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मेंढकी



मेंढकी -एक उभयचर जीव, कभी पानी में , कभी थल पर और कभी कूद कर पेड़ पर चढ़ जाना | जीवन की कितनी कलाएं उसे पता है | हर परिस्थिति से सामंजस्य स्थापित करने की उसकी क्षमता है | एक ऐसे ही मेंढकी तो थी निम्मो, फिर ऐसा क्या हुआ कि ...| ये कहानी निम्मों के साथ आगे बढती है और पाठकों के मानस पर एक रहस्य तारी रहता है | उसे मेंढकी पर भरोसा है | यही भ्रम बनाए रखना ही कथाकार की रचनाशीलता का कौशल | कहानी के अंत में ही पता चलता है कि अंतत : कौन साबित हुआ उभचर  जिसने विपरीत परिस्थिति का ग्रास बनने से पहले साम-दाम , दंड भेद से दूसरी दिशा में छलांग लगा ली  | आइये पढ़ते हैं वरिष्ठ लेखिका दीपक शर्मा की वो कहानी जिसे भोपाल विश्वविध्यालय के पाठ्यक्रम में भी शामिल किया गया है | 

मेंढकी 


निम्मो उस दिन मालकिन की रिहाइश से लौटी तो सिर पर एक पोटली लिए थी,

“मजदूरी के बदले आज कपास माँग लायी हूँ...”

इधर इस इलाके में कपास की खेती जमकर होती थी और मालिक के पास भी कपास का एक खेत था जिसकी फसल शहर के कारखानों में पहुँचाने से पहले हवेली के गोदाम ही में जमा की जाती थी।
“इसका हम क्या करेंगे?” हाथ के गीले गोबर की बट्टी को अम्मा ने दीवार से दे मारा।
“दरी बनाएंगे...”
“हमें दरी चाहिए या रोकड़?” मैं ताव खा गया। मालिक के कुत्ते की सेवा टहल के बदले में जो पैसा मुझे हाथ में मिलता था, वह घर का खरचा चलाने के लिए नाकाफ़ी रहा करता।

“मेंढकी की छोटी बुद्धि है। ज्यादा सोच-भाल नहीं सकती”, गुस्से में अम्मा निम्मो को मेंढकी का नाम दिया करती। तभी से जब छह महीने पहले वह इस घर में उसे लिवा लायी थीं। निम्मो की आँखें उन्हें मेंढकी सरीखी गोल-गोल लगतीं, ‘कैसे बाहर की ओर निकली रहती है!’ और निम्मो की जीभ उन्हें लंबी लगती, ‘ये मुँह के अंदर कम और मुँह से बाहर ज़्यादा दिखाई दिया करती है...’

“अम्माजी, आप गलत बोल रही हो”-निम्मो हँसी-जब भी वह अम्मा से असहमत हो, हँसती ज़रूर “मेंढकी की बुद्धि छोटी नहीं होती। बहुत तेज होती है। जिसे वह अपने अंदर छिपाये रहती है। जगजाहिर तभी करती है जब उसकी जुगत सफल हो जाए और जुगती वह बेजोड़ है। चाहे तो पानी में रह ले और चाहे तो खुश्की पर। चाहे तो पानी में रह ले और चाहे तो कूद कर पेड़ पर जा चढ़े। और यह भी बता दूँ, मेंढकी जब कूदने पर आती है तो कोई अंदाजा नहीं लगा सकता वह कितना ऊँचा कूद लेगी...”

“कूदेगी तू?” निम्मो की पीठ पर मैंने लात जा जमायी टनाटन- “कूद कर दिखाना चाहती है तो कूद... कूद... अब कूद...”

मेंढकों की कुदान के साथ मेरे कई कसैले अनुभव जुड़े थे। अपने पिता के हाल-बेहाल के लिए मैं मेंढक को भी उतना ही जिम्मेदार मानता था जितना मालिक को जिसके पगला रहे बीमार कुत्ते ने मेरे पिता की टाँग नोच खायी थी और जब डाक्टर ने इलाज, दवा, टीके मँगवाने चाहे थे तो मालिक ने मुँह फेर लिया था। ऐसे में बेइलाज चल रहे मेरे पिता का दर्द बेकाबू हो जाता तो वह मेंढकों की खाल के जहरीले रिसाव का सहारा ले लिया करते। उस रिसाव को अपने घाव पर लगाते-लगाते चाट भी बैठते। कभी कभी तो मेंढक की खाल को सुखा कर धुँधाते भी। अपने नशे की खातिर। ताल से मेंढक पकड़ने का काम मेरा रहा करता, उनकी इकलौती संतान होने के नाते।

दरी बनाने का भूत, निम्मो के सर से उतरा नहीं। अगले दिन, बेशक मजदूरी ही लायी, कपास नहीं। हाँ, अपने कंधों पर एक चरखा जरूर लादे रही, “मालकिन का है। उसे लोभ दे कर लायी हूँ, पहली दरी उसी के लिए बिनुंगी...”
“मतलब?” अम्मा की त्योरी चढ़ आयी। “अब तुझे दरियाँ ही दरियाँ बनानी हैं? घर का काम-काज मेरे मत्थे मढ़ना है?”
“घर का पूरा काम काज पहले जैसी ही करती रहूँगी। दरियाँ मैं अपनी नींद के टाइम बिनुंगी...”

और रसोई से छुट्टी पाते ही वह अपनी पोटली वाली रुई से जा उलझी उसे धुनकने और निबेड़ने ताकि उसे चरखे पर लगाया जा सके।

रातभर उसका चरखा चलता रहा और सुबह हम माँ-बेटे को रुई की जगह सूत के वह दो गोले नज़र आए जिनके अलग अलग सूत को वह एक साथ गूँथ रही थी एक मोटी डोरी के रूप में।
अगला वक्त हमारे लिए और भी नये नज़ारे लाया।

कभी वह हमें सूत के लच्छों को सरकंडों के सहारे हल्दी या फिर मेंहदी या फिर नील के घोल में डुबोती हुई मिली तो कभी उन रंगे हुए लच्छों के सूख जाने पर उनकी डोरी बँटती हुई।

सब से नया नज़ारा तो उस दिन सामने आया जब हमने एक सुबह लगभग चार फुटी दो बाँसों के सहारे नील-रंगी सूत को लंबाई में बिछा पाया। जमीन से लगभग ६ इंच की ऊँचाई पर। अपने आधे हिस्से में हल्दी रंगी चोंच और पैर वाली मेंहदी रंगी चिड़ियाँ लिए जिन्हें निम्मो लंबे बिछे अपने ताने पर इन दो धागों को आड़े तिरछे रख कर पार उतार रही थी।

“रात भर जागती रही है क्या?” अम्मा मुझसे भी ज़्यादा हैरान हो आयी थी।

“हाँ। मुझे यह दरी आज पूरी कर ले जानी है मालकिन को दिखाने के वास्ते कि उधार ली गयी उसकी कपास मेरे हाथों क्या रूप रंग पाती है। जभी तो उससे और कपास ला पाऊँगी...”
“मगर दूसरी दरी क्या होगी? किधर जाएगी?” मैंने पूछा।

“बाज़ार जाएगी। मेरी मेहनत का फल लायेगी...” निम्मो ने अपनी गरदन तान ली। उसके सर में एक अजानी मजबूती थी, एक अजाना जोश। ऐसी मजबूती और ऐसा जोश उसने हमारे नजदीकी के पलों में भी कभी नहीं दिखाया था।
“कितना फल?” मैं कूद गया। एक अजीब खलबली मेरे अंदर आन बैठी थी।
“साठ से ऊपर तो ज़रूर ही खींच लाएगी। मेरे बप्पा के हाथ की इस माप की दरी का दाम तो सौ से ऊपर जा पहुँचता...”


“एक दरी का सौ रूपया?” अम्मा की उँगली उसके दाँतों तले जा पहुँची।
हम माँ-बेटा उसके जुलाहे बाप से कभी मिले नहीं थे।हमारी शादी से पाँच साल पहले ही वह निमोनिया का निवाला बन चुका था अपने पीछे सात बेटियाँ छोड़ कर जिनमें निम्मो तीसरे नंबर पर थी और उस तारीख में कुल जमा चौदह साल की।

“और क्या! और आप दोनों देखेंगे। मुझे भी मिलेगा। जरूर मिलेगा। मालूम है? जहान छोड़ते समय हम बहनों में से बप्पा मेरा ही हाथ पकड़े थे। मुझे ही बोले थे- अपनी कारीगरी तेरे पास छोड़ जा रहा हूँ... इसे बनाए रखना...”
हम माँ-बेटा एक दूसरे का मुँह ताकने लगे।

मेंढकी

“बप्पा के हाथ में जादू था, जादू”, निम्मो का सुर चढ़ आया- “किसी भी रंग के ताने पर अलग-अलग रंगों का बाना वह ऐसा बिठलाते कि सूत के अंदर से फूल खिलखिलाते, पेड़ लहराते, मोर नाचते, बाघ दहाड़ते...”
“तेरी कारीगरी तो हम तब मानें जब वह रोकड़ लाए”, मैंने भी सुर चढ़ाकर निम्मो को ललकारा- “ऐसे फ़ोकट में कपास जोड़कर चिड़ियाँ उड़ाने और हाथ फोड़ने से क्या लाभ?”
“रोकड़ लाएगी। आज ही लाएगी। बस इस दरी के पूरी होने की देर भर है...” निम्मो अपने धागों में लौट गयी।
और उसी दिन मालकिन की रिहाइश से लौटते ही उसने हम माँ-बेटे को पास बुलाकर अपनी धोती के पल्लू में बंधे रुपए गिन डाले- “पूरे सौ हैं। मालकिन मेरे काम पर इतनी रीझी कि मुझ से तीन दरियाँ और बनवाना चाहती हैं...”
अम्मा ने रुपए संभाले और बोलीं- “मगर तू सौ पकड़ कर कैसे चली आयी? मोल तो पूरा माँगती। कारोबार में लिहाज कैसा?”
“एडवांस हैं, अम्मा जी, एडवांस”, निम्मो हँस पड़ी, “अभी और वसूलना बाकी है। बता आयी हूँ, अब की एक दरी अस्सी रुपये की पड़ेगी...”
“तो क्या तीसों दिन इसी में लगी रहा करोगी?” मुझे अपनी फ़िक्र सताने लगी। जिस बीच उसने अपनी वह पहली दरी तैयार की थी, उसने मेरी तरफ से अपना ध्यान पूरी तरह से मोड़ रखा था।
“अब उसकी बुनाई का लाभ हमीं को तो पहुँचना है। जितना रूपया बनाएगी, हमारे लिए ही तो बनाएगी”- निम्मो के हर दूसरे मामले में मुझ जैसी सोच रखने वाली अम्मा उसकी बुनाई वाले मामले में मुझ से अलग सोचती थी।
उस दिन मालिक ने अपने कुत्ते-घर की जाली बदलने का काम मुझे सौंप रखा था।

कुत्ता-घर मालिक के पिछवाड़े बनी हमारी कोठरी वाले दालान के एक कोने में बना था और कुत्ते को उसमें तभी बंद किया जाता था जब मालिक ने अपने खास मेहमानों को उससे दूर रखना होता था। कुत्ता था भी भेड़िया-नुमा जर्मन शैफर्ड। पुराने उस कुत्ते ही की नस्ल का जिसकी मौत मेरे पिता की मौत के आगे-पीछे ही हुई थी, पिछले साल।

कुत्ते घर की ढलवां छत लोहे की थी और दीवारें दमदार लकड़ी की छितरी हुई पट्टियों की। उन पर उस समय मैं नयी जाली ठोक रहा था।
निम्मो उसी दालान में मुझ से कुछ दूरी पर अपनी बुनाई पर लगी थी। पूरी तरह से उसमें निमग्न।
तभी मेरे हाथ से एक कील छूट कर निम्मो की बुनी जा रही दरी पर जा गिरी।
“मेरा हाथ इधर जाली को सीधी बनाए रखने में लगा है। दरी वाली वह कील उठा कर मेरे पास ले आओ” –मैंने निम्मो को आवाज़ दी।
“और इधर मेरे हाथ अपने फंदों में फँसे पड़े हैं। मेरी यह तीसरी दरी बस पूरी ही होने जा रही है” –निम्मो ने पट से मुझे जवाब दे डाला।
“मुझे जवाब नहीं चाहिए कील चाहिए” –उसकी बेध्यानी मुझसे सही नहीं गयी।
“तुम्हारे पास यही एक कील है क्या? मैंने बताया तो है मुझे यह दरी आज ही पूरी करनी है। मालकिन कहती हैं इसे पूरा करने पर ही वह मुझे मेरा बकाया पकड़ाएगी...”
“तू और तेरा बकाया” –जाली छोड़ कर मैं उसकी दिशा में दौड़ आया –“तू और तेरी बुनाई। इसे छोड़ती है या मैं इसे छुड़ाऊँ।”
“मेरे धागों को मत उलझाना –दोनों हाथ के अपने सूत समेत वह बुनी जा चुकी दो तिहाई अपनी उस दरी पर जा बिछी, ‘वरना यह दरी पूरी न हो पाएगी...”


मेंढकी

“इसे पूरी तो अब मैं करूँगा”, मैं उसके हाथों पर झपट लिया।“छोड़ दो मुझे! छोड़, दो वरना मैं ताल में जा कुदूँगी...”
“नहीं छोड़ता। नहीं छोडूँगा” –आपे से बाहर हो रहे मेरे हाथ चार-फुटी उस बाँस को लिपटे हुए धागों से बाहर खींच लाए।
“अम्मा जी”, निम्मो चिल्लायी, “अम्मा जी, हमारी दरी गयी। हमारी दरी गयी...”
“क्या हो रहा है?” कोठरी के अंदर सब देख-सुन रही अम्मा हमारी ओर बढ़ आयी। हम पति-पत्नी के झगड़ों के समय वैसे वह अपने कान-आँख बंद ही रखा करती थीं।
“अम्मा, तू आज भी बीच में मत पड़ना। वरना मुझसे कोई बड़ा कांड हो जाएगा...” मैंने अम्मा को चेताया।
अम्मा वहीँ रुक गयी।
“यह दरी आज जाएगी ही जाएगी”-मैंने चार-फुटी वह बाँस दूर जा फेंका- “और आज से मेरे घर में बुनाई एकदम बंद...”
“ऐसा कहोगे तो मैं ताल में जा कुदूँगी”-निम्मो दरी से उठ खड़ी हुई।
“जा, कूद जा। कूद जा। कूद जा” –चिनग रही मेरी चिनगारियाँ बाहर छूट आयीं।

निम्मो ने आव देखा न ताव, मालिक के गेट की ओर निकल पड़ी।

“रोक ले उसे”, अम्मा चिल्लायी, ‘रोक उसे। मेंढकी तो वह है ही, सच में जा कूदेगी...’

“कूदे जहाँ उसे कूदना है” –निम्मो के सूत वाले गोले मैंने जमीन पर पटक मारे।

निम्मो की छलांग उसे ले डूबी। उसकी मौत को एक हादसे का नाम दिलाने में मालिक ने मेरी पूरी मदद की और मैं पुलिस की पूछताछ से साफ बच निकलने में कामयाब रहा।

दीपक शर्मा 

लेखिका -दीपक शर्मा


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मर्द के आँसू



मर्द के आंसुओं पर बहुत बात होती है | बचपन से सिखाया जाता है , "अरे लड़के होकर रोते हो | बड़े होते होते भावनाओं पर लगाम लगाना आ जाता है | पर आंसू तो स्वाभाविक हैं | वो किसी ना किसी तरह से अपने निकलने का रास्ता खोज ही लेते हैं | आइये जानते हैं कैसे ...

मर्द के आँसू 


कौन कहता है की मर्द नहीं रोते हैं
उनके रोने के अंदाज जुदा होते हैं


सामाज ने कह -कह कर उन्हें ऐसा बनाया है
आंसुओं को खुद ह्रदय में पत्थर सा जमाया है
पिघलते भी हैं तो  ये आँसू रक्त में मिल जाते हैं
और सारे शरीर में बस घुमते रह जाते हैं |
बाहर निकलने का रास्ता कहाँ मिल पाता है |
इसलिए ये खून इनके अंतस को जलाता है
दर्द की किसी शय पर जब मन बुझ  जाता है
तो दुःख के पलों में इन्हें गुस्सा बहुत आता है
 कई बार जब ये गुस्से में चिल्ला रहे होते हैं
या खुदा ! दिल ही दिल में आँसू बहा रहे होते हैं |


लोग रोने पर औरत के ऊँगली उठाते हैं ,
उसको नाजुक और कमजोर बताते हैं |
पर औरत तो आंसू पोछ कर सामने आती है
पूरी हिम्मत से फिर मैदान में जुट जाती है
पर मर्द अपने आंसुओं को कहाँ पाच पाता है |
वो तो आँसुओं के साथ बस रोता ही रह जाता है |


एक औरत जब आँसुओं का साथ लेती है
बड़े ही प्रेम से दूजी का दुःख बाँट लेती है |
पर आदमी, खून में अपने आँसू छिपाता है
इसलिए दूसरा आदमी समझ नहीं पाता है |
ताज्जुब है कि इन्हें औरत ही समझ पाती है |
अपने आँसुओं से उस पर मलहम लगाती है |


हर मर्द की तकलीफ जो उसे दिल ही दिल में सताती है
उसकी माँ , बहन , बेटी पत्नी की आँखों से निकल जाती है |

वंदना बाजपेयी


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फाइल्ड अंडर - Iternational Man's Day , aansoon , tear , man's tear , poem 

समीक्षा –कहानी संग्रह किरदार (मनीषा कुलश्रेष्ठ)



That what  fiction is for . It’s for getting at the truth when the truth  isn’t sufficient for the truth “-Tim o’ Brien


मनीषा कुलश्रेष्ठ जी हिंदी साहित्य जगत में किसी परिचय की मोहताज़ नहीं हैं |उनकी कहानी ‘लीलण’ जो इंडिया टुडे में हाल ही में प्रकाशित हुई है  आजकल चर्चा का विषय बनी हुई है | एक गैंग रेप विक्टिम की संवेदनाओं को एक मार्मिक कथा के माध्यम से जिस तरह से उन्होंने संप्रेषित किया है उसके लिए वो बधाई की पात्र हैं | मनीषा जी अपनी  कहानियाँ के  किरदारों के मन में उतरती हैं और उनके मन में चलने वाले युद्ध, द्वंद , गहन इच्छाशक्ति के मनोविज्ञान के साथ कहानी का ताना –बाना बुनती हैं | वो आज के समय की सशक्त कथाकार हैं | उनकी कहानियों में विविधता है, उनकी कहानियों में विषयों का दोहराव देखने को नहीं मिलता, हमेशा  वो नए –नए अछूते विषयों को उठाती रहती हैं | इसीलिये उनकी  हर कहानी दूसरी कहानी से भिन्न होती है , न सिर्फ कथ्य में बल्कि शिल्प और भाषा में भी | वो बहुत प्रयोग करती हैं और उनके प्रयोगों ने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है | उनके कई उपन्यास मैंने पढ़े हैं | जिनमें शिगाफ, स्वप्नपाश और मल्लिका प्रमुख हैं | तीनों के ही विषय बिलकुल अलग हैं | अपने किरदारों के बारे में उनका कहना है कि


“ मेरे किरदार थोड़ा इसी समाज से आते हैं, लेकिन समाज से थोड़ा दूरी बरतते हुए | मेरी कहानियों में फ्रीक भी जगह पाते हैं, सनकी, लीक से हटेले और जो बरसों किसी परजीवी की तरह मेरे जेहन में रहते हैं | जब मुक्कमल आकार प्रकार ले लेते हैं , तब ये किरदार मुझे विवश करते हैं, उतारो ना हमें कागज़ पर | कोई कठपुतली वाले की लीक से हटकर चली पत्नी, कोई बहरूपिया, कोई दायाँ करार दी गयी आवारा औरत , बिगडैल टीनएजर, न्यूड मॉडलिंग करने वाली ...”

  
लेखिका -मनीषा कुलश्रेष्ठ

 किरदार -मेरे किरदार में मुज्मर है तुम्हारा किरदार

आज मैं जिस कहानी संग्रह के बारे में आप से चर्चा कर रही हूँ उसका नाम भी  ‘किरदार’ है  | यूँ तो हम सब का जीवन भी एक कहानी ही है | और हम  अपने जीवन की कहानी का किरदार निभा रहे हैं |कहीं ये किरदार जीवंत हैं मुखर हैं तो कहीं अपनी ही जद  में कैद हैं | ये किरदार अपने बारे में बहुत कुछ छिपाना चाहते हैं, परन्तु जिद्दी कलमें उन्हें वहां से खुरच –खुरच कर लाती रहीं हैं | ये मशक्कत इसलिए क्योंकि असली कहानी तो वही है जिसका संबंध असली जिन्दगी से है | ऐसा ही कहानी संग्रह है किरदार | इस कहानी संग्रह में मनीषा जी ऐसे किरदार लेकर आई हैं जो लीक से हट कर हैं | सबके अपने अपने अंतर्द्वंद हैं | इसलिए मनीषा जी उन अनकहे दर्द की तालाश में उनके मन को गहराई तक खोदती चली जाती हैं | बहुत ही कम संवादों के माध्यम से वो उनका पूरा मनोविज्ञान पाठक के सामने खोल कर रख देती हैं |ज्यादातर कहानियों में उच्च मध्यम वर्ग है जो बाहरी दिखावे में इतने उलझे रहते हैं कि इनके दरवाजों और चेहरों की सतह पर ठहरी हुई कहानियाँ एक बड़ा छलावा, एक बड़ा झूठ होती हैं | असली कहानियाँ तो किसी तहखाने में बंद होती हैं और वहां तक जाने की सुरंग लेखक किस तरह से बनाता है पूरी कहानी का भविष्य इसी पर निर्भर होता है | अब  ये उलझे हुए किरदार उन्हें कहाँ मिले, कैसे मिले ? पाठक के मन में स्वाभाविक रूप से उठने वाले इन प्रश्नों को उन्होंने पुस्तक की भूमिका में ही उत्तर दे दिया है |


“इस बार फिर कुछ बेसब्र किरदारों के साथ कुछ शर्मीले पर्दादार किरदारों की कहानियाँ ले कर आई हूँ | हर बार ये मुझे औचक किसी सफ़र से उतारते हुए या सफ़र के लिए चढ़ते हुए मिले |”


“एक बोलो दूजी मरवण ....तीजो कसूमल रंग” ये नाम है संग्रह की पहली कहानी का | प्रेम जीवन का सबसे जरूरी तत्व लेकिन सबसे अबूझ पहेली | ये जितना सूक्ष्म है उतना ही विराट | कोई सब कुछ लुटा कर भी कुछ नहीं पा पाता है तो किसी के हृदय के छोटे रन्ध में पूरा दरिया समाया होता है |  आज जब दैहिक प्रेम की चर्चाएं जोरो पर हैं और ये माना जाने लगा है कि प्रेम में देह का होना जरूरी है तो मनीषा जी की ये कहानी रूहानी प्रेम की ऊँचाइयों  को स्थापित करती हैं | एक प्रेम जो अव्यक्त हैं , मौन है लेकिन इतना गहरा कि सागर भी समां जाए | एक ऐसा प्रेम जिसमें ना साथ की चाह  है न ही अधिकार भाव, और ना ही शब्दों के बंधन में बांध कर उसे लघु करने की कामना | एक ऐसा प्रेम जिसका साक्षी है एक और प्रेमी युगल |  मध्यवय का  भावों को रंगों से कैनवास पर उतारता चित्रकार युगल | जो कालाकार हैं, आधुनिक हैं , बोहेमियन हैं और सफल भी | ऐसा युगल जिसका प्रेम शर्तों में बंधा है | पास आने की शर्ते, साथ रहने की शर्ते और दूर जाने की भी शर्ते साक्षी बनता है एक ऐसे प्रेम का भीड़ भरी बस में कुछ समय के लिए अव्यक्त रूप से व्यक्त होता है और फिर उस गहराई को अपने में समेट कर अपनी –अपनी राह पर चल देता है | बिलकुल संध्या की तरह, जहाँ दिन और रात मिलते हैं कुछ समय के लिए फिर अपने अपने मार्ग पर आगे बढ़ जाते हैं प्रेम की उस गरिमा को समेट कर | संध्या काल पूजा के लिए आरक्षित है क्योंकि पूजा ही तो है ऐसा प्रेम | वासना रहित शुद्ध, शुभ्र | ऐसा ही तो है कसमूल  रंग | सबसे अलग सबसे जुदा जो ना लाल है , ना गुलाबी , ना जमुनी ना मैजेंटा | आपने कई प्रेम कहानियाँ पढ़ी होंगी पर इस कहानी में प्रेम का जो कसमूल रंग है वो रूह पर ऐसा चढ़ता है कि उतारे नहीं उतरता |प्रेम की तलाश में भटके युगल शायद ...शायद यही तो ढूंढ रहे हैं |


“हमारे समान्तर एक प्रेम गुज़र गया था |अपनी लघुता में उदात्ता लिए |
अ-अभिव्यक्त, अ –दैहिक, अ –मांसल |
और हमारा प्रेम अपनी तमाम दैहिकताओं, अपनी कलाकाराना मौलिक अभिव्यक्तियों के साथ –साथ तमाम विश्व के साहित्य और सिनेमा | प्रेम उक्तियों से प्रेम और उसके नानाविध इजहार उधार लेकर एक छोटे बिंदु में लोप होता जा रहा था |



कहानी आर्किड पूर्वोत्तर राज्यों के निवासियों और सेना के बीच होने वाले संघर्षों के ऊपर आधारित है | आर्किड एक ऐसा पौधा  जो स्वपोषी होता है जिसे केवल सहारा चाहिए होता है पोषण नहीं | आर्किड का फूल दुनिया भर में अपनी सुन्दरता व् अनोखेपन व् विविधता के लिए प्रसिद्द है | पूर्वोत्तर के राज्य आर्किड ही तो हैं जिन्हें शांति  बहुत पसंद है, वो मेहनती हैं मतलब रोज का उगाना, कमाना, खाना –पीना और जीने  का मजा लेना | परन्तु सुरक्षा बालों की लगातार उपस्थिति उनके जीवन का ये रंग कहीं छीन ही लिया | अपने जंगल खेतों से वो ही बेदखल कर दिए गए | बाज़ार तो आया, पर विकास उस तरह से नहीं आया जैसा आना चाहिए | इतनी ही तो मांग है न उनकी कि आर्किड की तरह उन्हें अपना पोषण खुद करने दो | स्वपोषी को परजीवी क्यों बनाया जाए ? क्या घुटन नहीं होगी ?  

“ शुरू में सुरक्षा एजेंसियां इनके लिए मेहमान जैसे ही थीं | मेहमान आये हैं, चले जायेंगे | लेकिन अब ये छला हुआ महसूस करते हैं | हमारे यहाँ लोग कहते हैं कि सुबह मेहमान आये तो उसे ब्रेकफास्ट कराओ, फिर भी रुका रहे तो लंच कराओ, दोपहर को सोने को बिस्तर दो , शाम को रुके तो चाय दो , रात को रुकना चाहे तो डिनर दो | लेकिन अगर वो आपके घर की औरतें और खेती की जमीन मांगने लगे तो ...काट दो मतं काटने वाले नाइफ से ...|”


ये कहानी है डॉ.वाशी और प्रिश्का की | डॉ. वाशी की पोस्टिंग वहां के अस्पताल में हुई है और प्रिश्का वहीँ की निवासी, जो वहां के निवासियों से अलग है , जो ‘वहां इंडिया  में’ की जगह ‘अवर इंडिया’ बोलती है, और दोनों के बीच में अस्पताल में आने वाले ढेर सारे मरीज ...ढेर सारी लाशें, सुरक्षा बलों की भी और वहाँ के नौजवानों की भी | ये कहानी पूर्वोत्तर की समस्या पर न सिर्फ प्रकाश डालती है बल्कि गहन वेदना से भर देती है | जिस निष्पक्ष तरीके  से मनीषा जी ने इस समस्या को देखा है और उस पर कलम चलायी है वो आसान काम नहीं है | इस पर शोध कर इसे कहानी के रूप में पिरो कर सहज रूप से प्रस्तुत करने के लिए वो बधाई की पात्र हैं |


एक और कहानी जिस पर मनीषा जी ने शोध किया है वो है “ समुद्री घोडा” | वैज्ञानिक पृष्ठभूमि पर लिखी गयी यह कहानी मेल प्रेगनेंसी पर आधारित है | ये कहानी दो वैज्ञानिक विषयों को साथ  ले कर चलती है एक मेल प्रेगनेंसी और दूसरी सेलुलर मेमोरी | क्योंकि बात विज्ञान और शोध की है इसलिए इस कहानी में मेरी खास रूचि जगी | और इसके बारे में बात भी कुछ अलग तरीके से करुँगी |


 बच्चा, माता –पिता का साझा ख्वाब होता है, पर उसे नौ महीने गर्भ में रखकर जन्म देने का अधिकार माँ के ही पास है | इसमें माँ की महानता भी है और एक कर्तव्य भी जो उसे प्रकृति ने दिया है | लेकिन अगर कोई पत्नी माँ बनने  से इंकार कर दे या भविष्य में ऐसा समय आये जब स्त्रियाँ माँ बनने में अक्षम हो जाएँ तो क्या पुरुष मानव सभ्यता को बचाने का ये बीड़ा उठाएंगे ? अगर जान –जोखिम का खतरा हो तो भी ? क्या विज्ञान उनकी इस क्षेत्र में मदद कर सकती है ? ये एक ऐसा प्रश्न है जो भविष्य के गर्भ में है |


आप गूगल पर मेल प्रगनेंसी टाइप करेंगे तो आप को जानकार हैरानी होगी कि दिशा में शुरुआत हो चुकी है | ये अलग बात है कि अभी तक मेल प्रेगनेंसी के जितने भी मामले आये हैं वो सब ट्रांसजेंडर हैं | यानि उनके शरीर में गर्भाशय रहा है | इसमें Trystan Reese का मामला अभी हाल ही में बहुत प्रसिद्द हुआ था |एक्टोपिक प्रेगनेंसी जिसमें गर्भाशय  के बाहर भ्रूण का विकास हुआ है उसके कुछ सफल केस महिलाओं में देखे गए हैं | हालांकि ये बहुत खतरनाक है | पुरुषों में अभी ऐसा नहीं हुआ हैं | ये उनके लिए जानलेवा भी हो सकता है | फिर भी विज्ञान ये आशा करता है कि एक दिन ये संभव होगा | कोई न कोई तो होगा वो पहला पुरुष जो एक्टोपिक प्रेगनेसी से बच्चे को जन्म देगा | और भविष्य की इसी आशा को संजोये हुए बनती है कहानी ‘समुद्री घोडा” | लेखिका अपने पक्ष में जीव जगत से कई उदहारण लायीं हैं | जहाँ एक कोशीय जीव भी हैं और बहुकोशीय जीव भी जहाँ नर व् मादा एक ही शरीर में होते हैं | उसी जीव जगत  में है समुद्री घोडा ...समुद्री जीव , लसलसा सा |पर समुद्री घोडा वो जीव है जिसमें नर अपने निषेचित अन्डो को तब तक अपने मुँह में रखता है जब तक वो परिपक्कव नहीं हो जाते | क्योंकि वो मुँह नहीं खोल पाता इसलिए वो इतने दिन भूखा रहता है | नर व् मादा समानता का कितना खूबसूरत उदाहरण है समुद्री घोड़ा |  


ये कहानी  है एक वायव और रौद्रा की | रौद्रा एक एक्सीडेंट में अपना गर्भाशय खो चुकी है | पर वायव की जैविक पिता बनने की इच्छा है | और उसके लिए वो मेल प्रेगनेंसी के अनदेखे मार्ग पर जाना चाहता है | उसकी ये इच्छा एक बड़ी स्त्रीवादी बहस को जन्म देती है | जब प्रकृति में कई जीव जंतुओं में नर –मादा की बच्चे पैदा करने में भूमिका बराबर की है तो इंसान में क्यों ना हो ? मर्म को छूती , संवेदना को जगाती और तर्क की तलवार को धार देती ये कहानी अपने आप में एक अलहदा कहानी है |



मेल प्रेगनेंसी के अतिरिक्त ये कहानी सेलुलर मेमोरी की भी बात करती है | सेलुलर मेमोरी ...एक ऐसा शब्द है जिसमें विज्ञान , मनोविज्ञान और  पराजैविक अनुभव सिमटा हुआ है | जिस तरह से जैविक मेमोरी हमारी हर सेल में रहती है और वो द्विगुणित हो कर अपने ही जैसे सेल बनाती है वैसे ही हमारे जीवन भर के दुःख दर्द, हर्ट आदि  मनोभाव हमारे हर सेल में मेमोरी के रूप में स्टोर होते जाते हैं | आध्यात्म कहता है कि प्राण इसी मनोवैज्ञानिक मेमोरी को ले कर निकलता है | जो हमारे  अगले जन्म का मूल स्वाभाव या संस्कार बनता है | एक दो साल का बच्चा भी गायन , लेखन या अभिनय के प्रति अपनी गहन रूचि दिखाने  लगता है | जिसे हम कहते हैं “लगता है पिछले जन्म में कवि, चित्रकार आदि  रहा होगा |” यहाँ तक तो हम स्वीकार करते हैं पर ये कहानी सेलुलर मेमोरी के किस मनोवैज्ञानिक आस्पेक्ट को छूती है उसे आप कहानी पढ़ कर ही जान सकेंगे | फिर भी विज्ञानं, मनोविज्ञान और स्त्री विमर्श  के त्रिभुज पर सधी ये कहानी पाठक के सोचने के कई आयाम खोलती है |


कहानी “लापता पीली तितली” और ठगिनी दोनों मासूम बच्चियों  के दर्द से पाठक का ह्रदय चीर देती हैं |हालांकि दोनों का विषय अलग –अलगहैं  |  “लापता पीली तितली” एक ऐसे लड़की की कहानी है जो चाइल्ड एब्यूज का शिकार हुई है | उस मासूम बच्ची को कुछ भी याद नहीं | याद है तो वो पीली तितली जो ....
“पर रात जागती रही | चेतन –अवचेतन और स्वप्न के बीच वह पीली तितली कुनमुनाई और गायब हो गयी चेतना से |

एक ऐसी बच्ची जो चाइल्ड अब्यूज का शिकार होती है | उसकी चेतना को कुछ याद भी नहीं | फिर भी उसका सारा बचपन छिन जाता है | मासूमियत सतर्कता में बदल जाती है और वाचालता ख़ामोशी में , बहुआयामी व्यक्तित्व अंतर्मुखी हो जाता है | कितना कुछ है जिसके तार अवचेतन में उलझे हुए है और जब वो सुलझ कर रेशा रेशा पृथक हो जाते हैं तो ...| बच्चियों पर बढ़ते हुए यौन अपराधों की पीड़ा को उकेरती ये कहानी अपने मासूम संवादों और शिल्प के साथ संवेदनाओं को झकझोर देती है |


ठगिनी रहस्य के साथ आगे बढती है | एक युवा लड़की जो मेले में भैस बेचने आये पिता की उम्र के सरवण के पीछे चल पड़ती है | कौन है वो जो रेगिस्तान की परवाह ना करते हुए जाने किस विश्वास के साथ उसके पीछे चली जा रही है | सरवण भी यही सोचता है | ठग है शायद, उसके रूप से थोड़ा भटकता भी है पर वो निश्चिन्त बेखबर पीछे चली ही जाती है | अंत में जब राज का पर्दाफाश होता है तो पाठक की आँखें नम हो जाती हैं | ह्रदय चीत्कार कर उठता है और एक ही शब्द निकलता है उफ़ !| ये कहानी है पितृसत्ता के उन षडयंत्रों  की जो स्त्री के जन्म लेने के अधिकार को भी छीन लेती है | आज के समय में जब महिलाएं आसमान में जा रहीं है तो उसी आसमान के ठीक नीचे धरती पर कुछ ऐसे हिस्से भी हैं जो स्त्रियों के हाथों से आसमान तो क्या जमीन भी छीन लेना चाहते हैं | ये कहानी है कंचन की उसकी शारीरिक , मानसिक पीड़ा की, उसके अस्तित्व विहीन जीवन की  | यहाँ कंचन को माध्यम बना कर पितृसत्ता के चेहरे के जिस मुखौटे को नोचकर मनीषा जी उसका विद्रूप चहेरा दिखाती हैं उससे पाठक काँप जाता है | कहानी में मनीषा जी ने वहां के लोक –परिवेश और भाषा का इतना सुंदर सम्मिश्रण किया है कि कहानी केवल पठनीय ही नहीं रह जाती वो  दृश्य –श्रव्य हो उठती है |


कहानी ‘ब्लैक होल”  दो पीढ़ियों के विचारों में अंतर और उससे उपजे आपसी विरोध को दर्शाती है | लेकिन आप इस कहानी को उस तरह की कहानी बिलकुल मत मान लीजिये जो दो पीढ़ियों के सास –बहु टाइप टकराव को दिखाती हैं | ये कहानी “आजकल के बच्चे “ की एक नयी परिभाषा रखती है | ये कहानी अपने ही बच्चों के बारे में एक अलग तरह से सोचने को विवश करती है | हम अपने बच्चों को बेस्ट से बेस्ट शिक्षा देना चाहते हैं , बेस्ट किताबे देना चाहते हैं | पर क्या उससे विकसित हुए वैचारिक  मन को सँभालने को हम तैयार हैं ? कथनी और करनी के अंतर का ये वो ब्लैक होल है जो इंसानियत को निगलता जा रहा है ...समूचा | आज हर माता –पिता अपने बच्चों को अच्छी किताबें, अच्छी शिक्षा तो मुहैया करा रहा है लेकिन चलाना उसे अपनी ही लीक पर चाहता है | उसे वैचारिक स्वतंत्रता की आज़ादी नहीं है | ये मांग भी ऐसी नहीं है कि आप आयातित कह कर नाक –भौ सिकोंण लें | ये मांग है जीवन मूल्यों की | ऐसा ही एक आवरण अपने पिता के चेहरे से उनकी बेटी बड़ी ही शालीनता से उतार देती है | ये कहानी सोचने पर विवश करती है कि कही हमने तो ऐसकोई आवरण नहीं ओढ़ रखा |

“ आखिरकार मैं पिता हूँ | मेरी हथेलियों को ग्लानि नम कर गयी है , जिसे मैं बार –बार पोछ  रहा हूँ , अपनी पतलून से | वो लाल पोल्का डॉट्स वाली स्कर्ट में जो खड़ी है, अपने कॉलेज के गेट पर, मुड़ कर मुझे देखती हुई , मेरी बेटी है | आज पहली बार मैं आहत हूँ अपने आप से, वह मुझसे होगी ही , और उससे जो आहात होकर...जानें दें घबराहट होती है सोचकर |”



अब आते हैं संग्रह की आखिरी और उस कहानी पर जिस के नाम पर संग्रह का नाम है “किरदार” |जिसके बारे में मनीषा जी शुरू में ही कह देती हैं, “ मेरे किरदार में मुज्मर है तुम्हारा किरदार" |  ये कहानी तथाकथित सुखी  स्त्री मन की परतों को खोलती है | हमने सुखी स्त्री की एक परिभाषा बना रखी है और उस परिभाषा में फिट होने वाली हर स्त्री पर हम सुखी स्त्री का टैग लगा देते हैं | ऊँचे ओहदे और प्यार करने वाला  पति , प्यारे बच्चे बड़ा सा घर ,रुपया –पैसा शानो –शौकत इससे ज्यादा किसी स्त्री की क्या अभिलाषा हो सकती है ? क्या हर स्त्री इस् किरदार  में खुश रह सकती है | क्या जो किरदार समाज हमें उपलब्द्ध कराता है उसको प्रारब्ध मान कर जीवन काट देना ही नियति है | हम अपने से अलग साइज के कपड़े नहीं पहन पाते | कहीं सांस घुट्ती है |  है तो कहीं जरूरत से ज्यादा ढीलापन या हवा बर्दाश्त नहीं होती | फिर स्त्री कैसे जी पाती है किसी दूसरे के किरदार में | मधुरा भी नहीं जी पा रही थी  , तभी तो ...


“ मैं गहरे नीले रंग वाली नोटबुक उठाता हूँ , जिससे पन्ना फाड़ कर मधुरा ने सुसाइड नोट लिखा था...एक आखिरी पन्ने पर कुछ लिख कर काटा है पेन गड़ा-गड़ा कर |  मैंने अपना किरदार पूरे जोश से निभाया , अब और नहीं, सॉरी !


मधुरा की आत्महत्या केवल आत्महत्या नहीं है वह कला विहीन प्रेमविहीन जीवन की वेदना के प्रति आत्मघाती विद्रोह है | एक ऐसी बेआवाज चीख जिसके पीछे लाखों मौन चीखे हाथ थामे चली थी एक दूसरे को सहारा देते हुए ...पर  कब तक | मनीषा जी एक सुखी सी दिखने वाली कला प्रेमी स्त्री के मन में झाँकती हैं तो निकल कर आती है एक ऐसी स्त्री जो मुक्तकेशनी लक्ष्मी की बाग़ में विहार करती हुई तस्वीर में रंग भरना चाहती है, शेष शैया पर विष्णु के पैर दबाती हुई लक्ष्मी की नहीं | एक कलाकार, कला प्रेमी स्त्री को सब सुख देकर अगर उसकी कला को अभिव्यक्त करने की इजाजत नहीं है तो उसे क्या घुटन होती है , क्या बेचैनी होती है ...उसके दर्द को उसके एक –एक सूक्ष्म मनोभावों को मनीषा जी खोलती हैं ...और खुल जाती  है स्त्री की एक दुनिया जो किसी दूसरे के किरदार को निभा रही है | कोशिश कर रही है पूरे जोश से निभाने की ...पर आखिर कब तक ? मन के अँधेरे कोनो की एक विशष्ट शैली व् भाषा व्  शिल्प के साथ की गयी ये यात्रा बहुत मर्मान्तक है | एक नकली जीवन जीते हुए असली कला नहीं दी जा सकती | ये वो बेचैनी , वो घुटन है जिसे हर कला से जुडा व्यक्ति महसूस करेगा |


ये कहानी प्रेम  की परिभाषा पर भी प्रश्न चिन्ह लगाती है | क्या किसी को काट-छांट कर अपने अनकूल बना कर प्रेम करना असली प्रेम है या किसी को उसके पूरे वजूद के साथ स्वीकार करना प्रेम हैं ? नकली प्रेम को जीते हुए जो खोखलापन आता है , साथ में प्रेम करने वाला साथी हो पर मन की एक बात भी ना की जा सके तो जो अकेलापन महसूस होता है एक ऐसा विष है जिसमें तिल –तिल कर मरती है स्त्री |  मन माफिक होना और मनमाफिक दिखाना का जो द्वन्द है कहानी उसकी भी बात करती है | परिवार , समाज सब कुछ होते हुए भी ये कहानी स्त्री के रूप में मधुरा की अपने स्वतंत्र अस्तित्व की खोज है |

“ इस  किरदार को निभाने में कोई सुख, कोई अदा , कोई शोखी , कोई खूबसूरती तो हो| तुम मुझे एक खास अंदाज में रहने को कहते हो | मैं रंगों, स्याहियों, सुरों और आलापों में व्यक्त होना चाहती हूँ |”


और अंत में मैं यही कहूँगी कि किरदार कहानी संग्रह के सभी पात्र पर्देदार है ,  जो अपनी कहानियाँ यूँ ही नहीं बांचते फिरते | इनके अपने सुख दुःख हैं, संघर्ष हैं , ग्रंथियां हैं जिनसे ये जूझते हुए आगे बढ़ते हैं | ये हमारे आस-पास हैं पर इन किरदारों को ढूँढने में उन पर कलम चलाने में , उनके मनोविज्ञान की पड़ताल करने में जिस मेहनत की आवश्यकता होती है वो मनीषा जी ने की है | इसी लिए इस संग्रह की कहानियों के किरदार कहानी खत्म करते ही आपसे जुदा नहीं हो जाते बल्कि आपके  साथ कई दिन तक यात्रा करते हैं और आपके जेहन में हमेशा के लिए बस जाते हैं | संग्रह की कहानियों की भाषा और शिल्प में इतनी विविधता है जो सहज ही मन मोह लेती है | राजपाल प्रकाशन से प्रकाशित 140 पेज के इस संग्रह की कोई भी कहानी ऐसी नहीं है जिसे आप जल्दी –जल्दी पढ़ लें | हर कहानी अपने मनन का एक जरूरी समय माँगती  है |

अगर आप ऐसी कहानियाँ पढ़ना चाहते हैं जो आप के साथ लगातार चलती रहे तो ये संग्रह आप के लिए मुफीद है |

किरदार –कहानी संग्रह
लेखिका –मनीषा कुलश्रेष्ठ
प्रकाशक –राजपाल
पृष्ठ -140
मूल्य -195

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समीक्षा -वंदना बाजपेयी 
                                        

लेखिका-वंदना बाजपेयी



  
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ध्यान की पाठशाला -भाग -1


ध्यान या meditation आज के तनावपूर्ण समय की मांग है | ये हम कई जगह पढ़ते हैं | ध्यान के प्रति आकर्षित  हैं | लेकिन ध्यान करने बैठते हैं तो ध्यान नहीं  हो पाता | मन भटक जाता है | किसी को रोना बहुत आता है तो कोई उदास हो जाता है | अगर आपने आज सोचा की ध्यान करा जाए और आज से ध्यान पर बैठने लगे तो आपको अपना दिमाग सुस्त  महसूस होने लगेगा | याहन समझने की जरूरत है कि दिमाग का सुस्त होना और अवेयर होनादो अलग चीजे हैं | असली ध्यान दिमाग को सुस्त नहीं करता बल्कि कमल की तरह खिला देता है | व्यक्ति ज्यादा तरोताजा महसूस करता है |

ध्यान की पाठशाला -mindful eating


जिस तरफ से हम विज्ञान, कला या किसी अन्य विध्या को एक दिन में नहीं सीख जाते उसी तरह से ध्यान भी एक दिन में सीखना संभव नहीं | इसमें भी समय लगता है | अभी तक हमने जो कुछ भी सीखा होता है उसका संबंध बाह्य जगत से होता है पर ध्यान का संबंध अंत: जगत से होता है | पहली बार हम कुछ ऐसा सीख रहे होते हैं हैं जो हमने आज तक नहीं सीखा होता है | इसलिए समय लगना  स्वाभाविक है |


सबसे पहले तो ये समझना होगा की ध्यान है क्या ?


आम भाषा में कहें तो ध्यान का अर्थ है अपने विचारों को देखना , उन्हें अपनी इच्छानुसार बदल देना |

                                 इतनी आसान सी लगनी वाली बात वास्तव में उतनी आसान नहीं है | ऐसा ही एक प्रश्न लेकर एक व्यक्ति अपने गुरु के पास गया | उसने अपने गुरु से पूछा , " गुरुदेव ध्यान की कोई आसान विधि बताये ?"

गुरु ने कहा, "ये बहुत आसान है | बस तुम्हें इस बात का ध्यान रखना है कि तुम्हारे दिमाग में बन्दर ना आये | "

उत्तर पा कर व्यक्ति बहुत खुश हो गया | वो घर आकर ध्यान लगाने के लिए आँखे बंद कर जैसे ही बैठा उसे सबसे पहले बन्दर दिखाई दिया | उसने बहुत कोशिश की कि उसे बन्दर ना दिखाई दे | पर हर बार आँख बंद करते ही बन्दर आकर खड़ा हो जाता | धीरे -धीरे उसकी स्थिति ये हो गयी कि उसे खाते -पीते उठते बैठते भी बन्दर का ही  विचार मन पर हावी रहता | वो फिर गुरु के पास गया और बोला ,  " गुरुदेव ये तो संभव ही नहीं है | जितना मैं कोशिश करता हूँ कि बन्दर ना दिखे उतना ही बन्दर सामने आकर खड़ा हो जाता है |"

गुरुदेव मुस्कुराये, " मन का स्वाभाव ही ऐसा है | जिस चीज से रोकोगे | यह वहीँ वहीँ दौड़ेगा | तो ध्यान का पहला नियम है रोकना नहीं हैं | आँख बंद कर ध्यान पर बैठने से पहले बहुत सारे छोटे -छोटे बेसिक स्टेप्स बार -बार करके अपने आप को ध्यान के  लिए तैयार करना है |

क्या हैं ध्यान के लिए ये बेसिक स्टेप्स ?

                 सबसे महत्वपूर्ण स्टेप ये हैं कि जो आप कर रहे हैं उसे करने में अपना पूरा ध्यान दें |  मान लीजिये कि आप खाना -खा रहे हैं | तो एक -एक शब्द को स्वाद , रूप , रस , गंध का अनुभव करते हुए खाएं |इसे mindful eating भी कहते हैं |

आमतौर पर हमारी वैचारिक प्रक्रिया कैसी होती हैं | उदाहरण के लिए अगर आज आप ध्यान से खाना खाने जा रहे हैं | तो विचार कुछ इस तरह से आयेंगे ...

टमाटर आलू की  सब्जी तो स्वादिष्ट बनी है |
थोडा तीखा और होता तो ..
वैसे मुझे मटर पनीर ज्यादा पसंद हैं |
फलानी चाची  कितना अच्छा मटर पनीर बनाती हैं |
पर रेसिपी नहीं बताती ...पिछली बार तो पार्टी में सबके सामने कह दिया था , तुम नहीं बना पाओगी | पता नहीं क्या समझती हैं अपने आपको | हां , आजकल बेटे की पढाई का टेंशन हैं | पर किसको अपने बच्चों की पढाई का टेंशन नहीं है ? मेरे भी तो बच्चे हैं | बिट्टू की मैथ्स की टीचर अच्छी नहीं हैं .......

तो आपने देखा खाने से शुरू हुए विचार बिट्टू की मैथ्स तक पहुँच गए | श्रृंखला कुछ भी हो सकती है | पर हमारे सोचने की प्रक्रिया बेरोकटोक ऐसी ही है | कहते हैं कि एक घंटे में हमारा दिमाग करीब ५० से ६० हज़ार विचारों को डिकोड करता है | मन की सारी  भटकन इन्ही विचारों की वजह से है | इसलिए अवेयर होकर खाने के लिए जरूरी है की जब आप खाएं और दिमाग भटक कर इधर -उधर पहुंचे | उसे वापस खाने के रूप, रस गंध पर ले आये |

mindful eating के लिए आपको अपने खाने पर फोकस धीरे -धीरे इस तरह से बढ़ाते जाना है ...

1) आपको यह देखना है आप के लिए क्या खाना बेहतर है | खाने की लिस्ट बनाते समय सेहत को स्वाद से या स्ट्रेस बर्नर फ़ूड से ऊपर रखें |
2) खाना हमेशा टेबल या खास स्थान पर खाएं | टी वी देखते समय या कहीं भी नहीं | हल्का म्यूजिक चला सकते हैं |
3) खाने की टेबल पर केवल भूख लगने पर ही जाएँ | अगर आप स्ट्रेस में खाते हैं तो आप बार -बार मेज की तरफ दौड़ेंगे | हर बार दौड़ने पर आप ठहर कर सोचें की क्या वास्तव में मुझे भूख लगी है |
4) थोड़ी मात्रा में छोटी प्लेट में खाना लें और धीमे धीमे स्वाद लेते हुए खाएं |
5) अपनी सारी इंदियों को भोजन पर केन्द्रित कर दें |

आप देखेंगे कि धीरे धीरे आप खाते समय सिर्फ खाने पर फोकस कर पायेंगे | आपको अपने विचारों पर थोडा सा नियंत्रण शुरू हो पायेगा | इससे दो फायदे और होंगे ...

१- आप बहुत कम खाने में तृप्त हो जायेंगे | जो व्यक्ति वजन घटाना चाहते हैं उनके लिए ये बहुत कारगर तरीका है |
२...आपका पाचन तंत्र मजबूत होगा | अच्छे से एंजाइम निकलेंगे और आप शरीर पहले से ज्यादा स्वस्थ व् उर्जावान महसूस करने लगेगा |

सबसे पहले आप इस अवेयरनेस के साथ कम से कम दिन में एक बार खाना खाइए | फिर अन्य कामों में भी इसे अपनाइए |

आप देखेंगे कि आपके विचार कुछ थमने लगेंगे |

क्रमश :

वंदना बाजपेयी


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कब्जे  पर



हिस्टीरिया  एक ऐसी बिमारी है जिसमें व्यक्ति अपने ऊपर नियंत्रण खो देता है | ऐसा उनके साथ होता है जो बहुत ही दवाब में जीते हैं | कई बार आम लोग इसे मिर्गी समझ लेते हैं | परन्तु उससे अलग है | महिलाएं इसकी शिकार ज्यादा है |जब मन एक सीमा से ज्यादा दवाब नहीं सह पाता तो हिस्टीरिया के दौरे पड़ते हैं | या मरीज स्वयं ही इन दौरों को लाने की कोशिश करता है | ऐसा वो दूसरों को अपने कब्जे में लेने या उनसे अपनी बात मनवाने के लिए करता है | परन्तु यहाँ बात मानने वाले लोग अपने होते हैं जो भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं | परन्तु अगर ये जुड़ाव ना हो ...? किसी दूसरे इंसान को अपने कब्जे पर लेने की चाहत क्या -क्या करवाती है ...पढ़िए दीपक शर्मा जी की कहानी कब्जे पर में ...


कब्ज़े पर

अपनी दूसरी शादी के कुछ समय बाद पापा मुझे मेरी नानी के घर से अपने पास लिवा ले गए.
“यह तुम्हारी स्टेप-मॉम है,” अपने टॉयलेट के बाद जब मैं लाउन्ज में गई तो पापा ने मुझे स्टेप-मॉम से मिलवाया. वे मुस्करा रही थीं.
“हाऊ आर यू?” अजनबियों से पहचान बढ़ाना मैं जानती हूँ.
“हाथ की तुम्हारी अँगूठी क्या सोने की है?” स्टेप-मॉम मेरी माँ की एक अच्छी साड़ी में मेरी माँ के गहनों से लकदक रहीं.
“यह अँगूठी माँ की है,” मैंने कहा.
माँ के अंतिम स्नान के समय जब माँ की अँगुली से यह अँगूठी उतारी गई थी तो फफक कर मेरी नानी ने यह अँगूठी मेरे बाएँ हाथ के बीच वाली बड़ी अँगुली में बैठा दी थी- “इसे अब उतारना मत.”
“तुम्हारी उम्र में सोना पहनना ठीक नहीं,” स्टेप-मॉम ने अपने हाथ मेरी अँगूठी की ओर बढ़ाए, “कोई भी सोने के लोभ में तुम्हारे साथ कैसा अनर्थ कर सकता है.”
“न, मैं इसे न उतारूँगी.” मैंने अपने दाएँ हाथ से अपनी अँगूठी ढक ली.
“आज रहने दो.” पापा ने कहा.
“रहने कैसे दूँ?” स्टेप-मॉम ने अपनी मुस्कान वापस ले ली, “आपने नहीं कहा था, आशु के हाथ वाली अँगूठी मेरी है?”
“आज रहने दो.” पापा ने दोहराया, “आओ खाना खाएँ.” हमारे खाने की मेज हमारे लाउन्ज के दूसरे कोने में रही. खाना मेज पर पहले से लगा था. खाने की मेज पर हम तीनों एक साथ बैठे.
“तुम्हारे लिए तुम्हारी स्टेप-मॉम ने खाना बहुत मेहनत से तैयार किया है,” पापा ने मेरी प्लेट में चावल परोसे.
“थैंक यू, पापा. मैंने कहा.
माँ की ज़िद थी जब भी पापा मेरे साथ नरमी दिखाएँ, मुझे ज़रूर ‘थैंक यू’ बोलना चाहिए.
“मुझे नहीं अपनी स्टेप-मॉम को थैंक-यू बोलो.” पापा ने अपनी टूटरूँ-टू शुरू की, “तुम्हारी स्टेप-मॉम बहुत ही अच्छी, बहुत ही भली, बहुत ही सुशील और बहुत ही सुंदर लड़की हैं.....”
“थैंक यू,” न चाहते हुए भी मैंने स्टेप-मॉम की तरफ़ अपने बोल लुढ़का दिए. माँ कहती थीं पापा का कहना मानना बहुत ज़रूरी है.
“बहुत अच्छा अचार है.”


कब्ज़े पर


स्टेप-मॉम ने नींबू का अचार दोबारा लिया..... अकस्मात् मुझे अचार बना रही माँ दिखाई दे गईं. माँ का पुराना सूती धोती का वह टुकड़ा दिखाई दे गया जिसे मैंने झाड़न बनाकर नींबू पोंछने के लिए इस्तेमाल किया था.....
“ये नींबू मैंने गिने थे,” मैंने कहा, “वन टू वन हंडरड एंड फोर......”
“तुम्हें गिनती आती है?” स्टेप-मॉम ने अपनी भौंहें ऊपर कीं, “मुझे बताया गया था तुमने कभी स्कूल का मुँह नहीं देखा है.”
“माँ ने सिखाई थी.” मैंने कहा.
“आशु तुम्हारे काम में भी तुम्हारी मदद करेगी,” पापा ने स्टेप-मॉम को ख़ुश करना चाहा.
“जब तक आशु मुझे अपनी अँगूठी न देगी, मैं उससे कोई मदद न लूँगी,” स्टेप-मॉम अपनी ज़िद भूली नहीं. खाना छोड़कर मैं अँगूठी की तरफ़ देखने लगी. अँगूठी की दिशा से एक हिलकोरा उठा और मुझे हिलाने लगा. मेरे समेत मेरी कुर्सी लड़खड़ाई.
“तुम खाना खाओ,” पापा अपनी कुर्सी से उठ खड़े हुए, “आशु को अपनी माँ की तरह मिरगी के दौरे पड़ते हैं. मैं आशु को सोफ़े पर लिटाकर अभी आया.
खाने की कुर्सी से पापा ने मुझे नरमी से उठाया और लाउन्ज के सोफ़े पर धीरे से लिटा दिया. माँ की बड़बड़ाहट मैं हूबहू अपनी ज़बान पर ले आई, “नर्क, नर्क, नर्क, मैं यहाँ न रहूँगी. यह नर्क है, नर्क, नर्क, नर्क......”
“क्या वे भी ऐसा बोलती थीं?” स्टेप-मॉम सहम गई.
“तुम खाना खाओ,” खाने की मेज पर लौटकर पापा ने दोहराया, “मिरगी के रोगी को अकेले छोड़ देना बेहतर रहता है......”
“मैं खाना नहीं खा सकती,” स्टेप-मॉम की आवाज़ फिर डोली, “ऐसी हालत में कोई खाना खा सकता है भला?”
लेकिन अपनी बड़बड़ाहट के बीच मैं जानती रही, पापा ज़रूर खाना खा सकते थे..... पापा ज़रूर खाना खा रहे थे..... माँ की मिरगी के दौरान पापा हमेशा खाना खाते रहे थे......
अगले दिन स्टेप-मॉम ने पापा के ऑफिस जाते ही मुझे मेरे कमरे में आ घेरा, “यह अँगूठी उतार दो.”
“मैं नहीं उतारूँगी,” मैंने कहा, “इसमें माँ की रूह है इसे मैं अपने से अलग नहीं कर सकती.”
“देख लो. नहीं उतारोगी, मिरगी का दौरा डाल लोगी तो मैं तुम्हें यहाँ न रहने दूँगी. अस्पताल में फेंक आऊँगी. वहाँ डॉक्टर तुम्हें बिजली के ऐसे झटके लगाएँगे कि तुम अपने झटके भूल जाओगी.”
“ठीक है. मैं डॉक्टर के पास जाऊँगी. यहाँ नर्क है, नर्क, नर्क, नर्क, मैं यहाँ न रहूँगी.”
“तेरे कूकने से मैं नहीं डरती,” स्टेप-मॉम मुझ पर झपटीं. “आज मैं तुझसे यह अँगूठी लेकर रहूँगी.”
हूबहू पापा के अंदाज़ में मैंने स्टेप-मॉम के बाल नोच डाले. माँ को नोचते-खसोटते समय पापा हमेशा माँ के बालों से शुरू करते. फ़िरक कर स्टेप-मॉम ने एक फेरा लिया और मुझे जबरन ज़मीन पर पीठ के बल उल्टा कर दिया.
ज़मीन को छूते ही हूबहू माँ की तरह मैं काँपी और बड़बड़ाई, “मौत-मौत, मौत, मुझे मौत चाहिए. मौत, मैं मौत चाहती हूँ, मौत, मौत, मौत......”
तभी मैंने माँ को देखा. कुछ स्त्रियाँ माँ को स्नान दे रही थीं. हाथ में साबुन लगाए स्टेप-मॉम के हाथ माँकी अँगूठी उतारना चाह रहेथे, लेकिन अँगूठी माँ की अँगुली पर जा बैठी, सो बैठी रही थी, टस से मस न हुई थी.
“अँगूठी उतरी क्या?” पापा ने पूछा.
“नहीं.” स्टेप-मॉम ने कहा.
“मैं देखता हूँ.” पापा फलवाली छुरी उठा लाए, सफ़ेद दस्तेवाली छुरी.
अँगूठी की जगह से पापा ने माँ की अँगुली काटी. अँगुली ककड़ी की फाँक की तरह माँ के हाथ से अलग हो गई थी. माँ के हाथ ने खून का एक कतरा भी नहीं बहाया. “अँगूठी मुझे दीजिए.” स्टेप-मॉम ने अँगूठी की तरफ़ हाथ बढ़ाया, लेकिन पापा ने स्टेप-मॉम का हाथ नीचे झटक दिया और अँगूठी मेरे हाथ में पहना दी, “अब इसे उतारना मत.”
“तुम्हें अपनी स्टेप-मॉम के साथ हाथापाई नहीं करनी चाहिए.” शाम को पापा ने मेरे साथ सख्ती दिखाई.
“वे मेरी अँगूठी छीनना चाहती थीं.” मैंने अपनी अँगूठी पर अपने दाएँ हाथ की अँगुलियाँ फेरीं.
“हम तुम्हें डॉक्टर के पास ले जा रहे हैं,” स्टेप-मॉम ख़ुशी से मुस्कराई.
“यह गाना ख़त्म हो जाने दीजिए, पापा.” केबल पर मेरा मनपसंद गाना आ रहा था, “यह गाना मुझे बहुत अच्छा लगता है.”
“मैंने सब पता लगा लिया है,” स्टेप-मॉम ने मुझे सुनाया. “मिरगी का एक ऑपरेशन होता है-प्रीफ्रंटल लौबोटमी- खोपड़ी में गड़बड़ी पैदा करने वाले खंड को ऑपरेशन द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है और फिर मिरगी के दौरे ख़त्म हो जाते हैं.”
“मैं ऑपरेशन नहीं करवाऊँगी, पापा. मैं सिर्फ़ स्टेप-मॉम को डराने के लिए झूठ-मूठका नाटक करती थी..... माँ की तरह.” मैं रोने लगी.
“तुझे मिरगी नहीं है तो ला, अपनी अँगूठी उतार कर मुझे दे दे,” स्टेप-मॉम ने मुझे ललकारा.


कब्ज़े पर

“इसे मिरगी है,” पापा अपनी टूटरूँ-टू वाली आवाज़ से बाहर निकल आए, “मिरगी के बारे में मैं तुमसे ज़्यादा जानता हूँ. जिस ऑपरेशन की तुम बात कर रही हो उसके बारे में डॉक्टर दो मत रखते हैं. आमतौर पर वह ऑपरेशन ग्यारह साल से छोटे बच्चों पर किया जाता है और हमारी आशु अब अपने चौदहवें साल में है. इस उम्र में इसका ऑपरेशन हुआ तो इसकी याददाश्त चली जाएगी. इसका दिमाग़ कुछ भी नया सीख न पाएगा.”
“मुझे हंसाइये मत,” स्टेप-मॉम ने एक ज़ोरदार ठहाका लगाया, “किस बेदिमाग़ के दिमाग़ की बात कर रहे हैं? जिसके दिमाग़ की हत्थी कुदरत ने शुरू से ही उसके हाथ में नहीं रखी? उठिए, चलिए, डॉक्टर से सब पूछ लेंगे.”
“नहीं, पापा नहीं,” मैं ज़मीन पर लोटने लगी, “मैं डॉक्टर के पास न जाऊँगी. मुझे मिरगी नहीं है.....” ............................
“डॉक्टर ने क्या बताया?” माँ ने पूछा.
“डॉक्टर ने कहा,” पापा ने अपने दाँत पीसे, “घर जाते ही अपनी पत्नी के कान उमेठो, उसके मुँह पर थूको, उसने तुम्हें उल्लू बनाया है, तुम्हारा रूपया और समय बरबाद किया है.”
“डॉक्टर झूठ बोलता है,” माँ सिकुड़ी.
“एंज्योग्राफी झूठ बोलती है?” पापा चीखे. “स्कैनिंग इनसेफेलोग्राम सब डॉक्टर कई बार देखे और पलटे और हर बार उसने यही कहा, तुम्हारी पत्नी को कोई रोग नहीं. उसके दिमाग़ का दायाँ हेमिस्फियर, उसके दिमाग़ का कौरपस केलोजम सब सही काम कर रहे हैं, कहीं मिरगी का एक भी लक्षण नहीं.”
“फिर यह क्या है?” माँ ने अपना माथा पीटा, “यह कैसी भनभनाहट है जो हर समय मेरी कनपटियों पर हथौड़े चलाती है और मैं अपने होश खो बैठती हूँ?”
“वह तुम्हारे स्वार्थ की आवाज़ है. अपनी ज़िम्मेदारियों से बचने के लिए तुम बीमार होने का ढोंग रचाती हो.”
“स्वार्थ?” माँ हँसने लगीं, “स्वार्थ? हे भगवान अगर मैंने कभी भी स्वार्थ दिखाया है तो तुम अभी इसी पल मेरे प्राण हर लो, मेरी साँस खींच लो.”
“भगवान सुनेगा, ज़रूर सुनेगा,” पापा जोश में आ गए और फलवाली छुरी उठा लाए, सफ़ेद दस्तेवाली छुरी............  .....................
“छुरी मत लाना पापा,” मेरी हिचकी बँध गई, “छुरी मत लाना.”
“बस, अब कोई कहानी नहीं, कोई फंतासी नहीं.” मुझे ज़मीन से उठाकर सोफ़े की तरफ़ ले जा रहे पापा ने मुझे एक ज़ोरदार हल्लन दिया.
“मैं झूठ बोल रही, पापा.” अपनी हिचकियों के बीच मैं बड़बड़ाई, माँ के एक्सीडेंट वाले दिन मेज पर से फलवाली छुरी आपने उठाई थी, माँ ने नहीं. माँ की कलाई आपने काटी थी, माँ ने नहीं......”
“अपनी माँ की आत्महत्या यह स्वीकार नहीं कर पा रही,” स्टेप-मॉम के साथ अपनी टूटरूँ-टूँ वाली आवाज़ पापा वापस ले आए. “इसकी बेहतरी के लिए शायद वह ऑपरेशन ज़रूरी है.”
“मैं बताती हूँ,” स्टेप-मॉम ज़ोर से हँसी, “इसके ऑपरेशन से हमारी बेआरामी भी दूर होगी. बात-बात पर इसका यों कब्ज़े पर से उतर जाना मेरी बर्दाश्त के बाहर है.”
स्टेप-मॉम के बाल नोचने के लिए मैंने उठना चाहा मगर उठ न पाई. क्या मैं माँ की तरह अडोल हो गई थी?

दीपक शर्मा 





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