पीड़ा की तस्वीर का दूसरा रुख दिखाते संग्रह द्वय

 

 न्याय का तराजू हमेशा साम्य पर रहना चाहिए l इस साम्य में ही जीवन का, विकास का, संभावनाओं का सुंदर संगीत छिपा होता है l पलड़ों को बराबर रखने का काम सिर्फ न्यायालय का नहीं है l वो किसी एक मामले में किसी को दोषी ठहरा सकता है, सजा दे सकता है, कुछ कानून बना सकता है l समाज के कानूनों और विधायी कानूनों के दो पलड़ों को बराबर रखने का काम आगत भविष्य को पहले से ही भांप लेने वाले विचारकों, चिंतकों, और साहित्यकारों का रहा है l वो उस बिंदु पर समाज को चेताना शुरू करते हैं, जहाँ उसकी नजर ही नहीं गई होती है या देखकर भी अनजाना सा चला जा रहा होता हैl

 

कल्पना मनोरमा और कृष्णा श्रीवास्तव द्वारा संपादित ये दो संग्रह “सहमी हुई धड़कनें” और “काँपती हुई लकीरे” साहित्य में एक अलग तरह की दस्तक है l दर्द की उस तस्वीर का खुलासा है जो अनदेखी थी या जान-बूझकर छोड़ी जा रही थी l किसी भी विपदा से उबरने के लिए समय रहते चेतना जरूरी हैl संग्रह की खासियत उनकी मानीखेज संपादकीय लेखों के साथ वरिष्ठ साहित्यकार नासिरा शर्मा के साथ कल्पना मनोरमा का वैचारिकी से भरा साक्षात्कार है l दोनों संग्रहों में वरिष्ठ व समकालीन चालीस कथाकारों की कहानियाँ संग्रहित है जो पीड़ा के जीवंत दस्तावेज हैं l उन कहानियों के किरदार चीत्कार कर रहे हैं कि अब तस्वीर का दूसरा रूख भी देखने का समय आ गया है l तस्वीर का यह दूसरा रुख स्त्री के बरक्स पुरुष की पीड़ा है, जो आँकड़ों की चट्टान के नीचे दबी सिसकती रही है l साहित्य का यह धर्म है कि दबी, सहमी, कुचली सिसकियों की वह आवाज़ बने l ये दोनों संग्रह एक अलग तरह की लकीर है साहित्य में….l

 

हालाँकि घर के कामों का श्रेय देने के मामले में हाशिये पर सरका दिए गए, पुरुष वर्ग की तरफ़ से छुटपुट आवाजें तब सुनाई दी, जब 19 नवंबर को “पुरुष दिवस” की शुरुआत हुईl जिसका मुख्य उद्देश्य घर-परिवार के अंदर पुरुष के कामों को रेखांकित करना थाl सब्जी-भाजी लाने, बैंक के काम, गैस का कनेक्शन लगवाने से दीपावली की लाइट लगाने तक ज्यादातर काम, जो घर के कामों का ही हिस्सा होता है, पुरुषों द्वारा ये दायित्व निभाए जाते रहे हैंl समय-असमय बहनों को कॉलेज छोड़ने, स्टेशन छोड़ने, सहेली के घर छोड़ने के काम भाइयों द्वारा किये जाते गएl भले ही ये काम उन्हें बेटी की सुरक्षा के नाम पर परिवार द्वारा सौंपे गए हों, पर इसके लिए उन्हें पढ़ाई से उठा दिया गया, कई बार उन्होंने अपने जरूरी काम बहनों को सुरक्षित पहुँचाने के नाम पर छोड़ दिएl घर के किसी काम-काज में हलवाई, बिजली, टेंट की व्यवस्था में लगे लड़के घर के ही काम कर रहे थेl स्त्री दृष्टि से घर के कामों को स्थापित करने में पुरुषों द्वारा किए गए ये सारे “घर के काम” नजरअंदाज किए गएl माँ की ममता को स्थापित करने के जोश में देश-विदेश अकेले नौकरी करते, घर के खाने और सुकून से जूझते पिता का प्यार अनदेखा किया गयाl और ऐसे अनदेखा हो गया, पुरुष का अपने बच्चों को बढ़ते देखने का दुखl पुरुष दिवस उन्हीं कामों का श्रेय माँगने के लिए बनाया गया हैंl आश्चर्य ये है कि इस दिवस को बड़े पैमाने पर पुरुषों का भी समर्थन नहीं मिलाl यहाँ ये सवाल उठना लाजिम है कि पुरुष को स्त्रियों के द्वारा कितना गढ़ा गया है कि उसे अपने लिए स्नेह और श्रेय मांगने भी शर्म आने लगीl उसका पुरुषत्व आड़े आने लगाl

 

इस संदर्भ में मुझे सुनीता करोंथवाल की कविता “लड़के खड़े हैं” याद आ रही है l जिसकी पंक्तियाँ कुछ इस प्रकार हैं—

 

लड़के हमेशा खड़े रहे/ बहन की शादी में खड़े रहे/मंडप के बाहर/ बारात का स्वागत करने के लिए/ खड़े रहे…रात भर हलवाई के पास/ कभी भाजी में कोई कमी ना रहे/खड़े रह/…बारातियों की सेवा में/कोई स्वाद कहीं खत्म न हो जाए./खड़े हैं … डोली के पास/…विदाई तक/दरवाजे और टैंट के सहारे/अंतिम पाईप के उखड़ जाने तक/बेटियाँ भने जब तक वापस लौटेंगी, वे खड़े ही मिलेंगे

तस्वीर का दूसरा रुख दिखाते संग्रह

श्रेय मांगना एक मीठी शुरुआत हो सकती है, लेकिन समय की करवट कई बार धरती की करवट की तरह सब कुछ उथल-पुथल कर देती है l आज ऐसी ही करवट महसूस की जा रही है, जब स्त्री विमर्श, स्त्री स्वतंत्रता की जगह, स्त्री स्वच्छंदता की ओर बढ़ता दिख रहा हैl

 

स्त्री संघर्षों को कानून के साथ मिलना जहाँ सुखद रहा वहीं स्वच्छंदता या बदले की आड़ में इन कानूनों का दुरप्रयोग शोषण की एक नई दास्तान लिखने लगा और समय का एक बिद्रूप चेहरा ऐसा सामने आया जहाँ शोषित पुरुष की आवाज़ सुनने को ना समाज तैयार था और ना ही कानूनl “मर्द” के तमाम प्रतिमानों में कैद पुरुष अपनी पीड़ा को ना खुल के कह सका और ना ही खुलकर रो सकाl उसे पितृसत्ता का नुमाइंदा कहकर दुरदुराया गयाl पुरुष यह समझ ही नहीं सका कि पितृसत्ता के संचालन में स्त्रियों के अनदेखे हाथ भी छिपे हैंl नतीजा अवसाद, निराशा पीड़ा में व्यक्त होती गईl “पुरुष तो कमाता है, इसलिए मालिक बन बैठा है” और “आखिर हम कमा किसके लिए रहे हैं” का द्वंद्व हर घर में दस्तक देने लगाl भटके हुए स्त्री विमर्श ने घर-घर अदालतें लगवा दीl

 

बदलते हुए समय की इस दस्तक में कल्पना मनोरमा द्वारा संपादित ये संग्रह मानवीय आवाज की तरह लग रहे हैंl इसके माध्यम से उन्होंने ये बताना चाहा है कि पुरुष पीड़ा की बात कर पुरुष और स्त्री को एक दूसरे के आमने-सामने खड़ा करना नहीं वरन एक दूसरे को समझने की पहल करना हैl जिसके ऊपर परिवार का, समाज का, और संसार का संतुलन टिका हैl

 

कल्पना मनोरमा की सम्पादकीय से एक उदाहरण दृष्टव्य है—

 

“स्त्री-पुरुष यानी सिक्के के दो पहलू! संसार की दो प्रमुख इकाइयाँ! जिनके द्वारा प्रकृति अपना उद्देश्य पूरा करती है। उन दोनों के समानांतर चलने से घर-परिवार जैसी संकल्पना सधती है और हम सामाजिक प्राणी कहलाने योग्य बनते हैं।”

 

संग्रह पर बात करने की शुरुआत कल्पना मनोरमा जी और कृष्णा श्रीवास्तव जी को बहुत-बहुत साधुवाद देती हूँl इन संग्रहों के माध्यम से पुरुष पीड़ा को स्वर दिया गया, जिसे विमर्श के रूप में देखा जा सकता हैl ये कार्य दिमाग के ताले खोलता है और मन के जाले साफ़ करता है l हालांकि अपने विचारोत्तेजक संपादकीय “हिंसक, हिंसक होता है…” में कल्पना मनोरमा विमर्शों के खास दायरों में सिमटने और कालांतर में उनके भटक जाने के स्थान पर पीड़ाओं की बात करने पर ज़ोर देती हैंl अपनी सम्पादकीय की शुरुआत में ही वे ये स्पष्ट करती हैं कि मैंने अपने संपादन में पुरुष पीड़ा को रेखांकित करने का प्रयास किया है, तथापि मेरे कार्य का यह उद्देश्य नहीं है कि भारतीय समाज में स्त्री की पीड़ा पूर्ण रूपेण समाप्त हो गई हैl  लेकिन वे चिंतित दिखाई पड़ती हैं कि स्त्री को बेचारी बनाकर उसे हक दिलाने के प्रयास में जुटी पूरी दुनिया पुरुष के पक्ष में कहीं संवेदनहीन न हो जाएl पुरुष पीड़ा पर कार्य करने के पीछे उन्होंने अपने आस-पास के निजी उदाहरण भी दिएl पुरुषों की पीड़ा ने उनके हृदय को आंदोलित किया और नासूर बन कर गड़ती रहीl अंततः इन संग्रहों की शक्ल में पुरुषों की अनदेखी-अनसुनी पीड़ा आकार लेकर हमारे सामने हैl

 

 

सिमोन द बोउआर की पाश्चात्य बैसाखी पर टिके भारतीय स्त्री विमर्श की मुख्य अवधारणा के समक्ष कल्पना एक बड़ी रेखा खींचती हैंl जैसा कि विदित है कि सिमोन “द सेकंड सेक्स” में  लिखती हैं, “लड़कियाँ जन्म नहीं लेती बनाई जाती हैं” कल्पना मनोरमा कहती हैं कि—“क्या ये तथ्य पुरुष पर लागू नहीं होता? मैं तो कहती हूँ कि जिस तरह एक बालिका को सिरज-सिरज कर कमजोर हृदय, दब्बू स्त्री में तब्दील किया जाता है, उसी तरह अनजाने में पितृसत्तात्मक तरीकों से निबद्ध कर धीरे-धीरे फौलादी बनाने के जुनून में पुरुष को भी कठोर हृदय, रूढ़िवादी एवं स्त्री-शोषक बना दिया जाता है l” ये एक महत्वपूर्ण वैचारिक बिन्दु हैl आश्चर्य ये हैं कि साहित्यिक सभाओं, मंचों पर सिमोन का ये कोट शेयर करते हुए किसी स्त्रीवादी बुद्धिजीवी, विचारक को इसका भान तक नहीं हुआ… कि उनके द्वारा विमर्शों की एक सीधी रेखा गढ़ी जा रही हैl

 

खास बात एक ये भी है कि कल्पना मनोरमा ने इस संग्रह को घर में बैठ कर तैयार नहीं किया हैl उन्होंने इसे जमीनी हकीकत से जोड़ने के लिए पीड़ित पुरुषों से बात की हैl उनकी ओर सांत्वना का हाथ बढ़ा, उनसे उनका दर्द उगलवाया हैl आजकल झटपट तैयार हो जाने वाले संपादित संग्रहों में ये दोनों संग्रह एक लेखकीय कर्म के प्रति संजीदगी दिखाते हैंl कल्पना लिखती हैं कि—“कानून का सहारा लेकर अपने इर्द-गिर्द रहने वाले पुरुषों को छोटी-छोटी चीजों के लिए जैसे गहने, कपड़े, गाड़ी घर, पति के परिवार से विच्छेद के लिए स्त्रियाँ माँग करने लगीं l इस जद में आए और सताये पुरुषों से जब मैंने बात करना आरंभ किया, तो एक नहीं कई-कई पुरुष अवसाद में मिले कुछ स्मृतिलोप का शिकार मिले तो कुछ हार्ट के मरीज होकर घबराहट में जीवन जीने को मजबूर मिले l इतना ही नहीं कुछ तो छोटी से छोटी आवाज़ पर पसीने से तर-बतर होते हुए मिलेl” कल्पना का संपादकीय इतना संतुलित और मानीखेज है, कि इसे पढ़ने के बाद स्त्री वर्सेज पुरुष की भावना अगर आ भी रही होगी किसी के मन में तो स्वतः ही तिरिहित हो जाएगीl

 

संग्रह में कृष्णा श्रीवास्तव जी अपने संपादकीय में — “पुरुष पीड़ा एक विहंगम दृष्टि” में स्त्री पीड़ा को तथ्यों व प्रमाणों से स्पष्ट करते हुए आज के समय में पुरुष की पीड़ा की बात को कहे-सुने जाने की पुरज़ोर वकालत करती हैं l वे लिखती है कि, “अपने आप को योग्यतम सिद्ध करने की होड़ ने स्त्री के अहम को भी जगाया है, जो समाज के संतुलन को बाधित करता नज़र आ रहा हैl यह स्थिति स्वस्थ समाज के लिए पुनः चिंताजनक बन सकती हैl”

 

उनके अनुसार इसका कारण आज पुरुषों की भांति स्त्री के भीतर भी श्रेष्ठता का कुविचार हावी हो रहा हैl गृहस्थी के रथ में एक पहिया छोटा या बड़ा उसे ढंग से नहीं चला सकता l टूटते-बिखरते परिवारों में इस नए असंतुलन पर भी ध्यान देना होगाl

 

संग्रह में शिवेंद्र राणा का लेख “प्रताड़ित पुरुषत्व” ढ़ेर सारे आंकड़ों के माध्यम से अपनी बात रखता हैl वे जोर-शोर से पीड़ित पुरुषों के लिए पुरुष आयोग की स्थापना का मुद्दा उठाते हैं l इस बेहद तार्किक मानीखेज लेख में पुरुषों द्वारा की गई आत्महत्या के आँकड़े वास्तव में डरावने हैंl विवाहित पुरुषों की आत्महत्या के भयावाह आँकड़े देते हुए वे लिखते हैं कि, “इन आँकड़ों का क्या अर्थ निकाला जाए ? कहने को तो विवाह संस्था प्रेमाश्रय है और साथी प्रेम का श्रोत l लेकिन ये कैसा प्रेम है, जहाँ पुरुष जीवन के बजाय मृत्यु चुनने को बाध्य हो रहे हैंl” दहेज कानून की बात करते हुए वो गाजियाबाद की निशा शर्मा का उदाहरण देते हैं, जिसने दहेज लोभियों की बारात लौटाने की वजह से चर्चा बटोरी थी, हर किसी ने उसकी हिम्मत को सराहा था, लेकिन अंततः वो भी झूठा केस ही साबित हुआ था, क्योंकि मामले के दो साल बाद ज़िला न्यायालय में इस पूरे प्रकरण को सुनियोजित बताते हुए निशा के खिलाफ़ कड़ी टिप्पणी भी की थीl

क्या हम ऐसे मुद्दों पर सोचते हैं कि, “justice delayed is justice denied” क्या अपमान से नौ वर्ष तक झुलसते मुनीश और उसके परिवार के वो वर्ष लौट आएंगेl क्या सामाजिक अवहेलना की भरपाई का कोई तरीका है? लेख पढ़ते हुए मेरे मन में बार-बार ये विचार कौंधता रहा क्या बारात लौटा कर जितनी चर्चा निशा को मिली थी, उसका केस झूठा था, इसकी खबर उन सब तक पहुँच पाई? अक्सर अखबार के पहले पेज की खबर बने मुद्दे गलत साबित होने पर अखबार के किसी कोने में चंद पंक्तियों में माफ़ीनामा में सीमित कर रह जाते हैं, जो अक्सर बिना पढ़े ही रह जाते हैं l

 

अपनी बात का समापन  वे पुरुष के वर्तमान हालात की तुलना जिगर मुरादाबादी के एक शेर के माध्यम से करते हैं –

 

“हम इश्क के मारों का इतना ही फ़साना है/ रोने को नहीं कोई हँसने को जमाना है”

 

और कामना करते हैं कि इस कठोर यथार्थ को साझा करने कोई संस्था, कोई व्यक्ति, या सरकार आगे आए l

 

वरिष्ठ साहित्यकार-समीक्षक विजय शर्मा का आलेख “शोषण पर सम्यक दृष्टिकोण” एक संतुलित विचारपरक आलेख हैl वे पुरुष के शोषण को विवाह तक सीमित नहीं रखतीं बल्कि इसके खाँचे में पुरुष का पुरुष द्वारा शोषण, परिवार द्वारा शोषण, पुरुष का स्त्री द्वरा शोषण में वे माँ, पत्नी, प्रेमिका या कोई अन्य स्त्री सभी को शामिल करती हैं और पुरुष का कार्यालय में शोषण को भी शामिल करतीं हुए लिखती हैं कि— “विचार करने की बात है पुरुष का समाज और परिवार द्वारा शोषण-दमन होता है तो उसकी चर्चा क्यों नहीं ?” वह अपने तर्क से स्पष्ट करती हैं कि शोषण से उपजे दर्द, अशान्ति, अपमान के निकास की सम्यक राह न पाकर वह अपनी भावना अनुभव को विकृत ढंग से भी व्यक्त कर सकता है, दूसरों को सता सकता है उनका शोषण कर सकता हैl वाकई में कौन नहीं जानता कि एक मासूम बच्चे को चित्रकारी करने से परिवार द्वारा रोक गया और वो कालांतर में हिटलर बनाl

 

यह लेख इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि वह उस आईने से पुरुष पीड़ा को देखने का आग्रह करता है, जो संवेदना जगाए और बात को समानता के स्तर पर उतर कर समझने का प्रयास करेl जैसा की कल्पना मनोरमा ने अपने संपादकीय में स्पष्ट किया है कि, स्त्री विमर्श अपने मूल उद्देश्य से भटक कर मुख्य रूप से स्त्री देह पर केंद्रित हो चुका हैl उसी तरह पुरुष पीड़ा को किसी विमर्श में जकड़ कर एक खास कोठरी में नहीं धकेल देना हैl हर पीड़ा को आवाज़ मिलनी चाहिएl विजय शर्मा लिखती है कि, “यदि शोषित स्वयं आवाज़ नहीं उठा रहा है तो क्या दूसरों का दायित्व नहीं की वो पीड़ा को स्वर दें? साहित्य और साहित्यकार संवेदनशील है, शोषितों के पक्ष में उठ खड़ा होना चाहिए ?”

 

दोनों संग्रहों के अंत में वरिष्ठ लेखिका नासिरा शर्मा के साथ कल्पना मनोरमा जी की लंबी आत्मीय बातचीत हैl इस बातचीत में एक प्रश्न के उत्तर में नासिरा जी कहती हैं कि, “न किसी ने पड़ताल की और न ये जरूरत महसूस की कि आखिर मर्दों के इस व्यवहार के पीछे कौन सा मनोविज्ञान है? उनकी जड़ता और सख्त मिज़ाजी के पीछे कौन से संस्कार हैं? और ये किसने दिए जो वो औरत के प्रति इतना तंग हो गया l” वे अस्सी के दशक के मध्य का वकया याद करती हुई कहती हैं कि, उन्होंने अपने ऊपर रिसर्च कर रही जाहिदा जबीं से कहा था कि अगर तुम मेरे पुरुष किरदारों पर काम करोगी तो मुझे खुशी होगी l उनके साथ कुछ समकालीन लेखिकाओं ने पुरुषों पर काम करने का मन बनाया था परंतु तभी राजेन्द्र यादव स्त्री-विमर्श ले कर आए और ये पीड़ाएँ छुटपुट ही दर्ज हो पायींl

 

नासिरा शर्मा के साहित्य और उपन्यासों से गुजरते हुए ‘पुरुष पीड़ा के संदर्भ में कल्पना मनोरमा के एक महत्वपूर्ण प्रश्न के उत्तर में नासिरा जी कहती हैं कि, स्त्रियों की पीड़ा पर वर्षों से काम हो रहा है l समाज बदला है और बदल रहा है, फिर भी अगर स्त्री स्वयं को शोषित महसूस कर रही है तो दूसरे की समस्याएँ भी जानना समझना जरूरी हो जाता है l वे लिखती हैं कि, “यह देखना जरूरी हो जाता है कि बात कहाँ अटकती है? क्या हमें मर्दों से बातचीत कर इस मसले को सुलझाना है या मर्दों के जो दुख हैं जिन्हें वो बोलना नहीं चाहते हैं, उन्हें सामने लाकर दिखाना है कि गिरह कहाँ बँधी हुई है l”

संग्रह में 40 कहानियाँ हैं, जो पुरुष-पीड़ा पर केंद्रित हैं l संग्रह में उषा प्रियंवदा,अवध मुद्गल, नासिरा शर्मा, सूर्यबाला जैसे वरिष्ठतम कथाकारों से लेकर सत्या शर्मा ‘कीर्ति’ और सुषमा गुप्ता तक युवा कथाकारों की कहानियाँ संग्रहित हैं जो इस बात की साक्षी हैं कि पुरुष-पीड़ा की अभिव्यक्ति की एक लंबी परंपरा रही हैl इस छोटे-से लेख में समग्रता से कहानियों पर बात न रखते हुए इतना ही कहूँगी कि हर कहानी, पढ़ी जाने की मांग करती है ताकि पुरुष पीड़ा के इस वितान को समझा और महसूस किया जा सकेl

 

संग्रह की कहानियों के कथ्य, शिल्प, भाव और संरचना पर किसी अन्य लेख में बात करुँगी क्योंकि कुछ कहानियों पर बात करना और कुछ का छूट जाना मुझे न्याय संगत नहीं लग रहा हैl

 

अंत में बस मैं यही कहूँगी कि पीड़ा सिर्फ पीड़ा होती है इसलिए हर पीड़ा को सुना जाना जरूरी हैl अनसुनी पीड़ाएँ समाज़ में नासूर बन जाती हैं जो असमय किसी बड़ी दुखदायी घटना के रूप में समाने आती हैl समरस समाज़ की स्थापना में जरूरी है कि जहाँ-जहाँचाहे स्त्री हो या पुरुष पीड़ित हो रहा है, उन मुद्दों पर बात की जाएl स्त्री-पुरुष को अलगाने वाले मानसिक परदों को परे हटाकर देखें तो इन दोनों सग्र्हों की लगभग 40 कहानियाँ, संपादकीय लेखों के माध्यम से जीवन के उन कोनों पर प्रकाश डाला गया है जो कहीं अंधेरे में दुबके थेl इसके माध्यम से समय को जानना-समझना और हर पीड़ित के साथ खड़े होने और बेहतर मनुष्य बनने की दिशा में सहायक होगाl

 

साहित्य की वहीं आँख परिपक्व मानी जाती है, जो समय को पहले देख ले, करवटों और आहटों को सुन लेl ऐसे में कल्पना मनोरमा ने एक बड़ा काम किया हैl एक दूसरे पर अंगुलियाँ उठाते, रसातल की ओर धसते समाज को चिंतन का एक नया सूत्र सौंपा हैl ये अलग बात है कि हम एक जैसे जीवन, एक जैसे खान-पान और एक जैसे विमर्शों के इतने आदि हो चुके होते हैं कि हर नई चीज से घबराते हैं कि हर एक नये विधान का विरोध करने लगते हैंl पर यहीं से चिंतन का एक बीज भी मन की धरती पर अंकुरित होने लगता है l अत: विरोधों की परवाह न करते हुए कल्पना मनोरमा और कृष्णा श्रीवास्तव ने एक बीज तो रोप दिया हैl संभवतः आधी आबादी अपने से विपरीत के दर्द को भी समझने के प्रति ज्यादा विनम्र होंl

 

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समीक्षक : वंदना बाजपेयी

सम्पादक : कल्पना मनोरमा- कृष्णा श्रीवास्तव

पुस्तकें : काँपती हुई लकीरें/ सहमी हुई धड़कनें

प्रकाशक: भावना प्रकाशन, नई दिल्ली

मूल्य : 3 50 /-

यह समीक्षा सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित है।

 

 

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