जरूरी है असहमतियों से सहमत होना

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कभी – कभी प्रेम उन बातों
को नज़रंदाज़ करना भी है जो आपको पसंद नहीं हैं |
दो लोगों के मध्य रिश्ता
चाहें कोई भी क्यों न हो परन्तु वह रिश्ता बरक़रार तभी रहेगा जब वह असहमतियों से
सहमत होना सीख जायेंगे | दो लोग बिलकुल एक जैसा नहीं सोंच सकते | यह भिन्नता ही नए
– नए विचारों को जन्म देती है | नए विचार नयी संभावनाओं को | किसी भी मुद्दे पर जब
हम अपनी कोई बात रखते हैं तो अवश्य हमें वही बात ठीक लग रही होती है | मनोवैज्ञानिकों
की सुने तो जैसे ही हम किसी मुद्दे पर अपना कोई विचार बना लेते हैं

तो हमें उस
विचार से भावनात्मक लगाव हो जाता है | जिसको छोड़ना थोडा मुश्किल होता है | कुछ हद
तक हमें लगने लगता है की जिनसे हम बात करें वो हमारे विचार मानें | खासकर की जो
लोग हमारे करीब होते हैं कहीं न कहीं हम उनपर विचार थोपने लगते हैं | जैसे पति –
पत्नी  पर व् माँ बच्चों पर | दोस्त आपस
में एक दूसरे पर | कई बार ये इस हद तक हो जाता है की हम दूसरे को नीचा दिखने से भी
बाज़  नहीं आते |  परन्तु दूसरे पर अपने विचार थोपना उसकी  स्वतंत्रता छीनने के जैसा है | स्वाभाविक है उस
व्यक्ति से प्रेम करना मुश्किल है जो हमारा आकलन कर रहा हो | हम खुद चाहते हैं की
लोग हमें पूर्ण रूप से स्वीकार करे पर दूसरों को नकारते हैं | प्रेम का अभाव , ये
द्वंद ये कोलाहल तब तक चलता रहेगा जब तक हम असहमतियों से सहमत होना नहीं सीख
जायेंगे | मैं हूँ , तुम हो …. इसीलिये तो हम हैं

वंदना बाजपेयी 

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