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विटामिन जिन्दगी- नज़रिए को बदलने वाली एक अनमोल किताब



इस सदन में मैं अकेला ही दिया हूँ, मत बुझाओ !
जब मिलेगी, रोशिनी  मुझसे मिलेगी
पाँव तो मेरे थकन ने छील डाले
अब विचारों के सहारे चल रहा हूँ
आँसुओं से जन्म दे-दे कर हँसी को
एक मंदिर के दिए सा जल रहा हूँ,
मैं जहाँ धर दूं कदम वह राजपथ है, मत मिटाओ !
पाँव मेरे देखकर दुनिया चलेगी !
जब मिलेगी, रोशिनी मुझसे मिलेगी !
                   राम अवतार त्यागी  


आज मैं जिस किताब के बारे में लिखने जा रही हूँ वो सिर्फ एक किताब नहीं है ..वो जिन्दगी है , जिसमें हताशा है, निराशा है संघर्ष हैं और संघर्षों से टकरा –टकरा कर लिखी गयी विजय गाथा है | दरअसल यह गिर –गिर कर उठने की दास्तान है | यूँ तो ये एक आत्मकथा है जिसे पढ़ते हुए आपको अपने आस-पास के ऐसे कई चेहरे नज़र आने लगेंगें जिनके संघर्षों को आप  देख कर भी अनदेखा करते रहे | कई बार सहानुभूति में आँख तो भरी पर उनके संघर्षों में उनका हौसला बढाकर साझीदार नहीं बने | इस पुस्तक का उद्देश्य इस सामजिक मानसिकता के भ्रम को तोडना ह , जिसके तहत हम –आप,  किसी दिव्यांग को , किसी अस्वस्थ को, या  किसी अन्य आधार पर किसी  को अपने से कमतर मान कर उसे बार –बार कमतरी का अहसास करते हुए उसके स्वाभिमान पर प्रहार करते रहते हैं |  सहानभूति और समानुभूति में बहुत अंतर है | सहानभूति की नींव कभी समानता पर नहीं रखी होती | क्यों नहीं हम सहानुभूति वाली मानसिकता को त्याग कर हर उस को बराबर समझें | उसे अपने पंख खोलने का हौसला और हिम्मत दे ...यकीन करें उसकी परवाज औरों की तरह ही ऊँची होगी ...बहुत ऊँची |

विटामिन जिन्दगी- नज़रिए को बदलने वाली एक अनमोल किताब  


विटामिन जिंदगी के लेखक ललित कुमार



और जैसा किताब के लेखक ललित कुमार जी ने पाठकों को संबोधित करते हुए लिखा है कि “मैंने इस पुस्तक में हर भारतीय को आवाज़ दी है कि वो विकलांगों के प्रति अपने नजरिया सकारात्मक बनाए | मैंने समाज को कुछ वास्तविकताओं के बारे में बताया है, ताकि हमारा समाज विकलांग लोगों को हाशिये पर डालने के बजाय विकलांगता से लड़ने के लिए खुदको मानसिक व् संरचनात्मक रूप से तैयार कर सके | यदि यह पुस्तक एक भी व्यक्ति के जीवन को बेहतर बनाने में थोडा भी योगदान दे सके तो मैं इस पुस्तक के प्रकाशन को सफल समझूंगा |”


आज  हम जिस पुस्तक की चर्चा कर रहे हैं वो है ललित कुमार जी की “विटामिन –जिंदगी” | ललित कुमार जी को कविता कोष व गद्य कोष के माध्यम से सभी जानते हैं | लेकिन उनके सतत जीवन  संघर्षों और संघर्षों को परास्त कर जिन्दगी की किताब पर विजय की इबारत लिखने के बारे में बहुत कम लोग जानते होंगे | “ये विटामिन जिंदगी” वो इच्छा शक्ति है वो जीवट है, वो संकल्प है जिससे कोई भी निराश, हताश व्यक्ति अपनी जिन्दगी  की तमाम मुश्किलों से टकराकर सफलता की सीढियां चढ़ सकता है | इसमें वो लोग भी शामिल हैं जिनके साथ प्रकृति माँ ने भी अन्याय किया है |

“प्रकृति विकलांग बनती है और समाज अक्षम” 



“ओह ! इसके साथ तो भगवान् ने बहुत अन्याय किया है”कह कर  हम जिन लोगों को देखकर आगे बढ़ जाते हैं उन्हीं में से एक थे मिल्टन, जिनकी कवितायें आज भी अंग्रेजी साहित्य में मील का पत्थर बनी हुई हैं,  उन्ही में एक थे बीथोवन जिनकी बनायी सिम्फनी को भला कौन नहीं जानता है | उनकी सुनने की क्षमता  26 वर्ष की आयु से ही कम हो गयी थी | अन्तत: उन्हें सुनाई देना पूरी तरह से बंद हो गया | पाँचवीं सिम्फनी तक वो पूरी तरह से सुनने की क्षमता खो चुके थे | फिर भी वो रुके नहीं ...और उसके बाद भी एक से बढ़कर एक  लोकप्रिय सिम्फनी बनायी | उन्हीं में से एक है हिंदी फिल्मों में नेत्रहीन संगीतकार, गीतकार  रवीन्द्र जैन जिनकी बनायीं धुनें आज भी भाव विभोर करती हैं |  उन्हीं में से एक है दीपा  मालिक जी, जिनके सीने के नीचे का हिस्सा संवेदना शून्य है लेकिन उन्होंने रियो पैरा ओलम्पिक में रजत पदक जीता | हाल ही में उन्हें खेल रत्न से नवाजा गया है | और उन्हीं में से एक हैं ललित कुमार जी | ऐसे और भी बहुत से लोग होंगे जिनके नाम हम नहीं जानते, क्योंकि उन्होंने सार्वजानिक जीवन में भले ही कुछ ख़ास न किया हो पर अपने–अपने जीवन में अपने संघर्ष और विजय को बनाए रखा | ये सब लोग अलग थे ....दूसरों से अलग पर सब ने सफलता की दास्तानें लिखीं | ये ऐसा कर पाए क्योंकि इन्होने खुद को अलग समझा दूसरों से कमतर नहीं | इस किताब के लिखने का उद्देश्य भी यही है कि आप इनके बारे में जान कर महज उनकी प्रशंसा प्रेरणादायक व्यक्तित्व के रूप में कर के आगे ना बढ़ जाए | बल्कि  अपने आस-पास के दिव्यांग लोगों को अपने बराबर समझें | उनमें कमतरी का अहसास ना जगाएं |  


पल्स पोलियो अभियान के बाद आज भारत में पोलियो के इक्का दुक्का मामले ही सामने  आते हैं परन्तु एक समय था कि पूरे  विश्व को इसने अपने खुनी पंजे में जकड़ रखा था | कहा जाता है कि उस समय अमेरिका में केवल दो चीजों का डर था एक ऐटम  बम का और दूसरा पोलियो का | पोलियो के वायरस का 90 से 95 % मरीजों पर कोई असर नहीं होता | 5 से 10% मरीजों पर हल्का बुखार और उलटी और दर्द ही होता है केवल दशमलव 5% लोगों में यह वायरस तंत्रिका तंत्र पर असर करता है और उसे जीवन भर के लिए विकलांग कर देता | ये बात भी महवपूर्ण है कि  1955 में डॉ सार्क  ने पोलियो का टीका बनाया था | लेकिन उन्होंने इसे पेटेंट नहीं करवाया | उन्होंने इसे मानवता के लिए दे दिया | वो इस टीके के पेटेंट से हज़ारों करोणों डॉलर कमा सकते थे | पर उन्होंने नहीं किया | और इसी वजह से पोलियो को दुनिया से लगभग मिटाया जा सका है | मानवता के लिए ये उनका अप्रतिम योगदान है | ये जानने के बाद उनके प्रति श्रद्धा से सर झुक जाना स्वाभाविक है |

लेकिन 80 के दशक में भारत में भी पोलियो का खौफ था | ये मासूम बच्चों पर प्रहार कर उन्हें बेबस करता था | मुझे याद है मेरे प्राइमरी स्कूल में  एक बच्ची थी जिसका एक पैर पोलियो से ग्रस्त था | मेरा संवेदनशील मन हमेशा उसके साथ रहा | पर इस पुस्तक को पढने के बाद मुझे लगा कि काश ये पुस्तक मैं उस समय पढ़ पाती तो उसको और वो हम सब से क्या चाहती है इसे और गहराई से समझ पाती |  


इस किताब से पहले पन्ने पर ,”हमें भी कुछ  कहना है” में “नमस्ते हम ललित की बैसाखियाँ हैं’ से जो पाठक की आँखें डबडबाती हैं वो आगे के पन्नों पर बिना रुके बरसती ही जाती हैं और अंत तक आते –आते सर श्रद्धा से झुकता जाता है | ये जीवन कथा आरम्भ होती है एक निम्न मध्यम वर्ग में जन्में चार वर्षीय बच्चे से जिस पर पोलियो वायरस का अटैक हुआ है | वो बच्चा जो अभी तक अन्य बच्चों के साथ दौड़ता भागता था, जिसके नन्हे पैर वैष्णव देवी की खड़ी पहाड़ी पर सरपट दौड़ कर चढ़ गए थे,   उसे डॉक्टर्स ने कह दिया  कि अब ये कभी चल ही नहीं पायेगा | ये एक हँसते –खिलखिलाते परिवार में एक वज्रपात की तरह से था | कितना समय  लग गया होगा परिवार को इस सच्चाई को स्वीकार करने में | और फिर आशा की लौ को जीवित रखते हुए लिया एक संकल्प कि किसी भी तरह से इस बच्चे को ठीक करना है | किसी के, कोई भी कोई डॉक्टर वैद्य बताने पर बच्चे को लेकर वहाँ दौड़ पड़ना, बार–बार होने वाली निराशा में भी आशा का दीप जलाए रखना, वैद्य द्वारा बताई गयी मालिश और भाप  आदि देने के लिए दिन–रात एक कर देना किसी भी माता –पिता और परिवार  के संघर्षों की बयानी है | वहीँ उस बच्चे के दर्द जिसे असह्य  पीड़ा के बाद बैसाखी पकड़ा दी जाए कि अब तुम्हें इससे ही चलना है ह्रदय में शूल सा गड़ता है |



इस पुस्तक के माध्यम से ललित कुमार जी ने अपने जीवन के एक –एक संघर्ष को रखा है | खाना–पीना ,चलना , बोलना जो आम लोगों के लिए सामान्य सी बात होती है वो भी दिव्यांगों के लिए संघर्ष का सबब होता है |  एक मासूम बच्चा जिसे बैसाखी पर चलना है,  जिसके लिए रोजमर्रा के काम भी कठिन हैं वो बच्चा हिम्मत करके स्कूल जाता है | पर वहाँ भी बच्चे उसे चिढाते हैं, उसकी बैसाखी छीन लेते हैं, अपने से कमतर दिखाते हैं | बचपन में हमने आपने भी सुना है बच्चों को गाते हुए,  घर में आस –पड़ोस के लोग आने जाने वाले बेचारगी का भाव दिखाते हैं | ये सब बातें मन को तोडती हैं | कमजोर शरीर से लड़ते हुए व्यक्ति  केवल मन की शक्ति से ही आगे बढ़ने का प्रयास करता है पर समाज उससे वो भी छीनने की कोशिश करता है | ऐसे में अपने आत्मसम्मान को बचाए रख कर संघर्ष करना और भी कठिन हो जाता है |

बचपन के संघर्षों को बयाँ करते हुए ललित कुमार जी जब बच्चों द्वारा परेशान  किये जाना तो बताते है तो पाठक की आँखों के आगे ऐसे दृश्य स्वत: ही आ जाते हैं जहाँ बच्चे किसी को ...”लंगड़दींन बजावे बीन कह कर छेड़ रहे हैं तो किसी को चश्मिश कह कर, किसी को तेरे तो मजे हैं तुझे तो प्रार्थनासभा में जाना नहीं पड़ता” यहाँ बात माता –पिता द्वारा बच्चों समाज के प्रति संवेदनशील बनाने की कमी दिखाती है वहीँ अध्यापक, वो तो बड़े हो चुके हैं, वो क्यों  अपने क्लास के बच्चों को गलत बात कहने करने के लिए डांटते नहीं है या समानता के व्यव्हार को प्रोत्साहित करने की अपनी जिम्मेदारी को भूल जाते हैं |


मैंने भी इस बारे में एक बार लेख लिखा था कि “क्या सभी टीचर्स को चाइल्ड साइकोलॉजी की समझ है? “ उस समय मेरा उद्देश्य ‘वर्बल अब्यूज’ के प्रति ध्यान दिलाना था | शिक्षक जिसे ब्च्चा अपना आदर्श समझता है अगर वो एक छोटा सा नकारात्मक बीज बच्चे के दिमाग में बो देता है उसे आसानी से नहीं निकाला जा सकता |  जब आप इस किताब को पढेंगे तो समझेंगे कि आखिर क्या कारण होगा, जो ललित कुमार जी को लिखना पड़ा ...जो अध्यापकों ने उनकी शिकायत पर बच्चों से कहा ...

“उसके पास बंदूक है” , “ वो तुम्हे डंडे से मारेगा” या जगन को डांटते हुए कहना, “ ये बेचारा तो पहले से ही भगवान् का सताया हुआ है, इसे और तंग क्यों करते हो?”


आखिर कितनी निराशा रही होगी, जब उन्हें कहना पडा ,  “लेकिन प्रश्न ये है कि हमारे समाज में अध्यापक अपने कार्य को कितनी गंभीरतासे लेते हैं |” वो उस प्रक्रिया के बारे में भी बात करते हैं जिसके जरिये किसी आम व्यक्ति के हाथों में सैंकड़ों विद्यार्थियों का भविष्य सौंप दिया जाता है |


एक महत्वपूर्ण वाक्य और है जब ललित जी युवा होने के बाद देश विदेश की यात्रा करते हैं तो उन्हें वो प्रसंग याद आता है जब बचपन में चिड़ियाघर पिकनिक जाने पर यह कह कर रोक दिया था कि , “ तुम नहीं, तुम रहने दो , तुम चल तो पाओगे नहीं |” क्या वो उन्हें  नहीं ले जा सकते थे ....लेकिन वो उन्हें नहीं ले गए |



 दिव्यांगों  के प्रति किस तरह का व्यवहार हो इस बात को पुस्तक मजबूती से रखती है | जहाँ एक तरफ यह आपको भावुक  करती हैं वहीँ इस विषय पर देश और विदेश में दिव्यांगों के साथ होने वाले अलग –अलग व्यवहार के लिए भी अपनी बात रखती है ...जैसे कि हमारे यहाँ मॉल में या अन्य जगहों पर सुरक्षा जांच के समय दिव्यांगों की जांच यह कह कर नहीं की जाती, “अरे इसकी रहने दो, इसे तो भगवान् ने वैसे ही दंड दिया है |” जबकि विदेश में सबकी  समान ही चेकिंग होती है | कॉलेज हॉस्टल में भी जो छात्र जो काम कर सकता है उसे करने दिया जाता है | लोग बिना वजह रोक कर पूछते नहीं हैं कि, “ अरे ये आपके साथ क्या हुआ ?” लोग बिना वजह घूरते नहीं हैं |  बसों में दिव्यांगों और विकलांगों के लिए सीट न कर “प्राथमिकता सीट” होती हैं | जिसको ज्यादा जरूरत हो वो उस सीट पर बैठे | जैसे युवा बैठा है तो वो किसी वृद्ध के आने पर उठ जाएगा | कोई वृद्ध बैठा है तो वो किसी गर्भवती  महिला के आने पर उठ जाएगा | एक बार ललित जी भी अपनी सीट एक गर्भवती महिला को देते हैं तो वो ये नहीं कहती कि , “ नहीं –नहीं आप बैठिये “ बल्कि धन्यवाद कह कर बैठ जाती है | ये बातें भले ही कितनी छोटी हों पर एक दिव्यांग व्यक्ति के आत्मविश्वास को बढाने  के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती हैं | याद रखिये आत्मविश्वास कमतरी की भावना जाताने से नहीं बल्कि समान समझने की भावना से बढ़ता है | ऐसा करके हमारे देश में विकलांग व्यक्तियों को उपयोगी होने से रोक दिया जाता है |  

 दिव्यांगों के प्रति परिवार का व्यवहार बहुत महत्वपूर्ण होता है | ललित कुमार जी बताते हैं कि उनके माता –पिता आर्थिक रूप से समर्थ नहीं थे | शिक्षित भी नहीं थे  | लेकिन उन्होंने उनके मनोबल को कभी नहीं तोडा | उन्होंने जो करना चाहा  उसे करने में सहयोग दिया | उनके संयुक्त परिवार के हर सदस्य ने उनको कभी पीछे छूटा  हुआ महसूस नहीं होने दिया | ललित जी लिखते हैं कि वो ऐसे कई माता –पिता को जानते हैं जो अपने दिव्यांग बच्चे के  बेहतर भविष्य के लिए कोशिश कर रहे हैं | वहीँ ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो केवल अपने स्वस्थ बच्चों की ही चिंता करते हैं और उन्होंने अपने विकलांग बच्चों को समय के सहारे छोड़ दिया है | इसके पीछे सिर्फ माता –पिता ही दोषी नहीं हैं बल्कि पूरी सामाजिक सोच काम करती है |  

यूँ तो ये पुस्तक एक आत्मकथा है | लेकिन ये आत्मकथा के साथ बहुत कुछ कह जाती है | एक ओर जहाँ  ये दिव्यांग व्यक्ति की पीड़ा, कैपलर , पोलियो करेक्शन ओपरेशन , डॉ. मैथ्यू वर्गीज जैसे देवतुल्य पुरुष के बारे में बात करती हैं | वहीँ दूसरी ओर ये दिव्यंगों के प्रति समाज की सोच बदलने पर जोर देती है | ये किताब हर व्यक्ति के अन्दर ये हौसला जगाती है कि सकारात्मक सोच के द्वारा वो अपना जीवन बदल सकता है | स्वस्थ हो या दिव्यांग हर व्यक्ति में अपर संभावनाएं होती हैं | जरूरत है आशा , साहस , सकारात्मक सोच के विटामिन के साथ आगे बढ़ने की |



इस पुस्तक का प्रकाशन हिंदी युग्म ने eka प्रकाशन के साथ मिलकर किया है | इसके २५६ पन्ने हैं | कवर पृष्ठ पुस्तक के कंटेंट के अनुरूप है |

अभी तक मैं हमेशा कहती आई हूँ कि ये पुस्तक इस रूचि के लोगों को पढनी चाहिए | पर इसके लिए मैं ये कहूँगी कि ये पुस्तक सभी को पढनी चाहिए |


विटामिन जिन्दगी -जीवनी 
लेखक -ललित कुमार 
प्रकाशक -हिंदी युग्म eka
पृष्ठ -256
मूल्य - 199 रुपये 

अमेजॉन से खरीदे -विटामिन जिन्दगी

 समीक्षा -वंदना बाजपेयी 

                                       
लेखिका -वंदना बाजपेयी



                                           
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इश्क के रंग हज़ार -उलझते सुलझते रिश्तों पर सशक्त कहानियाँ



जीवन में खुश रहने के लिए मूलभूत आवश्यकताओं  ( रोटी कपड़ा और मकान ) के बाद हमारे जीवन में सबसे ज्यादा जरूरी  क्या है ? उत्तर है रिश्ते |  आज जब हर इंसान पैसे और सफलता के पीछे भाग रहा है तो ख़ुशी के ऊपर किये गए एक अमेरिकन सर्वे की रिपोर्ट  चौकाने वाली थी | सर्वे करने वाले ग्रुप को विश्वास था कि जो लोग अपनी जिन्दगी में बहुत सफल हैं या जिन्होंने बहुत पैसे कमाए होंगे वो ज्यादा खुश होने परन्तु परिणाम आशा के विपरीत निकले | वो लोग अपनी जिन्दगी में ज्यादा खुश थे जिनके रिश्ते अच्छे चल रहे थे भले ही उनके पास कम पैसे हो या सफलता उनकी तयशुदा मंजिल से बहुत पहले किसी पगडण्डी पर अटकी रह गयी हो | भले ही सफलता के  के नए गुरु कहते हों कि जिन्दगी एक रेस है ...दौड़ों और ये सब पढ़ सुन कर हम बेसाख्ता दौड़ने लगे हों पर जिन्दगी एक बेलगाम दौड़ नहीं है | ये अगर कोई दौड़ है भी तो नींबू दौड़ है | याद है बचपन के वो दिन जब हम एक चम्मच में नीबू रखकर चम्मच को मुँह में दबा कर दौड़ते थे | अगर सबसे पहले लाल फीते तक पहुँच भी गए और नींबू चम्मच से गिर  गया तो भी हार ही होती थी | सफलता की दौड़ में ये नीम्बू हमारे रिश्ते हैं जिन्हें हर हाल में सँभालते हुए दौड़ना है | लेकिन तेज दौड़ते हुए इतना ध्यान कहाँ रह जाता है इसलिए आज हर कोई दौड़ने के खेल में हार रहा है | निराशा , अवसाद से घिर है | समाज में ऐसे नकारात्मक बदलाव क्यों हो रहे हैं ? , रिश्तों के समीकरण  क्यों बदल रहे हैं ? गाँव की पगडण्डीयाँ चौड़ी सड़कों में बदल गयी पर दिल संकुचित होते चले गए | क्या सारा दोष युवा पीढ़ी का है या बुजुर्गों की भी कुछ गलती है ? बहुत सारे  सवाल हैं और इन सारे सवालों के  प्रति सोचने पर विवश करने और समाधान खोजने के लिए प्रेरित करने  के लिए 'रीता गुप्ता ' जी ले कर आयीं हैं "इश्क के रंग हज़ार "

लेखिका-रीता गुप्ता

इश्क के रंग हज़ार -उलझते सुलझते रिश्तों पर सशक्त कहानियाँ 


" इश्क के रंग हज़ार ' नाम पढ़ते ही पाठक को लगेगा कि इस संग्रह में प्रेम कहानियाँ होंगी | परन्तु आशा के विपरीत इस संग्रह की कहानियाँ  रिश्तों के ऊपर बहुत ही गंभीरता से अपनी बात करती हैं | पाठक कहीं भावुक होता है , कहीं उद्द्वेलित होता है तो कहीं निराश भी वहीँ कुछ कहानियों में रिश्तों की सुवास उसके मन वीणा के तार फिर से झंकृत कर देती हैं | कहानी संग्रह का नाम क्या हो ये लेखक का निजी फैसला है | ज्यादातर लेखक किसी एक कहानी के नाम पर ही शीर्षक रखते हैं | शीर्षक के नाम वाली कहानी बहुत मिठास का अहसास देती हैं पर जिस तरह से गंभीर कहानियाँ अंदर के पन्नों पर पढने को मिलती हैं तो मैं कहीं न कहीं ये सोचने पर विवश हो जाती हूँ कि संग्रह का शीर्षक कुछ और होता तो रिश्तों की उधेड़बुन से जूझते हर वर्ग के पाठकों को  ज्यादा आकर्षित कर  पाता | वैसे इस संग्रह की ज्यादातर कहानियाँ विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं  , फिर भी जिन्होंने नाम के कारण इस संग्रह पर ध्यान नहीं दिया है उनसे गुजारिश है कि इसे पढ़ें और फिर अपनी राय कायम करें |


सबसे पहले मैं बात करना  चाहूँगी कहानी 'आवारागर्दियों का सफ़र 'की | ये कहानी 'इद्र्प्रस्थ भारती' में प्रकाशित हुई  थी | ये कहानी है 17 -18 साल के किशोर  अनु की , जो  ट्रक में खलासी का काम करता है | काम के कारण अनु को अलग -अलग  शहर में जाना पड़ता है | पिछले कई वर्षों में वो झारखंड व् आसपास के कई राज्यों में  जा चुका  है | हर जगह उसकी कोशिश यही होती है कि  उस शहर में रेलवे स्टेशन जरूर हो |  हर रेलवे स्टेशन के पास ही वो अपना डेरा बनाता है ताकि उसे खोजने में आसानी हो  | आप सोच रहे होंगे कि आखिर अनु क्या खोज रहा है ? इस खोज के पीछे एक बहुत दर्द भरी दास्ताँ है | नन्हा अनु अपने माता -पिता के साथ किसी रेलवे स्टेशन के पास ही रहता था , जब वो पिता की ऊँगली छुड़ा कर रेलगाड़ी में घुस गया था | उसके लिए महज एक खेल था , एक छोटी सी शरारत ....पर यही खेल उसके जीवन की सबसे कड़वी  सच्चाई बन गया | आज उसे कुछ भी याद नहीं है ...याद है तो पिता की धुंधली सी आकृति , तुलसी  के चौरे पर घूंघट ओढ़े दिया जलाती माँ और स्टेशन के पास एक दो कमरों का एक छोटा सा मकान जिसकी दीवारे बाहर से नीली और अंदर से पीली पुती हुई थी पर दरवाजा सफ़ेद और पीछे कुएं के पास लगे आम और अमरुद के पेड़ | हर स्टेशन के आस -पास यही तो ढूँढता है वो ...और हर बार बढती जातीं है उसके साथ पाठक की बेचैनियाँ | अब उसकी तलाश पूरी होती है या नहीं ये तो आपको कहानी पढ़ कर पता चलेगा पर अनु की बेचैनी को उजागर करती ये पंक्तियाँ अभी आप को भी बेचैन होने को विवश कर देंगी |

"पक्षियों के झुण्ड दिन भर की आवारागर्दियों के बाद लौट रहे थे | अनु को उनके उड़ने में एक हडबडी , एक आतुरता महसूस हो रही थी | "घर " वहाँ  इन सब का जरूर कोई ना कोई घर कोई ठिकाना होगा , वहाँ  कोई होगा जो इनका इंतजार कर रहा होगा | 'परिवार 'इन पंक्षियों का भी होता होगा क्या ? होता ही होगा , दुनिया में हर किसी का एक परिवार अवश्य ही होता है , सिवाय उसके , और अनु की आँखों से कुछ खारा पानी आज़ाद हो गया उसी क्षण |


' बाबा ब्लैक शीप 'इस संग्रह की मेरी सबसे पसंदीदा कहानी है | ये कहानी दो पीढ़ियों के टकराव पर है | कहानी की शुरुआत अंकल सरीन की मृत्यु की खबर से होती  है , जिसे कभी उनके  पड़ोसी रहे व्यक्ति का बेटा पढता है | खबर में मीडिया ने अमेरिका में बसे बेटे पर ऊँगली  उठाई है कि  उसने अपने पिता की मृत्यु की खबर वाला फोन भी नहीं उठाया | पूरा मीडिया बेटे को कोस रहा है | ऐसे में उसके सामने उसके दोस्त रहे समर्थ का बचपन घूम जाता है |  समर्थ,  जिसे फूलों से तितलियों से प्यार है | जो कवितायें लिखता है , चित्र बनाता है | जीवन के कितने रंग उसके ब्रश से निकल कर पन्नों -पन्नों में बिखर जाना चाहते हैं | पर ये उच्च पदाधिकारी सरीन अंकल को नहीं भाता | उनकी आँखों में सपने हैं बड़ी नौकरी , बड़ी सैलिरी के | यहीं से शुरू होती है समर्थ के मशीनीकरण की प्रक्रिया | जहाँ घर में रिश्ते -नातों , टी वी त्यौहार , हंसी मजाक सब पर धारा 144 लग जाती है | ये कहानी एक बहुत बड़ा सवाल उठती है कि सफलता के लिए हम बच्चों पर दवाब डालते हैं कि वो सारे इमोशंस मार कर केवल पढाई करें , फिर वृद्ध होने पर मशीन हुए बच्चों से हम भावनाओं की उम्मीद करते हैं | यहाँ पर ठहर कर हमें सोचना होगा , विचारना होगा कि आखिर उन्हें मशीन बनाया किसने ?


" आशा साहनी के बहाने'  कहानी वागार्थ में प्रकशित हुई थी | मुंबई की आशा सहानी के बारे में तो सभी जानते हैं | आशा सहानी वहीँ महिला हैं जिनका बेटा विदेश में रहता था |   अपने घर में एकांत झेलती हुई महिला की कब मृत्यु हो गयी किसी को पता नहीं चला | जब घर का दरवाजा खोला गया तो महिला कंकाल मिला | ये खबर बुजुर्गों के प्रति बच्चों की संवेदनहीनता को दिखाती है | कहानी का ताना बाना  आशा सहानी के घर के बगल में रहने वाली एक महिला के आधार पर बुना गया है | ये महिला भी अकेली है और इसका बेटा भी विदेश में रहता है | इसमें और आशा सहानी में बस इतना फर्क है कि इस महिला के एक बेटी भी है जो भारत में ही रहती हैं | फिर भी ये महिला अकेली ही रहती है | अतीत की धुंध को साफ़ करने पर पता चलता है कि इस महिला ने अपनी बेटी के ऊपर हमेशा से बेटे को वरीयता दी थी | पुत्र प्रेम में बौराई  माँ ने अपनी पुत्री से लगभग नाता ही तोड़ लिया था |बरसों से दोनों के बीच संवाद भी बंद था | पर  बेटे के द्वारा ठुकराए जाने पर उसका अहंकार उसे बेटी से मदद माँगने  को रोक रहा था | ये कहानी उन वजहों की तलाश करती है कि क्या आशा सहानी जैसे हश्र पर पहुँचने के लिए सिर्फ नयी पीढ़ी ही जिम्मेदार है या पुरानी  पीढ़ी से भी कुछ चूक हो गयी | रिश्ते संभालना और सहेजना एक जिम्मेदारी का काम है किसी को काला और किसी को सफ़ेद कह देना आसान है पर जिन्दगी असल में ग्रे शेड है | जहाँ हर कहानी में कुछ काला है और कुछ सफ़ेद |


"हम तुम कुछ और बनेगे " कहानी एक पुरुष के मानसिक अंतर्द्वंद पर आधारित है | कहानी है एक ऐसे जोड़े की जिसकी कोई संतान नहीं हैं |  जाहिर है वो इसके लिए डॉक्टर को दिखाते है | डॉक्टर पुरुष में कमी बताता है | दोनों आई वी ऍफ़ की मदद लेने को तैयार हो जाते हैं | जिस अस्पताल में पत्नी का इलाज होता है उसी में पति का छोटा भाई डॉक्टर है | ये कहानी दो स्तरों पर द्वन्द उत्पन्न करती है | एक तो भावी बच्चे की दादी का आई वी ऍफ़ के जरिये हुए बच्चे के खून, संस्कार पर संदेह तो दूसरा पति के मन में यह वहम आ जाना की कि कहीं ये स्पर्म उसके अपने छोटे भाई के तो नहीं हैं | ऐसा दिमाग में आते ही उसे होने वाले बच्चे से वितृष्णा होने लगती है | धीरे -धीरे उसका व्यवहार अपनी पत्नी के प्रति भी बदलने लगता है | ऐसे में गर्भवती पत्नी की देखभाल के लिए छोटे भाई को आना ही पड़ता है | जिससे उसका शक और गहराता है | आज  जब आई वी ऍफ़ मेथड के द्वारा बच्चे की नानी , मौसी या परनानी भी बच्चे को जन्म दे रहीं है ऐसे में ये प्रश्न उठाना स्वाभाविक है क्यों पुरुष ये स्वीकार नहीं कर पाता कि उसी के परिवार के किसी अन्य व्यक्ति का स्पर्म लिया जाए ? जबकि ये पूरी तरह से वैज्ञानिक प्रक्रिया है | हालांकि कहानी शक और सुलह के बीच चलती है | पर जो सवाल पितृसत्ता के लिए छोड़ जाती है वो अभी भी बना हुआ है | जरा देखें ...


" वह देखता जब रोहन आता तो वो काजल की कुछ ज्यादा ही देखभाल करता | ये बात रमण को अब चुभने लगी थी | शक का बुलबुला मानस में आकार पाने लगा था | 
"कि कहीं ये वीर्य दान रोहन ने ही तो नहीं किया है "
हालांकि उसके पास इस बात का कोई सबूत नहीं था पर जब कमी खुद में होती है तो शायद ऐसे विचार उठने लाजिमी हैं " 





एक छोटी सी कहानी 'चौबे गए छब्बे बनने' स्त्री प्रताड़ना के विरुद्ध आवाज़ उठाने की कहानी है | जहाँ ट्रेन में अपनी पत्नी को प्रताड़ित करने वाले पति के विरुद्ध जब एक आवाज़ उठती है तो पत्नी ही उसे यह कह कर रोक देती है कि " मेरा पति हैं चाहें मारे या पीटे  आपको क्या दिक्कत है ?" ये हमारे समाज की सच्चाई है | जिससे हम अक्सर रूबरू होते रहते हैं |'इश्क के रंग हज़ार' एक सॉफ्ट सी कहानी है |  कई बार किसी का हमारे साथ होने का अह्सास भी हमारे जीवन के सफ़ेद बेजान से कैनवास पर खिलखिलाते  रंगों की सुंदर चित्रकारी कर देता है | साहित्य अमृत में प्रकाशित कहानी 'शिद्दते अहसास ' एक ऐसी माँ की कहानी है जिसने अपने युवा एकलौते पुत्र को एक दुर्घटना में खो दिया है | माता -पिता दोनों की हालत परकटे पक्षी की तरह है | दोनों पुत्र वियोग में तड़प रहे हैं | एक बार माँ अपने को खत्म करने की कोशिश भी करती है पर बच जाती है ...वहीँ से उसके मन में एक विश्वास आ जाता है कि उसका बेटा उसके पास जरूर लौटेगा | कहते हैं विश्वास में बहुत शक्ति होती है | तो क्या उस माँ का विश्वास जीतेगा या जिन्दगी यूँ ही हाथ से फिसल जायेगी ?


"थोड़ी सी जमीन सारा आसमान "हिन्दू मुस्लिम विवाह पर आधारित है | ऐसा विवाह जिसका पूरा समाज दुश्मन बन कर खड़ा है | यहाँ तक कि दोनों बच्चों के माता -पिता भी | लेकिन तमाम अवरोधों के बावजूद विवाह होता है | क्योंकि प्रेम शरीर से नहीं आत्मा से होता है | "अमाके के खेमा करो " कहानी  एक ऐसे वृद्ध व्यक्ति की मन :स्थिति पर आधारित है | जिसने अभी कुछ ही दिन पहले अपनी पत्नी को खोया है | अपनी पत्नी की मृत्यु के पल को याद करते हुए वृद्ध के मानसिक अंतरद्वंद से रूबरू होते हुए पाठक को ये कहानी गहरे विषाद  में छोड़कर समाप्त हो जाती है और साथ में उकेर देती है कई प्रश्न चिन्ह | ये कहानी दैनिक जागरण  में प्रकाशित हुई थी |


इसके अतरिक्त पति -पत्नी के रिश्तों पर आधारित दिल की वो रहस्यमयी पर्ते , बाजूबंद , वीणा के तार सी जिंदगी, भाई बहन के रिश्ते पर आधारित रक्षा बंधन और इंसानियत के रिश्ते पर आधारित हमसाया व  पुरसुकून की  बारिश प्रभावित करती हैं | 'काँटों से खींच कर  ये आँचल' कहानी अच्छी है पर एक सौतेली माँ के इस महान त्याग को समझना सबके लिए आसान नहीं है | फिर भी कुछ चरित्र एक सुखद कल्पना की तरह मन को बशुत सुकून देते हैं |


रीता जी का ये पहला कहानी संग्रह है | रीता जी उन गिनी चुनी लेखिकाओं में से एक हैं जो देर से साहित्य की दुनिया में आयीं पर आते ही  साहित्यिक/गैर साहित्यिक  पत्रिकाओं में छा गयीं | इस संग्रह की सबसे खास बात ये है कि इसकी भाषा बहुत सरल है और कहानियाँ कसी हुई | कहीं भी खींचतान कर कहानी को बड़ा करने की कोशिश नहीं की गयी है | कई बार कहानी को जबरदस्ती बड़ा करने की कोशिश में कहानी की आत्मा मर जाती है | कुछ साहित्यिक कहानियों में ऐसा देखने को मिलता है | ये कहानियाँ आधुनिक समाज में रिश्तों की बदलती परिभाषा को ही नहीं बताती बलि उन्हें निभाने के नए अंदाज भी प्रस्तुत करती हैं | इन कहानियों ने लगभग हर प्रमुख रिश्ते को उठाया है | कहानियों में रीता जी उन्हें बिलकुल नए दृष्टिकोण से देखती हैं | कई बार ये सोचने पर विवश कर देती हैं कि आज जिस तरह रिश्तों का हास हो रहा है उसमें हम एक -दूसरे पर ऊँगली उठाने के स्थान पर सोचें कि कहीं इसका कारण हम ही तो नहीं | आजकल कहानी संग्रहों में आत्मकथ्य का चलन बढ़ा है | इसमें उसकी कमी महसूस होती है | रिश्तों की पर्ते खोलते -सिलते इस कहानी संग्रह को पढने के बाद आपको कहीं उधेड़े जाने का गम होगा तो कहीं सिले  जाने का सुकून |


इश्क के रंग हज़ार - कहानी संग्रह
प्रकाशक -वनिका पब्लिकेशन
पृष्ठ -128
मूल्य - 120 रुपये (पेपर बैक )

अगर आप आज के समय में बनते बिगड़ते रिश्तों को समझना चाहते हैं तो ये संग्रह आपके लिए है |

वंदना बाजपेयी

                                     
समीक्षा -वंदना बाजपेयी




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पालतू बोहेमियन -एक जरूर पढ़ी जाने लायक किताब






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पालतू  बोहेमियन – एक जरूर पढ़ी जाने लायक किताब



प्रभात रंजन जी की मनोहर श्याम जोशी जी के संस्मरणों पर आधारित किताब ‘ पालतू बोहेमियन’ के नाम से वैसे ही आकर्षित करती है जितना आकर्षण कभी टी.वी. धारावाहिक लेखन में मनोहर श्याम जोशी जी का था | इसे पूरी ईमानदारी के साथ पन्नों पर उतारने की कोशिश करी है प्रभात रंजन जी ने | जानकी पुल पर प्रभात रंजन जी को पढ़ा है उनका लेखन हमेशा से प्रभावित करता रहा है  परन्तु इस किताब में उन्होंने जिस साफगोई के साथ उस समय की अपनी कमियाँ, पी.एच.डी. करने का कारण, और उस समय लेखन को ज्यादा संजीदगी से ना लेने का वर्णन किया है वो वाकई काबिले तारीफ़ है | ये पुस्तक गुरु और शिष्य के अंदाज में लिखी गयी है | फिर भी  आज आत्म मुग्ध लेखकों का दौर है | कोई कुछ जरा सा भी लिख दे तो दूसरों को हेय  समझने लगता है | ऐसे में मनोहर श्याम जोशी जी के कद को और कुछ और ऊँचा करने के लिए प्रभात रंजन जी जब कई खुद को कमतर दर्शाते  हैं तो इसे एक लेखक के तौर पर बड़ा गुण समझना चाहिए |  उम्मीद है जल्दी ही उनका उपन्यास पढने को मिलेगा | वैसे उन्हें  जोशी जी द्वारा सुझाया गया “दो मिनट का मौन” हिंदी साहित्य के किसी अनाम लेखक के ऊपर एक अच्छा कथानक है परन्तु क्योंकि अब प्रभात रंजन जी ने उस रहस्य को उजागर कर दिया है इसलिए उम्मीद है कि वो किसी नए रोचक विषय पर लिखेंगे | इस पुस्तक पर कुछ लिखने से पहले मैं कहना चाहती हूँ कि पुस्तक समीक्षा के लिए नहीं है , क्योंकि ये ज्ञान की एक पोटली है आप जितनी श्रद्धा से इसे पढेंगे उतना ही लाभान्वित होंगे |

लेखक -प्रभात रंजन


पालतू  बोहेमियन – एक जरूर पढ़ी जाने लायक किताब




"तो छुटकी डॉक्टर बन पाएगी या नहीं कल ये देखेंगे ..हम लोग "
" ऐसे ना देखिये मास्टर जी "
" तो कैसे देखूं लाजो जी " 
मनोहर श्याम जोशी जी के साथ खास बात यह थी कि वो  उन गिने चुने लेखकों में से हैं जिनका नाम वो लोग भी जानते हैं जो हिंदी साहित्य में ख़ास रूचि नहीं रखते हैं | भला ‘हम लोग’ और ‘बुनियाद’ जैसे ऐतिहासिक धारावाहिक लिखने वाले लेखक का नाम कौन भूल सकता है ? हालांकि उनका जीवन शुरू से ही लेखन –सम्पादन को  समर्पित रहा और हम लोग लिखने से पहले उनका उपन्यास ‘कुरु-कुरु स्वाहा’ व् ‘कसप’ से  साहित्य जगत में बहुत चर्चित भी हो  चुका था फिर भी आम जन-मानस के ह्रदय में उनकी पैठ हम लोग और बुनियाद जैसे धारावाहिक लिखने के कारण ही हुई | 
मनोहर श्याम जोशी जी हिंदी के उन गिने चुने लेखकों में से हैं जिनकी रचनाएँ पाठकों और आलोचकों में सामान रूप से लोकप्रिय रही हैं | साथ ही उनकी खास बात ये थी उनका लेखन किसी विचारधारा की बेंडी से जकड़ा हुआ नहीं था | उन्होंने पत्रकारिता कहानी , संस्मरण, कवितायें और टी वी धारावाहिक लेखन भी किया | कोई एक लेखक इतनी विधाओं में लिखे ये आश्चर्य चकित  करने वाला है |उस समय बहुत से लेखक उन पर शोध कर रहे थे | 




 मनोहर श्याम जोशी जी के संस्मरणों पर आधारित इस पुस्तक में उनके जीवन के अनेक अनछुए पहलुओं को छुआ है | इसकी प्रस्तावना पुष्पेश पन्त जी ने लिखी है | उन्होंने इसमें मुख्यत : जोशी जी के प्रभात जी से मिलने से पहले के जीवन पर प्रकाश डाला है | जोशी जी के साथ –साथ इसके माध्यम से पाठक को पुष्पेश पन्त जी के बचपन की कुछ झलकियाँ  देखने को मिलती हैं | साथ ही आज से 59-60 वर्ष पहले के पहाड़ी जीवन की दुरुह्ताओं की भी जानकारी मिलती है | पुष्पेश जी एक वरिष्ठ  लेखक हैं उनके बारे में जानकारी से पाठक समृद्ध होंगे | हालांकि प्रस्तावना थोड़ी बड़ी और मूल विषय से थोडा इतर लगी | फिर भी, क्योंकि ये किताब ही जानकारियों की है इसलिए उसने पुस्तक में जानकारी का बहुत बड़ा खजाना जोड़ा ही है |

असल में हम लोग जादुई यथार्थवाद के नाम पर अंग्रेजी भाषा और यूरोपीय वर्चस्व के जाल में उलझ जाते हैं | क्या तुम जानते हो कि उनकी भाषा को कभी स्पेनिश और लेटिन अमेरिकी आलोचकों ने कभी जादुई नहीं कहा |


पहली मुलाकात

ये किताब वहाँ  से शुरू होती है जब लेखक प्रभात रंजन जी ने पी.एच.डी के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया था | जिसका शीर्षक था : उत्तर आधुनिकतावाद और मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास | जोशी जी से पहली मुलाकात के बारे में वह लिखते हैं कि वो उदय प्रकाश जी द्वारा दिए गए ‘ब्रूनो शुल्ज’ के उपन्यास “स्ट्रीट ऑफ़ क्रोकोडायल्स” को  पहुँचाने के लिए उनके घर गए थे | उनके मन में एक असाधारण व्यक्ति से मिलने की कल्पना थी |  परन्तु उनसे मिलकर उन्हें कुछ भी ऐसा नहीं लगा जो उनके मन में भय उत्पन्न करे | साधारण मध्यम वर्गीय बैठक में बात करते हुए वे बेहद सहज लगे | जोशी जी के व्यक्तित्व में खास बात ये थी कि वो चाय बिना चीनी की पीते थे और साथ में गुड़ दांतों से कुतर-कुतर  कर खाते थे | पहली मुलाक़ात में जब उन्हें पता चला की प्रभात जी उन पर पी एच डी  कर रहे हैं तो उन्होंने इस बात पर कोई खास तवज्जो नहीं दी |  


जोशी जी का  व्यक्तित्व 


१)       जोशी जी आम लेखकों  की तरह मूड आने पर नहीं लिखते थे | वो नियम से १० से पाँच तक लिखते थे | जिसमें धारावाहिक कहानी , उपन्यास सभी शामिल होता था |

२)       जोशी जी कभी कलम ले कर नहीं लिखते थे बल्कि वह हमेशा बोलते थे और एक टाइपिस्ट उसको टाइप करता रहता था | हे राम फिल्म तक शम्भू दत्त सत्ती जी उनके लिए टाईप  करने का काम करते रहे |

३)       धारावाहिक लेखन तो वो बहुत जल्दी जल्दी बिना रुके कर लेते थे लेकिन जब भी कुछ साहित्यिक लिखते तो उसके कई –कई ड्राफ्ट बनाते थे |

४)       बोलने के कारण उनकी रचना व् विचार प्रक्रिया को  समझना आसान हो जाता |

५)       जोशी  जी जितना लिखते थे उससे कहीं ज्यादा पढ़ते थे | हिंदी ही नहीं विश्व साहित्य पर भी उनकी अच्छी पकड़ थी | अमेरिकन लाइब्रेरी से भी वो अक्सर किताबें मंगवाया करते थे |

६)       अंग्रेजी में किसी नए विषय को पढ़ कर उनकी तीव्र इच्छा होती थी कि हिंदी में भी कुछ ऐसा ही लिखा जाए |

७)       उनके दिमाग में एक साथ कई कहानियाँ चलती थी | उनपर न वो सिर्फ लिखते थे बल्कि औरों को भी लिखने को कहते थे |

८)       जब भी वो किसी को शोध करने का काम सौपते थे उससे पहले ही उस पर शोध कर चुके होते थे | एक तरह से ये उनका तरीका था दूसरों की मदद करने का |

९)       वो अपनी किसी भी कहानी में विषय का दोहराव पसंद नहीं करते थे | यहाँ तक कि जिस विषय पर वो काम कर रहे हैं और उसे उनसे पहले किसी ने लिख लिया | जिसकी किताब उन्हें पसंद भी आई तो वो उस विषय पर लिखना छोड़ देते थे |

१०)   उन्होंने डबिंग जैसे कठिन काम के लिए भी लेखन किया है |

११)   लिखने की उधेड़बुन में वो महीनों बरसों पड़े रहते थे पर एक बार कहानी उनके हाथ में आ जाए तो वो उपन्यास भी एक महीने में पूरा कर देते थे |

१२)   जोशी जी 21 साल की उम्र से पूर्णतया मसिजीवी हो गए थे हालाँकि उनका पहला उपन्यास 47 वर्ष की उम्र में आया |

१३)   उन्हें तकनीकी की काफी समझ थी | ऐसी समझ रखने वाले वो उस समय के हिंदी के गिने –चुने लेखकों में से थे | उन्होंने बहुत पहले ही कह दिया था कि आने वाला समय तकनीकी हिंदी का होगा | यही समय हिंदी को विचारधारों की जकदन से दूर करायेगा |

१४)   उनके दिमाग में बहुत तेजी से नए –नए विचार आते थे | सब पर काम करना संभव नहीं होता था | इसलिए अपने कई नए विचार वो युवाओं के साथ साझा करते थे ताकि उन पर काम हो सके | अपने काम में दूसरों को जोड़ने से उनका मतलब सिर्फ यही नहीं था कि वो अपना काम संभल नहीं पा रहे हैं  नहीं पा रहे हैं बल्कि इस तरह से वो दूसरों की मदद करना चाहते थे | 


नए लेखकों को सलाह



1)        सिर्फ लिखने के लिए लिखना है या छपने के लिए लिखना है तो कोई बात नहीं | हिंदी में हजारों की तादाद में रोज लोग लड़की, फूल, चिड़िया पर कविता लिखने वाले पैदा हो रहे हैं | उसी तरह कहानियाँ लिखने वाले भी पैदा हो रहे हैं | इतनी पत्र –पत्रिकाएँ निकल रही हैं कि बहुत से लेखक उसमें पन्ने भरने के काम आ जाते हैं | लेकिन कुछ लेखक ऐसे होते हैं जिनकी रचनाओं को प्रकाशित करके पत्र –पत्रिकाएँ खुद को गौरवान्वित महसूस करती हैं |

2)       अगर अच्छा लेखक बनना है तो खूब पढना चाहिए | कहानियों के बारे में उनकी सलाह थी कि दो तरह की कहानियाँ होती है ... एक जो घटनाओं पर आधारित होती हैं जिसमें लेखक वर्णनों विस्तारों से जीवंत माहौल रच देता है | डिटेल्स के साथ इस तरह की कहानियाँ लिखना मुश्किल है | दूसरी तरह की कहानियाँ लिखना थोड़ा आसान होता है | इसमें एक किरदार उठाओं और उस पर कॉमिकल , कारुणिक कुछ लिख दो | हालांकि आजकल ऐसी कहानियाँ ज्यादा लोकप्रिय हो रही हैं |

3)       हिंदी पट्टी वाले अक्सर शब्दकोष का इस्तेमाल नहीं करते | उनका कहना था कि तुम हिंदी पट्टी वाले लोग अंग्रेजी के लिए डिक्शनरी रखते हो लेकिन हिंदी के लिए शब्दकोष नहीं रखते | हिंदी भाषा को ठीक करने के लिए भी शब्द कोष रखना चाहिए | भाषा से ही तो साहित्य जीवंत हो उठता है |

4)        कहानी को डेवलप करने के लिए उनका कहना था कि कहानी को हमेशा वर्तमान में सोचना चाहिए | फिल्म और टी.वी के लिए लिखते समय ये और जरूरी हो जाता है कि आप जो भी लिखे उसे पहले मन के परदे पर घटित होता हुआ महसूस करें |

5)       धारावाहिक लेखन में (जिसके १०० से ज्यादा एपिसोड हो )किसी कहानी को सम्पूर्णता में ना सोच कर एपिसोड में सोचना चाहिए और हर बार एक सूत्र आगे की कहानी के लिए छोड़ते हुए लिखना चाहिये | यहाँ ध्यान देने की  बात है कि शुरुआत इतनी धमाकेदार ना हो कि दर्शक हर एपिसोड में उसकी ही प्रतीक्षा करें और जल्द ही निराश हो जाये | हर एपिसोड उतना ही धमाकेदार लिखना संभव नहीं है |

विचित्र संयोग  



पालतू बोहेमियन को पढ़ते हुए मुझे एक बात का  बहुत दुःख भी हुआ कि जिस लेखक को मैंने कुरु –कुरु स्वाहा और हम लोग , बुनियाद के माध्यम से जाना था , पसंद किया था उनके कितने धारावाहिक, फिल्में कभी परदे का मुँह नहीं देख पाए | कितने उपन्यास अधूरे रह गए | अपने अंतिम वर्षों में सब कुछ जल्दी –जल्दी पूरा करने की बेचैनी मुझे अंदर तक द्रवित कर गयी | इसके लिए जोशी जी का ही सुझाया एक शब्द बेहतर लगा ‘संयोग’ जीवन में कितनी घटनाएं संयोग से होती है | कई बार ये संयोग हमारे पक्ष में जाते है तो कई बार विपक्ष में |

 विपक्ष में जाने वाले ऐसे दो संयोग जिन का वर्णन इस किताब में है | एक “शुभ-लाभ “ जिस पर मारवाड़ी  समाज पर उन्होंने बहुत शोध किया था पर उसके आकार लेने से पहले किताब “ कलि कथा वाया बाई पास आ गयी “ और उन्होंने उसकी प्रशंसा करते हुए , “दोबारा मारवाडी समाज पर इतना अच्छा कथात्मक साहित्य नहीं लिखा जा सकता कहकर शुभ –लाभ पर काम करने का विचार त्याग दिया | दुबारा उन्होंने जब भोवाल के राजकुमार पर बहुत शोध किया तब उनकी पुस्तक आने से पहले प्रसिद्द इतिहासकार पर्था चैटर्जी की किताब “ प्रिंसली इम्पोस्टर “आ गयी | जिसमें भोवाल के राजकुमार की कहानियों के इतिहास के बारे में विशद वर्णन था | इस बारे में जोशी जी ने सिर्फ कहा ही नहीं था बल्कि प्रभात जी से एक  जेम्स रेड फील्ड के उपन्यास ‘द सेलेस्टिन प्रोफेसी’  की चर्चा भी की थी | जिसमें लेखक ने लिखा है की जीवन में संयोग अक्सर श्रृंखलाबद्ध तरीके से घटित होते हैं |

मेरे लिए मुश्किल ये नहीं है कि मैं क्या लिखूं , क्या प्रकाशित करवाऊं | मुश्किल ये है कि मैं अपने मानकों पर खरा नहीं उतर पा रहा हूँ | मेरे सभी उपन्यास अलग -अलग शैली के लिए जाने गए लेकिन अब मैं कोई नया लहजा नहीं बना पा रहा हूँ | मेरे ख्याल से एक लेखक को सबसे ज्यादा तकलीफ इस बात से होती होगी जब वो अपने आप को दोहराने लगता है | 




सच्चा साहित्यकार

    
मनोहर श्याम जोशी जी में  बहुत अच्छा लिखने की सामर्थ्य थी | वो हमेशा कुछ ऐसा लिखना चाहते थे जो कथा , भाषा व शिल्प की दृष्टि से बेजोड़ हो और वैसा ना कर पाने पर उन्हें बेचैनी भी बहुत होती थी | ऐसा ही एक किस्सा वागीश शुक्ल जी से सम्बंधित भी है | जब वो अपना उपन्यास ‘हरिया हरक्युलिस की हैरानी’ लिख रहे थे तो उनहोंने वागीश शुक्ल जी का उपन्यास पढ़ लिया था | जहाँ उन्होंने रोचकता व् पांडित्य का ऐसा प्रदर्शन देखा की वो अवसाद में  चले गए |  क्योंकि वो ऐसा ही कुछ लिखना चाहते थे और उनसे ये संभव नहीं हो रहा था | वैसे भी धारावाहिक लेखन में आने के बाद साहित्यिक लेखन अपने आप बहुत कम हो गया | बहुत सारे टी वी चैनलों के आने से वो उस बाज़ार से भी समझौता नहीं कर पाए | वो तड़प उनके व्यक्तित्व पर हावी रही | फिर भी वो एक सच्चे साहित्यकार थे | क्योंकि वो केवल और केवल लेखन में विश्वास करते थे | आजकल की तरह उस समय भी कई लेखक तमाम सामाजिक समारोहों में शिरकत कर लोकप्रिय हो रहे थे तब भी वो इन आयोजनों से दूर रहते थे और लेखन की अपनी नियमित दिनचर्या का पालन करते थे | एक बार उन्होंने कहा था , “ लेखक को अपना लेखन ईमानदारी से करना चाहिए | लिखने से ज्यादा पी आर करने वाले लोग कहीं के नहीं रहते | वे प्रेमचंद्र का उदहारण देते थे | वे कहते थे कि उनके पास सामाजिकता निभाने का समय ही नहीं होता था पर लोगों ने उन्हें देवता बना दिया |और जैसा कि पुस्तक में प्रभात रंजन जी कहते हैं .... 

“ मैं देख रहा था, निगम बोध घाट पर अपार भीड़ उमड़ी हुई थी | जो लेखक कभी अपने काम के दवाब के कारण सामाजिक नहीं हो पाया , उसको समाज इतना प्यार करता था |”

क्यों पढ़ें पालतू बोहेमियन ...


        
अगर आप लेखक हैं या साहित्य से प्यार करते हैं तो ये पुस्तक आपको अवश्य ही पढनी चाहिए | इतने सारे तथ्यों को इतने समय बाद जिस तरह से समेटा है उससे उन्क्के परिश्रम का सहज अनुमान लगाया जा सकता है | कहीं -कहीं तो ऐसा लगता है कि वो डायरी लेकर बैठे हैं और जोशी जी अभी -अभी बोल रहे हैं जिसको वो लिखते जा रहे हैं | इस तरह छोटी से छोटी सूचना को लिपिबद्ध करना दुर्लभ है | इस पुस्तक में  आपको मनोहर श्याम जोशी जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के साथ संस्मरण के माध्यम से ही  देशी –विदेशी कई साहित्यिक पुस्तकों के नाम मिल जायेंगे | ये पुस्तक उत्तर आधुनिकतावाद , हिंदी साहित्य में मार्क्सवाद , धारावाहिक व् फिल्म लेखन , डबिंग आदि पर भी प्रकाश डालती है | इस पुस्तक के माध्यम  में सीखा जा सकता है कि एक लेखक को कितना परिश्रम करना पड़ता है | उसके लिए पढना और लिखना दोनों जरूरी हैं | गंभीर लेखन के लिए भी कई सुझाव दिए गए हैं | किसी विषय पर शोध कैसे की जाती है उसकी भी जानकारी है |  कुल मिला कर ये पुस्तक हिंदी साहित्य के बारे में ज्ञान की एक पोथी है | इसे पढने से और बार बार पढने से एक लेखक के रूप में भी कई कांसेप्ट क्लीयर होंगे | पूरी पुस्तक में कहीं भी दुरुहता नहीं आती और वहीँ रोचकता शुरू से अंत तक बनी रहती है | और अंत में जब मनोहर श्याम जोशी के ना रहने पर प्रभात जी पूछा जाता है कि आज आप को उनका कौन सा किरदार याद आ रहा है तो प्रभात जी कहते हैं , "हवेली राम, जो कलम से इन्कलाब लाना चाहता था " इस एक पंक्ति में मनोहर श्याम जोशी का पूरा जीवन समाहित है |  

१३६ पेज की इस किताब में मैंने बहुत कुछ समेटने की कोशिश की है पर उससे कई गुना ज्यादा रह गया है | बेहतर है उस कई गुना ज्यादा को आप किताब पढ़ कर खुद जाने | वैसे बहुत ही रोचक शैली में इतने ज्ञान को संकलित करने के लिए प्रभात रंजन जी को बधाई

किताब का नाम -पालतू बोहेमियन 
प्रकाशक -राजकमल 
पृष्ठ -136
मूल्य -125
अमेजॉन से खरीदे -पालतू बोहेमियन



वंदना बाजपेयी   
               

       

लेखिका -वंदना बाजपेयी




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पुरानी फाँक




पूर्वानुमान या इनट्युशन किसी को क्यों होता है इसके बारे में ठीक से कहा नहीं जा सकता | फिर भी ये सच है कि लोग ऐसे दावे करते आये हैं कि उन्हें घटनाओं के होने का पूर्वानुमान हो जाता है | ऐसी ही है इस कहानी  की नायिका बिल्लौरी  उर्फ़ उषा | लेकिन   बातों  के पूर्वानुमान के बाद भी क्या वो अपना भविष्य बदल सकी या भविष्य में होने वाले दर्दों को जिन्हें वो पहले ही महसूस करने में सफल हुई थी वो अतीत की पुरानी फाँक के रूप में उसे हमेशा गड़ते रहे | पढ़िए वरिष्ठ लेखिका दीपक शर्मा की कहानी ...

पुरानी फाँक


सुबह मेरी नींद एक नये नज़ारेने तोड़ी है.....
कस्बापुर के गोलघर की गोल खिड़की परमैं खड़ी हूँ.....
सामने मेरे पिता का घर धुआँ छोड़ रहा है..... धुआँ धुह......
काला और घना.....
मेरी नज़र सड़क पर उतरती है......
सड़क झाग लरजा रही है..... मुँहामुँह…..
नींद टूटने पर यही सोचती हूँ, उस झाग से पहले रही किस हिंस्र आग को बेदम करने कैसे दमकल आए रहे होंगे..... हुआहुह.....
सोचते समय दूर देश, अपने कस्बापुर का वह दिन मेरे दिमाग़ में कौंध जाता है.....
“चलें क्या?” गोलघर के मालिक के बीमार बेटे सुहास का काम निपटाते ही मंजू दीदी मुझे उसके कमरे की गोल खिड़की छोड़ देने का संकेत देती हैं.
“चलिए,” झट से मैं मंजू दीदी की बगल में जा खड़ी होती हूँ. वे मेरी नहीं मेरी सौतेली माँ की बहन हैं और मेरी छोटी-सी चूक कभी भी महाविपदा का रूप ग्रहण करसकती है..... हालाँकि उस खिड़की पर खड़े रहना मुझे बहुत भाता है. वहाँ से सड़क पार रहा वह दुमंजिला मकान साफ़ दिखाई दे जाता है जिसकी दूसरी मंजिल के दो कमरे मेरेपिताने किराये पर ले रखे हैं. ऊपर की खुली छत के प्रयोग की आज्ञा समेत. अपनीदूधमुँही बच्ची को अपनी छाती से चिपकाए घर के कामकाज मेंव्यस्त मेरी सौतेली माँ इस खिड़की से बहुत भिन्न लगती हैं- एकदम सामान्य और निरीह. उसके ठीक विपरीत अपनी मृत माँ मुझे जब-जब दिखाई देती हैं, वह हँस रही होती हैं या अपने हाथ नचाकर मेरी सौतेली माँ को कोई आदेश दे रही होती हैं.....
“आप बताइए, सिस्टर,” सुहास मंजू दीदी को अपने पास आने का निमन्त्रण देता है, “आपकी यह बिल्लौरी कहती है, मेरी खिड़की से उसे भविष्य भी उतना ही साफ़ दिखाईदेता है जितना कि अतीत. यह सम्भव है क्या?”
“मुझे वर्तमान से थोड़ी फुरसत मिले तो मैं भी अतीत या भविष्य की तरफ़ ध्यान दूँ.” मंजू दीदी को सुहास का मुझसे हेलमेल तनिक पसन्द नहीं, “जिन लोगों के पास फुरसत-ही-फुरसत है, वही निराली झाँकियाँ देखें......”
“फुरसत की बात मैं नहीं जानता,” सुहास हँस पड़ा है, “लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ, वर्तमान से आगे या पीछे पहुँचना असम्भव है और इसीलिए आपकी बिल्लौरी को अपने वर्त्तमान में पूरी तरह सरक आना चाहिए.....”
“बुद्धितो इसी बात में है.” मंजू दीदी मुझे घूरती हैं.
“तुम्हें अपने वर्तमान को अनुभवों से भर लेना चाहिए.” सुहास मेरी ओर देखकर मुस्कराता है, “चूँकि तुम्हारे पास नये अनुभवों की कमी है, इसलिए तुम आने वाले अनुभवों का मनगढ़नत पूर्व धारण करती हो या फिर बीत चुके अनुभवों का पुनर्धारण. तुम्हें केवल अपने वर्तमान को भरना चाहिए.”
“वर्तमान?” घबराकर मैं अपनी आँखें मंजू दीदी के चेहरे पर गड़ा लेती हूँ. मेरा वर्तमान? खिड़की के उस तरफ़ एक भीषण रणक्षेत्र? और इस तरफ़ एक तलाकशुदा छब्बीस वर्षीय रईसजादे के साथ एक कच्चा रिश्ता? दोनों तरफ़ एक ढीठ अँधेरा?

पुरानी फाँक


“चलें?” मंजू दीदी समापक मुद्रा से अपने हाथ का झोला मेरी ओर बढ़ा देती हैं. मैं उसे तत्काल अपनी बाँहों में ला सँभालती हूँ. उनके झोले में लम्बेदस्तानोंऔर ब्लडप्रेशरकफ़ के अतिरिक्त स्टेथोस्कोप भी रहता है. वे सरकारी अस्पताल में सीनियर नर्स हैं और अपने ख़ाली समय में सुहास के पास कई सप्ताह से आ रही हैं. अपनी सहायता के लिए वे मुझे भी अपने साथ रखती हैं.
“कलयहबिल्लौरी गोलघर नहीं जाएगी.” मंजू दीदी आते ही बहन के सामने घोषणा करती हैं, “वहाँ मेरा काम बँटाने के बजाय मेरा ध्यान बटा देती है.....”
“कहाँ?” मैं तत्काल प्रतिवाद करती हूँ, “बिस्तर मैं बदलती हूँ. स्पंज मैं तैयार करती हूँ. तौलिए मैं भिगोती हूँ, मैं निचोड़ती हूँ.....”
सुहासका काम करना मुझे भाता है. वैसेउसकीपलुयूरिसी अब अपने उतार पर है. उसके फेफड़ों को आड़ देने वाली उसकी पलुअर कैविटी, झिल्लीदार कोटरिका, में जमा हो चुके बहाव को निकालने के लिए जो कैथीटर ट्यूब, नाल-शलाका, उसकी छाती में फिट कर दी गयी थी, उसे अब हटाया जा चुका है. उसकी छाती और गरदन का दर्द भी लगभग लोप हो रहा है. उसकी साँस की तेज़ी और क्रेकल ध्वनि मन्द पड़ रही है और बुखार भी अब नहीं चढ़ रहा.
“समझ ले!” मेरी सौतेली माँ मुझसे जब भी कोई बात कहती हैं तो इन्हीं दो शब्दों से शुरू करती हैं, “मंजू का कहा-बेकहा जिस दिन भी करेगी उस दिन तेरा एक टाइम का खाना बन्द.....”
“मैंउनका कहा हमेशा सुनती हूँ.” सोलह वर्ष की अपनी इस आयु में मुझे भूख़ बहुत लगती है, “आगे भी सुनती रहूँगी.”
“ठीक है.” मंजू दीदी अपनी बहन की गोदी में खेल रही उनकी बच्ची को मेरे कन्धे से ला चिपकाती है, “इसे थोड़ा टहला ला. छत पर ताज़ी हवा खिला ला.”
माँ से अलग किए जाने पर आठ माह की बच्ची ज़ोर-ज़ोर से रोने लगती है.
“मेरे पास खेलेगी?” मेरी सौतेली माँ उसकी ओर हाथ बढ़ाती हैं. अपनी बेटी को वे बहुत प्यार करती हैं.
“अबछोड़िए भी.” मंजू दीदी उन्हें घुड़क देती हैं, “कुछ पल तो चैन की साँस ले लिया करें.....”
“समझले,” मेरी सौतेली माँ अपने हाथ लौटा ले जाती हैं, “इसे अपने कन्धे से तूने छिन भर के लिए भी अलग किया तो मुझसे बुरा कोई न होगा.”
उनकी आवाज़ में धमकी है.
बच्ची और ज़ोर से रोने लगती है. उसके साथ मैं छत पर आ जाती हूँ.
उसे चुप कराने के मैंने अपने ही तरीक़े ख़ोज रखे हैं.
कभीमैंउसेऊपर उछालती हूँ तो वह अपने से खुली हवा में अपने को अकेली पाकर चुप हो जाती है..... याफिरउसकेसाथ-साथ जब मैं भीअपना गला फाड़कर रोने का नाटककरती हूँ तो वह मेरी ऊँची आवाज़ से डरकर अपना रोना बन्द कर दिया करती है, लेकिन उस दिन मेरे ये दोनों कौशल नाक़ाम रहते हैं......
तभीमेरी निगाह सुहास की गोल खिड़की पर पड़ती है.
सुहास अपनी खिड़की पर खड़ा हमें निहार रहा है.
“उधर वह राजकुमार खड़ा है.” बच्ची का ध्यान मैं सुहास की ओर बँटाना चाहती हूँ, “उसका घर देखो. अपने व्यास से ऊँचा है. गोल है. जाओगी वहाँ?” मैं मुडेर पर जा पहुँचती हूँ.
उसका हाथ पकड़कर मैंने सुहास की दिशा में अपना हाथ लहराया है.
जवाब में सुहास भी अपना हाथ लहरा रहा है.
“जाओगी वहाँ?” बच्चीकी दोनों बगलों को अपने हाथों में थामकर मैं उसे सुहास की दिशा में लहरा देती हूँ.

पुरानी फाँक

तभी मेरी निगाह उस पतंग पर जा टिकती है जो बच्ची से आ टकरायी है.....
पतंग की डोर से उसे बचाने के लिए मैं पतंग पर झपटती हूँ. बच्ची मेरे हाथ से फ़िसल ली है.....
पतंग जिस फुर्ती से आयी रही, उसी फुर्ती से लोप भी हो लेती है.
मानो वह केवल उस बच्ची को मेरे हाथों से अलग करने के वास्ते ही आयी हो!
मेरे हाथ ख़ाली हैं अब. बच्ची नीचे सड़क पर गिर गयी है.
एक दहल मेरे कलेजे में आन दाख़िल हुई है..... मैं अब भूखी मर जाऊँगी, मेरी सौतेलीमाँ अपनी बेटी को मेरे हाथों गँवाने की मुझे बहुत बड़ी सजा देगी. क्यों न मैं नीचे कूद पडूँ? ज़्यादा से ज़्यादा पैर की दो-एक हड्डी ही तो टूटेंगी, पलस्तर चढ़ेगा भीतो उतर भी जाएगा......
छत से मैं सड़क पर फाँदती हूँ.
लेकिन खुली हवा मुझसे टकराते ही मुझे अपने कब्ज़े में ले लेती है.....
मेरी देह को कलाबाजिया खिलाती हुई वह हवा सड़क पर पहले मेरा सिर उतारती है.....
धब-धब! फिर धम्म से मेरी कुहनियाँ और मेरे घुटने..... चरम पीड़ा की उस स्थिति मेंभी मेरे कान उस खलबली का पीछा करते हैं जिसके तहत अजनबी आवाज़ों को चीरती हुई मेरी सौतेली माँ चीख़ रही है, “मेरीबच्ची को बचाओ. मेरी बच्ची को, बच्ची को बचाओ.....”
घायल बच्ची के साथ मुझे भी पास के एक डॉक्टर के क्लीनिक पर पहुँचाया जा रहा है, एक मोटरकार में लिटाकर.....
मेरेपिता भी उस भीड़ में आ शामिल हुए हैं और पूछ रहे हैं, “क्या हुआ?”
“क्या बताऊँ क्या हुआ?” मेरी सौतेली माँ विलाप कर रही हैं, “आपकी बेटी ने मेरी बच्ची की जान ले ली.....”
“मुझसे भयंकर भूल हुई,” मंजू दीदी कहती हैं, “जानती थी मैं, बिल्लौरी यह लड़की चुड़ैलहै, फिर भी इसके हाथ अपनी बच्ची सुपुर्द कर दी......”
“कब?” मेरे पिता अपने अनिश्चित स्वर में पूछते हैं.
शायद वे निर्णय नहीं कर पा रहे हैं. इस समय उन्हें मेरे प्रति उबल रहे उन दो बहनों के क्रोध का पक्ष लेना चाहिए या अकेली, घायल अपनी बड़ी बेटी का. मेरे पिता को कोई भी असामान्य स्थिति हतबुद्धि कर दिया करती है और उनकी किंकर्तव्यविमूढ़ता दूसरों को भौंचक. दो वर्ष पहले हुई मेरी माँ की मृत्यु के बाद अपनी दूसरी शादी रचाने में उन्होंने तनिक देरी नहीं की है और तब से मुझे उनसे विपरीत संकेतमिलने शुरू हो लिये हैं. एक ही समय पर अब वे कई रूप धारण करने लगे हैं. उनका एक रूप यदि नयी पत्नी से रसीले प्रेम का स्वाग रचाता है और दूसरा मंजू दीदी से इश्क़बाज़ी करने का ढोंग तो तीसरा मुझ पर स्नेह उड़ेलने का दावेदार रहा करता है. लहरदार अपने हरेक रूप को स्थापित करने में वे इतने उलझे रहतेहैं कि उनका ध्यान हमारी उत्तरकारी बाहरी प्रतिक्रिया के आगे कभी जाता ही नहीं है. उनका नाटक जहाँ मेरे अन्दर तीख़ा संक्षोभ जगाता है तोवहीं साझा लगारही वे बहनें उनकी पीठ पीछे उनके दुस्साहसी अभिनय को आपस में बाँटा करती हैं. खींसे निकाल-निकालकर!
“अच्छी-भली मेरी बच्ची मेरी गोद में खेल रही थी.” मेरी सौतेली माँ चीख़ रही है, “हाय अब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? अब यह खेल क्यों नहीं रही?”
“मुझे अफ़सोस है.” शायद यह आवाज़ डॉक्टर की है, “यह बच्ची निष्प्राण हो चुकी है. लेकिन आपकी बड़ी बेटी का केस ज़रूर गुंजाइश रखता है. इसे आप फ़ौरन अस्पताल ले जाइए. इतने लहू का बह जाना ठीक नहीं. इसके सिर और पैर दरक गये हैं.”
“सुहास!” मैं कराहती हूँ.....
छतसे मुझे नीचे कूदते हुए उसने मुझे देखा होगा..... उसे याद होगा अभी कुछ हीसमय पहले उसकी खिड़की में खड़ी होने पर मैंने उसे बताया था कि अभी-अभी मैंने अपने मकान की छत से अपने आपको नीचे गिरते हुए देखा है.....
“सुहास!” मैं फिर पुकारती हूँ.
इसभीड़ में क्या वह कहीं नहीं है?
कस्बापुर में एक ही अस्पताल है. मंजू दीदी वाला सरकारी अस्पताल.
मुझे अस्पताल मेरे पिता पहुँचाते हैं.
अस्पताल से उनका परिचय पुराना है. मेरी माँ ने कुल जमा छत्तीस साल की अपनी उम्र के आख़िरी दस दिन यहीं गुज़ारे थे, बुखार में. मंजू दीदी से मेरे पिता की भेंट भी इसी सिलसिले में हुई थी.
अस्पताल में उन दो बहनों की लानत-मलामत और अपनी भूख़-प्यास से भी ज़्यादा मुझेसुहास से बिछोह खलता है..... अपने स्कूल सेछेंकाव खटकता है.
फिर एक दिन मेरे पिता मेरे स्कूल के बस्ते और मेरे निजी सामान के झोले के साथमुझे अस्पताल से छुट्टी दिलाते हैं और सीधे लखनऊ की गाड़ी से मुझे यहाँ मेरे मामा के पास छोड़ जाते हैं.....
फलतः कस्बापुर मुझसे छूट गया है और मामी की टहलक़दमीशुरू हो गयी है..... ईश्वर की कृपा से उनके चार बेटे ही बेटे हैं, और फिर मुझसे बड़े भी. उन्हें टहलाने से इसलिए इधर बची हूँ.
एक बात और.....
इधर लखनऊ में मुझे कोई भी ‘बिल्लौरी’ नाम से नहीं पुकारता.....
मेरे पिता कीतरह मुझे उषा ही के नाम से जानते-पहचानते हैं.

दीपक शर्मा 

लेखिका -दीपक शर्मा


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