खरगांव का चौक- मृत्यु के हाहाकार से सहकारिता की किलकारी तक खेत, खलिहान, किसान

 

 

“अन्नदाता” शब्द किसानों के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है। अन्न जिससे हम सब का रक्त, माँस, मज्जा बनता है। जन्म माँ देती है, पर पालता तो अन्न ही है और इस अन्न को खेतों में शीत, घाम, वर्षा में अपना हाड़ गला कर उपजाता है ‘अन्नदाता”। जिसको केवल शाब्दिक सम्मान दे देने से अन्न का कर्ज उतर जाता है? खासतौर से ऐसे समय में जब किसानों की आत्महत्याओं के किस्से रोज सामने आ रहें हैं। आँकड़े बताते हैं कि सन 2022 में कृषि से जुड़े 11,290 लोगों की आत्महत्या के मामले सामने आए। माहराष्ट्र इनमें अग्रणी है। इसी साल जनवरी से अक्तूबर के बीच महाराष्ट्र के 2000 से अधिक किसानों ने आत्महत्या की। 2024 के शुरुआती छः महीनों में 1267 किसानों ने आत्महत्या की, इनमें से 557 राज्य के विदर्भ क्षेत्र के अमरावती मण्डल में हुईं। विदर्भ क्षेत्र कपास और संतरे की खेती के लिए जाना जाता है। अखबारों में आँकड़े पढ़ने के बावजूद हममें से अधिकांश लोगों ने ये जानने का प्रयास नहीं किया कि, ‘रसीले संतरे उगाने वाले किसानों का जीवन रस सूख रहा है?

 

खरगांव का चौक- मृत्यु के हाहाकार से सहकारिता की किलकारी तक 

लेकिन यही प्रश्न रमाकांत पुरस्कार से सम्मानित चर्चित साहित्यकार आशा पाण्डेय जी के चिंतन के बीज बने। चिंतन ने समस्याओं की गहन पड़ताल की और कलम पीड़ा को दर्ज करती चली गई। विदर्भ खासकर अमरावती के आस-पास के किसानों की आत्महत्याओं पर केंद्रित उपन्यास “खरगांव का चौक” में गाँव, खेत-खलिहान, किसानों का जीवन, समस्याएँ, संघर्ष तो दर्ज हुए ही हैं उनको दिशा भी दिखाई गई है। एक जटिल विषय पर लिखे गए इस उपन्यास में प्रेम की अनकही धारा है, रिश्तों की गरिमा है और तमाम आशाओं अपेक्षाओं के बीच साथ मिलकर चलने का जज्बा भी। आज जब शहरी समाज मॉल कल्चर में एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ में लगा हुआ जीवन और सुकून का नाश कर रहा है तो आशा पाण्डेय जी उन्हें गाँव की कच्ची पगडंडियों पर से ले जाकर दिखाती हैं कि ये देखो असली संघर्ष। जो सारे जग के लिए दाने उगा रहा है वह कैसे दाने-दाने को मोहताज हो रहा है। आज शिल्प और भाषा की वीथिकाओं में महकते-गमकते साहित्य के बीच आशा पाण्डेय जी ने माटी से मटमैले, खुरदुरे विषय को उठाने और उसे सहजता के साथ बरतने महत्वपूर्ण का कार्य किया है। खास बात यह है कि उपन्यास को आंकड़ों से भर नहीं दिया गया है। उपन्यास पूरे कथारस के साथ आगे बढ़ता है और हमारी माटी की गंध, लोक और उत्सवों को सहेजता चलता है। प्रथमेश, श्रीहरि गोविंदा, गिरीश, शांता, मीरा, शारदा, नंदा ही नहीं मानमोड़े जैसे बुजुर्ग भी पाठक के मन में एक खास जगह बनाते चलते हैं। उपन्यास पर मैं कुछ प्रमुख बिंदुओं को लेकर अपनी बात रखना चाहूँगी।

 

कृषकों ने थक जब किया,वरण मृत्यु का द्वार

धार-धार आँखें बहीं, चहुँदिश हाहाकार

चहुँदिश हाहाकार, बताती कथा यही है

किन्तु पकड़ कर हाथ, दिखाती राह नई है

नव खरगांवीं चौक, बनाया तकनीको ने

श्रीहरि वा प्रथमेश, सहित ही सब कृषकों ने

उपन्यास पर आधारित कुंडली छंद

क्या है खरगांव का चौक

खरगांव के पूर्वी किनारे पर सौ-डेढ़ सौ साल पुराने इमली के पेड़ के है। जिसकी चाय में गजानन महाराज का मंदिर है और इसी पेड़ की जड़ के पास गाँव की पंचायत द्वारा एक पक्का चबूतरा बनवाया गया है। वहीं महिलाओं के बैठने के लिए दो बेंच बनवाई गई हैं। एक तरह से ये चौक गाँव की चौपाल लगने का अड्डा है। जहाँ मंदिर में भजन-पूजन, पंगत के साथ ही गाँव की नीतियाँ तय होती हैं। कहकहे लगते हैं और सुख-दुख साझा होते हैं। मुझे उपन्यास का नाम और इस चौक का होना बहुत सिम्बॉलिक लगा। क्योंकि आगे बढ़कर यही चौक तकनीकी की चौक में बदलता है, जो गाँव के विकास को एक नई दिशा देता है। महिलाओं की बेंच का होना एक नए समाज की आशा है, जहाँ स्त्रियाँ भी अपनी बात रखने को स्वतंत्र ही नहीं हैं बल्कि उनकी बात सुनी भी जाती है। उपन्यास में कई जगह पर स्त्रियों की इन प्रतिरोधों को तरजीह दी गई है।

खेती-किसानी और हैरान-परेशान किसान   

कहानी की शुरुआत एक किसान संतोष के परिवार से होती है, जिसने कुछ माह पहले आत्महत्या कर ली थी। संतोष अपने पीछे पत्नी शारदा, दो बच्चे (गोविंदा और श्रीहरि) और भाई प्रथमेश को छोड़ गया है। उदासी अभी भी घर भीतर उसी तरह से पैबस्त है। उपन्यास एक टूटे-उजड़े घर के साथ आगे बढ़ते हुए गाँव और किसानों के दुख-दर्द की पूरी कुंडली खोल देता है। वहीं ठहरकर यह देखने का प्रयास भी करता है कि आखिर पहले क्या-क्या होता था, जो किसान मौसम की मार से परेशान तो होता था पर कोई आत्मघाती कदम नहीं उठाता था।

कहानी बताती है कि मुख्य समस्या हाइब्रिड बीजों की हैं, जो पहली बार तो फ़सल अच्छी देते हैं। फिर बीज भी खरीदने पड़ते हैं उस पर सिंचाई, खाद-पानी, कीटनाशक का खर्चा इतना हो जाता है कि किसान की लागत बढ़ जाती है और लाभ कम। संतोष के जीवन पर गौर करेंगे तो कई माफिया मिलेंगे। चार एकड़ पर हुई अच्छी संतरे की फ़सल का डेढ़ से पौने दो लाख मांगने पर व्यापारी हल्के  गलने का इंतजार करते हैं फिर सवा लाख में बुक करके दाल में नमक बराबर ऐडवांस दे, कुछ दिनों बाद सौदा रद्द कर देते हैं। घबराए किसान से कुछ और दिन बीत जाने पर उन्हीं के आदमी औने-पौने दामों में फ़सल खरीद लेते हैं।

एक समस्या यह भी है कि अधिकतर कार्यवाही कागजों पर ही होती है। कर्ज माफ़ी हो या नुकसान की भरपाई धनी किसान पैसे ले-देकर वो लाभ भी अपने हिस्से करवा लेते हैं। पटवारी अपना हिस्सा लेकर इनका नुकसान बढ़ा-चढ़ा कर लिख देता है। यथा-

दामूजी अपनी कुर्सी से उठा, पटवारी से हाथ मिलाया और एक झटके से बाहर निकल गया।संतोष ने प्रदीप से कहा, “इन्होंने तो सोयाबीन पेरा भी नहीं था ? उड़द मूँग भी नहीं? फिर इन्हें किस नुकसान की भरपाई करेगी सरकार?”

अगर संतरे की गलन किसान के सिर का दर्द है तो कपास की खेती पर इल्ली और अरहर पर डुक्कर का कहर। सब्जी बोने वाले किसानों का दर्द अलग है। खुद बेचने के लिए कभी उन्हें नागपुर रोड तो कभी अमरावती जाना पड़ता है। पैदावार ज्यादा होने पर दाम गिरता है वो अलग । कहानी में संतोष एक स्थान पर हिसाब लगाता है कि अगर वह तीनों किसी के खेत में मजदूरी करते तो ज्यादा पैसा  मिल जाता है। यानी छोटी जोत के किसानों की आर्थिक स्थिति मजदूर से भी बदतर है। अच्छी फ़सल की उम्मीद में लिया गया कर्ज और उस पर ब्याज पर ब्याज किसान की कमर तोड़ देता है। संतोष ने भी ट्यूबवेल के लिए कर्ज लिया था, जो अंततः उसकी आत्महत्या का कारण बना। जहर खा कर मृत्यु की ओर बढ़ते हुए संतोष के साथ ही पाठक को अस्पतालों की अव्यवस्थाओं के नंगे सच से भी रूबरू कराती हैं। देर तक पाठक के मन में संतोष के आखिरी शब्द गूँजते रहते हैं, “मुझे बचा लो… मुझे बचा लो”

 

ट्यूबवेल की बात से एक और माफिया निकल कर सामने आता है। जो कर्ज देते समय जहाँ चेक करता है वहाँ पानी बता देता है।  गहरी खुदाई के बाद भी पानी निकलता नहीं। उन्हें अपने टारगेट पूरे करने होते हैं। इससे किसानों को कर्ज का लाभ तो मिलता नहीं उल्टे उनके सिर पर ब्याज का भुगतान और आ जाता है। कहानी प्रश्न उठती है कि कई बार कर्ज माफ़ी की झूठी खबर (झूठे वादे) से भी लाभ की आशा में किसान कर्ज ले लेता है। इसके अतरिक्त कहानी गीला और सुख दोनों आकालों पर प्रकाश डालती है।

किशनराव की बेटियों द्वारा खेत बेचे जाने पर वे खेत और जमीन के अंतर पर अंगुली रखती हैं। किस तरह से भूमाफिया गाँवों में खेत नहीं जमीन खरीदने आ रहा है। उसे यहाँ खेती नहीं करनी है पर कल को ऊंचे दामों पर किसी कॉर्पोरेट को ये जमीन बेच देनी है। यह पढ़कर अभी हालिया गाजियाबाद विवाद मेरी आँखों के आगे तैर गया। इसी कारण जरा सा रास्ता देने में जमीन मालिक को घोर आपत्ति है, जो वर्षों से किशनराव ने गाँव वालों को पैदल आने-जाने के लिए दे रखी थी। इस देने में गाँव के अपनेपन में बसी सहकारिता थी और न देने में जमीन और उसकी कीमत। लेखिका धनी किसानों का भी मुद्दा उठाती हैं, जो किशनराव की बेटियों से बात करने के लिए फोन नंबर तक नहीं मुहैया कराते। लाभ का गणित इंसानियत के गणित से कमजोर साबित हुआ।

इसके अंतरिक्त ऑर्गैनिक खेती के झूठ की भी कहानी पोल खोलती है। व्हाट्स एप ग्रुपों द्वारा ऑरगेनिक उत्पाद कहकर महंगे दामों में बेचे जा रहे उत्पाद दरअसल सामान्य ही हैं। आज जब एक वर्ग खाने से कोई समझौता नहीं के नाम पर इनकी ओर आकर्षित है तो धोखेबाज खिलाड़ी भी मैदान में उतर आए हैं।

 

संतोष, किशनराव, भाऊराव ईश्वरी, अप्पाराव की एक ही कहानी

किसान आत्महत्याओं की कड़ियाँ टटोलते हुए लेखिका सब की एक ही कहानी पर जोर देती हैं। कहानी है खराब फ़सल, कर्ज और कर्ज के बोझ से टूटता मन। फिर आत्महत्या चाहें संतोष की हो, किशनराव की या भाउराव और किसी अन्य की। लेखिका हर आत्महत्या पर विस्तार से आर्थिक ही नहीं सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारणों की भी पड़ताल करती हैं। आकाल से आहत किशनराव तो आत्महत्या की परमीशन मांगने कलेक्टर के ऑफिस गया था। किन्तु आत्महत्याओं की इतनी सूचनाओं के बावजूद इस पर संज्ञान नहीं लिया गया। बल्कि उसकी भूख हड़ताल और कलेक्टर द्वारा आश्वासन देकर उसे तुड़वाने की खबर एक खबरिया अखबार ने छाप दी। लेकिन दो साल तक भी कोई सुनवाई न होने पर किशनराव गाँव वालों के उपहास का पात्र बना। बेटियों ने साथ ले जाना भी चाहा तो गाँव छोड़कर नहीं गया। उपहास और अवमानना उसे अवसाद और आत्महत्या के क्रूर पंजों की ओर धकेल देती है। नंदा की बीमारी और मृत्यु से टूट चुके अप्पाराव कर्ज के बोझ तले भी दबे हैं । चारों तरफ की विपरीत परिस्थितियाँ उनकी समस्त जिजीविषा छीन लेती है। भाऊराव के ऊपर 80, 000 का कर्जा है। न जमीन ज्यादा है न सुविधाये ।ऐसे में सरकारी घोषणा कि किसानों का कर्ज  माफ़ किया जा रहा है। उसे हिम्मत देती है। जिससे घर में बचे मात्र 400 रुपये से खाद खरीदने जाता है। दुकानदार पिछली उधारी के आधार पर ये पैसा भी रखवा लेता है। मन से टूटे भाऊराव को कोई रास्ता नहीं दिखता। बीमार ईश्वरी आर्थिक कारणों से इहलीला समाप्त करती है।

 

इस प्रकार लेखिका चेताती हैं कि आत्महत्याओं के पीछे आर्थिक कारण तो थे ही, सामाजिक उपेक्षा और अकेलेपन जनित अवसाद भी एक वजह रही। झूठे आश्वासन, प्राप्त सहायता का सही व्यक्ति को वितरण नहीं, उम्मीद बनने और टूटने की अकथ कथा बनता रहा। वे मीरा के माध्यम से मीडिया को भी आड़े हाथों लेती हैं, जो उन्हें आश्वासन देने के बहाने अपनी खबरें बेच रहा है। भाऊराव की मृत्यु पर भुक्तभोगी मीरा, संतोष की मृत्यु पर मीडिया को फटकार लगाती है। प्रश्न ये है कि जब इन्हें कुछ करना नहीं है तो “कैसा लग रहा है?” जैसे ऊटपटाँग प्रश्न पूछकर दुखी व्यक्ति को और दुखी करने से क्या फायदा?

मीरा का अपने खेत में बेटे गिरीश के साथ अकेले रुकने का प्रसंग महिला किसानों की असुरक्षाओं से पाठक को दो-चार कराता है। खेत के बीच में बनी फूस की झोपड़ी और दरवाजे को ढपढपाते हाथ मीरा की समझदारी से भले ही वापस लौट गए हों पर सुबह हताश मीरा का कहना कि फ़सल जाती  है तो जाए अब वह रात में खेत पर नहीं रुकेगी। जहाँ संतोष को झपकी लग गई थी और डुक्कर फसल चट कर गए थे। वहीं मीरा स्वयमेव रात में खेत पर न रुकने का निर्णय लेती है। लेखिका एक महिला किसान की दोगुनी समस्याओं की ओर ईशारा करती है।

सशक्त स्त्री पात्र

लेखिका ने पूरी कथा में सशक्त स्त्री पात्रों को खड़ा किया है। फिर चाहें संतोष की पत्नी शारदा हो, मीरा या किशनराव की बेटियाँ । शारदा और मीरा उसी आर्थिक तंगी से परिवार समेत जूझती हैं, जिससे घबराकर उनके पतियों ने आत्महत्या की थी। मीरा तो मीडिया से भिड़ती है और बुरी निगाहों से भी। इसी तरह शांता वरगनी का विरोध कर रहे युवकों को समझा-बुझाकर भजन और दावत के लिए राजी करवाती है। श्रीहरि की पत्नी कल्याणी भी टीचर है और गाँव की समस्याओं को सुलझाने में अपने पति का साथ देती है। कृषि मेले की तैयारियों में भी स्त्रियाँ दिए गए कामों को आगे बढ़-चढ़ कर खुशी-खुशी करती हैं। विचारणीय ये भी है कि स्त्री किसान आत्महत्या नहीं करती, वह समस्याओं से जूझती है। एक बात और गौर करने लायक है कि आशा जी की नाएकाएँ माटी में तपी हुई औरतें हैं। ये अपने पतियों को खोकर आर्थिक विपन्नताएँ झेलते हुए देह की गलियों में नहीं भटकती बल्कि श्रम सीकरों से ससम्मान जीवन यापन के उपाय खोजती हैं। यहाँ पर भी ये उपन्यास अन्य उपन्यासों से अलग होकर आशा की मशाल थमाता है। लेखिका आशा जी स्वयं खेती-बाड़ी से जुड़ी हैं।  संभवतः इसीलिए वह किसानों पर लिखे गए अन्य उपन्यासों की तरह इसे दुखांत नहीं छोड़ती हैं, बल्कि आपसी सहयोग से समस्याओं को सुलझाने के उपाय लेकर आती हैं।

एक स्थान पर लेखिका बैंक में कार्यरत श्रीहरी के लिए साँवली और कम सुंदर मगर गुणी और उच्च शिक्षित लड़की कल्याणी को और गोविंदा के लिए कम पढ़ी लिखी पर सुंदर लड़की की बात उठाकर उस स्टीरियोटाइप को तोड़ती हैं जो अच्छा पति पाने के लिए लड़की का सुंदर होना आवश्यक मानता है। लड़की के गुण उसकी योग्यता हैं। जैसा पति वैसी पत्नी की परफेक्ट मैच मेकिंग भी अच्छी लगती है। मुकया के रूप में वे ऐसे पुरुष को भी लेकर आई हैं जो स्वछंद हो चुकी स्त्री (गुलबया) के आरोपों की सजा भुगतता है। कहने का तात्पर्य यह है कि लेखिका कहीं भी एक पक्षीय नहीं रहीं हैं। बहुसंख्यक के साथ-साथ समाज की बदलती करवटों की छोटी पर मजबूत आहट भी सुनती हैं।

आशा पाण्डेय

आशा पाण्डेय

जीवन संघर्षों के बीच प्रेम की मीठी सी धुन  

प्रेम का फूल तो चट्टानों पर भी खिल जाता है। फिर ये तो हमारे गाँव हैं। माटी रस से  भीगे धड़कते-महकते। यहाँ प्रेम की फुहार न हो ऐसा तो संभव ही नहीं। मेरा प्रिय पात्र मानमोड़े और शांता वृद्धवस्था की दहलीज पर हैं। पर लड़ाई झगड़ों के बीच भी एक-दूसरे का ख्याल और भरोसा प्रेम की वासंती बयार नहीं बरगद का एहसास है। शारदा और संतोष का प्रेम बार-बार शारदा की आँखों से छलकता है पर उस समय पाठक की आँखों से भी छलकता है जब मेले में संतोष उसकी इच्छा जानकर उसके लिए मंगलसूत्र खरीदता है। लेखिका ने इस दृश्य को बहुत सुंदर बुना है। वहीं शारदा द्वारा मजदूरी पर जाने के प्रस्ताव को भी वह यह सोचकर मना कर देता है कि उसे परेशान नहीं होने देगा। गुस्से में गोविंदा और श्रीहरि का नाम पुकारना की मीठी नोक-झोंक भी पाठक को लुभाती है। दरअसल शारदा अपने बच्चों का नाम कुछ नया सा रखना चाहती थी पर संतोष भगवान के नाम पर नाम रखना चाहता था। शारदा संतोष के मन के अनुसार चलती तो है पर अपनी नाराजगी यूँ भी प्रकट करती है। कालांतर में वही शारदा बेटे बहु द्वारा पोते का नाम कृष्णा रखने पर संतुष्ट होती है कि अपने पिता की परंपरा का निर्वाह कर रहा है।

नंदा और प्रथमेश की अनकही प्रेम कथा पाठक के हृदय में गूँजती रहती है। बचपन की दोस्ती से फूटे प्रेम के किल्ले  प्रथमेश द्वारा नंदा के लिए चप्पल लाने फिर नंदा और प्रथमेश की पिटाई के बाद ये अव्यक्त कथा दोनों के मन में गुपचुप चलती रहती है। उसकी गवाह बनती है पीतल की वो भूरी अंगूठी जो ब्याही-ठयाही  नंदा सोने कि अंगूठियों के बीच बड़े जतन से पहनती है। नंदा की बीमारी में बेचैन प्रथमेश की पीड़ा आहत करती है। नंदा चली जाती है और प्रथमेश अपनी अधूरी प्रेम कहानी के साथ बिना विवाह किए अकेला छूट जाता है। बिना शोर-शराबा किये दुखद अंत वाली ये प्रेम कहानी बहुत मार्मिक है।

इसके अतरिक्त हम पारिवारिक व्यवस्था का भी प्रेम देखते हैं। प्रथमेश और शारदा के रिश्ते में जहाँ भरोसा है। गोविंदा और श्रीहरि के लिए प्रथमेश पिता समान है। अप्पाराव बेटी के दर्द से आहत हैं। लगभग हर घर में पारिवारिक प्रेम की ये सौंधी महक जरूर मिलेगी।

दशा परिवर्तन- जागते रहो

“जीवन है अनमोल प्यारे, जीवन है अनमोल

समझ तू इसका मोल प्यारे, समझ तू इसका मोल”

कहानी कहती है कि आत्महत्या किसी समस्या का समाधान नहीं है। अगर कोई समस्या है तो उसके समाधान खोजने होते हैं। लेखिका इसका समाधान प्राचीन कृषि प्रणाली में ढूंढती हैं। तब भी किसान मौसम की मार झेलता था पर इस तरह हताश नहीं होता था। चौक पर सुख-दुख साझा होते थे। गाँव में उत्सव होते थे, जो सबको जोड़ते थे। संतोष के पिता गजानन मंदिर पर साल में दो बार भजन संध्या रखवाते थे और सबको दावत देते थे। बाद में संतोष अपने पिता की तरह दावत रखवाना चाहता है पर चंदा को लेकर उसपर बहुत अनर्गल आरोप लगते हैं। जिससे वह चंदे के बिना स्वयं ही बीड़ा उठाता है और अधिक आर्थिक अभाव में डूबता है। यह गाँव के टूटते विश्वास को दर्शाता है। स्वार्थ केवल शहरों में ही नहीं बढ़े हैं। गाँवों में भी

 

पिता की मृत्यु से आहत श्रीहरि नौकरी के बाद अप्पाराव की मृत्यु के पश्चात को समाधानों को खोजने का बिगुल बजाता है, जिसमे तकनीकी भी जोड़ता है। उसे विश्वास है कि उसका गाँव भी मेंधा, लेखा, हीवरे बाज़ार, रालेगांव की तरह चमक सकता है। उसका नाद है एक व्हाट्स एप ग्रुप ‘जागते रहो”। अवसाद को एक प्रमुख वजह मानते हुए एक दूसरे का उत्साह वर्धन, रात में युवाओं द्वारा चौकीदारी के अतरिक्त अपने बीज खुद बनाना, बाहर के मजदूरों की जगह गाँव के मजदूर को काम, गाँव के हर घर का एक लड़का या तो नौकरी करे या दुकान खोले और कृषि मेले में भाग लेना ऐसे कई उपाय हैं जिनपर काम करता है और लोगों के बीच सहकारिता और भरोसा बढ़ता है।

ऐसा नहीं है कि उस पर अपने पिता की तरह आरोप नहीं लगते हैं। उसपर तो हमला भी होता है पर वह उससे डरकर अपना काम नहीं छोड़ देता। कभी कॉलेज के लिए मीलों साइकिल चलाकर जाने वाला श्रीहरि अपनी योजनाओं को अमली जामा पहनने के लिए रोज अमरावती से गाँव आता है और अंततः भरोसा जीत लेता है। “एक अकेला थक जाएगा मिलकर बोझ उठाना” की तर्ज पर लेखिका द्वारा सुझाए गए ये उपाय बहुत कारगर हैं।

संतोष की मृत्यु के बाद से शुरू हुए उपन्यास का श्रीहरि के दूसरे बच्चे के ग्राभ में आने पर अंत होना भी लेखिका की सकारात्मक सोच का दिग्दर्शन कराता है।

लोक संस्कृति और भाषा को सहेजती कथा

इस उपन्यास कि खास बात यह है कि यह लोक संस्कृति और भाषा को बहुत नरमाई से सहेजता है। कहीं मानमोड़े की लोहे की धौकनी है, कहीं देवी मंदिर का प्रसिद्ध में ला है, कहीं किशनराव के खेत की पगडंडी है तो कहीं भजन-कीर्तन के रूप में आपसी जुड़ाव है। इतना ही नहीं लेखिका भूलोजी और भुलाबाई (शिव -पार्वती) को पूजता कोजागिरी (पेज-28) का त्योहार है तो कहीं पोल त्योहार (पेज -95)  बारिश की आस में मेढक-मेंढकी वाला धोंडी (पेज -84)

भाखरी (ज्वार की मोटी रोटी), तूर (तुअर दाल) काय झाला (क्या हुआ) शेती (खेती) जैसे कितने शब्दों से पाठक परिचित होता चलता है। सुविधा के लिए लेखिका कोष्ठक में उसके अर्थ भी दे देती हैं।

अंत में मैं यही कहूँगी की लोक संस्कृति और भाषा की मिठास में रचा बसा यह उपन्यास जो किसानों की आत्महत्याओं के प्रति चेताता है, उनके दुख दर्द पर विस्तार से बात करता है साथ ही समाधान भी प्रस्तुत करता है। शुरू से अंत तक कथारस में डूबा यह उपन्यास पाठक को उतनी ही सहजता से पढ़वा ले जाता है। अपनी बात का अंत उपन्यास की पंक्तियों से करती हूँ –

सिर्फ परिस्थितियाँ ही नहीं होती, दुख या आत्महत्या का कारण। असली कारण होता है हथियार डाल देना”

एक सार्थक और मानीखेज  उपन्यास के लिए आशा जी को बधाई

वंदना बाजपेयी

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