Go Grey-बालों से नहीं व्यक्तित्व से होती है आपकी पहचान

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परिवर्तन शाश्वत है | समय के साथ बहुत कुछ बदलता है | कुछ परिवर्तन सकारात्मक होते हैं , कुछ नकारात्मक और कुछ में शुरू में पता ही नहीं चलता कि ये परिवर्तन सकारात्मक है या नकारात्मक परन्तु उसके दूरगामी परिणाम होते हैं | ऐसा  ही एक परिवर्तन बालों के रंग के साथ है | पहले एक उम्र के साथ जब बाल सफ़ेद (grey) हो जाते थे तो कोई उसे छुपाने की कोशिश नहीं करता था |  “ये बाल धूप में सफ़ेद नहीं किये हैं “कुछ दशक पहले ये ऐसा जुमला था  जो सफ़ेद बालों  में चमकते अनुभव के प्रति श्रद्धा  व् सम्मान उत्पन्न करता था | बालों का सफ़ेद होना मात्र उम्र का बढ़ना नहीं अनुभव का बढ़ना था | अनुभव सम्मान का विषय था ,परन्तु आज ” अरे आप की उम्र का पता ही नहीं चलता ” जुमला चलना में है | क्या इंसान की पहचान सिर्फ उसके बालों के रंग से है | 
बालों से नहीं आपके व्यक्तित्व से होती है आपकी पहचान

Go Grey-बालों से नहीं  व्यक्तित्व से होती है आपकी पहचान 

दिल्ली की अध्यापिका निकिता की कहानी उन्हीं की जुबानी … उस समय मेरी उम्र कोई सत्रह साल रही होगी , जब मैं आईने में अपना पहला सफ़ेद बाल देखा , और मैंने वही किया जो उस उम्र की कोई लड़की करती , मैंने कैची से उसे काट दिया और निश्चित हो कर कॉलेज चली गयी | मुझे नहीं पता था कि ये मेरी परेशानी का अंत नहीं शुरुआत है | मेरे सफ़ेद बाल  घास की खेत की तरह बढ़ने लगे |  हर सुबह सफ़ेद बालों का झुण्ड मुझे बेचैन कर देता | मैं उन्हें तब तक काटती रही जब तक ये संभव था | धीरे -धीरे इतने सारे सफ़ेद बालों को काटना असंभव होने लगा | मैंने अपनी समस्या अपनी माँ को बतायी | मुझसे ज्यादा परेशां मेरी माँ हो गयीं |  भारत में जहाँ आज भी सुन्दरता लड़कियों की शादी का पैमाना है वहां  मेरे बालों की सफेदी मेरी माँ के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गयी | वो मुझे उसे दिन ब्यूटी पार्लर ले गयीं |
मुझे आज भी ये याद है कि मुझे देख कर उस पार्लर की महिला ने चिंता व्यक्त की , ” अरे अभी इस उम्र से बूढी दिखने लगोगी तो  ?? मुझे लगा कि बालों का सफ़ेद होना बूढ़े होने का परिचायक है … बूढ़ा  मतलब सुंदर न होना , बेकार होना , जिसकी किसी को जरूरत नहीं है | मैं डर गयी | मैंने अपने बाल काले करवा  लिए | अब मैं समाज द्वारा स्वीकृत थी , पर मेरे मन में डर ने अपने पाँव फैला लिए थे बूढ़े होने के डर ने | अब मेरी जिन्दगी में एक काम सबसे जरूरी हो गया वो था बालों को काला करना | दुनिया इधर की उधर हो जाए पर नियत दिन पर मुझे बाल काले करने ही  हैं | 
                                  मेरी पढाई पूरी हुई , शादी हुई पर उम्रदराज़  दिखने का डर मेरे दिमाग में अभी भी था | तभी मेरा अपने पति के साथ अमेरिका जाना हुआ उस समय तक मेरी उम्र करीब ३५ साल की थी |वहां मैंने देखा कि नयी उम्र की लडकियाँ अपने बाल  ग्रे  करवा रहीं हैं | कुछ समय बाद भारत के अभिजात्य वर्ग में भी ये फैशन आया | मुझे अहसास होने लगा कि ये जिस काम के लिए पैसे खर्च कर रहीं हैं वो मुझे प्रकृति ने मुफ्त में दिए हैं | और फिर हिम्मत जूता कर मैंने “go grey ” का फैसला लिया | 
                          हालंकि भारत में ये फैसला इतना आसान नहीं है |  खासकर महिलाओं के लिए | फिर भी धीरे -धीरे लोग मुझे स्वीकार करने लगे , पर उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण ये है कि मैं खुद को स्वीकार करने लगी | 
                                                                जरा पीछे मुड़  के देखें तो एक समय था जब भारतीय महिलाएं अपने सफ़ेद बालों से परेशांन  नहीं होती थी | मुझे याद है कि जब मेरी माँ के बाल सफ़ेद हुए थे तो हम लोगों को चिंता करने की कोई बात नहीं लगी थी क्योंकि समाज में उनका सम्मान और बढ़ गया था , पर क्या आज मेरी बेटी ऐसा कर सकती है ? मुझे वो दौर याद है जब   टी वी पर एक विज्ञापन आता था  , जिसमें एक महिला के कुछ बाल सफ़ेद हो जाते हैं | तभी उसके पास एक बच्चा आता  है जो उसके सफ़ेद बालों  को देख कर उसे आंटी कहता है | महिला का ध्यान अपने बुढ़ापे की तरफ जाता है | वो हेयर डाई खरीद कर लाती है अपने बाल काले करती है | अगले दिन वही बच्चा उसके पास फिर आता है | उसके बालों को गौर से देखता है | फिर उसे दीदी कहता है | 
                           विज्ञापन  भले ही बालों को काला रंगने के ऊपर हो पर उसने पूरे समाज की मानसिकता को एक रंग में रंग दिया …. जहाँ युवा , ख़ूबसूरती , जोश और हिम्मती होने का पर्याय बन गया बालों का काला होना | गाँव और छोटे शहरों में भी हेयर डाई पहुँच गयी | रंगे  हुए बाल आत्मविश्वास का प्रतीक माने जाने लगे | परन्तु आज धारणाएं बदलना शुरू हो  रही हैं | कई सेलेब्रिटीज भी अपने ग्रे बालों के साथ सामने आये हैं | ” Me too ” मूवमेंट आत्म स्वीकारोक्ति के साथ हमारा ध्यान उन चीजों की और भी जाने लगा जो एक  social myth बन गयीं हैं | लोग उस के खिलाफ आने लगे हैं  और अपने को अपने वास्तविक रूप के साथ स्वीकार लिया जाना पसंद करने लगे हैं | 
मैं अपनी बेटी की माँ हूँ , न बड़ी बहन , न दादी 
                         बालों को रंगने के कई प्रोडक्ट बाज़ार में हैं ,   हर कोई अपने बाल रंगने में लगा है | महिलाएं इसमें आगे हैं | क्या 30 का हो , 50 साल का व्यक्ति हो या 70 साल का बालों की सफेदी किसी को स्वीकार नहीं | उम्र का बढ़ना स्वाभाविक है , परन्तु ये बढती हुई उम्र को छुपाने का दौर है | किसी को आंटी या अंकल कहलाना पसंद नहीं है | अक्सर लोग ये सुनना पसंद करते हैं कि आप तो अपनी बेटी की बड़ी बहन लगती है | उम्र से कम दिखना गलत नहीं है | परन्तु बेटी की बड़ी बहन दिखने की लालसा भी क्या सही है ?
 यहाँ तस्वीर का एक दूसरा रुख भी है | जब निकिता ने अपने बाल रंगना बंद किया तो लोग जो अभी तक कहते थे कि आप अपनी बेटी की बड़ी बहन लगतीं हैं वही प्रश्न करने लगे क्या आप इसकी ( उनकी बेटी ) की दादी हैं | ये प्रश्न एक बारगी आत्मविश्वास को डिगा देता है | हर बार ये हिम्मत रखनी पड़ती है कि मैं जिस उम्र की हूँ उसी उम्र की दिख रही हूँ ये साज की समस्या है मेरी नहीं , क्योंकि मैं अपनी बेटी की माँ हूँ न दादी न बड़ी बहन | 

महिलाओं पर है ज्यादा दवाब 

                                          ये सच है कि आज पुरुषों के ब्यूटी पार्लर भी खुल गए हैं और बड़ी संख्या में पुरुष भी अपने बाल रंगवा रहे हैं | फिर भी महिलाओं पर कम उम्र दिखने का दवाब ज्यादा है | पुरुष और स्त्री दोनों की उम्र बढती है पर पुरुषों के ग्रे बाल पर इतना ध्यान नहीं दिया जाता | वो समाज द्वारा स्वीकृत हैं पर स्त्रीयों की उम्र नहीं बढती , पर उन्हें  इतनी बार कहा जाता है कि वो सामाजिक दवाब में आकर बालों को रंगने लगती है | 
अनुजा चौहान जो एक लेखिका  है ने 49 साल की उम्र में अपने बालों को रंगना बंद कर दिया उन्होंने इसके लिए तर्क कि वो अपनी उम्र को स्वीकारते हुए वास्तव में खूबसूरत दिखना चाहती हैं | “
खुद को स्वीकार करना सिखाता है “Go Grey “
                                                    एक तरफ हम कहते हैं खुद से प्यार करो और एक तरफ अपनी असलियत को ही स्वीकार नहीं कर पाते | क्या हम अपने झूठे व्यक्तित्व से असली प्यार कर सकते हैं या हमें हमेशा डर लगा रहता है समाज द्वारा नकारे जाने का | सोशल मीडिया में अक्सर देखती हूँ लोग फोटोशोप करी हुई प्रोफाइल पिक लगाते हैं | ये कैसा झूठ हम पाल रहे हैं | हम खुद ” GOOD LOOKS” की तथाकथित परिभाषाओं के भ्रम में हैं | क्या किसी के व्यक्तिव की पहचान केवल उसके बाल या चेहरा -मोहरा है | अगर इसी में अटके रहे तो क्या व्यक्तित्व के अन्य गुणों को  निखारा जा सकता है | 

मजा तो तब है जब कोई मिले और कहे , ” आप तो अपनी प्रोफाइल पिक से भी ज्यादा खूबसूरत दिखती हैं “|

कई प्रोफेशनल्स भी आये हैं ग्रे बालों के साथ 

                                                      कई प्रोफेशनल्स जैसे डॉक्टर , इंजीनियर , टीचर्स  ने अपने बालों को रंगना बंद कर दिया है | वो अपने ग्रे बालों के साथ सामने आये हैं | इससे उनके प्रोफेशन में फायदा हुआ है | लोग उन्हें ज्यादा अनुभवी समझ कर उनकी राय को ज्यादा महत्व देने लगे हैं | उम्र का बढ़ना अनुभव का बढ़ना है | ये छुपाने की नहीं बताने की चीज है | हमारे प्रोफेशन के हिसाब से हमारे सौन्दर्य के मानक अलग क्यों हों ? क्या ये जरूरी है कि हम अपने प्रोफेशन में रहते हुए भी करीना कपूर जैसी फिगर के लिए लालायित रहे , जबकि उसका हमारे प्रोफेशन से सीधा -सीधा कोई ताल्लुक न हो |

                                 आप बाल काले रखना चाहती हैं या सफ़ेद ये केवल आपकी पसंद के ऊपर निर्भर हो न कि उस सोशल स्टिग्मा के ऊपर जहाँ काले बाल का अर्थ ज्यादा युवा या ज्यादा खूबसूरत होने से लगाया जाता है | अगर आप केवल अपनी उम्र छुपाने के लिए बाल काले कर रही हैं तो एक बार grey बालों के साथ सामने आइये आप देखेंगी कि आप का दिल कई गुना बोझ कम हो जाने से ज्यादा युवा महसूस करेगा |

वंदना बाजपेयी

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