रहौ कंत होशियार -सिनीवाली शर्मा जी की हंस पत्रिका में प्रकाशित कहानी है... प्रस्तुत है उसकी समीक्षा





अटूट बंधन की समीक्षा के कॉलम में जहाँ एक ओर हम आपको  नयी पुरानी किताबों  से परिचय करवाएंगे जहाँ आपको उनकी विस्तृत समीक्षा पढने को मिलेगी |  वहीँ आज कल विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं में छप रही उम्दा कहानियों से भी परिचय करवाएंगे | आज प्रस्तुत है  प्रस्तुत है ...........

रहौ कंत होशियार -सिनीवाली शर्मा


हंस फरवरी 2019 अंक में प्रकाशित सिनीवाली शर्मा की कहानी –रहो कंत  होशियार एक बेहतरीन कहानी है | सिनीवाली जी एक सशक्त कथाकार हैं , ये बात वो अपनी हर कहानी में सिद्ध करती चलती हैं | उनकी ज्यादातर कहानियाँ ग्रामीण जीवन के ऊपर हैं | गाँवों की समस्याएं , वहां की राजनीति और वहां की मिठास उनकी कहानियों में शब्दश : उतर आते हैं |

इस कहानी की खास बात है कि ये है कि ये प्रदूषण की समस्या पर आधारित है | आज हमारे शहरों की हवा तो इस कदर प्रदूषित हो चुकी है कि एक आम आदमी /औरत दिन भर में करीब दस सिगरेट के बराबर धुँआ पी लेता है , लेकिन गाँव अभी तक आम की बौर की खुशबु से महक रहे थे , लेकिन विकास के नाम पर स्वार्थ की लपलपाती जीभ तेजी से गाँवों  के इस प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ देने को तत्पर है | ऐसा ही एक गाँव है जहाँ की मिटटी उपजाऊ है | लोग आजीविका के लिए खेती करते हैं , अभी तक किसान धरती को अपनी माँ मानते रहे हैं , उसकी खूब सेवा करके बदले में जो मिल जाता है उससे संतुष्ट | उनके सपने छोटे हैं और आसमान बहुत पास | लेकिन शहरों की तरह वहां का समय भी करवट बदलता है | वो समय जब स्वार्थ प्रेम पर हावी होने लगता है |   


विकास के ठेकेदार बन कर रघुबंशी बाबू वहां आते हैं और ईट का भट्टा लगाने की सोचते हैं | इसके लिए उन्हें १५ -१६ बीघा जमीन एक स्थान पर चाहिए | वो गाँव वालों को लालच देते हैं की जिसके पास जितनी जमीन हो वो उसके हिसाब से वो उन्हें हर साल रूपये देंगे | बस उन्हें कागज़ पर अंगूठा लगाना है | ये जानते हुए भी कि भट्टे को गाँव यानि उपजाऊ मिटटी से कम से कम इतना दूर होना चाहिए , बीच गाँव में उनके भट्टा लगाने की मंशा पर सब अपनी आँखों पर पट्टी बाँध लेते हैं | 

समीक्षा -अनुभूतियों के दंश (लघुकथा संग्रह )

कहानी की शुरुआत ही तेजो और रासो की जमीन गिरवी रखने की बात से होती है |  तेजो इसका विरोध करता है | वो अपनी जमीन नहीं देता | वो बस इतना ही तो कर सकता है पर उसको दुःख है तो उपजाऊ मिटटी के लिए जो भट्टा लगाने से बंजर हो जायेगी | धरती के लिए उसका दर्द देखिये ...

 ओसारे पर बैठे –बैठे सोचता रहा | धरती के तरह –तरह के सौदागर होते हैं | वो सबका पेट तो भरती है पर सुलगाती अपनी ही देह है | कहीं छाती फाड़कर जान क्या –क्या निकाला जाता है तो कहीं देह जलाकर ईंट बनाया जाता है |

पर उसकी चिंता गाँव वालों की चिंता नहीं है | उनके सर पर तो पैसा सवार है | विकास के दूत रघुवंशी बाबू कहाँ से आये हैं इसकी भी कोई तहकीकात नहीं करता | बस एक उडी –उड़ी खबर है कि भागलपुर के पास उनकी ६ कट्टा जमीन है जिसका मूल्य करीब ४० -४५ लाख है | इतना बड़ा आदमी उनके गाँव में भट्टा लगाये सब इस सोच में ही मगन हैं |तेजो भी सबके कहने पर जाता तो है पर ऐन  अंगूठा लगाने के समय वो लौट आता है | इस बीच गाँव की राजनीति व् रघुवंशी बाबू को गाँव लाने का श्रेय   लेने की होड़ बहुत खूबसूरती से दर्शाई गयी है |  

जिन्होंने ग्राम्य जीवन का अनुभव किया है वो इन वाक्यों से खुद को जुड़ा हुआ महसूस करेंगे ......

“जिसको देना था, दे चुके !वे रघुवंशी बाबू की चरण धूलि को चन्नन बना कर माथे पर लगा चुके हैं | अपने कपड पर तो हम अपने खेत की माती ही लागयेंगे |

एक और किसान दयाल भी तेजो के साथ आ मिलता है | केवल उनदोनों  के खेत छोड़ कर सबने अपनी जमीन पैसों के लालच में दे दी | इसमें से कई पढ़े लिखे थे | पर स्वार्थ धरती माँ के स्नेह  पर हावी हो गया | इतना ही नहीं लोगों ने अपने पास रखा पैसा भी बेहतर ब्याज के लाच में रघुवंशी बाबू को दे दिया | मास्टर साहब ने रिटायरमेंट से मिलने वाले रुपये से आठ लाख लगाये , प्रोफ़ेसर साहब ने अपनी बचत से तीन लाख , किसी ने बेटे के दहेज़ का रुपया लगाया तो किसी ने पत्नी का जेवर बेंच कर रुपया लगाया


ब्याज के पैसों से आँखों  वालों की आँखों में सपने पलने लगे | किसी को नौकरिवाले दामाद की उम्मीद जगी , की छोटा किसान अपने बेटे को पढने के लिए कोटा भेजने के सपने देखने लगा |

भट्टा बन गया ... एग्रीमेंट में मिट्टी तीन –चार फुट तक काटने की बात थी पर वो सात –आठ फुट तक काट रहे थे | उपजाऊ जमीन बंजर बनायी जा रही थी | चिमनियाँ लग गयीं और  चिमनी धुआं छोड़ने लगी ..........

चिमनी का धुंआ आकाश से कालिया नाग की तरह धीरे –धीरे रेंग रहा है | यह जहर पहले अपने गाँव में फिर धीरे –धीरे अगल –बगल के गाँव में पसर रहा है | इस साँप का विख किसी दवाय –दारु , झाड़ –फूंक से नहीं उतरेगा |


दयाल का खेत बीच में पड़ता था , उसके जमीन ना देने से ड्राइवर को ईंट लड़ी ट्रक ले जाने में दिक्कत होती थी | पर वो विवश था | दयाल अपने खेत में नेनुआ तोड़ने में मगन था इसी बीच...  

 ड्राइवर व्  दयाल के झगड़े में कोई गाँव वाला दयाल का साथ नहीं देता कि कहीं रघुवंशी बाबू नाराज ना हो जाएँ | तेजो गाँव के विनाश के प्रतीक भट्टे  को बंद कराने का संकल्प लेता है | कोर्ट कचहरी का मामला मुश्किल तो था पर तेजो हार नहीं मानता | शुरू –शुरू में तो दयाल भी उसके साथ जाता है फिर अपनी पारिवारिक उलझनों के कारण नहीं जा पाता , पर तेजो हिम्मत नहीं हारता | हर बार रघुवंशी बाबू के लोग न्याय का मुट्ठी गर्म कर उसका मुंह  बंद करने में कामयाब हो जाते हैं | तेजो असहाय तो महसूस करता है पर हिम्मत नहीं हारता |

इसी बीच दो बड़ी बातें होती हैं ... एक तो ईमानदार कलेक्टर की नियुक्ति और दूसरी गाँव के घटना क्रम कुछ ऐसी तेजी से चलना कि लोगों को रघुवंशी बाबू पर शक होने लगता है | बड़े आदमी की बड़ी पोल खुलने पर गाँव वाले भट्टे में लगाये अपने पैसे के लिए चिंतित होते हैं |

पढ़ें -समीक्षा -भूख का पता (कहानी -मंजुला बिष्ट )

अंत की ओर बढती कहानी एक सकारात्मक मोड़ लेती है ...........परन्तु चिमनी का धुँआ और उसके द्वारा किया गया विनाश अभी भी गाँव की हवा में मौजूद है |


इस कहानी की खास बात है इसकी भाषा और शिल्प | इस कहानी में ग्रामीण जीवन अपने पूरे रंग में छाया है | तो एक तरफ जहाँ ये मन को सहलाती है वहीँ दूसरी ओर दिमाग को सोचने पर विवश करती है .... प्रदूष्ण जैसे गंभीर मुद्दे  के ऊपर | जिस विषय पर बहुत जरूरी है सोचना , क्योंकि हम जितनी भी तरक्की कर लें अगर उपजाऊ जमीन ही नहीं बचेगी , सांस लेने को हवा ही नहीं बचेगी .....तो इंसान ही नहीं बचेगा |


ये कहानी एक अंधाधुंध विकास के ऊपर असलियत का तमाचा है ... जिसको पढने के बाद पाठक भी अपने गाल पर हाथ रख कर ये सोचने को विवश होता है कि विकास विकास चिल्लाते हुए हम विनाश  की आहट  क्यों नहीं सुन पाते |

ऐसे विषय को उठाने व् उसके साथ गंभीरता से न्याय करने के लिए सिनीवाली शर्मा जी बधाई की पात्र हैं |


वंदना बाजपेयी 

यह कहानी आप यहाँ पढ़ सकते हैं -रहौ कंत होशियार


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Atoot bandhan

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2 comments so far,Add yours

  1. बहुत जीवंत समीक्षा!

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  2. अच्छी लगी आपकी समीक्षा ...
    पड़ने को प्रेरित करती है सभी को ...

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