जिन्दगी ढोवत हैं
शाम ढल जाना चाहती थी…,सूरज, सफेद से लाल हो चला था…एक बूढा भिश्ती अपनी पीठ पर दो पानी के मश्क …
शाम ढल जाना चाहती थी…,सूरज, सफेद से लाल हो चला था…एक बूढा भिश्ती अपनी पीठ पर दो पानी के मश्क …
कभी किसी खाली वक़्त में गौर से अपने आस पास के मज़हबी लोगों को देखिएगा….अजब हैरान परेशान से आत्मसंतोष का …
जेब में पड़ा आखिरी दस का नोट निकाल उसे बड़े गौर से निहार रहा था, ये सोचते हुए की अभी …