती है। तुम्हारी पसंद अच्छी है। मैं सुबह तुम दोनों की शादी करवा देता हूँ…..‘‘

‘‘क…क्या कह रहें हैं डैडी आप भी। इन दस-दस हजार बीस-बीस हजार पर बिकने वाली लड़कियों से भी कोई शादी करता है। ये सब जिंदा लाशें हैं डैडी।’’-लड़की के होश ही उड़ गए। उसने आव देखा न ताव, धड़ा धड़ कितने ही चांटें उसके चेहरे पे रसीद कर दिए। वह बौखला गया। कभी लड़की को देखता कभी पास खड़े पिता को। लड़की फूट-फूट कर रोने लगी। उन्होंने उसका हाथ थामा और बोले-

‘‘ आओ मेरे साथ।’’ और अपने कमरे में ले गए फिर पूछा-

‘‘बोलो बात क्या है?’’

‘‘अंकल कल तक तो ये आदमी मुझसे प्रेम का नाटक कर रहा था। अंकल मेरी माँ एक स्कूल में अध्यापिका हैं। पिता नहीं है। मेरी मम्मी के स्कूल के मैनेजर से इस आदमी की अच्छी दोस्ती है । मैं कभी-कभी मम्मी के स्कूल जाया करती हूं। वहीं स्कूल में मेरी इससे भेंट हुई। फिर इसने कहा मैं तुम्हें अच्छी नौकरी दिलवाऊंगा। और उसके बाद………….

‘‘ जब मैने इससे संबन्ध बनाने से इन्कार कर दिया तो इसने विवाह कर लेने का वादा किया……और अब जब मैं इस हालत से हूँ तो ये मुझसे मिलने से कतराने लगा है। मैं यहाँ तीन बार आ चुकी हूँ अंकल इसी आग्रह से पर ये झूठा वादा करके मुझे चलता करता है। मेरी माँ चिंता में घुली जा रही है। ये दाग ले के कहाँ जाऊँ मैं ? आज भी यही कहा कि बिजनेस ट्रिप पर विदेश जा रहा है, आते ही विवाह कर लेगा। अगर आप न होते तो आज भी मैं मूर्ख बन कर चली गई होती’’

-इतना कह कर वह चुप हो गई। वह कुछ देर तक उसे रोते हुए देखते रहे और सोंचते रहे-

‘‘………….क्या कमी है इस भेाली भाली लड़की में। कमी तो उस गटर के कीड़े में है जिसे अच्छे-बुरे की तमीज नहीं है। जाने कौन सी कमजोर घड़ी में हमने इस संतान को आकार दिया था। उन्होंने उसे गेस्ट रूम में भेज दिया और कहा-

‘‘शरीफ घर की बहू-बेटियाँ रात के अंधेरे में बाहर नहीं निकलतीं।‘‘

-लड़की ने कृतज्ञ होने वाले भाव से उनके पांव छू लिए। 

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सेठ नरोत्तम दास उसके जाने के बाद एक अव्यक्त पीड़ा से भर उठे। कभी-कभी सम्मुख ऐसी परिस्थितियाँ आ खड़ी होती हैं कि व्यक्ति न तो उनसे मुँह मोड़ पाता है और न ही उनका सामना ही कर पाता है। ऐसी ही उहापोह की स्थिति से गुजर रहे थे वह। एक बेटा भी दिया ऊपर वाले ने वो भी जलाने के लिए। मालती होती तो कुछ सहारा मिल जाता। मगर क्या सहारा मिलता, उसी ने तो इस आदमी के बच्चे को शैतान बना डाला इसकी गलतियों पर पर्दा डालते-डालते। मैं सोंचता रहा सब ठीक है। पर मैं क्या जानता था कि धीरे-धीरे एक ज्वालामुखी आकार ले रहा है। जिस दिन फटेगा सब ध्वस्त हो जाएगा। ऐसी ही कितनी ही वेदनाओं से अटे पड़े वह गई रात तक जागते रहे। लड़की सुबह होते ही चली गई। वह जरा देर से जागे। उसके रूम में पहुँचे तो उसे न पाकर धक् से रह गए। कुछ देर वहीं निढाल से बैठे रहे फिर यंत्रवत उठे और बाहर चले गए।

सायं वह लड़की के बताए गए इलाके में पहुँचे और आस-पास के लोगों से उसके परिवार व किरदार की शिनाख्त की। लोगों ने माँ-बेटी को निहायत शरीफ व शालीन महिला बताया। हाँ एक शिक्षक ने जरा दबी जुबान में इतना बताया कि सेठ नरोत्तम दास का बेटा जरूर यहाँ आता देखा गया है। 

वह चले आए। दो रोज बाद फिर उस बस्ती में आए और सीधे उस लड़की के घर गए। लड़की ने देखते ही उनके पांव छुए और भीतर लिवा लाई। फिर वह देर तक उन माँ-बेटी से अपने बेटे द्वारा किए गए दुव्र्यवहार के लिए माफी-तलाफी करते रहे और ये आश्वासन दिया कि वह अपने बेटे के पापों का प्रायश्चित करेंगे। वह उस परिवार का सारा खर्च उठाएंगे व आने वाले बच्चे की पूरी जिम्मेदारी लेंगे और उस बच्चे को अपने खानदान का ही नाम देंगे। माँ-बेटी पर से मानों पहाड़ उतर गया। इसके बाद उनका प्रायः वहां का आना जाना हो गया और उन्होंने सार्वजनिक रूप से शिवांगी को अपनी बहू घोषित कर दिया। सर्वोत्तम ने सुना तो अपना सिर पीट लिया।

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शिवांगी ने एक सुंदर बेटी को जन्म दिया। उस दिन नरोत्तमदास फूले नहीं समाए। हस्पताल में देर तक उसे सीने से लगाए रहे। कुछ दिन बाद शिवांगी अपने घर चली आई। कई बार सेठ जी के मन में आया कि उसे अपने साथ अपनी हवेली लिवा ले जाएं। मगर सर्वोत्तम की करतूतों को देख उनका साहस न होता। वह तो दिन-ब-दिन बिगड़ रहा था। अब तो रात को भी गायब हो रहता था घर से। बाहर के लोग आए दिन बेटे की बुरी आदतों की शिकायत करते रहते। वह तराह कर जाते। अब वह बस में कहाँ है जो संभाला जा सके। घर की शून्यता मारे डाल रही थी। खाना-पीना छुआ नहीं जाता। अब मन उचट चुका था दुनिया से। शिवांगी के वहाँ जाते तो भले ही थोड़ा हँस बोल लेते। शिवांगी और उसकी माँ ने उन्हें जो अपनापन व संबल दिया उससे उन्हें बहुत सहारा मिला।

एक रात वह जब सोने की तैयारी कर रहे थे उनके मैनेजर का फोन आ गया। वह उसी वक्त मिलना चाह रहा था। वह चौंके-  ‘’इतनी रात गए शलभ’’

‘‘ सर बात ही ऐसी है’’

‘‘ठीक है आ जाओ’’

-कुछ मिंट  बाद शलभ उनके कमरे में था। 

‘‘सर, वो सर्व बाबू माले गांव वाला प्लांट सेठ दामोदर के हाथ 50 करोड़ का बेच रहे हैं’’

‘‘…क्या, उसका दिमाग खराब हो गया है…….दमोदर को फौरन मना कर दो‘‘

‘‘वो तो मैं मना कर ही दूंगा, लेकिन कब तक ? दामोदर जी आज जब उस प्लांट के कागज देखने आए तब मुझे मालूम पड़ा….किन्तु सेठ जी…..किन्तु सेठ जी बुरा न माने तो………सर्व बाबू के लच्छन ठीक नहीं दिखते। आपने इतना कुछ बनाया है वह बहुत जल्द ही सब…..‘‘

-नरोत्तमदास जी ने घूर के देखा उसे-

‘‘…मिटाएगा कैसे,……उसके बाप का है…?‘‘

‘‘….नो….नो….सर,….येस सर..’’-शलभ हड़बडा गया। 

‘‘…ठीक है तुम जाओ’’ -वह चला गया।  नरोत्तम दास जी के हाथ के तोते उड़ गए। किस जन्म की सजा मिली है ये। वह बेडरूम में सारी रात करवटें बदलते रहे। तमाम उधेड़बुन में उलझे रहे।  कभी जेहन शिवांगी की तरफ चला जाता तो कभी सर्वो की तरफ दौड़ जाता। अंततः हार के मन सोंचता-

‘‘मौत क्यूं नहीं आ जाती।’’ किन्तु बुलाने से मौत तो आने से रही। बिजनेस के क्षेत्र में अपना विशेष मुकाम बनाने वाले और जीवन संघर्ष में सदैव विजयी होने वाले नरोत्तमदास आज स्वतः परास्त होने लगे थे।….व्यक्ति सब कहीं जीत जाता है पर अपनों से ही हार जाता है। वह भी हारने लगे थे। ढहने लगे थे। सर्वो से हफतों मुलाकात नहीं होती। जाने कब घर आता और कब चला जाता। आता भी या नहीं। हाँ, शिवांगी के वहाँ जाते तो दिल थोड़ा बहल जाता। फिर भी अब ढहने लगे थे। कुछ दिनों से काफी फ्रस्टेट रहने लगे थे। इतने कि खुद को समाप्त करने की कोशिशें तक करने लगे थे। एक रोज आधी रात को कनपटी से पिस्टल सटाए खड़े थे। एक आद मंत्र बुदबुदाए कि तभी अचानक कुत्ते भौंक पड़े और उनकी पिस्टल हाथ से छूट कर नीचे जा गिरी। झुंझला कर बेड पर लेट रहे। दूसरी बार फांसी लगाने की कोशिश की मगर वो भी काम दुश्वार लगा। कोई न कोई आ टपकता और देर रात तक जद्दो जहद के बाद भी न हो सका। तीसरी दफा रेल की पटरियों पे शरण ली किन्तु दुर्भाग्य कि उस दिन सारी ट्रेने लेट। रेल की प्रतीक्षा करते-करते थक गए उन्हें भूख-प्यास सताने लगी। वहां से भाग आए। जीवन इतना दुश्कर हो जाएगा, कभी सोंचा न था। मौत भी नहीं नसीब। फिर भी मौत जितना उन्हें नकारती, वह उतने ही तीव्रता से उसकी ओर भगना चाहते। किन्तु नहीं।

जब सर्वो ने सुना कि उन्होंने दामोदर को प्लांट को बेचने से मना कर दिया है, तो उसका पारा सांतवें आसमान पर आ पहुँचा। आव देखा न ताव और जा कर नरोत्तम दास की अच्छी खबर ली। उन्हें काटो तो खून नहीं। जीवन का ये पहला अत्यंत विभेदक आघात था। उनकी जुबां चिपक के रह गई। वह सकते में बैठे रह गए। वह जाने क्या-क्या कह कर उल्टे पांव चला गया। तब उन्हें याद आई काली मण्डी की। उन्होंने एक ठोस निर्णय लिया। अपनी एक वसीयत तैयार की और अपनी सारी चल अचल सम्पत्ति शिवांगी की बेटी के नाम कर दी और शिवांगी को उस सम्पत्ति व बच्चे की संरक्षक। फिर दुनिया से उजड़ने का मन बना लिया। सोंचा संन्यास ले लेता हूँ। किंतु नहीं । मोह से पीछा कहाँ छूटेगा और सर्वो चैन नहीं लेने देगा। जब तक शरीर में प्राण हैं आदमी को चैन कहाँ? चिंता कहाँ खत्म हो सकती है। बेहतर है शरीर ही त्याग दिया जाए।

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आज सेठ नरोत्तम दास शिवांगी, उसकी माँ व बच्ची को ले कर शॅापिंग करने गए। कालू दादा ने अपना आदमी उनके पीछे उसी दिन से लगा दिया था। वह तीनों को लेकर पारस मार्केट पहुँचे। अभी वे चारों एक शॅाप पर खड़े कपड़े देख रहे थे कि सहसा शिवांगी की माँ ने पीछे मुड़ कर देखा और चीख पड़ी।

‘‘……बचाओ…’’ -ये चीख इतनी हृदय विदारक थी कि पूरे मौल में भगदड़ मच गई। सेठ जी पर निशाना लगा रहा गुण्डा जान छुड़ा कर भागा।

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खलील ने कालू दादा के सामने बैठते हुए कहा-

‘‘दादा उस सेठ की जिंदगी बड़ी बेशरम है। हफते भर से पस्त हो गया हूँ पिछवाते-पिछवाते। आज तो बात बन जाती पर वो साली बुढ़िया ऐसा चिंघाड़ी कि भागते नहीं बना। स्…साली मिर्ची जैसी है और आवाज कितनी बुलंद। पूरा मॅॉल इकटठा कर लिया। बड़ी मुश्किल से जान बचा कर भागा।…वर्ना…‘‘

‘‘…तुम साले सब हरामखोर हो। एक छोटा सा खून नहीं कर सकते। चले हो गुण्डागिरी करने। ठीक है जमील को बुलाओ।’’

-खलील ने बाहर जा कर जमील को भेज दिया। वह आया तो दादा ने उसे पूरा लोकेशन समझाते हुए कहा-

‘‘….सीधा आदमी है। पूरी कोठी में अकेला ही रहता है कोठी के ऊपरी हिस्से में। इसके कमरे का दरवाजा नीले रंग का है। बाकी सारेां का सफेद। आराम से पहचान लोगे। कद काफी लम्बा, छः फुटा हो सकता है। सिर पे बाल बिल्कुल नहीं। और हाँ कमरे का दरवाजा हमेशा खुला ही रखता है…’’

-जमील ने सारा कुछ समझते हुए सिर हिला दिया-

‘‘…..समझ गया दादा, काम हो जाएगा।’’

रात के तीसरे पहर छोटी कोठी में एक हलचल सी हुई। एक साया कोठी की पिछली बाऊँड्री पार करके भीतर पहुँचा और ऊपर की ओर सीढ़ियों पर चढ़ने लगा। रात काली थी मानो अमावस्या उतर आई हो। चैकीदारों ने झपकियाँ ले ली थीं। वह दबे कदमों से सेठ के बेडरूम तक पहुँचा। बाहर से कमरे का जायजा लिया। दरवाजा व खिड़कियाँ खुली हुई थीं। देर रात तक बेचैनी व अवसाद से भरे सेठ जी को करवटें बदलते-बदलते अब झपकी आई ही थी। वह बेड पर चित्त पड़े थे। उसने खिड़की की ओट से भीतर झांका फिर कुछ देर तक उन्हें यूँ ही निहारता रहा। सयास उसके माथे पर गहरे बल पड़़ गए। तनिक ठहर कर सोंचा उसने फिर मन नही मन बड़बड़ाया-

‘‘नहीं…..नहीं हो नहीं सकता। …कभी नहीं।’’ और वह लौट पड़ा।

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रात 1.30 पर काली मण्डी में एक बार पुनः सेठ नरोत्तम दास की गाड़ी खड़ी थी। इस बार सेठ के चेहरे पर अजीब खिंचाव और तनाव था। अजीब सी मुद्रा लिए वह कालू दादा के निवास की तरफ बढ़े। दरबानों ने उन्हें रोका नहीं । वह सीधे कालू दादा के कमरे की तरफ बढ़ गए। उन्हें देख कालू दादा चौंक पड़ा-

‘‘…हैं…सेठ जी…आप….‘‘

‘‘..क्या मजाक करते हो…किस बात के दादा हो, एक मामूली सा काम तुमसे नहीं हो पा रहा। नाकारा आदमी रख छोड़ें हैं तुमने…कैसा बदनसीब हूँ जिंदगी तो जिंदगी यहाँ तो मौत के भी लाले पड़े हैं…..।’’ कहते कहत सेठ जी का गला भर आया।

-उनकी इस मनःस्थिति पर कालू दादा का मन भींग गया जैसे। पहली दफा उसने अपने भीतर एक इंसानी किस्म की संवेदना महसूस की थी वर्ना आज तक तो वह भावों से रिक्त एक हाड़-मांस हुआ करता था। बादलों से खाली आसमान हुआ करता था। किन्तु आज सहसा उसका मन घटाओं से भर गया था। वह सेठ जी से नजरें न मिला सका और उनको अनदेखा करते हुए बाहर को हांक लगाई-

‘‘…अबे नदीम…जरा जमील को बुलाना…’’

‘‘..वह घर गया है दादा, दिन की ड्यूटी है उसकी सुबह आएगा।‘‘

‘‘….ठीक है सेठ आप जाओ, इस बार आपका काम जरूर होगा मैं वादा करता हूं।’’

-कहते हुए उसने सेठ की तरफ पान बढ़ाया। सेठ ने मुँह में पान डाला और चले आए। उनके जाने के बाद कालू दादा ने जीमल को फोन लगाया-

‘‘….अबे कहाँ मर रहा है। उस काम का क्या हुआ….?’’

‘‘…हाँ दादा मैं आपके पास आने वाला था, दर असल दादा मैं उस सेठ का खून नहीं कर सकता। वह बड़ा नेक व शरीफ इंसान है। छः साल पहले उसने मेरी बहन की शादी करवाई थी। ये सेठ हर साल कुछ गरीब लड़कियों की शादी करवाता है। उस बार मेरी बहन का घर भी इसने बसाया था। अब जिस आदमी ने मेरी बहन का घर बसाया है उसका खून मैं कैसे कर सकता हूँ। मैं तो उसकी जान बचाने में खुद अपनी जान लगा दूं।…मैं तो अब उस हरामी को तलाश रहा हूँ जिसने इस फरिश्ते जैसे आदमी को मारने के लिए सुपारी दी है…‘‘

‘‘…..ओत्…तेरे की …बंद कर लेक्चर…‘‘-कहते हुए दादा ने फोन काट दिया और बड़बड़ाया-‘‘अब ये काम खुद करना पड़ेगा…..’’

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सुबह के दस बजे थे। सर्वोत्तम पिता के सामने खड़ा भड़क रहा था-

‘‘डैडी…आपको पता है आपने क्या किया है….मुझे सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया है। मुझे उस रंडी शिवांगी का मोहताज बना दिया’’

‘‘…जबान संभालो…तमीज से बात करो वह तुम्हारी पत्नी है। बाकी मैने सारा कुछ अपनी मेहनत और मशक्कत से हासिल किया है। नींद चैन खो कर, सो तुम्हारे उड़ाने के लिए नहीं बल्कि इसमें इजाफा करने के लिए। शिवांगी कम-से-कम इसे बनाए तो रखेगी। तुम जैसे आज सड़क पर आए हो दस साल बाद आते।…तुम्हें तो सड़क पर आना ही था। तुम्हारे करम ही ऐसे हैं।…जाओ,…मेहनत करो कमाओ…तब खाओ…तुम जैसी बिगड़ी औलाद मेरी नहीं हो सकती…..।’’

‘‘…आप अच्छा नहीं कर रहे हैं…अंजाम बुरा होगा।’’

‘‘…हुँ…ह ले दे के एक ही बेटा वो भी पूरी तरह से निकम्मा। एक बाप के लिए इससे बुरा अंजाम और क्या हो सकता है..’’

‘‘हुँ…ह…’’-कहते हुए सर्वोत्तम ने एक जोर की ठोकर पास में पड़ी कुर्सी पर मारी और दनदनाता हुआ लौट गया।

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नवम्बर का महीना। रात का दूसरा पहर। नम हवाओं का विमोहक स्पर्श। ठण्डी-ठण्डी फजां.। मानो हवाएं समंदर के कलेजे से लग कर आई हों। सेठ नरोततम दास को अर्से बाद आज गहरी नींद आई थी। हल्की चाँदनी खिड़की के दरीचों से छन-छन कर उनके शरीर पर पड़ रही थी। एक साया उनके कमरे में धीरे-धीरे दाखिल हुआ। दूसरा साया खिड़की पर ही ठिठका खड़ा रह गया। दोनों साए एक-दूसरे से बेखबर। खिड़की वाला साया खिड़की की ओट से निशाना साधने लगा। अभी वह पोजीशन में आया ही था कि ‘‘धांय‘‘ के स्वर से कमरा गूंज गया और खिड़की वाले साए की रिवॉल्वर एकदम से लड़खड़ायी और उसकी गोली कमरे वाले साए की कलाई छेद गई। उसके हाथ से रिवॉल्वर छूट गया। वह लड़खड़ा कर गिर पड़ा। खिड़की वाला साया उछल कर कमरे में आया और भीतर वाले साए को दबोच लिया-

‘‘…कौन हो तुम ?’’

‘‘….इ…इनका…बेटा…’’ -उसने कांपते हुए कहा। कालू दादा ने अपने चेहरे पर से कपड़ा हटाते हुए कहा-

‘‘…स्…साला अब समझा। अरे साले जो पहले ही मर चुका है उसे मारने आया है….मैं तो उसे बस इस शरीर से मुक्ति दिलाने आया था…उसके जीवन का दर्द मिटाने आया था।’’

-कहते हुए वह सेठ की तरफ बढ़ा। गोली सेठ के कांधे को छीलती निकल गई थी। खून बह रहा था। सेठ नीम बेहोशी में थे। तब तक नौकर चाकर भी इकट्ठा हो चुके थे। आनन फानन में सेठ को हस्पताल पहुँचाया गया। कालू दादा वहीं से वापस चला आया। दूसरी सुबह जब सेठ जी होश में आए तो स्वयं को ही धिक्कारा-

‘‘..जा…नरोत्तम दास जिंदगी तो क्या तू मौत के काबिल भी नहीं।’’-वह हस्पताल में लेटे-लेटे शून्य में निहार रहे थे। तभी दरवाजे पर हलचल सी हुई। अगले क्षण दरवाजा खुला। कालू दादा दाखिल हुआ और उनको सलाम करके पैंताने बैठ गया-

‘‘..कैसी तबियत है सेठ…कैसा महसूस हो रहा है?’’

‘‘..नहीं…कुछ नहीं…’’

-वह कुछ देर बैठा मुग्ध भाव से सेठ की तरफ देखता रहा फिर उनके समीप खिसकते हुए बोला-

‘‘…सेठ तुम ये काम अपने बेटे को सौंपते तो ज्यादह अच्छा होता। वह आपका काम हमसे अच्छा करता।’’

-कहते हुए कालू दादा ने रूपयों का बैग उन्हें थमा दिया-

‘‘..इसकी जरूरत मुझसे ज्यादह तुम्हारे बेटे को है।’’

‘‘…क्या मतलब?’’

‘‘…कुछ नहीं, भगवान तुम्हें जीवन दे रहा है तो उसका सम्मान करो। तुमने किसी की डोली उठवाई है, किसी के सिर पे हाथ रखा है, भूखों का पेट भरा है उन सबकी दुआएं तुम्हारा कवच बन गई हैं। यही नेकियाँ तुम्हारी मौत में आड़े आ रही हैं| तुम्हें यूं ही मरने नहीं देंगी। मौत की तरफ भागने से अच्छा है तुम अपना जीवन इसी सब में लगाओ। तुम्हारे बेटे को न सही, संसार को तुम्हारी बहुत जरूरत है। हाँ अपने बेटे से जरा सावधान रहना।’’

-कहते हुए कालू दादा उठा और कमरे से बाहर निकल गया। सेठ नरोत्तम दास कभी जाते हुए उस कालू दादा को महसूस कर रहे थे। कभी उस बैग पर निंगाह फेर रहे थे।

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                                                                     हुस्न तबस्सुम ‘‘निंहाँ‘‘

                                                                         

हुस्ना तबस्सुम "निहां '
हुस्न तबस्सुम “निहां ‘
हुस्न तबस्सुम निहां युवा लेखिका हैं. आधा दर्जन के लगभग कहानी-कविता-आलेख आदि की पुस्तकें प्रकाशित. संपर्क – nihan073@gmail.com
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1 COMMENT

  1. बहुत ही मर्मस्पर्शी , उत्तम रचना।सारे किरदार अच्छे से फ़र्ज निभाते हुए..

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