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कहानी -माँ का दमा


क्या मन की दशा शरीर में रोग उत्पन्न करती है ? अगर विज्ञानं की भाषा में कहें तो 'हाँ " ...इस वर्ग में आने वाली बीमारियों को साइको सोमैटिक बीमारियों में रखा जाता है | बचपन से दमा की मरीज माँ को खाँसते देखने वाले बच्चे ने आखिर ऐसा क्या देखा कि उसे लगा कि माँ की बिमारी शारीरिक नहीं मनोशारीरिक है | 



माँ का दमा 




पापा के घर लौटते ही ताई उन्हें आ घेरती हैं, ‘इधर कपड़े वाले कारख़ाने में एक ज़नाना नौकरी निकली है. सुबह की शिफ़ट में. सात से दोपहर तीन बजे तक. पगार, तीन हज़ार रूपया. कार्तिकी मज़े से इसे पकड़ सकती है.....’

‘वह घोंघी?’ पापा हैरानी जतलाते हैं.

माँ को पापा ‘घोंघी’ कहते हैं, ‘घोंघी चौबीसों घंटे अपनी घू घू चलाए रखती है दम पर दम.’ पापा का कहना सही भी है.

एक तो माँ दमे की मरीज हैं, तिस पर मुहल्ले भर के कपड़ों की सिलाई का काम पकड़ी हैं. परिणाम, उनकी सिलाई की मशीन की घरघराहट और उनकी साँस की हाँफ दिन भर चला करती है. बल्कि हाँफ तो रात में भी उन पर सवार हो लेती है और कई बार तो वह इतनी उग्र हो जाती है कि मुझे खटका होता है, अटकी हुई उनकी साँस अब लौटने वाली नहीं.
‘और कौन?’ ताई हँस पड़ती हैं, ‘मुझे फुर्सत है?’

पूरा घर, ताई के ज़िम्मे है. सत्रह वर्ष से. जब वे इधर बहू बनकर आयी रहीं. मेरे दादा की ज़िद पर. तेइस वर्षीय मेरे ताऊ उस समय पत्नी से अधिक नौकरी पाने के इच्छुक रहे किन्तु उधर हाल ही में हुई मेरी दादी की मृत्यु के कारण अपनी अकेली दुर्बल बुद्धि पन्द्रह वर्षीया बेटी का कष्ट मेरे दादा की बर्दाश्त के बाहर रहा. साथ ही घर की रसोई का ठंडा चूल्हा. हालाँकि ताई के हाथ का खाना मेरे दादा कुल जमा डेढ़ वर्ष ही खाये रहे और मेरे ताऊ केवल चार वर्ष.
‘कारखाने में करना क्या होगा?’ पापा पूछते हैं.

‘ब्लीचिंग.....’
‘फिर तो माँ को वहाँ हरगिज नहीं भेजना चाहिए’, मैं उन दोनों के पास जा पहुँचता हूँ, ‘कपड़े की ब्लीचिंग में तरल क्लोरीन का प्रयोग होता है, जो दमे के मरीज़ के लिए घातक सिद्ध हो सकता है.....’
आठवीं जमात की मेरी रसायन-शास्त्रकी पुस्तक ऐसा ही कहती है.


माँ का दमा


‘तू चुप कर’ पापा मुझे डपटते हैं, “तू क्या हम सबसे ज़्यादा जानता, समझता है? मालूम भी है घर में रुपए की कितनी तंगी है? खाने वाले पाँच मुँह और कमाने वाला अकेला मैं, अकेले हाथ.....”
डर कर मैं चुप हो लेता हूँ.
पापा गुस्से में हैं, वर्ना मैं कह देता, आपकी अध्यापिकी के साथ-साथ माँ की सिलाई भी तो घर में रूपया लाती है.....
परिवार में अकेला मैं ही माँ की पैरवी करता हूँ. पापा और बुआ दोनों ही, माँ से बहुत चिढ़ते हैं. ताईकी तुलना में माँ का उनके संग व्यवहार है भी बहुत रुखा, बहुत कठोर. जबकि ताई उन पर अपना लाड़ उंडेलने को हरदम तत्पर रहा करती हैं. माँ कहती हैं, ताई की इस तत्परता के पीछे उनका स्वार्थ है. पापा की आश्रिता बनी रहने का स्वार्थ.
‘मैं वहाँ नौकरी कर लूँगी, दीदी’, घर के अगले कमरे में अपनी सिलाई मशीन से माँ कहती हैं, ‘मुझेकोई परेशानी नहीं होने वाली.....’
रिश्ते में माँ, ताई की चचेरी बहन हैं. पापा के संग उनके विवाह की करण कारक भी ताई ही रहीं. तेरह वर्ष पूर्व. ताऊकी मृत्यु के एकदम बाद.

‘वहाँ जाकर मैं अभी पता करता हूँ’, पापा कहते हैं, ‘नौकरी कब शुरू की जा सकती है?’ अगले ही दिन से माँ कारखाने में काम शुरू कर देती हैं.
मेरी सुबहें अब ख़ामोश हो गयी हैं.

माँ की सिलाई मशीन की तरह. और शाम तीन बजे के बाद, जब हमारा सन्नाटा टूटता भी है, तो भी हम पर अपनी पकड़ बनाए रखता है. थकान से निढाल माँ न तो अपनी सिलाई मशीन ही को गति दे पाती हैं और न ही मेरे संग अपनी बातचीत को. उनकी हाँफ भी शिथिल पड़ रही है. उनकीसाँस अब न ही पहले जैसी फूलती है और न ही चढ़ती है.

माँ की मृत्यु का अंदेशा मेरे अंदर जड़ जमा रहा है, मेरे संत्रास में, मेरी नींद में, मेरे दु:स्वप्नमें.....


फिर एक दिन हमारे स्कूल में आधी छुट्टी हो जाती है.....



स्कूल के घड़ियाल के हथौड़िए की आकस्मिक मृत्यु के कारण. जिस ऊँचे बुर्ज पर लटक रहे 
घंटे पर वह सालों-साल हथौड़ा ठोंकता रहा है, वहाँ से उस दिन रिसेस की समाप्ति की घोषणा करते समय वह नीचे गिर पड़ा है. उसकी मृत्यु के विवरण देते समय हमारे क्लास टीचर ने अपना खेद भी प्रकट किया है और अपना रोष भी, ‘पिछले दो साल से बीमार चल रहे उस हथौड़िए को हम लोग बहुत बार रिटायरमेंट लेने की सलाह देते रहे लेकिन फिर भी वह रोज ही स्कूल चला आता रहा, घंटा बजाने में हमें कोई परेशानी नहीं होती.....’


स्कूल से मैं घर नहीं जाता, माँ के कारखाने का रुख करता हूँ. माँ ने भी तो कह रखा है, उधर कारखाने में काम करने में मुझे कोई परेशानी नहीं होती.....

माँ के कारखाने में काम चालू है. गेट पर माँ का पता पूछने पर मुझे बताया जाता है वे दूसरे हॉल में मिलेंगी जहाँ केवल स्त्रियाँ काम करती हैं. जिज्ञासावश मैं पहले हॉल में जा टपकता हूँ. यह दो भागों में बटा है. एक भाग में गट्ठों में कस कर लिपटाईगयी ओटी हुई कपास मशीनों पर चढ़ कर तेज़ी से सूत में बदल रही हैं तो दूसरे भाग में बधे सूतके गट्ठर करघों पर सवार होकर सूती कपड़े का रूप धारण कर रहे हैं. यहाँ सभी कारीगर पुरुष हैं.

दूसरे हॉल का दरवाज़ा पार करते ही क्लोरीन की तीखी बू मुझसे आन टकराती है. भाप की 
कई, कई ताप तरंगों के संग मेरी नाक और आँखें बहने लगती हैं. थोड़ा प्रकृतिस्थ होने पर देखता हूँ भाप एक चौकोर हौज़ से मेरी ओर लपक रही है. हौज़ में बल्लों के सहारे सूती कपड़े की अटटिया नीचे भेजी जा रही हैं.



कहानी -माँ का दमा


हॉल में स्त्रियाँ ही स्त्रियाँ हैं. उन्हीं में से कुछ ने अपने चेहरों पर मास्क पहन रखे हैं. ऑपरेशन करते समय डॉक्टरों और नर्सों जैसे.
मैंउन्हें नज़र में उतारता हूँ.
मैं एक कोने में जा खड़ा होता हूँ.
हॉल के दूसरे छोर पर भी स्त्रियाँ जमा हैं : कपड़े की गठरियाँ खोलती हुईं, थान समेटती हुईं.....
माँ वहीं हैं.
उन्हें मैंने उनकी धोती से पहचाना है, उनके चेहरे से नहीं.
उनका यह चेहरा मेरे लिए नितान्त अजनबी है : निरंकुश और दबंग.
उनके चेहरे की सारी की सारी माँसपेशियाँ ऊँची तान में हैं.....
ठुड्डी जबड़ों पर उछल रही है.....
नाक और होंठ गालों पर.....
और आँखों में तो ऐसी चमक नाच रही है मानो उनमें बिजलियाँ दौड़ रही हों.....
मैं माँ की दिशा में चल पड़ता हूँ.....

‘तुम बहुत हँसती हो, कार्तिकी.’ रौबदार एक महिला आवाज़ माँ को टोकती है.....
माँ हँसती हैं? बहुत हँसती हैं? उनके पास इतनी हँसी कहाँ से आयी? या उन्हीं के अन्दर रही यह हँसी? जिसे उधर घर में दबाए रखने कीमजबूरी ही हाँफ का रूप ग्रहण कर लेती है?

‘चलो’, रौबदार आवाज़ माँ को आदेश दे रही है, ‘अपने हाथ जल्दी-जल्दी चलाओ. ध्यान से. कायदे से. कपड़े में तनिक भी सूत नहीं रहना चाहिए. ब्लीचिंग के लिए आज यह सारा माल उधर जाना है.....’
‘भगवान भला करे’, एक उन्मत्त वाक्यांश मुझ तक चला आता है.
यह शब्द चयन माँ का है. यह वाक्य रचना माँ दिन में कई बार दोहराती हैं: पापा की हर लानत पर, बुआ की हर शिकायत पर, ताई की हर हिदायत पर.....
‘किसका भला करे?’ माँ की एक साथिन माँ से पूछती हैं, ‘इस तानाशाह का?’
‘सबका भला करे’, माँ की दूसरी साथिन कहती हैं, ‘लेकिन इस कार्तिकी की जेठानी का भला न करे, जिसने देवर के पीछे पति को स्वर्ग भेज कर इसके लिए नरक खड़ा कर दिया.....’
‘लेकिन अब वह नरक मैंने औंधा दिया है,’ माँ कहती हैं, ‘वह नरक अब मेरा नहीं है. उसका है. मेरा यह कारखाना है, मेरा स्वर्ग.....’
विचित्र एक असमंजस मुझसे आन उलझा है, अनजानी एक हिचकिचाहट मुझ पर घेरा डाल रही है.....

माँ से मैं केवल दो क़दम की दूरी पर हूँ.....

लेकिन मेरे क़दम माँ की ओर बढ़ने के बजाए विपरीत दिशा में उठ लिए हैं.....


माँ का दमा

दीपक शर्मा


                                     
लेखिका -दीपक शर्मा

       फुंसियाँ

         रम्भा

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लघुकथा -व्रत






अरे बशेसर की दुल्हिन , " हम का सुन रहे हैं , अब तुम हफ्ता में तीन  व्रत करने लगी हो | देखो , पेट से हो , अपने पर जुल्म ना करो | अभी तो तुमको दुई जानो का खाना है और तुम ...

काकी की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि बशेसर की अम्माँ बोल पड़ीं | समझाया तो हमने भी था , पर मानी ही नहीं | अब धर्म -कर्म की बात है , का करें ...हम रोकेंगे तो पाप तो हमहीं को चढ़ेगा ना |"

काकी ने समर्थन में सर  हिलाया |

"चलो पुन्य करने वाली है लड़का ही होगा "

" तुम्हारे मुँह में घी शक्कर "

उधर इन दोनों से थोड़ी दूर पर बैठी बशेसर की दुल्हिन  अपने पैर के अंगूठे से जमीन खोदते हुए सोचती है कि , " पुन्य जाए भाड़ में छठे महीने से जब जमीन पर बैठ चूल्हे पर रोटी बनाने में दिक्कत होने लगी तब कितना कहा था उसने सासू माँ से , हमसे नहीं होता है | तब कहाँ मानी थीं वो , बस एक ही रट लगी रहती , ऐसे कैसे नहीं होता , हमने तो ६ बच्चे जने  और पूरे समय तक रोटी बनायीं और तुम पहले बच्चे में ही हाथ झाड़ रही हो |"


तब व्रत ही उसे एक उपाय लगा | सास खुद ही उसे रसोई से हटा देतीं , चलो हटो , व्रत की हो , ये रोटी की रसोई है |खुद ही फल ला कर उसके आगे रख देतीं |


व्रत की वजह से ही सही इस भीषण गर्मी में उसे रोटी बनाने से तो मुक्ति मिल ही गयी थी |

नीलम गुप्ता


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श्रम का सम्मान

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देश की समसामयिक दशा पर पाँच कवितायें


देश की दशा पर कवि का ह्रदय दग्ध ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता | वो अपने दर्द को शब्द देकर न सिर्फ खुद राहत पाटा है बल्कि औरों को सोचने को भी विवश करता है | प्रस्तुत है देश की समसामयिक दशा पर ऐसी ही कुछ कवितायें ..........


देश की समसामयिक दशा पर पाँच कवितायें 

विकास
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बिहार से आ रही है रोज
बच्चों के मरने की खबर
और हम
रोती कलपती माताओं से दृष्टि हटा
नयी मिस इंडिया की ख़बरों में उलझे हैं
सच में हमने विकास कर लिया है
हम मानव से मशीन  बन गए हैं



टी .वी रिपोर्टिंग 
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आइये आइये ... अपने टी वी ऑन करिए
देखिये -देखिये कैसे कैसे गरीब बच्चे मर रहे हैं
यहाँ अस्पताल में
इलाज के आभाव में
हाँ  तो डॉक्टर साहब आप क्या कर रहे हैं ?
देखिये -देखिये
वो बच्चा वहाँ  पड़ा उसे कोई पूछ नहीं रहा
आखिर क्या कर रहे हैं आप ?
बताइए -बताइए ?
छोडिये मैडम जाने दीजिये
क्यों जाने दूं
आज पूरा देश देखे
देखे तो सही आप की लापरवाही
मैंने कहा ना मैडम जाने दीजिये
फिर जाने दीजिये
हद है
आप डरते हैं उत्तर देने से
नहीं मैडम डरता नहीं
पर जितनी देर आपसे बात करूंगा
शायद एक बच्चे की जान बचा लूँ
मुझमें और आपमें फर्क बस इतना है कि
आपके  चैनल की टी आर पी
बढ़ेगी बच्चों की मौत की सनसनी से
और मेरी निजी प्रैक्टिस
बच्चो को बचाने से

शरणार्थी
------------------

वो शरणार्थी ही थे
जो रिरियाते हुए आये थे
दूर देश से
दया की भीख मांगते
पर भीख मिलते ही वो
200 लोगों को ट्रक में लाकर
कर देते हैं डॉक्टरों पर हमला
डॉक्टर करते हैं सुरक्षा की मांग
नहीं पिघलती
सत्ता की कुर्सी की ममता
उन्हें नज़र आता है
 सांप्रदायिक रंग
नहीं देखतीं कि उनकी सरपरस्ती में
क्या  है जो गुंडागर्दी पर उतर आये हैं
बेचारे शरणार्थी
और इन दो पाटो के बीच
पिस रहे हैं मरीज
शरणार्थियों के पक्ष में खडी ममता
आखिर क्यों नहीं देख पाती
उन का दर्द
जो अपने मरीज के ठीक होने की आशा में
आये थे इन अस्पतालों की शरण में


संसद में नारे 
-------------------

इस बार संसद में गूंजे
जय श्री राम
अल्लाह हु अकबर
जय भीम
जय हिन्द
जय संविधान
के बुलंद नारे
सही है कि एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में
सबको है स्वतंत्रता
अपने -अपने धर्म -सम्प्रदाय के नारों की आवाज़
बुलंद करने का
नहीं है कोई रोक टोक
बशर्ते
ये नारे ना हों एक दूसरे को नीचा दिखाने लिए
संसद से लेकर सड़क तक
ना बने धर्म
किसी युद्ध की वजह

आधा गिलास पानी
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जब तुम फ्रिज से निकाल कर
हलक से उतारते हो
आधा गिलास पानी
और आधा बहा देते हो नाली में
तो कुछ और सूख जाते हैं
महाराष्ट्र , बुन्देलखंड और राजस्थान के खेत
तीन गाँव पार करने की जगह
अब चार गाँव पार कर
लाती हैं मटकी भर पानी वहां की औरतें
क्या ये सही नहीं कि प्यास के अनुसार
 पिया जाए
सिर्फ आधा गिलास एक बार में
और आधा बच जाए फेंकने से
क्या ये भी बताना पड़ेगा
कि ये धरती सबकी है और
सबके हैं इसके संसाधन

नीलम गुप्ता


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नैहर छूटल जाए - एक परिवर्तन की शुरुआत

कहते हैं कि परिवर्तन की शुरुआत बहुत छोटी होती है, परन्तु वो रूकती नहीं है और एक से एक कड़ी जुडती जाती है और अन्तत : सारे समाज को बदल देती है ...एक ऐसे ही परिवर्तन की सूत्रधार है कोयलिया | यूँ तो कोयलिया ‘नया ज्ञानोदय में प्रकाशित रश्मि शर्मा जी की कहानी ‘नैहर छूटल जाए’ का एक पात्र ही है पर उसे बहुत ही खूबसूरती से गढ़ा गया है |

नैहर छूटल जाए - एक परिवर्तन की शुरुआत 

कहानी ग्रामीण परिवेश की है | दो भाइयों की इकलौती बहन कोयलिया की माँ की मृत्यु बचपन में ही हो गयी थी | पिता ने ही उसे माँ व् पिता दोनों का प्यार दिया | प्रेम –प्रीत से पली कोयलिया के नसीब में शराबी पति लिखा था | जो उसे अकसर मारता और वो देह पर नीले निशान लिए हुए मायके आ जाती | भाई और पिता उसकी खातिर करते पर भौजाइयाँ इस डर से की वो वहीँ ना बस जाए उसको गेंहू , चावल , खेत की तरकारी आदि दे कर  ये कह कर विदा कर देती कि जैसा भी है अब वही घर तेरा है | और कोयलिया विदाई के समय आँचल में चावल के दाने बाँध के साथ मायके का प्रेम  बाँध कर घर आ जाती |

जिस साल कोयलिया पैदा हुई थी उस साल उसके पिता को खेती में बहुत लाभ हुआ | उन्हें लगा कि कोयलिया उनके  लिए बहुत भाग्यशाली है | धीरे -धीरे उन्होंने कई खेत खरीदे | माँ की मृत्यु के बाद कोयलिया बिना माँ की तो जरूर हो गयी पर उसके पिता व् भाइयों ने उसे लाड -प्यार की कोई कमी नहीं होने दी | इसी हक से तो वो हर बार ससुराल से मार खा कर सीधे अपने घर आ जाती | आखिर ये घर भी तो उसका अपना ही था | 

उसी समय गाँव में कारखाना लगने का सरकारी प्रस्ताव आया | भूमि का अधिग्रहण शुरू हुआ | किसी के मकान का अधिग्रहण होना था तो किसी के खेत का | कोयलिया के पिता के खेत भी उसी भूमि में आये जिनका अधिग्रहण होना था | जमीन से चार गुना रकम मिलनी थी | हालांकि खेती की जमीन चली जाने पर आगे आय के श्रोत बंद हो रहे थे परन्तु उस पैसेका अन्यत्र कहीं इस्तेमाल किया जा सकता था | कोयलिया के पिता ने उसी समय भाइयों -भौजाइयों के आगे एक खेत जो उस्न्होने उस साल खरीदा था जिस साल कोयलिया पैदा हुई थी , उसके नाम करने को कहा | उन्हें कोयलिया प्रिय तो थी ही साथ ही शराबी दामाद का भय भी था कि उसकी वजह से कहीं उनकी बिटिया नाती को दिक्कत ना आये | 

भूमि अधिग्रहण और पैसे का आवंटन में होने में गड़बड़ी होने पर गाँव वालों का विद्रोह शुरू हुआ | विद्रोह को दबाने के लिए पुलिस आई और उसने अंधाधुंध हवाई फायरिंग शुरू की | इस फायरिंग में सात लोगों की गोली लगने से मृत्यु हुई | उसी में एक कोयलिया के पिता भी थे | कोयलिया रोती पीटती आई उसे पिता को खोने के साथ -साथ नैहर छूटने का भी भी था | भाइयों और भाभियों ने आश्वासन दिया और वो दुखी ह्रदय से घर वापस आ गयी | दुःख था की छूटने का नाम नहीं ले रहा था |

इसी बीच पता चलता है कि कंपनी की तरफ से उसके पिता की मृत्यु का हर्जाना मिलेगा | खबर सुन कर उसका दिल दुःख से भर गया ... करोणों के पिता की जगह लाखों का हर्जाना , क्या उसका दुःख इससे कम हो सकता है ?परन्तु उसके पति की आँखों में चमक आ गयी | वह कोयलिया पर दवाब डालने लगा कि वो भी  अपना हिस्सा मांगे ताकि वो अपने घर की टपकती छत बरसात आने से पहले ठीक करवा सके | कोयलिया को बात ठीक लगती है | वो मायके जाती है | भाई -भाभी उसका बहुत स्वागत करते हैं , परन्तु हर्जाने में हिस्समांगने की बात सुन कर नाराज़ हो जाते हैं | भाभियाँ समझा देती हैं कि क्यों बेकार में हिस्सा माँगती हो | तुम बाबा की बेटी हो पर उनके कारज में खर्चा तो हमारा ही हुआ था | बाबा नहीं रहे पर तुम्हारा नैहर तो है  ...तुम आओगी तो अपनी सामर्थ्य भर दाना -पानी हम बांधते रहेंगे तुम्हारे साथ ... हम भी बेटी हैं ,नैहर बना रहे इससे ज्यादा एक बेटी को और क्या चाहिए | 

कोयलिया को भाभियों की बात सही लगती है और वो वापस अपने घर आ जाती है | तभी मुआवजा मिलने की खबर आती है | पति फिर हिस्सा माँगने को कहता है | वो फिर नैहर  जाती है | बाबा के बाद वैसे भी अब उसका नैहर जाने का मन नहीं करता | भाई टका  सा जवाब दे देते हैं कि पैसा मिला ही नहीं और बाबा ने कब कहा था हमने तो सुना ही नहीं | उसका मन उदास तो होता है तो भाई उसे समझा देते हैं कि जब पैसा मिलेगा तब सोचेंगे | इस बार भाभियाँ मनुहार नहीं करती | वो वापस लौट आती है | 

जो लड़की बात -बात पर नैहर जाती थी वो अब महीनों नैहर नहीं जाती | नैहर छूटा सा जा रहा है | अब तो बदन पर पड़े नीले निशानों को भी किसी को दिखने की इच्छा नहीं होती | क्या फायदा ? कौन उसका अपना है जो सुनेगा | अपने दर्द अपने मन में ही रखती है .... जो भी है उसका पति ही है उसी के सहारे उसकी जिन्दगी की नैया पार लगेगी | 


तभी उसे पता चलता है कि भाइयों को मुआवजे की रकम मिल गयी है | पर किसी ने उसे बताया नहीं, नैहर सेकोई आया भी नहीं ? ये सोच कर उसे गहरा धक्का लगता है | बहुत दिन तक उदास रहने के बाद मन में क्रोध उफनता है | आखिर वो भी तो अपने बाबा की बेटी है , उस घर द्वार पर उसका भी हक़ है | ऐसे कैसे भैया भाभी उसे , उस घर में आने से बेदखल कर देंगे | वो अपने नैहर जाती है और बिना भाभियों से मोले सीधे भण्डार में जाकर चावल , दाल आदि की कुछ बोरिया उठा कर सासरे आ जाती है | भाइयों को उसकी हरकत नागवार गुज़रती है , अगली बार कुछ महीने बाद जब वो दुबारा आती है तो भाभियाँ उसके घुसने के बाद भंडार के दरवाजे को बंद कर देती हैं ...वो रोटी पीटती है पर खोलती नहीं हैं तन उसकी चची जिन्हें उसके आने की खबर है मिन्नत करके दरवाजा खुलवाती हैं | 


अप मानित  हो कर आने के बाद वह समझ जाती है कि अब उसका नैहर हमेशा के लिए छूट गया | तभी अपनी सहेली के कहने पर वो अपने हक की लड़ाई शुरू कर देती है ...वो हक़ जो सरकार ने बेटियों को दिया है पिता की सम्पत्ति पर बराबर का हक़ | 


कोयलिया इस संघर्ष में विजयी होगी की नहीं ... उसे उसका अधिकार मिलेगा कि नहीं ये तो कहानी पढने के बाद ही पता चलेगा लेकिन लेखिका ने इस कहानी में एक महत्वपूर्ण बिंदु को उठाया है ... लड़कियों के पिता की सम्पत्ति में  हक़ का | अक्सर लडकियां सम्पत्ति में हक इसलिए छोड़ देती हैं कि मायका बना रहेगा | परन्तु अगर माता -पिता के बाद भाई पूछे ही नहीं , भौजाइयों सीधे मुँह बात ही ना करें ....नैहर में नैहर जैसा कुछ महसूस ही ना हो तो ? जड़ से अलग की गयी लड़की पग -पग पर नैहर छूटने से बचाने का प्रयास करती रहती है | कहीं न कहीं उसकी कोशिश रहती है कि नैहर में आने -जाने का उसका हक़ बना रहे , फिर भी नैहर छूटता जाता है टुकड़ा -टुकड़ा रोज -रोज | लडकियां मायके को तोड़ने में नहीं जोड़ने में विश्वास करती हैं लेकिन अगर बलात नैहर छुडवाया ही जा रहा हो तो क्या लड़कियों को इस हक का प्रयोग कर अपनी बराबरी का ऐलान करना चाहिए | कहानी की खास बात है इसमें इस्तेमाल हुए देशज शब्द जो कहानी को पढने नहीं देखने का सुखद अहसास कराते हैं | 


नैहर छूटल जाए - एक परिवर्तन की शुरुआत नैहर छूटल जाए - एक परिवर्तन की शुरुआत

नया ज्ञानोदय -जून 2019 में प्रकाशित 


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अनमोल था है और रहेगा पिता का प्यार




आज का दिन पिता के नाम है | माँ हो या पिता ये दोनों ही रिश्ते किसी भी व्यक्ति के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं , जो ना सिर्फ जन्म का कारक हैं बल्कि उसको  एक व्यक्तित्व को सही आकार में ढालने में भी सहायक | पिछले एक हफ्ते से अख़बारों मैगजींस में पिता से सम्बंधित ढेरों लेख  पढ़ने को मिले , जिनमें से ज्यादातर के शीर्षक रहे ..."बदल रहे हैं आज के पापा', 'माँ की जगह ले रहे हैं पापा' , 'नया जमाना नये पापा', 'पापा और बच्चों का रिश्ता हो गया है बेहतर'  आदि-आदि | ये सच है कि आज के समय की जरूरतों को देखते हुए पिता की भूमिका में परिवर्तन आया है, लेकिन आज के पिता को पुराने पिता से बेहतर सिद्ध करने की जो एक तरफा कोशिश हो रही है वो मुझे कुछ उचित नहीं लगी |


अनमोल था है और रहेगा पिता का प्यार 


 ये सच है की फादर्स  डे मनाना हमने अभी हाल ही में सीखा है ...लेकिन संतान और पिता का एक खूबसूरत रिश्ता हमेशा से था | प्रेम तब भी था अभिव्यक्ति के तरीके दूसरे थे ...और उनको उसी तरह से समझ भी लिया जाता था | दादी के ज़माने में संयुक्त परिवारों में पिता अपने बच्चों को नहीं खिलाते थे ...भाई के बच्चों को खिलाते थे , प्यार दुलार देते थे | इस तरह से हर बच्चे को चाचा ताऊ से पिता का प्यार मिल ही जाता था | अपने बच्चे ही क्या तब गाँव की बेटी भी अपनी बेटी होती थी | कर्तव्य और पारिवारिक एकता के लिए निजी भावनाओं का त्याग आसान नहीं है | छोटे पर बच्चों को समझ भले ही ना आये पर बड़े होते ही उन्हें समझ में आने लगता था कि उनके पिता , चाचा , ताऊ परिवार को बाँधे रखने के लिए ये त्याग कर रहे हैं , तब पिता उनकी आँखों में एक आदर्श के रूप में उभरते थे | लोकगीत तब भी बाबुल के लिए ही बनते थे | बच्चे जानते थे कि उनके पिता उन्हें बहुत प्यार करते थे |


अगर अपने ज़माने के पिताओं की बात करूँ तो उस समय पिता ज्यादातर कठोर दिखा करते थे , जिसका कारण घर में अनुशासन रखना होता था | उस समय माताएं शरारत करते समय बच्चों को डराया करतीं , " आने दो बाबूजी को  , जब ठुकाई करेंगे तब सुधरोगे " और बच्चे शैतानी छोड़  कर किताबें उठा लेते | ये डर जानबूझ कर बनाया जाता था | कई बार पिता पसीजते भी तो माँ अकेले में समझा देती, "देखो आप कठोर ही रहना , नहीं तो किसी की बात नहीं सुनेगा ', और पिता अनुशासन की लगाम फिर से थाम लेते | पिता के अनुशासन बनाये रखने वाले कठोर रूप में माँ की मिली भगत रहती थी इसका पता बड़े होकर लगता था | माँ के मार्फ़त ही बच्चों समस्याएं पिता तक पहुँच जाती थीं और माँ के मार्फ़त ही पिता की राय बच्चों को मिल जाती थी | आज अक्सर माता -पिता दोनों परेशान  दिखते हैं , " ये तो किसी से नहीं डरता | "अनुशासन भी जीवन का अहम् अंग है , जिसकी पहली पाठशाला घर ही होती है, ये हम पिता से सीखते थे  |


मैंने स्वयं अपने पिता के कठोर और मुलायम दोनों रूप देखे | जिन पिता की एक कड़क आवाज से हम भाई -बहन बिलों में दुबक जाते उन्हें कई बार माँ से ज्यादा भावुक और ममता मयी देखा | तब सोचा करती कि घर में अनुसाशन बनाए रखने के लिए वो कितना मुखौटा ओढ़े रखते थे , आसान तो ये भी नहीं होगा | इस आवरण के बावजूद ऐसा कभी नहीं हुआ कि उनका प्रेम महसूस नहीं हुआ हो | वो ह्म लोगों के साथ खेलते नहीं थे , लोरी भी नहीं गाते थे , शायद पोतड़े भी नहीं बदले होंगें पर मैंने उन्हें कभी अपने लिए कुछ करते नहीं देखा हम सब सब की इच्छाएं पूरी करने के लिए वो सारी कटौती खुद पर करते | कितनी बार मन मार लेते कि बच्चों के लिए जुड़ जाएगा कितने भी बीमार हों हम सब की चिंता फ़िक्र अपने सर ओढ़ कर कहते , " तुम लोग फ़िक्र ना करो अभी हम हैं | उन्होंने कभी नहीं कहा कि हम तुम लोगों से बहुत प्यार करते हैं पर उनके अव्यक्त प्रेम को समझने की दृष्टि हमारे पास थी |

अब आते हैं आज के पिता पर ....आज एकल परिवारों में , खासकर वहाँ जहाँ पति -पत्नी दोनों काम पर जाते हों , पिता की छवि में स्पष्ट परिवर्तन दिखता है | बच्चों को अकेले सही से पालना है तो माता -पिता दोनों को पचास प्रतिशत माँ और पचास प्रतिशत पिता होना ही होगा | पिताओं ने इस नए दायित्व को बखूबी निभाना शुरू किया है | अनुशासन का मुखौटा उतार कर वो बच्चों के दोस्त बन कर उनके सामने आये हैं | माँ का बच्चों और पिता के बीच सेतु बनने का रोल खत्म हुआ है | बच्चे सीधे पिता से संवाद कर रहे हैं और हल पा रहे हैं | ये रिश्ता बहुत ही खूबसूरत तरीके से अभिव्यक्त हो रहा है |


जैसे पहले पिता और बच्चों के रिश्ते के बीच संवाद की कमी थी आज इस रिश्ते में दोस्ती के इस रिश्ते में बच्चे पिता का आदर करना नहीं सीख रहे हैं | जब पिता का आदर नहीं करते तो किसी बड़े का आदर नहीं करते | हम सब में से कौन ऐसा होगा जिसने ये संवाद अपने आस -पास ना सुना हो , " चुप बैठिये अंकल , पापा !आपको तो कुछ आता ही नहीं , और सड़क पर , " ए  बुड्ढे तू  होता कौन है हमरे बीच में बोलने वाला " |एक कड़वी  सच्चाई ये भी है कि आज जितने माता -पिता बच्चों के मित्र बन रहे हैं उतने ही तेजी से वृद्धाश्रम खुल रहते | दोस्ती का ये रिश्ता दोस्ती में नो सॉरी नो थैंक यू की जगह ... "थैंक यू पापा " और समय आने "सॉरी पापा 'में बदल रहा है |

जो भी हो पिता और बच्चे का रिश्ता एक महत्वपूर्ण रिश्ता है , जिसमें हमेशा से प्रेम रहा है ...समय के साथ अभिव्यक्ति का तरीका बदला है आगे भी बदलेगा | रिश्ता वही सच्चा है जिसमें सामंजस्य प्रेम और एक दूसरे के प्रति त्याग करने की भावना बनी रहे | भले ही ये आज का समय हो , पापा दोस्त बन गए हों पर , आज आप की हर जरूरत पूरी करने वाले पिता की आपसे दरकार  तो अब भी वही पुरानी है , जो इस फ़िल्मी गीत में है ...

" आज अंगुली थाम  के तेरी तुझे मैं चलना सिखलाऊं
कल हाथ पकड़ना मेरा जब मैं बुड्ढा हो जाऊ "
                                                  आज मिल रहा है और हम ले रहे हैं , ये फादर्स डे का असली मतलब नहीं है | ना ही गिफ्ट्स , कार्ड्स , और आई लव यू पापा ही इसके सही अर्थ को सिद्ध करते हैं | इसका सही अर्थ तो ये है कि अपने पिता के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त करने के लिए उन्हें वही भावनात्मक , शारीरिक , मानसिक संबल देने का है ....जो वो आपको हमेशा से देते आये हैं |

फादर्स डे  की शुभकामनाएं

वंदना बाजपेयी


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चमड़े का अहाता

वरिष्ठ लेखिका दीपक शर्मा जी की कहानियों में एक खास बात रहती है कि वो सिर्फ कहानियाँ ही नहीं बाचती बल्कि उसके साथ किसी ख़ास चीज के बारे में विस्तार से ज्ञान भी देती हैं | वो ज्ञान मनोवैज्ञानिक हो सकता है, वैज्ञानिक या फिर आम जीवन से जुड़ा हो सकता है | इस तरह से वो अपने पाठकों को हौले से न केवल विविध विषयों से रूबरू कराती हैं बल्कि उसके ज्ञान को परिमार्जित भी करती हैं | चमड़े का अहाता भी उनकी ऐसे ही कहानियों की कड़ी में जुड़ा एक मोती है ...जो रहस्य, रोमांच के साथ आगे बढ़ती है और अंत तक आते -आते पाठक को गहरा भावनात्मक झटका लगता है | इस कहानी में उन्होंने एक ऐसी समस्या को उठाया है जो आज भी हमारे, खासकर महिलाओं के जीवन को बहुत प्रभावित कर रही है | तो आइये पढ़ें मार्मिक कहानी ...

चमड़े का अहाता



शहर की सबसे पुरानीहाइड-मारकिट हमारी थी. हमारा अहाता बहुत बड़ा था.

हम चमड़े का व्यापार करते थे.

मरे हुए जानवरों की खालें हम खरीदते और उन्हें चमड़ा बनाकर बेचते.
हमारा काम अच्छा चलता था.

हमारी ड्योढ़ी में दिन भर ठेलों व छकड़ों की आवाजाही लगी रहती. कई बार एक ही समय पर एक तरफ यदि कुछ ठेले हमारे गोदाम में धूल-सनी खालों की लदानें उतार रहे होते तो उसी समय दूसरी तरफ तैयार, परतदार चमड़ा एक साथ छकड़ों मेंलदवाया जा रहा होता.

ड्योढ़ी के ऐन ऊपर हमारा दुमंजिला मकान था. मकान की सीढ़ियाँ सड़क पर उतरती थीं और ड्योढ़ी व अहाते में घर की औरतों व बच्चों का कदम रखना लगभग वर्जित था.
हमारे पिता की दो पत्नियाँ रहीं.
भाई और मैं पिता की पहली पत्नी से थे. हमारी माँ की मृत्यु के बाद ही पिता ने दूसरी शादी की थी.
सौतेलीमाँ ने तीन बच्चे जने परंतु उनमें से एक लड़के को छोड़कर कोई भी संतान जीवित न बच सकी.

मेरा वह सौतेला भाई अपनी माँ की आँखों का तारा था| वे उससे प्रगाढ़ प्रेम करती थीं. मुझसे भी उनका व्यवहार ठीक-ठाक ही था| पर मेरा भाई उनको फूटी आँख न सुहाता.

भाई शुरू से ही झगड़ालू तबीयत का रहा. उसे कलह व तकरार बहुत प्रिय थी. हम बच्चों के साथ तो वह तू-तू, मैं-मैं करता ही, पिता से भी बात-बात पर तुनकता और हुज्जत करता.फिर पिता भी उसे कुछ न कहते. मैं अथवा सौतेला स्कूल न जाते या स्कूल की पढ़ाई के लिए न बैठते या रात में पिता के पैर न दबाते तो पिता से खूब घुड़की खाने को मिलती मगर भाई कई-कई दिन स्कूल से गायब रहता और पिता फिर भी भाई को देखते ही अपनी ज़ुबान अपने तालु के साथ चिपका लेते.
रहस्य हम पर अचानक ही खुला.

भाईने उन दिनों कबूतर पाल रखे थे. सातवीं जमात में वह दो बार फेल हो चुका था और उस साल इम्तिहान देने का कोई इरादा न रखता था.
कबूतर छत पर रहते थे.

अहाते में खालों के खमीर व माँस के नुचे टुकड़ों की वजह से हमारी छत पर चीलें व कव्वे अक्सर मँडराया करते.



भाई के कबूतर इसीलिए बक्से में रहते थे. बक्सा बहुत बड़ा था. उसके एक सिरे पर अलग-अलग खानों में कबूतर सोते और बक्से के बाकी पसार में उड़ान भरते, दाना चुगते, पानी पीते और एक-दूसरे के संग गुटर-गूँ करते.


कहानी -चमड़े का अहाता



भाई सुबह उठते ही अपनी कॉपी के साथ कबूतरों के पास जा पहुँचता. कॉपी में कबूतरों के नाम, मियाद और अंडों व बच्चों का लेखा-जोखा रहता.

सौतेला और मैं अक्सर छत पर भाई के पीछे-पीछे आ जाते. कबूतरोंके लिए पानी लगाना हमारे जिम्मे रहता. बिना कुछ बोले भाई कबूतरों वाली खाली बाल्टी हमारे हाथ में थमा देता और हम नीचे हैंड पंप की ओर लपक लेते.उन्नीस सौ पचास वाले उस दशक में जब हम छोटे रहे, तो घर में पानी हैंड पंप से ही लियाजाता था.

गर्मी के उन दिनों में कबूतरों वाली बाल्टी ठंडे पानी से भरने के लिए सौतेला और मैं बारी-बारी से पहले दूसरी दो बाल्टियाँ भरते और उसके बाद ही कबूतरों का पानी छत परलेकरजाते.
“आज क्या लिखा?” बाल्टी पकड़ाते समय हम भाई को टोहते.

“कुछ नहीं.” भाईअक्सर हमें टाल देता और हम मन मसोसकरकबूतरों को दूर से अपलक निहारते रहते.
उस दिन हमारे हाथ से बाल्टी लेते समय भाई ने बात खुद छेड़ी, “आज यह बड़ी कबूतरी बीमार है.”

“देखें,” सौतेला और मैं ख़ुशी से उछल पड़े.“ध्यान से,” भाई ने बीमार कबूतरी मेरे हाथ में दे दी.सौतेले की नजर एक हट्टे-कट्टे कबूतर पर जा टिकी.“क्या मैं इसे हाथ में ले लूँ?” सौतेले ने भाई से विनती की.“यह बहुत चंचल है, हाथ से निकलकर कभी भी बेकाबू हो सकता है.”“मैं बहुत ध्यान से पकडूँगा.”भाई का डर सही साबित हुआ.सौतेले ने उसे अभी अपने हाथों में दबोचा ही था कि वह छूटकर मुडेर पर जा बैठा.भाई उसके पीछे दौड़ा.

खतरे से बेखबर कबूतर भाई को चिढ़ाता हुआ एक मुडेर से दूसरी मुडेर पर विचरने लगा.

तभी एक विशालकाय चील ने कबूतर पर झपटने का प्रयास किया.

कबूतर फुर्तीला था. पूरी शक्ति लगाकर फरार हो गया.

चील ने तेजी से कबूतर का अनुगमन किया.


भाई ने बढ़कर पत्थर से चील पर भरपूर वार किया, लेकिन जरा देर फड़फड़ाकर चील ने अपनी गति त्वरित कर ली.
देखते-देखते कबूतर और चील हमारी आँखों से ओझल हो गए.
ताव खाकर भाई ने सौतेले को पकड़ा और उसे बेतहाशा पीटने लगा.
घबराकर सौतेले ने अपनी माँ को पुकारा.
सौतेली माँ फौरन ऊपर चली आयीं.
सौतेलेकी दुर्दशा उनसे देखी न गयी.


“इसे छोड़ दे,” वे चिल्लायीं, “नहीं तो अभी तेरे बाप को बुला लूँगी.वह तेरा गला काटकर तेरी लाश उसी टंकी में फेंक देगा.”
“किस टंकी में?” भाई सौतेले को छोड़कर, सौतेली माँ की ओर मुड़ लिया.
“मैं क्या जानूँ किस टंकी में?”
सौतेली माँ के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं.

कहानी -चमड़े का अहाता


हमारे अहाते के दालान के अन्तिम छोर पर पानी की दो बड़ी टंकियाँ थीं. एक टंकी में नयी आयी खालें नमक, नौसादर व गंधक मिले पानी में हफ़्तों फूलने के लिए छोड़ दी जाती थीं और दूसरी टंकी में खमीर उठी खालों को खुरचने से पहले धोया जाता था.

“बोलो, बोलो,” भाई ने ठहाका लगाया, “तुम चुप क्यों हो गयीं?”

“चल उठ,” सौतेली माँ ने सौतेले को अपनी बाँहों में समेट लिया.
“मैं सब जानता हूँ,” भाई फिर हँसा, “पर मैं किसी से नहीं डरता. मैंने एक बाघनी का दूध पिया है, किसी चमगीदड़ी का नहीं.....”
“तुमने चमगीदड़ी किसे कहा?” सौतेली माँ फिर भड़कीं.
“चमगीदड़ी को चमगीदड़ी कहा है,” भाई ने सौतेली माँ की दिशा में थूका, “तुम्हारी एक नहीं, दो बेटियाँ टंकी में फेंकी गयीं, पर तुम्हारी रंगत एक बार नहीं बदली.मेरी बाघनी माँ ने जान दे दी, मगर जीते-जी किसी को अपनी बेटी का गला घोंटने नहीं दिया.....”

“तू भी मेरे साथ नीचे चल,” खिसियाकर सौतेली माँ ने मेरी ओर देखा, “आज मैंने नाश्ते में तुम लोगों के लिए जलेबी मँगवाई हैं.....”
जलेबी मुझे बहुत पसंद थीं, परंतु मैंने बीमार कबूतरी पर अपनी पकड़ बढ़ा दी.
“तुम जाओ,” सौतेले ने अपने आप को अपनी माँ की गलबाँही से छुड़ा लिया, “हम लोग बाद में आयेंगे|”
“ठीक है,” सौतेली माँ ठहरी नहीं, नीचे उतरते हुए कह गयीं, “जल्दी आ जाना. जलेबी ठंडी हो रही है.”
“लड़कियों को टंकी में क्यों फेंका गया?” मैं भाई के नजदीक---बहुत नजदीक जा खड़ा हुआ.
“क्योंकि वे लड़कियाँ थीं.”
“लड़की होना क्या ख़राब बात है?” सौतेले ने पूछा.
“पिताजी सोचते हैं, लड़कियों की ज़िम्मेदारी निभाने में मुश्किल आती है.”

“कैसी मुश्किल?”
“पैसेकीमुश्किल. उनकी शादी में बहुत पैसा खर्च करना पड़ता है.”
“पर हमारे पास तो बहुत पैसा है,” मैंने कहा.
“पैसा है, तभी तो उसे बचाना ज़रूरी है,” भाई हँसा.
“माँ कैसे मरीं?” मैंने पूछा. माँ के बारे में मैं कुछ न जानता था. घर में उनकी कोई तस्वीर भी न थी.
“छोटी लड़की को लेकर पिताजी ने उनसे खूब छीना-झपटी की. उन्हें बहुत मारा-पीटा. पर वे बहुत बहादुर थीं.पूरा जोश लगाकर उन्होंने पिताजी का मुकाबला किया, पर पिताजी में ज्यादा जोर था. उन्होंने जबरदस्ती माँ के मुँह में माँ की दुपट्टा ठूँस दिया और माँ मर गयीं.”

कहानी -चमड़े का अहाता


“तुमने उन्हें छुड़ाया नहीं?”

“मैंने बहुत कोशिश की थी.पिताजी की बाँह पर, पीठ पर कई चुटकी भरीं, उनकी टाग पर चढ़कर उन्हें दाँतों से काटा भी,परएक जबरदस्त घूँसा उन्होंने मेरे मुँह पर ऐसा मारा कि मेरे दात वहीं बैठ गये.....”
“पिताजी को पुलिस ने नहीं पकड़ा?”
“नहीं! पुलिस को किसी ने बुलाया ही नहीं.”
“वे कैसी थीं?” मुझे जिज्ञासा हुई.

“उन्हें मनकों का बहुत शौक था. मनके पिरोकर उन्होंने कई मूरतें बनायीं. बाजार से उनकी पसंद के मनके मैं ही उन्हें लाकर देता था.”
“उन्हें पंछी बहुत अच्छे लगते थे?” सौतेले ने पूछा, “सभी मूरतों में पंछी ही पंछी हैं.” घरकी लगभग सभी दीवारों पर मूरतें रहीं.
“हाँ. उन्होंने कई मोर, कई तोते और कई कबूतर बनाये. कबूतर उन्हें बहुत पसंद थे. कहतीं, कबूतर में अक्ल भी होती है और वफ़ादारी भी..... कबूतरों की कहानियाँ उन्हें बहुत आती थीं.....”
“मैं वे कहानियाँ सुनूँगा,” मैंने कहा.
“मैं भी,” सौतेले ने कहा.

“पर उन्हें चमड़े से कड़ा बैर था. दिन में वे सैंकड़ों बार थूकतीं और कहतीं, इसमुए चमड़े की सड़ा तो मेरे कलेजे में आ घुसी है, तभी तो मेरा कलेजा हर वक़्त सड़ता रहता है.....”

“मुझे भी चमड़ा अच्छा नहीं लगता,” सौतेले ने कहा.

“बड़ा होकर मैं अहाता छोड़ दूँगा,” भाई मुस्कराया, “दूर किसी दूसरे शहर में चला जाऊँगा. वहाँ जाकर मनकों का कारखाना लगाऊँगा.....”

उस दिन जलेबी हम तीनों में से किसी ने न खायीं.

दीपक शर्मा

लेखिका -दीपक शर्मा





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