रुद्रादित्य प्रकाशन से प्रकाशित सुपरिचित साहित्यकार वंदना गुप्ता जी का नया उपन्यास “विशोका” प्रथम द्रष्टया अपने नाम और कवर पेज से ही आकर्षित करता है। विशोका का शाब्दिक अर्थ होता है “शोक रहित” लेकिन गूढ अर्थ में यह मन की वह अवस्था है जहाँ साधक सुख-दुख से परे हो जाता है। कवर पेज पर बनी प्रतीक्षारत ग्वालिन संदर्भों के किसी ऐतिहासिक/पौराणिक कथा से जुड़े होने का संकेत देती है। इसी जिज्ञासा के साथ पाठक जब पुस्तक खोलता है तो वहाँ पर अंकित किवाड़ के पीछे से प्रतीक्षारत स्त्री पन्नों पर शब्दों में ढलती राधा में रूपांतरित हो जाती है, विरह से पीड़ित परंतु स्व अर्जित उत्तरों से संतुष्ट, शोक की आती-जाती तरंगों के मध्य विशोका होने को तत्पर।
जब बात राधा की आती है तो राधा-कृष्ण से जुड़ी कितनी ही कहानियाँ मानस पटल पर अंकित हो जाती हैं। फिर चाहें सूरदास, रहीम, और रसखान का भक्ति शृंगार हो, बिहारी का रूप-रस माधुर्य हो, या कोई अन्य कृति, कितना कुछ कितनी बार लिखा गया है। कहीं “आदि मैं न होती राधे-कृष्ण की रकार पर/तो मेरी जान राधे-कृष्ण आधे कृष्ण रहते” की मानिनी राधा हो या “मेरी भव-बाधा हरौ, राधा नागरि सोई /जा तन की झाँई परैं, स्याम हरित-दुति होइ” की देवी राधा हों। आधुनिक समय में भी राधा-कृष्ण पर कई दृष्टियों से इतना कुछ लिखा जा चुका है। तो ऐसे में किसी नई कृति के सामने आते ही ये सहज जिज्ञासा मन में उठती है कि इसमें नया क्या है? सवाल लेखक और उसकी नई दृष्टि का होता है। कहा भी गया है कि सत्य एक है। जिसे कहने के तरीके भिन्न-भिन्न हैं।
विशोका- समय को फलांग कर तथ्यों का आकलन करती वैचारिक कृति
पुस्तक को पढ़ते हुए इसी नयेपन की खोज मुझे वंदना गुप्ता जी के ही कविता संग्रह “प्रश्न चिह्न आखिर क्यों?” तक ले जाती है, जहाँ वंदना जी कविता के माध्यम से इतिहास के तमाम पात्रों को अपने प्रश्नों के घेरे में लेती हैं, और उत्तरों से एक नवीन दृष्टि देती हैं। कहीं न कहीं मुझे लगता है कि छोटे से काव्य संग्रह से उपजे प्रश्नों और उनसे जूझकर मिले उत्तरों के बाद प्रश्नोत्तरों की लंबी शृंखला से विचरने का गद्यात्मक परिणाम है “विशोका” जिसमें उत्तरों के अन्वेषण में काल के साथ-साथ विधाओं की तोड़-फोड़ या समावेश भी दृष्टिगोचर होता है। एक विधा में दूसरी विधा का संयोजन रचना को आकार देता है। इन्हीं प्रश्न-उत्तरों की लंबी शृंखला के माध्यम से लिखा गया ये उपन्यास कहीं ऐतिहासिक प्रतीत होता है, कहीं दार्शनिक, तो कहीं सहज कल्पना का विस्तार। इस प्रकार नई विधा और शैली विकसित करता है।
अपनी बात में वंदना जी उल्लेख करती हैं कि, “सर्वप्रथम मैंने कृष्ण लीला काव्य रूप में लिखी थी और रास लीला पर समाप्त करते हुए यही लिखा था कि, ‘जब कभी राधा-गोपियों की पीड़ा, उद्धव गोपी संवाद और कृष्ण के जीवन चरित्र का मर्म समझ पाऊँगी तभी नव नवसृजन संभव हो सकेगा।’ मेरे जीवन की घटनाओं ने मेरा दृष्टिकोण बदला और यह उपन्यास लिखवा लिया। जहाँ राधा के माध्यम से कृष्ण का जीवन रेखांकित हुआ है।”
मूलतः इस वैचारिक उपन्यास के केंद्र में राधा हैं। लेखिका की कल्पित राधा पूर्व की राधाओं की भांति प्रेम में पगी और विरह से व्यथित तो हैं, परंतु वे एक बौद्धिक स्त्री हैं, जिन्हे दर्शन, इतिहास, और विज्ञान का भी ज्ञान है। राधा एक स्थान पर रेखांकित करती हैं कि कृष्ण के जाने के बाद उन्होंने पोथियों का स्वाध्याय कर स्वयं को समृद्ध किया है। इन पोथियों में इतिहास, आध्यात्म, दर्शन, और विज्ञान, विशेषकर निषेचन की आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति का ज्ञान भी शामिल है। कथा का प्रारंभ ही भयाकुल ललिता के एक पोथी लेकर आने से होता है, और वह राधा से पूछती है कि, “देखो इसमें क्या-क्या लिखा है?” राधा और ललिता के संवाद से आगे बढ़ती कथा का आधार है भागवत पुराण और उसके माध्यम से ईश्वर बनाए जाने की प्रक्रिया।
16 खंडों में सुंदर और लंबे शीर्षकों से सजे इस उपन्यास में प्रारंभ से अंत तक ललिता प्रश्न पूछती जाती है और राधा अपनी प्रज्ञा के आधार पर उत्तर देती जाती हैं। यदा-कदा उन्हें प्रश्नों का उत्तर किसी व्यक्ति अथवा संयोग से भी प्राप्त हुआ होता है। अतः इन्हीं उत्तरों के बीच में कहीं-कहीं स्मृतियाँ भी आती हैं “देखो तब ऐसा हुआ था न” के रूप में, तो कहीं भविष्य की कल्पना भी। यानी उपन्यास अतीत, वर्तमान, और भविष्य में आवागमन करता है। यहाँ वे काल की लेखकीय छूट भी लेती हैं; क्योंकि गीता और महाभारत (प्राचीन नाम: जय संहिता) का रचना काल ईसा से 500-600 वर्ष पूर्व का है और भागवत का ईसा से 800 से 1000 वर्ष बाद का। प्रस्तुत उपन्यास की कथा भागवत पुराण लिखे जाने के बाद से आरंभ होती है। कृष्ण का परलोक गमन हो चुका है और राधा उनके बारे में प्रचारित/प्रसारित भ्रांतियों को दूर करना चाहती हैं।
इन्हीं संवादों में वे असली राधा और छाया राधा के संशय को भी मिटाती हैं। कहीं पूर्व में मथुरा गए कृष्ण को राधा द्वारा भेजे गए पत्र राधा की मनोदशा की बानगी देते हैं। कहीं उद्धव और गोपी संवाद में भी लेखिका प्रचलित मान्यताओं के विपरीत जाकर नई स्थापना करती हैं। “उद्धो तुम हो राह भुलाने” के स्थान पर उद्धो स्वयं भटककर ही वृंदावन पहुँच गए हैं। उन्हें कृष्ण ने नहीं भेजा है। वे ज्ञान नहीं देते हैं अपितु निश्चल प्रेमधारा का ज्ञान आत्मसात करते हैं। सहपात्रों में राधा के पति रायाण, सखी विशाखा, रुकमणी, नंद बाबा, देवकी-वसुदेव, माता यशोदा आदि आते-जाते रहते हैं।
यूँ तो जिज्ञासु ललिता सभी उत्तरों को अंकित करने का प्रयास कर रही है परंतु राधा को आशा है कि भविष्य में किसी ऊर्जा का उनकी ऊर्जा से मेल होगा और वह उनकी बात को ठीक वैसे ही समझ कर आमजन को सत्य का दिग्दर्शन करा सकेगी। सत्य जिसके बारे में कबीर ने कहा है –
“है कहूं तो है नहीं, नहीं कही ना जाए ।
हां नहीं के बीच में, साहब रहा समाय ।।”
इसी सत्य के दिग्दर्शन में राधा अपनी मेधा के आधार हर प्रश्न का स्व-मतानुसार तर्कसंगत उत्तर देने का प्रयास करती हैं और साथ-साथ आश्वस्त भी करती जाती हैं कि उन्होंने ये सब अपने अध्ययन और दृष्टि से अर्जित-परिमार्जित किया है। जिसका संवर्धन करने के लिए अंतस के दीप को प्रज्वलित करना होता है। राधा अहिल्या से लेकर गांधारी, कुंती, वृंदा, और द्रौपदी सहित अनेक पौराणिक स्त्रियों और अन्य पात्रों के बारे में लिखी गई बातों की व्याख्या करती हैं। कुछ तर्क अति प्रभावित करते हैं, कुछ और तर्कों को आरंभ करते हैं, तो कुछ तर्कों से पाठकीय असहमति होना भी स्वाभाविक है।
तत्सम शब्दावली युक्त उपन्यास की प्रांजल भाषा मनोरम और आनंदित करने वाली है। कुछ अति क्लिष्ट शब्दों के अर्थ नीचे दिए गए हैं जो पाठकीय बाधा में सहायता प्रदान करते हैं और उपन्यास के सहज प्रवाह को प्रभावित नहीं करते हैं। प्रश्नोत्तर के इसी रचना संसार के मध्य राधा के कृष्ण के प्रति प्रेम को अत्यंत काव्यात्मकता के साथ पिरोया गया है। खासतौर से बाद के सत्तर-अस्सी पृष्ठों में यह और उभर कर आता है। यथा-
“प्रेम और अप्रेम ऐसा कोई विधान होता ही नहीं। मुख्यतः अन्तश्चेतना के समीकरण ही बांटते हैं अन्यथा निरभार होना ही अंतिम सत्य है। पृथ्वी से भी हल्की हो जाती हूँ, आकाश से भी व्यापक, वायु से भी तीव्र, अग्नि से भी दाहक और जल से भी शीतल, एक शून्य में समाहित चेतना का ही सम्पूर्ण सृष्टि का विस्तार है और निर्वाण भी।”
कहीं यह आत्म-संवाद ‘पुरुष और प्रकृति’ सा प्रतीत होता है, तो कहीं राधा समय के आर-पार स्व-विन्यासित तथ्यों का बोध करती हैं, तो कभी प्रेम में ईश्वर की स्थापना करतीं हैं। अंततः प्रेम में समाधिस्थ राधा “विशोका” हो जाती हैं।
वंदना गुप्ता जी को भाषा लावण्य से संवर्धित प्रेम की एकात्मता का समेकन करते इस उपन्यास के लिए हार्दिक बधाई।
पुस्तक का नाम- विशोका (उपन्यास)
लेखिका- वंदना गुप्ता
प्रकाशक- रूदरादित्य प्रकाशन
पृष्ठ- 250
मूल्य- 325 रुपये (पेपर बैक)
वंदना बाजपेयी
कवि -कथाकार

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