फ्लाइट

जीवन में हम कितनी उड़ाने भरते हैं | सारी मेहनत दौड़ इन उड़ानों के लिए हैं | पर एक उड़ान निश्चित है …पर उस उड़ान का ख्याल हम कहाँ करते हैं | आइए पढ़ें वरिष्ठ लेखिका आशा  सिंह की समय के पीछे भागते एक माँ -बेटे की मार्मिक लघु कथा …

फ्लाइट 

मां,मेरी सुबह सात बजे थी फ्लाइट है-आशुतोष ने सूचना दी।

इतनी जल्दी- अंजलि हैरान हो गई।

मैं तो आपका पचहत्तरवां जन्मदिन मनाने आया था, साथ साथ लालकिले पर झंडा रोहण भी देख लिया।शाम को आपके साथ केक काट लिया।काम भी तोजरूरी है- पैंकिंग में लग गया

अंजलि ने गहरी सांस ली कहना चाहती थी, अभी तो जी भरकर तुम्हें देखा भी नहीं, पसंद का खाना भी नहीं खिला सकी,पर कंठ अवरुद्ध हो गया।बेटे को उच्चशिक्षा दी,और वह विदेश उड़ गया।अपना घर संसार भी बसा लिया।बेटे केआग्रह पर जाती,पर वहां तो अकेलापन और हावी हो जाता।सब अपने में व्यस्त,किसी के पास समय नहीं था।कुछ देर के लिए कोई पास बैठ जाता, रेगिस्तान में फूल खिल जाते।इतने बड़े बंगले से तो अपना मुम्बई का छोटा फ्लैटही अच्छा।सामने पार्क में कुछ वरिष्ठ लोग मिलते, बातें होती। घर आकर कामवाली बाई से चोंच लड़ती।एकाकी होने के कारण थोड़ी चिड़चिड़ी हो गई थी।

काश, यह रात कभी ख़तम न हो।कल सुबह आशु चला जायेगा, पुनः एकाकीपन का अंधेरा डसने लगेगा। चुपचाप बालकनी में कुर्सी पर बैठ गई।

सुबह आशु मां से विदा लेने आया, फ्लाइट पकड़नी थी,पर मां की फ्लाइट तो उड़ चुकी थी।

आशा सिंह

asha singh

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