हंस सम्मान से सम्मानित युवा कथाकार आलोक रंजन की “तलईकूतल” कहानी दक्षिण भारत की एक अमानवीय प्रथा पर केंद्रित मार्मिक कहानी है। ‘तलईकूत’ नाम की इस प्रथा में दक्षिण भारत विशेषकर तमिलनाडु में विपन्न परिवार बोझ बन चुके अपने बुजुर्गों को स्वयं जीवन से मुक्ति दे देते हैं। इस प्रकार हत्या करने के लिए वे असमर्थ बुजुर्ग पर लगातार ठंडा पानी डालते थे या उन्हें गोबर, मानव मल मिला हुआ पानी पीने को देते थे। जिससे उनके पेट में इन्फेक्शन हो जाता था। अगर कभी डॉक्टरी जाँच भी हो तो मृत्यु का कारण संक्रमण, हृदयघात ही आता था।
इस अमानवीय प्रथा को दर्शाने के साथ-साथ कहानी दक्षिण की पानी की समस्या, जलवायु, फूलों का व्यापार, बुजुर्गों की समस्याएँ, स्त्री की नींद, सुकून की तलाश में गाँव की ओर रुख करता धनाढ्य वर्ग और बाज़ार, पर्यावरण, अस्पतालों की दुर्दशा आदि भी बारीकी से कहती है, साथ ही कर्मकांडों पर प्रहार भी करती है। इस तरह से जो प्रत्यक्ष दिख रहा है उससे इतर कहानी कई सूक्ष्म बातों पर प्रकाश डालती है। इस पूरी व्यवस्था को दर्शाने के लिए लेखक ने एलीकुट्टी को चुना है। एलीकुट्टी एक वृद्ध स्त्री।
हंस सम्मान से सम्मानित कहानी तलईकूतल पर प्रतिक्रिया
कथावाचन शैली में कही गई ये कहानी सरल सहज भाषा में लेखक का पाठकों से संवाद है। इसमें लेखक ने संवाद में तटस्थता बनाए रखी है, फिर भी एलीकुट्टी की जिंदगी अपनी जिंदगी सी लगती है। पाठक उससे आत्मसात करता जाता है। भावुक दृश्यों में ये तटस्थता बनाए रखना और पाठक तक भावनाओं का पूर्ण सम्प्रेषण करना एक कठिन कला है, जिसे साधने में लेखक पूरी तरह से सफल रहे हैं। यूँ एलीकुट्टी का शाब्दिक अर्थ होता है, चूहे का बच्चा । एलीकुट्टी सोचती है कि आखिर उसके माता-पिता ने उसका ये नाम क्यों रखा ? नन्हे गुलाबी चूहे के बच्चों को कौवा झपट्टा मार कर खा सकता है पर एलीकुट्टी…? लेकिन रोग से हारी कमजोर एलीकुट्टी भी ग्रास बनाई जाती है, उतनी ही निष्ठुरता से उतनी ही तत्परता से।
कहानी रहस्य के साथ शुरू होती है। शुरू में लगता है ये एक आम दिन की शुरुआत है पर अंत पढ़ने के बाद लगता है कि कहानी की रहस्यात्मक शुरुआत एली की अंत समय की है, जहाँ उसका पूरा जीवन एक रील की तरह उसके सामने घूम रहा है।
“वह जोर लगाकर अपनी आँखें खोले हुए है जैसे आँख बंद होते ही वह खत्म, जैसे शरीर की सारी ताकत आँख और उसके आसपास आ गई हो। हालाँकि जैसे भाँग के नशे में होता है ठीक वैसे ही उसकी पलकें देखने वालों को अधमुँदी ही दिख रही हैं। उसे अपने सामने लोगों की धुंधली छवियाँ ही नजर आ रही हैं पर भीतर के दृश्य साफ हैं। वह जहाँ पहुँच गई है वहाँ रहना नहीं चाहती बल्कि यहाँ तक आना भी नहीं था उसको। कोई भी नहीं आना चाहेगा। इस भरे घर में इंतज़ार भरा हुआ है वह तसल्ली चाहती थी। जिंदगी खामोश और थके कदमों से भारी होकर बैठी है उसके पास चेहरे के भाव ऐसे कि न चाहते हुए उसे जाना हो दूर”
एली एक कर्मठ महिला है। फूलों के गजरे बेचती है। घर में भी सारे काम वही करती है। पति आवारा निठल्ला है। जैसा की ज़्यादातर होता है एली के पैसों को शराब में उड़ाता है। कहानी की शुरुआत होती है एक उदास सुबह से, जहाँ एली अपनी आदत के अनुसार अल सुबह उठ गई है। लेखक बड़ी ही चतुरता से स्त्री की नींद का विषय उठाते हैं। स्त्री की नींद को कभी महत्वपूर्ण समझा ही नहीं गया। जिसका जब मन करता है अपने काम के लिए उठा देता है।
बचपन से अब तक इसी समय में जागती रही। इतनी सुबह को किए जाने वाले काम बदलते रहे लेकिन उठने का समय नहीं बदला। हर दिन वह एक बेचैन और बची हुई नींद के बीच अपनी आँखें खोलती है। उस समय से डरावना कुछ नहीं है उसकी ज़िंदगी में। वह किसी न किसी के सोने की कीमत चुकाती रही जैसे सभी स्त्रियाँ चुकाती हैं, कभी भाई के तो कभी बाप के फिर हमेशा के लिए पति के! स्त्रियों की नींद भी अपनी नहीं होती!
कहानी की शुरुआत धीमी गति से होती है। बेइनतहां गर्मी के दिन हैं। चमड़ी जलाकर राख कर देने वाले। यूँ इस इलाके में बारिश कम होती है और इस बार पानी की एक बूंद भी नहीं बरसी है । सरकारी टैंकर रोज आता है पर पिछले दो दिन से नहीं आया है। एली इडलियाँ बनाती हुए चिंतित है कि अगर पानी नहीं मिला तो कल इडली बनाना भी मुश्किल है। इसके लिए वह पति से कहती है कि टैंकर आए तो पानी भर लेना। यूँ उसे अपने निखट्टू पति से कोई उम्मीद नहीं है पर पानी भर लेने की उम्मीद उसे है क्योंकि पानी नहीं मिलने पर इडली नहीं बनेगी । वह जानती है कि बाज़ार से इडली पैसों से मिलती है और उसका आवारा पति इडली के लिए पैसे खर्च नहीं करेगा। इसीलिए वह पति की बड़बड़ाहट को अनसुना कर साइकिल पर अपनी डलिया को पत्तियों से सजाती है।
बस निभाने के लिए निभाए जाने वाले पति-पत्नी के संबंधों पर भी कहानी प्रकाश डालती है। ऐसी शादियाँ या यूँ कहें कि निभाने की लिए निभा ली जाने वाली शादियाँ हमारे यहाँ खूब देखी जाती हैं। शुरुआत से ही उनका रिश्ता ऐसा ही है। अब दोनों वृद्ध है। सदा से घर की जिम्मेदारी से भागने वाले पति के प्रति एली भी उदासीन है। वह खाँसता भी रहे तो एली उठकर पानी नहीं देती। दोनों के बच्चे नहीं है। एली इसके लिए ईश्वर की शुक्रगुजार है। यहाँ दो लोगों की ज़िम्मेदारी उठाने में वह हैरान परेशान है, बच्चे होते तो उनका पालन कैसे होता। इस एक पंक्ति से एली के पूरे जीवन का दर्द छलकता है।
“दुनिया से कोई खास मतलब उसे नहीं है न ही अपनी बीवी से। शुरू में शरीर चाहिए था उसे पर अब तो खँखड़ बुढ़ापा है। अब एक दूसरे को लेकर न तो स्वीकार है न ही अस्वीकार। रोजमर्रा की गतिविधियाँ तो हैं लेकिन उनके भीतर अलगाव की अविरल धार निरंतर बहती है। एक दूसरे के प्रति अक्रिय रहने की लंबी आदत हो गई दोनों को”
एली के घर, जो नारियल के पत्तों और बांस से बना है। उसने अपने इलाके में सीमेंट और लोहे की छड़ों (सरियों) के घर नहीं देखे। लेखक खाए-अघाए हुए लोगों पर तंज करते हुए कहते हैं कि आजकल ऐसे घर विशेष तौर पर बनवाए जा रहे हैं। इन इको फ़्रेंडली घरों में लोग प्रकृति और ग्राम्य जीवन का आनंद लेने आते हैं और कुछ दिन बाद वापस अपने सीमेंट और लोहे की सरियों वाले घरों में लौट जाते हैं । पर्यटन की वजह से पूरा पर्यावरण खतरे में आया है। कहानी बिना लाउड हुए वहीं पर अंगुली रखती है। विकास के साथ विनाश की यह लीला आज हम हिमाचल और अन्य राज्यों में देख रहे हैं। अपनी दुनिया शहर को सीमेंट और सरियों से बर्बाद कर सैलानी उन ईलाकों में सुकून ढूँढने जाते हैं, और वहाँ विनाश के बीज बोते हैं। वर्णन करते हुए घर की खासियत इन शब्दों में समाई है –
“सूरज के निकलने से पहले के अंधेरे में नारियल के पत्तों के खिसक जाने से जो छेद बनते हैं वे रोशनी बढ़ने के साथ बंद होने लगते हैं तब तक छोटे से आँगन में झाड़ू फिर जाता है, उबलते पानी में वह चाय की पत्ती गिरा आती है।”
पर्यावरण की वीभत्सता का एक और दृश्य वैगई नदी के पुल पार करते समय दिखाई देता है। कभी द्रविण सभ्यता का केंद्र रही वैगई नदी मदुरै शहर के बीचोबीच कभी-कभी बहती है। फिलहाल सूखी पड़ी है। बीच में जो पानी जैसा तरल दिख रहा है वह पानी नहीं है शहर भर का मल है। गर्मी इतनी है कि मल की गंदी धारा भी सूखकर काँटा हो गई है। वहीं केले की घटी किस्मों का भी कहानी संज्ञान लेती है। कभी दर्जनों किस्में हुआ करती थीं, अब केवल 5 या 6 हैं। विकसित होते मनुष्य ने प्रकृति को कितना संकुचित कर दिया है। फैलाव और घटाव का ये अनियंत्रित ताना-बाना है।
भारत के दक्षिण में गर्मी तो पड़ती है। परंतु कहानी में गर्मी की प्रचंडता का वर्णन ग्लोबल वार्मिंग की ओर ईशारा करता है। गर्मी की प्रचंडता को दर्शाने के लिए कई स्थानों पर सूत्र छोड़े गए हैं। कहानी की शुरुआत ही चमड़ी तक सोख लेने वाली गर्मी से होती है। सुबह का वक्त है, इसलिए इडली की भाप दिख रही है। वरना भाप दिखना भी मुश्किल है। एली जब वैगई के पुल को पार करती है तो पसीना आना भी उसे पानी की बर्बादी लगती है।
“पता नहीं शरीर में इतना पानी कहाँ से आ जाता है कि पुल पर चढ़ते चढ़ते उसकी पीठ और चेहरे पर पसीना दिखाई देने लगता है। उम्र के इस पड़ाव पर दर्द का झलक जाना तो उसे समझ आता है लेकिन इस सूखे में उसके चेहरे पर पानी या जाना पानी की बर्बादी है”
फूल की दुकान में एक ग्राहक से उसका संवाद देखिए –
–दिव्याश्री , कपड़ा उठाकर फूलों को मत देखो .. मैं कभी खराब फूल नहीं लाती .. खुले में फूल सूख जाएंगे और मेरी कमाई मारी जाएगी .. कैसी गर्मी है देख ही रही हो।
–अम्मा गर्मी तो सच में बहुत ज्यादा है .. इस बार तो पानी बरसने का नाम ही नहीं ले रहा है .. मदुरै के सारे पेड़ सूख जाएंगे इस बार।
फूल बेचने वालों की परेशानियों को भी कहानी जर्रा-जर्रा खोलती है। एली को पहले फूल लेने के लिए जाना है फिर वह उन्हें बेचेगी। बीच का रास्ता बड़ा कठिन है। वह साइकिल से जाती है। जल्दी -जल्दी पैडल मारती है। वैगई का पुल पार करना है। देर होने पर सड़क लोगों से भर जाएगी। यहाँ जिनका अपना काम है और जो दूसरों के लिए काम करते हैं लेखक उनका बारीक अंतर बताते हैं।जिनका अपना काम है वे बहुधा समय से पहले निकलते हैं लेकिन जो दूसरों के लिए काम करते हैं वह एक नियत समय पर ही निकलते हैं। इतने सारे लोगों के एक साथ निकलने अपर सड़क पर भीड़ होना स्वाभाविक है। काम हमारी आदतों में वर्गीकरण का कारक है, भेदक है।
फूल मंडी में भी लेखक अपनी ऑबजर्वेशन क्षमता परिचय देते हैं। फूलों की खेती इधर बढ़ी है। उत्तर प्रदेश का मेरा अनुभव भी यही कहता है कि कई गाँव अब गेहूँ की जगह फूलों की खेती करने लगे हैं। यहाँ भी लेखक आश्चर्य करते हैं कि फूल बंगलुरु से आते हैं, जैसे वहाँ लोग अन्न नहीं फूल खाते हों। फूल प्रकृति का शृंगार हैं पर फूलों की खेती इंसान और भगवान के शृंगार के लिए है। कहानी फूलों की खरीदारी पर ही नहीं रुकती बल्कि मीनाक्षी मंदिर में उन्हें बेचने की कवायद पर भी अपनी बात रखती है। जिन्हें मंदिर के ठीक सामने जगह मिल जाती है, वे बढ़ा-चढ़ा कर दाम बताते हैं, सड़ा हुआ नारियल भी बेच देते हैं। एक बार आने वाला दोबारा आएगा, जरूरी नहीं। लोग सुविधा के लिए उन्हें खरीदते भी हैं। मंदिर से दूरी फूलों की गिरती कीमत की बानगी बनती है। मंदिर के ठीक सामने की सड़क पर फूल बेचना एली का सपना है पर वह कभी बेच नहीं पाती। वह किसी चौराहे पर जहाँ किसी रामराजू नाम के छुटभैया नेता की मूर्ति लगी है, वहीं छाता लगाकर फूल बेचती है। उसकी ग्राहक महिलाएँ हैं, जो गज़रा खरीदने के लिए उसके पास आती हैं।
यहीं से कहानी में यू टर्न आता है। जहाँ उसे पता चलता है कि उसके गाँव का पानी पड़ोस के कीलड़ी गाँव में भेजा जा रहा है, जहाँ बारिश के लिए यज्ञ हो रहा है। ये धनी लोगों का गाँव है, जिनके अपने खेत है। यहाँ खुदाई में प्राचीन अवशेष भी मिले हैं, जिसके कारण मंतरी-संतरी का भी यहाँ आना है । लेकिन अपने हिस्से के पानी की कीमत पर अनचाहे यज्ञ में वह और उसका गाँव भी शामिल किस आधार पर किया गया ? अंधविश्वास पर तार्किक प्रहार है। यहीं फूल बेचने वाली एक कर्मठ स्त्री, अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ उठाने वाली एक सशक्त स्त्री में बदलती जाती है। घर में पानी का न होना उसको पड़ोस के गाँव से बाल्टी में पानी लाने को प्रेरित करता है। आवश्यकता जनित एकता में अन्य स्त्रियाँ उसका साथ देती हैं।
–पानी तो हम लेकर जाएंगे …
कहते हुए एली पानी के टैंकर की ओर बढ़ गई। यज्ञ की वेदी से मंत्रोच्चार की आवाज या रही थी लेकिन सबका ध्यान इस ओर हो गया था। एली के साथ साथ बाकी स्त्रियाँ भी उस ओर लपकी।
एक अन्य तंज यहाँ देखने को मिलता है कि जो टैंकर उसके गाँव में पानी लाता था वो इस यज्ञ में आए लोगों के शौच धोने में काम आ रहा है। एली अन्याय का विरोध करती है और पानी लेने के प्रयास में हुई मार-पीट में उसकी कमर की हड्डी टूट जाती है। अस्पताल में नेता के देखने आने तक के इलाज के बाद उसे घर भेज दिया जाता है। सायकिल चलाने वाली कर्मठ स्त्री लाचार और बेबस स्त्री में बदल जाती है, जो स्वयं उठ भी नहीं सकती। लेकिन एली पूरी राजनैतिक और धार्मिक अंधविश्वास के ढांचे को हिला देती है। सशक्त स्त्री की स्थापना की गई है। अपने से चार गुने से भिड़ने के उसके साहस से परिवर्तन आता भी है। मंत्री का दौरा होता है । अस्पताल में पड़ी एली को उसका पति बताता है कि
उसके पति ने पास आकर समझाया कि घर में दो नई बाल्टियाँ या चुकी हैं, वेलु रोज पानी भर जाएगा और इलाज का खर्च मंत्री का परिवार देगा। इसलिए उसे ज्यादा चिंता नहीं करनी चाहिए।
कहानी ने अकि स्थानों पर स्त्री विमर्श को खूबसूरती से पिरोया है। स्त्री की नींद जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे को उठाती कहानी नदी की दारुण दशा और स्त्री की दारुण दशा में साम्यता दर्शाने के लिए लेखक कहते है कि एली के पैरों की फटी बिवाइयों की तरह नदी को भी अपनी बिवाइयों से दर्द होता होगा क्या? कई स्थानों पर स्त्री और प्रकृति एकमेक हो जाते हैं। अढ़ाती के आश्चर्य करने पर कि वह हमेशा समय पर कैसे आ जाती है, एली सोचती है कि क्या गरीब भी भी आलस कर सकता है, खासतौर से स्त्री।
मार्मिकता की ओर बढ़ती कहानी में पति को मुआवजा मिलता है और एली को तलईकूतल प्रथा के अनुसार मृत्यु। अपने चरम पर पहुंची कहानी पाठक के अंदर वेदना, छटपटाहट और बेचैनी पैदा करती है। घर में उत्सव का माहौल है। खाना-पीना, मौज मस्ती किसलिए एक असहाय वृद्धा से निजात पाने के लिए? ये अपनों द्वारा की गई हत्या का उत्सव है – वीभत्स हत्या। यूँ तो कहानी कहीं भी पाठक को रुकने नहीं देती पर अंत के बाद कहानी पाठक के मन में जड़ें जमाकर बैठ जाती है।
अंत में यही कहूँगी कि लेखक का ऑबजर्वेशन प्रभावित करता है। उन्होंने बहुत सारे मुद्दों को कहानी में उठाया है, खूबसूरती से बुना है, और स्वाभाविक अंत तक पहुंचाया है। ये लेखक का कथा कौशल है। ये याद रह जाने वाली कहानी है। फिर भी मुझे लगता है कि इस कहानी में उपन्यास बनने की संभावना है।
पुनः हंस सम्मान के लिए लेखक “आलोक रंजन” जी को हार्दिक शुभकामनाएँ
वंदना बाजपेयी

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