मोह-मोह के धागे- आम जीवन को सुंदर बनाने की जरूरी कोशिश

विदुषी साहित्यकार भावना शेखर जी का अपने नाम और कवर पेज से ही आकर्षित करता नया कहानी संग्रह “मोह-मोह के धागे” आम जीवन में लिपटी उन पंद्रह कहानियों का गुलदस्ता है जहाँ खुद को घायल करती कंडीशनिग और रूढ़ियों के नुकीले पंजे हैं, प्रेम में छल है, घर के अंदर रंगभेद की तपिश है और बच्चों के लोभ-स्वार्थ से जूझते बुजुर्ग हैं। संग्रह में भावना जी छटपटाहट और बेचैनी से भरा आईना नहीं दिखातीं बल्कि उससे निकलने और जीवन को एक बार फिर से थाम लेने की परवाज का रास्ता भी दिखाती हैं। फिर चाहें “इज़्ज़तदार आदमी” की सुजाता हो, “मिल्की व्हाइट” की चिक्की, मलेछछन की नयनतारा या फिर दाग की “लिपिका”। स्त्री प्रधान संग्रह होते हुए भी उनकी चिंताओं के केंद्र में स्त्री ही हो ऐसा नहीं है। “उम्मीद के पाँव” में वे बुजुर्गों, खासकर विधुरों की पीड़ाओं का भी संज्ञान लेती हैं।

मोह-मोह के धागे- आम जीवन को सुंदर बनाने की जरूरी कोशिश

संग्रह की मेरी सबसे पसंदीदा कहानी संयोग से पहली कहानी “इज़्ज़तदार आदमी” है। कहानी जिस सलीके से “इज़्ज़तदादर आदमी” के टैग में छिपी पितृसत्ता की बखिया उधेड़ती है वह काबिले तारीफ़ है। कहानी का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष है स्त्री को स्त्री की शक्ति दिखाया जाना। एक सशक्त स्त्री ही कन्डीशनिंग की शिकार हो, भाग्य मान जीती हुई स्त्री को सम्मान के साथ जीने की राह दिखा सकती है। विषय वस्तु और प्रेजेंटेशन तीनों आधार पर कसी हुई शानदार कहानी।
न्याय क्या हमेशा यही होता है कि गलत को या जो गलत लगे उसे सजा दे दो । कई बार न्याय में विवेक कि जिम्मेदारी बहुत होती है, जो किसी को फूल की तरह खिला सकती है या काँटों में तब्दील कर सकती है। ‘दाग’ कहानी ऐसे ही टैग लगाने की कहानी है। जिसे लेखिका ने स्पीच के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाया है। लंदन के फेडरल हॉल में यह स्पीच दे रही है, लिपिका, जिसे यूक्रेन युद्ध की रिपोर्टिंग पर आधारित उसकी किताब “ब्लडशेड इन दा स्ट्रीटस ऑफ खारकीव” के लिए ‘बेस्ट मीडिया पर्सन” का सम्मान मिला है। अपनी उपलबद्धि से खुश लिपिका अपने जीवन के वो हिस्से साझा करती है, जो अपमान की कालिमा से गुम हो रहे थे। लिपिका और वैभवी के माध्यम से लेखिका ने न सिर्फ टैग लगाने का विरोध किया है बल्कि अच्छी शिक्षिका और बुरी शिक्षिका के भेद को भी स्पष्ट किया है।
हमिंग बर्ड संसार की सबसे छोटी चिड़िया होती है पर अपने दम पर उड़ती है। हमिंग बर्ड का बिम्ब लिए हुए इसी नाम की कहानी एक लड़की के संघर्षों की बानगी है। प्रेम के नाम पर छली जाने वाली लड़कियों को चेताती है ये कहानी। पितृविहीन एक लड़की जो घर परिवार की जिम्मेदारियों को उठाते हुए युवावस्था के अंतिम पड़ाव की ओर है, प्रेमी द्वारा छली जाती है। बार-बार उसे अपने जीवन में लौटाने की कोशिशें उसके आत्मसम्मान कि धज्जियां उड़ाती जाती हैं। सवाल ये है कि प्रेम जो शक्ति देता है वो इतना कमजोर क्यों करता है? अक्सर जीवन में हारे-थके लोग गलत व्यक्ति के प्रेम में पड़ कर इमोशनल फूल बनते हैं और जीवन भर भुगतते हैं। लेकिन कहानी में अंततः वह खुद समझती है कि जीवन की इतनी विपरीत परिस्थितियों को तो वह अकेले ही झेलती आई है। फिर इस बार इतनी कमजोर क्यों पड़ रही है। झेल लेगी उसका चला जाना। विशिष्ट शैली में लिखी गई ये कहानी टॉक्सिक प्रेम से आजादी की दिशा में उठाया गया सशक्त कदम है।
माँ बनने को स्त्री की पूर्णता से जोड़कर देखा जाता है। इसे आधार बना तमाम रूढ़िगत शोषण भी स्त्री झेलती आई है। लेकिन ममता या ममत्व दैहिक माँ बनने से कहीं बड़ी बात है। “बंध्या नहीं हूँ मैं” कहानी न सिर्फ एक ऐसी स्त्री की पीड़ा चित्रित करती है जो दैहिक रूप से माँ नहीं बन सकती। कहानी उसे यहीं नहीं छोड़ देती बल्कि एक सुंदर समाधान भी लाती है। स्त्री की तुलना अक्सर धरती से की जाती है। धरती कभी बंध्या नहीं होती, न ही स्त्री। उसकी ममता का घेरा बहुत बड़ा है। स्त्री विमर्श से जुड़ी एक सशक्त कहानी है यह।
शीर्षक कहानी, “मोह-मोह के धागे” अपने नाम के अनुसार ही प्रेम के ताने-बाने से बुनी है। प्रेम को परिवार की स्वीकृति मिलना सहज नहीं हैं। धर्म, जाति, वर्ग, आर्थिक स्तर कितने पैरामीटर पर प्रेम को महज आकर्षण ठहराकर लड़कियों को कहीं और ब्याह दिया जाता है। फिर वे वहाँ चाहें कैसे भी दुख झेलें। विपरीत परिस्थितियों की रेतीली जमीन पर भी प्रथम प्रेम की तरलता को मन में बचाए रहती है ऐसी ही एक लड़की मीना। पर मोह का यही बीज भयंकर बीमारी में भी प्राणों को देह में अटकाये रहता है। एक नजर देखना भर और हमेशा के लिए खामोश हो जाना। एक अधूरी प्रेम कहानी दुखांत के साथ अपनी पूर्णता को प्राप्त होती है और पाठक के मन में एक गमगीन सा एहसास छोड़ जाती है।
थैंक यू एक बहुत छोटा सा शब्द है, जिसे हम अपनों से कहने से बचते हैं। अपनों को क्या कहना ? खासकर माँ के स्नेह को महसूस तो करते हैं पर शुक्रिया कहने से बचते हैं। क्या इसे इस तरह से नहीं सोचा जा सकता कि यही भाव स्त्रियों में एक खालीपन भर देता है। उन्हें अपना जीवन निरुद्देश्य केवल सेवा को समर्पित लगता है। उम्र के एक पड़ाव पर माँ अपनी बेटी नेहा से सीखती है थैंक यू का जादुई असर और उसे अपनी माँ पर भी आज़माती है। कहानी संकेत देती है कि एक छोटा सा शुक्रिया किसी के मन में अपनों की दुनिया में खास होने का एहसास घोल देता है।
“मिल्की व्हाइट” एक ऐसी कहानी जो आम घरों में आसानी से देखी जा सकती है। दो बहनों में अगर रंग में थोड़ा भी अंतर हो तो एक को बिल्कुल काला माना लिया जाता है। माता-पिता को तनाव रहता है कि बड़ी की शादी तो आराम से हो जाएगी, इस कल्लों का क्या होगा? अक्सर इसमें कम गोरी बेटी में आत्मविश्वास की कमी आ जाती है। पर लेखिका का उद्देश्य मात्र यह दिखाना नहीं है। वे घर में स्वीकृत सुंदरता के दोष भी दिखाती हैं। आसानी से मिली प्रशंसा लड़की के किसी और गुण को उभारने ही नहीं देते। छोटी विद्रोही हो शिक्षा पर काम करती है। कहानी का विशेष पक्ष ये है कि छोटी का विवाह एक ऐसे दक्षिण भारतीय परिवार में होता है, जहाँ सबका रंग काला है और वहाँ उसे मिल्की व्हाइट समझा जाता है। रंगभेद पर प्रहार करती कहानी घटनाओं के उतार-चढ़ाव से यह दर्शाने का प्रयास करती है कि रंग और सुंदरता से ज्यादा ध्यान लड़की के गुणों को विकसित करने में लगाना चाहिए। कहावत है न, “जिसका आप संभल गया उसका जग संभल गया।”
जीवनसाथी का जाना दुखद है पर अकेलेपन से बचने का उपाय स्वार्थी-लोभी संतानों के पास रह जाना भी नहीं है। नाजुक और मार्मिक घटनाक्रमों से गुजरती कहानी “उम्मीद के पाँव” 58 वर्षीय विधुर सोमेश भटनागर के लालची बच्चों के आगे हथियार डालने स्थान पर ज़िंदगी को आगे बढ़ाने के फैसले लेने की कहानी है। फिर चाहें वह दूसरा विवाह हो या ट्रेन एक्सीडेंट में परिवार को खो देने वाली बच्ची को गोद लेना। “अब तो ज़िंदगी ऐसे ही काट देनी है” की जगह “फिर से रीस्टार्ट” की बानगी है “उम्मीद के पाँव”
थोड़ा ऐतिहासिक टच लिए हुए “मलेच्छन” इसी नाम से पुकारी गई एक अंग्रेज नर्स की कथा है,जिसने बाद में नयनतारा बन देश सेवा में अपनी महती भूमिका निभाई। “फिरोजा”, “रोशिनी की लकीर”, धर्म का एक पाँव” और वनवास भी संदेश देती सार्थक कहानियाँ हैं।
भावना शेखर जी को प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित 144 पेज के “मोह-मोह के धागे” की छोटी पर कसी हुई सहज, सौउद्देश्य, सार्थक कहानियों के लिए बहुत-बहुत बधाई
वंदना बाजपेयी
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