मैं बृहन्नला- हमें डेरा नहीं घर चाहिए  

 

 

सुपरिचित कथाकार उर्मिला शुक्ल जी का भावना प्रकाशन से प्रकाशित नया उपन्यास ‘मैं बृहन्नला’ अपने नाम से पौराणिक ऐतिहासिक होने की झलक देता है। महाभारत काल में अज्ञातवास के दौरान अर्जुन ने बृहन्नला का रूप धारण किया था। लेकिन शीर्षक के साथ टैग लाइन ‘देहकारा का प्रेत” विषयवस्तु का किंचित पता दे देती है। यहाँ बृहन्नला का अर्थ प्रतीकात्मक है। उपन्यास ब्याह, जचगी, उत्सवों में ताली पीटकर नाचते-गाते किन्नर समाज की व्यथा-कथा लेकर आता है। किन्नर जिन्हें आम तौर पर हम हिंजड़ा कहते हैं। उत्सवों में नेग पर मोल-भाव करते कितने ही लोग यह जानने का प्रयास करते हैं कि समाज से अलग-थलग किए गए ये लोग किन दारुण दशाओं में रहते हैं। कितना दुर्गम है उनका जीवन। किसी ऐसे शिशु की भनक पड़ते ही कौन उन्हें माता-पिता, परिवार से छीन कर यहाँ ले आता है या कौन उन्हें यहाँ छोड़ जाता है। उपन्यास पर कुछ कहने की शुरुआत उपन्यास के एक वाक्य से करती हूँ –

 

“दोस्तों! सुनयनी ने कहा कि हिंजड़ों के डेरे होने चाहिए। मैं कहता हूँ, डेरे नहीं होने चाहिए उनके घर होने चाहिए, जहाँ वे इंसानों की तरह अपनों के बीच रह सकें।” उपन्यास के अंत में किन्नर पात्र नितिन मोहन द्वारा कहे गए ये वाक्य एक माँग हैं समाज से हमसे आपसे। पर क्या हम ये देने के लिए तैयार हैं?

 

मैं बृहन्नला- हमें डेरा नहीं घर चाहिए  

उमाशंकर उसकी माँ, पत्नी सरोज, बेटी दीपमालिका और बेटे दीपक की एक सरल, सहज कहानी बहुत से प्रश्न उठाती चलती है और समाज के एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में हमें आईना भी दिखाती चलती है। तेज गति से चलते इस उपन्यास की शुरुआत उमाशंकर के परिवार के कुंभ स्नान जाने से होती है। साथ में है पत्नी सरोजिनी, बेटी दीपमालिका और अम्मा जी। यात्रा से अम्मा जी की पिछली स्मृतियाँ सामने आ जाती हैं, बचपन से वह कुंभ स्नान करने जाना चाहती थीं परंतु जा नहीं पायी। विवाह के बाद पति से मुँह दिखाई में भी यही माँगा, पर हो न सका। पति का भी साथ छूटा और ससुराल वालों ने भी न पूछा तो किस तरह से मेहनत-मशक्कत कर उमाशंकर को पाला। कहना होगा कि ये सारी स्मृतियाँ ही नहीं आती, बल्कि और भी न जाने कितनी स्मृतियाँ आती हैं।

मैं बृहन्नला

ये कह सकते हैं शुरू के 20 पेजों में बहुत सारे पात्र हैं, और हैं उनके किस्से। कई बार नाम भूलने पर पलट कर देखना पड़ता है। मसलन जोरावर सिंह और उनके पिता नकबबाज सिंह। यहाँ लेखिका स्पष्ट करती हैं कि नकबजनी का अर्थ होता है सेंधमारी। नकबजनी धन तो देती है पर समाज में इज्जत नहीं देती। लेकिन नकबबाज सिंह ने धन-दौलत और राजनैतिक कनेक्शन से इज्जत भी कमा ली। फिर एक अन्य चाहत ने आ घेरा कि वंश में सुंदर संतानें हों। यहाँ लेखिका मानव मन की बढ़ती लालसाओं के ऊपर इशारा करती हैं। धन, मान और रूप । अपने वंश को रूप सौन्दर्य भी देने की चाहत में वह सुंदर पर गरीब लड़की चंपाकली को माँग कर लाते हैं। फिर भी पहली बेटी पिता पर ही जाती है। गहरा काला रंग और जोरावर सी मुखाकृति। बाद में जोरावर सिंह द्वारा अपनी इसी बेटी स्वर्ण पंखुरी से विवाह के लिए उमाशंकर को एक प्रकार से फंसाना परंतु लड़की का स्वयं विवाह से इनकार कर देना कहानी को करवट देता है। जो बदलते हुए समाज और स्त्री सशक्तिकरण की दस्तक है। विशेष परिस्थितियों में उमाशंकर का सरोजनी से ब्याह और नौकरी के लिए अपने मामा के पास छत्तीसगढ़ जाना, आदि घटनाएँ स्मृति पटल पर तेजी से घटती हैं और कहानी को आधार प्रदान करती हैं। लेखिका ने पृष्ठ संख्या 25 पर पहाड़ से निकलने वाली गंगा और खेत से निकलने वाली चित्रोत्पला का सुंदर वर्णन किया है।

“मगर चित्रोत्पला? राजकुमारी नहीं कृषक बाला थी। उसका जन्म  हिमालय की ऊंची चोटी से नहीं, किसान के खेत से हुआ था। जहाँ कोई ढलुआ राह नहीं थी, जो उसे गति देकर राह आसान कर देती। उसकी राह में तो असंख्य पथरीले टीले थे, जिन्हें तोड़कर आगे बढ़ना था उसे। नदियों का साथ उसे भी मिला पर इसमें किसी का औरा नहीं अपने श्रम का हाथ था। एक बात और जो भी संगी उसके साथ आई, वे विवश होकर नहीं खुशी-खुशी साथ आईं। उन्होंने ही चित्रोत्पला को महानदी बनाया और महानदी का का नाम उस अञ्चल में व्याप्त हो गया।”

जो लोग उर्मिला शुक्ल जी को पहले से पढ़ चुके हैं उन्हें छत्तीसगढ़ में उमाशंकर के परिवार के गमन के साथ ही लोक से जुड़ा कुछ पढ़ने की व्यग्रता होती है। लेकिन सधे हाथों से कहानियों के बीच कहानियाँ बुनते हुए वे स्मृतियों से लोक के कुछ मोती निकाल कर कहानी को कुंभ के मेले की ओर मोड़ देती हैं। जैसा कहना चाह रहीं हो कि आखिर चित्रोत्पला की यात्रा इतनी एकाकी तो नहीं है। एक तरह से लेखिका लगातार अतीत वर्तमान और भविष्य में आवागमन करती रहती है।

कुंभ के मेले में एक किन्नर को देख कर मन में सवाल के साथ कहानी एक रहस्य गूँथती है पर शीघ्र ही सखी राजदेई का रानी साहेब के रूप में मिलना कहानी तो टेन्स मोमेंट से खींच लेती है। बचपन की यादों की पोटली खुलती है और राजदेई उसकी माँ की कथा समानांतर चलने लगती है। बालात्कार से जन्मी राजदेई की माँ की विवशता और किसी अपरिचित को बचाने के लिए स्वयं को समर्पित करने वाली देई के साथ ही कथा देई के विवाह और कुँवर रुद्र आदित्य के साथ दीपमालिका के विवाह की बात करने तक आगे बढ़ती है। आगे कथा दीपमालिका के साथ एक-बार फिर छत्तीसगढ़ के लोक और संस्कृति को पन्नों पर उकेरती है। लेकिन कुंभ के मेले से तो बेटे दीपक की बनती बिगड़ती आहत स्मृतियाँ ही कथा को मार्मिक करती रहती है।

उर्मिला शुक्ल

कहा जा सकता है कि लेखिका ने सिर्फ किन्नरों की ही नहीं स्त्रियों की पीड़ा को भी पूरी शिद्दत से उकेरा है। सगुनी का जीवन पीड़ा की अकथ कथा बन गया तो काली होने के कारण अपने ही परिवार में अपमानित सवर्ण पंखुरी का भी। देई को ससुराल में अपना स्थान मिलने के लिए कितने ही कष्ट सहने पड़े। इधर सरोजनी जो जीवन पर्यंत सास की सेवा करती रही, उसकी कोख को पीड़ा में वही धकेलती हैं। एक स्त्री ही अपनी जन्मी संतान या पौत्र के साथ क्यों नहीं खड़ी हो पाती? सम्पूर्ण उपन्यास इस प्रश्न के साये में चलता है। क्या किसी बच्चे का लड़कियों जैसे कपड़े पहनना या अभिरुचियाँ इतनी नागवार हैं? उपन्यास में एक स्थान पर घर की देहरी से रगड़ते दीपू की कल्पना उमाशंकर करते हैं। देखा जाए तो हिंजड़ा एक अम्ब्रेला टर्म है। शारीरिक दुरुहताओं के अतरिक्त लेखिका ने ट्रांसजेंडर को भी इसमें शामिल किया है। फिर चाहें पुरुष देह में जन्मी स्त्री दीपू उर्फ सुनयनी हो या स्त्री देह में जन्मे पुरुष नितिन मोहन।

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सुनयनी के साथ ही किन्नरों के जीवन की दर्द भरी कथाएँ खुलती जाती हैं। किन्नर जिनका जीवन निष्काषित है, मन प्रेम से वंचित है, देह अत्याचारों से पीड़ित है, वहाँ मृत्यु उत्सव का विषय है। मृत्यु मुक्ति है, ऐसी देह में दोबारा न आना पड़े। फिर चाहें शबनम मौसी हों, जमीला, सुनयनी, गुरु माँ या कोई अन्य, ये कहानी बदलती नहीं। शबनम मौसी की मृत्यु पर कई स्थानों पर पीड़ा घनीभूत हो जाती है। और जब त्यागी हुई बच्ची जमीला का अपने पिता ही उसे अपनी वासना का शिकार बनाना चाहता है तो मन वितृष्णा से भर जाता है। यहाँ लेखिका मानवीय संबंधीं की गरिमा पर भी प्रश्न उठाती हैं। लेकिन उपन्यास केवल पीड़ा की बानगी नहीं है। समानांतर चलती दीपमालिका की प्रेम कहानी और अन्य सहपात्र मन को थामे रखते हैं। पति-पत्नी के झगड़े के बीच मौन प्रेम और देखभाल सुखद है। लेखिका की कल्पना शीलता को प्रमाणित करते रूमानी दृश्य प्रभावित करते हैं और उपन्यास को शुष्क होने से बचाते भी हैं। आज के बदलते समय में बदलती सोच और लेखिका की शुभेकक्षाएँ कथा को उन मोड़ों से गुजारती है, जहाँ आशा की कुछ किरणें प्रतीक्षारत है और एक नया सवेरा होने को है। पोरा के मेले में खोए दीपक की याद में तड़पते माता-पिता पाठक को भी अपने दर्द में डूब जाने को विवश करते हैं।

दीपमालिका के रूप में कहानी एक सशक्त स्त्री पात्र गढ़ती है। अल्ट्रा साउन्ड में जानने के बाद भी वह बच्चे को जन्म देना चुनती है जबकि माँ श्री अपनी ही बेटी की मृत्यु। रुद्र प्रताप भी उस बच्चे के जन्म के विरोध में थे पर संभवतः वह ऐसा फ़ैसला इसलिए ले पाई क्योंकि वह शिक्षित है। आत्मनिर्भर है, वह सीता सी अकेली वन-प्रांतर में जाकर पद का दायित्व संभालते हुए शिशु को जन्म देती है। इसे पढ़कर उर्मिला जी के पहले उपन्यास ‘बिन ड्योढ़ी का घर’ की सशक्त स्त्रियाँ भी याद आ गईं। वही मुख्य पात्र सुनयनी का मेकअप आर्टिस्ट बनना और स्वर्ण पंखुरी का योग्य अफसर बनना देह के ऊपर गुण की स्थापना है। वही स्वर्ण पंखुरी जिसका विवाह जबरन उमाशंकर के साथ कराया जा रहा था। योग्यता से योग्य साथी भी प्राप्त करती है। मानो लेखिका कहना चाह रहीं हों कि अपनी बेटियों को योग्य बनाओ, तब समकक्ष विवाह तो हो ही जाएगा । नितिन मोहन के साथ सुनयनी के विवाह के माध्यम से संदेश देती है कि दो अधूरों का मिलन एक पूर्ण दुनिया रचता है। एक स्थान पर वे रेखांकित करती हैं कि आदिवासी समाज में किन्नरों को ‘खोजा बच्चा’ कहा जाता है। उनकी दुनिया में वे समाज द्वारा बहिष्कृत नहीं हैं। उनकी गड़ना देवताओं में होती है। हालांकि कथित तौर पर अधिक प्रगतिशील आदिवासी समाज भी उसे देवता बनाकर सामान्य जीवन नहीं जीने देता । दीपमालिका के माध्यम से लेखिका यह प्रश्न उठाती हैं कि देवता समझा गया या तत्याज्य। इंसान रहने का अधिकार तो कहीं भी नहीं दिया गया।

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उपन्यास किन्नरों के जीवन की विद्रूपताओं में महत्वपूर्ण प्रश्न पर भी हाथ रखता है कि जब माता-पिता नेत्रहीन, चलने में असमर्थ, या किसी अन्य अर्थ में सम्मानव (ललित कुमार जी का दिया शब्द) को पाल लेते हैं तो इनके प्रति ही दुराग्रह क्यों? क्या सृष्टि की संरचना को आगे न बढ़ा पाना ही किसी का इतना बड़ा दोष है? क्या संतान उत्पन्न करने का एक मात्र उद्देश्य अपने वंश को आगे बढ़ाने का लोभ है? फिर माता-पिता को ईश्वर के समकक्ष मानने पर जोर क्यों, जो अपने द्वारा निर्मित हर जीव-जन्तु  को जीने का बराबर का अवसर देते हैं। और अगर देह ही दोष है तो उनके ऊपर दैहिक अत्याचार क्यों? क्यों किसी न्यायालय में इन अत्याचारों की सुध नहीं ली जाती है।

छत्तीसगढ़, लखनऊ, और इलाहाबाद के मध्य गुजरती कहानी वहाँ की बोली-बानी और परिवेश को भी साथ ले आती है। कुम्भ का मेला, सखी बदना,पोरा त्योहार आदि सहज ही चले आये हैं। कहानी का प्रवाह पाठक से जल्दी ही इसे पढ़वा लेता है। छोटे पर सारगर्भित वाक्य प्रभावित करते हैं। उपन्यास किन्नरों के घर वापसी के अपने उद्देश्य में सफल होता है।

किन्नरों की पीड़ा दर्शाते इस पठनीय उपन्यास के लिए उर्मिला शुक्ल जी को बधाई

वंदना बाजपेयी

वंदना बाजपेयी

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