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अनमोल था है और रहेगा पिता का प्यार




आज का दिन पिता के नाम है | माँ हो या पिता ये दोनों ही रिश्ते किसी भी व्यक्ति के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं , जो ना सिर्फ जन्म का कारक हैं बल्कि उसको  एक व्यक्तित्व को सही आकार में ढालने में भी सहायक | पिछले एक हफ्ते से अख़बारों मैगजींस में पिता से सम्बंधित ढेरों लेख  पढ़ने को मिले , जिनमें से ज्यादातर के शीर्षक रहे ..."बदल रहे हैं आज के पापा', 'माँ की जगह ले रहे हैं पापा' , 'नया जमाना नये पापा', 'पापा और बच्चों का रिश्ता हो गया है बेहतर'  आदि-आदि | ये सच है कि आज के समय की जरूरतों को देखते हुए पिता की भूमिका में परिवर्तन आया है, लेकिन आज के पिता को पुराने पिता से बेहतर सिद्ध करने की जो एक तरफा कोशिश हो रही है वो मुझे कुछ उचित नहीं लगी |


अनमोल था है और रहेगा पिता का प्यार 


 ये सच है की फादर्स  डे मनाना हमने अभी हाल ही में सीखा है ...लेकिन संतान और पिता का एक खूबसूरत रिश्ता हमेशा से था | प्रेम तब भी था अभिव्यक्ति के तरीके दूसरे थे ...और उनको उसी तरह से समझ भी लिया जाता था | दादी के ज़माने में संयुक्त परिवारों में पिता अपने बच्चों को नहीं खिलाते थे ...भाई के बच्चों को खिलाते थे , प्यार दुलार देते थे | इस तरह से हर बच्चे को चाचा ताऊ से पिता का प्यार मिल ही जाता था | अपने बच्चे ही क्या तब गाँव की बेटी भी अपनी बेटी होती थी | कर्तव्य और पारिवारिक एकता के लिए निजी भावनाओं का त्याग आसान नहीं है | छोटे पर बच्चों को समझ भले ही ना आये पर बड़े होते ही उन्हें समझ में आने लगता था कि उनके पिता , चाचा , ताऊ परिवार को बाँधे रखने के लिए ये त्याग कर रहे हैं , तब पिता उनकी आँखों में एक आदर्श के रूप में उभरते थे | लोकगीत तब भी बाबुल के लिए ही बनते थे | बच्चे जानते थे कि उनके पिता उन्हें बहुत प्यार करते थे |


अगर अपने ज़माने के पिताओं की बात करूँ तो उस समय पिता ज्यादातर कठोर दिखा करते थे , जिसका कारण घर में अनुशासन रखना होता था | उस समय माताएं शरारत करते समय बच्चों को डराया करतीं , " आने दो बाबूजी को  , जब ठुकाई करेंगे तब सुधरोगे " और बच्चे शैतानी छोड़  कर किताबें उठा लेते | ये डर जानबूझ कर बनाया जाता था | कई बार पिता पसीजते भी तो माँ अकेले में समझा देती, "देखो आप कठोर ही रहना , नहीं तो किसी की बात नहीं सुनेगा ', और पिता अनुशासन की लगाम फिर से थाम लेते | पिता के अनुशासन बनाये रखने वाले कठोर रूप में माँ की मिली भगत रहती थी इसका पता बड़े होकर लगता था | माँ के मार्फ़त ही बच्चों समस्याएं पिता तक पहुँच जाती थीं और माँ के मार्फ़त ही पिता की राय बच्चों को मिल जाती थी | आज अक्सर माता -पिता दोनों परेशान  दिखते हैं , " ये तो किसी से नहीं डरता | "अनुशासन भी जीवन का अहम् अंग है , जिसकी पहली पाठशाला घर ही होती है, ये हम पिता से सीखते थे  |


मैंने स्वयं अपने पिता के कठोर और मुलायम दोनों रूप देखे | जिन पिता की एक कड़क आवाज से हम भाई -बहन बिलों में दुबक जाते उन्हें कई बार माँ से ज्यादा भावुक और ममता मयी देखा | तब सोचा करती कि घर में अनुसाशन बनाए रखने के लिए वो कितना मुखौटा ओढ़े रखते थे , आसान तो ये भी नहीं होगा | इस आवरण के बावजूद ऐसा कभी नहीं हुआ कि उनका प्रेम महसूस नहीं हुआ हो | वो ह्म लोगों के साथ खेलते नहीं थे , लोरी भी नहीं गाते थे , शायद पोतड़े भी नहीं बदले होंगें पर मैंने उन्हें कभी अपने लिए कुछ करते नहीं देखा हम सब सब की इच्छाएं पूरी करने के लिए वो सारी कटौती खुद पर करते | कितनी बार मन मार लेते कि बच्चों के लिए जुड़ जाएगा कितने भी बीमार हों हम सब की चिंता फ़िक्र अपने सर ओढ़ कर कहते , " तुम लोग फ़िक्र ना करो अभी हम हैं | उन्होंने कभी नहीं कहा कि हम तुम लोगों से बहुत प्यार करते हैं पर उनके अव्यक्त प्रेम को समझने की दृष्टि हमारे पास थी |

अब आते हैं आज के पिता पर ....आज एकल परिवारों में , खासकर वहाँ जहाँ पति -पत्नी दोनों काम पर जाते हों , पिता की छवि में स्पष्ट परिवर्तन दिखता है | बच्चों को अकेले सही से पालना है तो माता -पिता दोनों को पचास प्रतिशत माँ और पचास प्रतिशत पिता होना ही होगा | पिताओं ने इस नए दायित्व को बखूबी निभाना शुरू किया है | अनुशासन का मुखौटा उतार कर वो बच्चों के दोस्त बन कर उनके सामने आये हैं | माँ का बच्चों और पिता के बीच सेतु बनने का रोल खत्म हुआ है | बच्चे सीधे पिता से संवाद कर रहे हैं और हल पा रहे हैं | ये रिश्ता बहुत ही खूबसूरत तरीके से अभिव्यक्त हो रहा है |


जैसे पहले पिता और बच्चों के रिश्ते के बीच संवाद की कमी थी आज इस रिश्ते में दोस्ती के इस रिश्ते में बच्चे पिता का आदर करना नहीं सीख रहे हैं | जब पिता का आदर नहीं करते तो किसी बड़े का आदर नहीं करते | हम सब में से कौन ऐसा होगा जिसने ये संवाद अपने आस -पास ना सुना हो , " चुप बैठिये अंकल , पापा !आपको तो कुछ आता ही नहीं , और सड़क पर , " ए  बुड्ढे तू  होता कौन है हमरे बीच में बोलने वाला " |एक कड़वी  सच्चाई ये भी है कि आज जितने माता -पिता बच्चों के मित्र बन रहे हैं उतने ही तेजी से वृद्धाश्रम खुल रहते | दोस्ती का ये रिश्ता दोस्ती में नो सॉरी नो थैंक यू की जगह ... "थैंक यू पापा " और समय आने "सॉरी पापा 'में बदल रहा है |

जो भी हो पिता और बच्चे का रिश्ता एक महत्वपूर्ण रिश्ता है , जिसमें हमेशा से प्रेम रहा है ...समय के साथ अभिव्यक्ति का तरीका बदला है आगे भी बदलेगा | रिश्ता वही सच्चा है जिसमें सामंजस्य प्रेम और एक दूसरे के प्रति त्याग करने की भावना बनी रहे | भले ही ये आज का समय हो , पापा दोस्त बन गए हों पर , आज आप की हर जरूरत पूरी करने वाले पिता की आपसे दरकार  तो अब भी वही पुरानी है , जो इस फ़िल्मी गीत में है ...

" आज अंगुली थाम  के तेरी तुझे मैं चलना सिखलाऊं
कल हाथ पकड़ना मेरा जब मैं बुड्ढा हो जाऊ "
                                                  आज मिल रहा है और हम ले रहे हैं , ये फादर्स डे का असली मतलब नहीं है | ना ही गिफ्ट्स , कार्ड्स , और आई लव यू पापा ही इसके सही अर्थ को सिद्ध करते हैं | इसका सही अर्थ तो ये है कि अपने पिता के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त करने के लिए उन्हें वही भावनात्मक , शारीरिक , मानसिक संबल देने का है ....जो वो आपको हमेशा से देते आये हैं |

फादर्स डे  की शुभकामनाएं

वंदना बाजपेयी


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चमड़े का अहाता

वरिष्ठ लेखिका दीपक शर्मा जी की कहानियों में एक खास बात रहती है कि वो सिर्फ कहानियाँ ही नहीं बाचती बल्कि उसके साथ किसी ख़ास चीज के बारे में विस्तार से ज्ञान भी देती हैं | वो ज्ञान मनोवैज्ञानिक हो सकता है, वैज्ञानिक या फिर आम जीवन से जुड़ा हो सकता है | इस तरह से वो अपने पाठकों को हौले से न केवल विविध विषयों से रूबरू कराती हैं बल्कि उसके ज्ञान को परिमार्जित भी करती हैं | चमड़े का अहाता भी उनकी ऐसे ही कहानियों की कड़ी में जुड़ा एक मोती है ...जो रहस्य, रोमांच के साथ आगे बढ़ती है और अंत तक आते -आते पाठक को गहरा भावनात्मक झटका लगता है | इस कहानी में उन्होंने एक ऐसी समस्या को उठाया है जो आज भी हमारे, खासकर महिलाओं के जीवन को बहुत प्रभावित कर रही है | तो आइये पढ़ें मार्मिक कहानी ...

चमड़े का अहाता



शहर की सबसे पुरानीहाइड-मारकिट हमारी थी. हमारा अहाता बहुत बड़ा था.

हम चमड़े का व्यापार करते थे.

मरे हुए जानवरों की खालें हम खरीदते और उन्हें चमड़ा बनाकर बेचते.
हमारा काम अच्छा चलता था.

हमारी ड्योढ़ी में दिन भर ठेलों व छकड़ों की आवाजाही लगी रहती. कई बार एक ही समय पर एक तरफ यदि कुछ ठेले हमारे गोदाम में धूल-सनी खालों की लदानें उतार रहे होते तो उसी समय दूसरी तरफ तैयार, परतदार चमड़ा एक साथ छकड़ों मेंलदवाया जा रहा होता.

ड्योढ़ी के ऐन ऊपर हमारा दुमंजिला मकान था. मकान की सीढ़ियाँ सड़क पर उतरती थीं और ड्योढ़ी व अहाते में घर की औरतों व बच्चों का कदम रखना लगभग वर्जित था.
हमारे पिता की दो पत्नियाँ रहीं.
भाई और मैं पिता की पहली पत्नी से थे. हमारी माँ की मृत्यु के बाद ही पिता ने दूसरी शादी की थी.
सौतेलीमाँ ने तीन बच्चे जने परंतु उनमें से एक लड़के को छोड़कर कोई भी संतान जीवित न बच सकी.

मेरा वह सौतेला भाई अपनी माँ की आँखों का तारा था| वे उससे प्रगाढ़ प्रेम करती थीं. मुझसे भी उनका व्यवहार ठीक-ठाक ही था| पर मेरा भाई उनको फूटी आँख न सुहाता.

भाई शुरू से ही झगड़ालू तबीयत का रहा. उसे कलह व तकरार बहुत प्रिय थी. हम बच्चों के साथ तो वह तू-तू, मैं-मैं करता ही, पिता से भी बात-बात पर तुनकता और हुज्जत करता.फिर पिता भी उसे कुछ न कहते. मैं अथवा सौतेला स्कूल न जाते या स्कूल की पढ़ाई के लिए न बैठते या रात में पिता के पैर न दबाते तो पिता से खूब घुड़की खाने को मिलती मगर भाई कई-कई दिन स्कूल से गायब रहता और पिता फिर भी भाई को देखते ही अपनी ज़ुबान अपने तालु के साथ चिपका लेते.
रहस्य हम पर अचानक ही खुला.

भाईने उन दिनों कबूतर पाल रखे थे. सातवीं जमात में वह दो बार फेल हो चुका था और उस साल इम्तिहान देने का कोई इरादा न रखता था.
कबूतर छत पर रहते थे.

अहाते में खालों के खमीर व माँस के नुचे टुकड़ों की वजह से हमारी छत पर चीलें व कव्वे अक्सर मँडराया करते.



भाई के कबूतर इसीलिए बक्से में रहते थे. बक्सा बहुत बड़ा था. उसके एक सिरे पर अलग-अलग खानों में कबूतर सोते और बक्से के बाकी पसार में उड़ान भरते, दाना चुगते, पानी पीते और एक-दूसरे के संग गुटर-गूँ करते.


कहानी -चमड़े का अहाता



भाई सुबह उठते ही अपनी कॉपी के साथ कबूतरों के पास जा पहुँचता. कॉपी में कबूतरों के नाम, मियाद और अंडों व बच्चों का लेखा-जोखा रहता.

सौतेला और मैं अक्सर छत पर भाई के पीछे-पीछे आ जाते. कबूतरोंके लिए पानी लगाना हमारे जिम्मे रहता. बिना कुछ बोले भाई कबूतरों वाली खाली बाल्टी हमारे हाथ में थमा देता और हम नीचे हैंड पंप की ओर लपक लेते.उन्नीस सौ पचास वाले उस दशक में जब हम छोटे रहे, तो घर में पानी हैंड पंप से ही लियाजाता था.

गर्मी के उन दिनों में कबूतरों वाली बाल्टी ठंडे पानी से भरने के लिए सौतेला और मैं बारी-बारी से पहले दूसरी दो बाल्टियाँ भरते और उसके बाद ही कबूतरों का पानी छत परलेकरजाते.
“आज क्या लिखा?” बाल्टी पकड़ाते समय हम भाई को टोहते.

“कुछ नहीं.” भाईअक्सर हमें टाल देता और हम मन मसोसकरकबूतरों को दूर से अपलक निहारते रहते.
उस दिन हमारे हाथ से बाल्टी लेते समय भाई ने बात खुद छेड़ी, “आज यह बड़ी कबूतरी बीमार है.”

“देखें,” सौतेला और मैं ख़ुशी से उछल पड़े.“ध्यान से,” भाई ने बीमार कबूतरी मेरे हाथ में दे दी.सौतेले की नजर एक हट्टे-कट्टे कबूतर पर जा टिकी.“क्या मैं इसे हाथ में ले लूँ?” सौतेले ने भाई से विनती की.“यह बहुत चंचल है, हाथ से निकलकर कभी भी बेकाबू हो सकता है.”“मैं बहुत ध्यान से पकडूँगा.”भाई का डर सही साबित हुआ.सौतेले ने उसे अभी अपने हाथों में दबोचा ही था कि वह छूटकर मुडेर पर जा बैठा.भाई उसके पीछे दौड़ा.

खतरे से बेखबर कबूतर भाई को चिढ़ाता हुआ एक मुडेर से दूसरी मुडेर पर विचरने लगा.

तभी एक विशालकाय चील ने कबूतर पर झपटने का प्रयास किया.

कबूतर फुर्तीला था. पूरी शक्ति लगाकर फरार हो गया.

चील ने तेजी से कबूतर का अनुगमन किया.


भाई ने बढ़कर पत्थर से चील पर भरपूर वार किया, लेकिन जरा देर फड़फड़ाकर चील ने अपनी गति त्वरित कर ली.
देखते-देखते कबूतर और चील हमारी आँखों से ओझल हो गए.
ताव खाकर भाई ने सौतेले को पकड़ा और उसे बेतहाशा पीटने लगा.
घबराकर सौतेले ने अपनी माँ को पुकारा.
सौतेली माँ फौरन ऊपर चली आयीं.
सौतेलेकी दुर्दशा उनसे देखी न गयी.


“इसे छोड़ दे,” वे चिल्लायीं, “नहीं तो अभी तेरे बाप को बुला लूँगी.वह तेरा गला काटकर तेरी लाश उसी टंकी में फेंक देगा.”
“किस टंकी में?” भाई सौतेले को छोड़कर, सौतेली माँ की ओर मुड़ लिया.
“मैं क्या जानूँ किस टंकी में?”
सौतेली माँ के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं.

कहानी -चमड़े का अहाता


हमारे अहाते के दालान के अन्तिम छोर पर पानी की दो बड़ी टंकियाँ थीं. एक टंकी में नयी आयी खालें नमक, नौसादर व गंधक मिले पानी में हफ़्तों फूलने के लिए छोड़ दी जाती थीं और दूसरी टंकी में खमीर उठी खालों को खुरचने से पहले धोया जाता था.

“बोलो, बोलो,” भाई ने ठहाका लगाया, “तुम चुप क्यों हो गयीं?”

“चल उठ,” सौतेली माँ ने सौतेले को अपनी बाँहों में समेट लिया.
“मैं सब जानता हूँ,” भाई फिर हँसा, “पर मैं किसी से नहीं डरता. मैंने एक बाघनी का दूध पिया है, किसी चमगीदड़ी का नहीं.....”
“तुमने चमगीदड़ी किसे कहा?” सौतेली माँ फिर भड़कीं.
“चमगीदड़ी को चमगीदड़ी कहा है,” भाई ने सौतेली माँ की दिशा में थूका, “तुम्हारी एक नहीं, दो बेटियाँ टंकी में फेंकी गयीं, पर तुम्हारी रंगत एक बार नहीं बदली.मेरी बाघनी माँ ने जान दे दी, मगर जीते-जी किसी को अपनी बेटी का गला घोंटने नहीं दिया.....”

“तू भी मेरे साथ नीचे चल,” खिसियाकर सौतेली माँ ने मेरी ओर देखा, “आज मैंने नाश्ते में तुम लोगों के लिए जलेबी मँगवाई हैं.....”
जलेबी मुझे बहुत पसंद थीं, परंतु मैंने बीमार कबूतरी पर अपनी पकड़ बढ़ा दी.
“तुम जाओ,” सौतेले ने अपने आप को अपनी माँ की गलबाँही से छुड़ा लिया, “हम लोग बाद में आयेंगे|”
“ठीक है,” सौतेली माँ ठहरी नहीं, नीचे उतरते हुए कह गयीं, “जल्दी आ जाना. जलेबी ठंडी हो रही है.”
“लड़कियों को टंकी में क्यों फेंका गया?” मैं भाई के नजदीक---बहुत नजदीक जा खड़ा हुआ.
“क्योंकि वे लड़कियाँ थीं.”
“लड़की होना क्या ख़राब बात है?” सौतेले ने पूछा.
“पिताजी सोचते हैं, लड़कियों की ज़िम्मेदारी निभाने में मुश्किल आती है.”

“कैसी मुश्किल?”
“पैसेकीमुश्किल. उनकी शादी में बहुत पैसा खर्च करना पड़ता है.”
“पर हमारे पास तो बहुत पैसा है,” मैंने कहा.
“पैसा है, तभी तो उसे बचाना ज़रूरी है,” भाई हँसा.
“माँ कैसे मरीं?” मैंने पूछा. माँ के बारे में मैं कुछ न जानता था. घर में उनकी कोई तस्वीर भी न थी.
“छोटी लड़की को लेकर पिताजी ने उनसे खूब छीना-झपटी की. उन्हें बहुत मारा-पीटा. पर वे बहुत बहादुर थीं.पूरा जोश लगाकर उन्होंने पिताजी का मुकाबला किया, पर पिताजी में ज्यादा जोर था. उन्होंने जबरदस्ती माँ के मुँह में माँ की दुपट्टा ठूँस दिया और माँ मर गयीं.”

कहानी -चमड़े का अहाता


“तुमने उन्हें छुड़ाया नहीं?”

“मैंने बहुत कोशिश की थी.पिताजी की बाँह पर, पीठ पर कई चुटकी भरीं, उनकी टाग पर चढ़कर उन्हें दाँतों से काटा भी,परएक जबरदस्त घूँसा उन्होंने मेरे मुँह पर ऐसा मारा कि मेरे दात वहीं बैठ गये.....”
“पिताजी को पुलिस ने नहीं पकड़ा?”
“नहीं! पुलिस को किसी ने बुलाया ही नहीं.”
“वे कैसी थीं?” मुझे जिज्ञासा हुई.

“उन्हें मनकों का बहुत शौक था. मनके पिरोकर उन्होंने कई मूरतें बनायीं. बाजार से उनकी पसंद के मनके मैं ही उन्हें लाकर देता था.”
“उन्हें पंछी बहुत अच्छे लगते थे?” सौतेले ने पूछा, “सभी मूरतों में पंछी ही पंछी हैं.” घरकी लगभग सभी दीवारों पर मूरतें रहीं.
“हाँ. उन्होंने कई मोर, कई तोते और कई कबूतर बनाये. कबूतर उन्हें बहुत पसंद थे. कहतीं, कबूतर में अक्ल भी होती है और वफ़ादारी भी..... कबूतरों की कहानियाँ उन्हें बहुत आती थीं.....”
“मैं वे कहानियाँ सुनूँगा,” मैंने कहा.
“मैं भी,” सौतेले ने कहा.

“पर उन्हें चमड़े से कड़ा बैर था. दिन में वे सैंकड़ों बार थूकतीं और कहतीं, इसमुए चमड़े की सड़ा तो मेरे कलेजे में आ घुसी है, तभी तो मेरा कलेजा हर वक़्त सड़ता रहता है.....”

“मुझे भी चमड़ा अच्छा नहीं लगता,” सौतेले ने कहा.

“बड़ा होकर मैं अहाता छोड़ दूँगा,” भाई मुस्कराया, “दूर किसी दूसरे शहर में चला जाऊँगा. वहाँ जाकर मनकों का कारखाना लगाऊँगा.....”

उस दिन जलेबी हम तीनों में से किसी ने न खायीं.

दीपक शर्मा

लेखिका -दीपक शर्मा





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प्रत्यंचा -समसामयिक विषयों की गहन पड़ताल करती रचनाएँ

कविता भावो  की भाषा है वो जबरदस्ती नहीं लिखी जा सकती , उसे जब हृदय के कपाट खोल कर भावों के निर्झर सी निकलना होता है, वो तभी निकलती है | कई बार लिखने वाला और पढने वाला अपने -अपने भाव जगत के आधार पर उसे ग्रहण करता है | समीक्षक का धर्म होता है कि वो कवि के भाव स्थल पर उतर कर रचना की व्याख्या करे |  हालंकि जब विश्व पुस्तक मेले में पंखुरी जी ने बड़े ही स्नेह के साथ अपना नया कविता संग्रह ' प्रत्यंचा ' मुझे भेंट किया था तो मैं उस पर तुरंत ही कुछ लिखना चाहती थी , पर दुनियावी जिम्मेदारियों ने भावनाओं के उस सफ़र से मुझे वंचित रखा | खैर हर चीज का वक्त मुकर्रर होता है तो अब सही ....और पंखुरी जी के शब्दों में कहें तो ...

बिम्ब ऐसे हों
जो दिखें ना
कविता वो जो
 मुट्ठी में ना आये
इसलिए नहीं
कि मेरे तुम्हारे प्रेम की कविता है
और उनके हाथों में
इसलिए कि कविता से भी
मुझे प्रेम है ....|


प्रत्यंचा -समसामयिक विषयों की गहन पड़ताल करती रचनाएँ 



प्रत्यंचा -समसामयिक विषयों की गहन पड़ताल करती रचनाएँ



यूँ तो प्रत्यंचा नाम पढ़ कर किसी युद्ध का अहसास होता होता है | जहाँ तीर हो कमान हो और निशाना साध  कर सीधे ह्रदय को बेध दिया जाए | लेकिन ये प्रत्यंचा अगर कोई कवि भी  ताने तो भी उससे निकले भावनाओं के तीर भी ह्रदय को बेधते  ही हैं , पर ये बिना रक्तपात किये उसके भाव जगत में उथल -पुथल मचा कर मनुष्य को पहले से ज्यादा परिमार्जित कर देते हैं | ऐसी ही एक प्रत्यंचा चढ़ाई है पंखुरी सिन्हा जी ने अपने कविता संग्रह 'प्रत्यंचा" में|

क्योंकि बात पंखुरी  जी की कविताओं की है तो पुष्पों की उपमा देना मुझे ज्यादा उचित लग रहा है | सच कहूँ तो इस काव्य संग्रह से गुज़रते हुए मुझे लगा कि मैं लैंटाना के फूलों के किसी उपवन से गुँजार रही हूँ  विभिन्न रंगों और आकारों के छोटे -छोटे फूलों के गुच्छे , जो सहज ही आपका ध्यान अपनी और आकर्षित कर लेते हैं | साहित्य जगत में पंखुरी सिन्हा जी के नाम से कोई अनभिज्ञ नहीं है | दो कहानी संग्रहों, दो हिंदी कविता संग्रहों और दो अंग्रेजी कविता संग्रहों की रचियता व साहित्य के अनेकों पुरुस्कारों द्वारा सम्मानित पंखुरी जी के  नवीनतम काव्य संग्रह 'प्रत्यंचा ' से गुजरने की मेरी यात्रा बहुत सुखद रही |


ये अलग बात है कि पंखुरी जी का पहला संग्रह कहानियों का था पर उन्हें पहला सम्मान कविता पर मिला | मैं जब से पंखुरी जी से जुडी हूँ मैंने ज्यादातर उनकी कवितायें ही पढ़ी हैं | कभी -कभी लगता है कि कहानी लिखी जाती है और कवितायें लिख जाती हैं ,खुद ब खुद क्योंकि वो दिल के बहुत पास होती हैं ...और पाठक को भी उतनी ही अपनी सी महसूस होती हैं | पंखुरी जी की कविताओं की बात करें तो वो बहुत सहज हैं , जो उनका देखा , सुना अनुभव किया है , उसे वो बिना लाग -लपेट के पाठकों के सामने रख देती हैं , और पाठक को भी वो अपना अनुभव लगने लगता है | अब उनकी पहली कविता किस्से को ही देखिये | हम भारतीयों की किस्से सुनाने की बहुत आदत है | जहाँ चार लोग बैठ जाते हैं वहां किस्सागोई  शुरू हो जाती है ...पर ये किस्सा है जमे हुए दही का | गाँवों और छोटे शहरों में आज भी मिटटी की हांडी में दही बेचा जाता है | अच्छे दही की पहचान हांडी की ठक -ठक की आवाज़ से होती है | पूरी तरह जम जाने और पत्थर हो जाने वाला दही ग्राह्य है | जब आप इस कविता में डूबेंगे तो ये किस्सा एक अलग ही किस्सा कहता है  इंसान के समाज द्वारा स्वीकृत होने का ,जीवन की विभिन्न विपरीत परिस्थितियों में पत्थर सा मजबूत हुआ इंसान , जब बार -बार ठोंक पीट कर आजामाया जाता है तभी उसे सर आँखों पर बिठाया जाता है |

दही अच्छा बताया जाता है
स्वाद से नहीं
ठक -ठक की आवाज़ से
यानि उस खटखटाहट की आवाज़ से
जो प्रतीकों में बताती है
दही का जमना

स्त्री विमर्श पर ..


किसी स्त्री की कविताओं में स्त्री विमर्श के स्वर ना गूँजे ऐसा तो हो ही नहीं सकता | पंखुरी जी की  कविताओं में भी स्त्री सवाल उठाती है | वो साफ़ -साफ़ कहतीं हैं कि स्त्री के लिए चूडियाँ पहनना या उतारना उसकी इच्छा पर निर्भर नहीं करता | ये समाज के आदेश से होता है | समाज ने तय कर रखा है को वो चूड़ी ना उतारे |आपने गाँवों में देखा होगा कि मनिहारिन से चूड़ी पहनने के समय औरते एक पुरानी चूड़ी डाले रहती है क्योंकि कलाई  पूरी तरह से खाली करने की इजाज़त नहीं होती | स्त्री की कलाई और स्त्री की ही चूड़ियाँ पर अफ़सोस कि उनको पहनने -उतारने का हक़ स्त्री को नहीं है |



ज्यादातर इस किस्म की होती हैं
स्त्री मुक्ति की बातें
कि चूड़ी उतारने की इजाजत नहीं होती
या फिर पहनने की दुबारा
विधापीठ -दो


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स्त्री जीवन का एक बड़ा सच ये है कि स्त्रियाँ अपनी उम्र छिपाती है , क्यों छिपाती हैं इसके अलग अलग कारण हो सकते हैं और एक कारण पंखुरी जी भी ढूंढ कर लायी हैं ...


स्त्रियों के साथ भी
बिलकुल स्त्री अस्मिता का पहला कदम
मन की बातें
कुछ मन में ही रख लेना भी एक अदा है
और जैसे उम्र भी हो
मन ही की बात
फॉर्म की लिखाई से बाहर
विधापीठ -1

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कौन सी स्त्री होगी जिसका हृदय सीता माता के दुःख पर चीत्कार ना कर उठे | उनका दुखी हृदय रामराज्य पर सवाल करता है कि जिस राज्य में एक निर्दोष स्त्री बिना अपनी सफाई का अवसर दिए वन में छोड़ दिए जाने की सजा पाती है वो राम राज्य कैसा है ? वहीँ उनके अंदर आशा भी है कि वह  स्त्रियों को सम्मान  दिलाने वाले श्री कृष्ण तक एक पुल बना देने में गिलहरी की तरह इंटें ढोंगी |  ये बहुत गंभीर बात है कि उस पुल के बन जाने से ही सीता का उद्धार है | हम सब स्त्रियाँ वो गिलहरी हैं जो अपनी छोटी -छोटी कोशिशों से पुल बना रहीं हैं | सारा स्त्री विमर्श स्त्री के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाया जाने वाला वो पुल ही तो है |

मैं चाहूँ तो लिख सकती हूँ
एक कविता एक राजा पर
जिसने देकर रानी को
महल से निकाला
छोड़ रखा है बताना
ये कौन सा रामराज्य है
कौन सा रामराज्य
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एक पुल बन रहा है
सीता से कृष्ण तक
गिलहरी सी मैं भी
ढोती हूँ इंटें

एक पुल बन रहा है से
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मेरी तो कट जायेगी
यूँही बेबसी की कैद में
पर सीता तुम खींचों तो आज
कुछ एक लक्ष्मण रेखाएं ....!

सीता  तुम खींचो कुछ लक्ष्मण रेखाएं 
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कभी आहत होकर वो प्रश्न करती हैं ..

क्यों आकर ठहर जाती हैं
औरत की देह पर ही
जातिवाद , भाषावाद
क्षेत्रवाद और प्रांतीयता
की सब लड़ाइयाँ ?

प्रकृति पर ...


आज प्रकृति पर लिखना बहुत जरूरी हो गया है | एक समय था जब प्रकृति कवि  कल्पना का प्रथम द्वार हुआ करती थी पर आज दैनिक जीवन की तरह वो भी हाशिये पर चली गयी है | उपेक्षा का शिकार हो रही है | जब प्रकृति से ही प्रेम नहीं है तो पर्यावरण  की रक्षा के उपदेश बेमानी हैं | स्त्रियों की कविताओं में तो प्रकृति वर्णन का खासा आभाव रहा है | कारण स्पष्ट स्त्री अपनी घर -गृहस्थी की समस्याओं , पितृ सत्ता की बेड़ियों से निकलने में ही इतनी टूटी जा रही है कि प्रकृति पर ध्यान जाता ही  नहीं पर पंखुरी जी ने इस पर ना सिर्फ ध्यान दिया है बल्कि उनकी कविताओं में प्रकृति अपने अनुपम सौन्दर्य के साथ चमत्कृत भी करती है | झरने , पहाड़ नदियाँ उनकी कविताओं के केवल बिम्ब ही नहीं है बल्कि उनकी चेतना का आत्मविस्तार है ...

और अचानक गायब हो गयी चाँदनी
वह मेरे एकांत की
जिसमें मैं और चाँद बंद हो जाते कमरे में
और हम घूम जाते पृथ्वी के इर्द -गिर्द
या पृथ्वी घूम जाती
हमारी धुन पर ...

चाँद मेरी उपासना नहीं एक गृह है 
............................................

कितनी शंट और विराट है यह पृथ्वी
हम कभी नहीं हो सकते
उसके ध्रुवो पर एक साथ
और बस वहीँ सूर्यास्त है

बस वहीँ सूर्यास्त है 
....................................


हिलाकर जरापैरों से पानी
उठाया नया गीत उसने

कैद कमल नाल में 

इन पक्तियों में पंखुरी जी ने जो बिंब रचे हैं उनसे उनका अभिप्राय  है कि एक स्त्री जब पुरुष को अपनी देह सौंपती है या पानी को सौंपती है उसमें अंतर है ...जब वो पानी को देह सौंपती है तो वो प्रेम करते हुए भी स्वतंत्र है , जब वो पैरो से पानी चलती है तो उसमें भी संगीत उत्पन्न हो जाता है ... ये उस्की स्वतंत्र व्यक्तित्व  की सुन्दरता का प्रतिबिम्ब ही तो है |

जंगलों का कटना ही पूरी धरती पर जीवन के खत्म होने का एक बड़ा कारण हो सकता है , यहाँ विनाश की दो स्थितियों में वो समय दिखा रही हैं ...

खतरों के निशान के ऊपर
बह रही है बरसाती नदी
खतरनाक गति से
काटे जा रहे हैं पेड़


खतरों के निशान के ऊपर बरसाती नदी 
..................................

और करे हैं बहस वो भी
जो काट रहे हैं पेड़ दनादन
खुद सुना है
शोर वो मैंने
अदृश्य कुल्हाड़ी का लकड़ी पर
सिक्किम तक के घने जंगल में

जंगल के ठेकेदार 


प्रेम पर ...


   प्रेम मानव मन की सबसे कोमल भावना है | प्रेम विषय से कोई भी कवि अछूता नहीं रह सकता | कहते  तो यहाँ तक हैं कि हर कवि की पहली कविता प्रेम पर ही होती है | प्रेम जितन कोमल भाव है उसको व्यक्त करना उतना ही जटिल हो जाता है ....क्योंकि प्रेम में शब्द मौन जो हो जाते हैं | पंखुरी जी ने  प्रेम के संयोग वियोग दोनों भावों को अपनी कविता में बहुत खूबसूरती से शब्दों का जामा पहनाया है | पंखुरी जी मानती है कि प्रेम होने और खत्म होने जैसी कोई चीज नहीं होती | वो एक एक बार हो कर हमारे ह्रदय में स्थायी रूप से निवास बना लेता है ...अलबत्ता  रिश्ते  जरूर टूटते हैं |

प्रेम  समाप्त नहीं होता
रिश्ते टूटते हैं
आदमी जितनी पुरानी है
रिश्तों की राजनीति
..................


मुस्कुराना शामिल नहीं है
प्यार के उस
बहुत गहन पल में
जिसमें उतारना चाहती हूँ तुम्हें

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बहुत मद्धिम सा चाँद उगा था
उस शाम
जिस दिन , आखिरकार
मेरे बहुत बुलाने पर वो घर आया था
..................................

और सबसे अलहदा होता है स्त्री का प्रेम ....

जिसे तुम महसूस कर रही हो
शहर के मौसम  में
वो कहीं और है
लेकिन ऐसा ही
खामख्याली होता है
औरत का प्यार...


 सामयिक समस्याओं पर ...

                             वो कवि ही क्या जिसे सम सामायिक समस्याएं उद्द्वेलित न कर दें| पंखुरी जी का कवि हृदय आस -पास की समस्याओं को देख सुन कर द्रवित होता है और ये दुःख और आक्रोश शब्द बन कविता के रूप में प्रवाहित होने लगता है | फिर चाहें वो धर्म के आधार पर बंटती इंसानियत हो , सीरिया का युद्ध या फिलस्तीन की सीमा रेखा , गाय का वोट बैंक बनाया जाना और बाढ़ पर भी राजनीति , कोई भी विषय पंखुरी जी की कलम से अछूता नहीं रहा है |


प्रेम की ऐसे प्रकृति नहीं होती
जो दंश बन जाए
प्रेम की वह प्रकृति नहीं
वह कुछ और है
और दो धर्मों के लोग रह सकते हैं साथ -साथ
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गाजा फिलिस्तीन की सीमा रेखा

कुछ ज्यादा ही सुरखित महसूसा था
लोगों की नींदों ने
ये गाजा फिलिस्तीन की सीमारेखा नहीं है
ये कुछ नए किस्से हैं
नयी किस्मों की विषमताओं के
......................................


एक वैलेंटाइन डे सीरिया युद्ध के बाद

लिख रही हूँ एक प्रेम कविता
जिसमें सत्ता के युद्ध का दंश ना हो
घमासान तो हम्सेदूर है बहुत
लेकिन युद्ध का भी कोई तय पड़ोस होता है ?

.....................................................

भड़कती अस्मिता

लौटना अपने पुराने देश में
यानी अपने देश में
पैदाइशी  मिटटी पर
और उसे पाना आंदोलित
गाय से अधिक गोमांस की भड़कती अस्मिता पर
........................................


बाढ़ की राजनीति

अपने आप खुल गयी
कासी हुई मुट्ठी मेरी
फ़ैल गयी हथेली
और टपकता रहा आसमान से पानी
-----------------------------

गाय का वोट बैंक


कितनी राजनीति हुई
गाय पर इनदिनों
कोई बाँध कर ले जाता कूड़े के ढेर से उसे
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कुछ  अन्य कवितायें ...


                                                   पंखुरी जी की कुछ अन्य सशक्त कवितायें जिनके बारे में मैं बात करना चाहूंगी उनमें से एक है 'बारिश के दिन की गोधुली और ड्रैगन नृत्य 'इस कविता में वो एक दृष्ट की तरह गिरगिटों के प्रणय नृत्य को देखती हैं वैसे तो गिरगिट कोई सुंदर जीव नहीं है पर नर गिरगिट द्वारा मादा गिरगिट को पेड़ की डाल से गिरने से बचाना सुन्दरतम हो जाता है ...प्रेम में सब कुछ सुंदर ही होता है | जिसको प्रकृति से इतना जुड़ाव हो वही ऐसे रचना लिख सकता है |

भीगे हुए फूल से
शाम का आखिरी मधुपान कर गयी है
सबसे छोटी हमिंग बर्ड सी चिड़िया
गुलाबी सी रौशिनी के
रात में विलय से पहले
लौट आये हैं झींगुर


                              अंत में ये कहाना चाहूँगी कि पंखुरी जी का साहित्यिक  आयाम बहुत विस्तृत है | उन्होंने विविध विषय उठाये हैं और उनके साथ पूरा न्याय किया है | कुछ कवितायें तो इतनी खूबसूरत बनी है जैसे लगता है किसी ने पन्ने के कैनवास पर शब्द चित्र उकेरे हों तो कुछ झकझोर देती हैं वहीँ कुछ में आँखों में पानी भर देने की ताकत  है | पंखुरी जी निरंतर लिख रही हैं और बहुत अच्छा लिख रहीं हैं | भविष्य में साहित्य जगत को उनसे बहुत उम्मीदें हैं | पंखुरी जी को मैं एक मित्रवत सलाह देना चाहूंगी जो मैं ज्यादातर  कवियों को देती हूँ कि काव्य संग्रह की परियोजना कहानी संग्रह की तरह ही बनायी जाए तो ज्यादा श्रेयस्कर होगा | जैसे एक मूड की कवितायें अगर साथ होती है तो कवि के दृष्टिकोण को समझने में पाठक को ज्यादा आसानी होती है |

अंत में पंखुरी जी के शब्दों में ...

मैं अधूरी नहीं, फूल मुझ्मी बनते हैं
खुशबुओं का आलय मैं
दीप मुझमें जलते हैं



बोधि प्रकाशन से प्रकाशित काव्य संग्रह 'प्रत्यंचा ' में १०० से ऊपर कवितायें हैं जो 244 पृष्ठों में समाई हैं | कवर पृष्ठ आकर्षक है और संपादन त्रुटी रहित |


प्रत्यंचा- काव्य संग्रह
लेखिका -पंखुरी सिन्हा
प्रकाशक -बोधि प्रकाशन
पेज -244
मूल्य - 250 रुपये


अगर आप समसामयिक विषयों  का गहन पड़ताल करती हुई कवितायें पढ़ना चाहते हैं तो ये संग्रह आपके लिए अच्छा है |
पंखुरी जी को उनके उज्जवल भविष्य के लिए शुभकामनाएं


वंदना बाजपेयी


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लघु कथा -शक्ति रूप


इस कहानी को पढ़कर एक खूबसूरत कविता की पंक्तियाँ याद आ रहीं है | 
"उठो द्रौपदी वस्त्र संभालो , अब गोविन्द ना आयेंगे "
वायरल हुई इस कविता में यही सन्देश था कि आज महिलाओं और खासकर बच्चियों के प्रति बढती यौन हिंसा को रीकने के लिए अब हमारी बच्चियों को अबला  बन कर किसी उद्धारक की प्रतीक्षा नहीं करनी बल्कि शक्ति रूपा बन कर स्वयं ही उनका संहार  करना है |

शक्ति रूप



सोलह साल की नाबालिग लड़की जंगल में लकड़ी बीनने जा रही थी। जरूर कोई मजबूरी रही होगी। नहीं तो आज के समय में ऐसी कौन-सी माँ  होगी, जो बेटी को खतरों से खेलने के लिए छोड़ दे। लेकिन आज सचमुच खतरा मंडरा रहा था। वह जंगल में थोड़ा अंदर पहुँची , तभी इंसान रूपी दो भेड़ियों ने उस लड़की को घेर लिया। लड़की तत्क्षण समझ गई कि आज उसकी इज्जत जाएगी और शायद जान भी। लड़की बचने का उपाय खोजने लगी। सबसे पहले उसने दया की भीख मांगी। उसने कहा, ‘‘भगवान के लिए मुझे छोड़ दो। एक अबला की इज्जत से न खेलो। वो तुम्हारा भला करेगा।’’


संवेदनहीन भेडियों  पर इस अनुनय-विनय का कोई असर नहीं हुआ। वे लड़की तरफ बढ़ने लगे। लड़की दो कदम पीछे हटी। उसने चिल्लाना शुरू किया, ‘‘बचाओ ! बचाओ !!’’ शहर में जहां हृदय-युुक्त प्राणी रहते हैं, वहां उसकी गुहार न सुनी जाती, तो यहां जंगल में उसकी सुनने वाला कौन था। लड़की का यह प्रयास भी व्यर्थ गया। अब उसने पुलिस का नाम लेना शुरू किया। उसने दरिंदों को डराते हुए कहा, ‘‘तुम बचोगे नहीं। पुलिस अब बहुत चैकन्नी हो गई है। वो तुम्हें ढूंढ़ निकालेगी और तुम्हें कड़ी सजा देगी।’’

 भेड़िया अट्टहास करने लगे। उन्होंने कहा, ‘‘पुलिस में इतनी ताकत कहां ? दूसरे, हम कोई साक्ष्य छोड़ेंगे तब न !’’
भेडियों ने उसे अपनी गिरफ्त में लेने के लिए पंजा मारा। लड़की झटके से फिर चार कदम पीछे हटी। उसने मां-बेटी का हवाला देना शुरू किया। उसने कहा, ‘‘तुम्हारे घर में मां-बेटी नहीं हैं क्या ? क्या मैं तुम्हारी छोटी बहन की तरह नहीं हूं ?’’


भेड़िया विद्रूप हंसी हंसने लगे। जैसे कह रहे होें, भेड़िया और मानवीय रिश्ता ? हुंह !


खुद को बहन कहने का यह प्रयास भी व्यर्थ गया। लड़की अब रोने लगी। वह गिड़गिडा़ती रही, चिल्लाती रही। मगर यह सब इन निष्ठुरों पर चिकने घड़े पर पानी के समान था। अब वह उनकी पकड़ में आने ही वाली थी। 
तभी पीछे एक पहाड़ी आ गई। लड़की को पहाड़ी पर चढ़ भागने का मौका मिल गया। वह पहाड़ी पर तेजी से काफी ऊपर चढ़ गई। वे दरिंदे भी पहाड़ी चढ़ने लगे। लड़की फिर घबराई। वह थक चुकी थी। उसे लगा, अब वह पकड़ी जाएगी। तभी उसने देखा, पहाड़ी पर बड़े-बड़े कई पत्थर पड़े हैं। अब उसने ताकत दिखाने की सोची। उसने पाया, आज उसकी साहस और शक्ति ही उसकी रक्षा करेगी। वह ऊपर से चिल्लाई, ‘‘रुक जाओ पापियो ! आगे बढ़े तो मैं ये पत्थर तुमपर गिरा दूंगी !’’

भेड़िये डरे नहीं और आगे बढ़ते रहे। लड़की अब शक्ति रूप में आ गई। उसने कई पत्थर नीचे ढकेल दिए। अब भेड़ियों को बचने और भागने की बारी थी। वे बचते-बचते नीचे की तरफ भागने लगे। इधर लड़की पत्थर-पर-पत्थर गिराती चली गई। थोड़ी ही देर में भेड़िये आंखों से ओझल थे। शक्ति रूप की जीत हुई थी। कुछ देर इंतजार के बाद लड़की निश्ंिचत होकर नीचे उतर आई।                                                                     
                                                                                     
                                                ज्ञानदेव मुकेश 
                                                पटना-800013 (बिहार)
                                                फोन नं -   0्9470200491

लेखक -ज्ञानदेव मुकेश



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युवाओं में पोर्न एडिक्शन ...क्या हो अगला कदम


एडिक्शन केवल तम्बाकू , सिगरेट या शराब का ही नहीं होता | पोर्न देखने का भी होता है | आज इंटरनेट युग में आसानी से उपलब्द्ध होने के कारण बच्चे और युवा इस की चपेट में आ जाते हैं और अपना कैरियर , खुशियाँ और जिन्दगी तबाह कर बैठते हैं | समझना होगा कि इससे कैसे निकलें |



अपनी जिन्दगी को बदलने के लिए अपनी आदतों को बदलें -जेनी क्रैग 

"हाँ  !तो बोलिए क्या समस्या है ?डॉक्टर ने रीतेश से पूछा

इतनी हिम्मत करके यहाँ तक  आने के बाद भी डॉक्टर के इस पूर्व संभावित प्रश्न पर वो अचकचा सा गया | दिल की धड़कन बढ़ गयी और जुबान जैसे साथ छोड़ने लगी |

"देखिये आप बताएँगे नहीं तो हम आपका इलाज कैसे शुरू करेंगे ?" डॉक्टर ने फिर कहा

पर वो रीतेश का मौन नहीं तोड़ पाया |

अबकी बार डॉक्टर अपनी  कुर्सी से उठ कर रीतेश के पास जा कर उसकी पीठ पर हाथ रख कर बोला ," आप मुझे अपना दोस्त समझ सकते हैं | मेरे पास सब ऐसे ही मरीज आते हैं और मैं एक दोस्त बन कर उनकी मदद करता हूँ |"


रीतेश को कुछ हल्का सा महसूस हुआ और वो हकलाते हुए बोला , " डॉक्टर साहब मुझे अपने आपसे घिन आती है |मुझे लगता है कि मैं अपने को पीटता चला जाऊं तब भी मुझे इस पाप से मुक्ति नहीं मिलेगी | मेरी पूरी जिन्दगी बर्बाद हो गयी |"

"बोलो मैं सुन रहा हूँ |" डॉक्टर ने  छलक आये आंसुओं को पोछने के लिए एक टिसू पेपर उसे देते हुए कहा |


युवाओं में पोर्न एडिक्शन ... 


आँखें पोछ  कर रितेश ने आगे कहना शुरू किया , " डॉक्टर साहब , आज पाँच   साल पहले की बात है , जब मैं 16 -१७  साल का था | मैं भी सामान्य बच्चों की तरह एक सामान्य बच्चा ही था | क्लास में हमेशा अच्छे नम्बरों से पास होता था , और फुटबॉल का अपनी स्कूल टीम का स्टार था | माता -पिता का एकलौता बेटा होने के कारण वो दोनों मुझ पर जान छिडकते थे | उसी समय टेंथ का रिजल्ट आया मैंने अपने स्कूल में टॉप किया था |मेरे पिता बहुत खुश थे , उन्होंने मुझे मनचाहा उपहार मांगने को कहा | मैंने आई .पैड की माँग की | हालाँकि वो महंगा था पर मेरे पिता ने कैसे भी खर्चों को मेनेज कर मुझे वो लाकर दिया |


आई .पैड पाकर मैं बहुत खुश था |  उसी समय मैंने स्कूल के साथ -साथ इंजीनियरिंग इंट्रेंस  की कोचिंग लेना शुरू किया | मेरा सपना IITया NIT से इंजीनियर बनने का था | मैं होशियार था , मेहनती था , मुझे अपनी सफलता पर विश्वास था | स्कूल और कोचिंग दोनों दोनों को सँभालने की कोशिश में मेरे पास हमेशा समय की कमी रहती | क्योंकि मेरा आई .पेड नया था , और उसके प्रति मेरी नयी उत्सुकता थी , इसलिए पिताजी ने मुझसे वादा लिया कि मैं इसे सीमित समय के लिए ही इस्तेमाल करूँ | मैंने भी उनकी बात मान ली , आखिर इसमें मेरा ही भला था | मैं भी तो अपने क्लास के बच्चों को अपने से आगे नहीं जाने देना चाहता था |


परन्तु मैं अपने वादे  पर कायम नहीं रह सका | अक्सर मैं कोचिंग से आकर आई .पैड लेकर बैठ जाता   | माँ टोंकती तो थके होने का बहाना बना देता  | फुटबॉल मैच , फिल्मे , एजुकेशन मैटीरियल  देखते -देखते एक दिन अंगुली  , "देखिये फलां अभिनेत्री के उप्स मोमेंट पर क्लिक कर दी |"दोस्तों ने कई बार इन सब के बारे में बताया था पर फिर भी एक भय सा था कि कि कहीं ये कुछ गलत तो नहीं है | लेकिन उस दिन  जाने -अनजाने मैं उस दुनिया में प्रवेश कर ही गया |   उसके बाद एक के बाद एक ऐसे दृश्य आते गए कि आँखें फटी की फटी रह गयीं | दस मिनट के लिए उठाया गया आई .पैड दो घंटे तक इस साईट से उस साईट का सफ़र तय करता रहा जहाँ दुनिया बेपर्दा थी , नग्न थी और शरीर के स्तर पर ही  सीमित थी |



ये कुछ ऐसे विषय थे जिनके लिए मेरे किशोर मन में सहज जिज्ञासा भी थी , मैं  तो कुछ बूँद समान प्रश्नों के उत्तर ही चाहता था पर अब तो मेरे  आगे विशाल सागर था | पहली बार देखते हुए दिल की धडकने तेज हो गयीं | आँखों के आगे अंधेरा सा छाया और माथे पर पसीना छलछला उठा | पर मन तो जैसे रुकने को तैयार ही नहीं था | माँ की आवाज से ही तंद्रा टूटी और झट से उस साईट से बाहर निकल एग्जाम क्वेश्चन पेपर की साईट में शरण ली | माँ मुझे पढ़ते देख कर संतुष्ट हुई |  उन्हें अनुमान ही नहीं था कि पिछले दो घंटे में उनका मासूम सा बच्चा एक व्यस्क बन चुका है | उस दिन माता -पता से नज़र भी नहीं मिलाई गयी ना ठीक से खाया गया ना ही सोया |
प्रण किया कि अब कल से सिर्फ और सिर्फ पढाई पर ही फोकस करूंगा |


परन्तु अगली सुबह ये प्रतिज्ञा ओस बूँद की तरह उड़ गयी | मैंने  सुबह उठते ही जो सबसे पहला काम किया वो था उन्हीं साइट्स पर फिर से क्लिक  करना और उसी संसार में लौट जाना | दिन , महीनों में बदलने लगे ...पढाई पर ध्यान हटने लगा | कितनी बार खुद को समझाने की कोशिश करता कि मुझे कुछ करना है , कॉम्पटीशन क्रैक करके अपने माता -पिता का नाम रोशन करना है, अच्छी जॉब पा कर देश और समज के लिए कुछ करना है |  ...पर किताब उठाते ही आखों के आगे वेबसाईट की वो आकृतियाँ आने लगतीं और यंत्रवत अंगुलियाँ  उसी और घूम जातीं |


क्लास टेस्ट के रिजल्ट आने लगे | हमेशा टॉप करने वाला मैं क्लास में पीछे होने लगा | माता -पिता  के चेहरे पर चिंता की लकीरे बढ़ने लगीं | माँ आकर समझातीं कि किसी विषय में दिक्कत हो तो कोई और ट्यूशन लगवा देंगे , तुम चिंतामत करो |" पर मुझे माँ की बात पर बहुत गुस्सा आता | उन्हें बता भी तो नहीं सकता था कि मैं इस दुनिया से दूर किसी और दुनिया में विचर रहा  हूँ ... जहाँ ना मन है ना दिमाग, है तो बस शरीर हैं ...शरीर जो केवल एक ही सुख चाहता है , एक  ही सुख मांगता है और एक ही सुख में डूबे रहना चाहता है ...किसी रीढ़ विहीन छोटे जलचर की तरह जिसका उद्देश्य ही बस भोजन और मैथुन होता है | और मुझे तो भोजन से भी अरुचि होने लगी थी | कभी -कभी मेरी आत्मा मुझे धिक्कारती कि मैं ये किस दिशा में आगे बढ़ रहा हूँ ...ये मुझे क्या हो रहा है पर उस सुख के आगे ये दुःख ज्यादा देर ठहर ही ना पाता |


मुझे आज भी याद है कि मेरी पढाई व् कोचिंग में घटती रूचि देख कर पिताजी ने मुझे खुद पढ़ाने  के उद्देश्य से फिजिक्स पढनी शुरू की | मैं स्टडी रूम में  किताब में आई पैड छुपा कर उसमें डूबा रहता   और वो ड्राइंग रूम में फिजिक्स पढने में, ताकि मुझे समझा सकें | जब भी वो मेरे पास आते मैं जोर -जोर से चीखता , किताबें फेंकता और शोर मचाता | उन लोगों को लगने लगा कि मैं पढाई में पिछड़ रहा हूँ इसलिए अवसाद में जा रहा हूँ | उन्होंने मुझे पढाई के लिए मोटिवेट करने  की कोशिश छोड़ कर अपनी सारी  ताकत इस बात में झोंक दी कि मैं कहीं कोई आत्मघाती कदम ना उठा लूँ | अब उनकी बातें में , "तुम कर सकते हो ", का स्थान "क्या हुआ , जो बहुत से बच्चे नहीं कर पाते हैं , वो कहीं और सफल हैं "ने ले लिया | मुझे थोड़ी सी राहत महसूस हुई और अपनी मन -मर्जी का करने की सुविधा भी |


बारहवीं का रिजल्ट निकला तो मैं बस किसी तरह पास ही हुआ था | उस रात मैं बहुत रोया | वो रीतेश जो IIT में आने की कूबत रखता था आज बस पास में सिमिट गया | ये सब मेरा ही किया धरा था | दोष देता भी तो किसे ? मैं कामना के ऐसे  ज्वार  में फंस गया था कि निकलना मुश्किल हो गया था | उस रात माता -पिता दोनों मेरे पास ही बैठे रहे | उनकी चेहरों पर चिंता की घनी रखायें थीं | पिछले दो सालों में उनकी उम्र दस साल बढ़ गयी थी | उस दिन मुझे अपने से घृणा हुई | उस रात मैंने प्रण किया कि मैं उनका सर नीचे नहीं झुकने दूँगा | मैं अपनी इस गलत आदत से छुटकारा पा लूँगा |


कहते हैं जिन्दगी बार -बार मौका देती है पर एक बार मौका खोकर दुबारा मैदान में डट कर खड़े होना बहुत मुश्किल होता है | इतने कम परसेंटेज पर मेरा किसी भी कॉलेज में एडमिशन  नहीं हुआ | पिताजी यहाँ से वहां मेरी मार्कशीट लेकर कितना दौड़े , कितनी कोशिशे की पर परिणाम वही रहा जो होना था | मैंने इग्नू से लॉ  में पढाई शुरू की | मोबाइल पर भी अलार्म सेट कर दिया कि थोड़ी देर नेट सर्फिंग के बाद  बज उठे | मुझे लगा कि अब मुझे  पढने में मन लगाने में कोई दिक्कत नहीं होगी पर ...कोशिश शुरू कर दी | फिर भी मेरा मन उस तरफ खिंचता था |




उन्हीं दिनों मैंने अपने दोस्तों से भी इस बारे में बात की | वो सब मेरी बात पर हंस पड़े देवेश मेरी पीठ पर हाथ मारते हुए बोला ," पगले इस उम्र में इन सब का मजा नहीं लेगा तो क्या ८० साल की उम्र में लेगा |" वैभव ने आँख मारते हुए कहा , " ये उम्र घास  खाने की नहीं मांस खाने की है |"  मेरी ग्रुप की लड़कियों को भी ये बात पता चल गयी | वो भी बहुत हँसी , " अरे हम सब देखते हैं , कुछ गलत नहीं है, इस उम्र में हारमोंस की डिमांड है ... थोड़ी देर देखते हैं जो करना हैं कर भी लेते हैं फिर पढ़ते हैं ... ये सब नेचुरल है " और समवेत हंसी में मेरी चिंताएं कपूर की तरह उड़ गयीं |


कुछ दिनों तक मुझे लगा कि ये सब नेचुरल  है हारमोंस की मांग है | मैंने वेबसाईट देखने पर लगाया प्रतिबन्ध हटा दिया | फिर पढाई पिछड़ने लगी | मैं कितनी भी कोशिश करता ..कितना भी जरूरी काम सर पर होता पर जब तलब सी लगती ...तो उसके आगे सब बेअसर हो जाता | मैंने महसूस किया कि और दोस्तों और मुझमें अंतर हैं | वो इसे अपनी मर्जी से ऑफ़ -ऑन कर सकते हैं | जब जरूरी काम या पढाई के लिए समय निकालना हो तो महीनों के लिए स्थगित भी कर देते हैं | परन्तु मैं ... मैं तो इस दलदल से निकल ही नहीं पा रहा | लगता है जैसे मेरा रिमोट किसी दूसरे के हाथ में हो और मैं यंत्रवत चल रहा हूँ | मैंने एक एप की मदद से वो सारी  वेबसाईट ब्लॉक करीं | उस दिन मुझे लगा कि अब सब ठीक हो जाएगा |



पर अब वो सब साइट्स मेरे दिमाग में खुलने लगीं | उससे भी ज्यादा बेपर्दा , उससे भी ज्यदा नग्न और उससे भी ज्यादा घातक | वेबसाईट से निकलने का ऑप्शन मेरे पास था ...पर उन विचारों से निकलने का कोई ऑप्शन मेरे पास नहीं था | क्योंकि उसमें दिखने वाले लोग कोई फ़िल्मी कलाकार  नहीं थे ....जिन्हें देखकर मैं संतुष्ट होता था ...वो सब मेरे अपने परिचित थे , मेरे दोस्त , मेरे टीचर , मेरे रिश्तेदार और मेरे .....मैं घबरा गया | उस दिन मुझे यह अहसास हुआ ये पाप है ये गलत है ...आखिर मैं ऐसा क्यों कर रहा हूँ ....मेरे साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है |


मैं भयंकर अवसाद में घिरने लगा | मुझे अपने आप से नफ़रत होने लगी | किसी काम में मेरा मन  नहीं लगता | घंटो उदास पड़े रहने के बाद खुद को कुछ अच्छा महसूस कराने के लिए मुझे फिर उन्हीं विचारों की शरण में जाना पड़ता | फिर खुद से घृणा ... और गहरी उदासी | मुझे लगता मैं एक चक्रव्यूह में फँस गया हूँ | मेरे अन्दर खुद को खत्म करने की इच्छा होने लगी | एक -दो बार कोशिश भी करी पर बच गया | कभी -कभी अपने माता -पिता पर दया भी आती है कि आखिर उनका क्या अपराध है ...फिर वही सब कुछ | समझ में नहीं आता कि जो काम मेरी उम्र के लगभग सभी बच्चे करते हैं ...वो मेरे लिए इतना पीड़ा दाई क्यों है ? एक दोस्त ने ही मुझे आपको दिखाने को कहा | बिना माता -पिता को बताये चुपचाप मैं आपके पास आया हूँ | प्लीज डॉक्टर मेरी मदद करिए ... नहीं तो मैं खुद को खत्म कर लूँगा | "

डॉक्टर ने अपना हाथ उसकी पीठ पर फेरते हुए कहा , " घबराओ नहीं , इसका इलाज संभव है | तुम इससे जरूर निकल आओगे | तुमने सही कहा कि तुम्हारी उम्र के दोस्त भी पोर्न देखते हैं पर उन पर इतना असर नहीं होता , जितना तुम पर हुआ | दरअसल किशोरावस्था उम्र ही ऐसी है , जब हॉर्मोन्स के कारण सहज ही मन उस तरफ जाता है | एक बार देखने के बाद दुबारा या बार -बार देखने का मन करता है | पर तुममे और तुम्हारे दोस्तों में फर्क ये है कि उनका अपने मन पर वश है , वो कभी -कभार देखते हैं और तुम एडिक्ट हो गए हो , तुम उसे देखे बिना रह नहीं पाते ...अगर वेबसाईट बंद कर देते हो तो वह सब कुछ तुम्हें अपने विचारों में साफ़ -साफ़ दिखता है | क्योंकि अंदर से मन कहता है कि ये सब गलत है तो मन में अपराधबोध आता है | जिसके कारण अवसाद और आत्महत्या के विचार आते हैं | फिर भी तुम उससे निकल नहीं पा रहे हो क्योंकि तुम्हें पोर्न एडिक्शन हो गया है |"


डॉक्टर के कहे  अनुसार मैंने इलाज शुरू किया और अब मैं इससे निकल कर कम्प्यूटर में उच्च शिक्षा ले रहा हूँ | अगर आप भी इस समस्या से ग्रस्त हैं तो आप भी निकल सकते हैं ...





आमतौर पर देखा जाए तो  में 78 से 80 % तक पुरुष व् 20-25 % महिलाएं पोर्न देखती हैं | ऐसा केवल युवा ही नहीं बल्कि हर उम्र के लोग करते हैं | पहले वो इसके लिए फिल्मों या मैगजीन्स का सहारा लेते थे पर आजकल इन्टरनेट की वजह से उन्हें प्रचुर मात्रा में पोर्न उपलब्द्ध है | नैतिक रूप से पोर्न देखना भले ही गलत हो पर मनोवैज्ञानिक इसे गलत नहीं मानते | और तो और पोर्न  एडिक्शन को बहुत सारे मनोवैज्ञानिक एडिक्शन के तौर पर नहीं लेते | परन्तु मनोवैज्ञानिकों की एक बड़ी शाखा इस विषय में गंभीर हैं कि पोर्न का मानव मष्तिष्क पर वही असर होता है जो अल्कोहोल तम्बाकू आदि नशीली चीजों का होता है | थोडा बहुत देर देखना किसी बालिग के लिए गलत नहीं कहा जा सकता , लेकिन अगर कोई इसके बिना रह नहीं सकता तो मामला  इलाज की जरूरत  होती है | 



क्या हैं पोर्न एडिक्शन के लक्षण 



1-जब लगे की ये समय लगातार बढ़ता जा रहा है |
2- जब लगे कि हर समस्या का हल यहीं है ...क्योंकि देखने के बाद थोड़ी देर हाई महसूस हो और  उसके लिए बार -बार उसे देखें |
3- जब एक अपराधबोध जन्म लेने लगे |
4- जब समय का एक बड़ा हिस्सा इसमें जाने लगे और पढाई या काम में एकाग्रता की कमी आने लगे |
5-जीवन की अन्य जरूरतें , जैसे खाना -पीना सोना आदि प्रभावित होने लगें |
6-जीवन साथी के साथ रिश्ते प्रभावित होने लगे |


जानिये कम्पलशन और एडिक्शन में अंतर 



कम्पलशन में बिना किसी खास कारण के वही व्यवहार बार -बार दोहराने का मन करे | कुछ अच्छा महसूस करने के लिए उसेदेखने का मन करे , जबकि  एडिक्शन में उसके बिना  रहा ही ना जाए , जबकी उसके नकारात्मक पहलु जीवन में दिखने लगे हों |

Students "Adult Content " addiction से कैसे निकलें  ?"

क्या आप इस पर खुद से लगाम लगा सकते हैं 



खुद पर लगाम लगाने की कोशिशों में आप ...


1-इन्टरनेट से वो सारी  साइट्स जो बुक मार्क कर राखी हैं डिलीट कर दीजिये |
2- हार्ड डिस्क में से वो सारा मैटिरियल हटा दीजिये |
3- जब पोर्न देखने की इच्छा जागृत हो तो कोई और ध्यान बंटाने वाला काम करें ...जैसे संगीत सुनना , शतरंज खेलना , या घर में ही किसी से गप्पे मारना आदि |

4-उन ट्रिगर्स को पहचानिए जिसके कारण उस तरफ ध्यान  जाता है |
5-जब भी पोर्न देखने का मन करे तो याद करिए कि इसने आपकी जिन्दगी में कितनी तोड़ -फोड़ मचाई है |
6- योग और ध्यान को अपने जीवन में स्थान दीजिये वो आपके विचारों को नियंत्रित करने में मदद करेगा |
7-अपने इस सफ़र में अगर हो सके तो किसी को अपना राजदार बनाइये जो आपकी इस कोशिश में आपका मनोबल बढाए |
8-अगर आप  धार्मिक हैं ... तो थोड़ा समय अपना ध्यान ईश्वर में लगाइए |

9-एक कॉपी पेन ले कर लिखते रहे कि कब आपको पोर्न देखने की जबरदस्त तलब हुई और उस समय आप ने ऐसा क्या किया कि खुद को रोक पाए |


कब लें डॉक्टर की मदद 


जब आपको लगे  कि आप खुद से निकलने में असमर्थ हैं तो बेझिझक डॉक्टर की मदद लें | खासकर तब जब आपको लगे कि आप अवसादग्रस्त हो रहे हैं या OCD की चपेट में आ गए हैं |


डॉक्टर इसमें ज्यादातर बेहेवियरल थेरेपी देते हैं ...कई बार वो आपके परिवार और दोस्तों को ग्रुप काउंसिलिंग के लिए बुलाते हैं |

डॉक्टर सबसे पहले तो ये पड़ताल करते हैं कि आपको कम्पलशन क्यों उत्पन्न  होता है फिर वो आप के हिसाब से इफेक्टिव  कोपिंग मेकेनिज्म तैयार करते हैं |

आमतौर पर दवाई के स्थान पर कोग्नैटिव थेरेपी ही देते हैं | लेकिन अगर अवसाद या OCD भी है तो उसकी दवाईयाँ दी जाती हैं |

कुछ लोगों को सपोर्टिव ग्रुप से बात करके आराम मिलता है जो इस रोग से निकल चुके हैं | आप  इसके लिए अपने डॉक्टर से बात कर सकते हैं |

अन्य एडिक्शन की तरह पोर्न एडिक्शन पर भी लगाम लगायी जा सकती है और पुन : स्वस्थ , शांतिमय आनंददायक जीवन जिया जा सकता है |




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#अगला_कदम के बारे में 
हमारा जीवन अनेकों प्रकार की तकलीफों से भरा हुआ है | जब कोई तकलीफ अचानक से आती है तो लगता है काश कोई हमें इस मुसीबत से उबार ले , काश कोई रास्ता दिखा दे | परिस्तिथियों से लड़ते हुए कुछ टूट जाते हैं और कुछ अपनी समस्याओं पर कुछ हद तक काबू पा लेते हैं और दूसरों के लिए पथ प्रदर्शक भी साबित होते हैं |
जीवन की रातों से गुज़र कर ही जाना जा सकता है की एक दिया जलना ही काफी होता है , जो रास्ता दिखाता है | बाकी सबको स्वयं परिस्तिथियों से लड़ना पड़ता है | बहुत समय से इसी दिशा में कुछ करने की योजना बन रही थी | उसी का मूर्त रूप लेकर आ रहा है
" अगला कदम "
जिसके अंतर्गत हमने कैरियर , रिश्ते , स्वास्थ्य , प्रियजन की मृत्यु , पैशन , अतीत में जीने आदि विभिन्न मुद्दों को उठाने का प्रयास कर रहे हैं | हर मंगलवार और शुक्रवार को इसकी कड़ी आप अटूट बंधन ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं | हमें ख़ुशी है की इस फोरम में हमारे साथ अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ व् कॉपी राइटर जुड़े हैं |आशा है हमेशा की तरह आप का स्नेह व् आशीर्वाद हमें मिलेगा व् हम समस्याग्रस्त जीवन में दिया जला कर कुछ हद अँधेरा मिटाने के प्रयास में सफल होंगे

" बदलें विचार ,बदलें दुनिया "