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कुँजी


जैसे होने की उत्त्पत्ति ना होने से होती है , जीवन की मृत्यु से और प्रकाश की अन्धकार से ...वैसे ही कई बार विलपत स्मृतियाँ उस समय के अँधेरे में और स्पष्ट होकर दिखाई देने लगतीं है जब परिस्थितियाँ  हमें दुनियावी चीजों से ध्यान हटा अंतरतम में झाँकने को विवश कर देती हैं | ये कहानी ऐसी ही विस्मृत स्मृतियों की है जो कई साल बाद मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बाद चेतन मन के अंधकार में  अवचेतन मन की गहराई से ना केवल प्रकट हुई बल्कि स्पष्ट भी हुईं | एक बार बचपन की स्मृतियों में अपने अंधे -माता -पिता को याद करते हुए अपने प्रश्नों के उत्तर भी मिले | अवचेतन द्वारा उत्तर दिया जाना शोध का विषय हो सकता है पर खानी का विषय स्त्री शोषण की वो दास्ताँ है जिसे उस समय वो बच्चा भी नहीं समझ पाया था |


कुँजी


बीती वह पुरानी थी.....
लेकिन मोतियाबिंद के मेरे ऑपरेशन के दौरान जब मेरी आँखें अंधकार की निःशेषता में गईं तो उसकी कौंध मेरे समीप चली आई.....
अकस्मात्.....
मैंने देखा, माँ रो रही हैं, अपने स्वभाव के विरुद्ध.....
और गुस्से में लाल, बाबा हल की पट्टीदार खिड़की की पट्टी हाथ में पकड़े हैं और माँ को नीचे फेंक रहे हैं.....
अनदेखी वह कैसे दिख गई मुझे?
धूम-कोहरे में लिपटी माँ की मृत्यु ने अपनी धुँध का पसारा खिसका दिया था क्या?
अथवा मेरे अवचेतन मन ने ऑपरेशन की प्रक्रिया से प्रेरित मेरी आँख की पीड़ा कोपीछे धकेलने की ख़ातिर मुझे इस मानसिक दहल की स्थिति में ला पहुँचाया था?
मेरा चेतन मन हिसाब बैठाता है : माँ की मृत्यु हुई, 28 फरवरी, 1956 की रात और मेरा ऑपरेशन हुआ 28 फरवरी, 2019 की शाम.....
तिरसठ साल पीछे लौटता हूँ.....
बाबा दहाड़ रहे हैं, “वह कुँजी मुझे चाहिए ही चाहिए.....”
माँ गरज रही हैं, “वह कुँजी मेरे पास रहेगी. मेरे बाबूजी की अलमारी की है. मेरी संपत्ति है.....”
1904 में जन्मे मेरे नाना संगीतज्ञ थे. नामी और सफ़ल संगीतज्ञ. रेडियो पर प्रोग्राम देते, संगीत-गोष्ठियों में भाग लेते. विशिष्ट राष्ट्रीय कार्यक्रमों में बुलाए जाते.
अपनेअड़तीसवें वर्ष, 1942 में, उन्होंने अपनी पुश्तैनी इमारत की ऊपरी मंजिल पर अपना विद्यालय स्थापित किया : सुकंठी संगीत विद्यालय. बोर्ड के निचले भाग पर लिखवाया : शिष्याओं के लिए पृथक कक्ष एवं पृथक शिक्षिका की व्यवस्था.
लड़कियों को माँ पढ़ाती थीं. वे नाना की इकलौती संतान थीं और ‘सुकंठी’ उन्हीं का नाम था. अपने नाम के अनुरूप उनके कंठ में माधुर्य और अनुशासन का ऐसा जोड़ था कि जो भी सुनता, विस्मय से भर उठता.
लेकिन वे अंधी थीं.
ऐसे में 1946 में जब सत्रह वर्षीय बाबा नाना के विद्यालय में गाना सीखने आए तो नाना ने उन्हें अपने पास धर लिया. बीस वर्षीया अपनी सुकंठी के लिए बाबा उन्हें सर्वोपयुक्त लगे थे. बाबा अंधे थे. अनाथ थे. सदाचारी थे. तिस पर इतने विनम्र और दब्बू कि प्रतिभाशाली होने के बावजूद अहम्मन्यता की मात्रा उनमें शून्य के बराबर थी.
नाना उन्हें ‘नेपोलियन थ्री’ कहा करते. ‘नेपोलियन टू’ इसलिए नहीं क्योंकि वह उपाधि वे माँ को पहले दे चुके थे.
उन दिनों नेपोलियन को सफ़लता और दृढ़निश्चय का पर्याय माना जाता था और नेपोलियन की परिश्रम-क्षमता का एक किस्सा नाना सभी को सुनाया करते :
एक रात काउंसलर थककर ऊँघने लगे तो नेपोलियन ने उन्हें डांटा , ‘हमें जागते रहना चाहिए, अभीतो सिर्फ़ दो बजे हैं. अपने वेतन के बदले में हमें पूरा-पूरा काम देना चाहिए.’
नेपोलियन के एक भक्त उनकी बात सेबहुत प्रभावित हुएऔरअपने साथी काउंसलरों सेबोले, ‘ईश्वर ने बोनापार्ट बनाया और फिर आराम से चला गया.’
काम करने की ख़ब्त नाना, माँ और बाबा को बराबर की रही, लेकिन बाबा रात को देर में सोते थे और सुबह देर से उठते थे. इसकेविपरीत नाना और माँ रात में जल्दी सोने के आदी रहे और सुबह जल्दी जग जाने के.
माँऔरबाबाके तनाव का मुख्य बिंदु भी शायद यही रहा. आज स्वीकार किया जा रहाहै कि हममें से कुछ लोग फ़ाउलज(चिड़ियाँ), मॉर्निंग पीपल (प्रातः कालीन जीव) होते हैं और कुछ आउलज(उल्लू), नाइट पीपल(रात्रि जीव). किंतु बाबा को माँका जल्दी सो जाना अग्राह्य लगता. शायद इसीलिए उन्होंने शराब पीनी शुरू की. नाना के जीवनकाल में छुपकर और बाद में खुल्लमखुल्ला.
मेरा जन्म सन उनचास में हुआ था, माँ और बाबा की शादी के अगले वर्ष. मेरी प्रारंभिक स्मृतियाँ उषाकाल से जुड़ी हैं :
नाना के शहद-घुले गुनगुने पानी के भरे चम्मच से.....
नाना के हाथ के छीले हुए बादाम से, जोरात में भिगोए जाते थे.....
नानाऔरमाँकी संगति में किए गए सूर्य-नमस्कार से.....


कुँजी

माँ और नाना द्वारा गिने जा रहे और हस्तांतरित हो रहे रुपयों और सिक्को से.....
कब्ज़ेदार दो लोहे के पत्तरों की स्लेट के बीच काग़ज़ रखते हुए माँ के हाथों से.....
काग़ज़ पर ‘रेजड डॉट्स (ऊपर उठाए गए बिंदु) लाने के लिए उन पत्तरों में बने गड्ढों पर काग़ज़ दबाते हुए माँ के स्टाइलस से.....
माँ ब्रेल बहुत अच्छा जानती थीं.
और सच पूछिए तो मैंने अपने गणित के अंक और अंग्रेजी अक्षर अपने स्कूल जाने से पहले ब्रेल के माध्यम से सीख रखे थे. और ब्रेल मुश्किल भी नहीं. इसके कोड में तिरसठ अक्षर और बिंदु अंकन है. प्रत्येक वर्ण छह बिन्दुओं के एक सेल में सँजोया जाता है, जिसमें दो वर्टीकल, सीधे खानों में एक से लेकर छह ‘रेजड डॉट्स’ की पहचान से उसका विन्यास निश्चित किया जाता है.
अपने तीसरे ही वर्ष से मैं नाना के पास सोने लगा था.....
हॉल के दाएँ कमरे में.....
नाना की निचली मंजिल पर बनी चार दुकानों के ऐन ऊपर बना वह हॉल नाना ने तीन कक्षों में बाँट रखा था, दो छोटे और एक बड़ा. हॉल में चार आदम-कद, पट्टीदार खिड़कियाँ थीं, जो सड़क की तरफ़ खुलती थीं और हर एक खिड़की के ऐन सामने बीस फुट की दूरी पर एक-एक दरवाज़ा था जो अन्दर आँगन में खुलता. बड़ाकक्ष दो खिड़कियाँ और दो दरवाज़े लिए था और दाएँ-बाएँ के दोनों कक्ष एक-एक खिड़की और एक-एक दरवाज़ा. बाएँ कक्ष में नाना ने विद्यालय का दफ़्तर खोल रखा था और दाएँ कक्ष को वे निजी, अनन्य प्रयोग में लाते थे. उसी कक्ष में उनका पलंग था. उनके कपड़ों की घोड़ी थी, उनकी किताबों का रैक था, उनके निजी संगीत वाद्य थे और वह अलमारी जिसमें रूपया रहता था और जिसकी कुँजी वे अपनी जेब में रखा करते थे.
कहने-भर को मालिकी उनकी थी लेकिन सब कुछ माँ के नाम था, विद्यालयक्या, मकान क्या, दुकानें क्या. और सारा हिसाब-किताब भी माँ ही रखा करतीं. दुकानों के किराए और बकाए का; विद्यालयकीफ़ीस और निधि का; नौकर लोग के वेतनका; बाबा के जेब-खर्च का; पंसारी, बजाज और दर्ज़ी के बिल का; मेरे स्कूल की किताबों, बैगऔर बस के व्यय का.
सुबह के चार बजते ही आँगन पार कर माँ इधर हॉल के बीच वाले कमरे में चली आतीं. यहीं उन्होंने अपना मंदिर बना रखा था. अपनी शिष्याओं को संगीत भी वे यहीं सिखाती थींऔर बाबा के रूठने पर इधर सो भी जातीं. बाबा उधर आँगन पार बने अपने कमरे में रहते थे. उधर तीन कमरे थे. बायाँ बाबा का, दायाँ रसोई घर और बीच वाला विद्यालय का, जहाँ पुरुष जन संगीत सीखते थे. यह कमरा और हॉल के बीच वाला कमरा इस तरह एक-दूसरे के ऐन सामने पड़ते थे.
नाना की मृत्यु बिना चेतावनी के आई. स्नानगृह में स्नान करने गए. वहाँ ठोकर खाई या फिसले, किसी को नहीं मालूम. माँ को केवल उनका धड़ाम से गिरना सुनाई दियाऔर समस्या यह कि स्नानगृह की सिटकनी अंदर से बंद थी. जब तक माँ ने बाबा और रसोइए को जगाकर स्नानगृह का दरवाज़ा खुलवाया, नाना अपना शरीर त्यागचुके थे.
नाना की कुँजी अपने अधिकार में लेने का आग्रह बाबा ने उसी भोर से शुरू कर दिया.
“कुँजी मुझे दो. डॉक्टर इधर बुलवाया है. उसकी फ़ीस देनी होगी.....”
बाबा और माँ बेशक अंधे थे लेकिन दोनों सदैव स्वतःस्फूर्त रहे- शरीरसे भी और चित्त से भी. दोनों के हाथ-पैर पूरी तरह से उनके अधीन रहा करते. बिना कोई सहारा लिए, बिना कभी डगमगाए वे घर-भर में स्वच्छंद घुमते फिरते, उठते-बैठते. चित्त भी दोनों का बराबर- आत्मकेंद्रित और स्वसंगत!
“मैं सब देख लूँगी,” चिंतातुर, शोकाकुल उस अवस्था में भी माँ अपने को सभाले रहीं, “आप अपना देखिए.....”
डॉक्टर के जाते ही माँ ने मुझसे टेलीफ़ोन की अपनी कॉपी मँगवाई और उसमें से एक नंबरखोजकर मुझे टेलीफ़ोनमिलाने को कहा.
नंबर मिलते ही माँ ने मुझसे टेलीफ़ोन पर बृजभान काका को पूछा और बोली, “उन्हें बताइए, मास्टरजी नहीं रहे. वे तत्काल इधर चले आएँ.....”
नीचे वाली हमारी दुकानों में बृजभान काका की दुकान उन दिनों अच्छी पनप रही थी. उनके पास मरफ़ीरेडियो की एजेंसी थी और उनके रेडियो खूब बिकते थे.
बृजभान काका के आते ही माँ ने नाना की सारी ज़िम्मेदारी उन्हें सौंप दी. दाहकर्म की, फूल चुनने की, तेरहवीं के भोज की.
तेरहवीं की रस्म बीतते ही बाबा ने माँ को फिर घेर लिया, “मुझे कुँजी दो. मुझे ठेकेदारको रूपया देना है. नई सीढ़ियाँ बनवानी हैं. सड़क की तरफ़ से. उधर हमारे ग्राहकभटक जाते हैं.....”
“लेकिन सड़क में जगह कहाँ है?” माँ चिल्लाईं. चारों दुकानों के दोनों किनारे घिरे थे.
एक-दूसरे की बात का विरोध माँ और बाबा पहले भी करते रहे थे; माँ उग्र स्वर मेंऔर बाबा दबे स्वर में. किंतुनाना की मृत्यु के बाद बाबा का विरोध कर्णभेदी स्वर में फूटने लगा था, सो वे भी चिल्ला उठे, “बृजभान की दुकान ख़ाली करवाएँगे और उस जगह अपनी सीढ़ी बनवाएँगे.....”
“कभी नहीं,” माँ ने दृढ़ स्वर में कहा, “कभी नहीं. वैसे भी हमारी सीढ़ियाँ अहाते में ठीक हैं. बृजभान काका की दुकान कभी नहीं छेड़ी जाएगी.....”
ऊपर आने के लिए बनी हमारी सीढ़ियाँ अहाते में स्थित थीं. अहाता सड़क की दुकानों के पीछे था; महाकाय एवं कुंडलित. हमारी सीढ़ियों के अतिरिक्त उसमें ऊपरी मंजिल के दूसरे मकानों की सीढ़ियाँ भी रहीं. साथ ही कई बेतरतीब, बे-सिर-पैर, ठसाठस, सटे-सटे मकान.
“वे भी कोई सीढ़ियाँ हैं? पिछले पैरों पर खड़ीं? उन्हें तो हमें बदलना ही बदलना है. बृजभान को यहाँ से हटाना ही हटाना है..... रस्सी-वस्सी सब दूर फेंक देनी है.....”
नाना ने अहाते की उन सीढ़ियों के दरवाज़े पर दुफंदी साँकल लगवा रखी थी जिस पर दोतरफ़ी रस्सी बधी थी. रस्सी के दोनों सिरे ऊपर हमारे आँगन में टगी एक खूँटी पर टिके रहते. दरवाज़ा हमें खोलना होता तो रस्सी का पहला सिरा अपनी तरफ़ खींचलेते, बंद करना होता तो दूसरा.
“सीढ़ियाँ वे ठीक हैं. उन्हें नहीं बदला जाएगा.....” माँकी दृढ़ता दुगुनी हो ली.
“क्या पुरातनपंथी है?” बाबा दुगुने वेग से चिल्लाए, “सीढ़ियाँ वे ठीक नहीं हैं. ख़तरनाक हैं. वाहियात हैं. हमें नई सीढ़ियाँ चाहिए ही चाहिए.....”
“आप कानून नहीं जानते,” माँ ने बाबा को चुनौती दी, “वरना ऐसे नहीं कहते, ऐसे नहीं सोचते. कानून जानते होते तो मालूम रहता, मकान-मालिक की मर्ज़ी के बिना मकान की एक ईंट तक हिलाई नहीं जा सकती.....”
“धर्म कहता है, परिवार का मुखिया पति होता है, मकान का मालिक पति होता है.....” बाबा ने माँ की चुनौती खारिज़ कर दी.
“आप अपना धर्म थामे रखिए,” माँ के पास अपना तर्क था, “मेराकानून मुझे सभाल लेगा.....”
“इतना ऊँचा उछलोगी तो मुँह के बल गिरोगी.....” बाबा के पास धमकी थी.
आगामी दिन भयावह रहे. बाबा ख़ुलेआम शराब पीते और माँ को एलानिया आएँ-बाएँ, बुरा-भला सुनाते. कुँजी को लेकर.
कुँजी


“आप बाबा को कुँजी दे क्यों नहीं देतीं?” एक दिन सूर्य-नमस्कार के समय मेरा धैर्यहार खाने लगा.
“तेरे बाबा को पैसे की बहुत भूख़ है. कुँजी मिलते ही मुझे मार डालेंगे.....”
उस दिन, 29 फरवरी, 1956 की सुबह मुझे धूप ने जगाया था, माँ ने नहीं.
धूप को देखकर मैं चौंका था.....
सूर्य-नमस्कार कैसे चूक गया?
माँ कहाँ थीं?
बाहर लपका तो देखा लहूलुहान अवस्था में माँ आँगन में लेटी थीं और सड़क बुहारने वालीमाँ-बेटी पास बैठी आपस में कानाफूसी कर रही थीं.
“क्या बात है?” मैंने पूछा. हमारे घर के अंदर वे पहली बार आई थीं.
“सुबह सड़क पर झाड़ू लगाने आई तो बिटिया हमें वहाँ गिरी पड़ी मिलीं.....” बेटी की माँ बोली.
मैंने माँ को छुआ.
वे पत्थर थीं!
नाना की तरह लोप हो जाने के लिए?
अनजानी एक शिथिलता मेरे शरीर में उतरने लगी.
माँ की बगल में मैं जा लेटा.
अपनी आँखें मूँदकर.
उनके संग लोप हो जाने के लिए.....
“उठिए भैया जी, उठिए वहाँ से,” दोनों माँ-बेटी अपनी जगह से मुझे दुलराई. मुझे छूने का साहस उनमें न था. छुआछूत का अनुपालन कर रही थीं वे.
“क्या बात है?” बाबा की आवाज़ आँगन में उतरी.
“भैया जी बिटिया के पास आ लेटे हैं..... वहाँसे उठ नहीं रहे.....”
“गिरधर गोपाल!” बाबा ने मुझे पुकारा.
मैंने आँखें नहीं खोलीं.
“उठो, गिरधर गोपाल, इधर आओ,” बाबा के स्वर में क्रोध छलका.
“भैया जी को डािए नहीं, बाबूजी,” बेटीकी माँ ने कहा, “वे सदमे में हैं, गहरे सदमे में.....”
“औरअभीकच्ची उम्र है,” बेटी बोली, “नासमझ हैं, कुछ नहीं जानते.....”
“तुममाँ-बेटीयहाँ किस वास्ते रुकी हो?” बाबाने उन्हें डा, “बख्शीश के वास्ते?”
“हम छोटी जात की हैंगी,” बेटीकी माँ नेकहा, “मगर समझ तुमसे बड़ी रखती हैं. मौतकी मर्यादा बख्शीशसेऊपरहै.....”
“हम जा रही हैं,” बेटी ने कहा.
बाबा के हाथ मेरे कन्धों और एड़ियोंसे आ चिपके.
मैंने प्रतिवाद नकिया. मुझसे करते न बना.
अपनी बाँहों में भरकर वे मुझे नानाके कमरे में ले आए.
नानाकेपलंगपर.
मैं वहीं धँस गया.
जभी मुझे नाना की अलमारी के खुलने की आवाज़ आई.
मेरी आँखें भी खुललींऔरबाबा के कुर्ते की ऊपरी जेब पर जम गईं.
जेब से उस रुमाल का सिरा बाहर झाँक रहा था, जिसके एक कोने में माँ इस अलमारी की कुँजी बाँधे रखती थीं. 

दीपक शर्मा 

                     

लेखिका -दीपक शर्मा


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श्रीकृष्ण वंदना

जन्माष्टमी प्रभु श्रीकृष्ण के धरती पर अवतरण का दिन है | दुनिया भर में भक्तों द्वारा यह पर्व हर्षौल्लास के साथ मनाया जाता है | भक्ति प्रेम की उच्चतम अभिव्यक्ति है | भक्ति भावना में निमग्न व्यक्ति सबसे पहले ईश के चरणों की वंदना करता है ...

श्रीकृष्ण वंदना 


अंतर में बैठे हो प्रभुवर ,
इतनी करुणा  करते रहिये |
मम जीवन रथ की बागडोर ,
कर कमलों में थामें रहिये ||


 उच्श्रिंखल इन्द्रिय घोड़े हैं ,
निज लक्ष्य का बोध न रखते हैं 
ठुकरा मेरे निर्देशों को ,
भव पथ पर सदा भटकते हैं ||


अति बलि निरंकुश चंचल मन ,
प्रिय मेरे वश नहीं होता है |
ये मस्त गेंद की भांति प्रभु ,
दिन रात्रि दौड़ता रहता है ||

चंचल मरकट  की भांति जभी 
ये स्वप्न जगत में जाता है |
तब कुशल नटी की भांति वहाँ,
अद्भुत क्रीडा दिखलाता है ||


निज जान अकिंचन दासी को ,
चरणों में नाथ लगा लीजे ,
गोविन्द वारि करुणा  की बन 
अब सतत वृष्टि मुझ पर कीजे ||


मेरे जीवन कुरुक्षेत्र में आ ,
गीता का ज्ञान उर में भरिये ,
प्रिय सारथि अब जीवन रथ को , 
आध्यात्म मार्ग पर ले चलिए ||


  उर  के विकार कौरव दल का ,
प्रिय सारथि अब विनाश करिए |
सद्वृति रूपी पांडव की ,
अविलम्ब प्रभु रक्षा करिए ||

मन से वाणी से काया  से ,
जीवन भर जो भी कर्म करूँ 
हे जगन्नाथ करुना सागर |
वे सभी समर्पित तुम्हें करूँ ||

ये 'राष्ट्रदेवी 'अल्पज्ञ प्रभु 
स्वीकार उसे करते रहिये 
शुभ कर्मों का आचरण करूँ  |
अवलंबन प्रिय देते रहिये ||

कृष्णी राष्ट्र देवी त्रिपाठी (श्रीमती एम डी त्रिपाठी,)
(संक्षिप्त गीतामृतं से )

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जन्माष्टमी पर सात काव्य पुष्प



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अन्त: के स्वर - दोहों का सुंदर संकलन


सतसैयां के दोहरे, ज्यूँ नाविक के तीर |
देखन में छोटे लगे, घाव करें गंभीर ||

                                 
वैसे ये दोहा बिहारी के दोहों की ख़ूबसूरती के विषय में लिखा गया है पर अगर हम छन्द की इस विधा पर बात करें जिसके के अंतर्गत दोहे आते हैं तो भी यही बात सिद्ध होती है | दोहा वो तीक्ष्ण अभिव्यन्जनायें हैं जो सूक्ष्म आकर में होते हुए भी पाठक के अन्त:स्थल व् एक भाव चित्र अंकित कर देती हैं | अगर परिभाषा के रूप में प्रस्तुत करना हो तो, दोहा, छन्द की वो विधा है जिसमें चार पंक्तियों में बड़ी-से बड़ी बात कह दी जाती है | और ये (इसकी  चार पंक्तियों में 13, 11, 13, 11 मात्राएँ  के साथ ) इस तरह से कही जाती है कि पाठक आश्चर्यचकित हो जाता है | हमारा प्राचीन कवित्त ज्यादातर छन्द बद्ध रचनाएँ हीं  हैं | दोहा गागर में सागर वाली विधा है पर मात्राओं के बंधन के साथ इसे कहना इतना आसान नहीं है | शायद यही वजह है कि मुक्त छन्द कविता का जन्म हुआ | तर्क  भी यही था कि सामजिक परिवर्तनों की बड़ी व् दुरूह बातों को छन्द में कहने में कठिनाई थी | सार्थक मुक्त छन्द कविता का सृजन भी आसान नहीं है | परन्तु छन्द के बंधन टूटते ही कवियों की जैसे बाढ़ सी आ गयी | जिसको जहाँ से मन आया पंक्ति को तोड़ा-मरोड़ा और अपने हिसाब से प्रस्तुत कर दिया | हजारों कवियों के बीच में अच्छा लिखने वाले कवि कुछ ही रह गए | तब कविता का पुराना पाठक निराश हुआ | उसे लगा शायद छन्द की प्राचीन  विधा का लोप हो जाएगा | ऐसे समय में कुछ कवि इस विधा के संरक्षण में आगे आते रहे, जो हमारे साहित्य की इस धरोहर को सँभालते रहे | उन्हीं में से एक नाम है किरण सिंह जी का | किरण सिंह जी छन्द बद्ध रचनाओं में न सिर्फ दोहा बल्कि मुक्तक,रोला और कुंडलियों की भी रचना की है |


लेखिका -किरण सिंह


अन्त :के स्वर - दोहों का सुंदर संकलन 


“अन्त: के स्वर” जैसा की नाम सही सपष्ट है कि इसमें किरण जी ने अपने मन की भावनाओं का प्रस्तुतीकरण किया है | अपनी बात में वो कहती हैं कि, “हर पिता तो अपनी संतानों के लिए अपनी सम्पत्ति छोड़ कर जाते हैं, लेकिन माँ ...? मेरे पास है ही क्या ...? तभी अन्त : से आवाज़ आई कि दे दो अपने विचारों और भावनाओं की पोटली पुस्तक में संर्हीत करके , कभी तो उलट –पुलट कर देखेगी ही तुम्हारी अगली पीढ़ी |" और इस तरह से इस पुस्तक ने आकर लिया | और कहते है ना कि कोई रचना चाहे जितनी भी निजी हो ...समाज में आते ही वो सबकी सम्पत्ति हो जाती है | जैसे की अन्त: के स्वर आज साहित्य की सम्पत्ति है | जिसमें हर पाठक को ऐसा बहुत कुछ मिलेगा जिसे वो सहेज कर रखना चाहेगा |

भले ही एक माँ संकल्प ले ले | फिर भी कुछ लिखना आसान नहीं होता | इसमें शब्द की साधना करनी पड़ती है | कहते हैं कि शब्द ब्रह्म होते हैं | लेखक को ईश्वर ने अतरिक्त शब्द क्षमता दी होती है | उसका शब्दकोष सामान्य व्यक्ति के शब्दकोष से ज्यादा गहन और ज्यादा विशद  होता है | कवित्त का सौन्दर्य ही शब्द और भावों का अनुपम सामंजस्य है | न अकेले शब्द कुछ कर पाते हैं और ना ही भाव | जैसे प्राण और शरीर | इसीलिए किरण जी एक सुलझी हुई कवियित्री  की तरह कागज़ की नाव पर भावों की पतवार बना कर शब्दों को ले चलती हैं ...

कश्ती कागज़ की बनी, भावों की पतवार |
शब्दों को ले मैं चली , बनकर कविताकार ||

अन्त: के स्वर  का प्रथम प्रणाम


जिस तरह से कोई व्यक्ति किसी शुभ काम में सबसे पहले अपने  ईश्वर को याद करता है , उनकी वंदना करता है | उसी तरह से किरण जी ने भी अपनी आस्तिकता का परिचय देते हुए पुस्तक के आरंभ में अपने हृदय पुष्प अपने ईश्वर के श्री चरणों में अर्पित किये हैं | खास बात ये है कि उन्होंने ईश्वर  से भी पहले अपने जनक-जननी को प्रणाम किया है | और क्यों ना हो ईश्वर ने हमें इस सुंदर  सृष्टि में भेजा है परन्तु माता –पिता ने ही इस लायक बनाया है कि हम जीवन में कुछ कर सकें | कहा भी गया है कि इश्वर नेत्र प्रदान करता है और अभिवावक दृष्टि | माता–पिता को नाम करने के  बाद ही वो प्रथम पूज्य गणपति को प्रणाम करती है फिर शिव को, माता पार्वती, सरस्वती आदि भगवानों के चरणों का भाव प्रच्छालन करती हैं | पेज एक से लेकर 11 तक दोहे पाठक को भक्तिरस में निमग्न कर देंगे |

संस्कार जिसने दिया, जिनसे मेरा नाम |
हे जननी हे तात श्री, तुमको मेरा प्रणाम ||
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..
अक्षत रोली डूब लो , पान पुष्प सिंदूर |
पहले पूज गणेश को,  होगी विपदा दूर ||
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शिव की कर अराधना, संकट मिटे अनेक |
सोमवार है श्रावणी , चलो करें अभिषेक ||

अन्त: के स्वर का आध्यात्म



                    
केवल कामना भक्ति नहीं है | भीख तो भिखारी भी मांग लेता है | पूजा का उद्देश्य उस परम तत्व के साथ एकीकर हो जाना होता है | महादेवी वर्मा कहती हैं कि,  

“चिर सजग आँखें उनींदी, आज कैसा व्यस्त बाना,
जाग तुझको दूर जाना |”

 मन के दर्पण पर परम का प्रतिबिम्ब  अंकित हो जाना ही भक्ति है | भक्ति है जो इंसान को समदृष्टि दे | सबमें मैं और मुझमें सब का भाव प्रदीप्त कर दे | जिसने आत्मसाक्षात्कार कर लिए वह दुनियावी प्रपंचों से स्वयं ही ऊपर उठ जाता है | यहीं से आध्यात्म का उदय होता है | जिससे सारे भ्रम  दूर हो जाते हैं | सारे बंधन टूट जाते हैं | किरण जी गा उठती हैं ...

सुख की नहीं कामना, नहीं राग , भय क्रोध |
समझो उसको हो गया , आत्म तत्व का बोध ||
............................

अंतर्मन की ज्योति से, करवाते पहचान |
ब्रह्म रूप गुरु हैं मनुज, चलो करें हम ध्यान ||


अन्त : के स्वर  में नारी


 कोई स्त्री स्त्री के बारे में ना लिखे ... असंभव |  पूरा संसार स्त्री के अंदर निहित है |जब एक स्त्री स्त्री भावों को प्रकट करने के लिए कलम का अवलंबन लेती है तो उसमें सत्यता अपने अधिकतम प्रतिशत में परिलक्षित होती है | अन्त : के स्वर का नारी की विभिन्न मन : स्थितियों के ऊपर लिखे हुए दोहों वाला  हिस्सा बहुत ही सुंदर है | एक स्त्री होने के नाते यह दावे के साथ कह सकती हूँ कि ये हर स्त्री के मन को स्पर्श करेगा | इसमें चूड़ी हैं, कंगना है, महावर है और है एक माँ की पत्नी की बेटी की स्त्री सुलभ भावनाएं जो मन के तपती रेत पर किसी लहर सम आकर नमी सृजित कर देती हैं |

जीवन हो सुर से सजा , बजे रागिनी राग |
ईश हमें वरदान दो , रहे अखंड सुहाग ||
......................

लिया तुम्हें जब गोद में , हुआ मुझे तब बोध |
सर्वोत्तम वात्सल्य है, सुखद सृष्टि का शोध ||
.........................

करती हूँ तुमसे सजन, हद से अधिक सनेह
इसीलिये शायद मुझे , रहता है संदेह ||
.......................

मचल-मचल कर भावना, छलक –छलक कर प्रीत |
करवाती मुझसे सृजन , बन जाता है गीत ||

अन्त: के स्वर में नीति


               मनुष्य  को मनुष्य बनाता है सदाचार | मनुष्यत्व का आधार ही सदाचार है |  दोहों में नीति या जीवन से सम्बंधित सूक्तियाँ ना हों तो उनका आनंद ही नहीं आता | कबीर , तुलसी रहीम ने नीति वाले दोहे आज भी हम बातों बातों में एक दूसरे से कहते रहते हैं |रहीम दास जी का ये दोहा देखिये ...

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग |
चन्दन विष व्याप्त नहीं, लिपटे राहत भुजंग ||


बिहारी यूँ तो श्रृंगार के दोहों के लिए अधिक प्रसिद्द हैं पर  आम प्रचलन में उनके नीति के ही दोहे हैं | ‘अन्त : के स्वर में भी किरण जी ने कई नीति के दोहे सम्मिलित किये हैं | हर दोहा अपने साहित्यिक सौन्दर्य के साथ एक शिक्षा दे जाता है |

अपनों से मत कर किरण, बिना बात तकरार |
जो हों जैसे रूप में , कर लेना स्वीकार ||
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कर यकीन खुद पर किरण , खिलना ही है रूप |
मूर्ख मेघ कब तक भला, रोक सकेगा धूप ||
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सुख में रहना संयमित, दुःख में धरना धीर |
संग समय के आ पुन :, हर लेगा सुख पीर ||

अन्त: के स्वर में प्रेम


 प्रेम मानव मन की सबसे कोमल भावना है | प्रेम के बिना तो  जीवन ही पूरा नहीं होता तो  कोई पुस्तक पूरी हो सकती  है भला ? किरण सिंह जी ने भी प्रेम के दोनों रंगों संयोग और वियोग के दोहे इस पुस्तक में लिखें हैं | प्रेम केवल दैहिक नहीं होता यह मन व आत्मा से भी होता है | अक्सर देह के अनुराग को ही  प्रेम समझ बैठते हैं पर देह तो प्रेम की तरफ बढ़ाया पहला कदम मात्र है | प्रेम की असली अभिव्यंजना इसके बाद ही पल्लवित –पुष्पित होती है जहाँ से यह मन और आत्मा के स्तर पर अवतरित होता है | प्रेम पर अपनी कलम चलाने से पूर्व ही वो प्रेम का परिचय देती हैं |


प्रेम नहीं है वासना, प्रेम नहीं है पाप |

प्रेम पाक है भावना, नहीं प्रेम अभिशाप ||

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प्रेम नहीं है भावना, प्रेम नहीं है भीख |

प्रेम परम आनंद है, प्रेम प्रेम से सीख ||

अन्त: के स्वर :राजनीति


                 
वो कवि ही क्या जिसकी कलम देश की स्थिति और समकालीन समस्याओं पर ना चले |  आज की राजनीति दूषित हो चुकी है चुनाव के समय तो नेता वोट माँगने के लिए द्वार –द्वार जाते हैं | याचना करते हैं पर चुनाव जीतते ही उनके दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं | इस भौतिकतावादी युग में नेता सबसे ज्यादा भ्रष्ट हैं ये कहना अतिश्योक्ति ना होगी | पीड़ित, शोषित , दुखी व्यक्ति कराहते रह जाते हैं और सत्ता जन प्रतिनिधियों की मुट्ठी गर्म करती रहती है | ये बात कवियित्री को  मर्मान्तक  पीड़ा से भर देती है |

जनता के दुःख दर्द से, जो रहते अनभिज्ञ |
उसको ही कहते यहाँ , किरण राजनीतिज्ञ ||

.........................

घूम रहे बेख़ौफ़ हो, करके कातिक खून |
कैसे होगा न्याय जब , अँधा है क़ानून ||




अन्त :के स्वर में स्त्री विमर्श


                 
आज कल साहित्य में स्त्री विमर्श की बाढ़ आई हुई है | जिसे पुरुष बड़ी संदिग्ध दृष्टि से देखते हैं | उसे लगता है कि उसके अधिकार क्षेत्र में महिलाओं की दखलंदाजी हो रही है | वो अभी भी अपने उसी नशे के मद में रहना चाहता है | स्त्री विमर्श सत्ता की नहीं समानता की बात करता है | यूँ तो स्त्री विमर्श हर काल में स्थित था परन्तु महादेवी वर्मा ने इसकी वकालत करते हुए कहा कि स्त्री विमर्श तभी सार्थक है जब स्त्री शिक्षित हो और अर्थ अर्जन कर रही हो | वर्ना ये सिर्फ शाब्दिक प्रलाप ही होगा | मैत्रेयी पुष्पा , प्रभा  खेतान, सुधा अरोड़ा, चित्रा मुद्गल आदि स्त्री विमर्श की अग्रणीय लेखिकाएं रही है | इससे पितृसत्ता की जंजीरे कुछ ढीली तो हुई है पर टूटी नहीं है | आगे की कमान समकालीन  लेखिकओं को संभालनी है | किरण जी ये दायित्व पूरी जिम्मेदारी के साथ उठाते हुए कहती हैं कि ...

अपनी कन्या का स्वयं, किया अगर जो दान |
फिर सोचो कैसे भला , होगा उसका मान ||
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करके कन्यादान खुद, छीन लिया अधिकार |
इसीलिये हम बेटियाँ , जलती बारम्बार ||
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जो दहेज़ तुमने लिया, सोचो करो विचार |
बीके हुए सुत रत पर , क्या होगा अधिकार ||

अन्त: के स्वर में प्रकृति


              
प्रकृति मनुष्य की सहचरी है | ये लताएं ये प्रसून , ये हवाएं, नदी झरने , वन, विविध जलचर वनचर | ईश्वर भी क्या खूब चितेरा है उसने अपनी तूलिका से प्रथ्वी पर अद्भुत रंगों की छटा बिखेर दी है| प्रकृति को देखकर ना जाने कितनी बार प्रश्न कौंधता है, “वो चित्रकार है ?” श्री राम चरित मानस  के किसकिन्धा कांड में जब प्रभु श्री राम अपने लघु भ्राता लक्ष्मण के साथ पूरा एक वर्ष सुग्रीव द्वारा माता सीता की खोज का आदेश देने की प्रतीक्षा में बिताते हैं तो तुलसी दास जी ने बड़ी ही सुंदर तरीके से सभी ऋतुओं का वर्णन किया | उन्होंने हर ऋतु  के माध्यम से शिक्षा दी है |

रस-रस सूख सरित सर पानी ,
ममता त्याग करहिं जिमी ज्ञानी ||

दादुर ध्वनि चहुँ दिशा सुहाई |
वेड पढई जनु वटू समुदाई ||

कवियित्री  के मन को भी प्रकृति विह्वल करती है | यहाँ पर किरण जी ने हर ऋतु की सुन्दरता को अपने शब्दों में बाँधने का प्रयास किया है |

पिघल गया नभ का हृदय, बरसाए है प्यार |
धरती मैया भीगती,  रिमझिम पड़े फुहार ||
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हरियाली ललचा रही , पुरवा बहकी जाय |
हरी धरा की चुनरी , लहर –लहर बलखाय ||

अंत में ...


       कवियित्री ने इस छोटी सी पुस्तक के माध्यम से अपनी भावनाओं का दीप जलाया है | जिसकी लौ उनके अनुभवों से प्रदीप्त हो रही है | उन्होंने प्रकृति , नारी , स्त्री विमर्श , आध्यात्म  , भक्ति , पर्यावरण  ,साहित्य व् समकालें राजनैतिक दशा हर तरह के अँधेरे को अपनी परिधि में लिया है | खास बात ये हैं कि पुस्तक के सभी दोहों में लयात्मकता व् गेयता है | हिंदी साहित्य की इस विधा को जीवित रखने का उनका अप्रतिम योगदान है | 111 पृष्ठ वाली इस पुस्तक का कवर पृष्ठ आकर्षक है |



*अगर आप भी दोहे की विधा में रूचि रखते हैं तो ये पुस्तक आपके लिए एक अच्छा विकल्प है |

अन्त: के स्वर –दोहा संग्रह
लेखिका –किरण सिंह
प्रकाशक जानकी प्रकाशन
पृष्ठ – 111
मूल्य – 300 रुपये


 वंदना बाजपेयी  
            

लेखिका -वंदना बाजपेयी





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अक्टूबर जंक्शन -जिन्दगी के फलसफे की व्याख्या करती प्रेम कहानी



वास्तवमें प्रेम क्या है ? इसकी कोई परिभाषा नहीं है और हम सब इसे अपनी -अपने तरह से परिभाषित करने का प्रयास करते हैं | ऐसा ही एक प्रयास दिव्य प्रकाश दुबे जी ने उपन्यास अक्टूबर जंक्शन में भी किया है | ये किताब 2017 से दैनिक जागरण की बेस्ट सेलर में शामिल है | इसका कारण है  कि ये सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं है | इसमें प्रेम कथा के साथ -साथ जीवन का फलसफा व् बहुत  सारा दर्शन भी है |


अक्टूबर जंक्शन -जिन्दगी के फलसफे की व्याख्या करती प्रेम कहानी


दिव्य प्रकाश दुबे -लेखक अक्टूबर जंक्शन



                                    "हमारी दो जिंदगियां होती हैं | एक वो जो हम जीते हैं और दूसरी वो जो हम जीना चाहते हैं | ये कहानी उसी दूसरी जिन्दगी की कहानी है |"

                                   ' अक्टूबर जंक्शन 'एक ऐसा उपन्यास है जो सुदीप यादव और चित्रा  पाठक की अनोखी प्रेम कहानी के साथ रिश्तों को, जिन्दगी के फलसफे को और  सच व स्वप्न के बीच  की    खाली जगह  समझने और उसकी व्याख्या करने की भी कोशिश करता  है | ये एक ऐसी  प्रेम कहानी   है  जिसमें एक 'सैड ट्यून' लगातार पीछे बजती रहती है | कहानी के तेज प्रवाह   के साथ आगे बढ़ते हुए भी ऐसा लगता है पीछे कुछ छूटा जा रहा है जिसे थामना है, पकड़ कर रखना है ..पर ये संभव नहीं पाता , ना कहानी में ना प्रेम में और ना ही जीवन में |

कहानी के नायक सुदीप और चित्रा की पहली मुलाक़ात बनारस के अस्सी घाट पर होती है | बनारस , एक ऐसा शहर जो सच और सपने के बीच में बसता है | कोई यहाँ सच ढूँढने आता है तो कोई सपना भूलने | सुदीप और चित्रा भी यहाँ कुछ ऐसी ही वजह से आये हैं |

सुदीप यादव 


 सुदीप यादव केवल बारहवीं पास है | उसने आगे पढाई नहीं की लेकिन लक्ष्मी उसकी उँगलियों पर खेलती है | वो  बहुत ही कम उम्र करोणपति बन गया था  | आज 'बुक माय ट्रिप' कंपनी का मालिक है | पेज थ्री सेलेब्रेटी है | उसके हजारों -लाखों फोलोअर्स हैं | आये दिन अखबार में उसकी खबरें छपती रहती हैं | लेकिन आज वो बनारस आया है  ताकि शांत दिमाग से अपनी जिन्दगी का एक महत्वपूर्ण फैसला ले सके | ये फैसला है अपनी कम्पनी के कुछ शेयर बेंचने का | इस पैसे से वो अपनी कम्पनी को और ऊँचाइयों पर ले जा सकेगा परन्तु उसका मालिकाना ह्क थोडा घटेगा | अपने सपने को किसी दूसरे के हाथों सौंप देना एक कठिन निर्णय है | एक तरफ जहाँ वो असमंजस में है वहीँ काम का अतरिक्त दवाब उसके जीवन में उसके खुद के लिए जीने वाले समय को चुरा रहा है | सपने के साथ आगे और आगे भागते हुए भी उसे विरक्ति हो रही है | वो हर जगह पहचान लिए जाने से ऊब चुका है | क्या यही जीवन है ? क्या बस यही उसका सपना था ? वो अभी 25 साल का है | पर वो 35 में रिटायरमेंट लेना चाहता है |  दौड़ -भाग से थककर सुस्ताना चाहता है | अपनी जिन्दगी थोड़ा अपने लिए बिताना चाहता है |


चित्रा पाठक 



 चित्रा पाठक  एक लेखिका है | उम्र २६ -२७ वर्ष , दो वर्ष पूर्व उसका तलाक हो गया था | वो उपन्यास लिख रही है | उसका सपना है इस उपन्यास  को लिखकर नाम , शोहरत और बहुत से पैसे कमाना | वो पेज थ्री सेलेब्रिटी बनना चाहती है | वो इतना ऊँचा उठना चाहती है कि कोई उसे इग्नोर ना कर सके | कभी कहानी साथ छोड़ देती है तो कभी पात्र मुकर जाते हैं | उसे लगता है कि वो शायद इसे पूरा नहीं कर पाएगी | एक अजीब सी निराशा उसे घेरे हुए है | उसकी आँखों में सपने हैं आशाएं और निराशाएं हैं |


एक का सपना उसके गले का फंदा सा बना उसे खींच रहा है और दूसरी पसीने से लथपथ होते हुए भी अपने सपने की डोर छोड़ना  नहीं चाहती | विरोधाभास ही तो है कि सुदीप को आसमान से जमीन बेहद सुकून भरी दिखाई देती है तो चित्रा को जमीन से आसमान बेहद उम्मीदों भरा | 



ये प्रेम कथा है या नहीं 



पर ये कहानी अपोजिट अट्रैकट्स की भी नहीं है और ना पहली नज़र का प्यार है | खास बात ये है कि अलग अलग स्थिति में होते हुए भी दोनों एक दूसरे की तकलीफ को समझ पाते हैं, ढांढस बंधाते हैं हिम्मत देते हैं | दोनों को बस एक दूसरे का साथ अच्छा  लगता है ...और लगता है कि यही वो जगह है जहाँ वो अपने मन को खाली कर सकते हैं | अपने मन के टनों बोझ का खाली हो जाना एक ऐसा अनुभव है जिसे वो दोहराना तो चाहते हैं पर उस स्पेस को भी बनाये रखना चाहते हैं ताकि ये सुकून का अहसास हमेशा बना रहे | इसलिए पहली बार दस अक्टूबर  2010  (10-10-10) को मिलने के बाद वो अगली बार दस अक्टूबर  2011 को मिलने का वादा कर अपने अपने रास्ते अपनी -अपनी जिंदगियों में डूब जाते हैं | ये वाद महज जुबानी नहीं है इसके लिए हर बार वो जापानी लेखक मुरकामी की किताब पर अगली तारीख लिखते हैं |  इस दौरान  वो एक दूसरे को कॉल भी नहीं करते |  लेकिन अगली दस को वो फिर मिलते हैं , फिर अगली 10 को | 2010 से 2020 के दरमियान हर 10 अक्टूबर को मिलकर वो महज 20 दिन ही साथ रहते हैं | पर ये छोटा सा साथ उनके 364 दिनों के लिए एक टॉनिक की तरह काम करता है | वो समझते हैं इस ३६४ दिन के इंतज़ार और मिलन की अहमियत ...इसलिए हर बार मिलते हैं और हर बार मिलने का वादा करते हैं |

  ये किरदार सच और सपने के बीच की छोटी सी खाली जगह में मिले थे | बंद मुट्ठी से खुली मुट्ठी भर ही हम जिन्दगी को छू पाते हैं | बस इतना ही लेखक उस कहानी को छू पाता  है जिसे कागज़ पर उतारने के लिए वो सालों बेचैन रहता है -दिव्य प्रकाश दुबे 

आज माना  जाता है कि प्यार को बने रहने के लिए स्पेस जरूरी है पर क्या इतनी ज्यादा ? दोनों की  देह की जरूरतों को पूरा करने के लिए उनके पास अपने अपने साथी भी हैं | फिर भी दोनों के बीच में प्यार है | सुनने में अटपटा लगता है लेकिन कहानी की लय  के साथ ये गंगा की तरह बहता है | प्रेम में शरीर  के ऊपर मन , मन के ऊपर आत्मा | प्यार की लौकिक परिभाषा इन तीन स्तरों के बीच ही उलझी रह जाती है | इस लिए बहुत समय तक पाठक को भी अहसास नहीं होता कि क्या उनके बीच में प्यार है या सिर्फ आत्मीयता | धीरे -धीरे परदे खुलते हैं न सिर्फ पाठक के मन से बल्कि सुदीप और चित्रा के मन से भी | फिर भी ये प्यार , प्रेम  की मानक परिभाषाओं में फिट नहीं होता | इसे समझने के लिए जो दिव्य दृष्टि चाहिए उसको पाठक को प्रदान करने के लिए दिव्य प्रकाश दुबे जी ने दर्शन यानि की फिलोसफी का बेहद खूबसूरत प्रयोग किया है , जो ठहर कर पढने को विवश करता है और कई बार पलट कर भी | इससे पाठक की प्रेम और रिश्तों के प्रति मन की कई ग्रंथियां भी खुलती हैं |

"If  we are not together for real reasons like kids , security and emotional support . Then we should be together  for unreal reasons like happiness , good company and comfort" ...रसल क्रो 


सब ठाट धरा रह जाएगा ...जब लाद चलेगा बंजारा 


                                                       जैसा की मैंने पहले भी बताया था कि इस कहानी में  जीवन दर्शन समाया हुआ है और वो इस कदर खूबसूरती से आया है कि आप उसके मुरीद हो जायेंगे | ऐसा ही एक दर्शन गंगा नदी के साथ है ...

" बहते हुए पानी को  थोड़ी देर तक  लगातार देखो तो वो रुका हुआ लगने लगता है और पलक झपकते ही फिर चल पड़ता है | यही तो जीवन है | सतत जीवन |"


गंगा जीवन का  बहता हुआ दर्शन है और इस कहानी में  जीवन दर्शन की व्याख्या करने में गंगा का दो बार इस्तेमाल हुआ है | दोनों बार नाव में | जब उनकी नाव में सुदीप और चित्रा के साथ एक फ़कीर बाबा कबीर भी बैठा हुआ है | कबीर और फ़कीर की संस्कृति अभी भी बनारस के घाटों में जिन्दा है | कबीर नाव में यही गीत गाता है , "सब ठाट पड़ा रह जाएगा जब लाद चलेगा बंजारा "| सुदीप गीत के बोलों में गहनता से उतर जाता है |  सुदीप के सवालों पर बाबा के उत्तर का  एक दृश्य देखिये ...

" बाबा ने बस मुट्ठी भर रेत उठाकर हवा में छोड़ दी | रेत कुछ देर तक उडती हुई नीचे जाकर रेत में मिल गयी | रेत को देखकर ये पहचानना मुश्किल था कि कौन सी  रेत हवा से उड़कर रेत में मिली थी | ऐसे ही हर आदमी एक दिन रेत बन जाएगा | रेत जिसमें बैठकर लोग जिन्दगी के बारे में बात करेंगे | "


दूसरी बार जब बाबा के कहने पर वो तीनो मणिकर्णिका घाट की तरफ नाव से सैर को जाते हैं | बनारास का मणिकर्णिका घाट जहाँ मुर्दे जलाए जाते हैं | विदेशी सैलानी जिसे देखने भी आते हैं | वहाँ का  गाइड अपनी टूटी फूटी इंग्लिश में समझा रहा था ...

" In india this is not end of life , it is part of life ."

"अंतिम संस्कार की प्रक्रिया इतनी थकाने वाली होती है कि ज्यादातर लोगों के आँसू भी थककर  सूख जाते हैं | एक के बाद एक लाशें लाइ जा रहीं थी | सामने दीवार पर लिखा था -
" माया मरी ना मन मरा, मर -मर गए शरीर -कबीर दास  "


जहाँ प्रारंभ वहीँ अंत 


                               कहानी शुरू होती है सुविख्यात लेखिका चित्रा  पाठक के एक  कार्यक्रम से | चित्रा पाठक देश  की जानी मानी लेखिका बन चुकी हैं | उनकी किताबें लाखों में बिकती हैं और वो हर हफ्ते  कई अखबारों में कॉलम लिखती है | उसके पास नाम है शोहरत है पैसा है | चित्रा तमाम लिट् फेस्ट, समारोहों , मीडिया के कार्यकर्मों में शिरकत करती है | क्या वो अब खुश है ?  यानि वो सब जो उसे चाहिए था आज उसके पास है | एक खास बात का जिक्र करना चाहूँगी  कि   चित्रा  की  किताबें बिक रही हैं पर उसके साथ ही सुरभि पराशर की किताबें भी उतना ही बिक रहीं है | सुरभि पराशर जिसको कभी किसी ने नहीं देखा | जिसके बारे में कोई नहीं जानता पर उसकी किताबें भी बिक रहीं हैं|  बिना प्रचार के सुरभि की किताबें बिक रहीं हैं | कौन है ये सुरभि पराशर | इसके बाद कहानी फ्लैश बैक में चलती है | अंत में वहीँ पर आ कर कई राजों से पर्दा उठाती है | और कई बातों पर पर्दा पड़ा ही रहने देना चाहती है | जैसे की कहानी का अंत जिसे लेखक ने पाठक के ऊपर छोड़ दिया है | कहानी  हमेशा निश्चित अंत लिए हुए हो ये जरूरी नहीं है | जीवन में कुछ भी हो सकता है | हर कहानी में कई अंत लेने की सम्भावना होती है तो ये बोझ लेखक ही क्यों उठाये ?

उपन्यास की  कुछ खास बातें


                           उपन्यास की खास बात ये है कि इसमें चित्रा  व् सुदीप अलग -अलग जगहों पर मिलते हैं और लेखक ने हर जगह से पाठकों का परिचय करने की कोशिश की है | बनारस तो जैसे लेखक की आत्मा में बसा है और वो वैसे का वैसा ही पाठक की आत्मा में उतर जाता है |  चित्रा के द्वारा लेखन के क्षेत्र में हुए शोषण को दिखाया गया है | चित्रा के पास पैसे की कमी है | इसलिए वो पहले घोस्ट राइटिंग करती है | ऐसा वो एक प्रसिद्द  लेखिका के लिए करती है | उस के के द्वारा लिखा उपन्यास पसंद किया जा रहा है, पर उस पर उसका कहीं नाम नहीं है |  और इसी वजह से प्रकाशक उसका खुद के अपने नाम से लिखे उपन्यास की डेट आगे बढ़ाता जा रहा है | लेखन के क्षेत्र की चमक -दमक के पीछे का ये काला सच भयभीत करता है | पैसे के लिए प्रतिभाशाली लोगों का शोषण दुखी करता है |  सुदीप की जिन्दगी अपने आप में एक दर्शन है | ये बिजनेस  वर्ल्ड की उठापटक , पल में ऊपर पल में नीचे का बारीकी से ज्ञान कराता है | बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स मिल कर किस तरह से सुदीप को उसकी अपनी ही कम्पनी से निकाल देते हैं ये तथकथित  बिजनेस वर्ल्ड में व्याप्त स्ट्रेस, असुरक्षा की भावना और चालाकियों से रूबरू कराता है | यहाँ कोई किसी का नहीं होता न दोस्त न प्रेमिका |


क्यों पढ़ें क्यों ना पढ़ें अक्टूबर जंक्शन 


                            अगर आप दर्शन के शौक़ीन हैं तो इस कहानी में जीवन दर्शन छिपा हुआ है | थोड़ी -थोड़ी देर में ऐसी लाइन्स  हैं कि आप उसमें डूब जाते हैं | कई बार इतना डूब जाते हैं कि चिंतन प्रक्रिया शुरू हो जाती है | और आप उसी पन्ने पर अटके रहते हैं | जिन्हें दर्शन में आनंद आता है | उनके लिए ये एक सुखद अनुभव है | भाषा , प्रवाह और बांधे रखने की क्षमता के कारण ये एक अच्छा उपन्यास है |  और शायद इसी लिए बहुत लोकप्रिय भी है |



"जिन्दगी में न जिए हुए दिनों का कोटा बढ़ता जाता है | हर बीता हुआ दिन अपने ना जिए जाने का हिसाब माँगता है | "

अगर आप इसमें सिर्फ रोमांटिक एंगल से एक प्रेम  कहानी ढूढ़ रहे हैं तो आपके निराश होने की पूरी सम्भावना है | क्योकि  यहाँ प्रेम का जो दार्शनिक अंदाज है उसे सब पसंद ही करें ये जरूरी नहीं |



अक्टूबर जंक्शन -उपन्यास
लेखक -दिव्य प्रकाश दुबे
प्रकाशक -हिंदी युग्म
पृष्ठ -150
मूल्य - 125 रुपये

अमेजॉन से खरीदें -अक्टूबर जंक्शन  

वंदना बाजपेयी 
वंदना बाजपेयी


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