जब बात प्रेम की होती है तो सबसे पहले राधा-कृष्ण का नाम स्मरण में आता है । एक ऐसा प्रेम जो दिव्य है और अतुलनीय है । लेकिन प्रेम की इस दिव्य धारा के बीच में सिर्फ प्रेम का मनमोहक रूप ही नहीं है, विरह की चीत्कार भी है और ओंकार का नाद भी । राधा और कृष्ण के प्रेम के साथ भागवत और उसके पात्रों को राधा के दृष्टि से समझने का प्रयास करती वंदना गुप्ता की कृति ‘विशोका’ पर पढिए मीनाधर पाठक का समीक्षात्मक लेख –
विशोका – राधा के किसना का श्रीकृष्ण हो जाना
यह तो परम्परागत मान्य है कि महाभारत की मूल कथा वेदव्यास ने सुनाई और रची गणेश जी ने। यहाँ व्यास स्वयं कथा पात्र भी हैं। इस कथासागर के अनेक पात्रों और कथाओं पर कई आधुनिक हिन्दी उपन्यास, नाटक और काव्य लिखे गए हैं। जो मूल कथा को नई दृष्टि देते हैं, पुनर्कथन करते हैं। समकालीन दृष्टिकोण, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक सन्दर्भों से पुनर्परिभाषित करते हैं।
हमारे धर्म ग्रंथों में कृष्ण एक ऐसे नायक हैं जिनसे हम सब प्रेम करते हैं। उनका बाल स्वरूप हो, युवा अथवा प्रौढ़। उनके सभी रूप हमें अभिराम, दिव्य और प्रेमिल लगते हैं । कृष्ण को यदि हम ईश्वर न माने, तो भी हमें उनकी जीवन गाथा आकर्षित करती है, लुभाती है और द्रवित भी करती है। जिसे सुन-सुनाकर, पढ़कर उनसे अनुराग होता है। उनके जीवन की दुश्वारियाँ, पग-पग पर प्राण हंता योग, शत्रुओं का छल और इनसे बचते-बचाते, पलते-बढ़ते और युवा होते कृष्ण; धेनु चराते हैं, माखन चुराते हैं , बंसी बाजते हैं और विषम परिस्थितिओं में गोकुल वासियों की रक्षा भी करते हैं। शिक्षा के साथ अस्त्र-शस्त्र का अभ्यास भी करते हैं और पूरे जीवन बिछोह का दुख भोगते हुए परम गति को प्राप्त हो जाते हैं। ऐसे मनमोहन से किसे प्रेम न होगा ! परन्तु जब हम कोई कृति रचने बैठते हैं तब हम भावनाओं को परे कर तर्कों को साधते हैं। वंदना जी ने ‘विशोका’ रचते हुए यही किया है।
वंदना जी की नवीनतम कृति विशोका पढ़ते हुए मन में अनेकानेक भाव उमड़ते हैं। कथा राधा और ललिता संवाद से आरंभ हो कर अतीत और वर्तमान में आवाजाही करती है। संवादों का रच रचाव मन मोहता है। जिज्ञासा उत्पन्न करता है।
द्रोपदी और कौरवों के जन्म को लेकर ललिता के प्रश्नों का राधा द्वारा दिया गया उत्तर लेखक के अध्ययन को दर्शाता है। यहाँ वंदना जी कई मत लेकर आती हैं।
जैसे– धृतराष्ट्र कामान्ध थे। संभवतः युयुत्सु की तरह दासी पुत्र हों और वेदव्यास ने इसपर पर्दा डाल दिया हो। या
— गांधारी ने एक बार में कई-कई शिशुओं को जन्म दिया।
एक स्थान पर वे राधा से कहलवाती भी हैं, “इतना अवश्य संभव है दो चार बार महारानी गांधारी से इसी प्रकार कभी आठ कभी दस या बीस पुत्र उत्पन्न हुए हों और दो चार सामान्य रूप से उत्पन्न हुए हों, किन्तु सौ की संख्या तब भी असंभव लगती है।”
अब यहाँ पाठक के मन में भी प्रश्न उठता है कि यदि एक बार में कई-कई शिशुओं को गांधारी ने जन्म दिया तो वे शिशु कैसे होंगे? कितने स्वस्थ होंगे जो बाद में इतने बड़े योद्धा बने ? संभवतः एक स्त्री एक बार में तीन-चार या पांच बच्चे को जन्म दे भी दे पर लगातार कई बार यह प्रक्रिया दोहराई जाए, ऐसा संभव हो, यह जान नहीं पड़ता है।
आगे राधा अपने इस बात से ऊपर उठकर एक और संशय प्रकट करती हैं कि “हो सकता है कि गांधारी का अविकसित गर्भ नन्हे-नन्हे गुच्छों के रूप में गिर गया हो और ऋषियों ने किसी रासायनिक द्रव्य में रखा हो और उसे किसी प्रक्रिया के तहत सुरक्षित किया गया हो।
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राधा अपने अनुमानों को स्वयं भी बचकाना कहती दृष्टिगत होती है। कई मतों और तर्कों के साथ महाभारत की कथाओं पर अपनी तीक्ष्ण दृष्टि रखते हुए वंदना जी की कलम खूब चली है। यह उपन्यास हर एक पात्र के चरित्र को प्रश्नों के कटघरे में खड़ा करता है। पढ़ते हुए अचानक महाभारत से निकल आप रामायण की घटनाओं और पात्रों से रूबरू होने लगें, तो आश्चर्य नहीं।
चीजो को समझने और दिखाने का हर एक व्यक्ति का अपना दृष्टिकोण होता है । किसी को पात्र आधा भरा दिखाई देता है तो किसी को आधा रिक्त। किसी को एक प्रस्तर में ईश्वर के दर्शन होते हैं तो किसी को निष्प्राण खंड।
राम और कृष्ण भी तो मानव ही थे किंतु उनका चतित्र, कार्य शैली, परिवार, समाज, राष्ट्र के प्रति उनकी सोच, प्रतिबद्धता, धैर्य और समर्पण ने उन्हें ईश्वरत्व प्रदान किया। कोई पुरुषों में उत्तम कहलाया तो कोई योगेश्वर, गोपेश्वर आदि आदि। परंतु यदि कोई उनको मानव मात्र मानकर उनके किए पर प्रश्न करें तो यह उनका अपना दृष्टिकोण है। अवतार की अवधारण से परे यदि देखा जाय तो वे थे तो मानव ही। इसे नकारा नहीं जा सकता। महाभारत और रामायण लिखने वाले भी मनुष्य ही थे। भले ही काल का अंतर हो पर मानव प्रकृति तो आज भी वैसे ही है। सत्य को मिथ्या और मिथ्या को सत्य सिद्ध करने वाली।
आज इतिहास से छेड़छाड़ का आरोप लगाया जाता है कि हमारे इतिहास को वैसा नहीं लिखा गया जैसा उसका स्वरूप था या सच्चाई से इतर मनगढ़ंत कहानियाँ गढ़ी गईं, तो क्या इन ग्रंथों के साथ ऐसा नहीं हो सकता ? प्रश्न ढेर सारे हैं और उठेंगे भी।
विशोका में राधा और ललिता के माध्यम से जो प्रश्न और उत्तर के रूप में संवाद चल रहा है वह पाठक मन को अपने घेरे में लिए बिना नहीं रहता। चीरहरण के समय क्या द्रोपती स्वयं को विवसन होने से बचा पाई होगी? क्या सच में कोई साड़ी इतनी लंबी हो सकती है, जो खींचते-खींचते पसीना आ जाए और उसका छोर ही न मिले ? चमत्कार से परे क्या हम इस बात की कल्पना कर सकते हैं ?

राधा का ये कहना कि व्यास ने बहुत से तथ्यों पर पर्दा डाल, उसे अपनी तरह से लिखा है, सत्य ही प्रतीत होता है। इतिहास साक्षी है कि पूर्व में जो भी लिखा गया, अपने राजाओं का महिमा मंडन ही किया गया। इसी लिए ‘आदिकाल’ को ‘चारण और भाट काल’ भी कहा गया। इस काल में अपने-अपने राजाओं के शौर्य का बढ़ा चढ़ा कर गुणगान किया गया। क्योंकि कवि राज्याश्रित थे। अपने राजा के विरुद्ध नहीं लिख सकते थे। वही क्यूँ? राज्य का कोई अन्य कवि भी नहीं लिख सकता था। यूँ ही तो ये कहावत नहीं बनी होगी कि ‘बातहि हाथी पाइए, बातहि हाथी पाँव’ ! तो हजारो वर्ष पूर्व महर्षि व्यास भी तो राज परिवार का एक अभिन्न अंग ही थे, तो क्या महाभारत की कथा लिखते समय उन्होंने अपने राजा व् सगे सम्बन्धियों का बचाव न किया होगा?
‘सिमोन द बोउवार’ की एक पंक्ति अक्सर कोट की जाती है, कि ‘स्त्री पैदा नहीं होती, बना दी जाती है’ तो यदि यहाँ लेखक का मानना है कि ‘ईश्वर भी बनाया जाता है’ तो यह उसकी चेतना का विस्तार ही है। महाभारत की हर कथा, उप कथा को लेखक ने अपने तर्कों की कसौटी पर कसा है।
एक स्थान पर वंदना जी लिखती हैं, “मानव का स्वभाव है, वह अधर्म से भयभीत होता है। यही भय उसे अपना ईश्वर गढ़ने का हेतु देता है।”(पेज़ न० 86)
राधा के मन में कहीं न कहीं इस बात का क्षोभ भी है कि वेद व्यास ने उनका नाम क्यों नहीं लिया ? ललिता के प्रश्न पर वे मुस्कुराते हुए कहती हैं, “ललिते, मैं इतिहास का वह पन्ना हूँ जिसे देवी बना बिसरा दिया गया जिससे उनके ईश्वर पर कोई आक्षेप न लगे।” (पेज़ न० 87)
वह पुरानों में वर्णित राधा को छाया राधा कहती हैं।
विशोका में वंदना जी ने सभी चमत्कारों, ईश्वरत्व से परे जा कर इन पात्रों को देखा है। कई प्रसंगों पर प्रश्न उचित लगते हैं परंतु कई-कई बार इन प्रश्नों के रेशे मन के तारों से उलझ उलझ जाते हैं।
कोई भी कृति पढ़ते हुए हर एक पाठक अपनी तरह से उसे लेता है, लेगा भी परंतु लेखक ने अपने विचारों, अंतर्द्वंदों को अत्यंत सुगढ़ता और गम्भीरता से प्रतिष्ठित किया है।
जैसे-जैसे हम कथा में आगे बढ़ते हैं राधा का बिरह मन में घुलने लगता है। भीतर का औत्सुक्य करुण रस में परिवर्तित होने लगता है। राधा का आत्मालाप उर को भिगोने लगता है। सारी जिज्ञासाएँ मन को द्रवित कर नेत्रों से छलकने को उद्यत होती हैं। कथा, कवितामय हो जाती है। अतीत में कृष्ण के साथ बिताये मधुर पल, हास-परिहास, रूठना-मनाना, उलाहना, सारी स्मृतियाँ राधा को स्मरण हो आती हैं। यहाँ राधा कृष्ण का श्रृंगारिक काव्यमय संवाद अंत्यंत मनहर हैं परन्तु यह राधा का बीता हुआ कल है।
वर्तमान में राधा का अपने किसना को लेकर बावलापन चरम पर पहुँचता है। माता-पिता की चिंता बढ़ती है कि बेटी का ब्याह कैसे होगा? कौन इसका हाथ थामेगा। राधा मौन हो स्वयं को परिस्थितिओं के हवाले कर देती हैं। ऐसे में रायाण आगे बढ़कर राधा जिस रूप में है, उसे उसी रूप में स्वीकारता है। संभवतः यहाँ लेखक की मंशा यह दिखाने की है कि प्रेम का एक रूप यह भी होता है। हम जिससे प्रेम करते हैं, यह आवश्यक नहीं कि वह भी हमसे प्रेम करे। ललिता का प्रेम भी इसी श्रेणी में आता है। वह जब देखती है कि किसना और राधा एक दूसरे के प्रेम में हैं तब वह विलग हो जाती है। अपना प्रेम हृदय में पालती है और सदा राधा से अपने मित्र भाव का निर्वाह करती है।
यहाँ रायाण के व्यक्तित्व का अत्यंत सुंदर चित्रण हुआ है। यह जानते हुए भी कि राधा कृष्ण के प्रेम में है। उसके लिए बावरी है। वह ब्याह के लिए प्रस्तुत होता है और जीवन भर उससे कृष्ण को ले कर कोई प्रश्न नहीं करता जबकि राधा ता-उम्र कृष्ण कृष्ण ही करती हैं।
वंदना जी की राधा मात्र कृष्ण की प्रेमिका नहीं हैं। वे एक जिज्ञासु विद्यार्थी, समाज सेविका, प्रकृति प्रेमी और पारिवारिक स्त्री हैं। उपन्यास में उनके कई कई रूप देखने को मिलता है।
कथा के सभी पात्रों को एक आम व्यक्ति के रूप में दर्शाया गया है। यहाँ कृष्ण, किसना है। वह कोई योगेश्वर-परमेश्वर नहीं हैं, एक ग्वाला हैं जो मेला देखने मथुरा जाते हैं और मल्ल युद्ध में कंस को मार कर वहाँ का वैभव देख वहीं रुक जाते हैं। वसुदेव देवकी के आजाद होने पर उन्हें सत्य का ज्ञान होता है कि वह नंद बाबा के पुत्र नहीं हैं। देवकी उन्हें अपने वात्सल्य का वास्ता दे कर रोक लेती हैं और वह नंद बाबा, यशोदा मइया,राधा, ग्वाल-बाल, गोपियों, धेनु धेनव, सबको बिसरा, वे वहीं रुक जाते हैं। वह रुक तो जाते हैं परंतु वहाँ रह नहीं पाते। वहाँ के लोग उन्हें राजा के रूप में स्वीकार नहीं करते। कारण कि वह एक ग्वाला हैं और एक ग्वाला मथुरा का राजा कैसे बन सकता था! अतः कुछ काल के उपरान्त किसना अर्थात श्रीकृष्ण को द्वारिका की ओर प्रस्थान करना पड़ता है।
“ऊधो मोहि ब्रज बिसरत नाहीं”… अथवा
“संदेशों देवकी सो कहियो…।”
सूरदास की ये पंक्तियाँ, जिनमें कृष्ण अपने सखा संबंधियों को स्मरण करते हैं और यशोदा द्वारा देवकी को संदेश भेजे जाने का मार्मिक चित्रण हुआ है। पढ़ कर कौन है जिसकी आँखें न छलक पड़ी होंगी ! परन्तु यहाँ कृष्ण उससे इतर दीख पढ़ते हैं। उद्धव भी। कालिया मर्दन कथा, जो हम बचपन से पढ़ने आए हैं। यह प्रकरण भी विपरीत पढ़ने को मिलता है।
महाभारत कथाओं का महासागर है। इन्हें बहुतों ने अपनी-अपनी दृष्टि से पढ़ा है, देखा है और लिखा भी है। उसी की अगली कड़ी है विशोका । जिसकी मुख्य पात्र राधा हैं। लेखक ने इन कथाओं, पात्रों को अपनी दृष्टि दी है।
अंत आते-आते लेखक यशोदा, द्रोपदी और स्वयं श्री कृष्ण/ किसना का दुःख वर्णित करना नहीं भूलतीं।
— कुरुक्षेत्र में कृष्ण का नन्द बाबा, यशोदा मैया व राधा से मिलना।
— नन्द बाबा और यशोदा का अंतिम संस्कार। युद्ध के बाद की स्थितियाँ। कृष्ण का अनुताप। उनका एकांत। अवसाद की स्थिति में वन गमन व परलोक गमन।
— तीर्थयात्रा करते हुए राधा जब केदार नाथ पहुँचती हैं, वहाँ का दृश्य। इन सभी प्रसंगों का लेखक द्वारा अद्भुत शब्द-चित्र उकेरा गया है।
कृति की भाषा तत्सम शब्दावली से युक्त है। प्रवाह ऐसा कि थमने का नाम नहीं लेता। बहुत से दुरूह शब्दों के अर्थ दिए गए हैं, बावज़ूद इसके समझने के लिए कभी-कभी गूगल बाबा का सहारा लेना पड़ता है। विशोका अत्यंत जिज्ञासू व पठनीय कृति है। वंदना जी ने जो विषय उठाया है उसका निर्वाह पूरी गम्भीरता से किया है।
रुद्रादित्य प्रकाशन ने बड़े मनोयोग से पुस्तक को प्रकाशित किया है। वर्तनी की त्रुटियाँ नगण्य हैं। ‘प्रवेश सोनी’ जी का आवरण चित्र पूरी कथा को अपने में सहेजे है।
और अंत में बस इतना ही कि उपन्यास में लेखन ने श्रीकृष्ण को वेदव्यास द्वारा ईश्वरत्व प्रदान किया जाना और उनकी मृत्यु के बाद उनके ईश्वरत्व का प्रसार पाण्डवों द्वारा किया जाना दर्शाया है। हालांकि इन विचारों से बहुत-सी अ-सहमतियाँ भी हो सकती हैं।
एक सुन्दर और महत्वपूर्ण कृति हेतु वन्दना जी को बहुत-बहुत बधाई और अशेष शुभकामनाएँ।
मीनाधर पाठक

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हिन्दुस्तानी मेमने -उपन्यास अंश
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