एक चिट्ठी :साहित्यकार /साहित्यकारा भाइयों एवं बहनो के नाम

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किरण सिंह 
बहुत दिनों से कहना चाह रही थी तो सोंची आज कह ही दूँ… अरे भाई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है तो मैं क्यों चुप रहूँ भला!
बात बस इतनी सी है कि यह मुख पोथी जो है न आजकल की सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली पत्रिका है जहाँ हर प्रकार के साहित्यिक तथा असाहित्यिक रचना को थोक भाव में मुफ्त में स्वयं प्रकाशित किया जा सकता है तथा नाम या बदनाम कमाया जा सकता है ! इतना ही नहीं आजकल तो लाइव आकर अपनी रचनाएँ सुनाया भी जा सकता है यहाँ! फिर काहे को छपने छपाने की मृगतृष्णा में पैसा देकर इक्का दुक्का रचना छपवाई जाये जिसके कि पाठक तो मिलने से रहे हाँ आलमारियों की शोभा अवश्य बढ़ेगी !
अच्छा तो यह रहेगा कि अपनी रचनाओं को बेहतर से बेहतरीन करने का प्रयास किया जाये 
तत्पश्चात अच्छे पत्र पत्रिकाओं तथा ब्लागों में प्रकाशन के लिए भेजी जाये जहाँ प्रकाशन के लिए कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती है और लोग आपको पढ़ते भी हैं! आप चाहें तो अपना स्वयं का भी बलाॅग बना सकते हैं! 
यदि हम गौर फरमायेंगे तो पायेंगे कि नवोदित साहित्यकार अपने अति महत्वाकांक्षा की वजह से साहित्यक माफियाओं के द्वारा स्वयं ही शोशित हो रहे हैं ! जरा सोंचिये साझा संग्रह छपवाने के लिए रचनाएँ हमारी, पैसा हमारा, और नाम और पैसा कमाकर महिमामंडन करवाये कोई और सिर्फ आपको आपके ही पैसे से मेडल , कप, तथा सर्टिफिकेट का झुनझुना थमाकर !
कुछ साहित्यिक संस्थाओं में तो ऐसा भी सुनने में आया है कि नवोदित साहित्यकार अपनी रचना लेकर गये हैं और उसी रचना में थोड़ा बहुत फेर बदल कर स्वयंभू  ( उनसे कुछ बड़े साहित्यकार ) अपने नाम से मंच पर उद्घोष कर देते हैं और नवोदित साहित्यकार किंकर्तव्य विमूढ़ देखते रह जाते हैं! 
फिर भी बहुत से साहित्यकार तथा साहित्यिक संस्थाएँ आज भी साहित्य हित के उद्देश्य से कार्यरत हैं सिर्फ आवश्यकता है परखने की! 
इस लेख  का उद्देश्य सिर्फ साहित्यकारों को जागरूक करना है न तो किसी को नीचा दिखाना है और न ही किसी को हतोत्साहित करना है | मेरा उद्देश्य सिर्फ उनके समय और पैसे को बचाते हुए उनकी प्रतिभा को सही दिशा देना है | 

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