आभा दुबे जी नारी मनोभावों को पढने में सिद्धहस्त हैं। बड़ी ही सहजता से वो एक शिक्षित नारी को परिभाषित करती हैं ,वो रो नहीं सकती चीख नहीं सकती घुटन अन्दर ही अन्दर दबाती है। ………क्योंकि जहीन औरतों को यही तालीम दी जाती है। नारी जीवन की कठोरता को ओ निराश लड़की में व्यक्त करती हैं। …… कहीं न कहीं आभा जी को पढना मुझे खुद को पढने जैसा लगा ,एक नारी को पढने जैसा लगा। वो अपने प्रयास में कितना सफल हो पाई हैं ,पढ़िए और जानिए
आभा दुबे की कवितायेँ
1….तालीम का सच….
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पढ़ी-लिखी सर्वगुणसंपन्न ,जहीन, घरेलू औरतें ,
रोतीं नहीं, आंसू नहीं बहातीं
बंद खिड़की दरवाजों के पीछे ,
अन्दर ही अन्दर घुटती हैं,
सिसकती हैं कि आवाज बाहर ना चली जाये कहीं,हाँ, सच तो है ,
ऐसी औरतें भी भला रोती हैं कहीं?
शेयर करती हैं सुबह की चाय सबके साथ…
ओढ़ के चौड़ी,नकली,मुस्कराहट,
बारी -बारी देखती हैं सबकी आँखों में खुद को ,
पढ़ ले ना कोई चेहरे से,
बंद कमरे की रात की कहानी,
डूबी रहती हैं अंदेशे में,
किसी ने चेहरे को पढ़ा तो नहीं?
अगर किसी ने पूछ लिया,
है ये माथे पे निशां कैसा ?
देंगी वही घिसा-पिटा जवाब ,
हंस के कहेंगी, ओह ये….!
रात वाशरूम में पांव स्लिप कर गया था ,
या…
सीढियां उतरते पैर फिसल गया था, …
अब कौन बताये इन्हें …
आये दिन, एक ही तरह के हादसे , होते हैं भला कहीं?
ऐसे ही मसलों से दो चार होती औरतें,
सोचती रहती हैं मन ही मन ,
अच्छा होता हम अनपढ़ और जाहिल ही रहतीं !
कम से कम बुक्का फाड़के , चिल्ला के, रो तो सकतीं थीं !
दिल तो हल्का हो जाता !
अपनी ही तालीम बोझ तो नहीं लगती…!
तालीम ही ऐसी मिली कि हर बात पे सोचो….लोग क्या कहेंगे
बड़े मसले होते हैं इन पढ़ी-लिखी, घरेलू, जहीन औरतों के पास ,
कुछ दिखाने के , कुछ छिपाने के,
पर करें भी क्या ?…..तालीम ही ऐसी मिली….!
2….देह …!
देह …!
__________
एक पिंजरा कितनी उड़ानों को कर सकता है कैद ?
एक ही घर में कितने लोग
होते हैं कितने आंसू ? उन आँखों के समंदर में ..?
3…..वो पागल …!
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उसके पास दिमाग नहीं है
याददाश्त भी कमजोर है
एक हद तक भूलने की बीमारी जैसा
वो तर्क नहीं करती
हाजिर रहती है , हर आवाज पर
हाथ बंधे, सर झुकाए आज भी,
बदले में तैयार रहता है एक संबोधन उसके लिए,
पागल …
सुना है, कि…
प्रेम से बोलने वाला , प्रेम में बोलनेवाला ,
सबसे खूबसूरत शब्द होता है ये–
पागल
पर पागलपन में ही सही
वो नहीं भूल पाती, अपने औरतपन को ,
हर हाल याद रहता है उसे
कि, प्रकृति को संतुलन प्रदान करती
और जीवों की तरह,
हाड़-मांस, रक्त-मज्जा, अस्थियों के मेल से
बनी है वो भी
उन्ही के जैसी भावनाओं से लदी-फदी
पर, जब वो मिलती है ,
नारी छवियों की आड़ में , छवियों को भंजाते-भुनाते, लोगों से,
खुद-जैसी ही छवियों की कैदी औरतों से ,
तब वो करती है स्त्री-विमर्श
जो बनती है सुर्खियाँ, अखबारों की
और मैं देखती हूँ ख़बरों में छाई हुई पागल के उम्दा पागलपन को,
मैं खुश होती हूँ
कि वो पागल,
औरत है और औरत ही रहेगी…
क्यूंकि उसके पास दिमाग नहीं है….!
4…..तलाश …..
निभाना है जिसे,
रहती सांसों तक….
5…..ओ ! निराश लड़की …
बहुत ही कम है तुममें ,
धैर्य और सहिष्णुता
और तुम पढ़ती हो
निराशा के क्षणों में ,
पाब्लो नरूदा की कविताएँ …
डर है मुझे …
कहीं फिर ना हो जाये
नरूदा, किसी, आत्महत्या का जिम्मेदार
क्यूंकि.तुम ….
पहले कविता पढ़ती हो
फिर शब्दों से सपने बुनती हो
बना देती हो कविता में सपनों की कहानी
ढूंढती हो एक ऐसा सच, जैसा तुम चाहती हो
जीने लगती हो पात्र बनकर
उन कविताओं के आसपास ही कहीं
बसा लेती हो एक मायावी संसार उनमें ही
अंत में उलझ जाती हो
हकीकत की कठोर धरातल और सपनों के सतरंगी मायाजाल में
नतीजा ….
आत्मसात कर लेती हो मृत्यु का सच
हार जाता है
कविताओं के बिम्ब से उभरे
रंगीन जीवन का दुह्स्वप्न ….
और जीत जाता है नरूदा
खुद के भावों को तुम्हारे मन से जोड़ने में
ऐ निराश लड़की ….
मत बुनो
मत ढूंढो
कविताओं के आसपास
जीवन और मृत्यु का ताना-बाना
कविताएँ बहुत ही कोमल, नर्म, मखमली हुआ करती हैं
और जीवन ?
कठोर
…..इसके रास्ते …. बहुत ही पथरीले …..

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