हम ऐसे समज में जीने के लिए अभिशप्त हैं जहाँ रिश्ते -नाते अपनत्व पीछे छूटते जा रहे हैं | इंसान में जो चीज सबसे पहले खत्म हो रही है वो है इंसानियत | इंसान बर्बर होता जा रहा है | आये दिन अखबारों के पन्ने ऐसी ही दर्दनाक खबरों से से भरे रहते हैं …जहाँ मानवता शर्मसार हो |ऐसे में कवि ह्रदय का व्याकुल होना स्वाभाविक है | ये कविता एक ऐसी ही घटना से व्याकुल हो कर लिखी गयी है जिसमें फरक्का एक्सप्रेस में एक महिला से उसका बच्चा छीन कर बाहर फेंक दिया गया | माँ की व्यथा का अंदाजा लगाया जा सकता है | ये कविता गिरते मानव मूल्यों के प्रति जागरूक कर रही है ….
अग्नि – पथ
वक्त यह ,सोचें-विचारें
बढ़ रही क्यों दूरियाँ?
चल पड़े हैं अग्नि-पथ पर
कौन सी मजबूरियाँ?
करुणा से दूरी बनाई
प्रेम-घट खाली किया
पोंछेगा किसके तू आँसू?
बन के बर्बर जो जिया
बढ़ती जाएँ दूरियाँ
कुटुम्ब और समाज से
पाठ जिनसे पढ़ते थे हम
नेह, प्रीति ,उजास के
बिखरते परिवार
रिश्ते टूटते अपनत्व के
अब सबक़ किससे पढ़ें ?
सहिष्णुता , समत्व के
उषा अवस्थी
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