आओ, हे भ्रमर! कमनीय कृष्ण-काति धर!!
देखो, जिस रूप, जिस रंग में खिले हैं हम।
आकुल किसी के अनुराग में अवनि पर;
इसी रूप-रंग में खिला हैं कोई और कहीं,
जाओ वहीं, मधुप! सुनाओ गूँज पल भर।
आचार्य राम चंद्र शुक्ल कि ये पंक्तियाँ… किसी नवीन पुष्प का भ्रमर को आहवाहन है कि देखो हमारी भी अप्रतिम सुंदरता को जिसकी तरह अन्यत्र कोई दूसरा नहीं हैl शायद ये पंक्तियाँ किसी रचनाकार की नवीन कृति पर भी सटीक बैठती हैंl अपने अनुभव की भाव भूमि पर जब वह किसी काव्य पुष्प की रचना करता है तो ये नितांत अलहदा होती हैl क्योंकि हर बार अनुभव करने का और उसे संप्रेषित करने का तरीका अलग होता हैl इसलिए एक ही कवि के अनुभव कोष से निकलते हर संग्रह की मूल संवेदना भले ही वही रहती हो परंतु जीवनानुभवों के जुड़ जाने से दृष्टि में अंतर स्पष्ट दृष्टि गोचर होता हैं।
छलांग मारती स्त्रियाँ- सचेतन स्त्री के आत्मबोध की कविताएँ
डॉ. वंदना गुप्ता के कविता संग्रह ‘छलांग मारती स्त्रियाँ’ से गुजरते हुए कुछ ऐसा ही अनुभव होता है। वैसे वे अपनी कविताओं से निरंतर स्त्री जीवन के विभिन्न आयामों को स्वर देती रही हैं। जहाँ पितृसता की जंजीरें हैं, स्त्री की पीड़ाएँ और स्त्री आकांक्षाओं का विस्तृत कैनवास है। ‘छलांग मारती स्त्रियों’ में वे एक कदम आगे बढ़कर एक सचेतन स्त्री के दृष्टिकोण से समस्त स्त्री विमर्श का आकलन करती हैं। साथ ही सचेत भी करती हैं कि स्त्री अब गूंगी गुड़िया नहीं रह गयी है बल्कि वह जाग गयी है। पितृसत्ता द्वारा निर्मित पिंजड़े को पहचान गयी है और शिक्षा, जिजीविषा, और आत्मबल से उसे खोलने का ताला भी खोज लाई है। वे संग्रह के आमुख में ही मुनादी करती हैं कि –
यह कोई किताब नहीं
स्त्री पीड़ा का इतिहास है जनाब!
इसे झेला है स्त्रियों ने
पीढ़ी-दर-पीढ़ी
अपनी पीठ पर
खोलिए इसे…
इसके हर पृष्ठ के पोरपोर से
जख्मों का टपकता
टटका लहू मिलेगा तुम्हें
और संघर्षपूर्ण जीवन की
चुनौतियों से
निखरने की वजह भी
यह एक कविता पूरे संग्रह की बानगी है। इस प्रकार वह स्वयं के कहे को तोड़ती मरोड़ती नहीं बल्कि उससे आगे की बात करती हैं। उसके बाद की कविताएँ क्रमबद्ध रूप से इसे रेखांकित करती जाती हैं। जहाँ दर्द है, पर बैठ के रोने के स्थान पर आगे बढ़ने का फ़ैसला भी । आजकल आमतौर स्त्री से संबंध रखने वाली रचना को स्त्री रुदन के खेमे में डाल दिया जाता है परंतु वंदना जी रुदन के स्थान पर आईना दिखाने का चयन करती हैं न सिर्फ पुरुष और पितृसत्ता को बल्कि स्त्री को भी।
मुझे आचार्य राम चंद्र शुक्ल अन्यत्र कहीं कविता के बारे में कही पंक्तियाँ पुनः याद आ रही हैं। जिसमें उन्होंने कहा था कि, “कविता ही मनुष्य के हृदय को स्वार्थ-सम्बन्धों के संकुचित मंडल से ऊपर उठाकर लोक-सामान्य भाव-भूमि पर ले जाती है जहाँ जगत् की नाना गतियों के मार्मिक स्वरूप का साक्षात्कार और शुद्ध अनुभूतियों का सञ्चार होता है। इस भूमि पर पहुँचे हुए मनुष्य को कुछ काल के लिए अपना पता नहीं रहता। वह अपनी सत्ता को लोकसत्ता में लीन किए रहता है। उसकी अनुभूति सब की अनुभूति होती है। या हो सकती है। इस अनुभूति-योग के अभ्यास से हमारे मनोविकारों का परिष्कार तथा शेष सृष्टि के साथ हमारे रागात्मक सम्बन्ध की रक्षा और निर्वाह होता है।“
इसके कथन के बरक्स जब वंदना गुप्ता जी कि कविताओं को देखती हूँ तो पाती हूँ कि उनकी कविताओं में व्यक्ति में समष्टि की बात समाहित है। उनकी कविताओं का ‘मैं” समस्त स्त्री जगत का ‘हम’ है। निजी अनुभवों से उपजी ये कविताएँ संसार की समस्त स्त्रियों के मन का आईना हैं।और पाठक को अपने हृदय के करीब महसूस होती हैं। लेकिन इस लकीर पर चलना तलवार की धार पर चलना है। स्वयं कवयित्री होने के नआते मेरा अनुभव रहा है कि कई बार स्त्री विषयक कविताएँ, “आज ऐसा कहाँ हो रहा है?” के आरोपों की शिकार हो जाती हैं। ऐसे में समझना होगा कि स्त्री विमर्श सघन वन की तरह हैं। जैसे एक वन में पेड़, पौधे झाड़ियाँ अलग-अलग लंबाई पर उग कर इ कोसिस्टम का स्ट्रेटा बनाते हैं। उसी तरह स्त्री विमर्श भी अलग-अलग स्तरों पर है। शहर की स्त्री अलग समस्याओं से जूझ रही है, गाँव की अलग। जाति वादी मानसिकता को ढोती स्त्री की समस्याएँ अलग हैं तो आदिवासी स्त्री की अलग। ऐसे में समग्र स्त्री विमर्श को एक छाते के अंदर लाने या उसके आधार पर दाखिल-खारिज का खेल खेलने के स्थान पर हमें प्रत्येक पृष्ठभूमि से उठते अनुभवों को स्वीकार्यता प्रदान करनी होगी। क्योंकि हर अनुभव में पितृसत्ता की जकड़ने एवं बेड़ियों को तोड़ने की कवायदें समां रूप से दृष्टिगोचर होती हैं। वंदना गुप्ता जी के संग्रह की स्त्रियाँ अधिकांशतः छोटे शहरों की मध्यम वर्गीय स्त्रियाँ हैं। अगर पाठक किसी खास चश्में के बिना कविताओं से गुजरेगा तो पाएगा कि एक- एक अनुभव किसी एक्स रे मशीन से गुजर कर पंक्तिबद्ध आकृति निर्मित कर रहा है।
सर्वभाषा प्रकाशन से प्रकाशित 108 पेज का यह संग्रह सर्वप्रथम अपने नाम और कवर पेज से आकर्षित करता है। आकर्षक रंग संयोजन में पिंजड़ा तोड़ कर निकलती एक स्त्री, जो अपने हिस्से के आसमान पर चमकते चाँद की ओर बढ़ चली है। यही उसका मन्तव्य है, गंतव्य है और छलांग भी। कवर पेज कई बार पाठक दुविधाग्रस्त हो जाता है कि, “छत्र को सराहे या सराहे छत्रपाल को”
संग्रह की इक खास बात यह भी है कि इसमें कवयित्री ने आत्मकथ्य जैसा कुछ नहीं दिया है। शुरुआत में आत्मकथ्य लेखक का पाठक से संवाद का सुंदर जरिया होता था। जिसमें बातचीत का सिरा संग्रह से इतर भी होता था। संग्रह के बारे में वह अपना विजन भर साझा करता था।लेकिन अंत के साथ इसमें परिवर्तन हुआ और लेखक आत्मकथ्य के नाम पर अपनी पुस्तक की समीक्षा उड़ेलने लगे। जो नैतिक दृष्टि से तो उचित नहीं ही है बल्कि पुस्तक पढ़ने का उत्साह ही ठंडा कर देता है। वंदना गुप्ता जी न केवल इस विडंबना से पाठक को बचाती हैं अपितु पुस्तक में शामिल वरिष्ठ साहित्यकार पूनम सिंह जी की जो अल्प भूमिका शामिल की है, वह भी पाठक को विजन मात्र से ही परिचय कराती है, समीक्षा से नहीं। एक स्थान पर पूनम सिंह जी लिखती हैं, “”छलांग मारती स्त्रियाँ” वंदना गुप्ता की नवीन काव्यकृति है। अपने ही आँवें की आँच में पकती ये कविताएँ स्वीकृत सामाजिक मान्यताओं के बरक्स एक आत्मचेतस स्त्री के आत्म को बचाने की जद्दोजहद है। इन कविताओं का कंटेन्ट रोजमर्रा की ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा है, ‘जहाँ लामबंद जंग की तैयारी है और दूसरी तरफ एक बड़ा खुला आसमान है।
संग्रह की करीब 71 कविताओं से गुजरते हुए मुझे भी ऐसा ही महसूस हुआ। मुझे यह भी लगा कि अद्धीयन की सुविधा के लिए कविताओं को तीन भागों में बाँटा जा सकता है। स्त्री पीड़ा और उसके आत्म-मंथन को उकेरती कवितायेँ, बोध के साथ संघर्ष के पथ पर आगे बढ़ती स्त्री की कविताएँ और आज के स्त्री विमर्श की स्थिति परिस्थिति।
स्त्री पीड़ा और उसके आत्म-मंथन को उकेरती कवितायेँ
पितृसत्ता की जंजीरों से जकड़ी स्त्री कभी देवी बनी कभी भोग्या लेकिन साधरण मानवी उसे समझा ही नहीं गया न ही वह सामान्य मानवी की तरह जीवन जी पाई। जब भी कभी स्त्री के कंठ से कविता फूटेगी तो उस स्वर को नकार नहीं जा सकेगा। फिर चाहे वे बौद्ध भिक्षुणियों की थेरी गाथाएँ हो, ललनद हों, मीरा या महादेवी। वंदना गुप्ता कि कविताओं में भी इतिहास से सताई जा रही उस स्त्री की छवि बार-बार उभर कर आती है। आखिर वर्तमान इतिहास की चाय से मुक्त कहाँ है। वे “स्त्रियों की सदी” में लिखती हैं-
“वह रात के कोने में
स्मृतियों की चादर ओढ़
भटकने लगती है इतिहास के गलियारों में”
एक अन्य कविता “प्रश्नचिन्ह” में वह राम को भी आड़े हाथों लेते हुए उनसे प्रश्न पूछती हुए लिखती है –
हे राम!
मेरी आस्था है तुम पर
पर जग भले ही तुम्हें
लोकनायक, महानायक
पुरुषोत्तम सत्य सनातन कहे
पर सीता की अग्नि परीक्षा
कहीं न कहीं
कटघरे में खड़ा करती है तुम्हें
‘दर्द का दैदिप्य” कविता बार-बार पढ़ने लायक है। इसमें स्त्री का वह दर्द समाहित है जो वह कह न सकी। उसे बस पितृसत्ता द्वारा खींची गई लकीर पर चलना था। जिसे वह अपना प्रारबद्ध मान बैठी थी। यहाँ कवयित्री स्त्री रुदन का हाहाकार न प्रदर्शित कर उसे रेगिस्तान के फूल के बिम्ब से सृजित करती है। एक अनुपम बिम्ब। यह स्त्री सृजनात्मकता का चरम बिंदु है,जहाँ प्रकृति और स्त्री एकमेव हो जाती हैं। जिनके मातम से रेगिस्तान में फूल खिलता है, जिसपर गिरती ऑस कि बूंदों से आस्थाएँ भीग जाती हैं। ये कहना अतिशयोनकती नहीं होगा कि ये आस्थाएँ ही कंडीशनिग के पिंजड़े हैं । यानि परिवर्तन की शुरुआत इतने हौले से इतनी शाइस्तगी से भी हो सकती है।

वंदना गुप्ता
एक कवि की सबसे बड़ी शक्ति होती है उसका ऑबजर्वेशन । वंदना गुप्ता की कुछ कविताएँ स्त्री जीवन के सूक्ष्म ओबजर्वेशन से चौंकाती हैं। उदाहरण के तौर पर कविता ‘हंसी की तहजीब” में देखिए –
खिलखिलाती स्त्रियाँ
दबा देती हैं दांत के पल्लू के पीछे
पीड़ा की चट्टान
आँखों में घिर आई बदली को भी
गटक लेती हैं
किसी कड़वे घूँट के मानिंद
हम अक्सर देखते हैं कि स्त्रियाँ हँसते समय दांत नहीं दिखती हैं। लोक में प्रचलित है कि स्त्रियों की खुलकर दांत दिखने वाली हंसी से घरों में महाभारत हो जाते हैं। ये अलग बात है कि द्रौपदी की हँसी की काल्पनिक कथा का महाभारत से कोई संबंध नहीं है। परंतु सदियों से पितृसत्ता द्वरा पढ़ाए पाठ को स्त्रियाँ अपने सिर पर ढोती रही हैं। ‘हँसी तो फँसी’ जैसी उक्तियाँ आज भी कायम हैं। लेकिन वंदना जी इन उक्तियों से अलग पल्लू को दांत में दबाकर हँसती हुई स्त्रियों को एक अलग ही रूप में देखती हैं। वे अपना दर्द छिपा रहीं हैं। स्त्रियों का पूरा अस्तित्व ही परिवार की खुशियों के आगे स्वयं को विलीन कर देने का है। इसी कविता में एक अन्य स्थान पर वे लिखती हैं-
“खिलखिलाती ये स्त्रियाँ
इस तरह बाँटती हैं हंसी की तहजीब
दूसरे होंठों को
और समेत लेतीं हैं गम औरों के दुआ बन
आँचल में अपने”
एक अन्य कविता “रुदालियाँ” में वे उन स्त्रियों के साथ खड़ी नजर आती हैं। जिनका काम ही बेगानों की मृत्यु पर चीत्कार भरा रुदन कर मृत्यु के शोक का माहौल बनाना है। लेकिन जो अपने सुख के समय भी अपने आँसू बेचती रहीं उन रूदालियों के दुख और कष्ट के समय कोई उनके साथ खड़ा नहीं होता। ये कविता बहुत देर तक पाठक के साथ बनी रहती है-
“वे शरीक नहीं हुए कभी
उनके आकांश दुख में भी”
कविता “वे जा रहीं हैं” एक आम स्त्री की व्यथा का अकरुण गान है। यहाँ वे श्रमिक स्त्रियों को चुनती हैं। जो दिन बहर की हद-तोड़ मेहनत के पश्चात घर लौट रहीं हैं। मुझे महादेवी वर्मा याद आती हैं जिन्होंने एक गाँव में स्त्रियों को अपने कौशल से आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रहने का मार्ग सुझाया था। पर क्या ये स्वप्न साकार हो सका? वंदना जी इसी कटु सत्य से पर्दा हटाती हैं। “स्त्रियाँ काम से लौटकर काम पर लौटती हैं। वे खाना बनाती हैं। पशु-पक्षियों को दाना-पानी देती हैं। बच्चों को खिलाती हैं और पति को संतुष्ट करती हैं। एक बंधी-बंदहै दिनचर्या में स्त्रियों के लिए अवकाश का कोई समय नहीं है।
बोध के साथ संघर्ष के पथ पर आगे बढ़ती स्त्री की कविताएँ
लेकिन समय बदला तो स्त्री ने भी नए युग की आहट को सुना। वो कौन सा समय होगा जब स्त्री अपने रुदन से आगे बढ़ी होगी। ज्ञान की किरण ने उसके अंधकार मय जीवन में प्रवेश कर चेतना को झकझोरा होगा और उसने युग परिवर्तनकारी अंगड़ाई ली होगी। उसने अतीत की कारा में बंद अपनी पुरखिनों के दर्द को सुना वह चली भी उसे पगडंडी पर, लेकिन उसके अंदर प्रश्न उठने लगे थे। ये प्रश्न समता समानता मूलक समाज की स्थापना की दिशा में आगे बढ़ने प्रारम्भिक काल था। अतीत और वर्तमान के अवगुंठन की अकुलाहटें इन कविताओं में प्रदर्शित होती हैं। मुझे इसी विषय पर लिखा अपना एक मुक्तक याद आता है-
अब तख्त चाहिए न मुझे ताज चाहिए
चलती हूँ नहीं पीछे से आवाज चाहिए
डरने की इंतहाँ हुई हिम्मत तभी जगी
पिंजड़े के परिंदों को बस परवाज चाहिए
वंदना गुप्ता जी “स्त्रीत्व का व्याकरण” में लिखती हैं-
“सुनो
तुम जो पहले रहे हो,
पुरानी पांडुलिपि की तरह मुझे
कविता कहानियों
कहानियों और उपन्यासों में करते रहे हो
मेरा वर्ण विन्यास
मैं वो नहीं
गर समझोगे मुझे
मेरा होना होकर

रुदन के बाद संघर्ष पथ पर आगे बढ़ना आसान नहीं होता। इसके लिए किसी अच्छी लड़की के स्वीकार्य ढांचे को तोड़ रूढ़ियों के विरुद्ध प्रश्न पूछने का साहस करना पड़ता है। अपरिचित मार्ग पर चल पड़ने का अंतरदवंद भी होता है और हर कदम साहस के साथ रखने का आत्मबल भी जुटाना होता है। वंदना जी ने स्त्री के इस अंतरदवंद, निश्चय, संघर्ष को बड़ी ही बारीकी से उकेरा है। इसे पहचानते हुए वे ‘बदलाव’ कविता में लिखती हैं-
“वह नहीं लिखती अब
अपनी बेबसी पर कोई कविता
बस किसी झील के
ठहरे हुए पानी में
एक पत्थर उछाल देती है”
मुझे ओशो का कथन याद आता है। जिसमें वे कहते हैं कि मैं उपदेश नहीं देता।मन नदी में एक कंकण फेंक देता हूँ। कितनी लहर बनेगी यह तुम जानो। स्त्री भी ऐसी ही वीतरागी हो गई है जो सफलताओं पर गर्व करने के स्थान पर बस एक बार आसमां की ओर देख लेती है, कोलाहल नहीं करती । हार जाने पर चुपचाप द आँसू टपका देती है। इसी कविता में वंदना जी लिखती हैं –
“भावनाओं के वेग पर
मन को मना लेती है
देखकर अपना चेहरा
आईने में एक बार”
वह बस मन झील के शांत जल में एक पत्थर फेंकती है और उसकी यात्रा एक लहर के बनने मिटने और दूसरी के बनने से पूरी होती है। ये कदम-कदम का संघर्ष है। पर हर बार इसकी प्रेरणा सप्रयास उसके आत्म से आती है।
मुझे माया एजिलों का कथन याद आता है कि, ‘स्त्रियों को हर काम करते हु ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है क्योंकि जब कोई स्त्री असफल होती है तो लोग ये नहीं कहते कि ये स्त्री सफल नहीं हुई है बल्कि ये कहते हैं कि स्त्रियाँ तो यह काम कर ही नहीं सकतीं।” कतिपय ये उनके संघर्ष को अधिक बढ़ा देता है। इस पथ पर जाते हुए स्त्रियाँ या तो काम शुरू करने के लिए छटपटाती रहती हैं या आधे रास्ते में लौट जाती है। अपनी कविता कुछ अलग करने की चाह में वे लिखती हैं-
“कुछ अलग करने की चाह में
हार मानना स्वीकार नहीं थ उसे
टैगोर के गीत ने
झटका उसकी शिराओं को”
जो स्त्रियाँ जीवन संघर्ष में स्वयं हार गई। बेड़ियों से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाई। उन्होंने अपनी बेटियों के लिए खड़े होकर परिवर्तन के बिगुल को थामा और बेटियों के मार्ग को सुगम करने का प्रयास किया। कविता ‘पदचिह्न’ में वंदना जी ने इसी को स्वर दिया है-
“ताकि बेटियाँ पा सकें
अपने मन मुताबिक
अपने सपनों का आकाश”
यहाँ पर प्रेम के नाम पर छली गई स्त्री को भी आगाह करती हैं। जैसा की कबीर दास जी लिखते है -या मार्ग साहिब मिले, प्रेम कहावे सोय” प्रेम तो ग्रोथ या वृद्धि का सूचक है। प्रेरित करने का सूचक है, न कि समूल नाश करने का। हालांकि स्त्रियाँ अभी भी “कबीर” फिल्म के नायक जैसे टाक्सिक प्रेम में पड़ रहीं हैं। लेकिन सचेतन स्त्रियाँ प्रेम के नाम पर शोषण के इन नाखूनी पंजों को समझ इसे अस्वीकार करने के अधिकार के प्रति जाग गई है। वंदना जी की कई कविताओं में सचेतन प्रेम का यह स्वरूप दिखा। कविता “सूर्यास्त के पहले” में वे लिखती हैं-
“नहीं होना किसी साजिश का शिकार
प्रेम में पड़कर तो कतई नहीं करना
अपने दायरे कुंद”
लेकिन मैं यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि उनकी कविताएँ प्रेम विरोधी नहीं हैं। वे विवेक सामंत सचेतन प्रेम के पक्ष में है। प्रेम के नाम पर शोषण और स्वयं को भूल जाने के पक्ष में वे कहीं खड़ी दिखाई नहीं देतीं।
वहीं वंदना गुप्ता जी स्त्री पीड़ा को उकेरने के लिए एक पात्र शरबतिया का निर्माण करती है। शरबतियाँ हम आप कोई भी स्त्री हो सकती है। उसकी पीड़ा हमारी पीड़ा है। ये एक नया और सुंदर प्रयोग है। मुझे लगा कि ऐसे किसी पात्र को लेकर पूरा संग्रह लाया जा सकता है।इसी शृंखला की कविता “घातक मंसूबे” में वह लिखती हैं-
“शरबतिया तुम कइसे निपटोगी
व्यवस्था के उन वाचाल ठेकेदारों की वाचालता से
जिनकी खुराफातें अंदर ही अंदर
खोद रहीं है तुम्हारी प्रतिभा की कब्र”
“प्रेम में पूरा करती हूँ उन्हें”, “कूबड़ का दर्द”, “लोक परंपरा की संवाहक”, ‘सदानीरा’ ‘पद्मिनी की आँखें” आदि कई उल्लेखनीय कवितायेँ हैं।
आज के स्त्री विमर्श की स्थिति परिस्थिति
युगों के संघर्ष बाद जब स्त्री के हाथ में स्वतंत्रता आई तो कुछ ने स्वच्छंदता की राह पकड़ ली। सिगरेट, शराब और उन्मुक्तता ने बराबरी के संघर्ष की दिशा ही मोड़ दी। स्त्री पितृसत्ता के विरोध के स्थान पर घर-परिवार और पुरुष विरोधी होने लगी। रूढ़ियों का विरोध मेरी मर्जी के नाम पर स्त्रियोचित गुणों का विरोध होने लगा। संतुलन डगमगाने लगा। वंदना जी की कलम ने इस भटके स्त्री विमर्श का भी बखूबी संज्ञान लिया है। दिन-रात खटती माँ के स्थान पर बच्चों को शिशु गृह में भेजती आज की माताओं को वे आड़े हाथों लेती हैं। कविता है “प्रोजेक्ट” की भाषा। वहीं अपनी भाषा, मिट्टी और संस्कृति से दूर हुए इन बच्चों को पुनः जोड़ने के लिए नानी-दादी एक पुल बन जाती हैं। मिले हुए थोड़े से समय में वह इए बड़ी तन्मयता और खूबसूरती से अंजाम देती हैं। “विरासत की कड़ियाँ” में वह लिखती हैं-
“वह जोड़ना चाहती हैं अपने बच्चों को
अपने देश की मिट्टी के सौंधेपन से, संस्कारों से
जो उसने विरासत में पाए हैं
उसे फिक्र है अपनी जड़ों की”
आज स्त्री विमर्श देह विमर्श बन गया है। स्त्री कामुकता का नृत्य संस्कारों को लील रहा है और परिवारों को भी और पिछड़े इलाकों की स्त्रियों के अधिकारों को भी। स्त्री विमर्श इतना गूँथा बुना है कि उन्मुक्त स्त्री को देखकर गाँव में शिक्षा के लिए संघर्ष करती स्त्री पर संकट आता है। समाज का प्रश्न होता है कि अगर तुम्हें पढ-लिख कर यही बन जाना है तो तुम ऐसे अनपढ़ ही ठीक हो। आदिकारों का दुरप्रयोग “सिस्टरहुड” की संकल्पना के भी विरुद्ध है। “स्त्री का अतीत वर्तमान और भविष्य” में वह बाजार के खेल और नग्न होती स्त्री के मन की थाह लेती हैं, आगाह करती हैं –
“लिखती हैं
भविष्य -वस्त्रों के मुक्त समय की नग्नता का स्त्री विमर्श
जानती है, समय के बदलने के साथ
बदल जाता है जीवन की पटकथा का नायक
पर नहीं बदलता, समाज के नजरिए की धुरी पर घूमता
स्त्री देह का व्याकरण”
साथ ही वे आज के पुरुष में विकसित हुई संवेदनात्मक स्त्री दृष्टि को भी चीन्हती हैं । तभी तो वे ‘आजाद लड़की’ जैसी दुर्लभ कविता लिख पाती हैं। जिसमें स्त्री जीवन की विडंबनाओं को एक सहयोगी, संवेदनशील पुरुष नजरिए से देखा गया है। ठीक दूसरी इस कविता में पितृसत्ता के विरोध में अपना आशय स्पष्ट कर देती हैं। यहाँ संवेदनशील पुरुष स्त्री के संघर्ष को देख रहा है। बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक फैलती जाती इसकी आकांक्षाओं की चादर और आसमां को छूने की ललक देख रहा है। देख रहा है नए लिबास में सपनों के नए रंग भरती स्त्री को। वे लिखती हैं-
मैं वर्षों से देख रहा हूँ
नींद में चलते हुए उस लड़की को
शहर में, कस्बे में, गाँव में
अपनी महत्वाकांक्षाओं की जद्दो-जहद में
उलझते-सुलझते”
अंत में यही कहूँगी कि सरल सहज भाषा और सुग्राह्य बिंबों से सजे इस संग्रह में वंदना गुप्ता ने पूर्वाग्रह रहित होकर स्त्री के कल आज और कल का मूल्यांकन किया है। जहाँ अतीत के रुदन से उपजे वर्तमान के संघर्ष पर संतोष करते हुए भविष्य के प्रति चेताया भी है। जैसा कि शीर्षक कविता “छलांग मारती स्त्रियाँ” में वे कहती हैं कि-
‘अपने दौर का विखंडित इतिहास बदलने की खातिर
बदलने तस्वीर वर्तमान में अपनी
और साबित करने की आने वाली सदी
स्त्रियों की सदी होगी”
वंदना बाजपेयी

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