आख़िरकार स्त्री विमर्श के मुद्दे पर बनी “आप जैसा कोई” फिल्म का मुख्य उद्देश्य ये स्थापित करना है कि प्रेम बराबर की बात है – जहाँ दोनों बराबर हैं – न कम न ज्यादा।
किसी भी काम को अगर गलत माना जाता है तो पुरुष और स्त्री के लिए गलत माने जाए या दोनों के लिए ठीक।
आज अकेलापन युवाओं की जिंदगी में रच बस गया है। चाहे वो कैरियर की वजह से परिवार से दूर रहने की कारण उपजा हो या ब्रेकअप से. एकाकीपन और ब्रेकअप के दर्द से गुज़रते युवा अपने मन को सहारा देने के लिए डेटिंग एप का सहारा लेते हैं। अगर युवतियां भी वही करें तो उसे सहजता से लिया जाए। उन्हें चरित्र हीन की उपाधि न दी जाए। जबकि हमारा समाज स्त्रियों के लिए अलग दृष्टि रखता है और पुरुषों के लिए अलग ।
वहीँ फिल्म वर्क-लाइफ बैलेंस पर भी जोर देती है और प्रौढ़ पुरुषों को सचेत करती है कि अगर आप अपनी पत्नी के जीवन के एकाकीपन को नहीं समझते हैं या उसके साथ क्वालिटी टाइम नहीं बिताते है, तो आज उनके पास भी विकल्प हैं।
फिल्म बनाई बहुत सलीके से गयी है। देखते हुए रॉकी और रानी याद आती है। उसमें स्त्री विमर्श लाउड था और यहाँ शांति से आया।
फिर भी मैं यही कहूँगी की प्रौढ़ स्त्री पुरुष के मामले में कहानी एक सब्ज़बाग़ परोसती है। जिसमें सारी आदर्श परिस्थितियां हैं। उस पत्नी के एकाकीपन और अपमान से उतपन्न विचलन पर एक महीने में ही उसके द्वारा दूसरे पुरुष को पूरी तरह से समझ लेना और परिवार द्वारा भी स्त्री को सहर्ष अपना लेना और बच्चों द्वारा भी पिता के विरुद्ध माँ का साथ देना हकीकत में थोड़ा मुश्किल है। अक्सर स्त्रियां इसमें धोखा ही खाती हैं। फिर उनके दोनों हाथ खाली हो जाते हैं। देखा जाए तो पुरुष भी इधर-उधर घूम कर पत्नी के पास ही लौटते हैं। क्योंकि कोई सच्चा व्यक्ति मिल जाना रेयर हैं। अलबत्ता धोखा तगड़ा मिलता है/मिल सकता है ।
आदर्श रचते हुए कई कहानियां यहीं धड़ाम से गिरती हैं। फिल्म के माध्यम से अगर बड़ा मेसेज देने की कोशिश की जा रही हो तो सतर्कता बहुत जरूरी है।
अगर एक सचेतन स्त्री को लिया ही था तो समझदारी से धीरे-धीरे दोस्ती से कदम बढ़ाते हुए दिखाना चाहिए था। वहीँ उसके संवाद इतने मजबूत होने चाहिए थे की दर्शक उसके पक्ष में खड़े हो सकें। इसके संदर्भ में मुझे बाजीराव मस्तानी याद आती है , जो फिल्म मस्तानी के प्रेम को स्थापित करने के लिए बनाई गयी वहां संवादों की वजह से काशीबाई बाजी मार ले जाती है।
कहानी में कोई भी पात्र कोई भी वाक्य अगर आया है तो उसे पूरी स्पष्टता देनी चाहिए। बाकी वन टाइम वाच है और ऐसा नहीं लगा कि देखनी ही चाहिए। हाँ वर्क -लाइफ संतुलन की बात मुझे जरूर अच्छी लगी। टूटते परिवारों के पीछे ये मुख्य वजह है। कमाने में इतना भी व्यस्त न हो जाओ की परिवार के लिए समय ही न बचे।
मन क का खाली हो जाना जेब खाली होने से कम भयावह नहीं।
आज युवा वर्ग का एक बड़ा प्रतिशत खाली मन और भरी जेब के साथ दौड़ रहा है।
वंदना बाजपेयी
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