Top News

Only for Admin

सुरक्षा


  फ्रीज के दरवाजे के अंदरूनी रैक पर एक पारदर्शाी डब्बे में बेहद मंहगा खजूर रखा हुआ था। दरवाजा खोलते वक्त वह दिख जाता तो मैं दो-चार अदद खा लेता। पत्नी भी अक्सर ऐसा ही कर लेती थी। मगर फ्रीज के निचले ड्रावर से सब्जियां निकालते वक्त कामवाली की नजर रैक पर पड़ जाती तो वह अपने बच्चे के लिए एक-दो अदद खजूर मांगने से नहीं हिचकती। मुझे या पत्नी को मजबूरन एक-दो अदद खजूर देना पड़ता।

   मांगने की यह अप्रिय घटना हर दूसरे-तीसरे दिन घटित हो जाती। हमें यह बुरा लगता था। आखिर एक दिन पत्नी ने खजूर के उस डब्बे को फ्रीज के बिलकुल पीछे के स्थान पर छुपा कर रख दिया। अब फ्रीज खोलते वक्त खजूर नहीं दिखता तो हम उसे खाना भूल जाते। पत्नी भी भूल जाती। देखते-देखते दो माह निकल गए।

   एक दिन अचानक पत्नी को खजूर का खयाल आया। उसने खजूर फौरन बाहर निकाला। खजूर खराब हो चुका था और उससे बदबू छूट रही थी। उसे फेंकने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। पत्नी खजूर लेकर डस्टबीन की तरफ बढ़ी। मैंने यह देखा तो कहा, ‘‘खजूर के कुछ पीस कामवाली को देने पर हमें मलाल होता था। मगर अब इन्हें फेंकने पर क्या मलाल नहीं हो रहा ?’’


   पत्नी ने स्वीकार किया और कहा, ‘‘हां, कसक तो हो रही है।’’
   इसपर मैंने पूछा, ‘‘अब आगे से क्या करोगी ?’’
   पत्नी ने विश्वास भरे स्वर में कहा, ‘‘कोई कारगर उपाय जरूर करूंगी।’’
   कुछ दिन बाद पत्नी दूसरा खजूर ले आई। मैंने पूछा, ‘‘खजूर कहां रखा है ?’’
   उसने कहा, ‘‘बस वहीं। फ्रीज के दरवाजे के भीतरी रैक पर ही।’’
   मैंने पूछा, ‘‘मगर मुझे दिखा नहीं।’’

   पत्नी ने आंखों में चतुराई भरकर कहा, ‘‘अरे, धीरे बोलो। मैंने इस बार उसे एक काले रंग के डब्बे में छुपाकर रखा है। कामवाली समझ नहीं पाएगी। तुम याद कर चुपके से खा लिया करना।’’
   जहां देश के सैनिक बिना सुरक्षा के सीमा पर सीना तानकर रहते हैं, वहीं महज खजूर की रक्षा के लिए की गयी इस चालाक व्यवस्था पर मैं भौंचक रह गया। 
   
                                                  -ज्ञानदेव मुकेश                         
                                   
                                                न्यू पाटलिपुत्र काॅलोनी, 
                                                पटना-800013 (बिहार)
                                               
लेखक -ज्ञानदेव मुकेश



यह भी पढ़ें .........


श्राद्ध की पूड़ी

मजबूरी

नीम का पेड़

आपको लघु कथा   " सुरक्षा कैसी लगी   | अपनी राय अवश्य व्यक्त करें हमारा फेसबुक पेज लाइक करें अगर आपको "अटूट बंधन " की रचनाएँ पसंद आती हैं तो कृपया हमारा  फ्री इ मेल लैटर सबस्क्राइब कराये ताकि हम "अटूट बंधन"की लेटेस्ट  पोस्ट सीधे आपके इ मेल पर भेज सकें 

filed under -
story, hindi story, emotional hindi story, short story
भनक


टिनीटस एक बीमारी है जिसमें कानों में अजीब अजीब सी आवाजें आती हैं | ऐसा कान का पर्दा सूज जाने के कारण होता है | आम भाषा में इसे काम का भनभनाना भी कहते हैं | क्या किसी को भविष्य की भनभनाहट भी सुनाई देती है | पढ़िए वरिष्ठ लेखिका दीपक शर्मा जी की कहानी ...

भनक 


नहीं, बीणा को नहीं मालूम रहा.....
जब भी उसकी बायीं दिशा से कोई कर्णभेदी कोलाहल उसके पास ठकठकाता और वह अपने बाएँ कान को ढँक लेती तो उसके दाएँ कान के परदे पर एक साँय-साँय क्यों चक्कर काटने लगती? अन्दर ही अन्दर! मन्द और मद्धम!
कभी पास आ रही किसी मधुमक्खी की तरह गुँजारती हुई..... 
तो कभी दूर जा रही किसी चिखौनी की तरह चहचहाती हुई.
नहीं, बीणा को नहीं मालूम रहा-
उसके विवाह के तदनन्तर वह साँय-साँय उसके अन्दर से आने की बजाय अब बाहर से क्यों धपकने लगी थी? तेज़ और तूफ़ानी!
मानो कोई खुपिया बाघ अपनी ख़ोर से निकलकर उसकी ओर एकदिश धारा में अब लपका, तब लपका.

उस समय भी लोको कॉलोनी के उस क्वार्टर में जैसे ही किसी एक सुपर-फ़ास्ट ट्रेन की तड़ातड़ तड़तड़ाहट ने उसे अपने बाएँ कान को अपने हाथ से ढँकने पर मजबूर कर रखा था और उसका दाहिना कान उस जान्तव चाप की चपेट में था जब उसके जेठ उसके मायके से आए एक टेलीफ़ोन-सन्देश की सूचना देने अपने लोको वर्कशॉप से उस लोको क्वार्टर पर दोपहर में आए थे : बीणा की माँ अस्पताल में दाख़िल है. पिछले दस घंटे में उसे होश नहीं आया है. बीणा के मायके वाले बीणा को बुला रहे हैं.
तुम हमारे काम की चिन्ता न करो,” जेठानी ने उदारता दिखाई थी, “कौन जाने तुम्हें फिर अपनी माँ देखने को मिले, न मिले. तुम मायके हो आओ.....
बीणा और उसके पति को उसके जेठ-जेठानी ने अपने क्वार्टर का छोटा कमरा दे रखा था. बीणा के पति पिछले दो साल से रेलवे की भरती के इम्तिहान में बैठते रहे थे और फ़ेल हो जाते रहे थे. पैसे की तंगी को देखते हुए फिर पिछले साल उनकी शादी बीणा से कर दी गई थी ताकि घर में टेलीविज़न और स्कूटर जुटाया जा सके. बीणा अपने पाँच भाइयों की अकेली बहन थी और उसके बप्पा अभी डेढ़ वर्ष पहले ही एक सरकारी दफ़्तर की अपनी चालीस साल की ड्राइवरी से सेवानिवृत्त हुए थे. बीणा की माँ ने लोको कॉलोनी के उस क्वार्टर को रेलगाड़ियों की निरन्तर आवाजाही की धमक से पल-पल थरथराते हुए जब देखा था तो पति से विनती कर बैठी थी, ‘लड़की को इधर न ब्याहिए. रेलगाड़ियों की यह गड़गड़ाहट, लड़की का बाँया कान भी बहरा कर देगी.मगर बप्पा को लड़के की बी.ए. की डिग्री चकाचौंध कर देने में सक्षम रही थी और उन्हें दृढ़ विश्वास था कि वह डिग्री किसी रोज़ उनके दामाद को रेलवे क्लर्की ज़रूर दिला देगी.

कौन?” एमरजेन्सी वार्ड के सत्ताइस नम्बर बेड से माँ बुदबुदाईं.
जूजू,” कहते-कहते बीणा ने अपनी ज़ुबान अपने तालू से चिपका ली.
जूजूउसकी ख़रमस्ती का नाम था जो दस वर्ष पहले एक तपती दोपहरी में उसने माँ के साथ खेलते समय अपने लिए रखा था. उस दोपहर के सन्नाटे में जिस समय बप्पा अपनी ड्यूटी पर रहे और चटाई पर भाई सोए रहे, बीणा की बाँह अपनी गरदन से अलग कर माँ उठ ली थीं. इस भ्रम में कि बीणा भी सो रही थी. लेकिन बीणा जाग रही थी और उसने माँ का पीछा किया था और माँ उसे घर की बरसाती में मिली थीं. हिचकियाँ लेकर सुबकती हुईं. वह अपना मुख उनके कान के पास ले गई थी और आँधी बनकर उसमें हवा फूँकने लगी थी.कौन है?’ चौंककर माँ ने सिसकना छोड़ दिया था.जूजूकहकर बीणा माँ से लिपट ली थी.चल हट’, माँ हँस पड़ी थीं, ‘कैसे डरा दिया मुझे?’ बीणा ने अपनी बाँह माँ की गरदन पर फिर जा टिकाई थी :और तुम जो हरदम डराती रहती हो? जूजू आया, जूजू आया?’ उनके छह भाई-बहनों को अपनी बात मनवाने हेतु माँ अक्सरजूजूका हवाला दिया करती थीं. हँस रही माँ अकस्मात् रोने लगी थीं. ऐसा अक्सर होता था. माँ जब भी हँसतीं, बीच में ही अपनी हँसी रोक कर रोने लगतीं. बीणा के पूछने पर कहतीं, ‘चल हट. मैं रोई कब रही? ये आँसू तो हँसी के बढ़ जाने से आए रहे.
वह चुप हो जाती.

कौन?” माँ के होंठ फिर हिले और एक कम्पन उन्हें झकझोर गया.
माँ की बेहोशी का यह चालीसवाँ घंटा था.
बीणा ने माँ का हाथ पकड़ लिया.
उसके दोनों कान एक साथ बज रहे थे.
चलन के विरुद्ध.
आहट पीछे से नहीं सामने से आ रही थी. चरपरी और तीक्ष्ण.
कड़ी और कठोर.
दुरारोह और दुर्बोध.
आगे ही आगे बढ़ती हुई.
माँ के बराबर आ पहुँचने.
नहीं, नहीं,” बीणा ने डरकर अपनी आँखें बन्द कर लीं.
माँ ने बचपन में उसे जो यमराज की कहानी सुनाई थी वही यमराज अपने उस रूप में सामने खड़े थे.....
सुर्ख़ परिधान में.....
लाल आँखें लिए.....
भैंसे पर सवार.....
हाथ में मृत्युफंदा.....
गदा पर कपाल.....
चार-चार आँखों वाले दो कुत्ते भी उसे दिखाई दिए जो माँ के कहे अनुसार यमराजपुरी के प्रवेशद्वार पर पहरा दिया करते थे.....
नहीं, नहीं, नहीं,” अपनी पूरी ताक़त के साथ बीणा ने मृत्युदेव से प्रार्थना की, “दक्षिण दिशा के दिक्पाल, मानव जाति के इतिहास के प्रथम पुरुष, हे मृत्युदेव, मेरी माँ की मृत्यु टाल जाइए. बदले में मुझे ले जाइए, मुझे ले जाइए.....
एमरजेन्सी वार्ड के काउन्टर पर तैनात दोनों डॉक्टरों और चारों नर्सों ने बीणा को सत्ताइस नम्बर बेड पर लुढ़कते हुए देखा तो तत्काल उधर लपक लिए.
कौन?” बीणा की माँ को एक दूसरा कम्पन दुगुने वेग से झकझोर गया और उनकी बेहोशी टूट गई.
मरते-मरते वे जी उठीं.

भनक

एमरजेन्सी वार्ड के स्टाफ ने शीघ्र ही बीणा के लिए एक दूसरे बेड की व्यवस्था कर दी और उन्हीं के चेकअप के दौरान बीणा को मालूम हुआ उस रोग का नाम टिनाइटस था जिसके अन्तर्गत उसके बाएँ कान का परदा भी उसके दाहिने कान के परदे की तरह पूरा-पूरा सूज गया था और इसीलिए पथ से हटकर विसामान्य ध्वनियाँ सुनने लगा था.

आजकल बीणा के दोनों कानों का इलाज चल रहा है..... लेकिन क्या है कि ठीक ध्वनियाँ पकड़ते-पकड़ते अचानक जिस समय वह जेठ-जेठानी के घर पर कमरे बुहार रही होती है या बरतन माँज रही होती है या कपड़े धो रही होती है या चपातियाँ सेंक रही होती है या जेठ-जेठानी के ज़िद्दी बच्चों को पुचकार रही होती है या रात के घुप अँधेरे में पति की बगल में होती है खुपिया वह बाघ डकारता-डकारता उसके समीप पहुँचने लगता है : धप, धप, धप.
कहीं वह दक्षिण क्षेत्र का यावना तो नहीं? अथाह और गूढ़?

दीपक शर्मा 
लेखिका -दीपक शर्मा

यह भी पढ़ें ...










आपको कहानी  भनक  " कैसा लगा  | अपनी राय अवश्य व्यक्त करें | हमारा फेसबुक पेज लाइक करें | अगर आपको "अटूट बंधन " की रचनाएँ पसंद आती हैं तो कृपया हमारा  फ्री इ मेल लैटर सबस्क्राइब कराये ताकि हम "अटूट बंधन"की लेटेस्ट  पोस्ट सीधे आपके इ मेल पर भेज सकें

filed under -
story, hindi story, emotional hindi , bhanak




लिट्टी-चोखा व् अन्य कहानियाँ –धीमी आंच में पकी स्वादिष्ट कहानियाँ


आज मैं आप के साथ बात करुँगी गीताश्री जी के नए कहानी संग्रह लिट्टी-चोखा के बारे में | लिट्टी-चोखा बिहार का एक स्वादिष्ट व्यंजन है | किसी कहानी संग्रह का नाम उस पर रख देना चौंकाता है | लेकिन गौर करें तो दोनों में बहुत समानता है | एक अच्छी कहानी से भी वही तृप्ति  मिलती है जो लिट्टी- चोखा खाने से | एक शरीर का भोजन है और एक मन का | और इस मन पर  पर तरह –तरह की संवेदनाओं के स्वाद का असर ऐसा पड़ता है कि देर तक नशा छाया रहता है | जिस तरह से धीमी आंच पर पकी लिट्टी ही ज्यादा स्वादिष्ट होती है वैसे ही कहानियाँ भी, जिसमें लेखक पूरी तरह से डूब कर मन की अंगीठी  में भावनाओं को हौले –हौले से सेंक कर पकाता है | गीताश्री जी ने इस कहानी संग्रह में पूरी ऐतिहात बरती है कि एक –एक कहानी धीमी आंच पर पके | इसलिए इनका स्वाद उभरकर आया है |



ये नाम इतना खूबसूरत और लोक से जुड़ा है कि इसके ट्रेंड सेटर बन जाने की पूरी सम्भावना है | हो  सकता है आगे हमें दाल –बाटी, कढ़ी, रसाजें, सरसों का साग आदि नाम के नाम कहानी संग्रह पढने को मिलें | इसका पूरा श्रेय गीताश्री जी और राजपाल एंड संस को जाना चाहिए | कहानीकारों से आग्रह है कि वो भारतीय व्यंजनों को ही वरीयता दें | मैगी, नूडल्स, पिजा, पास्ता हमारे भारतीय मानस के अनकूल नहीं | ना ही इनके स्वाद में वो अनोखापन होगा जो धीमी आँच में पकने से आता है | भविष्य के कहानी संग्रहो के नामों की खोज पर विराम लगाते हुए बात करते हैं लिट्टी –चोखा की थाली यानि कवर पेज की | कवर पेज की मधुबनी पेंटिंग सहज ही आकर्षित करती है | इसमें बीजना डुलाती हुई स्त्री है | सर पर घूँघट. नाक में नाथ माथे पर बिंदिया | देर तक चूल्हे की आंच के सामने बैठ सबकी अपेक्षाओं पर खरी उतरने वाली, फुरसत के दो पलों में खुद पर बीजना झल उसकी बयार में सुस्ता रही है | शायद कोई लोकगीत गा रही हो | यही तो है हमारा लोक, हमारा असली भारत जिसे सामने लाना भी साहित्यकारों का फर्ज है | यहाँ ये फर्ज गीताश्री जी ने निभाया है |


गीताश्री जी लंबे अरसे तक पत्रकार रहीं हैं, दिल्ली में रहीं हैं |  लेकिन उनके अन्दर लोक बसता है | चाहें बात ‘हसीनाबाद’ की हो या ‘लेडीज सर्किल’ की, यह बात प्रखरता से उभर कर आती है | शायद यही कारण है कि पत्रकारिता की कठोर जीवन शैली और दिल्ली निवास के बावजूद उनके अंदर सहृदयता का झरना प्रवाहमान है | मैंने उनके अंदर सदा एक सहृदय स्त्री देखी है जो बिना अपने नफा –नुक्सान का गणित लगाए दूसरी स्त्रियों का भी हाथ थाम कर आगे बढ़ाने  में विश्वास रखती हैं | साहित्य जगत में यह गुण बहुत कम लोगों में मिलता है | क्योंकि मैंने उन्हें काफी पढ़ा है इसलिए यह दावे के साथ कह सकती हूँ कि उन्होंने लोक और शहरी जीवन दोनों ध्रुवों को उतनी ही गहनता से संभाल रखा है | ऐसा इसलिए कि वो लंबे समय से दिल्ली में रहीं हैं | बहुत यात्राएं करती हैं | इसलिए शहर हो या गाँव हर स्त्री के मन को वो खंगाल लेती है | सात पर्दों के नीचे छिपे दर्द को बयान कर देती हैं |जब वो स्त्री पर लिखती हैं या बोलती हैं तो ऐसा लगता है कि वो हर स्त्री के मन की बात कह रही हैं | उनके शब्द बहुत धारदार होते हैं जो चेहरे की किताबों के अध्यन से व गहराई में अपने मन में उतरने से आते हैं | उनकी रचनाओं में बोलते पात्र हैं पर वहाँ हर स्त्री का अक्स नज़र आता है | यही बात है की उनकी कहानियों में स्त्री पात्र मुख्य होते हैं | हालांकि वो केवल स्त्री पर ही नहीं लिखती वो निरंतर अपनी रेंज का विस्तार करती हैं | भूतों पर लिखी गयी ‘भूत –खेला ‘इसी का उदाहरण है | अभी वो पत्रकारिता पर एक उपन्यास ‘वाया  मीडिया’ ला रही हैं | उनकी रेंज देखकर लगता है कि उन्हें कहानियाँ ढूँढनी नहीं पड़ती | वो उनके अन्दर किसी स्वर्णिम संदूक में रखी हुई हैं | जबी उन्हें जरूरत होती है उसे जरा सा हिला कर कुछ चुन लेती हैं और उसी से बन जाता है उनकी रचना का एक नया संसार | वो निरंतर लिख कर साहित्य को समृद्ध कर रही हैं | एक पाठक के तौर मुझे उनकी कलम से  अभी और भी बहुत से नए विषयों की , नयी कहानियों की, उपन्यासों की प्रतीक्षा है |

लिट्टी-चोखा व् अन्य कहानियाँ –धीमी आंच में पकी स्वादिष्ट कहानियाँ   



लेखिका गीताश्री



“लिट्टी-चोखा” कहानी संग्रह में गीताश्री जी दस कहानियाँ लेकर आई हैं | कुछ कहानियाँ अतीत से लायी हैं जहाँ उन्होंने झाड़ पोछ कर साफ़ करके प्रस्तुत किया है | कुछ वर्तमान की है तो कुछ अतीत और वर्तमान को किसी सेतु की तरह जोडती हुई | तिरहुत मिथिला का समाज वहाँ  की बोली, सामाजिकता, जीवन शैली और लोक गीत उनकी कहानियों में सहज ही स्थान पा गए हैं | शहर में आ कर बसे पात्रों में विस्थापन की पीड़ा झलक रही है | इन कहानियों में कलाकार पमपम तिवारी व् राजा बाबू हैं, कस्बाई प्रेमी को छोड़कर शहर में बसी नीलू कुमारी है , एक दूसरे की भाषा ना जानने वाले प्रेमी अरुण और जयंती हैंअपने बल सखा को ढूँढती रम्या है और इन सब के बीच सबसे अलग फिर भी मोती सी चमकती कहानी गंध-मुक्ति है | एक खास बात इस संग्रह किये है कि गीताश्री जी ने इसमें शिल्प में बहुत प्रयोग किये हैं जो बहुत आकर्षक लग रहे हैं | जो लगातार उन्हें पढ़ते आ रहे हैं उन्हें यहाँ उनकी कहन शैली और शिल्प एक खूबसूरत बदलाव नज़र आएगा |


अक्सर मैं किसी कहानी संग्रह पर लिखने की शुरुआत उस कहानी से करती हूँ जो मुझे सबसे ज्यादा पसंद आई होती है |  पर इस बार दो कहानियों के बीच में मेरा मन फँस गया | ये कहानियाँ हैं  “नजरा गईली गुइंयाँ” व् “गंध मुक्ति”| बहुत देर सोचने के बाद शुरुआत मैं गंध मुक्ति  से कर रही हूँ | ये एक ऐसी कहानी है जिसकी गंध बहुत देर तक जेहन पर छायी रहेगी |



रूप, रस, श्रुति, स्पर्श और गंध ..हमारा पूरा जीवन अपने समस्त ज्ञान, समस्त स्मरण के लिए इन पांच माध्यमों पर ही निर्भर है | हम सब की एक गंध होती है | हर घर की एक खास गंध होती है जो दूसरे घर की गंध से अलग होती है | कितनी चीजों  को आँख बंद करके हम उनकी गंध से पह्चान लेते हैं ...ये पुष्प है , ये कोई स्वादिष्ट भोजन है, ये तेल है ये घी है और ये.... कैरोसीन | जीवन में तरह तरह की गंध होती है पर अनिम गंध होती है मृत्यु गंध | इन सबसे इतर  क्या कोई ऐसी भी गंध होती है जो खींचती है, जिसे हम पहचानते हुए भी नहीं पहचानते हैं ...ये होती है विस्मृत स्मृति की गंध | यहाँ खुलते हैं मानव मन के अवचेतन के कई रहस्य | अवचेतन यानि की स्टोर रूम | जहाँ हर देखी, सुनी, पढ़ी बात दर्ज होती रहती है , हम चाहे या ना चाहें | हमारी चेतना के  मष्तिष्क  से इसका कोई संबंध  नहीं होता | हम चाह  कर वहाँ हाथ डालकर कुछ नहीं निकाल सकते | परन्तु अनचाहे कुछ अस्पष्ट  सा अचानक सामने आ जाता है | पूरा स्वप्न विज्ञान इसी पर आधारित है | पूरा मनोविज्ञान इसी की पड़ताल करता है | आज के ज़माने में लोकप्रिय self_healing इसी की गहराई में उतरने का नाम है | सत्य ये है कि जो दिखायी देता है वो हमेशा सच नहीं होता | मानव मन की कई लेयर्स होती है | जिन्दगी उन्हीं लेयर्स में कई बार फंस कर रह जाती है | उनमें कैद होती है कोई गंध |  अफ़सोस साहित्य में इसकी गंध बहुत कम है | इस कहानी को रचते हुए गीताश्री इसकी गहन पड़ताल करती हैं और ले आती हैं गंधमुक्ति | ये कहानी अवचेतन की गांठों को खोलने की कोशिश करती एक ऐसी लड़की सपना की कहानी है जिसे एक अजीब सी गंध परेशान  करती है ...एक तेज तीखी गंध | इसलिए वो हर तेज गंध से भागती है | एक गंध है, एक धुएं की लकीर और बहुत कुछ अनकहा | उसके आस –पास कोई तेज परफ्यूम भी लगा ले तो वो बेचैन हो जाती है | वो गंध को पकड़ने के लिए उसके पीछे चुम्बक की तरह खिंची चली जाती है पर हर बार वो गंध उसे कुछ दूर ले जाकर अतृप्त सा छोड़कर अस्पष्ट हो जाती है |



सपना  जिसकी माँ की बचपन में ही मृत्यु हो चुकी है | जिसकी सौतेली माँ और पिता ने उसे उसे अपने पास रखने से इनकार कर दिया है | चाचा-चाची के पास पली बढ़ी इस लड़की के लिए बहुत जरूरी है कि वो जल्दी से जल्दी अपने पैरों पर खड़ी हो जाए | पर ऐसे समय में ये गंध उसे और परेशान कर रही है | वो अपनी सहेलियों से पूछती है कि क्या उन्हें भी गंध आती है ...पर नहीं कहीं कोई गंध नहीं | फिर उसे क्यों परेशान  कर रही है ?


गंध शब्द पढ़ते ही मुझे  शेक्सपीयर के ‘मैकबेथ’ में लेडी मैकबैथ की याद आ जाती है , जो अपने हाथ बार –बार धोती है वो कहती है कि, “ अरब के सारे इत्र भी मेरे हाथों से इस गंध को नहीं निकाल सकते |” वहां उसे पता है ये हत्या की गंध है | लेकिन क्या किसी गंध के माध्यम से किसी हत्या का सुराग ढूँढा जा सकता है ? सपना मनोवैज्ञानिक के पास भी जाती है | उसको सुलझाने जो उलझ गया है | कहानी रहस्य के साथ आगे बढती है | अंत में रहस्य सुलझता है | सुलझता है दृश्य, श्रव्य, गंध का मनोविज्ञान | बेटी और मृत माँ के बीच के रहस्य को जोडती एक ऐसी गंध,  एक ऐसा दर्द जिस पर पाठक का मन भी चीत्कार कर उठेगा | हो सकता है आप संवेदना को झकझोर कर रख देती इस मार्मिक कहानी फिर से पढ़ें | अवचेतन के मनोविज्ञान पर आधारित एक बहुत ही खूबसूरत कहानी जिसका शिल्प और शैली भी उतनी ही खूबसूरत है |कहानी मन के स्तर पर चलती है इसलिए भाषा का अनावश्यक सौन्दर्यीकरण ना करके उसे बिलकुल सामान्य रखा गया है | जो मन को लुभाता है |  कहानी में नायिका को गंध से मुक्ति भले ही मिल गयी हो | पर आपके जेहन को इस कहानी की गंध से मुक्ति नहीं मिलेगी |



 “नजरा गईली गुइंयाँ” २०१८ में साहित्य आजतक में प्रकाशित हुई थी और खासी चर्चित हुई थी | ये कहानी हकपड़वा नामक ऐसी प्रथा पर प्रकाश डालती है जो अब लुप्तप्राय है | इसके कुछ वीडियो जरूर आपको यू ट्यूब पर मिल जायेंगे | इस कहानी को पढने से पहले जरूरी है  कि इस प्रथा को जान लिया जाए | हंकपड़वा बिहार में मुज्जफरपुर और उसके आस-पास के क्षेत्रों में पायी जाने वाली एक प्रथा है | इसको निभाने वाले  निम्न श्रेणी  के ब्राह्मण होते हैं जो मृत्युभोज के समय बुलाये जाते हैं | ये पहले वहां उपस्थित परिवार के लोगों की खिचाई करते हैं और फिर मृतक  का यशगान करके माहौल को ग़मगीन बना देते हैं | इसके एवज में उन्हें भारी ईनाम मिलता था | यही उनकी जीविकाका साधन है  | मुख्य रूप से ये कलाकार होते हैं  | आशु कवि | जो तुरंत कविता बनाकर सुना देते हैं  | साथ ही ये गायक भी होते हैं और तेज सुर में गाते हैं | किसी जमाने में मृतक के भोज में इनका जाना बहुत भाग्य की बात समझी जाती थी | इन्हें वहीँ धन और  मान सम्मान भी बहुत मिलता था | यही इनकी जीविका का साधन था | आर्थिक स्थिति  अच्छी होते हुए भी इनकी सामाजिक स्थिति अच्छी नहीं थी | मृत्यु भोज में गाने के कारण लोग इन्हें अपनी बेटी देने को तैयार नहीं होते थे | जैसे –जैसे भौतिकता समाज पर हावी हुई, कला और कला की कद्र घटने लगी | धीरे धीरे ये प्रथा भी लुप्तप्राय हो गयी | सुखद ये है कि आज हम अपने अतीत को खोजते हुए उनके महत्व को समझ रहे हैं और उन्हें पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहे हैं | ऐसा ही प्रयास गीताश्री जी ने अपनी कहानी में किया है |

"पर्ची पढ़ते ही उनके चेहरे का रंग उड़ गया | गोरा चेरा तपने लगा था | चेहरे की झुर्रियां कांपने लगी थीं | वो पर्ची अपनी मुट्ठी में दबाये दबाये आँगन की तरफ चले गए | ललुआ ने नोट्स किया , पैरों में जान नहीं बची थी |"


ये कहानी है हंकपड़वा के कलाकार पमपम बाबू, रिया और उसकी माँ की | नजरा गईली गुइंयाँ का अर्थ है बचपन की सखी को नज़र लग गयी | किसी समय हंकपड़वा के प्रसिद्द कलाकार रहे पमपम बाबू की ये गुइयाँ या बाल सखी है रिया की माँ | जिसके बारे में किसी को भी नहीं पता | रिया को भी नहीं | रिया की माँ वो सखी हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन पति की इच्छाओं और उनके दवाब के आगे नतमस्तक हो कर गुज़ार दिया | परन्तु वो अपनी बेटी को इन सबसे दूर रखना चाहती हैं | वो चाहती हैं कि बेटी अपनी मर्जी की जिन्दगी जी सके  | इसके लिए वो उसे स्वप्न के पंख भी देती हैं और पंख पसारने का अवसर भी | ३६ की उम्र पार कर चुकी रिया पर वो विवाह का दवाब भी नहीं बनाती | इस कारण वो अपने बेटों का विद्रोह झेलती हैं | धीरे –धीरे उनकी जिन्दगी उनके अपने ही घर की ऊपरी मंजिल पर अपनी एक सहायिका और रिया के फोन के साथ सिमिट जाती है |



रिया की माँ  की मृत्यु के बाद उनके गद्दे के नीचे रखी फ़ाइल से रिया के सामने अपनी माँ के अतीत का राज खुलता है | बालसखा पमपम तिवारी और उनकी मित्रता का राज | जिनके छोटी श्रेणी के ब्राह्मण होने के कारण ये मित्रता विवाह में नहीं बदल पायी | माँ अपने सारे सपने दफ़न करके ससुराल चली आयीं | उनसे मिलने आये पमपम तिवारी को पिता अपमानित करके निकाल देते हैं |बेटी को लिखे पात्र में माँ अपनी अंतिम इच्छा व्यक्त करती हैं कि एक बार अपमानित किये गए पमपम तिवारी को सम्मान के साथ उनके मृत्युभोज पर कविता गाने के लिए बुलाया जाए | वो अपने पिता द्वारा दी गयी जमीन भी उसके नाम कर चुकी हैं | एक मुश्किल ये है कि ये काम उसे अपने भाहियों से छुपा कर करना है | दूसरी मुश्किल ये है कि अब पमपम  बाबू हंकपड़वा का काम छोड़ चुके हैं | क्यारिय ये सब मैनेज कर पाएगी ? क्या पमपम बाबू अपनी बाल सखी को दिया वचन निभाएंगे ? ये तो आप कहानी पढ़ के जानेंगे | लेकिन ये कहानी उन कहानियों में से है जो आपको गूगल सर्च करने पर विवश करती है | एक लुप्तप्राय प्रथा को जीवित करती है | इन सब के साथ ये एक जीवत स्त्री और उसके छिपे हुए विद्रोह को भी परिभाषित करती है | एक ऐसा विद्रोह जो उसने अपनी मृत्यु के बाद अपनी सशक्त बेटी से करवाने की ठान रखी  थी | लोक की भाषा और गीत के साथ ये कहानी पूरा परिद्रश्य रचती है और पाठक के आगे उसे जीवंत कर देती है |


‘’कब ले बीती अमावस की रतियाँ “’एक ऐसी स्त्री की कहानी है जिसका पति उसे विवाह वाले दिन ही छोड़कर मणिपुर चला जाता है | वो अपनी पत्नी का मुँह भी नहीं देखता | उसे क्रोध इस बात का है कि उसकी माँ ने उससे बिना पूछे उसका विवाह क्यों कर दिया | अपनी मर्जी से अपनी जिन्दगी जीती  पितृसत्ता का प्रतीक ये सोचे बिना भी कि वो कहाँ जा रहा है बस चल देता है | बस चल देने की जितनी सुविधा पुरुष को है उतनी स्त्री को नहीं है | पत्नी उमा को मायके वाले भी नहीं अपनाते | उमा एक संघर्षशील स्त्री है | वो धीरे –धीरे अपने को शिक्षित करती है | अपने हुनर से चार पैसे और गाँव भर में इज्ज़त कमाती है | वो अपने साथ जोड़कर अन्य स्त्रियों को भी सशक्त करती है | ये कहानी उस मुक्ति की बात करती है जो एक दूसरे का हाथ थामने  से आती है | पितृसत्ता की जंजीरों को तोड़ने का एकमात्र उपाय भी शायद यही है |


अपनी दूसरी पत्नी की मृत्यु के बाद  एकाकी जीवन से त्रस्त होकर उमा को अपराधबोध के साथ नहीं हक के साथ लेने आये उसके पति के सामने रखी गयी शर्त कहानी की जान है | और छोड़कर जाने वाले पतियों के लिए एक आह्वान भी | कहानी का शिल्प बहुत ही सुंदर है | पाठक उसमें बह जाता है |



‘सुरैया की चिंता ना करो टिल्लू’ और ‘खोये सपनों का द्वीप’ , दोनों कहानियाँ उस सशक्त स्त्री को दिखाती हैं जो प्रेमी के आगे घुटने नहीं टेकतीं | दोनों के परिवेश अलग –अलग हैं | एक गाँव  की स्त्री है और  एक शहर की परन्तु दोनों ही आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं | आर्थिक स्वतंत्रता उन्हें अपने फैसले लेने का संबल देती है | पहली कहानी में जब कस्बे से शहर आया प्रेमी उस पर साथ चलने का दवाब बनाते हुए उसे देवानंद सुरैया का उदाहरण  देते हुए, माँ के कारण जीवन भर कुवारी रहने का भय दिखाता है तो दूसरी में नायका के सामने अपने प्रेमी की करतूतों का ऑनलाइन पर्दाफाश होता है |  ‘सुरैया की चिंता ना करो टिल्लू’ का शिल्प जहाँ चुटीला है वहीँ खोये सपनों का द्वीप’ का गंभीर और कलात्मक |


एक और कहानी जो अपने चुटीले  शिल्प के कारण गहरा प्रभाव उत्पन्न करती है वो है “दगाबाज रे” ये कहानी है एक सोसायटी में कमोड साफ़ करने वाले कर्मचारी बंटी कुमार की | बंटी कुमार अनपढ़ है पर उसके माता –पिता उसका विवाह उसका काम व् शिक्षा छुपा कर एक पढ़ी लिखी स्त्री से कर देते हैं | नव विवाहित पत्नी की फरमाइश है हनीमून की, अच्छे कपड़ों की,  मोबाइल पर उससे बात करने की, मायके जाने पर उसे चार चक्का गाडी में लाने की |  पर बंटी के पास तो मोबाइल ही नहीं | हो भी तो नंबर मिलाना कैसे आये ? उसकी तनख्वाह भी इतनी नहीं | फिर भी बंटी अपनी पत्नी की  नज़रों में छोटा नहीं बनना चाहता | वो मोबाइल खरीदने के लिए पैसों की जुगाड़ में सीवर में उतर जाता है, अपना काम बढ़ा देता है | पत्नी से दूर  रहते हुए रुपये जोड़ते –जोड़ते त्रस्त हुआ जा रहा है | वो कुछ रुपयों का इंतजाम करता भी है पर दोस्त ये जानकार उस भोले –भाले युवक में पितृसत्ता का अभिमान भरते हैं | और पत्नी को खुश करने वाले हाथों के आढे नाक आ जाती है |


स्वाधीन वल्लभा एक ऐसी जोड़े की कहानी है जो एक दूसरे की भाषा नहीं जानते पर प्रेम में भाषा कब आढे आती है | प्रेम  में तो परिवार आढे आता है | अरुण जानता है कि उसका परिवार उसके और नीलंती के प्रेम विवाह को स्वीकार नहीं करेगा इसलिए वो नहीं चाहता कि नीलंती उनसे मिले | प्रेम उसे भीरु बना रहा है | वहीँ नीलंती उनसे मिलने को आतुर है | दुभाषिया अथिरा के साथ वो बिहार जाती है | वहां अरुण के परिवार की शर्ते ही शर्ते हैं | दुभाषिया अथिरा  दुविधा में है | पर नीलंती  का प्रेम उसे वहां अपनी बात रखने का साहस देता है | प्रेम पुरुष को भीरु बनाता है और स्त्री को निर्भीक |अपने फैसले लेने की हिम्मत करने वाली इस स्वाधीन वल्लभा नायिका को पाठक सैल्यूट करता रह जाता है |


किताब के शीर्षक के नाम वाली कहानी यानि की लिट्टी –चोखा बचपन के स्वाद और साथ को ढूँढने की कहानी है | मुज्ज्फ्फर पुर के रामवचन दीक्षित अपना सत्तरवां जन्मदिन मना  रहे हैं | इसकेलिए उन्होंने रामधन नामक इलाके के प्रसिद्द हलवाई को बुलाया है | रामधन की हैवी बुकिंग चलती है | जिनको मिल जाए वो भाग्य सराहते हैं | रामवचन दीक्षित भाग्यवान रहे | भाषा की बानगी देखिये ...
“ “आज से औरत सभ को चूल्हा चौकी से फुर्सत ...तुम लोग मौज करो , हंसी ठिठोली करो...गीत नाद गाओ ..तीन दिन रामधन के हाथ के खाने का स्वाद लीजिये आप लोग |”



इसी जलसे में रावचन की बेटी रम्या दिल्ली से आती है और रामधन के साथ आता है राजा बाबू उर्फ़ चंदुआ | चंदुआ पेशे से तो हलवाई का काम करता है पर है कलाकार | हलवाई के काम से ज्यादा मन उसका जनान खाने में औरतों के पैरों की मालिश और अपने गीत सुनाने में लगता है | औरतों में भी वो बहुत लोकप्रिय है | रम्या के पैर दाबते हुए ऐसा गीत गाता है कि रम्य को अपने बचपन के साथ की स्मृति ताज़ा हो जाती है | ये गीत राजा बाबू को ट्रेन में एक यात्री ने सिखाया था | जैसा की मैंने पहले कहा था ये कहानी स्वाद और साथ को ढूँढने की कहानी है | कहीं न कहीं हम सब के अंदर रम्या बसती है जो बिसरे  आतीत को फिर से पा लेना चाहती है | वो उसे खंडहरों में ढूढती है, स्वाद में ढूंढती है , इन्टरनेट पर ढूंढती है | क्या ये खोज पूरी हो पाएगी | क्या हमें पता है ? शायद नहीं | इसलिए इस कहानी का अंत खुला छोड़ा गया है | आशा और निराशा के मद्य पेंडुलम सा लटकता | राजा बाबू जैसा रोचक चरित्र रचते हुए लेखिका ने कहानी के माध्यम से पूरा लोक खड़ा कर दिया है |



अंत में मैं यही कहूँगी कि राजपाल एंड संस से प्रकाशित ११२ पेज के कहानी संग्रह की कहानियाँ लिट्टी –चोखा की तरह ये बहुत  स्वादिष्ट हैं | कुछ लिट्टी की तरह मजबूत कथ्य के साथ तो कुछ चोखे की तरह नर्म मुलायम चटपटे  शिल्प के साथ | शिल्प के बारे में एक बात और कहना चाहूंगी कि गीताश्री जी ने इन कहानियों में शिल्प में बहुत प्रयोग किये हैं | ये प्रयोग बहुत खूबसूरत हैं | एक रचनाकार के रूप में उन्होंने अपनी रेंज का विस्तार किया है | बोली भाषा बानी में उन्होंने लोक को जीवंत कर दिया है |

अगर आप लिट्टी चोखा के दीवाने हैं तो ये संग्रह आपके स्वाद और स्वास्थ्य के लिए बेहतरीन है |


लिट्टी –चोखा व् अन्य कहानियाँ  –कहानी संग्रह
लेखिका –गीता श्री
प्रकाशक –राजपाल एंड संस
पेज -112 (पेपर बैक )
मूल्य -१६० रुपये

समीक्षा -वंदना बाजपेयी
 
                      
समीक्षक -वंदना बाजपेयी






यह भी पढ़ें ...

हसीनाबाद -कथा गोलमी की जो सपने देखती नहीं बुनती है

भूत खेला -रहस्य रोमांच से भरी भयभीत करने वाली कहानियाँ

शिकन के शहर में शरारत -खाप पंचायत के खिलाफ बिगुल

बाली उमर-बचपन की शरारतों , जिज्ञासाओं के साथ भाव नदी में उठाई गयी लहर

आपको  समीक्षात्मक लेख "लिट्टी-चोखा व् अन्य कहानियाँ –धीमी आंच में पकी स्वादिष्ट कहानियाँ     " कैसा लगा  | अपनी राय अवश्य व्यक्त करें | हमारा फेसबुक पेज लाइक करें | अगर आपको "अटूट बंधन " की रचनाएँ पसंद आती हैं तो कृपया हमारा  फ्री इ मेल लैटर सबस्क्राइब कराये ताकि हम "अटूट बंधन"की लेटेस्ट  पोस्ट सीधे आपके इ मेल पर भेज सकें | 
keywords; review , book review,  Hindi book , litti chokha, hindi story book, hindi stories, geetashree, 

मजबूरी


जैसे एक झूठ  की वजह से सौ झूठ बोलने पड़ते हैं वैसे ही एक गलत कदम  कारण एक के बाद एक कई गलत कदम उठ  जाते हैं | जिन्दगी की पूरी धरा ही बदल जाती है | मजबूरी चंदा की भी थी और शिवम् की भी | आखिर शिवम् ने ऐसा क्या गलत कदम उठाया कि उसकी मजबूरी का सिलसिला बढ़ता ही चला गया | आइये जानते हैं कहानी मजबूरी में 
मजबूरी 


चंदा ओ चंदा सरला की आवाज में गुस्सा था, चंदा दौड़कर आई जी बोलिए,बस शुरू हो गई सरला, आज तूने अभी तक क्या किया है घर कितना बिखरा पड़ा है डस्टिंग नहीं हुई, सब्जी साफ नहीं की, बाथरूम गंदे पड़े हैं आखिर तू कर क्या रही है अभी तक। चंदा रोने लगी।रोता देखकर एक मिनट को सरला भी सहम गई क्या हुआ? अपने गुस्से को शांत करके चंदा को पानी पिलाया। फिर प्यार से पूछा क्यों रो रही हो। बात सुनकर सरला भी तनाव में आ गई। पड़ोस में रहने वाले बड़ी उम्र के शर्मा जी ने चंदा को लिफ्ट में गलत तरीके से छूने की कोशिश की थी यह सुनकर सरला ने अपने पति को फ़ोन किया और बात बताई।

घर आकर देखते हैं कहते हुए दिनेश ने फोन रख दिया।शाम को जब दिनेश घर आया तो शर्मा जी नीचे  ही मिल गये बोले यार तुम अपनी नौकरानी को समझाते नहीं हो कि बड़ों से कैसे बात करनी चाहिए।दिनेश सकते में आ गया अरे ये क्या यहां तो माजरा ही अलग है।उपर आकर सरला को बताया कि शर्मा जी ऐसा बोल रहे थे।सरला ने चंदा को पूछा कि तुमने क्या बोल दिया??, लेकिन चंदा की बात सुनकर सरला भी परेशान होकर शर्मा जी के यहां जाने की जरूरत महसूस कर रही थी। उसने जाकर पूछा आपने हाथ क्यों लगाया चंदा को??? 

शर्मा ने मना कर दिया मैंने कुछ नहीं किया। एक थप्पड़ जड़ दिया सरला ने बगैर सोचे। और घर आ गई। थोड़ी देर बाद प्यार से पूछने पर चंदा ने बताया कि शर्मा जी ने मेरी छाती पर हाथ रख दिया था इसलिए मैंने हाथ उठाया।शाबाश सरला ख़ुश होकर बोली। आगे से भी ये ही करना।

एक दिन सरला ने चंदा की शादी की बात चंदा के जीजाजी से करने का फैसला लिया। क्योंकि चंदा की बहन डिलेवरी में बच्चे को जन्म देकर भगवान को प्यारी हो गई थी।सो बच्चे को सम्हालने और बहन का घर बसाने का फैसला लिया ।अब सरला ने थोड़ी हेल्प लेकर और थोड़ा अपना पैसा लगाकर शादी की तैयारी की। वक्त आने पर शादी करके चंदा ससुराल आ गई ।अपनी बहन की जगह लेने में थोड़ा वक्त लगेगा यही सोचते हुए एक हफ्ता बीत गया। जीजाजी में पति को देखना,सहज नहीं था।रात को सोने के लिए अपना बिस्तर लगा रहे जीजाजी को देखते हुए चंदा सोचने लगी कि यह क्या हो रहा है। धीरे से बोली आप उपर सो जाइए मैं नीचे  सो जाउंगी। मनाने पर मान गया मधुर।

रात को थोड़ी देर बाद मधुर उपर आ गया चंदा के साथ सोने के लिए आखिर पुरुष था अपने पुरुषत्व को नीचा  नहीं दिखा सकता था।सुबह अलसाई हुई चंदा उठी और नहाने चली गई बदन टूट रहा था।नल के नीचे खड़ी हो गई,सारे अरमान जो शिवम् के साथ रहने के लिए सजाए थे,सब बिखर गए थे।शिवम् किराने की दुकान चलाता था,जब चंदा सामान लाने जाती थी,तब बातों में अपना प्रेम प्रगट कर चुका था। लेकिन सरला का कहना मानकर जीजाजी से शादी का फैसला मन मारकर लिया था चंदा ने।

थोड़े दिन बाद चंदा सरला के घर आईं। सरला ने गरम पकोड़े,और चाय लाने के लिए चंदा को आवाज दी।बुझी हुई चंदा और भी चुप हो गई थी। अब तो सामान लाने के लिए भी आनाकानी करने लगी। लेकिन कब तक नहीं जाती।एक दिन दुकान पर जाकर सामान की लिस्ट शिवम् को देकर‌ नजरें हटा लीं उसने, लेकिन आंखों में आसूं आ ही गये। शिवम् ने भी देखकर कुछ कहना चाहा मगर और भी लोग खड़े थे,सो चुप ही रहा।
१५ दिन में बहुत बार जाना हुआ दुकान पर। लेकिन कोई बात नहीं हुई शादी के बारे में।आज तो बात करूंगी यह सोचकर दुकान से थोड़ी दूर जाकर खड़ी हो गई और इशारे से शिवम् को बुलाया और अपने मन की बात कही कि तुम्हारे साथ शादी करना चाहती थी बचपन से आ रही हूं तुम्हारी दुकान पर लेकिन ना तुमने कुछ कहा ना मैंने कुछ बोला।

सुनकर शिवम् बहुत उदास हो गया अब तो कुछ नहीं होगा। तुम खुश रहो बोलकर चला गया।दो साल बीत गए।अब बच्चा चलने लगा था।एक दिन घर के बाहर खेल रहा था एक लड़का आकर बच्चे को उठा कर ले गया। चंदा को जब काम खत्म होने पर ख्याल आया कि मुन्ना कहां है सो बाहर भागी लेकिन मुन्ना नहीं मिला थोड़ी देर बाद जब ढूंढते हुए थक‌ गई तो पति को फ़ोन किया और बताया कि मुन्ना नहीं मिला कोई उठा ले गया है। दोनों पुलिस को रिपोर्ट लिखवाने थाने जाने लगे। रास्ते में भीड़ थी देखा कि कोई दुर्घटना हुई है।अरे
यह तो मुन्ना है और साथ में शिवम् ।चंदा को कुछ नहीं सूझा उसने मुन्ना को गोद में उठा लिया और हिलाने लगी आवाज दी लेकिन वह भगवान को प्यारा हो गया था। शिवम् को किसी ने अस्पताल पहुंचाया। थोड़े दिन बाद शिवम् ठीक हो गया। 

उसने चंदा के दूर चले जाने के बाद अपनी दुकान बन्द कर दी थी। कोई काम नहीं कर सकता था।सो खर्च बढ़ने से गलत लोगों के संगत में पड़ गया। बच्चों को अपहरण करके उनकी किडनी निकालने बेचने का काम किया करता ।उसको मलाल था कि चंदा को उसकी वजह से कितना दुःख हुआ है लेकिन पैसे की कमी और खर्च ज्यादा होने से बच्चों को उठाकर किडनी निकालने बेचने वाले गिरोह से सम्बन्ध होने की वजह से आज शिवम् को कितना कुछ देखना पड़ा।
रात को नींद नहीं आ रही थी बहुत सोचने के बाद अस्पताल में उपर छत पर जाकर नीचे छलांग लगा दी और अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। ग़रीबी के कारण क्या,क्या नहीं सहना पड़ता है लोगों को। अपने से प्यार करने वाले से ना शादी की,। जैसा मालकिन ने कहा किया चंदा ने ।


और ना अपना बच्चा पैदा किया और ना अपनी बहन के बेटे को बचा पाई।और शिवम् ने गलत काम की वजह से कलंक लगा कर जीवन लीला समाप्त कर ली।एक मजबूरी दूसरी मजबूरी को जन्म देती है शायद। 

प्रेमलता तोंगिया 



यह भी पढ़ें ...




आपको कहानी  " मजबूरी   " कैसा लगा  | अपनी राय अवश्य व्यक्त करें | हमारा फेसबुक पेज लाइक करें | अगर आपको "अटूट बंधन " की रचनाएँ पसंद आती हैं तो कृपया हमारा  फ्री इ मेल लैटर सबस्क्राइब कराये ताकि हम "अटूट बंधन"की लेटेस्ट  पोस्ट सीधे आपके इ मेल पर भेज सकें | 

filed under -story, hindi story, emotional hindi , majboori



पापा मर चुके हैं



" पापा मर चुके हैं " एक ऐसी कहानी है जो संवेदना के स्टार पर आपको झकझोर देगी | चाइल्ड अब्यूज कोई नयी बात नहीं है | अक्सर इसके शिकार मासूम बच्चे हो जाते हैं | ये केवल एक बार घट जाने वाली घटना नहीं है | मानसिक ट्रोमा से बच्चा आजन्म नहीं निकल पाता | ऐसी ही एक बच्ची की मार्मिक कहानी जिसने खुद को इनसे कैसे मुक्त किया ...

पापा मर चुके हैं 



आज एकबार फिर अरनव को बिस्तर पर उसकी इच्छाओं के चरम क्षण में अचानक छोडकर मै उठ आयी थी। अब बाथरूम के एकांत में पीली रोशनी के वृत के नीचे खड़ी आईने में प्रतिबिंबित अपनी सम्पूर्ण विवस्त्र देह की थरथराती रेखाओं की तरफ देखने की त्रासदी झेलने के लिए मैं बाध्य भी थी और अभिशप्त भी... अपने अंदर के उन्माद के इस पल को मैं धैर्य से गुजर जाने देना चाहती थी, मगर जानती थी, यह इतना सहज नहीं होगा! पूरी देह में रेंगती हुई चीटियों की कतारें जैसे अब धीर-धीरे गले के अंदर थक्के बाँधने लगी थीं। भीतर सनसनाकर उठते हुए आंतक के गहरे नीले बवंडर को मैंने आप्राण घुटककर पसलियों में वापस धकेलने का प्रयास किया था, मगर वह निरंतर बना रहा था- अपनी सम्पूर्णता में, पूरी भयावहता के साथ! कुछ न सोच पाने की मनःस्थिति में मैं बेसिन का नल खोलकर अपने चेहरे पर पानी छपकती चली गयी थी। सामने जीवित दुःस्वप्न की तरह खड़े आईने की मटमैली धुंध में सुलगता हुआ चेहरा पिघलते हुए आहिस्ता से खो गया था। अब बचे रह गये थे बस वे आँसू जो अभी-अभी पलकों के किनारे तोडकर  बह आये थे- सिंके हुए गालों पर संवेदनाओं की आड़ी-तिरछी लकीरें खींचते हुए, ठोढ़ी से छाती तक की उघरी त्वचा को एक ही क्षण में पूरी तरह से भिगोते हुए।


अपने नग्न घुटनों में चेहरा छिपाये मैं फर्श पर बैठ गयी थी - हे ईश्वर! कबतक... यह नर्क कबतक...! मैंने आज अपने उन्माद के अतिरेक में अरनव के चेहरे पर अपने नाखून खुबा दिये थे! अंधेरे में दर्द से छटपटायी हुई उसकी आवाज से मैं स्वयं आहत हो उठी थी- अब ये क्या हो गया मुझसे...!  क्या सचमुच मैं अपना मानसिक संतुलन खोती जा रही हूँ ?

आज अरनव का हमेशा का मान-मनुहार एक जिद्द में बदल गया था। वह किसी भी सूरत में मेरीसुनने के लिेए राजी नहीं था। आपस की छीना-झपटी में मेरा नाइट गाउन पूरी तरह से फट गया था- अपनी टीसती देह पर उसके गर्म होंठ, जीभ, दाँतों की जबर्दस्ती को मैं सह नहीं पा रही थी। जांघों के बीच उसकी अबाध्य उंगलियाँ उद्दंड हुई जा रही थीं... वही शराब की गंध में डूबा हुआ खौफनाक अंधेरा, वही मुझमें बलात् प्रविष्ट करती हुई पशुवत् मर्दानी कठोरता... मेरी देह का पत्येक अणु यकायक अपने अंदर के खौलते हुए लावे की जद में आ गया था - नहीं! अब यह दुबारा मेरे साथ नहीं होगा...!

अरनव मेरी जानुओं को अपने दोनों घुटनों से चांपते हुए एक गर्म सलाख की तरह मेरे अंदर आमूल धंस आया था। मेरी साँसें रूक गयी थीं, अंदर एकबार फिर तहस-नहस हो जाने का तूफान था। पापा...!‘ अपनी यातना के चरम क्षण में भी मैंने उसे ही पुकारा था जिससे भागते हुए आज उन्माद के इस कगार पर आ पहुँची थी! तेज नाखून से तड़पकर अरनव मुझसे अलग हो गया था- ‘ यू मैड वुमन...!‘ झन्नाटेदार थप्पड़ के साथ ये प्रत्याशित शब्द मेरे वजूद पर गाज की तरह गिरे थे। अंदर का एक बहुत बडा हिस्सा अनायास अवश हो आया था। मेरे भीतर के बार-बार नकारे हुए सत्य को आज अरनव ने एक स्पष्ट नाम दे दिया था। एक आदमकद आईने की तरह सामने खड़ा होकर वह जानलेवा सच बोलने पर उतारू था... मेरे अंदर सहने की सारी शक्ति जैसे यकायक चुक आयी थी, इसलिए खुद को समेटकर मै चुपचाप उसके सामने से हट गयी थी।

आईने में अपने गालों पर टंकी हुई सुलगती अंगुलियों की छाप को देखते हुए मैं रोना नहीं चाहती थी, मगर बस वही किया...रोती रही...! कोई और विकल्प नहीं था मेरे इस अछोर दर्द के पास। बाथरूम के गीले फर्श पर अपनी ही सिसकियों से टूटती हुई मेरे लिए आज भी सबसे बडी तकलीफ यही थी कि मैं अपने जीवन के इतने बडे क्राइसिस के पल में अपने पापा को पुकार नहीं पा रही थी, हालांकि मैं कहीं गहरे जानती थी, आज भी मेरी सबसे बडी रूहानी जरूरत वही हैं...!  उनका मेरे जीवन से जाना अभाव की एक पूरी दुनिया ले आया है... इसी अभाव से जन्मी है रिश्तों की एक लंबी फेहरिस्त- दोस्तों की, दुश्मनों की, प्यार की और नफरत की...मगर कोई भी, कुछ भी तो उस उस अभाव का पूरक नहीं बन पाया...! मन के अंदर एक भायं-भायं करता हुआ अंधा कुआं है और उसके सीलन भरे अंधकार में कैद मेरा सहमा हुआ बचपन... वह आज भी बड़ा नहीं होना चाहता! बडों की इस बहुत छोटी दुनिया में तो कभी नहीं... यह स्तब्ध अकेलापन मेरी ढाल भी है और कारावास भी! मैं इससे छूटना चाहकर भी छूटना नहीं चाहती... एक सर्द, स्याह रात के सूने में मेरे हाथ से उनकी उंगली छूट गयी थी... और तभी से मैं उजालों की इस दुनिया में खो गयी हूँ। अबतक खुद को नहीं ढूँढ पायी हूँ, औरों की क्या कहूँ...
                                                   
पापा की उस छूटी हुई उंगली के साथ खो गया है मेरा सबसे बडा संबल- मेरी आस्था, मेरा होना, मेरे पाँव की जमीन, मेरे सर का आसमान... अपने एकमात्र आश्रय से निकल कर जाना था, बेघर हो जाने की वास्तविक विडंबना क्या होती है! उसके बाद आस्था-अनास्था के मारक द्वन्द्व से जूझती यातना के एक अन्तहीन अन्तरिक्ष में भारहीन होकर न जाने कब से भटक रही हूँ- स्वयं को समेटने के असफल प्रयास में... एक विराट शून्य के सिवाय हाथ में अबतक कुछ भी नहीं आया है। सब में डूबकर उनको भूलाने की कोशिश और फिर उनसब में उन्ही को ढूँढने की कोशिश... और अंततः पा लेने का आतंक... हर टूटे रिश्ते में वास्तव में वही-वही रिश्ता एक नये सिरे से जुड़ा है जिसे पूरी तरह से तोड़कर नष्ट कर देने का प्रयास मैंने बार-बार किया है।
                                                       
आज आँखों के सामने सायास भुलाये कितने ही दृश्य उमड़े चले आ रहे हैं, जैसे कैमरे में स्लाइड शो चल रहा हो- पापा के कंधों पर बैठी मेले की रंगीनियाँ बटोरती हुयी मैं, पीठ पर बस्ता लटकाये पापा की उंगली पकड़े स्कूल जाती हुई मैं... क्या ये सचमुच में मैं ही थी या कोई चिड़िया- निरंतर चहकती हुई, हंसी की उजली धूप में झिलमिलाती हुई, तितली के परों की तरह रंगीन और चंचल- हर क्षण हवा में फैलकर खुशबू की तरह खो जाने को आतुर... हींग-हल्दी में बसी हुई माँ और आफ्टर सेव से महकते हुए पापा के बीच की रेशम-डोर... इतना प्यार, इतना दुलार अपनी फ्रॉक के छोटे-से घेरे में समेटते-समेटते सच, मैं थक ही जाती थी! पापा मेरी बुची नाक पर चुंबन जडते हुए पूछते - गुड़िया पापा की या मम्मी की? मैं उनके हाथ से चॉकलेट लेकर कहती- पापा की! ‘क्या कहा, फिर से तो कहना...‘ माँ अचानक पीछे से आकर मुझे गुदगुदा देतीं। मैं खिलखिलाती हुई गुड़ी-मुड़ी हो जाती। पापा, मम्मी कपट गुस्से में दोनों तरफ से मेरी दोनों बाँहें खींचने लगते और मैं चिल्ला उठती- छोड़ो मुझे नहीं तो गुड़िया टूट जायगी...
                                                      
अपनी ही तेज सिसकियों से चौंककर मैं उठ खड़ी हुई थी। बाथरूम की फर्श पर न जाने कब से बैठी रह गयी थी!  बाहर निकल कर देखा था, अरनव कमरे में नहीं  है। इतनी रात को कहाँ गया होगा... मैं परेशान हो उठी थी। तभी बाहर गाडी स्टार्ट होने की आवाज सुनकर बाल्कनी में निकल कर देखा था- गेट से हमारी कार निकल रही है। रात की सूनी सड़क पर जलती-बुझती हुई बत्तियाँ एक मोड़ पर जाकर गुम गयी थीं- पीछे के अंधेरे को और-और गहराते हुए... रात की स्याही में दगदगाता हुआ लाल रंग..! सिहर कर मैं कमरे में भाग आयी थी और फिर एक कटे हुए पेड की तरह बिस्तर पर गिरकर तकियों के बीच दुबक गयी थी... उनकी नर्मी में निरापद होने का आश्वासन ढूँढती हुई... मगर आँखो में दुःस्वप्न की वही असह्य आवाजाही लगी हुई है, खुली आँखों में और-और जीवंत होती हुई और बंद पलकों में दूर तक गहराती हुई... अपने से छूटकर मैं कहाँ  जाऊँ...जा सकती हूँ...! विवश पड़ी रहती हूँ, खुली आँखों से वही-वही नर्क देखने के लिए बाध्य और अभिशप्त...
                                                
...मम्मी चली गयी हैं सुजय काकू के साथ! पापा ड्योढ़ी में खडे हवा में गोलियाँ दागे चले जा रहे हैं लगातार! सामने का दालान छटपटाते हुए कबूतरों से पट गया है... चारों तरफ उन्हीं के खून और टूटे पंख बिखरे पड़े हैं दूर-दूर तक... ये खूबसूरत पक्षी पापा ने किस लाड-प्यार से पाले थे... इन्हें दाना चुगाये बिना कभी खुद नहीं खाते थे... कहते थे, ये अमन के पक्षी हैं, इन्हें बस प्यार और मुक्ति के नीले आकाश में बेफिक्र उड़ना चाहिए... दादी उनके पाँवों के पास दोहरी होकर बैठ गयी हैं। मैं संगमरमर के स्तंभ के पीछे सहमी हुई खडी हूँ। मेरी हिचकियाँ बँधी हुई हैं। गोली की गूँज से हवेली की बूढ़ी दीवारें कांप-कांप उठ रही हैं।
                                               
चार-पाँच महीने पहले सुदर्शन सुजय काकू हमारे जीवन में आये थे और उसके बाद से ही हमारे सहज-सरल जीवन में गिरह पड़नी शुरू हो गयी थी। सुजय काकू रविंद्र संगीत बहुत अच्छा गाते थे और पेटिंग भी बहुत अच्छी करते थे। जब वे विभोर होकर गाते थे- ‘आगुनेर परोसमोनि छोआओ पाने, ए जीबोन पूर्णो कॅरो...‘ मम्मी एकटक उनके चेहरे को ताकती रहती थीं। शायद कोई पारसमणि उनके प्राण को भी अजाने छू गयी थी। पापा-मम्मी के बीच रोज-रोज होनेवाली बहसों ने मुझे न समझ आनेवाली आशंकाओं से भर दिया था। जाने से पहले मम्मी ने अपने गहनों का बक्सा मुझे थमा दिया था। मेरे माथे पर सोने का मांग टीका सजाकर वह चुपचाप रोती रही थीं। उन्हें रोते देख मैं भी रोने लगी थी...
                                                       
...उस रात अपने बिस्तर पर रोते-रोते न जाने मैं कब सो गयी थी। शराब की तेज गंध से चौंककर शायद मेरी नींद बीच रात में खुल गयी थी। आँखें खुलते ही मुझे लगा था, कमरे का घना काला अंधेरा अपनी पूरी भयावहता के साथ मुझपर लदा हुआ है। भय के अतिरेक में मेरी साँसें रूक गयी थीं। मैं कुछ भी समझ नहीं पा रही थी। असह्य पीड़ा और आतंक से मेरी चेतना शून्य-सी होती जा रही थी। मैं किसी तरह पापा को पुकारना चाहती थी। अपनी समस्त शक्ति जुटाकर जब मैंने पापा को पुकारने के लिए अपना मुँह खोलने का प्रयास किया था तो उसी भीषण अंधकार ने मेरे मुँह पर अपना पंजा जमा दिया था - ‘चुप हरामजादी, छिनाल की बेटी...!‘ यह मेरे पापा की आवाज थी...! उन्होंने इतनी शराब पी रखी थी कि उनसे बोला भी नहीं जा रहा था। मैं यकायक जैसे पत्थर बन गयी थी... मुझे नोचते-खसोटते हुए ये हाथ मेरे पापा के थे...! ये थोड़े-से आकारहीन शब्द मुझपर घन की तरह गिरे थे। मेरी मसलती हुई देह के अंदर उस समय एक  साथ न जाने क्या-क्या एक ही झनाके से टूटा था, न जाने कितनी मौंते हुई थीं... इंसान मर गया था, भगवान् मर गया था, मेरे यकीन की एक पूरी दुनिया मर गयी थी...! एक ही पल में मेरा बचपन गहरी झुर्रियों में बदल गया था। मेरे जीने का, होने का विश्वास अपनी उंगली छुड़ाकर हमेशा-हमेशा के लिए वितृष्णा, संशय और भय की गहरी नीली घाटियों में खो गया था, संभवतः फिर कभी न लौट सकने के लिए... अब उस भीषण क्षण में कुछ शेष रह गया था तो मेरी असहाय चीखें और मेरी कच्ची देह पर पापा का जघन्य आक्रमण...कोई मिट्टी की गुड़िया को भी उस तरह नहीं तोड़ता, जिस तरह उस रात पापा ने मुझे- अपनी गड़िया को- तोड़ डाला था! उस अछोर दर्द और आतंक के बीच अपने पापा को न बुला सकना ही शायद मेरे लिए सबसे त्रासद अनुभव था। मनुष्य का अपने नितांत संकट के समय में अपने ईश्वर को न बुला पाना उसकी विवशता का चरम है! मैं भी किसे बुलाती, मेरा भगवान् ही मिट्टी का बन गया था। एक मदिर के भग्नावशेष में खंडित देव मूर्तियों के बीच मैं अपनी टूटी आस्था के साथ बिखरी पड़ी थी। इंसान तो हमेशा से मरता रहा है, मगर उस रात मेरे भगवान का मर जाना मेरे लिए असहनीय हो गया था। उस छोटी अवस्था में मेरा मेरे पापा के साथ यकीन से आगे का कोई रिश्ता था...  

दूसरी सुबह एक खून और आँसू की नदी के बीच से शायद दादी मुझे उठाकर ले गयी थीं, अपने पैतृक गाँव, फिर कभी अपने बेटे के पास न लौटने के लिए - मुझे न लौटाने के लिए...! वही बिस्तर में तेज बुखार और नीम बेहोशी के बीच डूबते-उतरते हुए मेरे कानों में अस्पष्ट-सी आवाज़ आई थी, पापा ने स्वयं को गोली मार ली है, मेरी ही तरह जीवन और मौत के बीच झूल रहे हैं... दादी खबर सुनकर रोती रही थीं, मगर नहीं गयी थीं! मैं साँसों की कच्ची डोर से बंधी न जाने कब तक जिंदगी से हाथ छुड़ाती और मौत की तरफ भागती रही थी... और एक दिन हारकर अपने तन-मन के घाव समेटकर उठ बैठी थी। दादी ने मुझे मरने नहीं दिया था। न जाने क्यों मुझे ऐसा लगा था, उनकी इस साजिश में उनके कृष्ण भी शामिल हैं जिनकी चौखट पर वे रात-दिन पड़ी रहती थीं। देह के जख्म भर गये थे और मन के जख्म दिखते न थे, मगर उनका समय के साथ और-और दगदगा उठना मैं महसूस कर सकती थी।
                                                      
...वहीं से मेरी यातनाओं का सफर शुरू हुआ था - सुलगती हुई रेत पर नंगे पाँवों का दुःखता हुआ सफर... हर पल मरते हुए जीने का एक निस्संग और उदास सफर... मुझे कहीं नही जाना था, कहीं नही पहुँचना था, मगर चल रही थी... न जाने क्यों, न जाने किसलिए... उस रास्ते पर अनवरत, यंत्रवत् चलना जो इंसान को स्वयं से ही क्रमशः दूर ले जाय... विवशता किसे कहते हैं, कोई समझ सकता है...!    
                                                       
मैं बोर्डिगं स्कूल में रहकर पढती रही थी। वहाँ भी मैं एक अकेले द्वीप की तरह सबसे कटी हुई निस्संग जीती रही थी। किसी के करीब होना मेरे वश में नहीं रह गया था। स्पर्श मुझे आतंकित करता था। मुझे रिश्तों से डर लगता था, मैं नहीं चाहती थी, कोई भी मेरे करीब आये। अपने चारों ओर एक अदृश्य दीवार उठाकर मैं निस्संग जीए जा रही थी। कोई मेरे पास चाहकर भी पहुँच नहीं पाया! पहुँचता भी कैसे, मैं खुद ही अपने रास्ते में दीवार बनकर खड़ी थी...                                                     
छुटिटयों में घर पहुँकर कई बार दादी से पापा के विषय में पूछना चाहा था, मगर दादी के चेहरे की कठिन रेखाओं को देखकर हिम्मत नहीं कर पायी थी। दादी ने पापा की तस्वीरें तक दीवार से हटवा दी थीं। वह एक सच्ची माँ थीं, तभी इतनी कठोर माँ बन सकी थीं। उन्होंने पापा को अपना दूध कभी नहीं बख्शा था। मर कर भी उन्हें माफ नहीं कर सकी थीं। पापा उनकी मिट्टी तक को हाथ लगाने से मना कर दिये गये थे ।
                                                    
पाँच वर्ष पहले जब मैं बी. . फईनल की परीक्षा देकर घर लौटी थी, दादी ने तटस्थ भाव से जानकारी दी थी कि वृंदावन के श्रीनाथ जी के मंदिर की सीढ़ियों पर जो भिखारन मरी हुई पडी मिली थी, वह वास्तव में मेरी माँ थीं...! सुनकर वर्षों से मेरे अंदर जमी हुई पत्थरों की स्तब्ध दुनिया में अचानक एक बड़ी-सी दरार पड़ गयी थी। शिलाएँ पिघलती हैं तो नदी बन जाती हैं, वही नदी जिसे बाँधने के लिए कभी ये शिलाएं जन्मी होती हैं... दर्द बहता है तो अपने तट बंधनों को तोड़ ही देता है...! माँ और भिखारन...! मुझे माँ का जराऊ गहनों में जगर-मगर करता हुआ रूप याद आ रहा था। उनकी कच्ची हल्दी-सी रंगत पर नाक में पडी हीरे की लौंग लश्कारे मारा करती थी। मांग भर सिंदूर में सूरजमुखी की तरह दपदपाती हुई वह हवेली के गलियारों में चाँद-तारे बिखेरती हुई चलती थीं। मैं पापा की तरह सांवली थी। गोरी बनने की आंकाक्षा में प्रायः उनकी हथेलियाँ अपने गालों से रगड़ा करती थीं।
                                               
...माँ की मृत्यु की खबर ने मुझे बिल्कुल ही अकेली कर दिया था। वह मेरी जिंदगी में नहीं थीं, मगर कहीं थीं। बस, यही एक तसल्ली रेगिस्तान-सी इस जिंदगी में कहीं से सुकून का चश्मा बनी हुई थी। अब तो वह संबल भी छिन गया था। निःशेष हो जाना शायद इसी को कहते हैं। मैंने अपने अकेलेपन से एक नये सिरे से समझौता करने की कोशिश की थी। अभी ठीक से संभली भी नहीं थी कि दादी भी मुझे छोडकर चली गयीं... यह मेरे अकेलेपन की हद थी, इसलिए  एक तरह से मैं निश्चिंत हो गयी थी। सर्वहारा होने का भी एक अपना परवर्टेट किस्म का सुख होता है... उस स्वाद की तरह जो शायद हड्डी चबाते-चबाते लहूलुहान हो गये कुत्ते को अपने ही रक्त से मिलने लगता है...! अपने जख्म भी शायद जानवर इसलिए चाटते रहते हैं कि वे भर न पायें, ताजा बने रहें... वर्जित सुख का स्वाद निशि बनकर अपने पास बुलाता है, फिर-फिर भटकाता है...! 
                                               
अरनव जीवन में एक बिलकुल अलग अंदाज से आया था। उसका अप्रोच दूसरोँ से अलग था। वह मेरी रूह के रास्ते से दिल की जमीन पर उतरा था। उसके आने से लगा था, स्याह बादलों के ठीक पीछे सूरज का उजाला है, सुबह अब होने ही वाली है। मैं अब मुस्कराने लगी थी, गुनगुनाने लगी थी...! जिंदगी की उदास फजाओं में सात रंगों का इंद्रधनुष भी घुलने लगा था, खिड़की पर चाँद खड़ा था, दरवाजे पर खुशियों की झिलमिल दस्तक थी... ये जादू का मौसम था, अपने सारे तिलस्म के साथ! मैंने आईने में मुस्कराते हुए अपने ही प्रतिबिंब को काजल का टीका लगा दिया था।
                                                       
मगर जिस दिन हमारा ये प्यार अशरीरी शब्दों को लांघकर देह की दहलीज तक आ पहुँचा, मैं भय और आतंक से भर उठी। हर मर्दानी छुअन में पापा होते हैं, वह रात होती है और होता है खून में लिसरा हुआ मेरा मासूम यकीन! न जाने कितनी रातें बीत गयी थीं उस रात के बाद, मगर वह रात आजतक मेरे अंदर से बीत नहीं सकी थी पूरी तरह से, बनी हुई थी कहीं--कहीं- अपनी सम्पूर्ण त्रासदी और विभीषिका के साथ...! जब-जब अरनव करीब आता, मुझे चूमता, मेरी देह की नर्म रेखाओं को सहलाता, मैं जैसे कीचड़ से लिसर जाती, कीड़े-से रेंगते रहते मेरे शरीर पर देर तक... एकबार मैं उसके आफ्टर सेवआजारोकी महंगी बोतले बीन में फेंक आयी थी - पापा को यही ब्रांड प्रिय था, और मुझे भी इसकी मादक गंध मदहोश कर देती थी, शायद इसलिए इन्हें फेंकना जरूरी हो गया था... हर वह चीज जो जीवन में प्रिय थी, अब दुःख देने लगी थी, क्योंकि पापा मेरे अबकत के जीवन के हर पहलू से जुड़े हुए थे, कोई ऐसा कोना नहीं था, जहाँ पापा नहीं थे... मेरे लिए देह के सुख का स्वाद भी शायद हमेशा के लिए ग्लानि की किसी अतल खाई में खो गया था। कुंठाओं और ग्रंथियों का एक विषम गुंजल बनकर रह गयी थी मैं।
                                                   
एकबार युनिवर्सिटी कैम्पस में क्लासेज खत्म होने के बाद मैं और अरनव अचानक आ गयी बारिश से बचने के लिए फुटबॉल ग्राउंड के पास वाले गुलमोहर के नीचे आ खड़े हुए थे। एकांत पाकर अरनव ने जब मुझे चूमते हुए मुझसे अंतरंग होने की कोशिश की थी, मैं आतंक से पीपल के पत्ते की तरह कांप उठी थी। मुझे लगा था मेरे भीगे हुए शरीर पर अरनव की सिंकी हुई उंगलियाँ नहीं, छिपकलियाँ फिसल रहीं हैं...!  मैं खुद को उससे छुडाकर जमीन पर बिखरी हुई किताबों को उठाये बिना ही वहाँ से चल पड़ी थी। अरनव माफी मांगता हुआ दूर तक पीछे-पीछे आया था। जाहिर है, उसने मेरे इस व्यवहार को मेरा संस्कार-जनित संकोच माना था। मैं भी इसी तरह के बहानों की ओट में अपनी देह बहुत दिनों तक छिपाती रही थी।
                                                         
शादी की बात जब टालना और संभव नहीं रह गया तब मैंने हाँ कर दी। मगर सुहागरात मेरे लिए वही वर्षों पुराना दुःस्वप्न फिर से ले आया था। न जाने वह रात किस तरह बीती थी। दूसरी सुबह मैं शायद घंटों नहाती रही थी। चाहती थी, अपनी त्वचा ही सारी छुअन के साथ उतार फेंकूँ...सारे पुरूष अंततः पापा ही बन जाते हैं। पापा का पुरूष बन जाना या पुरूष का पापा बन जाना कैसा त्रासद अनुभव हो लकता है, मेरा मर्म ही जानता था। पसीना, आफ्टर सेव और  सिगरेट की मिली-जुली गधं ... गालों में दाढ़ी की खड़खडाहट, अबाध्य होंठों का दबाव, उंगलियों का वहशीपन... अरनव के सानिध्य में आते ही न जाने कैसी वर्जित-सी इच्छा और ग्लानि की परस्पर विरोधी मनःस्थिति में मैं हो आती हूँ... कपडों के अंदर देह पसीजने लगता है, गर्म लहू की नदी शिराओं में हरहराने लगती है... मगर दूसरे ही क्षण वही तनाव और कुंठा...! मैं अहल्या की तरह पाषाण हो उठती हूँ! अरनव के लिए मन गीला होता है, मगर अभिशप्त देह की कठिन रेखाएँ सहज नहीं हो पातीं। मैं चाहती हूँ, हमारी रूह के बीच से यह तन की मिट्टी हट जाय, मगर वह हर बार अपरिहार्य नियति की तरह सामने आ खडी होती है।
                                                         
...अरनव की पतीक्षा में मैंने वह सारी रात पलकों पर काट दी थी। एक न खत्म होनेवाले दुःस्वप्न की तरह बीती थी वह रात। मैं सोने की कोशिश में हर क्षण जागती रही थी। सुबह उठी तो सर भारी था। किचन में पहुँचकर वहाँ अरनव को डायनिंग टेबल पर बैठे हुए पाया। सामने रखी कॉफी ठंडी हो रही थी। हाथ में सिगरेट जलकर अंतिम सिरे तक पहुँच गयी थी। मेरी आहट पाकर उसने चेहरा उठाकर देखा था। उसकी आँखें लाल थीं, जैसे देरतक रोता रहा हो। मैं अपराधी की तरह चुपचाप खड़ी रह गयी थी। हमारे बीच के सारे शब्द चुक गये हों जैसे! थोडी देर बाद उसने न जाने कैसी आवाज में कहा था-‘संदल, लास्ट नाइट आई हैव बीन टु ए होर...!‘ अरनव के शब्दों ने मुझे गहरे तक स्तब्ध कर दिया था। कोई आक्रोश या घृणा के भाव नहीं पैदा हुए थे, बस एक गहरी हताशा और दुःख ने घेर लिया था - ये अकेले  होने का सिलसिला न जाने कब खत्म होगा। मुझे चुप देखकर अरनव मुझसे लिपट गया था- ‘आई एम सॉरी हनी...‘ मैंने बडी मुश्किल से पूछा था -‘डीड यू डू इट...?‘ ‘नो, आई कुड नॉट...‘ वह देर तक सिसकता रहा था और फिर हिचकते हुए कहा था -‘ऐन वक्त पर मैं उसका मुँह नोंचकर भाग आया...‘ ‘व्हाट...!’ मुझे अपने कानों पर यकीन नहीं आया था। यस संदल...ये तुम हो जिसे मैं चाहता हूँ... नॉट एनी वन एल्स....’ हम दोंनों कुछ देर तक एक-दूसरे की तरफ देखते रहे थे और फिर एक साथ हंस पड़े थे- ‘यू आर नटस् अरनव...‘ ‘यस, आई नो आई एम...जस्ट लाइक यू...‘ उसने मेरे सीने में अपना चेहरा धंसा दिया था ।
                                                          
इसके ठीक एक महीने बाद मैं अस्पताल में पापा के बेड के बगल में बैठी सोच रही थी कि मैं वहाँ क्या कर रही हूँ। पापा मर रहे थे, ये उनके चेहरे पर साफ लिखा हुआ था। बड़ी बुआ ने आधी रात में मुझे फोन करके कहा था - ‘दुलाल मर रहा है संदल... तुझसे मिलना चाहता है। एकबार उससे मिल ले, उसके लिए न सही, अपने लिए... कब तक भागती रहेगी... एकबार सामना करके इस नर्क को गुजर जाने दे अपने अंदर से... तेरे लिए जरूरी है...‘ मैं कभी नहीं जाऊंगी कहकर मैंने फोन पटक दिया था। सारी रात मैं रोती रही थी। अंदर  जैसे सारे जख्मों के टाँके एक साथ खुल गये थे। उस रात मैंने अरनव के सामने सबकुछ कन्फेश कर लिया था। अरनव  मेरा हाथ अपने हाथ में लिए बैठा रहा था। उसने  बिना कुछ कहे मुझे रोने दिया था, कहा था, रो लो संदल, नहीं तो दर्द नासूर बन जायगा... मेरा अकेले का दुःख उस दिन सांझे का होकर जैसे अपना वजन खोता जा रहा था। सुबह के करीब मैं सो गयी थी।
                                                          
दूसरे दिन अपनी सारी इच्छाओं के विरूद्ध मैं अस्पताल जाने के लिए तैयार हो गयी थी। अरनव साथ नहीं आया था। अस्पताल के गेट पर मुझे कार से उतारते हुए हल्के से मेरा हाथ दबाया  था - ‘ये तुम्हारा सलीब है, तुम्हें ही उठाना है संदल, आगे बढो, मैं तुम्हारे लिए प्रार्थना करूंगा...!‘ स्वयं को ढोती हुई-सी मैं पापा के कमरे में दाखिल हुई थी। दरवाजे पर खड़ी बुआ के चेहरे पर मुझे देखकर कोई आश्चर्य के भाव नहीं आये थे, शायद वह जानती थीं, मैं जरूर आऊंगी। कोई खुद से कहाँ तक भाग सकता है और कबतक...
                                                           
बिस्तर पर पापा लेटे हुए थे। उनकी आँखों से मैंने उन्हें पहचाना था। बाकी कहीं कुछ पहले जैसा रहा नहीं था। वे बहुत पहले और शायद बहुत बार मर चुके हैं। आज साँसों में पूर्ण विराम लगाने की औपचारिकता भर निभानी है। बिना कुछ कहे मैं भावशून्य आँखों से उनकी तरफ देखती रही थी। एक हद के बाद संवेदनाएँ ऐसे खत्म होती हैं कि अनुभव के परे चली जाती हैं। हाथ रह जाता है तो बस  एक अबूझ-सा स्वाद जिसे मन नहीं पहचानता...एक शून्य, एक जड, एक अवश हो जाने की-सी मनःस्तिथि...
                                                            
पापा ने मेरी तरफ आँखें उठाकर नहीं देखा था। बस उनकी पलकें थरथराती रही थीं - वे निःशब्द रो रहे थे। बिस्तर से मिला हुआ उनका दुबला शरीर लग रहा था जैसे आँसुओं में ही बह जायेगा। पता नहीं, इसी  तरह से कितना समय बीत गया था, जब पापा ने रूक-रूककर एक अजनबी-सी आवाज में कहा था -‘मुझे माफ कर दो गुड़िया, मैंने किसी और को सजा देने के लिए... आई वाज़ सिक...जिंदगी भर मरता रहा, मगर फिर भी मर न सका, अब मुझे मर जाने दो, भगवान् मेरी सजा कम न करें, मगर तुम  एकबार मुझे माफ कर दो...‘  इतना कहते हुए ही वे बुरी तरह हाँफ उठे थे। पानी से निकली हुई मछली की तरह उनकी हालत थी। मैं अचानक उठ खड़ी हुई थी, अब इस नर्क का अंत हो - ‘ मैंने आपको माफ कर दिया है पापा, आप अपने दिल पर कोई बोझ न रखें...’ इतना कहकर मैं झटके से उठकर कमरे से बाहर निकल आयी थी। अपने पीछे मैंने बुआ की चीख सुनी थी, मगर मुडकर नहीं देखा था- अब मुझे पीछे मुडकर कभी नहीं देखना है, बस आगे बढना है, जहाँ जिंदगी आज भी मेरे इंतजार में शायद कहीं ढेर सारी खुशियाँ लिए खड़ी है। पाप कभी क्षम्य नहीं हो सकता, मगर पापी....?..और तब जब पश्चाताप का लंबा रास्ता तय करके कोई सामने याचक बनकर आ खड़ा हुआ हो- कुदरत की तमाम सजायें झेलकर, स्वयं को ही खत्म कर लेने की नाकाम कोशिश की जिल्लत और ग्लानि झेलता हुआ... अब मैं इस बहस में नहीं पडना चाहती।
                                                         
वह रात उनपर भी भारी थी, उन्हें भी ले डूबी थी... डूबनेवाला अपने अंजाने ही दूसरों को भी ले डूबता है और कभी-कभी उसे इसका अहसास भी नहीं होता! आज उन्हें माफ करके मैं स्वयं मुक्त हो गयी थी। एक लंबी उम्र से घृणा के इस रिश्ते से जुड़ी हुई मैं खुद से ही अलग होकर रह गयी थी। घृणा का संबंध सबसे बडा संबंध होता है, इसकी वरगद जैसी छाँव के नीचे दूसरा कोई संबंध पनप नहीं पाता... पनप नहीं पा रहा था। इस बंधन को काटना आज जरूरी हो गया था - पापा को मेरे अंदर से सचमुच मर जाने देने के लिए और मेरे सही अर्थों में जी सकने के लिए...इस नासूर का कोई दूसरा ईलाज नहीं था मेरे पास।
                                                      
घृणा किसी बात का हल हो नहीं सकती, अपनी इस लंबी बीमार जिंदगी ने मुझे अच्छी तरह से सिखा दिया था। मेरी धमनियों में दौडते हुए विष ने मुझे ही प्रतिपल तिल-तिलकर मारा था। स्वयं को प्यार से, जिंदगी से, खुद से जोडने की एक आखिरी कोशिश में मैंने अजगर-से घृणा के इस पाश को अपने जीवन से काटकर आज बहुत दूर फेंक दिया था। मेरे समक्ष दो ही विकल्प रह गये थे- या तो मेरी घृणा या मेरे होने का - मैंने अपने होने का विकल्प चुना था... इसकी एकमात्र कीमत मेरे अंदर की गहरी घृणा थी... मैंने उसे खत्म हो जाने दिया! एक पहाड़ यकायक मेरे सीने से उठ गया हो जैसे, मैंने बाहर की खुली हवा में आकर गहरी साँस ली थी- मैं हील हो रही हूँ... मेरे अंदर प्यार बीज बनकर अखुँआ रहा है... मैं जैसे खुद को ही यकीन दिलाती हूँ। नहीं, अब उन्माद के एक क्षण को अपने पूरे जीवन पर कैसे भी हावी होने नहीं दूंगी, प्यार को नफरत से हारने नहीं दूंग...
                                                
अरनव गेट के पास कार के बोनट से टेक लगाये खड़ा है। मैं जल्दी से जल्दी उस के पास पहुँचकर उससे लिपट जाना चाहती हूँ - आज मेरा अरनव सिर्फ मेरा अरनव है, कोई और नहीं! पापा मर चुके हैं, आज पापा सचमुच मेरे लिए मर चुके हैं...!

जयश्री राय 

जयश्री राय












आपको कहानी  " पापा मर चुके हैं " कैसा लगा  | अपनी राय अवश्य व्यक्त करें | हमारा फेसबुक पेज लाइक करें | अगर आपको "अटूट बंधन " की रचनाएँ पसंद आती हैं तो कृपया हमारा  फ्री इ मेल लैटर सबस्क्राइब कराये ताकि हम "अटूट बंधन"की लेटेस्ट  पोस्ट सीधे आपके इ मेल पर भेज सकें | 

filed under -story, hindi story, emotional hindi , papa , death of father , incest, child abuse