पोलिश

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विवेक ने मुस्कुराते हुए निधि कीआँखों पट्टी खोलते हुए कहा “देखिये मैडम अपना फ्लैट …. अपना ताजमहल , अपना घर … जो कुछ भी कहिये
निधि फ्लैट देख कर ख़ुशी से चिहुकने लगी “वाह विवेक ,कितना सुन्दर है पर ये क्या इतने आईने लगा दिए ,जगह -जगह पर क्यों ?
विवेक :ये तुम्हारे लिए हैं निधि
निधि :मेरे लिए (ओह ! माय गॉड ) चाहे जितने आईने लगवा लो अब इस उम्र में मैं ऐश्वर्या राय तो दिखने से रही (निधि हँसते हुए बोली )


विवेक: ये चेहरा देखने के लिए नहीं है ,ये तुम्हे समझाने के लिए हैं
निधि :(हँसते हुए )क्या समझाने के लिए ,रिफ्लेक्सन ऑफ़ लाइट ,इमेज फार्मेशन ,जितनी आगे ,उतनी पीछे , वर्चुअल ,लेटरली इनवर्टेड ,क्या विवेक ?
विवेक :इतना सब कुछ बता गयी पर वो पोलिश भूल गयी ,जिसके बाद ही शुरू होता है देखने ,दिखने का सिलसिला ……………. यही भूल जाती हो तुम हमेशा इसीलिए कभी देख नहीं पाती असली अक्स न अपना न किसी का …………..
निधि की आँखों में आंसूं आ गए …………… गुजरा वक्त सामने आकर खड़ा हो गया ……..एक पोलिश की ही तो कमी थी तभी तो हर किरण गुजरती रही आर पार ,एक सामान ,एक ही तरीके से ,जान ही नहीं पायी किसी का असली रूप ,असली प्रतिबिम्ब । आह ! आइना बनने के लिए पोलिश जरूरी है ,अन्यथा वो बस कांच का टुकड़ा रह जाता है 

वंदना बाजपेई 
(चित्र गूगल से )
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