प्रश्नकाल- किरण सिंह से रेखा भारती मिश्रा का संवाद

किरण सिंह जी से रेखा भारती मिश्रा का साक्षात्कार

ग्रृहणी अर्थात् ऐसी कार्यशक्ति जो परिवार और समाज में उच्च कोटि का अमूल्य योगदान देती है।  इसके लिए उसे ना तो कोई तय राशि मिलती है और ना प्रोत्साहन।  हां कई बार अवांछित उपहास और ताने जरूर मिल जाते हैं। बावजूद इसके लाभ-हानि के गणित में उलझे बिना एक ग्रृहणी सभी को प्यार और ममत्व देती रहती है और जब एक ग्रृहणी कलम थाम कर शब्दों की दुनिया में सक्रिय होती है तो वह वहां भी अपनी लेखनी से अपनी क्षमता का लोहा मनवाती है और समाज में अपने लेखन के माध्यम से स्नेह और ज्ञान लुटाती है।  साहित्य जगत में सक्रिय एक ऐसी ही विदुषी लेखिका हैं श्रीमती किरण सिंह जो एक ग्रृहणी का जीवन गुजारते हुए एक लेखिका बनी और साहित्य में अपनी ऊंचाइयों की तरफ अग्रसर हुईं। इनके ग्रृहणी से लेखिका बनने तक के सफर को जानने के लिए रेखा भारती मिश्रा ने उनसे एक साक्षात्कार लिया जिसे यहां प्रस्तुत किया जा रहा है।

१) प्रश्न:— आप कई विधाओं में लिखती हैं। पाठकों को तो आपकी हर विधा पसंद आती है लेकिन आपको किस विधा में लिखने में अधिक आनंद आता है।

उत्तर:— सच कहूँ तो मैंने मस्ती – मस्ती में ही लेखन की शुरुआत की और जो जी में आया वही लिखा इसलिये  मुझे प्रत्येक विधा में आनंद ही आता है। दोहे और कुण्डलिया तो मैं उठते-बैठते, चाय पीते – पीते बातों-बातों में ही लिख लेती हूँ । बाकी सरसी छंद, सार छंद, चौपाई छंद, गीत ग़ज़ल लिखने में भी अच्छा लगता है और लिख जाने पर बहुत ही सुकून मिलता है। लघुकथाएँ भी आराम से लिख लेती हूँ। कहानियों में मेहनत करनी पड़ती है और उपन्यास लिखना तो एक साधना है जो मैं अभी लिखते हुए अनुभव कर रही हूँ। हाँ बाल साहित्य में विशेष आनंद की अनुभूति होती है क्योंकि बच्चों के लिए लिखते समय हम बचपन में लौट जाते हैं और बच्चों का विषय भी आनन्दित करने वाला ही होता है। 

(२) प्रश्न:— एक साहित्यकार के रूप में अपने दायित्व और कर्तव्य को आप किस रूप में लेती है।

उत्तर :— कलम में बहुत ताकत होती है यह तो सिद्ध है। मैं मैथिली शरण गुप्त जी की इन पंक्तियों से बहुत प्रभावित हूँ – 

केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए। 

उसमे उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए।। 

और इस उक्ति पर भी पूर्ण विश्वास है कि जो काम तलवार से नहीं हो सकता वह कलम कर देती है। 

साहित्य एक साधना है और साहित्यकार एक साधक। साधना स्वयं से साक्षात्कार है। जब हमारा स्वयं से साक्षात्कार होता है तो आत्मशक्ति का भान होता है जिसका प्रयोग सच्चा साहित्यकार अपने लेखन के जरिये समाज के कल्याण के लिए करता है। फिर जो कार्य सामाजिक कल्याण के लिए किया जायेगा तो निश्चित ही सुख, शांति व तुष्टि की अनुभूति होगी। 

(३) प्रश्न:— पुराने लेखकों और वर्तमान के लेखकों में क्या अंतर या विशेषता पाती है।

उत्तर:— पुराने लेखकों में धैर्य, गम्भीरता, अपने अग्रजों के प्रति श्रद्धा, साहित्य के प्रति समर्पण की भावना है जबकि नये लेखकों में अधीरता, चंचलता, आत्ममुग्धता और सस्ती लोकप्रियता पाने की तमन्ना देखी जाती है। हाँ कुछ नये युवा साहित्यकार काफी प्रतिभा सम्पन्न हैं जिनमें गम्भीरता, धीरता तथा विनम्रता देखने को मिलती है इसलिये उनपर विश्वास है कि वे साहित्यिक धरोहर को सम्हालते हुए साहित्य निधि को और भी समृद्ध करेंगे। 

(४) प्रश्न:— जब आपने बाल साहित्य सृजन किया तो उसके बाद आपके लेखन से प्रेरित होकर कितनी नई रचनाकारों ने बाल साहित्य में लिखने की शुरुआत कर दी। इस संबंध में क्या कहना चाहेंगी।

उत्तर:— मैं इन पंक्तियों से से बहुत प्रभावित हूँ – 

“कोई चलता पदचिन्हों पर, कोई पदचिन्ह बनाता है….. 

फिर यदि आपसे प्रेरित होकर आपके पदचिन्हों पर कोई चले तो इससे अच्छी बात क्या हो सकती है। 

वैसे भी मैं अपने माता-पिता की पहली संतान तथा सास – ससुर की पहली बहु रही हूँ तो मायके और ससुराल में भी मुझसे छोटे मेरा अनुसरण करते आये हैं तो एक तरह से इन चीजों की आदत बचपन से ही पड़ी हुई है। फिर साहित्य जगत में वही सब मिलना काफी सुखद है। 

(५) प्रश्न:— एक गृहिणी से लेखिका तक के सफर को आप किस रूप में लेती हैं।

उत्तर:— मैंने अपने जीवन के हर किरदार को भरपूर जीया भी और निभाया भी। एक गृहणी के रूप में भी मुझे घर परिवार तथा समाज में काफी स्नेह व सम्मान मिला तो मैं काफी खुश थी। साहित्य जगत में मेरा पदार्पण तो एक सुखद संयोग है जो सुख, शांति व तुष्टि का आभास कराता है। 

(६) प्रश्न:— अन्य क्षेत्रों की तरह साहित्य में भी आगे बढ़ने की होड़ है। इसमें आप खुद को किस जगह पर पाती हैं।

उत्तर:—कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। 

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ 

गीता के इस श्लोक से भी मैं बहुत प्रभावित रही हूँ इसलिए मैं बिना फल की कामना के अपने कर्तव्यों का निर्वहन करती रही हूँ। हाँ लेकिन मेरा श्रम फलीभूत हुआ है और मुझे मेरे पाठकों से बहुत अधिक स्नेह मिला है इसलिए मुझे लगता है कि कर्मों का फल देर – सवेर मिलता तो जरूर है। 

मैंने स्वयं से साक्षात्कार कर लिया है इसलिए मैं अपने ही लय में चलती हूँ। कितनी दूरी तय कर पाउंगी वह समय तय करेगा । 

(७)प्रश्न:— आपके प्रशंसक आपको प्रेरित करने वाली लेखिका के रूप में देखते हैं। यह देखकर कैसा महसूस होता है।

उत्तर:—मुझे लगता है कि इससे बड़ा पुरस्कार किसी लेखक के लिए हो ही नहीं सकता । सच तो यह है कि प्रशंसकों की प्रेरक टिप्पणियों से मैं प्रेरित होती हूँ, मेरा लेखन सार्थक लगने लगता है और मन में संतुष्टि का आभास होता है और मेरी लेखनी उर्जान्वित हो कुछ और बेहतर लिखने के लिए मचल उठती है। कुल मिलाकर बहुत ही सुखद अनुभूति है यह। 

(८) प्रश्न:— लोग साहित्य से क्यों जुड़ें। इसकी क्या विशेषता है। इसकी महत्ता को स्पष्ट करें।

साहित्य एक साधना है और साधना में शक्ति। अतः साहित्य में समूचा ब्रम्हाण्ड विद्यमान है जहाँ से मानव को बहुत कुछ मिलता ही है। मैं तो कहूंगी कि जीवन की सार्थकता साहित्य में निहित है इसलिए साहित्य

 से सभी को जुड़ना चाहिये। 

(९) प्रश्न:— नए रचनाकारों को आप क्या कुछ संदेश देना चाहेंगी।

उत्तर:— नये रचनाकारों से यही कहना चाहूंगी कि वे हमारी साहित्यिक निधि के उत्तराधिकारी हैं इसलिए अपने पूर्वजों जानें, समझें और उनसे कुछ सीखें। इसके लिए उन्हें लेखन के साथ – साथ पढ़ना भी होगा । 

सभी रचनाकारों में कुछ अलग – अलग विशेषता होती है । रचनाकारों को चाहिए कि वे अपनी विशेषता को पहचान कर उस ओर विशेष ध्यान दें। 

सस्ती लोकप्रियता केे चक्कर में साहित्यक माफियाओं के चंगुल में न फँसे क्योंकि वहाँ आपका समय, श्रम और धन का व्यर्थ में अपव्यय होगा। 

और बाकी एक गीत के माध्यम से कहना चाहूंगी –

कवि तू धर्म निभाता चल

विश्व चमन का बनकर प्रहरी

आशा दीप जलाता चल

कवि तू धर्म निभाता चल

नीरसता  जग में भर जाये 

नीरवता से मन घबराये 

सुर सुमनो को चुन – चुनकर के 

छन्दबद्ध कर गाता चल

कवि तू धर्म निभाता चल

दिखे अकेला कोई पथ में। 

बनकर साथी जीवन रथ में 

लक्ष्य साधना उसे सिखाकर

राह सही दिखलाता चल 

कवि तू धर्म निभाता चल

जब जन जायें भूल नीतियाँ 

हुई दानवी मनः प्रवृत्तियाँ 

सदाचार का पाठ पढ़ाकर 

उन्हें नीति समझाता चल 

कवि तू धर्म निभाता चल

समक्ष रोगियों के वैद्य बन 

सहलाकर उनका दुखता मन 

छूकर मर्म सृजन कर कोई 

जन – जन को बहलाता चल 

कवि तू धर्म निभाता चल

शत्रु करे जब कभी आक्रमण 

शष्त्र उठाकर तू भी तत्क्षण 

बनकर योद्धा युद्ध भूमि में 

अपना शौर्य दिखाता चल 

कवि तू धर्म निभाता चल

प्रस्तुति -अटूट बंधन

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