मॉल कल्चर के साथ सरपट दौड़ती दुनिया में बहुत कुछ हाशिये पर छूटने लगा है — हमारा लोक, अपनी संस्कृति, परम्परायें और सुख-दुख ! आभिजात्य संस्कृति ने कहानियों को दुरूह ही नहीं बनाया, बल्कि शिल्प और अतिबौद्धिकता के भार तले वे दबती भी रहीं । अपनी मिट्टी से कटा साहित्य न तो समकाल को पूरी तरह दर्ज़ कर पाता है और न पाठकों को संतुष्ट ही । इस परिस्थिति में कुछ लेखकों ने मज़बूती के साथ अपनी ज़मीन से जुड़े रहने का दायित्व सँभाला हुआ है l प्रेम रंजन अनिमेष उनमें अग्रगण्य हैं, जिन्होंने अपनी कविताओं और कथा साहित्य, दोनों के ही माध्यम से पाठकों के हृदय में अपनी पहचान बनायी है l वे आसपास के परिवेश, वहाँ की ज़िंदगी और घटनाओं का ताना- बाना बुनते हुए बड़े क़ायदे से रचनाकर्म को आगे बढ़ाते हैं ।
अनिमेष की कहानियों में लोक और जीवन की सोंधी महक है l लोक भाषा का प्रयोग रचना की सुंदरता और जीवंतता को कई गुण बढ़ा देता है l ज़्यादातर कहानियों की धुरी में स्त्री उसी तरह से है, जैसे घर में रसोई — जिसके दाय से तो सब अवगत हैं, पर चूल्हे की आग में धधकती उसकी पीड़ा पर किसी का ध्यान नहीं जाता l अनिमेष उस पीड़ा को न केवल महसूस करते हैं, अपितु उसे गहनता से उकेरते हैं — इस तरह कि पाठकों को भी उस दर्द का शिद्दत से एहसास हो l इधर लंबी कहानियों का दौर आया है और उनकी कहानियाँ भी इसी परंपरा में आती हैं l वे अचानक किसी एक विन्दु पर समाप्त नहीं हो जातीं, बल्कि हौले-हौले तय दिशा में बढ़ती हुई पाठकों के मन पर गहरी छाप छोड़ती हैं l कुल मिलाकर अनिमेष की कहानियाँ संप्रेषणीयता, सुस्पष्टता, संवेदना, सदाशयता और भावनात्मकता का उद्देश्यपूर्ण और मानीख़ेज़ कोलाज़ हैं l कथा के साथ कई अंतर्कथायें समेटे उनकी अनेक कहानियाँ औपन्यासिक तत्वों को समाहित किये हुए हैं l
लोक से जुड़ी मार्मिक कहानियाँ
कवि के साथ कथाकार के तौर पर भी हिन्दी साहित्य जगत में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले प्रेम रंजन अनिमेष ने जीवन के बहुस्तरीय बहुरंगी आयामों को समेटने वाली कई कहानियों की रचना की हैं । उनके कथा-साहित्य के अक्षय पात्र में से स्त्री जीवन को केन्द्र में रखकर रची गयी तीन अत्यन्त महत्वपूर्ण कहानियाँ — ‘ए आजी’, ‘दी’ और ‘माई रे’ प्रतिदर्श के रूप में देखी जा सकती हैं, जो हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं l
‘ए आजी’ कहानी जीवन के विविध रंग समेटे हुए है — नटखट पोते और दादी के माध्यम से बाल मनोविज्ञान के बड़े फ़लक पर l आज जबकि साहित्य और फ़िल्मों से भी दादा-दादी ग़ायब होते जा रहे हैं, यह कहानी दादी और पोते के बीच के मधुर रिश्ते को सहेजती है — पीढ़ियों के बीच समन्वय के सूत्र तलाशती हुई । आधुनिक परिवेश में भी संयुक्त परिवार की महत्ता स्थापित करने वाली इस कहानी को पढ़ते हुए सहसा प्रेमचंद की कथा ‘ईदगाह’ याद आ जाती है l
अनिमेष की यह कहानी एकरेखीय नहीं है, बल्कि इसमें कई उतार चढ़ाव आते हैं — घटनाओं के साथ भावों और संवेदनाओं के । शुरुआत मौज- मस्ती के साथ होती है, फिर धीरे-धीरे यह गाथा गंभीर होती जाती है l कहानी के केंद्र में बल्लू और उसकी दादी हैं l दादी को मोतियाबिंद की वजह से दिखायी नहीं देता l गाँव का छोटा सा घर है और गुज़ारे के लिए माता-पिता, दोनों काम पर जाते हैं l दादी के साथ ही बल्लू का समय गुज़रता है l बल्लू दादी से प्यार तो बहुत करता है, पर शरारत की वजह से उन्हें सताता भी उतना ही है l इस तरह पोते और दादी के बीच दोस्ती की अनोखी दास्तान भी है यह l
बल्लू की बालसुलभ हरकतों से कहानी की शुरुआत होती है l दादी के नहाते समय बल्लू पूरा वज़न डालकर चापाकल चलाता है l छकाने के लिए वह अपनी कमीज़ पर गिरी चिड़िया की बीट नहा चुकी दादी के सिर पर गिरा देता है, जिससे उन्हें फिर से स्नान करना पड़ता है । वह कभी पूजा के समय हनुमान जी कि जगह सलमान ख़ान की तसवीर लगा देता है l बल्लू हर बार शरारत कर भाग जाता है और दिखायी न देने की वजह से दादी उसे पकड़ भी नहीं पातीं । ऐसा नहीं है कि दादी की आँखों का इलाज करवाने की कोशिश नहीं की गयी l गाँव में मोतियाबिन्द के मुफ़्त कैंप में बल्लू के माता पिता उन्हें ले जाते हैं, पर वहाँ कहीं बानर की आँख न लगा दी जाये — इस डर से दादी भाग आती हैं l धीरे-धीरे घर वाले और दादी, दोनों इस परिस्थिति को लेकर अभ्यस्त हो जाते हैं l “डाँक्टर बानर की आँख लगा देगा” — दादी के इस अंदेशे के ज़रिये हमारे गाँवों में स्वास्थ्य सुविधाओं में कमी व इलाज के प्रति दुष्प्रचार को रेखांकित कर अनिमेष अपनी गहन दृष्टि का परिचय देते हैं l

बल्लू का ध्यान दादी की नेत्रहीनता पर तब जाता है जब उसे महसूस होता है कि उसके दोस्तों की दादियों की तरह उसकी दादी उसे पकड़ने के लिए उसके पीछे नहीं आ सकतीं l संयोगवश फिर से फ़्री कैंप लगता है और नन्हा बल्लू दादी का मनोविज्ञान समझते हुए उन्हें चमत्कारी बाबा को दिखाने के बहाने वहाँ ले जाता है तथा अनुनय विनय कर आँखों का ऑपरेशन करवाने में सफल हो जाता है l यहाँ पर बल्लू एक समझदार और ज़िम्मेदार बालक की भूमिका में नजर आता है l दादी की आँखों की रोशनी आ जाती है, मगर बल्लू की मुसीबत बढ़ जाती है l अब दादी उसकी शरारत आसानी से पकड़ लेती हैं l इससे परेशान बल्लू उनके चश्मे का एक शीशा निकाल कर छुपा देता है और दादी को बताता है कि बंदर ले गया l दादी चश्मे के एक शीशे से देखकर काम चलाती रहती हैं । फिर बल्लू को एक नयी योजना बनानी पड़ती है, जिसमें वो चश्मे को ऐसी जगह रख देता है कि वह सुबह दादी के ही पैर के नीचे आ जाये । चश्मा टूटने से निराश हुई दादी को देखकर बल्लू अपना छिपाया शीशा देने की बात करता है, पर दादी नहीं लेतीं l उन्हें लगता है कि इतनी उम्र तक बिना देखे ही काम चलाया है तो अब आगे भी चला लेंगी !
दादी की अत्यधिक निराशा देखकर बल्लू का दिल बोझिल हो जाता है l तभी उसे माँ के साथ ननिहाल जाना पड़ता है l वहीं उसे दादी के पैर टूट जाने की ख़बर मिलती है l माँ उसे वहीं छोड़ कर घर लौट जाती हैं l फिर बल्लू अपराध बोध से भर जाता है और उसे लगता है कि नहीं दिखने के कारण ही दादी गिरी हैं । वह नये चश्मे की क़ीमत पूछता है, पर उसके लिए ज़रूरी पैसों का दसवाँ हिस्सा भी उसके पास नहीं है l फिर वह मेहनत का रास्ता अपनाता है और नाना की दुकान पर मदद करने लगता है l पैसे जुटाने के लिए वह चमड़े की कतरनों से छोटी सी चप्पल बनाता है, जिसे एक बच्चा ख़रीद लेता है l उत्साहित होकर बल्लू हुनर और कलाकारी से भरी ऐसी और नन्ही प्यारी सौग़ातें बनाता है जो ख़ूब सराही जाती हैं और हाथों हाथ बिकती हैं। बल्लू आख़िरकार चश्मा ख़रीद कर दादी के पास लौट आता है l
कहानी की इस मुख्य कथा के अंदर कई उपकथायें चलती हैं — जैसे बल्लू के माता-पिता की प्रेम कहानी और बड़ी बहन का पिता की मार की वजह से निधन l दुकानदारी बढ़ाने के लिए चोरी तक का हथकंडा अपनाना पड़ता है, जो कहानी में हलके-फुलके मनोरंजन का रस घोलता है l बल्लू की बड़ी बहन की मौत हालाँकि कहानी का बहुत छोटा सा हिस्सा है, लेकिन पाठक उसके असर से मुक्त नहीं हो पाता l पिटाई से बच्ची की मृत्यु और इस अमानवीय घटना को लेकर गाँव घर की संवेदनहीनता गम्भीर प्रश्न खड़े करती है l गाँव के दृश्यों का वर्णन करते हुए अनिमेष जिस बारीक नजर से उसे रेशा-रेशा प्रस्तुत करते हैं, उससे स्पष्ट होता है कि उन्हें ग्रामीण परिवेश का गहरा अनुभव है । इसीलिए गाँव और लोक जीवन पर लिखी जाने वाली ‘क्राफ़्टेड कहानियों’ से बिलकुल अलग है यह, जिनमें ड्रॉइंग रूम में बैठ कर लेखक गाँव घर की कल्पना को मूर्त रूप देने की कृत्रिम कोशिश करते रहते हैं l

कहानी मुख्य रूप से दादी के साथ बल्लू की जीवन यात्रा का क्रमिक विकास दर्शाती है, जो केवल बाह्य न होकर आंतरिक भी है l नटखटपन, मस्ती, अपराधबोध, कर्तव्यबोध और कार्यशीलता — ये सारे इस यात्रा के पड़ाव हैं l बल्लू का चरित्र उत्तरोत्तर जिस तरीक़े से बड़ा होता है, उससे पता चलता है कि लेखक की बाल मनोविज्ञान पर बहुत गहरी पकड़ है l बच्चे के मानस पर परिवर्तन के इन भावों को उकेरना सहज नहीं है, लेकिन अनिमेष इस मामले में सफल रहे हैं । कहानी का आख़िरी हिस्सा प्रतीकात्मक होते हुए भी पाठकों को बाँधे रखता है l इसे पढ़ते हुए पाठक प्रेमचंद की ‘ईदगाह’ के हामिद की तरह दादी की आँखों में ख़ुशी के आँसू देखना चाहते हैं, पर लेखक अंत को खुला छोड़ देता है l ऐसा करते हुए वह कहानी को दोहराव से तो बचाता ही है, पाठकों को भी अपनी कल्पना से ख़ाली स्थान भरने की पूरी छूट देता है l
स्त्री पात्रों की बात करें तो बल्लू की माँ, दादी और बहन, तीन ही मुख्य हैं, जिनके ज़रिये जीवन की विभिन्न परतें उद्घाटित होती हैं l दादी को दिखाई नहीं देता, लेकिन उन्होंने समझौता कर लिया है l माँ घर और बाहर के काम सँभाले रहती है l बड़ी बहन की उम्र अधिक नहीं होने के बावजूद उस पर छोटे भाई की देखभाल का भार है l बच्ची की मृत्यु पर स्त्री अपने पति को दोषी नहीं मानती… वह दुखी होती है, पर क्रोध को दबा लेती है अपने भीतर । इनके साथ चलता रहता है कभी ख़त्म नहीं होने वाला स्त्री संघर्ष !
“दी” कहानी, जैसा कि नाम से स्पष्ट है, भाई-बहन की कहानी है l भाई अपनी दी से कहता है कि “तुम इतना अत्याचार कैसे सहती हो ?” उसके बाद दीदी की जीवन यात्रा के साथ-साथ स्त्री जीवन की विवशता की कथा खुलती जाती है l कहानी मुख्य रूप से ‘दी’ पर केंद्रित है, पर दूसरी बहन भी है रचना में रची बसी। दोनों ही बहनें जहाँ ब्याही गयी हैं, वहाँ उन पर अत्याचार होता है l माता-पिता लड़कों के दोषों के बारे में जानते थे, फिर भी ब्याह कर दिया, क्योंकि उनके पास दहेज के पैसे नहीं थे l जीजा का व्यवहार बाक़ी लोगों के लिए अच्छा है, पर वह ‘दी’ के साथ मारपीट करता है l यहाँ कहानी पितृसत्ता के उस विद्रूप चेहरे को दिखाती है, जहाँ पुरुष अपनी पत्नी को जागीर समझता है l दरअसल यह पितृसत्ता ही है जो माँ में देवी देखती है और पत्नी में संगिनी सहचरी के बदले अनुचरी l माँ के हाथों थोड़ी सी सत्ता देकर वह स्त्री द्वारा स्त्री का शोषण करवाती है l
माँ पर होते अत्याचार को देखकर बेटा उसके जीवन को सुखमय बनाना चाहता है, पर अपनी पत्नी का जीवन ख़ाली छोड़ देता है और उस पर ध्यान नहीं देता l यह सिलसिला चलता रहता है और सिद्ध करना मुश्किल हो जाता है कि जो अच्छा बेटा है, अच्छा भाई है, क्या वह अच्छा पति नहीं ? कई बार जानबूझ कर स्त्रियाँ अपना दर्द छिपाती हैं ताकि मायके वालों के जीवन पर उनके दुखों की छाया भी न पड़े l ‘दी’ ने भी ऐसी कोशिश की, पर संयोगवश बात खुल गयी l भाई अपनी बहन को उस ज़िंदगी से निकालने की पूरी कोशिश करता है, लेकिन बहन हर बार मना कर देती है l अंततः बच्चों की शिक्षा के नाम पर बहन मान जाती है, लेकिन फिर पति की बीमारी की ख़बर सुन कर वापस चली जाती है l
अंतर्कथा के रूप में भाई के जीवन का दूसरा पक्ष भी सामने आता है l वह अपनी बहन की ख़ुशियों के लिए शादी नहीं करने का फ़ैसला लेता है । फिर उसकी प्रेमिका भी शादी नहीं कर इस निर्णय को स्वीकार करती है l कहानी स्त्री जीवन के कई बिंदुओं पर प्रश्न उठाती है — जैसे भार समझ कर किया गया विवाह, पति द्वारा मारपीट, स्कूल में अभिभावक के रूप में स्त्री द्वारा भाई का नाम लिखवाने में समस्या, पुरुष द्वारा अपनी बहन के हित में प्रेयसी से बिना मशविरा किये विवाह न करने का फैसला, कुँवारे छोटे भाई के साथ रह रही बहन के आपसी रिश्तों पर लांछन, पति के बुरे समय में उसके पास लौटने का फैसला…। इनमें से कुछ भी ऐसा नहीं है जो हम आस-पास के समाज में नहीं देखते हैं l इसी में छिपा है स्त्री जीवन का सारा दर्द l स्त्री की करुणा और ममता ही नहीं, भाई के जीवन का बिखराव और सामाजिक उलाहना से उपजा दर्द– सब मिलकर अंततः उसे शोषक पति के पास लौटने को विवश करते हैं l यह कहानी पितृसत्तात्मक व्यवस्था के तहत दबते कुचलते और उबरने की कोशिश करते स्त्री जीवन के रचनात्मक विवेचन की क्षमता को प्रमाणित करती है ।
“माई रे” औपन्यासिक कलेवर की महागाथा है : एक उपन्यासिका या लघु उपन्यास ! इसमें कई पात्र हैं और कलेवर इतना विशाल कि उसकी ख़ूबियों को कुछ पंक्तियों में समेटना मुश्किल है l एक के बाद एक घटनाओं को पिरोने वाली यह अनन्य रचना मुख्य रूप से माँ और बेटे के अनुपम रिश्ते को रेखांकित करती है l कहते हैं कि जब किसी की मृत्यु होने वाली होती है तब उसकी आँखों के सामने उसका सारा जीवन किसी चलचित्र सा घूमता है l माई, यानी शिबू की अंतिम साँसे चल रही हैं, और स्लाइड्स की तरह चल रही है उसकी अतीत-यात्रा — बालपन से शुरू हुई ! देश का विभाजन, हिन्दू मुस्लिम के बीच दरार का पड़ना, बच्चे के स्कूल के दाख़िले में आने वाली मुश्किल और रबू का नाम प्रभु लिखा देना — इनसे सम्बद्ध विडंबनाओं, विरोधाभासों एवं विसंगतियों को संकेतित व रेखांकित करती घटनाओं के साथ आगे बढ़ती हुई इस महागाथा के बीच-बीच में कई अंतर्कथायें चलती रहती हैं l
अबू के लकवाग्रस्त होने के बाद कहानी यू टर्न लेती है और वहीं से माई, यानी शिबू एक सशक्त महिला के रूप में उभर कर आती है l घर की आजीविका का प्रबंध करने वाली एक माँ के रूप में वह सुरों को साधने के साथ बेटे की देखभाल भी करती है l गायत्री मंत्र साधना से वह अनंत से जुड़ने लगती है और उसे पूर्वाभास भी होने लगता है l स्कूल द्वारा निकाले जाने पर वह प्रभु की औपचारिक शिक्षा के ऊपर कला और रचनात्मकता को महत्व देती है और उसे जीवन और आजीविका, दोनों के लिए ध्यान और संगीत सिखाती है l जैसे-तैसे जीवन पटरी पर आ रहा होता है कि वह कैंसर से पीड़ित हो जाती है l उसे मृत्यु का पूर्वाभास हो जाता है, फिर भी वह अपने बेटे को सफल गायक बनते देखना चाहती है और उससे मैदान छोड़ कर नहीं भागने की शपथ लेती है l प्रभु एक गायक के रूप में जब सफल होता है तब तक माई की इहलीला समाप्त हो चुकी होती है l प्रभु के मन के अंतर्द्वंद्व को लेखक ने इतनी मार्मिकता से उकेरा है कि पाठकों की आँखें नम हो जाती हैं और द्रवित हो जाता है दिल !
प्रेम रंजन अनिमेष की और बहुतेरी कहानियाँ भी इसी तरह के औपन्यासिक कलेवर वाली हैं, जिनके भीतर कई घटनायें और अंतर्कथायें सहज प्रवाह के साथ आगे बढ़ती रहती हैं । ये कथायें यह प्रतिपादित करती हैं कि रचनाकार की लोक भाषा और जीवन पर अच्छी पकड़ तो है ही, मानव मनोविज्ञान की भी बेहतर समझ है l जितनी भी कहानियाँ स्त्री को केन्द्र में रखकर रची गयी हैं, उनके रचनात्मक विकास में लेखक को सफलता मिली है । ‘ए आजी’ की स्त्रियाँ जहाँ जीवन की यथास्थिति को स्वीकारती हैं, ‘दी’ भाई का सहारा लेकर संघर्ष की कोशिश करती है, लेकिन पुनः अपने घर लौट जाती है l ‘माई’ ऐसी वर्जनाओं को तोड़ती हुई एक सशक्त स्त्री के रूप में स्वयं को स्थापित करती है, जो न केवल आर्थिक सामाजिक परिस्थितियों से निपटती है, बल्कि भावनात्मक उथल-पुथल पर भी नियंत्रण रखती है l कुल मिला कर अनिमेष की कहानियों का विकास स्त्री संघर्ष के विस्तार को दिशा देता है — रचनात्मक धरातल पर सोच विचार की तार्किक परिणति तक पहुँचकर पाठकों को कई मुद्दों पर उद्वेलित करता हुआ !

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वंदना बाजपेयी
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