हम सब मजबूत रिश्ते चाहते हैं पर ऐसा न होने पर relationship counceling की मदद लेना गलत नहीं है | पर ऐसी क्या तीन गलतियाँ हो जाती हैं कि इसका कोइलाभ नहीं होता |

                               
3 गलतियाँ जिसके कारण relationship counseling आपकी मदद  नहीं कर पाती



एक समय था जब पति -पत्नी में झगडे होते थे तो परिवार के बड़े बुजुर्ग संभाल लेते थे | परन्तु आज परिस्थितियाँ अलग हैं | आज एकल परिवार है और उस पर भी " my life my rules " के चलते बड़े -बूढों की दखलंदाजी पूर्णतया निषिद्ध कर दी गयी है | ऐसे में छोटे झगड़ों के तलाक तक  पहुँचते देर नहीं लगती है | पर तलाक हमेशा समस्या का समाधान नहीं होता | ये हमेशा जरूरी भी नहीं होता |   हर किसी का अपने जीवन साथी में बहुत बड़ा " emotional investment " होता है | ये बहुत पीड़ा दायक प्रक्रिया है , खासकर तब जब बच्चे हो चुके हो , जिन्हें माँ या पिता के बीच में से एक को चुनना पड़ता है | इसलिए आजकल दम्पत्ति टूटते रिश्तों को सँभालने के लिए  relationship counselling की मदद लेते हैं |


3 गलतियाँ जिसके कारण relationship counseling आपकी मदद  नहीं कर पाती


relationship counselling  नए ज़माने का शब्द है और शायद नए ज़माने के लोगों को ही इसकी ज्यादा जरूरत भी है | लोग इस आशा से  काउंसलर के पास जाते हैं कि उनके रिश्ते में फिर से पहली वाली बात आ जाए , या जो भी गलतफहमी आपस में  हो गयी है वो ठीक हो जाए | अक्सर ऐसा होता भी है | एक अच्छी सलाह के साथ दोनों वापस आते हैं और ख़ुशी -ख़ुशी अपनी जिन्दगी शुरू करते हैं |


 relationship  therapist मधुरिमा बजाज कहती हैं कि  एक दूसरे को सुनना , समझना या बात करना एक स्किल है जिससे थेरेपी की जाती है | बहुत से लोग छोटे झगड़ों में ही आ जाते हैं और समस्या आसानी से सुलझ जाती है | पर बहुत से लोग बात तलाक तक पहुँचने पर आते हैं वो बहुत आहत होते हैं उनमें एक दूसरे के प्रति गुस्सा बहुत भरा  होता है | ऐसे में उनको संभालना मुश्किल होता है | परन्तु कई लोग इस मन: स्थिति के साथ आते हैं कि सब प्रयास कर लिए चलो इसे भी  आखिरी दांव की तरह कर के देख लेते हैं | उनको देख कर यह तय करना मुश्किल हो जाता है की क्या वो वास्तव में अपना रिश्ता बचाना चाहते हैं ?


जाहिर है ऐसे रिश्तों को बचाना मुश्किल हो जाता है |

अगर आप भी किसी relationship  counseling के लिए जाना चाहते हैं | तो अपना समय , पैसा और ताकत बर्बाद होने से बचने के लिए उन तीन गलतियों से दूर रहना होगा  जिन्हें करने वाले लोगों की counselling कोई मदद नहीं कर पाती |


1) वो  एक दूसरे की गलतियां देखने से बाज नहीं आते


                                                       ऋतिक और सान्या  जब काउंसलर के पास गए तो वो दोनों वहीँ झगड़ पड़े | ऋतिक सान्या पर  आरोप लगाये जा रहा था और सान्या  ऋतिक पर | दोनों दूसरे का पक्ष सुनने को तैयार ही नहीं थे | यही तो वो घर में करते थे फिर काउन्सलिंग की फीस देने और यहाँ आने से क्या फायदा | दरअसल जब आप काउंसेलर के पास जाने का मन बनाये तो अपना " rigid attitude " लेकर न जाएँ | ये सोच कर न जाए कि ये केवल दूसरे की गलती है जिस कारण रिश्ते में समस्या आ रही है | यहाँ जरूरी है की आप खुले दिमाग से जाए , आप सुनाने नहीं सुनने जा रहे हैं | सुना तो आप घर में भी लेते थे | यहाँ ये सोच कर जाइए कि आपको खुले दिल से दूसरे की बात समझनी है |


बीना को   नौकरी करने का मन था , उसे लगता था उसकी शिक्षा व्यर्थ हो गयी है | किशोर चाहता था वो घर  में ही रहे | अक्सर वो बीना से कहता कि तुम्हें तो तफरी करने कला शौक है , घर में पैर बंधते नहीं है | और बीना उस पर मिडल क्लास मेंटेलिटी का लेबिल लगा देती | जिससे झगडा बढ़ जाता | जब दोनों खुले दिमाग से कोउन्लर के पास  गए तब किशोर को पता चला कि बीना अपनी सहेलियों के सामने छोटा महसूस करती है जो आज बाहर जा कर काम कर रहीं हैं व् पैसे कमा रहीं हैं , जबकि पढाई में वो उससे बहुत पीछे थीं | बीना को भी पता चला कि किशोर को भय है कि कामवाली ठीक से बेटे का  ध्यान नहीं रखेगी | बचपन में उसका चचेरा भाई बाथ  तब में गिर जाने के कारण दुनिया से चला गया , उस समय उसकी चाची पड़ोसन के घर में बैठ शादी का वीडियो देख रही थीं |

दोनों ने एक दूसरे के पक्ष को समझा | जिसे वो घर में बहस के बीच नहीं समझते थे | बीच का रास्ता निकला | बीना ने एक ऐसे स्कूल में नौकरी की जिसमें छोटे बच्चों की डे केयर की सुविधा थी | बीना को सम्मान मिला और किशोर  भय मुक्त हुआ | 


ऐसा तभी संभव हुआ जब दोनों ने एक दूसरे को सुना | एक दूसरे के प्रति खुले दिल से व् अपने को कुछ हद तक बदलने के वादे  के साथ गए | लेकिन अगर कोई जोड़ा सिर्फ अपनी बात सिद्ध करने के उद्देश्य से आता है तो उसकी शादी को बचना मुश्किल है |


2) ये केवल दो लोगों के बीच का मामला नहीं है 

                                                           ऐसे लोगों की counseling भी मुश्किल होती है | जो ये सोचते हैं की ये हमारे बीच का झगडा है और हम सुलझा लेंगे | दरअसल दो लोग नहीं लड़ रहे होते हैं दो बिलीफ सिस्टम लड़ रहे होते हैं | वो बिलिफ सिस्टम जो बचपन में अपने परिवार की परवरिश द्वारा बनते हैं | इसीलिए पहले लोग परिवार पर बहुत ध्यान देते थे | आज के बच्चे खुद चयन करते हैं और सोचते हैं परिवार के सत्यह रहना तो है नहीं फिर उनपर ध्यान देने कसे क्या लाभ | लेकिन किसी भी व्यक्ति के स्वाभाव की जेड उसके परिवार में होती हैं | लतिका  के माता -पिता का रिश्ता बहुत प्यार भरा था | उसके पिता उसकी माँ को कभी ऊँचे स्वर में कुछ नहीं कहते थे | दीपेश के माता -पिता के झगडे के बीच दोनों के पुरखे भी तार दिए जाते थे | बाद में सॉरी -सॉरी से बात आई गयी हो जाती |


दीपेश  को लगता वो कुछ भी कह दे बाद में सॉरी से बात खत्म हो जायेगी पर लतिका के लिए एक -एक कडवा शब्द जिन्दगी भर का नासूर बन जाता | वो दीपेश से कटने लगती | दीपेश को ये नागवार गुज़रता |झगडा खिचता जाता | बात छोटी होती दूरियाँ बढती जा रहीं थीं | विवाह के बाद हम नए इंसान नहीं बन जाते ... हम अपने पिछले जिए जीवन का प्रोडक्ट होते हैं | बेहतर  है कि जब काउंसेलर बचपन के जीवन में जाए तो उसे रोकें नहीं , क्योंकि समस्या के बीज कई बार वहां होते हैं | ऐसे में उपरी तौर पर सब ठीक दिखने के बाद भी कुछ ठीक नहीं होता |

ये गांठे खोलने में समय लगता है | ये प्रक्रिया जल्दी खत्म हो इसके लिए अधीर लोग counseling बीच में ही छोड़ देते हैं और फिर वैसे ही लड़ -झगड़ कर अलग हो जाते हैं |


3) काउंसलर सब ठीक कर देगा 


                                       ये एक बहुत बड़ी गलती है जो अक्सर लोग करते हैं | ये वो लोग हैं  थेरेपिस्ट के ऑफिस में खुल कर बात करते हैं , एक दूसरे को सुनते हैं , गांठे खोलने की इजाजत भी देते हैं |उन्हें लगता है थेरेपिस्ट सब ठीक कर देगा | लेकिन ऐसा होता नहीं है | एक रिश्ता दो लोगों के बीच की आपसी समझदारी है जो सिर्फ थेरेपिस्ट के ऑफिस में दिखा  देने से काम नहीं चलेगा | असली शुरुआत तो घर आने के बाद है क्योंकि ये आपको करना है | यहाँ कोई दवाइयां नहीं है | सिर्फ सलाह है जिस पर चल कर खुद में और घर के वातावरण में सुधार करना है | वहां जहाँ थेरेपिस्ट नहीं है |


व्योम व् मेधा को लगता कि थेरेपिस्ट सब कुछ ठीक कर देगा | वो ६ महीने तक काउंसेलिंग सेशन लेते रहे ... पर घर में वो पूर्ववत ही रहे | ये कोई जादू  की छड़ी नहीं थी | यहाँ इच्छा और ईमानदार प्रयास की जरूरत थी | अफ़सोस उनके रिश्ते को थेरेपिस्ट व् थेरेपी भी नहीं बचा सकी |


                     अगर आप भी ये गलतियां कर रहे हैं तो इसका मतलब ये नहीं है कि ये रिश्ता टूटना ही टूटना है | कोशिश करिए ये गलतियां न करें | ये भी सही है कि शुरू में सब को लगता है की उनका रवैया सही है , पर धीरे -धीरे समझिये | खुद भी प्रयास करिए | एक खूबसूरत रिश्ते से बेहतर कुछ भी नहीं होता , और इसे बचाना आपकी प्राथमिकता होनी चाहिए |

वंदना बाजपेयी 
फाउंडर ऑफ़ अटूट बंधन .कॉम 

लेखिका



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Atoot bandhan

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2 comments so far,Add yours

  1. वंदना दी,रिश्तों को सहेजने के ये टिप्स जरूर सभी के बहुत काम आएंगे।

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    1. धन्यवाद ज्योति जी

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