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फेसबुक पर लाइक कमेंट की मित्रता




दोस्त यूँ ही नहीं बनते | दो लोगों के जुड़ने के बीच कुछ कारण होता है | ये कारण उस दोस्ती को थामे रखता है | दोस्ती को जिन्दा रखने के लिए उस कारण का बने रहना बहुत जरूरी है | ऐसी ही तो है फेसबुक की मित्रता भी ...जिसकी प्राण -वायु है लाइक और कमेंट

फेसबुक पर लाइक कमेंट की मित्रता 


फेसबुक की इस अनजान दुनिया में
तमाम परायों के बीच अपनापन खोजते हुए
मैंने ही तो भेजा था तुम्हें
मित्रता निवेदन
जिसे स्वीकार किया था तुमने
बड़ी ही जिन्दादिली से
और मेरी वाल पर चस्पा कर दी थी अपनी पोस्ट
स्वागत है आपका
झूम गयी थी उस दिन मन ही मन
और एक तरफ़ा प्रेम में डूबी मैं
युम्हारी हर पोस्ट पर लगाती रही
लाइक  और कमेंट की मोहर
और खुश होती रही
अपनी मित्रता की इस उपलब्द्धि पर
महीनों की मेहनत के बाद
तुम्हारी  भी कुछ लाइक
चमकने लगीं मेरी पोस्ट पर
और उस दिन समझा था
मैंने खुद को दुनिया का सबसे धनी
फिर फोन नंबर की हुई अदला -बदली
और कभी -कभी मुलाकाते भी
अचानक तुमने मेरी पोस्ट आना छोड़ दिया
कुछ खटका सा मेरे मन में
हालांकि फोन पर थीं तुम उतनी ही सहज
मिलने के दौरान भी
लगता था सब ठीक
फिर भी तुम्हारी हर पोस्ट पर मेरी लाइक -कमेंट के बाद
नहीं आने लगीं तुम्हारी लाइक
मेरी किसी भी पोस्ट पर
इस बीच बढ़ गए थे हमारे मित्रों की संख्या
पर उन सबके बीच मैं हमेशा खोजती रही तुम्हारी लाइक
और होती रही निराश
 अन्तत :न्यूटन का थर्ड लॉ अपनाते हुए
धीरे -धीरे तुम्हारी पोस्टों पर कम होने लगे
मेरे भी   कमेंट
फिर लाइक भी
अब हमारी फोन पर बातें भी  नहीं  होतीं
मुलाकातें तो बिलकुल भी नहीं
और फेसबुक की हजारों दोस्तियों की तरह
हमारी -तुम्हारी दोस्ती भी
जो लाइक -कमेंट से शुरू हुई थी
लाइक -कमेंट की प्राण वायु
के आभाव में खत्म हो गयी

नीलम गुप्ता


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एक नींद हज़ार सपने –आस -पास के जीवन को  खूबसूरती से  उकेरती कहानियाँ


सपने ईश्वर द्वारा मानव को दिया हुआ वो वरदान है, जो उसमें जीने की उम्मीद जगाये रखते हैं  | यहाँ पर मैं रात में आने वाले सपनों की बात नहीं कर रही हूँ बल्कि उन सपनों की बात कर रही हूँ जो हम जागती आँखों से देखते हैं और उनको पाने के लिए नींदे कुर्बान कर देते हैं | “एक नींद हज़ार सपने” अंजू शर्मा जी का ऐसा ही सपना है जिसे उन्होंने जागती आँखों से देखा है , पन्ने दर पन्ने ना जाने कितने पात्रों के सपनों को समाहित करती गयी हैं | एक पाठक के तौर पर अगर मैं ये कहूँ कि इस कहानी संग्रह को पढ़ते हुए मेरे लिए यह तय करना मुश्किल हो रहा था कि मैं सिर्फ कहानियाँ पढ़ रही हूँ या शब्दों और भावों की अनुपम चित्रकारी में डूब  रही हूँ तो अतिश्योक्ति नहीं होगी | अंजू जी, कहानी कला के उन सशक्त हस्ताक्षरों में से हैं जिन्होंने अपनी एक अलग शैली विकसित की है | वो भावों की तूलिका से कागज़ के कैनवास से शब्दों के रंग भरती हैं ...कहीं कोई जल्दबाजी नहीं, भागमभाग नहीं और पाठक उस भाव समुद्र में  डूबता जाता है...डूबता जाता है |

 एक नींद हज़ार सपने –आस -पास के जीवन को खूबसूरती से  उकेरती कहानियाँ 


गली नंबर दो  इस संग्रह की पहली कहानी है | ये कहानी एक ऐसे युवक भूपी के दर्द का दस्तावेज है जो लम्बाई कम होने के कारण हीन भावना का शिकार है | भूपी मूर्तियाँ बनाता  है , उनमें रंग भरता है , उनकी आँखें जीवंत कर देता है , पर उसकी दुनिया बेरंग है , बेनूर है ... वो अपने मन के एक तहखाने में बंद है , जहाँ एकांत है , अँधेरा है और इस अँधेरे में गड़ता हुई एक टीस  है जो उसे हर ऊँची चीज को देखकर होती है | किसी की भी सायकोलोजी यूँ ही नहीं बनती, उसके पीछे पूरा समाज दोषी होता है | बचपन से लेकर बड़े होने तक कितनी बार ठिगने कद के लिए उसे दोस्तों के समाज के ताने सुनने पड़े हैं | एक नज़ारा देखिये ...

“ओय होय, अबे तू जमीन से बाहर आएगा या नहीं ?”

‘भूपी तू तो बौना लगता है यार !!! ही, ही ही !!’

“अबे, तू सर्कस में भरती क्यों नहीं हो जाता, चार पैसे कम लेगा|”

“साले तेरी कमीज में तो अद्धा कपडा लगता होयेगा, और देख तेरी पेंट तो चार बिलांद की भी नहीं होयेगी |”
                                        


किसी इंसान का लम्बा होना, नाटा  होना , गोरा या काला होना उसके हाथ में कहाँ होता है | फिर भी हम सब ऐसे किसी ना किसी व्यक्ति का उपहास उड़ाते रहते हैं या दूसरों को उड़ाते देखते रहते हैं ....इस बात की बिना परवाह किये कि ये व्यक्ति के अंदर कितनी हीन भावना भर देगा | भूपी के अंदर भी ऐसी ही हीन ग्रंथि बन गयी जो उसे मौन में के गहरे कुए में धकेल देती है | ग्लैडिस से लक्ष्मी बन कर पूरी तरह से भारतीय संस्कृति में रची बसी भूपी की भाभी , उसके काम में उसकी मदद करती |

लक्ष्मी का चरित्र अंजू जी ने बहुत खूबसूरती से गढ़ा है ,ये  आपको अपने आस –पास की उन महिलाओं की याद दिला देगा जो विवाह के बाद भारतीय संस्कृति में ऐसी रची कि यहीं की हो के रह गयीं | खैर, भूपी के लिए सोहणी का विवाह प्रस्ताव आता है जिसके पिता की ८४ के दंगों में हत्या  हो चुकी है और रिश्तेदारों के आसरे जीने वाली उसकी माँ किसी तरह अपनी बेटी के हाथ पीले कर देन चाहती हैं | भूपी के विपरीत सोहणी खूब –बोलने वाली, बेपरवाह –अल्हड़ किशोरी है जिसके पास रूप –रंग व् लंबाई भी है ...वही लम्बाई जो भूपी को डराती है | भूपी और सोहणी का विवाह हो जाता है पर उसकी लंबाई भूपी को अपने को और बौना महसूस  कराने लगती है| सोहणी को कोई दिक्कत नहीं है पर ये हीन ग्रंथि, ये भय जो भूपी ने पाला है वो उनके विवाहित जीवन में बाधक है ...

कहानी में पंजाबी शब्दों का प्रयोग पात्रों को समझने और उनके साथ जुड़ने की राह आसान करता है | कहानी बहुत ही कलात्मकता से बुनी गयी है | जिसके फंदे-फंदे में पाठक उस कसाव को मह्सूस करता  है जो कहानी की जान है | एक उदाहरण देखिये ...

भूपी को दूर –दूर तक कहीं कुछ नज़र नहीं आ रहा , एक कालासाया उसके करीब नुमदार  हुआ और धीरे –धीरे उसे जकड़ने लगा | भूपी घबराकर उस साए से खुद को छुडाना चाहता है | वह लगभग जाम हो चुके हाथ –पैरों को झटकना चाहता है , पर बेबस है , लाचार है |


“ समय रेखा “  संग्रह की दूसरी कहानी है | ये कहानी मेरी सबसे पसंदीदा दो कहानियों में से एक है, कारण है इसका शिल्प ...जो बहुत ही परिपक्व लेखन  का सबूत है | अंजू जी के लेखन की यह तिलस्मी, रहस्यमयी शैली मुझे बहुत आकर्षित करती है, साथ ही इस कहानी दार्शनिकता इसकी जान है |  कहानी का सब्जेक्ट थोड़ा बोल्ड है और वो आज की पीढ़ी को  परिभाषित करता है | ये कहानी अटूट बंधन पत्रिका में भी प्रकाशित हुई है और  आप इसे यहाँ पढ़ सकते हैं |


वैसे तो ये कहानी बेमेल विवाह पर आधारित है पर ये बेमेल विवाह माता –पिता की इच्छा से कराया हुआ नहीं है, ये प्रेम विवाह है | आज हम देखते हैं कि प्रेम विवाह भी टूटते हैं ...इसका एक महत्वपूर्ण कारण है कि प्रेम होना और प्रेम में पड़ जाना दो अलग-अलग चीजें हैं | प्रेम में पड़ जाने के पीछे कई मनोवैज्ञानिक कारण होते हैं , जो उस समय समझ नहीं आते पर साथ रहने से मन की पर्ते खुलती हैं , प्रेम में पड़ जाने का कारण समझ में आता है , फिर होता है अंतर्द्वंद ...

कहानी की शुरुआत ही खलील जिब्रान के एक कोटेशन से होती है ..
.
“प्रेम के अलावा प्रेम में और कोई इच्छा नहीं होती |पर अगर तुम प्रेम करो और तुमसे इच्छा किये बिना रहा ना जाए तो यही इच्छा करो कि तुम पिघल जाओ प्रेम के रस में और प्रेम के इस पवित्र झरने में बहने लगो |”

परन्तु बादलों की आकृतियों से खेलती कहानी की नायिका  अवनि इस वाक्य पर संदेह करती है ...


“ इच्छाएं किसी बंधन की कैद को कब मानती हैं |वो तो सिंदूरी आकाश में बेख़ौफ़ , बेबाक विचारने वाला पंक्षी है |”

कहानी अवनि , मानव और अनिरुद्ध के बीच की है | अवनि और मानव हमउम्र हैं , बचपन के दोस्त हैं वहीँ अनिरुद्ध अवनि का पति है जो उससे उम्र में २० साल बड़ा है | किताबों की शौक़ीन अवनि को ज्ञान के आकाश के सूर्य अनिरुद्ध के प्रति कब आसक्ति हुई जो प्रेम और  विवाह में बदली ये वो खुद भी नहीं जान पायी | उसने अनिरूद्द को पाने के लिए मानव के एकतरफा प्रेम को उस समय छोड़ा था क्योंकि हमउम्र मानव में उसे बहुत बचपना लगता था | परन्तु  जीवन संतुलन मांगता है | और इसी मांग में वो अपने मष्तिष्क में एक खेल रचती है ... समय रेखा का खेल  |


समय रेखा के इस खेल में वो 25 पर खड़ी है और अनिरुद्ध 45 पर ....वो दोनों बीच की तरफ एक –एक कदम बढ़ाते हुए 35 पर आ जाते हैं | ये एक समय रेखा एक तिलिस्म रचती है जहाँ पर वह ये मान कर खुश होती है कि वो अपनी उम्र से थोड़ी परिक्व हो गयी है और अनिरुद्ध में थोड़ा सा बचपना आ गया | जीवन के लिए दोनों ही जरूरी हैं , वरना जीवन नीरस हो जाता है | घर, जहाँ बौद्धिकता और सिर्फ बौद्धिकता  पसरी हुई है वहाँ अवनि का मुस्कुराना भी मुश्किल है ऐसे में उसकी सहेली मार्था का साथ उसे बहुत सुकून देता है | मार्था भी बहुत अद्ध्यानशील है और उसका व्यक्तित्व बहुत सुलझा हुआ है | जिंदगी के तमाम सवालों के जवाब के लिए मार्था के पास एक कोटेशन है | जैसे अवनि की मानसिक स्थिति के लिए भी उसके पास एक कोटेशन है ...

“स्वप्न हमारी उन इच्छाओं को सामान्य रूप से अथवा प्रतीक रूप से व्यक्त करता है , जिनकी तृप्ति जाग्रत अवस्था में नहीं हो पाती |”


            
दरअसल ये कहानी एक स्त्री के उस मनोविज्ञान को परिभाषित करती है , जिसके पिता बचपन में ही नहीं रहे , पितृ स्नेह से वंचित वो ,  पति से वही सुरक्षा व् स्नेह चाहती है, जो पिता देता है | इसी कारण वो अपने से बीस वर्ष  बड़े अनिरुद्ध की तरफ आकर्षित होती है और प्रेम विवाह करती है  |  परन्तु थोड़े दिनों में एक स्त्री के रूप में उसकी माँगे सर उठाने लगती हैं जो स्नेह नहीं प्रेम चाहती है , जो उसे तृप्त कर सके जो उसका हम उम्र साथी ही दे सकता है , इसीलिए बचकाने व्यवहार वाला मानव उसे लुभाता है | यही सारी कशमकश  है |

कहानी के अंत तक आते –आते  उसकी मानसिक कल्पना में आने वाली समय रेखा बदल जाती है और अब समय रेखा के दोनों सिरों पर अनिरुद्ध व् मानव खड़े हैं और वो बीच में खड़ी  है .... उसे बस दस कदम बढ़ने है ...पर किस ओर?

एक उलझे हुए व्यक्तित्व की स्वामिनी अवनि के मानसिक स्तर पर उतर कर लिखी हुई ये कहानी लिखना कितना मुश्किल हुआ होगा इसे सहज ही समझा जा सकता है पर जिस तरह से अंजू जी ने उसे शिल्प कथ्य और प्रस्तुतीकरण के तीनों कोणों पर साधा है वो निश्चित तौर पर उनकी लेखकीय प्रतिभा का परिचायक है |

नेमप्लेट इस संग्रह की वो कहानी है , जिससे शायद हम सब महिलाएं गुज़रती हैं ...पूरा नहीं तो थोड़ा-थोड़ा ही सही, और यही कारण है कि हंस में प्रकाशित इस कहानी का बहुत लोकप्रिय होना | ये कहानी रेवा और स्वरा नाम की दो स्त्रियों की कहानी है| रेवा तो रेवा है लेकिन स्वरा का परिचय है “मिसेज वशिष्ठ”| जहाँ रेवा  स्वतंत्र व्यक्तित्व की मालकिन है और उन्मुक्त जिन्दगी जीती है, वहीँ स्वरा विवाह के बाद “मिसेज वशिष्ठ के आवरण तले अपनी पहचान ही नहीं अपने व्यक्तित्व को भी खो चुकी है| आमने –सामने रहने वाली इन दो स्त्रियों की पहली मुलाक़ात बाद , स्वरा के बारे में रेवा के विचार है ...
“पूरा दिन  फैमिली, बच्चे, घर,किचन, चिक-चिक ...आई मीन साली क्या लाइफ है |पितृसत्ता के हाथों कठपुतली बनना कब छोड़ेंगी ये मूर्ख औरतें | इतने धुँआधार लेख लिखती हूँ उन औरतों के लिए और ये नासमझ उसे पढ़ती तक नहीं |"

और स्वरा , रेवा के बारे में सोचती है ...

"लड़की नहीं तूफ़ान है , जब से आई है सबकी गॉसिप का केंद्र है | कितनी बिंदास है बाबा, कोई डर नहीं , अकेली रहती है | शादी भी नहीं की , पैंतीस से कम नहीं होगी | मिसेज गुप्ता बता रहीं थीं कि पूरी  पियक्कड़ है, चेन स्मोकर, किसी अखबारमें नौकरी करती है शायद | ना खाने का टाइम ना सोने का | ये भी कोई जिन्दगी है भला|"


पर दोनों का जीवन एक कोने पर असंतुलित था | जीवन का वही असंतुलित कोना दोनों को एक दूसरे की जीवन की ओर आकर्षित करने लगा | जहाँ रेवा को पति के साथ सैर पर जाती और शाम को बच्चों के साथ खेलती नज़र आती स्वरा उसके स्वतंत्र जीवन में स्त्री की घर बनाने और बसाने  की सहज इच्छा को हिला कर कर जगा देती वहीँ बिंदास खिलखिलाती, मस्त और आत्मविश्वास से भरपूर रेवा की आवाज़ उसके मन की शांत झील में कोई पत्थर फेंक देती और बहुत देर तक वो उस भँवर में घूमती रहती |

आमने –सामने के घरों में रहने वाली दो औरतें जो अपने तरीके से संतृप्त औरपने तरीके से असंतृप्त हैं जो अपनी जीवन शैली जीते हुए दूसरे की जीवन शैली के प्रति आकर्षित हैं कि मुलाक़ात कुछ विशेष परिस्थितियों में एक नर्सिंग होम में होती है | जहाँ रेवा भास्कर और स्वरावशिष्ठ की दीवारे टूट जाती है | वहां केवल दो स्त्रियाँ हैं जो अपना दर्द बाँट लेना चाहती हैं | दोनों ही कहती है और समझतीं है दूसरे छोर का दर्द , जिसे वो अपनी जीवन के उदास कोने में भरकर तृप्त होना चाहती थी ...पर वहां के खालीपन से अनभिज्ञ थीं |


ये कहानी स्त्री विमर्श को एक नए तरीके से प्रस्तुत करती है | जो घर –परिवार के अंदर अपने रिश्तों को जीते हुए अपने हिस्से का आकाश अर्जित कर सकें | क्योंकि दोनों ही छोर स्त्री के लिए उपयुक्त नहीं हैं ...मध्यम मार्ग ही श्रेष्ठ है | ये स्त्री विमर्श आयातित स्त्री विमर्श से अलग है और हमारे भारतीय मान के ज्यादा अनकूल है |


“भरोसा अभी कायम है “ और “बंद खिड़की खुल गयी “ में जहाँ उन्होंने हिन्दू –मुस्लिम समुदाय के बीच आपसी प्रेम और भाईचारे की बात की है | उन्होंने असली चरित्रों को लेकर ये दिखाने की कोशिश की है कि आज जिस कटुता की बात हो रही है असलियत उससे बहुत दूर है | तमाम अखबारों और चैनल्स की खबरें जहाँ मन में अविश्वास उत्पन्न करती हैं वहीँ जमीनी हकीकत कुछ अलग ही होती है, जहाँ दोनों समुदाय बहुत ही प्यार और विश्वास से एक दूसरे के साथ रहते हैं | ‘एक शाम है बहुत उदास ‘ चौरासी के दंगों की पीड़ा व्यक्त करती है | “आउटडेटिड” और “पत्ता टूटा डाल से “ बुजुर्गों की पीड़ा को व्यक्त करती हैं | इन दोनों कहानियों को पढ़कर लगता है कि आस –पास के चरित्र से रूबरू हो रहे हैं , जो अपनी भाषा और बोली के साथ आपके सामने हैं और आप उनके साथ वहीँ कहीं बैठे हुए हैं |

“मुस्तकबिल” कहानी तीन तालाक पर आधारित है | जिस तरह से कहानी शुरू हुई है और जिस तरह से उर्दू की संवाद अदायगी के साथ पूरा माहौल बना कर आगे बढती है तो पाठक ना केवल उस दर्द में डूबता है बल्कि चमत्कारिक शैली में भी खो सा जाता है...

“ये सुबह आहिस्ता से चलती कुछ यूँ शर्मिंदा सी उगी थी कि यूँ उगना उसकी फितरत थी और फर्ज भी |वर्ना क्याजल्दी थी चाँद को डूब जाने की और आज के इस मनहूस दिन आफताब को क्या गरज थी कि चला आया नासपीटा मुँह उठाये |”


रात के हमसफर” और “छत वाला कमरा और इश्क वाला लव” दोनों ही प्रेम कहानियाँ हैं पर दोनों का अंदाज एक दूसरे से जुदा है | अंतिम कहानी ‘एक नींद हज़ार सपने” कामवालियों की बस्ती में महिलाओं के अपने बच्चों को शिक्षित करने के सपने पर आधारित है |


कुल मिला कर अंजू जी का ये पहला कहानी संग्रह जहाँ उन्हें पाठकों के बीच एक समर्थ लेखिका के रूप में स्थापित करता है वहीँ साहित्य जगत को आशा जगती है कि वो अपनी विशिष्ट शैली , भाषा पर पकड़ , देशी मुहावरों व् अन्य भारतीय भाषाओँ के खूबसूरत प्रयोग से साहित्य जगत को और समृद्ध करेंगी | सामयिक प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 160 पेज के इस कहानी संग्रह में विभिन्न विषयों को उठाती 14 कहानियाँ है | कवर पेज आकर्षक है और सम्पादन  त्रुटिहीन |अगर आप अपने आस –पास के चरित्रों  से जुडी कुछ ऐसी कहानियाँ पढ़ना चाहते हैं जो आपको रूहानी सुकून दे साथ ही एक गंभीर विमर्श को हल्के से स्पंदित कर दे तो यह संग्रह आपके लिए मुफीद है |

अंजू शर्मा जी को बधाई व् लेखन में उज्जवल भविष्य के लिए हार्दिक शुभकामनाएं 

एक नींद हज़ार सपने -कहानी संग्रह 
लेखिका -अंजू शर्मा 
प्रकाशक -सामयिक प्रकाशन 
पृष्ठ -160
मूल्य -200 रुपये (पेपर बैक )

वंदना बाजपेयी 

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मुझे मिला वो, मेरा नसीब है



मुझे मिला वो, मेरा नसीब है 
वही सुकून जहां वो करीब है 
मैं और क्या भला चाहूंगी 
जब प्यार से उसके भर गई ।

उसने जो कहा मैंने मान ली 
नज़र की हरकतें पहचान ली 
जिस राह उसके कदम बढ़े 
बनी फूल और मैं बिखर गई ।

वह मोड़ जहां टकराए हम
बने जिस्म, जिस्म के साये हम 
मेरा वक्त आगे बढ़ गया 
पर मैं वहीं पर ठहर गई ।

जीवन उसी पर वार के 
मैं खुश हूं खुद को हार के
उसने देखा जैसे प्यार से 
मेरी रूह तक निखर गई।

आ जाए तो उसे प्यार दूं 
मेरे यार सदका उतार लूं
डर है नजर लग जाएगी 
गर उसपर कोई नजर गई ।।  


साधना सिंह 

लेखिका -साधना सिंह


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प्रो लाइफ या  प्रो चॉइस ...स्त्री के हक़ में नहीं हैं कठोर कानून



माँ बनना दुनिया के सबसे खूबसूरत अनुभवों में से एक है | किसी कली  को अपने अंदर फूल के रूप में विकसित होते हुए महसूस करने का अहसास बहुत सुखद है | कौन स्त्री है जो माँ नहीं बनना चाहती | फिर भी कई बार उसे ग्राभ्पात करवाना पड़ता है | गर्भपात का दर्द बच्चे को जन्म देने के दर्द से कई गुना ज्यादा पीड़ा दायक है ...फिर भी स्त्री इससे गुजरने के पक्ष में निर्णय लेती है... तो यकीनन कोई बड़ा मसला ही होगा | ( यहाँ केवल लिंग परिक्षण के बाद हुए गर्भपातों को सन्दर्भ में ना लें , वो गैर कानूनी हैं )परन्तु अब ये बात फिरसे उठने लगी है कि गर्भपात को पूरी तरह से गैर कानूनी करार दे दिया जाए | खास बात ये है कि ये मान किसे विकासशील देश नहीं विकसित देश अमेरिका से उठ रही है |

प्रो लाइफ या  प्रो चॉइस ...स्त्री के हक़ में नहीं हैं कठोर कानून 


प्रो लाइफ और प्रो चॉइस  के पक्ष और विपक्ष का वैचारिक विरोध कोई नयी बात नहीं है |
हम सब जीवन के पक्ष में है | फिर भी अगर इन परिस्थितियों पर गौर करा जाए जहाँ स्त्री गर्भपात के अधिकार की मांग करती है ...


बालात्कार से उत्पन्न बच्चे
धोखा देकर भागे प्रेमी से उत्पन्न बच्चे
ऐसा भ्रूण जिसे कोई ऐसा रोग हो जो उसे जीवन भर असहाय बना दे |
ऐसा भ्रूण जिसका गर्भ में पलना माँ के जीवन को खतरा हो |
या स्त्री मानसिक रूप से इसके लिए तैयार ना हो चाहे इसका कारण उसका कैरियर हो या बच्चा पालने की अनिच्छा |


प्रो चॉइस महिलाओं को ये अधिकार देता है कि ये शरीर उनका है और उसमें बच्चे को पालने या जन्म देने का अधिकार  उनका है |


जबकी प्रो लाइफ का कहना है कि किसी भी जीव चाहें वो भ्रूण अवस्था में ही क्यों ना हो उसका जीवन खत्म करने का अधिकार किसी को नहीं है |


यूँ तो प्रो लाइफ के तर्क बहुत सही लगते हैं ,क्योंकि वो जीवन के पक्ष में है , लेकिन प्रो चॉइस के अधिकार पाने के लिए महिलाओं को बहुत संघर्ष करना पड़ा , क्योंकि गर्भपात हमेशा से कानूनी रूप से गलत माना जाता रहा है | 




अभी हाल में अमेरिका के ओकलाहोमा में प्रो लाइफ के पक्ष में निर्णय देते हुए गर्भपात को पूरी तरह से गैर कानूनी बना दिया जिसमें गर्भपात करने वाले डॉक्टर को भी 99 वर्ष के लिए जेल जाना पड़ेगा जाहिर है कोई डॉक्टर ये खतरा नहीं उठाएगा ऐसा करने वाला ये राज्य अमेरिका का पांचवां राज्य है |


तो क्या महिलाएं गर्भपात नहीं करवाएगी ?






जहाँ विवाहित दंपत्ति  प्रेम पूर्ण साथ -साथ रहते हैं वहां वो वैसे भी भी बच्चे को लाने या नहीं लाने का निर्णय साथ –साथ करते हैं और अगर बिना मर्जी के बच्चा आ ही गया तो उसे सहर्ष पाल ही लेते हैं |( फिल्म –बधाई हो जो असली जिंदगी की ही कहानी है  ) परन्तु ऊपर लिखे सभी कारणों में अगर स्त्री  गर्भपात नहीं करवा पाएगीं तो वो क्या करेगी ...


उन बच्चों ओ जन्म देकर कूड़े में फेंकेंगी या अनाथालयों मे भेजेंगी ,क्योंकि रेप चाइल्ड या धोखेबाज प्रेमी से उत्पन्न बच्चों को पालने, उस बच्चे को देखकर उस सदमे के साथ हमेशा जीने के लिए विवश करता है , जबकि बच्चे का पिता पूर्ण रूप से उस बच्चे और अपने कर्तव्यों के प्रति आज़ाद रहता है | प्रो चॉइस स्त्री को ये अधिकार देता है कि केवल वो ही दंडित ना हो |




या फिर खराब भ्रूण के कारण अल्प मृत्यु का शिकार होंगी | जैसे की भारतीय मूल की सविता की २०१२ में आयरलैंड में मृत्यु हो गयी थी | जिसके गर्भ में पलने वाला भ्रूण खराब था और उससे माँ की जान को खतरा था | परन्तु कोई डॉक्टर गर्भपात  के लिए तैयार नहीं हुआ क्योंकि उस समय वहाँ का कानून यही था कि  किसी भी तरह का गर्भपात गैर कानूनी है | उनके पति द्वारा अदालत में गुहार लगाने के बावजूद सविता को नहीं बचाया जा सका और वो मृत्यु का शिकार हुई |उसके बाद वहां हुए विरोध प्रदर्शनों के मद्देनज़र वहां की सरकार को कानून में बदलाव करना पड़ा कि स्त्री की अगर जान को खतरा हो तो उस भ्रूण का गर्भपात  करवाया जा सकता है |


कानून बनने के बाद भी बहुत सी स्त्रियाँ गर्भपात करवाएंगी पर वो अप्रशिक्षित व् अकुशल दाइयों और झोला छाप डॉक्टरों द्वारा होगा ...जिसमें स्त्री के जीवन को खतरा है |

                            जीवन का अंत करना भले ही सही ना हो परन्तु ख़ास परिस्थितियों में किसी स्त्री , किसी भावी माँ के शारीरिक , मानसिक स्थिति को देखते हुए ये जरूरी हो जाता है कि महिलाओं के पास ये अधिकार रहे कि वो बच्चे को जन्म दे या नहीं |

आप क्या कहते हैं ?

वंदना बाजपेयी 

फेसबुक और महिला लेखन


दोहरी जिंदगी की मार झेलती कामकाजी स्त्रियाँ

सपने जीने की कोई उम्र नहीं होती

करवाचौथ के बहाने एक विमर्श


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फोटो क्रेडिट -http://naqeebnews.com

ये उन दिनों की बात है जब बाज़ार में तरह -तरह के शर्बत व्ग कोल्ड ड्रिंक नहीं आये थे ....तब गर्मी दूर भगाने का एक ही तरीका था ...रूह अफजा शर्बत , गर्मी शुरू और रूह अफजा की मांग शुरू | ठंडे पेयों के फैलते जाल के बीच भी इसकी मांग कम ना होने पायी और अभी भी अपनी युवा पीढ़ी के साथ माल में शान से खड़ा रहता है ... परन्तु कवि की कल्पना ये तो कुछ और ही कह रही है ....



हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा

तू मेरी, शरीक-ऐ-हयात है, कि---- हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा. ये तेरी---- नर्म-नाजूक सी कलाई की छुअन, हाय !! तू मह़ज़ गिलास है ,या ---- हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा. ये शर्म से झुकी नज़र, उसपे सुर्खी ,तेरे गाल की, बता तू ,गुलाब है, कि---- हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा. ये हवा की शरारत , ये उड़ती तेरी जुल्फें, हाय !! तू खुबसूरत ढ़लती शाम है,या ---- हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा. टहलना ---- तेरा हौले-हौले यूं छत पे और मेरा देखना तुमको , तू मेरी मुमताज़ है, या ---- हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा. @@ रंगनाथ द्विवेदी जजकालोनी, मियांपुर जिला-जौनपुर 222002 (U.P.)

कवि-रंगनाथ द्विवेदी


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जो लोग आप का उत्साह बढाते हैं | आपको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते दिखते  हैं | क्या वो आप से जल सकते हैं ? यकीनन आपका उत्तर ना ही होगा | लेकिन ऐसा हो भी सकता है , कई बार वर्षों बाद जब आपको पता चलता है कि अमुक व्यक्ति आपसे जलता  रहा है और जिसके प्रेरणादायक शब्दों को सुन कर आप  उसे अपना हितैषी समझ रहे थे, तो सच्चाई सामने आने पर आप के पैरों तले जमीन खिसकना स्वाभाविक है | आखिर कैसे पहचाने उन लोगों को जिनकी प्रेरणा में जलन छिपी हो ....


How to know if someone is secretly jealous of you 


जरा इस उदाहरण पर ध्यान दीजिये ...ये बातचीत है मिश्रा जी की और मिताली की


हाँ तो क्या रिजल्ट रहा ?पड़ोस के मिश्रा जी ने पान चबाते हुए पूछा

बड़ी ख़ुशी के साथ मिताली ने  रिजल्ट   उनके हाथ में पकड़ा दिया | मिताली को मिश्रा अंकल बहुत अच्छे लगते थे | वो उसकी पढाई -लिखाई में इतनी रूचि जो लेते थे | उनके शब्दों से उसे बहुत प्रेरणा मिलती थी | 

रिजल्ट लेते ही उन्होंने मुँह थोड़ा बिचकाकर पान का रस अंदर की ओर गुटकते  हुए कहा ,  " अरेरेरे ! क्लास में थर्ड , भई ये तो अच्छा नहीं लगा , फर्स्ट आओ  तब कोई बात होगी , हमें तो तभी ख़ुशी होगी , अभी और मेहनत करो और ...

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ठीक है , ठीक है  , फर्स्ट तो आई हो पर ये गणित /हिंदी /विज्ञान में नंबर कुछ कम है , भी जब गणित में सौ में सौ नंबर आयेंगे तो ख़ुशी होगी | 

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ये स्कूल तो खासा नामी नहीं है , अरे फलाना स्कूल में पढ़ातीं तब कुछ ख़ुशी की बात होती | कोशिश करती रहो ...करती रहो |

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अच्छा -अच्छा लिखने लगी हो ?( यहाँ आप किसी भी कला , प्रतिभा को ले सकते हैं ) 

कहाँ छप कहाँ रही हो ?
ओह , ठीक है अच्छी बात है , तुम्हें बड़ी लेखिका , तब मानेगे जब नेशनल पत्रिकाओं में छ्पोगी ...फिर शिकायत नहीं रहेगी कि हमने तारीफ़ नहीं करी | 




मिताली क्लास में फर्स्ट भी आ गयी , गणित में १०० में १०० नंबर नंबर भी , अच्छे स्कूल में पढ़ाने  लगी और बड़ी पत्रिकाओं में छपने भी लगी | 


लेकिन मिश्रा जी खुश नहीं हुए ...इस बार उन्होंने ख़ुशी को आगे सरकाया भी नहीं , पर उनके निराश चेहरे ने उनके अतीत के सभी वाक्यों की पोल खोल दी | अब बारी मिताली के चौंकने की थी | 

क्या आप ने देखे हैं ऐसे लोग ?


पहचानिए प्रेरणादायक शब्दों के पीछे छिपी जलन की भावना को 



जब बच्चा पहला कदम रखता है तो माता -पिता की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता | वो हर कदम पर उसे प्रोत्साहित करते हैं ,सँभालते हैं , गिरने पर पैरों की मालिश कर उसे फिर से दुरुस्त करते हैं |  जब बच्चा चलने लगता है , दौड़ने लगता है तो उसे इस की जरूरत ही नहीं रहती |


हमारे आस -पास हमारे अपनों में बहुत से ऐसे लोग होते हैं , जो हमारे किसी क्षेत्र में पहले कदम पर ताली नहीं बजाते , गिरने पर सँभालते भी नहीं , हाँ ये जरूर कहते हैं कि , "ठीक है कोशिश कर रही/रहे हो अच्छा है लेकिन जब 'वो' ...प्राप्त करोगी /करोगे तब हमें ख़ुशी होगी | अक्सर हम इस बात को मोटिवेशनल समझने की व्  उन्हें अपना हितैषी समझने की  भूल कर जाते हैं | लेकिन जब हम गिरते, लडखडाते  संभलते , तथाकथित ''वो'' स्थान  प्राप्त कर लेते हैं , तब असली चेहरा सामने आता ...क्योंकि तब भी वो खुश नहीं होते | मोटिवेशन और इर्ष्या में अंतर अक्सर लोग नहीं समझ पाते हैं |


जो व्यक्ति वास्तव में आप को प्रेरणा देना चाहता है वो हर कदम पर आपके साथ होगा | वो पहले कदम के बाद दूसरा कदम रखने की जुगत बतायेगा | लेकिन जो व्यक्ति इर्ष्या करता है वो पहले कदम के बाद ये कह कर तारीफ़ नहीं करेगा ....वो देखों वो है चाँद ...जो वहां तक नहीं गया , समझो वो चला ही नहीं |


जब व्यक्ति पहले ही कदम पर चाँद को देखता है तो उसका मनोबल टूट जाता है | अरे इतनी लम्बी यात्रा कैसे होगी , वो चलने से डर  जाता है और दूसरा कदम ही नहीं रख पाता | दरअसल पहले कदम पर ताली बजा कर हौसला अफजाई की जरूरत होती है ....चलने की अधिकतम सीमा बताने की नहीं | अगर आप के आस -पास के कोई व्यक्ति ऐसा कर रहे हैं तो उनके मन में आप के लिए प्रशंसा का भाव कम इर्ष्या का भाव ज्यादा है |



वो आपकी छोटी से छोटी गलतियों पर ध्यान दिलाएंगे

अगर आप सफल हैं और अपने क्षेत्र में अच्छा काम कर रहे हैं तो ऐसी लोग आप की छोटी से छोटी गलती पर  ध्यान दिलाएंगे | मान लीजिये अगर आप  थोड़ा  सा असफल होते हैं तो उनका पहला शब्द होगा , " देखा मैंने तो कहा था |" ऐसा कह के वो अपने को थोड़ा सा उंचा महसूस करते हैं | आपका उतरा चहेरा उनकी तसल्ली होती है |


यहाँ पर कुछ अन्य लक्ष्ण दे रही हूँ ताकि आप अपने करीबी लोगों की छुपी हुई जलन को पहचान सकें 


वो आपको नज़र अंदाज  करेंगे


                         जब आप सफल होंगे तब उनका व्यवहार आप के प्रति बदल जाएगा | वो आपके लिए कभी समय नहीं निकालेंगे | जब भी आप उनके मिलने बात करने की इच्छा रखेंगे वो मैं व्यस्त हूँ कह कर बात खत्म कर देंगे | दोस्तों की महफ़िल में वो आप को नज़र अंदाज कर देंगे | आप देखेंगे कि जिस समय आप की उपस्थिति में वो आप को नज़रअंदाज कर रहे हैं ...ठीक उसी समय वो किसी अन्य मित्र या व्यक्ति के आने पर अपना पूरसमी देकर खुल कर बात करेंगे |

उल्टा चक्र 

                    दुनिया का नियम है कि  जब आप सफल हैं तो लोग आपस जुड़ते हैं और असफलता मिलते ही दूर होने लगते हैं | कहा भी गया है कि उगते सूरज को सब सलाम करते हैं | लेकिन जो लोग आपसे इर्ष्या की भावना रखते हैं वो इसके उल्टा व्यवहार करते हैं | जब आप सफल होते हैं वो आपसे दूर भागते हैं जब आप असफल होते हैं तो सहानुभूति जताने वालों में वो सबसे आगे होते हैं , क्योंकि ये उनकी ख़ुशी का क्षण होता है | उन्होंने इसी की कामना की होती है |


उनकी नज़रों में आप उनके दुश्मन हैं 


                                           ये लोग आपको अपना दुश्मन मानते हैं | इसका कारण है कि वो हमेशा अपने को आपसे ऊँचा देखना चाहते हैं | इसके लिए वो तरह -तरह से कोशिश करते हैं | परन्तु कामयाब नहीं होते तो बात -बात पर सिद्ध करने की कोशिश करते हैं ," भाई तुम्हारा भाग्य तो बड़ा जबरदस्त है वर्ना लिखते तो हम भी अच्छा हैं , जरा कभी मेरा आर्टिकल पढ़ कर देखना , तुमसे तो बेहतर ही होगा पर भाग्य से मात खा गए | यहाँ पर जरूरी ये है कि आप उनकी बातों से उत्तेजित ना हों | क्योंकि इर्ष्या के इस खेल में अगर आप पड़ गए या अपनी बात समझाने की कोशिश भी करने लगे तो आप की सफलता की यात्रा रुक जायेगी |


वो आपकी नक़ल करेंगे 


                               वो भले ही आप के काम को बेकार , फ़ालतू , बेवजह का बाताएं पर आपकी नकल करेंगे | हो सकता है वो आपकी बातचीत की शैली , दोस्ती का तरीका , कपड़े पहनने का ढंग भी इख्तियार कर लें | हर वो काम करने की वो कोशिश करेंगे जो आप कर रहे हैं और ये जाताने की भी कि वो इसे बेहतर कर पाते हैं |

वो आपको गलत राय देंगे 

                        जब भी आप उनसे राय मांगेंगे वो आप को बिलकुल उलटी राय देंगे , ये ऐसी राय होगी कि आप असफल हों ही | यहाँ पर आप को बहुत चौकन्ना होने की जरूरत है क्योंकि वो हर संभव कोशिश करेंगे कि आप उनकी राय सुने ही और असफल हो जाएँ |





नीलम गुप्ता


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माँ के सपनों की पिटारी

सूती धोती उस पर तेल -हल्दी के दाग , माथे पर पसीना और मन में सबकी चिंता -फ़िक्र | माँ तो व्रत भी कभी अपने लिए नहीं करती | हम ऐसी ही माँ की कल्पना करते हैं , उसका गुणगान करते हैं ...पर क्या वो इंसान नहीं होती या माँ का किरदार निभाते -निभाते वो कुछ और रह ही नहीं जाती , ना रह जाते हैं माँ के सपने 


माँ के सपनों की पिटारी 



कल मदर्स डे था और सब अपने माँ के प्यार व् त्याग को याद कर रहे थे | करना भी चाहिए ....आखिर माँ होती ही ऐसी हैं | मैंने भी माँ को ऐसे ही देखा | घर के हज़ारों कामों में डूबी, कभी रसोई , कभी कपड़े कभी बर्तनों से जूझती, कभी हम लोगों के बुखार बिमारी में रात –रात भर सर पर पट्टी रखती, आने जाने वालों की तीमारदारी करती | मैंने माँ को कहीं अकेले जाते देखा ही नहीं , पिताजी के साथ जाना सामान खरीदना , और घर आ कर फिर काम में लग जाना |अपने लिए उनकी कोई फरमाइश नहीं , हमने माँ को ऐसी ही देखा था ...बिलकुल संतुलित, ना जरा सा भी दायें, ना जरा सा भी बायें |


 उम्र का एक हिस्सा निकल गया | हम बड़े होने लगे थे | ऐसे ही किसी समय में माँ मेरे व् दीदी के साथ बाज़ार जाने लगीं | मुझे सब्जी –तरकारी के लिए खुद मोल –भाव करती माँ बहुत अच्छी लगतीं | कभी –कभी कुछ छोटा-मोटा सामान घर –गृहस्थी से सम्बंधित खुद के लिए भी खरीद लेती , और बड़ी ख़ुशी से दिखातीं | उस समय उनकी आँखों की चमक देखते ही बनती थी |


मुझे अभी भी याद है कि हम कानपुर में शास्त्री नगर बाज़ार में सब्जियां लेने गए थे , वहाँ  एक ठेले पर कुछ मिटटी के खिलौने मिल रहे थे | माँ उन्हें देखने लगीं | मैं थोड़ा पीछे हट गयी | बड़े मोल –तोल से उन्होंने दो छोटे –छोटे मिटटी के हाथी खरीदे और मुझे देख कर चहक कर पूछा ,” क्यों अच्छे हैं ना ?” मेरी आँखें नम हो गयीं | 

घर आने के बाद पिताजी व् बड़े भैया बहुत हँसे कि , “ तुम तो बच्चा बन गयीं , ये क्या खरीद लायी, फ़ालतू के पैसे खर्च कर दिए | माँ का मुँह उतर गया | मैंने माँ का हाथ पकड़ कर सब से कहा, “ माँ ने पहली बार कुछ खरीदा है , ऐसा जो उन्हें अच्छा लगा , इस बात की परवाह किये बिना कि कोई क्या कहेगा,ये बहुत ख़ुशी का समय है कि वो एक माँ की तरह नहीं थोड़ा सा इंसान की तरह जी हैं |"


 लेकिन जब मैं खुद माँ बनी , तो बच्चों के प्रेम और स्नेह में भूल ही गयी कि माँ के अतिरिक्त मैं कुछ और हूँ | हालांकि मैं पूरी तरह से अपनी माँ की तरह नहीं थी , पर अपने लिए कुछ करना बहुत अजीब लगता था | एक अपराध बोध सा महसूस होता |  तब मेरे बच्चों ने मुझे अपने लिए जीना सिखाया | अपराधबोध कुछ कम हुआ | कभी -कभी लगता है मैं आज जो कुछ भी कर पा रही हूँ , ये वही छोटे-छोटे मिटटी के हाथी है ,जो माँ के सपनों से निकलकर मेरे हाथ आ गए हैं | 



 ये सच है कि बच्चे जब बहुत छोटे होते हैं तब उन्हें २४ घंटे माँ की जरूरत होती है , लेकिन एक बार माँ बनने के बाद स्त्री उसी में कैद हो जाती है , किशोर होते बच्चों की डांट खाती है, युवा बच्चे उसको झिडकते, बहुत कुछ छिपाने लगते हैं ,और विवाह के बाद अक्सर माँ खलनायिका भी नज़र आने लगती है | तमाम बातें सुनती है , मन को दिलासा देती है ,  पर वो माँ की भूमिका से निकल कर एक स्त्री , इक इंसान बन ही नहीं पाती | क्या ये सोचने की जरूरत नहीं कि माँ के लिए दुनिया इतनी छोटी किसने कर दी है ? 



 माँ के त्याग और स्नेह का कोई मुकाबला नहीं हो सकता, लेकिन जब बच्चे बड़े हो जाए तो उनका भी फर्ज है कि खूबसूरत शब्दों , कार्ड्स , गिफ्ट की जगह उन्हें , उनके लिए जीवन जीना भी सिखाये | घर की हथेली पर बूँद भर ही सही पर उसके भी कुछ सपने हैं , या किसी ख़ास तरह से जीने की इच्छा ,बस थोडा सा दरवाजा खोल देना है , खुद ही वाष्पीकृत हो कर अपना रास्ता खोज लेंगे |

 मेरी नानी ने एक पिटारी दी थी मेरी माँ को, उसमें बहुत ही मामूली चीजें थी , कुछ कपड़ों की कतरने , कुछ मालाएं , कुछ सीप , जिसे खोल कर अक्सर माँ रो लिया करती | सदियों से औरतें अपनी बेटियों को ऐसी ही पिटारी सौंपती आयीं है, जो उन्होंने खोली ही नहीं होती है ...उनके सपनों की पिटारी | कोशिश बस इतनी होनी चाहिए कि कोई भी माँ ये पिटारी बच्चों को ना सौंप कर अपने जीवन काल में ही खोल सके |

मदर्स डे का इससे खूबसूरत तोहफा और क्या हो सकता है | क्या आप अपनी माँ को ये तोहफा नहीं देना चाहेंगे | 

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