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सावन की बुंदियां


सावन के आते ही अपनी धरती ख़ुशी से झूम उठती है , किसान अच्छी फसल की उम्मीद करने लगता है और बावरा मन गा उठता है .....

सावन की बुंदियां



उमड़ - घुमड़ कर
श्याम मेघ , अम्बर छाए
संकुल नभ गलियां
रिमझिम गिरे सावन की बुंदियां

शीतल , मृदुल फुहारें गिरतीं
अमृत सम मधुमय जल झरतीं
भरतीं पोखर , झीलें , नदियां
रिमझिम गिरे सावन की बुदियां


तप्त हुई बेचैन धरा की
है जलधर ने प्यास बुझाई
कृषकों के चेहरों पर खुशियां
रिमझिम गिरे सावन की बुंदियां


अट्टालिका गगनचुंबी हित
वृक्ष कटें वन , उपवन के नित
झूला किस पर डाले मुनिया ?
रिमझिम गिरे सावन की बुंदियां

उषा अवस्थी

लेखिका -उषा अवस्थी


पढ़ें सावन पर कुछ भीगती हुई कवितायें -


सावन में लग गयी आग कि दिल मेरा (कहानी )

सावन पर किरण सिंह की कवितायें

सावन एक अट्ठारह साल की लड़की है

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कहानी -जीवन का सत्य

"संसार से भागे फिरते हो भगवान् को तुम क्या पाओगे" चित्रलेखा फिल्म का यह लोकप्रिय गीत जीवन के सत्य को बहुत कुछ उजागर करता है | यूँ तो मन की शांति के लिए बहुत सारे आश्रम हैं जहाँ लोग जाते हैं , ध्यान संयम सीखते हैं , परन्तु क्या कोई गृहस्थ अचानक से संन्यास ले ले तो उसके मन में पीड़ा नहीं होगी ? क्या उसकी घर -गृहस्थी बिखरेगी नहीं ? कर्म को प्रधानता देने वाला हमारा धर्म कर्म से भागने का सन्देश नहीं देता | पढ़िए जीवन के इसी सत्य को उजागर करती किरण सिंह जी की लोकप्रिय कहानी ...

जीवन का सत्य 

अरे – अरे यह मैं कहाँ आ गई? अपनी हमउम्र श्याम वर्णा तराशे हुए नैन नक्श वाली साध्वी को अपनी खाट के बगल में काठ की कुर्सी पर बैठे हुए देखकर मीना कुछ घबराई हुई सी उससे पूछ बैठी। साध्वी वृक्ष के तना के समान अपनी खुरदुरी हथेली उसके सर पर फेरती हुई बोली बहन घबराओ नहीं तुम सुरक्षित स्थान पर आ गई हो।
मीना – लेकिन कहाँ? और फिर मैं यहाँ कैसे आ गई?

साध्वी बगल में रखे हुए एक केतली में से तुलसी पत्ता, अदरक और गुड़ का काढ़ा स्टील के गिलास में उड़ेलती हुई बोली उठो बहन पहले काढ़ा पी लो मैं सब बताती हूँ। वैसे भी इतनी ठंड है और तुम नदी में… अपने प्रश्न को अधूरा छोड़ते हुए ही साध्वी दूसरा प्रश्न कर बैठी आखिर ऐसी कौन सी मुसीबत आन पड़ी थी बहन कि ईश्वर का दिया हुआ इतना सुन्दर उपहार को ही समाप्त करने जा रही थी वो तो अच्छा हुआ कि तुम्हें बचाने के लिए अपने दूत प्रेमानन्द को ईश्वर ने भेज दिया था वर्ना………

इतना सुन्दर शरीर ईश्वर ने दिया है तुम्हें और जहाँ तक मैं तुम्हें समझ पा रही हूँ अच्छे – खासे घर की लग रही हो साध्वी किसी ज्योतिषाचार्य की भांति मीना का भूत, भविष्य और वर्तमान गिन रही थी और काढ़ा के एक – एक घूंट के साथ – साथ मीना की कड़वी यादें भी उसके मन जिह्वा को कसैला कर रहीं थीं और आँसू पलकों में आकर अटक गये थे जो ज़रा भी भावनाओं के वेग से टपक पड़ते।

गलत कहते हैं लोग कि स्त्री ही स्त्री की शत्रु होती हैं सच तो यह है कि पुरुष ही अपनी अहम् तथा स्वार्थ की सिद्धि के लिए एक स्त्री के पीठ पर बंदूक रखकर चुपके से दूसरी स्त्री पर वार करते हैं जिसे स्त्री देख नहीं पाती और वह मूर्खा स्त्री को ही अपनी शत्रु समझ बैठती है। सोचते – सोचते अविनाश के थप्पड़ की झनझनाहट को वह भी दूसरी औरत के लिये उसके गालों पर पुनः महसूस होने लगे और अश्रु बूंदें टपककर उसके घाव पर मरहम लगाने लगे लेकिन पीड़ा अधिक होने पर मरहम कहाँ काम कर पाता है और उसमें भी अपनो से मिली हुई पीड़ाएँ तो कुछ अधिक ही जख्म दे जाती हैं।

मीना सोचती है कि मायके भी तो माँ से ही होता है न। आज मेरी माँ जिन्दा होती तो क्या मुझे मायके से इस कदर लौटाती जैसे पिता जी ने समझा बुझाकर मुझे उसी घर में जाने को बोल दिया जहाँ से पति थप्पड़ मार कर खदेड़ दिया हो? नहीं, नहीं माँ एक स्त्री थी वह जरूर मेरे दुख, दर्द, तथा भावनाओं को समझती।
अपनी माँ को याद करते – करते मीना को अचानक अपने बच्चे याद आ गये और वह तड़प उठी। मीना सोचने लगी इस उम्र में मैं अपनी स्वर्गवासी माँ को याद करके रो रही हूँ और मैं खुद एक माँ होते हुए भी जीते जी अपने बच्चों को कसाई के हवाले कर आई। क्या अविनाश (बच्चों के पिता) बच्चों पर हाथ न उठायेंगे? ओह मैं भी कितनी स्वार्थी निकली। मीना अपनी कायरता से खिन्न विवश साध्वी के गले लग कर फूट-फूट कर रो पड़ी।

साध्वी मीना को समझाते हुए बोली मत रो बहन,अब तुम ईश्वर के शरण में आ गई हो इसलिए मोह माया का त्याग करो। मान लो तुम यदि डूब गई होती तो..? तो कौन तुम्हारे बच्चों को देखता? जिस ईश्वर ने जन्म दिया है वही पालन पोषण भी करेगा तुम आराम करो अभी ।

देखो तो तुम्हारा वदन कितना तप रहा है। साध्वी के स्पर्श में एक अपनापन था इसलिए मीना उसकी बात मान कर सोने का प्रयास करने लगी।
मीना जब सुबह उठी तो कुछ ठीक महसूस कर रही थी। तभी साध्वी फिर वही काढ़ा लिये पहुंचती है और पूछती है कैसी हो बहन?
मीना – अब कुछ अच्छी हूँ बहन
साध्वी – तो चलो आज मैं तुम्हें गुरू जी से मिलाती हूँ।
मीना अपने आँखों से ही हामी भर दी।
साध्वी गेरूआ रंग का वस्त्र देते हुए मीना से बोली नहा लो फिर चलते हैं।

जीवन का सत्य

मीना नहा धोकर गेरुआ वस्त्र लपेटे बिल्कुल साध्वी लग रही थी। वह यन्त्रवत साध्वी के पीछे – पीछे चलने लगी। साध्वी एक कमरे में ले गई जहाँ पूरे घर में मटमैले रंग की दरी बिछी हुई थी जिसपर करीब सौ साध्वी और साधु जिनकी उम्र भी करीब – करीब पच्चीस से पचास वर्षों के बीच की होगी। कमरे के एक तरफ ऊँची सी चौकी जिसपर सफेद रंग का मखमली चादर बिछा हुआ था। चादर के ऊपर दो मसनद जिसपर गेरूआ मखमली खोल लगा था। गुरु जी मसनद के सहारे बैठे थे। साध्वी उनके सामने जाकर पहले पाँव छूकर प्रणाम की तो पीछे से मीना ने भी नकलची बन्दरों की तरह ठीक वैसे ही प्रणाम कर लिया। गुरु जी अपने दाहिने हाथो को आशिर्वाद मुद्रा में ले जाकर दोनो को आशिर्वाद दिये और बैठने का इशारा कर दिये।

साध्वी गुरु जी के उपदेश का पालन करते हुए एक तरफ मीना के साथ बैठ गई। गुरु जी का उपदेश चालू था। मीना मन्त्र मुग्ध हो सुनी जा रही थी। अशांत चित्त को कुछ शांति मिल रही थी। गुरु जी का प्रवचन समाप्त हुआ। सभी उठ कर जाने लगे तो गुरु जी के इशारे पर साध्वी ने मीना को रोक लिया। साध्वी भी कमरे में से जाने लगी तो मीना को थोड़ी घबराहट हुई तो साध्वी उसे भांपकर बोली घबराओ मत बहन मैं बाहर ही हूँ। आज तुम्हें गुरु जी दीक्षा देंगे मतलब तुम्हारे कान में मंत्र बोलेंगे जिसे तुम याद कर लेना। बहुत किस्मत से ही ऐसे गुरु मिलते हैं कहकर साध्वी बाहर चली गई। गुरु जी ने मीना के कान में मंत्र बोला और कोई एक फल छोड़ने को कहा।

इधर मीना के पति अविनाश परेशान हर रिश्ते 1नाते तथा दोस्त मित्रों से पूछते रहे लेकिन मीना का पता ठिकाना किसी से भी पता नहीं चला । थक हारकर अविनाश थाने में रपट लिखाने के लिए जैसे ही जाने को हुए वैसे ही मोवाइल पर रिंग हुई जो कि किसी आश्रम से था।

अविनाश मोवाइल से बात करने के तुरंत बाद जैसै तैसे अपनी गाड़ी निकाले और आश्रम पहुंचे । आश्रम में मीना को देखकर उसे अपने आप पर बहुत ग्लानि हुई। कहाँ मीना के माँग में सिंदूरी गंगा बह रही थी जिसे उसी ने अपनी चुटकियों से उतारा था आज बालू की रेत उफ…घर चलने को कहता भी तो किस मुंह से फिर भी वह मीना को मनाने की कोशिश किया बच्चों का भी वास्ता दिया लेकिन पाषाणी बनी मीना का दिल नहीं पिघला। बल्कि उसने जो भी गहने पहने थे उसे एक पोटली में बांधकर अविनाश को देते हुए कहा इसे भी लेते जाइये। अब यह सब मेरे काम का नहीं है।

अविनाश एक हारे हुए जुआरी की तरह वापस अपने घर लौट आया।

प्रति माह गुजारा भत्ता के रूप में आश्रम में दो हजार रुपये भेज देता था जो कि आश्रम का फीस था।

आश्रम के कठोर नियम का निर्वहन करते- करते कभी-कभी मीना परेशान भी हो जाती थी। कितना भी कोशिश करती लेकिन बच्चों की यादें उसके हृदय में लहर बनकर उठती थीं और आँखों के रास्ते छलक ही आती थीं। मन होता था कि अपने घर वापस चली जाये लेकिन उसका स्वाभिमान उसके पाँवों को जकड़ लेता था।
कभी-कभी सोचती थी कि गलती चाहे स्त्री करे चाहे पुरुष, दोनो ही दशा में भुगतना स्त्री को ही पड़ता है। माँ सीता को राम ने छोड़ा था और मैं स्वयं घर छोड़ आई वनवासी जीवन व्यतीत कर रही हूँ।

इस तरह आश्रम में रहते – रहते मीना के करीब तीन वर्ष बीत गये। अचानक मीना की तबियत बहुत बिगड़ गई। उपचार आश्रम में ही चल रहा था लेकिन कोई फायदा नहीं हो रहा था। उसे लग रहा था कि अब इस धरती से जाने का समय आ गया है। मीना अपने मोवाइल से अविनाश को सूचित कर मुर्छित अवस्था में चली गई।
जब मीना को होश आया तो एक बहुत बड़े अस्पताल में अपने को पाया जहाँ सामने उज्वल वस्त्रों में नर्स बड़े मीठे स्वरों में बोली कैसी हैं मैम..?

मीना – ठीक हूँ लेकिन कहाँ हूँ मैं.?

मैम आप हास्पिटल में हैं तीन दिनों से आपके पति हास्पिटल से हिले भी नहीं। बहुत लकी हैं आप जो आपको ऐसे पति मिले ।

तब तक अविनाश हास्पिटल के रूम में प्रवेश करते हैं। आते ही मीना के सिर पर हाथ फेरते हुए हाल पूछते हैं।
पति के स्निग्ध स्पर्श से मीना की पीड़ा कुछ कम हो रही है। तब तक सीनियर डाॅक्टर के साथ दो और असिस्टेंट डाॅक्टर राऊंड पर आते हैं और मीना का रिपोर्ट देखकर बोले आप कल डिस्चार्ज हो रही हैं।
मीना का दिल चाह रहा था कि कुछ दिनों तक यहीं रहे। कम से कम पति के साथ तो है। उसे आश्रम जाने का बिल्कुल मन नहीं हो रहा था।

शाम को जब बच्चे मिलने आये तो उसका हृदय और भी पसीज गया। वह चाह रही थी कि बच्चे उसे घर चलने को कहें लेकिन शायद वह मीना के बिना रहने के आदी हो गये थे इसलिये वह मिलकर चले गये।
हास्पिटल से डिस्चार्ज का समय हो रहा था। तभी नर्स एक पैकेट लिये आती है और कहती है मैम आपका ड्रेस चेंज करना है आज आप डिस्चार्ज हो रही हैं। मीना 'हूँ' कहकर बैठ गई। नर्स पैकेट खोलती है जिसमें मीना का मन पसंद रंग की गुलाबी साड़ी और उसी से मैचिंग चूड़ियाँ, बिंदिया और साथ में सिंदूर। मीना चुपचाप तैयार हो रही थी।



जीवन का सत्य

नर्स चली गई तो अविनाश अन्दर प्रवेश किये दोनों की आँखें आपस में टकराई और फिर मीना की पलकें झुक गईं। मानों वे पहली बार मिल रहे हों। अविनाश अपनी जेब से एक डिब्बा निकाला जिसमें मीना के लौटाये हुए गहने थे। उसमें से मंगलसूत्र निकालकर मीना को पहना दिया। मीना अविनाश के गले से लिपटकर सिसक पड़ी। सारे गिले शिकवे आँसुओं में बह गये।
मीना ने कहा मुझे घर ले चलिये। अविनाश ने कहा घर तो तुम्हारा ही है।
©किरण सिंह
यह कहानी दैनिक भास्कर पटना में प्रकाशित है 

                                        
लेखिका किरण सिंह


परिचय -
जन्मस्थान - ग्राम - मझौआं  , जिला- बलिया
उत्तर प्रदेश 
जन्मतिथि 28- 12 – 1967
शिक्षा - स्नातक, गुलाब देवी महिला महाविद्यालय, बलिया (उत्तर प्रदेश)
संगीत प्रभाकर ( सितार ) 
प्रकाशित पुस्तकें - मुखरित संवेदनाएँ ( काव्यसंग्रह ) प्रीत की पाती ( काव्य संग्रह) अन्तः के स्वर ( दोहा संग्रह ) प्रेम और इज्जत ( कथा संग्रह )
शीघ्र  प्रकाश्य - मुखरित संवेदनाएँ ( द्वितीय संस्करण) अन्तर्ध्वनि, ( कुंडलिया संग्रह), शगुन के स्वर ( विवाह गीत संग्रह ), देव दामिनी ( प्रबंध काव्य ) 
उपलब्धियाँ - विभिन्न राष्ट्रीय तथा अन्तरराष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाएँ एवम् आकाशवाणी तथा दूरदर्शन पर रचनाओं का प्रसारण!
लेखन विधा - गीत, गज़ल, छन्द बद्ध तथा छन्मुक्त पद्य, कहानी, आलेख, समीक्षा, व्यंग्य !


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मेरा पैशन क्या है ?


पैशन यानि वो काम जिसे हम अपने दिल की ख़ुशी के लिए करते हैं | लेकिन जब हम उस काम को करते हैं तो कई बार महत्वाकांक्षाओं के कारण या अतिशय परिश्रम और दवाब के कारण हम उसके प्रति आकर्षण खो देते हैं | ऐसे में फिर एक नया पैशन खोजा जाता है फिर नया ...और फिर  और नया | ये समस्या आज के बच्चों में बहुत ज्यादा है | यही उनके भटकाव का कारण भी है | आखिर कैसे समझ में आये कि हमारा पैशन क्या है और कैसे हम उस पर टिके रहे | प्रस्तुत है ‘अगला कदम’ में नुपुर की असली कहानी जो शायद आपको और आपके बच्चों को भी अपना पैशन जानने में मदद करे | 


मेरा पैशन क्या है ?


धा-धिन-तिन-ता /ता धिन तिन ता 
धा-धिन-तिन-ता /ता धिन तिन ता 
                                               मैं अपना बैग लेकर दरवाजे के  बाहर निकल रही हूँ , पर ये आवाजें मेरा पीछा कर रही हैं | ये आवाजें जिनमें कभी मेरी जान बसती थी , आज मैं इन्हें बहुत पीछे छोड़ कर भाग जाना चाहती हूँ | फिर कभी ना आने के लिए | 

                                             मेरी स्मृतियाँ मुझे पांच साल की उम्र में खींच कर ले जा रही हैं |    नुपुर ...बेटा नुपुर , मास्टरजी आ गए | और मैं अपनीगुड़ियाछोड़कर संगीत कक्ष में पहुँच जाती और 
 मास्टर जी मुझे नृत्य और संगीत की शिक्षा देना शुरू कर देते | अक्सर मास्टर जी माँ सेकहा करते, "बहुत जुनूनी है आप की बिटिया , साक्षात सरस्वती का अवतार | इसे तो नाट्य एकादमी भेजिएगा फिर देखना कहाँ से कहाँ पहुँच जायेगी |" माँ का चेहरा गर्व से भर जाता | 

रात को माँ खाने की मेज पर यह बात उतने ही गर्व से पिताजी को बतातीं | हर आने -जाने वालों को मेरी उपलब्द्धियों के बारे में बताया जाता | कभी -कभी उनके सामने नृत्य कर के और गा कर दिखाने को कहा जाता | सबकी तारीफ़ सुन -सुन कर मुझे बहुत ख़ुशी मिलती और मैं दुगुने उत्साह से अपनी सपने को पूरा करने में लग जाती | 

कितनी बार रिश्तेदारों की बातें मेरे कान से टकरातीं , " बहुत जुनूनी है तभी तो स्कूल, ट्यूशन होमवर्क
सब करके भी इतनी देर तक अभ्यास कर लेती हैं | कोई साधारण बच्चा नहीं कर सकता | धीरे -धीरे मुझे भी अहसास होने लगा कि ईश्वर ने मुझे कुछ ख़ास बना कर भेजा है | यही वो दौर था जब मैं एक अच्छी शिष्य की तरह माँ सरस्वती की आराधिका भी बन गयी | 


पिताजी के क्लब स्कूल, इंटर स्कूल , राज्य स्तर के जाने जाने कितनि प्रतियोगिताएं मैंने जीती | मेरे घर का शो केस मेरे द्वारा जीती हुई ट्रोफियों से भर गया | १८ साल की होते -होते संगीत और नृत्य मेरा जीवन बन गया और २० वर्ष की होते -होते मैंने एक बड़ा संगीत ग्रुप ज्वाइन कर लिया | ये मेरे सपनों का एक पड़ाव था , जहाँ से मुझे आगे बहुत आगे जाना था | परन्तु ...


"नुपुर  रात दस बजे तक ये नृत्य ातैयार हो जाना  चाहिए | " 
" नुपुर १२ बज गए दोपहर के और अभी तक तुमने इस स्टेप पर काम नहीं किया |" 
" नुपुर ये नृत्य तुम नहीं श्रद्धा करेगी |" 
 " नुपुर श्रद्धा बीमार है आज रात भर प्रक्टिस करके कल तुम्हें परफॉर्म करना है |"
"नुपुर , आखिर तुम्हें हो क्या गया है ? तुम्हारी परफोर्मेंस बिगड़ क्यों रही है ?"
"ओफ् ओ ! तुमसे तो इतना भी नहीं हो रहा |"
" नुपुर मुझे नहीं लगता तुम कुछ कर पाओगी |"

और उस रात तंग आकर मैंने अपने पिता को फोन कर ही दिया , " पापा , मुझसे नहीं हो हो रहा है | यहाँ आ कर मुझे समझ में आया कि नृत्य मेरा पैशन नहीं है | मैं सबसे आगे निकलना चाहती हूँ | सबसे बेहतर करना चाहती हूँ | लें मैं पिछड़ रही हूँ | "


" अरे नहीं बेटा, तुम्हें तो बहुत शौक था नृत्यु का , बचपन में तुम कितनी  मेहनत करती थी | तुम्हें बहुत आगे जाना है |मेरा बच्चा ऐसे अपने जूनून को बीच रास्ते में नहीं छोड़ सकता |" पिताजी ने मुझे समझाने की कोशिश करी | 

मैंने भी समझने की कोशिश करी पर अब व्यर्थ | मुझे लगा कि मैं दूसरों से पिछड़ रहीं हूँ | मैं उनसे कमतर हूँ | मैं उन्हें बीट नहीं कर सकती | ऐसा इसलिए है कि म्यूजिक मेरा पैशन नहीं है | और मैं ऐसी जिन्दगी को नहीं ओढ़ सकती जो मेरा पैशन ना हो | 

मैंने अपना अंतिम निर्णय पिताजी को सुना दिया | 

वो भी मुझे समझा -समझा कर हार गए थे | उन्होंने मुझे लौट आने की स्वीकृति दे दी | 


घर आ कर मैंने हर उस चीज को स्टोर में बंद कर दिया जो मुझे याद दिलाती थी कि मैं नृत्य कर लेती हूँ | मैंने अपनी पढाई पर फोकस किया  और बी .ऐड करने के बाद मैं एक स्कूल में पढ़ाने लगी | 

मैं खुश थी मैंने अपना जूनून पा लिया था | समय तेजी से आगे बढ़ने लगा |
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इस घटना को हुए पाँच वर्ष बीत गए | एक दिन टी. वी पर नृत्य का कार्यक्रम देखते हुए मुझे नृत्यांगना के स्टेप में कुछ गलती महसूस हुई | मैंने स्टोर से जाकर उस स्टेप को करके देखा ...एक बार , दो बार , दस बार | आखिरकार मुझे समझ आ गया कि सही स्टेप क्या होगा | मुझे ऐसा करके बहुत अच्छा लगा | 

अगले दिन मैं फिर स्टोर में गयी और अपनी पुरानी डायरी निकाल लायी | उसमें एक नृत्य को कत्थक और कुचिपुड़ी के फ्यूजन के तौर पर स्टेप लिखने की कोशिश की थी | वो  पन्ना अधूरा था | मैं उसमें फिर से जुट गयी | सारी  रात मैं उसे लिखती रही , आगे की दो रात भी ...उन्हें कर कर के देखती रही | मुझे असीम शांति मिल रही थी | आखिरकार मैंने वो कर ही लिया | 

धीरे -धीरे संगीत के सामान स्टोर से निकल कर मेरे कमरे में सजने लगे | रात में वो अभ्यास करने में मुझे असीम शांति मिलने लगी | 


तभी मन ने एक हल्का सा झटका दिया | ये तो मेरा पैशन नहीं है | आखिर मैं ये क्यों कर रही हूँ | जबकि इस समय मैं वो काम एक प्रोफेशन के रूप में अपना चुकी हूँ जिसमें मेरा पैशन है | फिर ... फिर ये क्यों ?


मन की अदालत में खुद ही मुवक्किल और खुद ही अपराधी के बीच में जिरह चलने लगी | 

"नृत्य मेरा पैशन कैसे हो सकता है | अगर होता तो मैं वो ग्रुप छोड़ कर ही क्यों आती |" 
" लेकिन ...लेकिन आज तो मुझे इसमें आनंद मिल रहा है |"
"नुपुर , ये महज टाइम पास है तुम्हारा जूनून नहीं है |"
"लेकिन आज ... आज तो मुझे अच्छा लग रहा है |"

"फिर ...आखिर तुमने वो ग्रुप क्यों छोड़ा ?" 

                                   मैं अपने ही प्रश्नों के उत्तर तलाशने लगी | ग्रुप के वो काम के दवाब वाले घंटे | मेरा अत्यधिक महत्वाकांक्षी होना | सबसे जल्दी सबसे आगे निकलने की होड़ .....इन सब ने मुझसे मेरा पैशन , मेरा जूनून, मेरा नृत्य छीन लिया था | 

आज जब मैं खुद अपनी ख़ुशी से अपने लिए ये सब कर रही हूँ तो मुझे आनंद आ रहा है | 


                        हममें से कई लोग जब वो अपने पैशन पर काम करते हैं तो महत्वाकांक्षाओं का दवाब उसने पैशन के आड़े आ जाता है | दवाब का प्रभाव रचनात्मकता पर पड़ता है और पेश का दम घुटने लगता है | लगने लगता है कि ये तो मेरा पैशन है ही नहीं | फिर शुरू होता है एक दिशा सेदूसरी दिशा भटकने का सफ़र | 


पैशन वो है जो कोयल की तरह कूके , फूल की तरह खिले , भौंरों की तरह गुनगुनाये | यह अक्सर किशोरावस्था तक आते -आते स्पष्ट हो जाता है | पर महत्वाकांक्षा के बोझ तले उसका गला हम खुद ही घोंटते हैं | 


ऐसा नहीं है कि ये केवल कला के क्षेत्र में हो | कभी देखा है अच्छे खासे पढ़ने वाले बच्चे IIT में सेलेक्ट होने का दवाब नहीं झेल पाते और पढ़ाई से ही नाता तोड़ लेते हैं | कई पढ़ाई से नाता तो नहीं तोड़ते हैं पर बुझे मन से आगे बढ़ते जाते हैं | जैसे अपने सपनॉन के बोझ से पिसे जा रहे हों | 

ऐसा तभी हो सकता है जब हम ये सोचना छोड़ दें कि हम इससे क्या प्राप्त कर सकते हैं | 

अगर आप भी चाहते हैं कि आपके पैशन के प्रति आपका स्पार्क वापस आ जाए तो ...

कुछ भी प्राप्त करने के लिए मत करो 

                                          संसार में सफलता की परिभाषा है , जिसे नाम , दाम और उपलब्द्धियों से आंका जाता है | पर क्या इसमें पैशन का दम नहीं घुटता | इस अंतर को समझना होगा कि इन चीजों को पाने के लिए पैशन पर काम नहीं करना है | पैशन पर काम करन है तो ये चीजे बाई प्रोडक्ट के रूप में मिलती हैं | सफल और असफल व्यक्ति में बस इतना ही अंतर होता है | जो लोग अपेक्षाओं का दवाब नहीं डालते हैं वो सफल हो ही जाते हैं | 


अपने अंत : आलोचक को मत सुनो 
                                         हम सब के अन्दर एक इनर क्रिटिक रहता है जो हमें कम करके आँकता रहता है | हम सब अपने आगे एक मिसाल खड़ीे हैं और उससे खुद की तुलना कर कर के निराश होते रहते हैं | अपने को और अपने काम को जज मत करो | किसी से प्रतिस्पर्द्धा भी मत करो , केवल वो करो जिसे तुम्हारा दिल करना चाहता है |

समय निकालें -
                 पैशन वो चीज है जिसे करने के लिए आपसे कोई कुछ नहीं कहता | बाकी चीजें आपका समय व् ध्यान माँगती हैं | अगर आप अपने पैशन में बिना प्रेशर के बढ़ना चाहते हैं तो आपको ये सुनिश्चित करना होगा कि आप उसके लिए थोड़ा समय निकालें | चाहें वो समय महज १५ मिनट ही क्यों ना हो | 

कभी भी समय ज्यादा नहीं हुआ -

                            पैशन तो वो है जो आपके दिल के करीब है आपकी धडकनों में बसता है | क्या फरक पड़ता है कि आपने और कामों में उसे छोड़ रखा था | 'जब जाग जाओ तभी सवेरा की तर्ज पर आप उसे कभी भी दुबारा शुरू कर सकते हैं | अगर आप देर से शुरू करते हैं तो निराश होने के स्थान पर ये सोचिये कि उम्र के इन वर्षों में आपके अनुभव का खजाना और बढ़ गया है | आप और परिपक्कव हुए हैं और समृद्ध हुए हैं | इसलिए आप अब पहले से बेहतर कर पायेंगे | 


वंदना बाजपेयी 


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कहानी -बिटर पिल


यूँ तो ये जिंदगी एक बिटर पिल ही है जिसे हमें चाहे अनचाहे गटकना ही पड़ता है | ज्यादातर लोग इसे आसानी से गटक जाते हैं क्योंकि वो इसे जस का तस स्वीकार कर लेते हैं | हालाँकि सही या गलत, उचित या अनुचित,निर्णय-अनिर्णय के  बीच में हर कोई एक सीमा में झूलता है, परन्तु जब ये सीमा अपनी  हद से ज्यादा बढ़ जाती है तो मनोविछछेद (psychosis) के लक्षण नज़र आने लगते हैं | वैसे psychosis एक umbrella टर्म है , जिसके अंदर अनेकों लक्षण  आते हैं, लेकिन मुख्य रूप से ये उन चीजों को महसूस  करना है जो नहीं होती या विश्वास करना जिन का वास्तविकता से कोई संबंध  ना हो | एक दर्द और दहशत भरी जिन्दगी की इस बिटर पिल को गटकना बहुत -बहुत मुश्किल है | तो आइये पढ़ें एक वरिष्ठ लेखिका दीपक शर्मा जी की एक ऐसी ही मोवैज्ञानिक कहानी ...

बिटर पिल 


वेन इट स्नोज इन योर नोज़
यू कैच कोल्ड इन योर ब्रेन
(‘हिम जब आपके नाक में गिरती है तो ठंडक आपके दिमाग़ को जा जकड़ती है’) –ऐलन गिंज बर्ग
“यह मोटर किसकी है?” अपने बँगले के पहले पोर्टिको में कुणाल की गाड़ी देखते ही अपनी लांसर गेट ही पर रोककर मैं दरबान से पूछता हूँ.
हाल ही में तैनात किए गये इस नये दरबान को मैं परखना चाहता हूँ, हमारे बारे में वह कितना जानता है.
“बेबी जी के मेहमान हैं, सर!” दरबान अपने चेहरे की संजीदगी बनाये रखता है.
बेटीअपनी आयु के छब्बीसवें और अपने आई.ए.एस. जीवन के दूसरे वर्ष में चल रही है, किन्तु पत्नी का आग्रह है कि घर के चाकर उसे ‘बेबी जी’ पुकारें. घर में मेमसाहब वही एक हैं.
“कब आये?”
“कोई आधा घंटा पहले.....”
अपनी गाड़ी मैं बँगले के दूसरे गेट के सामने वाले पोर्टिको की दिशा में बढ़ा ले आता हूँ.
मेरे बँगले के दोनों छोर पर गेट हैं और दोनों गेट की अगाड़ी उन्हीं की भाति महाकाय पोर्टिको.
सात माह पूर्व हुई अपनी सेवा-निवृत्ति के बाद एक फाटक पर मैंने ताला लगवा दिया है. दोनों सरकारी सन्तरी जो मुझे लौटा देने पड़े, और दो दरबान अब अनावश्यक भी लगते हैं.
पोर्टिको के दायें हाथ पर मेरा निजी कमरा है जिसकी चाभी मैं अपने ही पास रखता हूँ. पहले सरकारी फाइलों की गोपनीयता को सुरक्षित रखने का हीला रहा और अब एकान्तवास का अधियाचन है.
“हाय, अंकल!” कुणाल मुझे मेरे कमरे की चाभी के साथ उसके दरवाज़े ही पर आ पकड़ता है.
“कुणाल को आपसे काम है पापा.” बेटी उसकी बगल में आ खड़ी हुई है.
“उधर खुले में बैठते हैं.” मेरे क़दम लॉबी की ओर बढ़ लेते हैं.
अपने कमरे की चाभी मैं वापस अपनी जेब को लौटा देता हूँ.


बिटर पिल

दोनों मेरे साथ हो लेते हैं. मेरे डग लम्बे हो रहे हैं. कुणाल को अपना दामाद बनाने कामुझे कोई चाव नहीं. उसकी अपार सम्पदा के बावजूद. किन्तु बेटी के दृढ़ संकल्प के सामने मैं असहाय हूँ. तीन वर्ष पूर्व एम.ए. पूरा करते ही उसने अपने इस बचपन के सहपाठी के संग विवाह करने की इच्छा प्रकट की तो मैंने शर्त रख दी थी, बेटी को पहले आई.ए.एस. में आना होगा. और अपने को आदर्श प्रेमिका प्रमाणित करने की उसे इतनी उतावली रही कि वह अपने पहले ही प्रयास में कामयाब हो गयी. फिरअपनी ट्रेनिंग के बाद उसने जैसे ही अपनी पोस्टिंग इधर मेरे पास, मेरे सम्पर्क-सूत्र द्वारा, दिल्ली में पायी है, कुणाल के संग विवाह की उसकी जल्दी हड़बड़ी में बदल गयी है. फलस्वरूप चार माह पूर्व उसकी मँगनी करनी पड़ी है और अब अगले माह की आठवीं को उसके विवाह की तिथि निश्चित की है.
“कहो!” लॉबी के सोफ़े पर मैं बैठ लेता हूँ.
“अंकल.....” कुणाल एक सरकरी पत्र मेरे हाथ में थमा देता है, “पापा को सेल्स टैक्स का बकाया भरने का नोटिस आया है.....”
मेरे भावी समधी का कनाट प्लेस में एक भव्य शॉपिंग कॉम्प्लेक्स है, दो करोड़ का.
“इसकी कोई कॉपी है?” मैं पूछता हूँ.
“यह कॉपी ही है,” बेटी कहती है, “हम जानते हैं इस आदेश से छुटकारा दिलवाना आपके बायें हाथ का खेल है.....”
वह सच कह रही थी.
छत्तीस वर्ष अपने आई.ए.एस. के अन्तर्गत मेरे पास चुनिंदा सरकारी डेस्क रहे हैं और दो चोटी के विभाग. फिर साहित्य और खेलकूद के नाम पर खोले गये कई मनोरंजन क्लबों का मैं आज भी सदस्य हूँ और मेरे परिचय का क्षेत्र विस्तृत है.
“मैं देख लूँगा.” कुणाल का काग़ज़ मैं तहाने लगाता हूँ.
तभी मेरा मोबाइल बज उठता है.
उधर ओ.एन. है.
जिस अधिकरण में अगली एक तारीख को एक जगह ख़ाली हो रही है, उस जगह पर उसकी आँख है. मेरी तरह.
आई.ए.एस. में हम एक साथ आये थे और हमें कैडर भी एक ही मिला था और उसकी तरह मैंने भी अपनी नौकरी की एक-तिहाई अवधि इधर दिल्ली ही में बितायी है.
“तुमने सुना जी.पी. की जगह कौन भर रहा है?” वह पूछता है.
“तुम?” मैं सतर्क हो लेता हूँ, “उस पर तुम्हारा ही नाम लिखा है.....”
“कतई नहीं. उस पर एक केन्द्रीय मन्त्री के समधी आ रहे हैं..... आज लैटर भी जारी हो गया है.....”
नाम बूझने के लिए मुझे कोई प्रयास नहीं करना पड़ा है.
“कोई भी आये!” अपने संक्षोभ को छिपाना मैं बखूबी जानता हूँ.
“सो लौंग देन.....”
“सो लौंग.....”
इस बीच कुणाल को बाहर छोड़कर बेटी मेरे पास आ खड़ी हुई है.
“कुणाल घबरा रहा था,” मेरे मोबाइल बन्द करने पर वह कहती है, “आप अपनी सहानुभूति उसे दें न दें.....”
“हं..... हं.” मैं अपने कन्धे उचकाता हूँ, “मैं अपने कमरे में चलूँगा. मुझे कुछ फ़ोन करने हैं......”
“पपा आप इतने लोगों को फ़ोन क्यों करते हैं?” अपनी खीझ प्रकट करने में बेटी आगा-पीछा नहीं करती, तुरन्त व्यक्त कर देती है, “यह कमीशन, वह कमीशन, क्यों? यह ट्रिब्यूनल, वह ट्रिब्यूनल, क्यों? यह बोर्ड, वह बोर्ड, क्यों? यह कमिटी, वह कमिटी, क्यों? क्यों कुछ और हथियाना चाहते हैं, जब आपके पास घर में तमाम वेबसाइट हैं, ढेरों-ढेर म्यूजिक हैं, अनेक किताबें हैं....."
“और जो मुझे कॉफ़ी पीनी हो? तो किससे माँगू?”
“आपको मात्र कॉफ़ी पिलाने की ख़ातिर मैं अपनी सत्ताइस साल की नौकरी छोड़ दूँ? जिसके बूते आज मैं अपनी बेटी की शादी का सारा गहना-पाती ख़रीद रही हूँ.....!” पत्नी अपने कमरे से बाहर निकल आयी है. पेशे से वह डॉक्टर है, लेकिन मरहम-पट्टी से ज़्यादा दवा पिलाने में विश्वास रखती है. दवा भी कड़वी से कड़वी. मेरे तीनों भाई उसकी पीठ पीछे उसे ‘बिटर पिल’ के नाम से पुकारते हैं.
“और जिसकी नौकरी के बूते नौ करोड़ के इस बँगले में एक महारानी का जीवन बिताती हो, उसके लिए तुम्हें एक कप कॉफ़ी बनाना भी बोझ मालूम देता है......” मैं भी बिफ़रता हूँ.
“ममा तुम्हें याद रखना चाहिए, पपा सभी मैरिज इवेंट्स का ख़र्चा उठा रहे हैं.”
बेटी हम दोनों को शान्त देखना चाहती है. अपने भले की ख़ातिर.
“और वह भी कहाँ?” मैं उखड़ लेता हूँ, “कितना कहा, कम-से-कम लेडीज संगीत ही घर पर रख लो मगर नहीं..... सब अशोक होटल ही में रखना है......”
“पपा!” बेटी लाड़ से मेरा हाथ चूम लेती है, “बैंक में आपके पास बेहिसाब रूपया है. अपनी इकलौती के लिए इतना नहीं कर सकते?”
तभी मेरा मोबाइल फिर बज उठता है.


बिटरपिल

उधर मेरी मनोविशेषज्ञा है. वर्तमानकाल में मेरी गर्लफ्रेंड. मेरी‘लैस’ (प्रेयसी). मेरी अन्तरंग मित्र. मेरी इष्टतम विश्वासपात्र. जिसेमैं अपने सभी भेद सौंप सकता हूँ. सौंप चुका हूँ. अपने इकतालीसवें वर्ष में भी जो खूब बाँकी-तिरछी है और कन्यासुलभ अरुणिमा लिये है.
“हलो!” मैं अपने कमरे की ओर बढ़ लेता हूँ.
“आपकी मिस्ड कॉल है. डिस्ट्रड? (विपदाग्रस्त?)”
“हाँ,” मैं अपने कमरे तक पहुँच लिया हूँ और खटकेदार उसका ताला बन्द करके आश्वस्तहो लेता हूँ.
“मुझे तुम्हारे साथ एक सेशन चाहिए. आज ही, अभी ही.....”
“नहीं हो पाएगा, सर. मैं देहली से बाहर हूँ, तीसरे दिन लौटूँगी.....”
“कहाँ?” मैं धैर्य खो रहा हूँ.
“बंगलौर, सर, आपको बताया था यहाँ मेरी ननद शादी कर रही है.....”
“भूल गया! लेकिन तुम्हें याद है न, बंगलौर से दिल्ली तुम्हें रेलगाड़ी से नहीं, प्लेन से आना है. कल, इसी रविवार को. मेरे एक्सपेंस अकाउंट पर.....”
“यह सम्भव नहीं है, सर! मेरी रेल टिकट सबके साथ ख़रीदी गयी है. मेरे बच्चे क्या करेंगे? मैं मंगलवार ही को पहुँचूँगी.”
मैं मोबाइल काट देता हूँ.
अपनी दोलन कुर्सी पर आ बैठता हूँ. अपने दवा के डिब्बे के साथ. अपनी दवा मुँह मेंरखता हूँ और डिब्बा बगल वाली मेज पर ला टिकाता हूँ.
“बलवती.....” अपनी दोलन कुर्सी मैं झुलाता हूँ.
बलवती मेरी पहली प्रेयसी का नाम रहा. उसके कम्युनिस्ट पिता की देन.
“बलवती,” मैं दोहराता हूँ, “बलवती.....”
कालबाधित समय की एक धज्जी मेरे मन के पार्श्व घाट से निकलकर मेरे समीप चली आती है.
“फिर से नौकरी करोगे?” बलवती कहती है, “फिर से असमान लोगों की अधीनता स्वीकारोगे? मार्क्स ने क्या कहा था? हमें समाज समझना नहीं है, बदलना है.....”
“बलवती, मैं क्या करूँ?” मैं रो पड़ता हूँ, “मेरे सिद्धान्त आज भी उतने ही अनिश्चित हैं..... समाज में परिवर्तन चाहता भी हूँ और नहीं भी......”
जाने कैसे मुझे नींद घेर लेती है और मैं निर्जीव ही देखता हूँ, मेरे चारों ओर दीवारें ही दीवारें हैं!
दरवाज़ा कोई नहीं.....
“मेरे दरवाज़े कहाँ हैं?” मैं चीख़ उठता हूँ.
क्या बेटी और पत्नी ने मुझे जीते-जी दीवार में चिनवा दिया है?
तभी मेरा मोबाइल बजता है.
“पपा, खाने की मेज लग गयी है, आइए.....” बेटी का फ़ोन है.
“लेकिन दरवाज़ा कहाँ है?” मैं चिल्लाता हूँ.
“आप क्या कह रहे हैं,पपा?” बेटी की आवाज़ काँप रही है.
“मेरे तीनों दरवाज़े ग़ायब हो चुके हैं,” मैं रो पड़ता हूँ, “न लॉबीवाला दरवाज़ा यहाँ है, न पोर्टिकोवाला और न ही बाथरूमवाला.....”
“पपा आप चलना शुरू कीजिए. दरवाज़ा अपने आप आपके सामने आ खड़ा होगा......”
मैं उठने की चेष्टा करता हूँ, लेकिन उठ नहीं पा रहा.
अपने गिर्द फ़िर नज़र दौड़ाता हूँ.
अभी भी दरवाज़े ग़ायब हैं.
चारों तरफ़ दीवारें ही दीवारें हैं.
“पपा, पपा.....”
“हाय!” मेरी रुलाई अभी भी रुक नहीं रही, “मेरे दरवाज़े कोई चुरा ले गया है..... अब मैं क्या करूँगा? मेरा क्या होगा?”
“दरबान को बुलाकर लाओ.” मेरा मोबाइल पत्नी की आवाज़ पकड़ता है, “उससे दरवाज़ा खुलवातेहैं-”
“लेकिन पपा को हुआ क्या है?” बेटी रो रही है.
“एम्बुलेंस भी बुलवा लेती हूँ.....” पत्नी कहती है, “कहीं फालिज़ ही न हो.....”
मैं नहीं जानपाता अस्पतालमैंकब और कैसे पहुँचाया गया हूँ. लेकिन डिफेंसिव मेडिसिन के अन्तर्गत किये जा रहे मेरे सभी टेस्ट्स की रिपोर्ट्स सही आ रही हैं. कहीं भी किसी भी रोग अथवा विकार का उनमें कोई लक्षण नहीं मिल रहा.
तीसरे दिन मैं अस्पताल छोड़ देने की ज़िद पकड़ लेता हूँ.
मुझे अपनी मनोविशेषज्ञा से मिलना है.


कहानी -बिटर  पिल

मेरी कथा सुनते ही वह बोल उठती है, “आप मनोविच्छेद की स्थिति से गुज़र रहे हैं, सर! आपका मस्तिष्क बट रहा है. अपनी विचारणा और अपनी भाव-प्रवणता आप पास-पास नहीं रख पा रहे! बेटी का विवाह उस व्यवसायी से करना भी चाहते हैं और नहीं भी. पत्नी की पसन्द-नापसन्द को अपने से अलग रखना भी चाहते हैं और नहीं भी. अपने समय को नयी उपजीविका से भरना भी चाहते हैं और नहीं भी.अपनी पहली प्रेयसी की आत्महत्या के लिए स्वयं को उत्तरदायी मानना भी चाहते हैं और नहीं भी......”

दीपक शर्मा 


लेखिका -दीपक शर्मा



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