कभी आपने गौर किया है अपने कपड़ों में लगाई गयी चोर जेब पर। जिसमें हम कीमती सामन रखते हैं। वस्तुतः ये जींस पेंट में राइट साइड के पॉकेट में एक छोटी सी पॉकेट होती है जो जेब घड़ी रखने के लिएं ही बनाई गई थी; विशेषकर खान मजदूरों के लिएं क्योंकि रिस्ट वॉच काम करते हुए अक्सर टूट जाती थी। मुख्य उद्देश्य होता है सामान को बचाना। प्रस्तुत कविता में इन्हीं चोर जेबों की तुलना मानव मन से की है जहाँ कभी पूरी न होने वाली इच्छाएं अगले जन्म के नाम पर बचा कर रख ली जाती हैं।
चोर जेब जानते हैं न आप ?
वही जो कपड़ों की तहों के बीच बड़ी बारीकी से
छिपाई /बनाई जाती है
जहाँ रखा सामान
छीना न जा सके आसानी से
ऐसी ही एक चोर जेब होती है
हम सबके मन की पैरहन में भी
गहरी छिपी
किसी अगले जन्म के नाम
इस बात से बेखबर कि अगला जन्म होता भी है कि नहीं
लेकिन इनमें बड़े करीने से तहा कर रखी जाती हैं
उन इच्छाओं की पर्चियां
जिनके इस जन्म में पूरे होने की कोई गुंजाइश नहीं होती
पड़ोस के बिट्टू जैसी नै खिलौना कार से
मान का सबसे लाड़ला बच्चा कहलाने तक
या फिर अधूरे छूटे प्यार के मुक़्क़मल हो जाने से
बीच सफर में साथ छोड़ गए लोगों से फिर मुलाक़ात तक
अनगिनत, अपरिमित
ये अलग बात है कि
एक उम्र बीत जाने के बाद
बहुत कर रो-रो कर सहेजी गई इन फेहरिस्तों में
अधिकतर लगने लगती हैं बेमानी
यहाँ तक की कुछ के लिए लगता है
अच्छा हुआ नहीं पूरी हुई
हो जाती तो…
फिर भी चोर जेबें कभी हटाई नहीं जाती
वो रहती हैं हर उम्र में अपने पूरे अस्तित्व के साथ
और उसमें रहती हैं
मासूम आशाएं और संभावनाएं
अगर है कोई अगला जन्म
तो कर्म का फल है या
इन अधूरी छूट गयी इच्छाओं की परणिति
नहीं पता
पर हमारा आज इन चोर जेबों का ऋणी है
जो हर बार बचा लेती हैं इसे
टूटने बिखरने से…
वंदना बाजपेयी

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