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सेल्फ हीलिंग



हम सब ने सुदर्शन जी की कहानी ''हार की जीत' पढ़ी है | कैसे बाबा भारती  का घोडा डाकू खड़गसिंह अपाहिज होने का नाटक कर के हासिल कर लेता है | इस पर बाबा भारती उससे कहते हैं कि , "तुम ये घोडा ले लो, पर एक प्रार्थना है कि लोगों को इस घटना के बारे में मत बताना , नहीं तो लोग दीं दुखियों पर विश्वास नहीं करेंगे |


बाबा भारती की प्रार्थना का डाकू खड़गसिंह पर क्या असर हुआ ये तो कहानी का हिस्सा है | परन्तु जरा अपनी कहानी पर गौर करिए ...

हमें कितनी बार धोखा मिलता है }|

कितनी बार लोग हमारा फायदा उठाते हैं |

कितनी बार कोई हमारा हमदर्द बन कर आता है पर जिन्दगी का सबसे भयानक घाव देकर चला जाता है |

                                                               क्या हम इस चोट से उबार पाते हैं | हो सकता है बाहर से उबार पाते हों पर चोट अंदर अवचेतन में धँस जाती है | इसके बाद हमारा पूरा व्यव्हार इसी पर आश्रित हो जाता है |

कोई हमारी मदद करने आता है ...हम उसे शक की नज़र से देखते हैं |
किसी के मीठे शब्दों में हमें गंभीर योजना छिपी नज़र आती है |
किसी के स्नेह में स्वार्थ नज़र आता है |

कितने अच्छे रिश्ते हमारे जीवन में आ सकते हैं पर हम उन्हें इस लिए खो देते हैं क्योंकि हम अवचेतन में उस घाव से नहीं निकल पाते हैं जो किसी ने हमारा भरोसा तोड़ कर दिया था |

जिन्दगी बहुत खूबसूरत है | यहाँ अच्छे और बुरे लोग , दोनों तरह के लोग हैं | यकीन मानिए अच्छे ज्यादा हैं ...तभी तो दुनिया चल रही है वर्ना बुरे लोगों ने कब का खत्म कर दिया होता | बहुत बार धोखा खाने के बावजूद अभी बहुत से अच्छे लोगों के मिलने की उम्मीद है पर हम अपने घावों को धोते हुए उस उम्मीद को कम करते चलते हैं |

हीलिंग ... चाहें वो self healing हो या काउंसेलर की मादा से बहुत जरूरी है | ताकि पूराने घाव रिसना बंद हो सके , ठीक हो सके और फिर जब कोई हमारी जिंदगी में आसा , प्रेम या मदद ले कर आये तो हम उस पर विश्वास कर सकें |

#self_healing

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अपने पर काम करिए




हर माता पिता अपने बच्चे को प्यार करते हैं ...बहुत प्यार
और बच्चों की नज़रों में वो निर्दोष होते हैं

पर माता –पिता भी इसी समाज का हिस्सा है ...उन्होंने भी अपने बचपन में अपने हिस्से का सही गलत झेला होगा, सामाजिक दवाब ने उनके भी व्यहार को प्रभावित किया होगा |
हो सकता है उन्हें ना पता हो कि उन्हें अपने ऊपर काम करना बाकी है | वो अपने बचपन का दुष्परिणाम झेल रहे हैं पर क्या हम भी झेलते रहेंगे या हमें अपने पर काम करके खुद को इस लायक बनाना चाहिए कि हमारा बचपन जीवित रहे पर बचपना नहीं और आगे ये ट्रेट हम कम से कम पहुंचाएं | देखिये ये कैसे होता है ...

बच्चे का चेतन मन प्यार समझता है पर अवचेतन में विपरीत व्यवहार दबता जाता है |

एक बच्चे के माता –पिता उसके साथ मारपीट भी करते हैं पर उसे बहुत उपहार भी ला कर देते हैं | उपहार को बच्चा प्यार समझ कर ले लेता है पर मारपीट उसके अवचेतन में दबती जाती है |

एक बच्चे के माता –पिता उससे प्यार भी करते हैं पर सफलता के लिए उस पर दवाब भी बनाते हैं बच्चा प्यार और दवाब उसके अवचेतन में चला जाता है |यानि वो सफल नहीं होगा तो कोई उसे प्यार नहीं करेगा | 


एक माता –पिता जो प्यार के साथ बहुत सारी  रोक लगाते हैं| मसलन यहाँ नहीं जाना, ये नहीं करना, हमारे घर में सब इंजिनीयर ही हुए हैं आर्टिस्ट नहीं ....बच्चा प्यार अपना लेता है | रोक अवचेतन में चली जाती है |
                       

एक बच्चा माता –पिता का अच्छा भाव ले लेता है और बुरा  अवचेतन में दबा देता है| बच्चा अपने माता -पिता को सर्वश्रेष्ठ समझता है | वो ये नहीं समझ पाता कि उनका भी अभी अपने ऊपर काम बाकी है |

बड़े होते ही दबाया हुआ “बुरा व्यवहार या गलत व्यवहार” परेशानियाँ उत्पन्न करने लगता है और ये मांग करने लगता है कि इस पर काम किया जाए |

एक बच्चा जिसने दवाब भोगा  है वो रिश्तों में दवाब बनाता है | जब ऐसा नहीं होता तो  ...वो एक रिश्ते से दूसरे रिश्ते की ओर भागता रहता है |

एक बच्चा जिसे यह अहसास कराया गया है कि वो अच्छा नहीं है वो हर किसी से स्वीकृति चाहता है | चाहे उसके लिए उसे लोगों की गलत बात में हाँ में हाँ ही क्यों न लगानी पड़े |ऐसे लोग जिन्हें हम 'यस मैंन'  कहते हैं |

जिस पर रोके लगायी गयी है वो बहुत सारी चीजों से डरता है |भय उसका स्थायी स्वाभाव बन जाता है | 

अपने ऊपर काम करने के लिए जरूरी है कि जब भी ये conflict हो | यानि कि स्वीकृति चाहिए , भय से पीछा छुडाना है या फिर हीनता बोध से ....ये आपको आपके पति या पत्नी से नहीं मिलेगा | ये खुद से मिलेगा | बाहर सारी दौड़ बेकार होगी | ये आपके दिमाग के ही एक हिस्से में है , जिसने आपको अस्वीकार किया है | उसे अहसास दिलाना है ...सब ठीक है |

ठीक है अगर मैं काली काली मोती नाटी भद्दी हूँ | ( आप और भी विशेषण जोड़ सकते हैं )
ठीक है अगर मैं उस परिभाषा में सफल नहीं हूँ 
ठीक है ...मैं हर वो काम कर सकती हूँ जिसको करने के लिए मुझे रोका गया | 

अपने ऊपर काम करिए ...आगे बढिए 

#self_healing

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जीवन स्वयं आगे बढ़ता है | पर हम उससे भी आगे बढ़ने की होड़ लगा लेते हैं | इतनी तेज दौड़ते हुए भी लगता है जैसे कुछ फँस गया है , कोई फांस है जो पैर में चुभ रही है, कहीं कुछ अटक गया है और सबसे महत्वपूर्ण अगर यात्रा अधूरी या तनाव ग्रस्त ही लग रही हो तो एक कदम पीछे हटना भी उतना ही जरूरी होता है | ये कदम पीछे हटना अपने लिए होता है | जहाँ हम आगे भागती हुई जिन्दगी से थोड़ा सा पीछे हट कर सोचते हैं कि ऐसा क्या है जो हमारी मदद नहीं कर रहा है, या अवरोध उत्त्पन्न कर रहा है |
ये एक रिश्ता हो सकता है जो ख़ुशी के स्थान पर सिर्फ तकलीफ दे रहा होता है |
ये कोई व्यवहारिक पैटर्न हो सकता है जो बार बार निराशा की ओर या असफलता ( मानसिक स्तर पर ही सही ) की ओर धकेल रहा हो |
या फिर कोई ऐसा सत्य हो सकता है जिसे मन स्वीकार नहीं करना चाहता | कई बार मन परछाई को पकड़ना चाहता है, जो संभव नहीं | झूठे दिलासे खुद को देने के स्थान पर बेहतर है सच को स्वीकार कर आगे बढ़ा जाए |
जो भी हो ठहर कर अपने प्रति ईमानदार होकर उस कारण को खोज निकालना है और हिम्मत के साथ उसे छोड़ देना है |
तो आगे की यात्रा के लिए एक कदम पीछे हटिये | ये एक तोहफा है जो आप खुद को देंगे | याद रखिये अपने लिए ये काम सिर्फ आप ही कर सकते हैं ...
#self_healing

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हर बात पर असहमति



हम एक दूसरे से
हर बात पर असहमत होते हुए भी एक दूसरे के प्रति दयालु हो सकते हैं 
यात्रा पर विश्वास




ये देखना कितना सुखद है कि हम उन चीजों से आगे बढ़ गए जिन के बारे में कभी हम सोचते थे की हम उनके  बिना जी ही नहीं पायेंगे | फिर अचानक से हम उन चीजों से अचानक से गहराई से जुड़ गए जिनके बारे में हमने कभी सोचा भी नहीं था कि हम उन्हें अपने जीवन में चाहते भी हैं | जीवन हमारे ऊपर यात्राएं आरोपित करता है, जिन्हें हम कभी नहीं करते अगर जीवन बिलकुल हमारी इच्छा से ही चल रहा होता |  

डरें नहीं 
आस्था रखें 
पाठ सीखें 
यात्रा पर विश्वास करें .... 


अंतर्मन के द्वीप- विविध विषयों का समन्वय करती कहानियाँ


अभी  पिछले दिनों मैंने “हंस अकेला रोया” में ग्रामीण पृष्ठभूमि पर लिखी हुई कहानियों का वर्णन किया था | आज इससे बिलकुल विपरीत कहानी संग्रह पर बात रखूँगी  जहाँ ज्यादातर कहानियों के केंद्र में शहरी और विशेष रूप से उच्च मध्यम वर्ग है | जहाँ मेमसाहब हैं | लिव इन रिश्ते हैं | टाइमपास के लिए पुरुषों से फ़्लर्ट करने वाली युवा लडकियाँ हैं | नौकरीपेशा महिलाएं हैं | माता –पिता दोनों के नौकरी करने के कारण  अकेलेपन से जूझते बच्चे हैं | स्त्रियों को अपने से कमतर समझने वाले परन्तु स्त्री अधिकारों पर लेख, कवितायें  लिखने वाले  फेमिनिस्ट लेखक हैं | और उन सब के बीच में है अना ...जो आज के युग की नहीं है | पाषाणयुगीन महिला है | इन तमाम महिलाओं के बीच अना का होना अजीब लगता है | परन्तु उसका अलग होना ही उसकी खासियत है जो पाषाण युग से आधुनिक युग को जोडती है | कैसे ...? 



आज मैं बात कर रही हूँ वीणा वत्सल सिंह के कहानी संग्रह ‘अंतर्मन के द्वीप’ की | द्वीप यानि भूमि का ऐसा टुकडा जो चारों  तरफ से पानी से घिरा हो | जिसका भूमि के किसी दूसरे टुकड़े से कोई सम्बन्ध ना हो | जब ये द्वीप मन के अंदर बन रहे हों तो हर द्वीप एक कहानी बन जाता है | क्योंकि ऐसे ही तो उच्च-मध्यम वर्ग के लोग रहते हैं | एक साथ रहते हुए भी एक दूसरे से पूरी तरह कटे हुए, अपने –अपने अंदर बंद | फिर भी चारों तरफ भावनाओं के समुद्र में बहते हुए ये द्वीप पृथक –पृथक होते हुए भी उसी भाव समुद्र का हिस्सा हैं | एक दूसरे से पूर्णतया पृथक और अलग होना ही इन द्वीपों की विशेषता है और कहानियों की भी | शायद इसी कारण आजकल के चलन के विपरीत  “अंतर्मन के द्वीप” नामक कोई भी कहानी संग्रह में नहीं है |

अंतर्मन के द्वीप- विविध विषयों का समन्वय   

लेखिका -वीणा वत्सल सिंह

सबसे पहले मैं बात करना चाहूँगी कहानी “अना” की | ये कहानी हमें समय के रथ पर बिठाकर पीछे ले जाती है ...बल्कि बहुत पीछे, ये कहना ज्यादा  सही होगा | ये कहानी है पाषाण युग की, जब मनुष्य गुफाओं में रहना व् आग पर भोजन पकाना सीख लिया था | उस युग में महिला व् पुरुष एक टोली बनाकर एक गुफा में रहते थे | पुरुष शिकार को जाते थे व् महिलाओं का काम संतान उत्पन्न करना था | जब महिला संतान उत्पन्न करने लायक नहीं रह जाती थी तो गुफा के पुरुष उस महिला को शिकार पर साथ ले जाकर उसे खाई में धक्का दे देते या जानवर के आगे डाल कर उसकी हत्या कर देते थे | इस तरह से महिलाएं अपना पूरा जीवन जी ही नहीं पाती थी | उन्हीं महिलाओं में से एक महिला थी अना और उसकी बेटी चानी | हालांकि उस युग में नाम रखने का चलन नहीं था पर लेखिका ने पाठकों की सुविधा के लिए ये नाम रखे  हैं | अना ने पुरुषों के अत्याचार के खिलाफ उनकी सेवा करके उनके लिए अधिक समय तक उपयोगी सिद्ध होकर ज्यादा जीवन जी लेने का पहला प्रयोग किया | अपने प्रयोग को सफल होते देख उसने ये गुरुमंत्र अपनी बेटी चानी को भी दिया | चानी ने यहाँ से मन्त्र को और आगे बढ़ाते हुए पुरुषों के लिए देवताओं से लम्बी आयु का वरदान माँगना भी शुरू किया | इस कहानी को स्त्री की आज की कहानी  के शुरूआती पाठ की तरह देखा जा सकता है | आज भी स्त्री अपने परिवार के  पुरुषों की लंबी आयु के लिए व्रत उपवास करती है | भोजन से लेकर शयन तक उनकी हर सुविधा का ध्यान रखती है ...क्यों ?  क्यों अपने को पुरुष के जीवन में उपयोगी सिद्ध करने की ये सारी जद्दोजहद स्त्री के हिस्से में आती है ? क्यों ऐसी आवश्यकता पुरुष  को नहीं पड़ती ? तमाम स्त्री विमर्श के केंद्र में जो शाश्वत प्रश्न हैं ये कहानी उन्हीं के उत्तर ढूँढते –ढूँढते पाषण युग में गयी है | कहानी में एक नयापन होने के साथ ये स्त्री के जीवन के बेनाम संघर्षों की अकथ बयानी भी है |  





अना का जिक्र करते हुए मेरे जेहन में एक अन्य कहानी आ रही है | हालांकि इस कहानी से उसका कोई लिंक नहीं है फिर भी  जिसके बारे में लिखने में मैं खुद को रोक नहीं पा रही हूँ | “The Handmaid's tale” जो Margret Atwood का उपन्यास है | ये उपन्यास  Dystopian Fiction  का एक नमूना है | जो यूटोपिया यानि आदर्श लोक का बिलकुल उल्टा है | इस कहानी में लेखिका ने स्त्री जीवन की आगे की यात्रा की है | आज जिस तरह से लिंग अनुपात बिगड़ रहा है और बढ़ते प्रदूष्ण , रेडीऐशन व् जीवन शैली में बदलाव के कारण स्त्री की संतान उत्पत्ति की क्षमता प्रभावित हो रही है | तो हजारों साल  बाद एक ऐसा समय आएगा जब स्त्रियाँ खासकर वो स्त्रियाँ जिनमें संतान उत्पत्ति की क्षमता है, बहुत कम रह जायेगी | तब पुरुषों द्वारा स्त्री प्रजाति को दो भागों में स्पष्ट रूप से विभाजित कर दिया जाएगा | एक वो जिनमें संतान उत्पन्न करने की क्षमता है और दूसरी वो जो उनकी सेवा करेंगी | जिनमें क्षमता है तो क्या उनका जीवन सुखद होगा ? नहीं | उनके ऊपर कैसे भी, किसी भी तरह से ह्युमन रेस को बचाने का दारोमदार होगा | ये कैसे भी और किसी भी तरह से इतना वीभत्स है कि पढ़ते हुए रूह काँप जाती है |




दोनों कहानियों का जिक्र मैंने एक साथ इसलिए किया क्योंकि एक ओर अना है जो स्त्री के द्वारा पुरुष की दासता स्वीकार करने से आज के दौर में पहुँचती है जहाँ स्त्री ने अपने अधिकारों के लिए संघर्ष शुरू कर दिया है | The Handmaid’s tale  स्त्री अधिकारों के लिए संघर्ष की शुरुआत से लेकर स्त्री के अधिकारों को पुन: छीन लिए जाने तक जाती है | ये बात महिलाओं को समझनी होगी कि इतिहास से हम सीख सकते हैं ... अपने सघर्ष को और तेज कर सकते हैं | लेकिन इसके साथ यह भी याद रखना होगा कि हमें  The Handmaid’s tale जैसे अंजाम तक भी नहीं पहुँचना है | ऐसे सभी भावी-संभावी भविष्य से खुद को बचाना है |



‘मेमसाहब” मेराइटल रेप के मुद्दे को उठाती है | ये  तथाकथित सुखी औरतों के दर्द को बयाँ करती है | किसी को खायी-पी –अघाई औरत कह देने से हम बाज नहीं आते पर क्या कभी हमने उसका दर्द समझने की कोशिश की है | ‘मेमसाहब भी एक ऐसी ही स्त्री हैं जो अपनी सुन्दरता सलीके और ब्रांडेड परिधानों की वजह से जानी जाती हैं | पार्टी में हँसती –मुस्कुराती मेमसाहब के बेडरूम के स्याह पन्ने उनके सामाजिक जीवन के उजले पन्नों से बिलकुल उलट हैं | जहाँ वो शराब पिए हुए अपने साहब पति की मार भी खाती हैं, गालियाँ भी सुनती हैं और अपनी इच्छा के विरुद्ध, पति की इच्छा के आगे मात्र देह में तब्दील होने को विवश भी होती हैं | एक अंश देखिये ...


“मेमसाहब गुस्से, विरोध और नफ़रत से अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लेतीं तो साहब जबरन उनका चेहरा पकड़ कर अपनी आँखों के सामने ले आते और कहते – “क्या मेरा चेहरा देखना नहीं चाहती तुम ? तुम्हारी तरह खूबसूरत न सही पर तुम्हारी तरह दागदार भी नहीं है और फिर चूमने का अभिनय करते हुए मन भर थूक चेहरे और गले पर उगल देते | मेमसाहब को उन शराब की बदबू वाले थूकों से उबकाई आती लेकिन साहब को संतुष्ट किये बगैर वो बिस्तर पर से उठ भी नहीं सकती थीं |”

ये सब लिखते  हुए मुझे आभा दुबे की एक कविता याद आ रही है, तालीम का सच"  याद आ रही है ....

पढ़ी-लिखी सर्वगुणसंपन्न ,जहीन, घरेलू औरतें ,
रोतीं नहीं, आँसू नहीं बहातीं 
बंद खिड़की दरवाजों के पीछे ,
अन्दर ही अन्दर घुटती हैं,
सिसकती हैं कि आवाज बाहर ना चली जाये कहीं,हाँ, सच तो है ,
ऐसी औरतें भी भला रोती हैं कहीं?

‘ मेमसाहब’ उच्च मध्यम वर्गीय महिलाओं के चेहरे से नकाब खींच कर सच का विद्रूप चेहरा दिखाती है | जो अच्छा दिखता है वो हमेशा अच्छा नहीं होता | कितनी फ़िल्मी नायिकाओं, सशक्त महिलाओं की शादी के बाद  उनके घरेलु शोषण के किस्से  आम हुए हैं | वो भी तब जब उन्होंने तलाक लेने की हिम्मत करी | अब मेमसाहब अपने शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठा पाती हैं या नहीं ये तो आप कहानी पढ़कर ही जान पायेंगे परन्तु इस कहानी को पढ़ कर आप अपने घर के आस –पास रहने वाली ‘मेमसाहब’ के प्रति कुछ अधिक संवेदनशील हो जायेंगे |



कहानी ‘देवांश’ अपने शिल्प और बुनावट की वजह से खास है | देवांश पितृसत्ता का चेहरा है | जो स्त्रीवादी कवितायें लिखता है | वाहवाही पाता है परन्तु उसे किसी महिला का लेखन पसंद नहीं आता | क्यों ? यही तो है पितृसत्ता, पुरुषों द्वारा  महिलाओं को अपने से कमतर समझना और उन्हें कम होने का अहसास दिला कर उन पर शासन करना | लेकिन महिलाएं इसका विरोध नहीं करती वो खुश होती हैं | एक दृश्य देखिये ...

" स्त्रियाँ जो उसके इर्द-गिर्द थी, उसके आस –पास ही रह्ना चाहती थीं | वो उन्हें दुतकारता अनाप शनाप कहता लेकिन उसकी बातों को लगभग अनसुना कर स्त्रियाँ उसके साए से ही लिपटी रहतीं | देवांश ने अपने जीवन में ऐसी स्त्रियों को कोई महत्व ना दे रखा था |”


आखिर स्त्रियाँ उसी के पास क्यों जाना चाहती हैं जो उन्हें दुत्कारे | इसके पीछे स्त्रियों के अंदर खुद को कमतर समझने की भावना होती है | मुझे अपने कॉलेज के दिन याद आ रहे हैं | जब एक अभिनेत्री ने इंटरव्यू दिया कि वो ऐसा पति चाहती है जो सिर्फ उसे प्यार ही ना करे, डांटे भी |  उसने इच्छा जाहिर की,  “वो कहे कि धूप में खड़ी हो जाओ तो मैं धूप  में खड़ी हो जाऊं | आज्ञा का पालन करूँ |” हम सहेलियों के बीच ये बहुत बड़ी चर्चा का विषय था कि एक ऐसे स्त्री जिसे हम सशक्त कहते हैं, जो फिल्मों में काम करती हैं, अपने फैसले खुद लेती है, देश –विदेश आउट डोर शूटिंग पर जाती है वो ऐसा कैसे कह सकती हैं ? औरतों की इस सोच के पीछे पीढ़ी दर पीढ़ी की गयी कंडिशनिंग है कि पुरुष श्रेष्ठ होता है | वो डांट सकता है, बुरा भला कह सकता है और स्त्री को महज आज्ञा का पालन करना है | पढ़ी –लिखी स्वतंत्र स्त्रियाँ भी जीवनसाथी में सखा नहीं स्वामी ढूंढती हैं तो आम स्त्रियों की बात ही क्या है ? हालांकि ये कहानी उन स्त्रियों के बारे में नहीं है, ये कहानी देवांश के बारे में है , जो हर उस स्त्री से दूर भागता है जिसे वो टूट कर प्रेम करता है | चाहें वो उसकी माँ हो, बहन हो या प्रेमिका | इसके पीछे उसका एक मनोविज्ञान है | दरअसल प्रेम के नाम पर किसी प्रकार का बंधन उसे पसंद नहीं | इसलिए जहाँ –जहाँ जब जब प्रेम उसे बाँधने की कोशिश करता है वो उसे मुक्त करता जाता है | क्या उसकी सोच बदलती है या वो अपनी सोच में ही फँस जाता है ? अगर शिल्प की बात करूँ तो वीणा वत्सल जी की सबसे बेहतरीन कहानियों में से एक है |


‘अर्णव’और ‘अनिमेष’ दोनों कहानियाँ किशोर बच्चों की समस्याओं पर आधारित हैं | एक तरफ अर्णव है जिसके माता-पिता दोनों नौकरी करते हैं | वो अपनी एकलौती संतान को समय नहीं दे पाते हैं | अकेलेपन को भरने के लिए अर्णव को वीडियो गेम्स का सहारा मिलता है जो बाद में लत बन जाता है | इससे उसकी शिक्षा उसका व्यवहार और जीवन प्रभावित होने लगता है | बच्चे की इस लत को छुड़ाने के लिए उसकी माँ तूलिका के नौकरी छोड़ने के स्थान पर कोई अन्य हल होता तो शायद मेरा स्त्री मन ज्यादा संतुष्ट होता परन्तु यथार्थ जीवन की सच्चाई यही है कि जब ऐसी परिस्थिति आती है तो त्याग माँ ही करती है | ‘’अनिमेष’ तो आत्महत्या तक का प्रयास कर लेता है | यहाँ कारण है माता –पिता और  बच्चे के बीच संवादहीनता | समस्या आने पर बच्चे के साथ संवाद कर उसे सुलझाने की जगह वो दोनों अपनी परवरिश के फेल होने पर ज्यदा व्यथित रहे | यही तो हो रहा है आजकल ...परफेक्ट के जिस कांसेप्ट को लेकर हम सब चल रहे हैं वो एक तिलिस्म ही तो है | पर इस तिलिस्म की माया में फँसकर एक दवाब बच्चों पर और माता –पिता दोनो पर बन रहा है | और दोनों ही निराश कुंठित हो रहे हैं |


“सरोज की डायरी के कुछ पन्ने “ डायरी शैली में लिखी हुई कहानी है | ये कहानी लिव इन को आधार बना कर लिखी गयी है | हालाँकि ये कहानी लिव इन के पक्ष और विपक्ष में खड़े होने के स्थान पर रिश्तों में आपसी समझ और विश्वास की बात करती है | रिश्ते वही सही हैं जिनमें विश्वास हो चाहे वो लिव इन हो या विवाह के बंधन  में बंधे हुए | कहानी में नायिका का एक कभी एक ना हो पाने वाले टूटे हुए रिश्तों को किरचों को समेट कर जीने की अपेक्षा उससे पूरी तरह किनारा कर एक नयी जिन्दगी की शुरुआत करने का फैसला अच्छा लगता है | आज हमें ऐसी ही नायिकाओं की जरूरत है जो स्वतंत्र जीवन ही नहीं जीती ....टूटे हुए रिश्तों के इमोशनल बर्डन  से आज़ाद होना भी जानती हैं | ये जिन्दगी भर प्रियतम की याद में आँसू बहाती रीतिकालीन छवि से इतर एक सशक्त महिला की छवि है | ये आज की महिला की छवि है | “ टाइम पास” एक ह्ल्की –फुलकी कहानी है जो आज की युवा लड़कियों के उस व्यव्हार के बारे में बात करती है जो अभी तक पुरुषों के पास ही सीमित था | वो व्यवहार है फ़्लर्ट करने का और टाइम पास रिश्ते बनाने का | पहले सिर्फ टाइम पास के नाम पर छली जाती स्त्रियाँ आज स्वयं ऐसे रिश्ते बनाने लगी हैं , जिनमें गहरे अहसास नहीं होती | ये कहानी आधुनिक स्त्री के  नकारात्मक एंगल पर भी प्रकाश डालती है |


सिकंदर पशु प्रेम पर आधारित कहानी है | कहानी के अंत में वीणा वत्सल जी ने मेंशन किया है कि इस कहानी का सूत्र बनी एक खबर जिसमें एक बाघ की मृत्यु के बाद पोस्ट मार्टम की रिपोर्ट में पता चला कि वो कई दिन से भूखा था | उसकी भूख की वजह से उसकी आँतें  सूख गयीं थी | बाघ 'इन ड़ेंजेरड' प्रजाति में आता है | उसके शिकार पर प्रतिबंध है | बाघ माँसाहारी जीव है | दूसरे जीव ही उसका भोजन हैं पर क्या एक मांसाहारी पशु भी अपने पालनहार के प्रति इतना प्रेम अपने ह्रदय में महसूस कर सकता है की वो कई दिन तक खाना ही ना खाए ? उत्तर 'हाँ' में है | प्रेम एक बड़ी शक्ति है वो जीवन देता भी है और लेता भी है | इसी प्रेम ने अपनी माँ की मृत्यु हो जाने पर सिकंदर को जीवन दिया था और इसी ने हर लिया | इंसान और जानवर के बीच की ये कहानी भावुक कर देने वाली है |


सोहनी महिवाल और  चिनाब एक प्रेम कथा है | प्रेम जो कोई बंधन नहीं मानता | जो न जाति देखता है न धर्म वो बस देखता है तो सिर्फ और सिर्फ अपने प्रियतम को ...न सिर्फ तन की आँखों से बल्कि मन की आँखों से भी | परन्तु दुनिया ये नहीं समझती वो तो  दो प्रेमियों को जाति धर्म और देश के चश्मे से ही देखती है | ये कहानी है प्रिया  और अरमान की जो मिलकर भी न मिल पाए और ना मिल कर भी   हमेशा के लिए मिल गए | इस कहानी के अंदर एक और कहानी है,  सोहनी महिवाल की ...जो एक उपन्यास के रूप में आई है जिसे प्रिया पढ़ रही है इस बात से बेखबर की उसकी जिन्दगी का भी वही हश्र हो सकता है | कहानी लव जिहाद के मुद्दे को भी उठाती है और ये सिद्ध करती है कि दोध्र्म के लोगों के बीच प्रेम तो  हमेशा से होता आया है | हाँ इसका नामकरण जरूर नया है | प्रेम कहानियों का एक अपना ही टेस्ट होता है | जो लोग प्रेम कहानियाँ पसंद करते हैं उन्हें यह कहानी पसंद भी आएगी और विह्वल भी करेगी |


अर्धनारीश्वर’ में मंदबुद्धि बच्चे और उसके परिवार के सामने आने वाली दिक्कतों का को पन्नों पर उकेरती है | पाठक कहीं दीपक की समस्या के साथ जूझ रहा होता है,  कहीं उसे दर्द होता है, तो कहीं सहानुभूति | कहानी अंत तक बाँधे रखती है | कहानी का सकारात्मक अंत अच्छा लगता  है | कहानी सुखद  अंजाम तक पहुँचती है  फिर भी ये प्रश्न बुद्धि में अपना फन फैला ही देता है कि मंद बुद्धि बच्चों के विवाह सफल हो सकते हैं या नहीं ? वैसे  भी जिंदगियों की कहानियाँ एक जैसी कहाँ होती हैं |” मालविका मनु” संग्रह की पहली कहानी है | ये करीब 33 पेज की कहानी है | इस कहानी की खासियत इसका मानसिक द्वन्द है | इस कहानी का बड़ा हिस्सा मन के स्तर पर घटित होता है | कहानी का मुख्य स्त्री पात्र देवांश के चारों ओर घिरी लड़कियों की तरह पुरुष की उपेक्षा पर न्योछावर नहीं होता बल्कि सम्मान अर्जित करने के लिए संघर्ष करता है | या यूँ कहें कि उसे उपेक्षा का दंड देना चाहता है |  यहाँ नायिका के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्ष कहानी में रखे हैं | जो अन्तत: विजय और पराजय के मिश्रित रूप में सामने आता है | इसमें एक तथ्य उभरकर सामने आता है कि सत्ता, सत्ता ही होती है...सत्ता का मद, अहंकार, क्रूरता स्त्री पुरुष देखकर नहीं आता | मुख्य पात्र से इतर फुलवा का चरित्र और उसका प्रेम प्रभावित करता है | उसके चरित्र के साथ आगे बढ़ते हुए एक सुकून महसूस होता है | एक पाठक के तौर पर कहूँ तो मनोवैज्ञानिक स्तर पर उतर कर  कहानी कुछ दृश्य बहुत प्रभावित करते हैं तो कुछ मालविका और जूली के उलझे हुए चरित्र की वजह से उलझते हैं | कहानी में घटनाएं बहुत तेजी से घटती हैं | जिन्हें कहानियों में ठहराव पसंद है उन्हें इस कहानी को पढ़ते हुए अपने मष्तिष्क की गति तेज रखनी पड़ेगी |  दरअसल कहानी लम्बी जरूर है पर इसमें लघु उपन्यास बन जाने की पूरी क्षमता है |


अंत में मैं इतना कहना चाहूंगी कि वीणा वत्सल जी ने “अंतर्मन के द्वीप’ के 128 पेजों में सम्मलित 11 कहानियों में विविधता बनाए रखने का प्रयास किया है | कुछ कहानियाँ जैसे अना, मेमसाहब और टाईमपास अपने नए विषयों के कारण प्रभावित करती हैं तो कुछ  देवांश, मालविका मनु  अपने शिल्प की वजह से, अर्णव और अनिमेष का कथ्य बहुत स्ट्रांग है जो किशोर वय के बच्चों के विमर्श का द्वार खोलता है | कवर पेज के बारे में हर किसी की अपनी राय हो सकती है | मुझे कवर पेज थोड़ा ज्यादा भरा–भरा व् रंगीन लगा | जिसके कारण संग्रह का नाम थोडा दब रहा है | पाण्डुलिपि प्रकाशन के यह शुरूआती कहानी संग्रहों में से एक है पर उस का सम्पादन त्रुटिहीन है | ये एक अच्छी बात है | इसके लिए उन्हें बधाई | 


अंतर्मन के द्वीप –कहानी संग्रह
लेखिका –वीणा वत्सल सिंह
प्रकाशक –पाण्डुलिपि प्रकाशन
मूल्य -१५० रुपये (हार्ड बाउंड )
अमेजॉन से ऑर्डर करें ....अंतर्मन के द्वीप

समीक्षा -वंदना बाजपेयी 

                                
लेखिका -वंदना बाजपेयी



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मुन्नी और गाँधी -एक काव्य कथा
फोटो क्रेडिट -आउटलुक इंडिया .कॉम


गाँधी जी आज भी प्रासंगिक है | गाँधी जी के विचार आज भी उतने ही सशक्त है | हम ही उन पर नहीं चलना चाहते | पर एक नन्ही बच्ची मुन्नी ने उन पर चल कर कैसे अपने अधिकार को प्राप्त किया आइये जाने इस काव्य कथा से ...

मुन्नी और गाँधी -एक काव्य कथा 



मुन्नी के बारे में आप नहीं जानते होंगे
कोई नहीं जानता
कितनी ही मुन्नियाँ हैं बेनाम सी
पर एक नाम होते हुए भी
ये मुन्नी थी कुछ अलग
जो जमुनापार झुग्गीबस्ती में रहती थी
अपनी अम्मा-बाबूजी और तीन बहनों के साथ
अम्मा के साथ झुग्गी बस्ती में
रोज चौका -बर्तन करते
बड़े घरों की फर्श चमकाते
जब ब्याह दी गयीं थी तीनों बहने
तब मुन्नी स्लेट पट्टी पकड़ जाती थी पास के स्कूल में पढने
मुन्नी की नज़रों में था पढने का सपना
एक -एक बढती कक्षा के साथ
इतिहास की किताब में 
मुन्नी ने पढ़ा था गाँधी को ,
पढ़ा था, आमरण अनशन को, और जाना था अहिंसा की ताकत को
वो अभी बहुत पढना चाहती थी,
पर मुन्नी की माँ की आँखों में पलने  लगा सपना
मुन्नी को अपने संग काम पर ले जाने का 
कद हो गया है ऊँचा, भर गया है शरीर ,
सुनाई देने लगी खनक उन पैसों की
जो उसे मिल सकते थे काम के एवज में
चल जाएगा घर का खर्चा,
जोड़ ही लेगी खुद का दहेज़
अपनी तीनों बहनों की तरह ...आखिर हाथ तो पीले करने ही हैं
बिठा कर थोड़ी ना रखनी है लड़की
अम्मा की बात पर बापू ने सुना दिया फरमान
बहुत हो गयी पढाई , अब कल से जाना है अम्मा के साथ काम पर
दिए गए प्रलोभन उन बख्शीशों के
जो बड़े घरों में मिल जाती है तीज त्योहारों पर
मुन्नी रोई गिडगिड़ाई
" हमको पढना है बापू, हमको पढना है अम्मा,
पर बापू ना पसीजे
और अम्मा भी नहीं
ठीक उसी वक्त मुन्नी को याद आ गए गाँधी
और बैठ गयी भूख हड़ताल पर
शिक्षा  के अधिकार के लिए
एक दिन,  दो दिन, पाँच दिन सात दिन
गले के नीचे से नहीं उतारा निवाला
अम्मा ने पीटा , बापू ने पीटा
पर मुन्नी डटी रही अपनी शिक्षा  के अधिकार के लिए
आखिरकार एक दिन झूके बापू
और कर दिया ऐलान
मुन्नी स्कूल जायेगी , शिक्षा  पाएगी
मुन्नी स्कूल जाने लगी ...
और करने लगी फिर से पढाई
इस तरह वो मुन्नी हो गयी हज़ारों मुन्नियों  से अलग
बात बहुत छोटी  है पर सीख बड़ी
गर संघर्ष हो सत्य  की राह पर
तो टिके रहो ,
हिंसा के विरुद्ध
भूख के विरुद्ध
सत्ता के विरुद्ध
यही बात तो सिखाई थी गांधी ने
यही तो था कमजोर की जीत का मन्त्र
कौन कहता है कि आज गाँधी प्रासंगिक नहीं ...

सरबानी सेन गुप्ता


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 रिश्ते तो कपड़े हैं
सखी देखो वसंत आया
नींव

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हंस अकेला रोया -ग्रामीण जीवन को सहजता के साथ प्रस्तुत करती कहानियाँ

 “गाँव” एक ऐसा शब्द जिसके जुबान पर आते ही अजीब सी मिठास घुल जाती है | मीलों दूर तक फैले खेत, हवा में झूमती गेहूं की सोने सी पकी बालियाँ, कहीं लहलहाती मटर की छिमियाँ, तो कहीं छोटी –छोटी पत्तियों के बीच से झाँकते टमाटर, भिन्डी और बैगन, कहीं बेल के सहारे छत  पर चढ़ इतराते घिया और कद्दू, दूर –दूर फैले कुछ कच्चे, कुछ पक्के घर, हवा में उड़ती मिटटी की सुवास, और उन सब के बीच लोक संस्कृति और भाषा में रचे बसे सीधे सच्चे लोग | यही तो है हमारा असली रूप, हमारा असली भारत जो जो पाश्चात्य सभ्यता में रचे शहरों में नहीं बम्बा किनारे किसी गाँवों में बसता है |


पर गाँव के इस मनोहारी रूप के अतिरिक्त भी गाँव का एक चेहरा है...जहाँ भयानक आर्थिक संकट से जूझते किसान है, आत्महत्या करते किसान हैं, धर्म और रीतियों के नाम पर लूटते महापात्र, पंडे-पुजारी हैं | शहरीकरण और विकास के नाम पर गाँव की उपजाऊ मिटटी को कंक्रीट के जंगल में बदलते भू माफिया और ईंट के भट्टे | गाँव के लोगों की छोटी –मोटी लड़ाइयाँ, रिश्तों की चालाकियाँ, अपनों की उपेक्षा से जूझते बुजुर्ग | जिन्होंने गाँव  नहीं देखा उनके लिए गाँव केवल खेत-खलिहान और शुद्ध जलवायु तक ही सीमित हैं | लेकिन जिन्होंने देखा है वो वहाँ  के दर्द, राजनीति, निराशा, लड़ाई –झगड़ों और सुलह –सफाई से भी परिचित हैं | बहुत से कथाकार हमें गाँव के इस रूप से परिचित कराते आये हैं | ऐसी ही एक कथाकार है सिनीवाली शर्मा जो गाँव पर कलम चलाती हैं तो पाठक के सामने पूरा ग्रामीण परिवेश अपने असली रूप में खड़ा कर देती हैं | तब पाठक कहानियों को पढ़ता नहीं है जीता है | सिनीवाली जी की जितनी कहानियाँ मैंने पढ़ी हैं उनकी पृष्ठभूमि में गाँव है | वो खुद कहती हैं कि, ‘गाँव उनके हृदय में बसता है |” शायद इसीलिये वो इतनी सहजता से उसे पन्नों पर उकेरती चलती हैं |


अपने कहानी संग्रह “हंस अकेला रोया” में सिनीवाली जी आठ कहानियाँ लेकर आई हैं | कहने की आवश्यकता नहीं कि ये सारी कहानियाँ ग्रामींण पृष्ठभूमि पर आधारित हैं | इस संग्रह के दो संस्करण आ चुके हैं | उम्मीद है कि जल्दी तीसरा संस्करण भी आएगा | तो आइये  बात करते हैं संग्रह की कहानियों की |

हंस अकेला रोया -ग्रामीण जीवन को सहजता के साथ प्रस्तुत करती कहानियाँ


हंस अकेला रोया की लेखिका -सिनीवाली शर्मा




सबसे पहले मैं बात करुँगी उस कहानी की जिसके नाम पर शीर्षक रखा गया है यानि की  “हंस अकेला रोया” की | ये कहानी ‘परिकथा’ में प्रकाशित हुई थी | ये कहानी है एक ऐसे किसान विपिन की, जिसके पिता की मृत्यु हुई है | उसके पिता शिक्षक थे | आस –पास के गाँवों में उनकी बहुत इज्ज़त थी | पेंशन भी मिलती थी | लोगों की नज़र में उनका घर पैसे वाला घर था | लेकिन सिर्फ नज़र में, असलियत तो परिवार ही जानता था | रही सही कसर उनकी बीमारी के इलाज ने पूरी कर दी | कहानी शुरू होती है मृत्यु के घर से | शोक का घर है लेकिन अर्थी से लेकर तेरहवीं में पूरी जमात को खिलाने के लिए लूटने वाले मौजूद हैं | अर्थी तैयार करने वाला, पंडित , महापात्र, फूफा जी यहाँ तक की नाउन, कुम्हार, धोबी सब लूटने को तैयार बैठे हैं | आत्मा के संतोष के नाम पर जीवित प्राणियों के भूखों मरने की नौबत आ जाए तो किसी को परवाह नहीं | जो खाना महीनों एक परिवार खा सकता था वो ज्यादा बन कर फिकने की नौबत आ जाए तो कोई बात नहीं, आत्मा की शांति के नाम पर खेत बिके या जेवर  तो इसमें सोचने की क्या बात है ? ये कहानी मृत्यु के उपरान्त किये जाने वाले पाखंड पर प्रश्न उठाती है पर इतने हौले से प्रहार करती है कि कथाकार कुछ भी सीधे –सीधे नहीं कहती पर पाठक खुद सोचने को विवश होता है |



ऐसा नहीं है कि ये सब काम कुछ कम खर्च में हो जाए इसका कोई प्रावधान नहीं है | पर अपने प्रियजन को खो चुके  दुखी व्यक्ति को अपने स्वार्थ से इस तरह से बातों के जाल में फाँसा जाता है कि ये जानते हुए भी कि उसकी इतनी सामर्थ्य नहीं है, फिर भी व्यक्ति खर्चे के इस जाल में फँसता जाता है | ये सब इमोशनल अत्याचार की श्रेणी में आता है जिसमें सम्मोहन भय या अपराधबोध उत्पन्न करके दूसरे से अपने मन का काम कराया जा सकता है | जरा सोचिये ग्रामीण परिवेश में रहने वाले भोले से दिखने वाले लोग भी इसकी कितनी गहरी पकड़  रहते हैं | एक उदाहरण देखिये ...


“किशोर दा के जाने के बाद  विपिन के माथे पर फिर चिंता घूमने लगीं | दो लाख का इंतजाम तो किसी तरह हो जाएगा | पर और एक लाख कहाँ से आएगा ? सूद पर ...? सूद अभी दो रुपया सैंकड़ा चल रहा है | सूद का दो हज़ार रुपया महीना कहाँ से आएगा...सूद अगर किसी तरह लौटा भी दिया तो मूल कहाँ से लौटा पायेगा |

वहीँ दूसरी तरफ ...

“अंतर्द्वंद के बीच सामने बाबूजी के कमरे पर विपिन की नज़र पड़ी ...किवाड़ खुला है,  सामने उनका बिछावन दिख रहा है |

उसे लगा एक पल में जैसे बाबूजी उदास नज़र आये.. नहीं नहीं बाबूजी मैं भोज करूँगा | जितना मुझसे हो पायेगा | आज नहीं  तो कल दिन जरूर बदलेगा पर अप तो लौट कर नहीं आयेंगे ...हाँ, हाँ करूँगा भोज |”

कथ्य भाषा और शिल्प तीनों ही तरह से ये कहानी बहुत ही प्रभावशाली बन गयी है | एक जरूरी विषय उठाने और उस पर संवेदना जगाती कलम चलने के लिए सिनीवाली जी को बधाई |


“उस पार” संग्रह की पहली कहानी है | इस कहानी बेटियों के मायके पर अधिकार की बात करती है | यहाँ बात केवल सम्पत्ति पर अधिकार की नहीं है (हालांकि वो भी एक जरूरी मुद्दा है-हंस जून 2019 नैहर छूटल  जाई –रश्मि  ) स्नेह पर अधिकार की है | मायके आकर अपने घर –आँगन को देख सकने के अधिकार की है | इस पर लिखते हुए मुझे उत्तर प्रदेश के देहातों में गाया जाने वाला लोकगीत याद आ रहा है ...

“ जो मेरी ननदी प्यार करेगी, जल्दी ब्याह रच दूंगी |
जो मेरी ननदी लड़े-लड़ाई मैके को तरसा दूँगी ||”


लोकगीत लोक भावना के प्रतीक होते हैं | अगर ननद अपने कहे अनुसार चलती है तो ठीक है वर्ना उसको मायका देखने को ही प्रतिबंधित कर देना वो अत्याचार है जो महिलाएं ही महिलाओं पर करती हैं | मंगला भी एक ऐसी ही भाभी है जो अपने ससुर द्वारा अपनी ननद के घर में कुछ पैसे दे देने के कारण कोहराम मचा देती है | बात इतनी बिगड़ती है कि पिता खुद उसे नदी के उस पार ससुराल के गाँव जाने के लिए ऑटो में बिठा देते हैं | मायके से लडकियां बड़े मान के साथ विदा की जाती हैं | पैरों में आलता, हाथों में नयी चूड़ी और कोंछे में पड़े चावल जिसके कुछ दाने आँचल में बंधे रहते हैं | परन्तु यहाँ एक बेटी को इस तरह अपमानित होना पड़ता है | ये कई बेटियों का सच है | शहरों में भले ही बेटियाँ हक की बात करने लगीं हो पर गाँवों में ये बयार अभी नहीं पहुँची है | कहानी पढ़ते हुए आप सुनैना के साथ इतना जुड़ जायेंगे कि उसके दर्द को स्वयं महसूस करेंगे |


विशेष रूप से मैं बात करना चाहूँगी कहानी ‘नियति’की | आजकल इन्सेस्ट पर बहुत बात हो रही है | घर की चारदीवारी के अंदर रिश्तों को कलंकित करते कितने अपराध हो रहे हैं | रिश्तों को बचाए रखने की खातिर कितनी स्त्रियाँ मौन का कफ़न ओढ़ कर जीवन की लाश को घसीटती हैं, ये सच किसी से छुपा नहीं है |  ये कहानी भी ससुर द्वारा बहु से जबरन बनाये गए संबंधों पर आधारित है | कहानी में जिस खूबसूरती और कलात्मकता से इन संबधों का वर्णन किया है उससे आम पाठक हो या साहित्यिक पाठक केवल उसकी संवेदना से जुड़ता है | किसी अन्य तरह का भाव उसके मन में नहीं आता | कहानी है एक ऐसी स्त्री की जिसका पति कालाआजार से पीड़ित है | महीनों से अशक्त पड़े पुत्र की पत्नी यानि अपनी पुत्र वधु पर घर के मुखिया की बुरी नज़र है | एक दिन सास की अनुपस्थिति में वो ...| दर्द, अपमान, घृणा सी पीड़ित वो स्त्री हाँफते हुए उस अपराध को अपने पति को बता देती है | अशक्त बीमार पति सहन नहीं कर पाता और आत्महत्या कर लेता है | श्वेत वस्त्र धारण करने के बाद अभी भी वो उस घर में रहने को विवश है | क्योंकि यही तो हमारी परम्परा है ...”जिस घर में डोली जाती है अर्थी भी वहीँ से जाती है |” पर नियति उसके साथ एक और खेल खेलती है | वो अभागी माँ बनने वाली है | यहाँ पर कहानी नए मोड़ लेती है | किस तरह से लिंग जांच के बाद गर्भ हत्या की बात पर वो स्त्री अपने साथ हुए अत्याचार पर अब मौन ना रह कर सबको बताने का प्रयास करती है | पर क्या उसकी बात सुनी जाती है ? या फिर समाज पीडिता को ही अपराधी बना कर कटघरे में खड़ा कर देता है | ये तो जब आप कहानी पढेंगे तब जान पायेंगे | लेकिन हमारे समाज का सच यही है | हम और आप कितनी बार सुन चुके हैं ...


“ लड़कों से तो भूल हो ही जाती है |”
“ लडकियाँ ऐसे उठती –बैठती, चली फिरती क्यों हैं ?”
“ पुरुष के अंदर तो होता ही जानवर है | सचेत तो लड़कियों को रहना चाहिए |”


ये कहानी उसी की एक कड़ी है, लेकिन ऐसी कड़ी जो एक बार जरूर आपको हिला कर रख देगी | कहानी की सबसे खास बात है उसका शिल्प | एक बोल्ड सब्जेक्ट पर लिखते समय शिल्प को साधना ही कथाकार की सबसे बड़ी विशेषता है | जरा देखिये ...
“पति को सुलाकर धीरे से कमरे के बाहर आकर वो आँगन में खटिया पर लेटी ही थी | पता नहीं कब आँख लग गयी | न जाने रात का वो कौन सा पहर था , जो उसके जीवन में ग्रहण लगा गया |”



“विसर्जन” कहानी यूँ तो गाँव में दशहरे के अवसर पर होने वाले नाटक से शुरू होती है पर असल में यहाँ  से गाँव में कुछ और ही नाटक चलता है | ये कहानी गाँव की प्रतिस्पर्धा, झगड़ों, राजनीति की बयानी है | बात दरअसल ये है कि गाँव में साल भर में मुख्य तीन आयोजन होते हैं | जिसमें गाँव वाले जमकर चंदा देते हैं और बहुत धूम –धाम से मनाते हैं | इसमें से एक है दशहरे  के अवसर पर होने वाला नाटक , दूसरा दीपावली का लक्ष्मी –गणेश पूजन और तीसरा छठ  पूजन | इन आयोजनों को सफल बनाने के लिए  गाँव को तीन टोलों में बाँटा गया है | जिसमें पूर्वी टोला दशहरे पर आयोजित तीन दिवसीय मेला व् नाटक की व्यवस्था करता है | पश्चिमी टोला दीपावली पर लक्ष्मी जी की मूर्ति बिठाने व् पूजा की और गद्दी टोला छठ  पर सूर्यदेव की प्रतिमा पूजन व् घाटों की व्यवस्था का | अब तीन तोले हैं तो उनमें प्रतिस्पर्द्धा भी होगी ही | जिस टोले  का कार्यक्रम सञ्चालन सबसे अच्छा होता है साल भर तक सारे गाँव में उसी का डंका बजता है | ऐसे सुअवसर को भला कौन अपने हाथ से जाने देना चाहेगा | तीनों अपने –अपने तरीके से मेहनत करते हैं | यहीं से शुरू होती है गाँव की राजनीति | किसी लकीर को छोटा करने के लिए उससे बड़ी लकीर खींचनी पड़ती है | लेकिन अगर बड़ी लकीर खींचते ना बने तो ? तो आसान है कि बड़ी लकीर को थोड़ा मिटाने की कोशिश की जाए | गाँव हो या शहर पर्तिस्पर्द्धा के दौर में यही तो होता आया है | दूसरे का काम और नाम खराब कर दो |


तो कहानी में पूर्वी टोला के नाटक को बिगाड़ने का काम पश्चिमी टोले  वाले करते हैं और उनकी लक्ष्मी पूजा में व्यवधान डालने का प्रयास पूर्वी तोले वाले | ऐन लक्ष्मी विसर्जन के दिन तीनों टोलों के मध्य चल रहे इस गुरिल्ला युद्ध का क्या नतीजा निकलता है इसे तो आप कहानी पढ़कर ही जान पायेंगे पर कहानी के साथ –साथ गाँव की भाषा, चालाकियाँ, योजनायें, चतुराई आदि से जिस तरह रूबरू होते हैं उससे गाँव का एक दृश्य आँखों के सामने खींचता जाता है |  

‘घर’ कहानी एक अलग तरीके की कहानी है | जिसमें घर की कल्पना ईंट गारे का बना हुआ ना होकर एक एक ऐसे बुजुर्ग  से की गयी है जिसके पास भी आत्मा है | भले ही वो कुछ बोल नहीं पाता पर हर दर्द को, हर अलगाव को, हर कुटिलता को महसूस करता है | जब –जब घर का बंटवारा होता है वो भी रोता है, तड़पता आहत होता है पर उसे काट-छांट कर उसके अंदर अपने –अपने अलग –अलग घर बना लेने की ख्वाइश में हम उसका दर्द  कहाँ सुन पाते हैं | कहानी का ताना- बाना संवेदना के जिस स्तर पर बुना गया है उसे पढ़कर शायद आप अपने घर की बेआवाज़ चीखें सुन पाएं |

सिकड़ी कहानी गले में पहने जाने वाले जेवर की कहानी है | वर्षों पहले राम किशोर की कनिया की मायके में साँप के काटने से मृत्यु हो गयी थी तब उसने गले में सिकड़ी पहनी हुई थी परन्तु घंटे भर में सिकड़ी उसके गले से गायब हो गयी | तमाम रोने तड़पने  वाले रिश्तों में से आखिर किसने मृत देह से सिकड़ी उतारने का काम किया ? वर्षों बरस कभी दबी –छुपी तो कभी महिला मण्डली में मुखर होकर ये सिकड़ी रहस्य कांड  चलता रहा | आखिर सिकड़ी का हुआ क्या ? सिकड़ी का जो भी हुआ हो पर इस बहाने गाँव की औरतों के बतरस का लाभ पाठक जरूर उठाएंगे | और जब सिकड़ी का रहस्य  खुलेगा तब ...| आँखों देखा हाल गाँव में होने वाले क्रिकेट  मैच का वर्णन है | ये थोड़ी हलकी फुलकी मनोरंजक कहानी है |


“चलिए अब”  ...संग्रह की आखिरी कहानी है और बुजुर्गों के शोषण पर आधारित है | कहते हैं कि बुढापे में पैसा अपने हाथ में जरूर रहना चाहिए वर्ना अपने ही छीछालेदर करने में कोई कसर नहीं रखते | कहानी  एक ऐसे ही बुजुर्ग की है जो पुत्री और पत्नी की मृत्यु के बाद अकेला रह गया है | उसको धनवान समझकर दोनों भाइयों में उसकी जिम्मेदारी लेने की होड़ मचती है | लेकिन जैसे ही ये रहस्य खुलता है कि उसके पास ज्यादा पैसे नहीं हैं | अपमान और उपेक्षा के दंश शुरू हो जाते हैं | कहानी  की एक खास बात मुझे अच्छी लगी जिसमें इस वास्तविकता को दिखाया गया है कि जो लोग घर में बुजुर्ग का शोषण कर रहे हैं वो दूसरों के आने पर भले होने का नाटक करने लगते हैं | परिवार वालों के इस दोहरे चरित्र के कारण उपेक्षित बुजुर्गों का दर्द बाहर वाले या शुभचिंतक  समझ नहीं पाते | हालांकि कि कहानी का अंत सकारात्मक है जो आश्वस्त करता है कि अपनों में न सही किसी में तो संवेदना अभी भी बाकी है | इंसानियत पूरी तरह मरी नहीं है | वैसे ये सब्जेक्ट कई बार उठाया गया है | पर इसे बार-बार उठाये जाने की जरूरत है | क्योंकि मशीन में बदलते मानव को ऐसी कहानियाँ दिशा दिखाती हैं | विवेक मिश्रा जी की ‘एल्बम’, प्रज्ञा जी की ‘उलझी यादों के रेशम’ और ‘चले अब’ का विषय बुजुर्गों की समस्या ही है | परन्तु सबका प्रस्तुतीकरण अलग है जो उन्हें खास बनाता है |



अंत में यही कहूँगी कि गाँव के जीवन को अपनी कलम से पन्नों में उतारने में सिनीवाली जी पूर्णतया सफल  हुई हैं | आजकल लेखकों द्वारा आत्मकथ्य  लिखने का चलन है | इधर कई पुस्तकों में उसे पढ़कर मेरी आदत सी बन गयी है कि लेखक अपनी किताब के बारेमें क्या कहना  चाहता है | उसकी कमी मुझे थोड़ी से खली | आशा है सिनीवाली  जी अगले संस्करण में आत्मकथ्य भी शामिल करेंगी |  मेरे पास इस पुस्तक का मलयज प्रकाशन से प्रकाशित दूसरा संस्करण है | जिसके  कवर पेज पर बना दुखी किसान और मंडराती चील शीर्षक को सार्थक कर रहे हैं | 96 पेज के इस संग्रह में संपादन त्रुटी रहित है |

अगर आप सशक्त कथ्य –शिल्प के साथ गाँव को पुन: जीना चाहते हैं तो ये संग्रह आपके लिए मुफीद है |

हंस अकेला रोया –कहानी संग्रह
लेखिका-सिनीवाली शर्मा
प्रकाशक – मलयज प्रकाशन
पृष्ठ -96
मूल्य -100 रूपये (पेपर बैक )
पुस्तक मंगवाने के लिए –
मलयज प्रकाशन
शालीमार गार्डन एक्स्टेंशन -1
गाजियाबाद -201005(उत्तर प्रदेश )


वंदना बाजपेयी 
                       
लेखिका -वंदना बाजपेयी






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