अहसासों का स्वाद

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काका और काकी का झगडा कोई नयी बात नहीं है | काका अक्सर काकी के खाने
में कुछ न कुछ नुस्ख  निकाल देते | रोज़ का
वही नाटक ,” तुम कैसा खाना बनाती  हो इसमें
स्वाद नहीं है हमारी अम्मा तो ऐसा बनाती थी | क्या  स्वाद था | अंगुलियाँ चाट जाने को जी करता था | काकी
चुपचाप सुन कर सर झुका कर रसोई में आ जाती |मन ही मन सोंचती , बढती उम्र में सठिया
गए हैं | इतनी मेहनत के द भी प्रसंशा के दो शब्द नहीं फूटते मुँह से | फिर मन
मार कर काम में लग जातीं |  काकी ने आज बड़े
जतन  से आंवलें का मुरब्बा बनाया |काका ने
जुबान पर रखते ही कहा ,” ये कैसा बनाया है , इसमें तो स्वाद ही नहीं है | हमरी
अम्मा तो  ऐसे बनाती थी | सुनते ही काकी का
पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया | आज उनसे भी नहीं रहा गया | तपाक से बोलीं

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के हो गए हो अब न वो दांत हैं न वो आंत तो स्वाद वही कैसे रह जाएगा ?

                    क्या हम सब भी जब अपने अतीत
को याद करते हैं तो ये नहीं सोंचते की वो जमाना ही अच्छा था | वो तवा टनटनाता  हुआ चाट वाला , वो 5 पैसे की पांच संतरे की
फांकों जैसी टाफियां , वो प्याऊ पर मिली गुड की ढेली सब का स्वाद मुँह में अमृत सा
घोल देता है | अतीत को याद करते हुए हम इस बात को सिरे से खारिज कर देते हैं की वो
उम्र का स्वाद था , वो अपने और पराये में भेद न होने का स्वाद था , कौतुहल का
स्वाद था , आँखों में सपनों का स्वाद था | बढती उम्र के साथ अनुभव में शामिल हुआ
खट्टापन , तीखापन , कसैलापन हर स्वाद को बदल देता है |बाहरी तौर पर  अगर अब सब कुछ पहले जैसा भी हो जाए तो भी क्या
वैसा  महसूस होगा ?  क्योंकि बढती उम्र के साथ अहसासों का स्वाद बदल
चुका  है |

वंदना बाजपेयी 

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