श्राद्ध की पूड़ी एक मनोवैज्ञानिक कहानी


श्राद्ध की पूड़ी




श्राद्ध  पक्ष यानी अपने परिवार के बुजुर्गों के प्रति सम्मान प्रगट करने का समय | ये सम्मान जरूरी भी है और करना भी चाहिए | पर इसमें कई बार श्रद्धा के स्थान पर कई बार भय हावी हो जाता है | भय तब होता है जब जीवित माता -पिता की सेवा नहीं की हो | श्राद्ध पक्ष में श्रद्धा के साथ -साथ जो भय रहता है ये कहानी उसी पर है |

श्राद्ध की पूड़ी 



निराश-हताश बशेसरी  ने आसमान की ओर देखा | बादल आसमान में मढ़े  हुए थे | बरस नहीं रहे थे बस घुमड़ रहे थे | उसके मन के आसमान में भी तो ऐसे ही बादलों के बादल घुमड़ रहे थे , पर बरस नहीं रहे थे | विचारों को परे हटाकर उसने हमेशा की तरह लेटे -लेटे पहले धरती मैया के पैर छू कर,"घर -द्वार, परिवार  सबहीं की रक्षा करियो धरती मैया " कहते हुए  दाहिना पैर जमीन पर रखा | अम्मा ने ऐसा ही सिखाया था उसको | एक आदत सी बना ली है | पाँच -छ : बरस की रही होगी तब से धरती मैया के पाँव छू कर ही बिस्तरा छोड़ती है |


पर आज उठते समय चिंता की लकीरे उसके माथे पर साफ़ -साफ़ दिखाई दे रहीं थी | आज तो हनाय कर  ही रसोई चढ़ेगी | रामनाथ के बाबूजी का श्राद्ध जो है | पाँच  बरस हो गए उन्हें परलोक गए हुए |  पर एक खालीपन का अहसास आज भी रहता है | श्राद्ध पक्ष  लगते ही जैसे सुई से एक हुक सी  कलेजे में पिरो देता है | पिछले साल तक तो सारा परिवार मिल कर ही श्राद्ध करता था | पर अब तो बड़ी बहु अलग्ग रहने लगी है | कितना कोहराम मचा था तब | मझले गोविन्द से अपनी  बहन के ब्याह की जिद ठाने है | अब गोविन्द भी कोई नन्हा लला है जो उसकी हर कही माने | रहता भी कौन सा उसके नगीच है | सीमापुरी में रहता है | वहीँ डिराइवरी का काम मिला है | रोज तो मिलना होता नहीं | मेट्रो से आने -जाने में ही साठ रुपैया खर्चा हो जाता है | दिन भर की भाग -दौड़ सो अलग | ऐसे में कैसे समझाए | फिर आज -कल्ल के लरिका-बच्चा मानत हैं क्या बुजर्गन की | अब उसकी राजी नहीं है तो वो बुढ़िया क्या करे ? पर बहु को तो उसी में दोष नज़र आता है | जब जी आये सुना देती है | सात पुरखें तार देती है |


यूँ तो सास -बहु की बोलचाल बंद ही रहती है पर मामला श्राद्ध का है | मालिक की आत्मा को तकलीफ ना होवे ई कारण कल ही तो उसके द्वारे जा कर कह आई थी कि,  "कल रामनाथ के बाबूजी का श्राद्ध है , घरे आ जइयो, दो पूड़ी तुम भी डाल दियो तेल में | रामनाथ तो करिए ही पर रामधुन  बड़का है , श्राद्ध  कोई न्यारे -न्यारे थोड़ी ही करत है | आखिर बाबूजी कौरा तो सबको खिलाये रहे | पर बहु ने ना सुनी तो ना सुनी | घर आई सास को पानी को भी ना पूछा | मुँह लटका के बशेसरी अपने घर चली आई |


बशेसरी ने स्नान कर रसोई बनाना शुरू किया | खीर,  पूड़ी , दो तरह की तरकारी, पापड़ ...जब से वो और रामनाथ दुई जने रह गए हैं तब से कुछ ठीक से बना ही नहीं | एक टेम का बना कर दोनों टेम  का चला लेती है | हाँ रामनाथ की चढ़ती उम्र के कारण कभी चटपटा खाने का जी करता है तो ठेले पर खा लेता है | उसका तो खाने से जैसे जी ही रूसा गया है | खैर  विधि-विधान से रामनाथ के हाथों श्रद्ध कराया | पंडित को भी जिमाया | सुबह से दो बार रामधुन की बहु को भी टेर आई | पर वो नहीं आई |


इंतज़ार करते -करते भोर से साँझ हो आई | पोते-पोती के लिए मन में पीर उठने लगी | बाबा को कितना लाड़ करते थे | अब महतारी के आगे जुबान ना खोल पा रहे होंगे | बहुत देर उहापोह में रहने के बाद उसने फैसला कर लिया कि वो खुद ही दे आएगी  उनके घर | न्यारे हो गए तो क्या ? हैं तो इसी घर का हिस्सा |  बड़े-बड़े डोंगों में तरकारी और खीर भर ली | एक बड़े से थैले में पूरियाँ भर ली | खुद के लिए भी नहीं बचायी | रामनाथ तो सुबह खा ही चुका  था | लरिका -बच्चा खायेंगे | इसी में घर की नेमत है | दिन भर की प्रतीक्षारत आँखें बरस ही पड़ीं आखिरकार |


जाते -जाते सोचती जा रही थी कि कि बच्चों के हाथ में दस -दस रूपये भी धर देगी | खुश हो जायेंगे | दादी -दादी कह कर चिपट पड़ेंगे | जाकर दरवाजे के बाहर से ही आवाज लगायी, " रामधुन, लला , तनिक सुनो तो ..." रामधुन ने तो ना सुनी | बहु चंडी का रूप धर कर अवतरित हो गयी |

"काहे-काहे चिल्ला रही हो |"

" वो श्राद्ध की पूड़ी देने आये हैं |"

" ले जाओ, हम ना खइबे | लरिका-बच्चा भी न खइबे | बहु तो मानी  नहीं हमें | तभी तो हमारी बहिनी से गोविन्द का ब्याह नहीं कराय रही हो | अब जब तक हमरी  बहिनी ई घर में ना आ जाए हमहूँ कुछ ना खइबे तुम्हार घर का | ना श्राद्ध, न प्रशाद | कह कर दरवाजे के दोनों कपाट भेड़ लिए | बंद होते कपाटों से पहले उसने कोने में खड़े दोनों बच्चे देख लिए थे | महतारी के डर से आये नहीं | बुढ़िया की आँखें भर आयीं | पल्लू में सारी  लानते -मलालते समेटते हुए घर आ आई |


बहुत देर तक नींद ने उससे दूरी बनाये रखी | पुराने दिनों  की यादें सताती रहीं | क्या दिन थे वो जब मालिक का हुकुम चलता था | मजाल है कि बहु पलट कर कुछ कह सके | आज मालिक होते तो बहु की हिम्मत ना होती इतना  कहने की | सोचते -सोचते पलकें झपकी ही थीं कि किसी  द्वार खटखटाने की आवाज़ आने लगी | आँखें मलती हुई उठी तो सामे रामधुन खड़ा था |

" अम्मा, बाबूजी के श्राद्ध की पूड़ी दे दो, जल्दी |"

"ऐ टाइम पर ? का बात का भई है ?"उसने आश्चर्य से आँखें फाड़कर पूछा |

" बाबूजी ने तुम्हारी बहु को ऐंठ दिया है | श्राद्ध की पूड़ी नहीं ली ना उसने | कल शाम से ही पेट में ना जाने कैसी पीर हो रही है | ठीक होने का नाम नहीं ले रही है | अस्पताल में भर्ती है | कितनी तो जाँचे करा लीं | पर दर्द कम होने का नाम ही नहीं ले रहा | अधमरी हुई जा रही है | अभी तनिक होश आया तो पाँव पड़  कर बोली अम्मा से पूड़ी ले आओ | वर्ना बाबूजी हमें साथ ही ले चलिए |"कहकर रामधुन रूआसा ही गया |

" सोच का रही हो अम्मा, पूड़ी दो |"

बसेशरी घबरा गयी | "क्षमा करो मालिक, बहु से गलती हो गयी | क्षमा करो | अब कभी तुम्हार निरादर ना करिहै" आँखों में आँसू भर कर हाथ जोड़ -जोड़ कर वो थैले में पूड़ी भरने लगी  |
उसने पूड़ी थैले में लीं और बोली,  "हमहूँ चलिहैं |"

"ठीक है |" रामधुन ने सहमती जताई |


अस्पताल पहुँचते ही देखा कि बहु का दर्द से बुरा हाल है | अस्पताल के बिस्तर पर इधर -उधर करवट बदल रही है | बसेशरी और रामधुन को देख कर वहीँ से चिल्लाई , "अम्मा जल्दी पूड़ी दो | क्षमा करो हमका, बाबूजी ऐठे दे रहे हैं | "


बसेशरी ने पूड़ी निकाल कर दी | बहु झट-झट खाने लगी | चार कौरे में दो पूड़ी गटक गयी |  पानी पी कर लेटी  तो चेहरे पर शांति का भाव था |

थोड़ी देर में दर्द ऐसे गायब हुआ जिसे गधे के सर से सींग |

बसेशरी बहुत खुश थी | मालिक के द्वारा बहु को दंड देने से भी और पूड़ी खा कर बहु के ठीक हो जाने से भी | ख़ुशी के मारे बसेशरी डॉक्टर को बताने गयी | ताकि जल्दी से बहु को घर ले जा सके | जब जाकर डॉक्टर को अपने मालिक के द्वारा बहू को श्राद्ध की पूड़ी ना खाने पर ऐंठ देने की बात बताई तो डॉक्टर के चेहरे पर मुस्कान फ़ैल गयी |

"अम्मा, तुम्हारी बहु को भय का दर्द था | तभी सब रिपोर्ट नार्मल आ रहीं थी | उसे लग रहा था कि पूड़ी लौटा कर उसने कुछ गलत किया है | तभी उसके ससुर की आत्मा उसे दंड दे रही है | पूड़ी खा कर वहम दूर हुआ और दर्द भी दूर |"


डॉक्टर की बात सुन कर बसेशरी जैसे  आसमान से जमीन पर आ गयी |  इतनी देर में उसने क्या कुछ नहीं सोच लिया था | कैसे वो मालिक से बहु को ऐठा कर न्यारा चूल्हा , साझा करवा लेगी | कैसे बहु को अपनी बहिन के साथ गोविन्द की शादी से मन कर देगी | और भी ना जाने क्या -क्या |पर अब ...अब तो एक क्षण में उसका स्वप्न संसार  फिर से हिल गया |



 "डॉक्टर साहब बहु को ना बताइयेगा | " बसेशरी ने हाथ जोड़ कर कहा और बहु की तरफ चल दी |


बहु के बालों पर  हाथ फेर -फेर कर कहने लगी, " देखा अभी तो श्राद्ध की पूड़ी का निरादर करे पर बाबूजी छोड़ दिए हैं पर आइन्दा से निरादर ना करना , वर्ना ..."


वंदना बाजपेयी

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Atoot bandhan

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