कहते हैं साहित्य सोचसमझकर  रचा नहीं जा सकता  बल्कि जो मन के भावों को कागज़ पर आम भाषा में उकेर  दे वही साहित्य बन जाता है ...... कई नव रचनाकार अपनी कलम से अपने मनोभावों को शब्दों में बंधने का प्रयास कर रहे हैं ...... उन्हीं में से एक हैं अम्बरीश त्रिपाठी जो पेशे से सॉफ्टवेर इंजिनीयर हैं पर पर उनका  मन साहित्य में भी सामान रूप से रमता है | उन के शब्दों में उनके मासूम भाव जस के तस बिना किसी लाग लपेट के कागज़ पर उतरते हैं  .... और पाठक के ह्रदय को उद्वेलित करते हैं | अटूट बंधन का प्रयास है की नयी प्रतिभाओ को सामने लाया जाए इसी क्रम  में आज अटूट बंधन ब्लॉग पर पढ़िए ........ अम्बरीश त्रिपाठी की कवितायें 










आज थोडा परेशान हूँ मैं

आज थोड़ा परेशान हूँ मैं
कहीं अंधेरो मे निकलते हुए पाया
की अभी भी बाकी कहीं थोड़ा इंसान हूँ मैं

सुबह की दौड़ मे भागती कोई जान हूँ मैं
अपने ही बीते हुए कल की छोटी सी पहचान हूँ मैं
कभी अपनो के दिल मे बसा सम्मान हूँ मैं
तो कभी किसी का रूठा हुआ कोई अरमान हूँ मैं

देखता हूँ आज जब जिंदगी को मुड  के पीछे
तो पाता हूँ बस इतना
की कागज के टुकड़ो से बना कोई भगवान हूँ मैं

गिरता संभलता हाथो मे पड़ता
किसी भिक्षा मे दिया हुआ कोई दान हूँ मैं
कभी बच्चे की कटी पतंग के जैसे
आकाश मे लहराती कोई उड़ान हूँ मैं

खुदा को समझने मे बिता के पूरी ज़िंदगी
आख़िर मे है बस इतना पाया
की मस्जीदो मे गूँजती अज़ान हूँ मैं

पेडो से पत्तो से पौधो से उगते
कुछ महकते हुए फूलो की मुस्कान हूँ मैं
तारो सितारों के जहाँ से कई आगे
ब्रह्मांड मे चमकता कोई वरदान हूँ मैं

लिख के इतने अल्फ़ाज़ जो वापस मैं आया
तो पाया की वापस वीरान हूँ मैं






माँ 

जब भी उठता था सुबह,चाय ले के मेरे सामने होती थी
रात में मुझे खिला के खाना,सबको सुला के ही सोती थी
बीमार जो होता कभी मै,तो घंटो गीली पट्टियां मेरे सिर पे रखती थी
मेरी हर उलटी सीधी जिद को बढ़ चढ़ के पूरा करती थी
बचपन में स्कूल जाते वक़्त ,मै उससे लिपट के रोया करता था
रात को अँधेरे के डर से,उसके हाथ पे सिर रख के सोया करता था
छुट्टी के दिन भी कभी उसकी छुट्टी नही हो पाती थी
पूछ के हमसे मनपसंद खाना,फिरसे किचन में जुट जाती थी
सरिद्यों में हमे अपने संग धूप में बिठा लेती थी
अलग अलग रंग के स्वेटर हमारे लिए बुना करती थी
सुबह के नाश्ते से रात के दूध तक बस मेरी ही चिंता करती है
ऐसी है मेरी माँ,जो हर दुआ हर मंदिर में बस मेरी ख़ुशी माँगा करती है
कहने को बहुत दूर आ गया हूँ मै,पर हर वक्त उसका दुलार याद आता है
खाना तो महंगा खा लेता हूँ बाहर,पर उसके हाथ का दाल चावल याद आता है
घूम लिए है देश विदेश,पर उसके साथ सब्जी लेने जाना याद आता है
स्कूल से आ के बैग फेक के उसके गले लग जाना बहुत याद आता है
आज भी जब जाता हूँ घर,फिरसे मेरी पसंद के पराठे बना देती है
मेरे मैले कपड़ो को साफ़ करके ,फिरसे तहा देती है
जब जा रहा होता हूँ वापस,फिर से उसकी आंखे नम हो जाती है
सच कहता हूँ माँ ,अकेले में रो लेता हूँ पर मुझे भी तू बहुत याद आती है



सच को मैंने अब जाना है


एक फांस चुभी है यादो की , हर राह बची है आधी सी 
कुछ नज्मे है इन होठो पर,आवाज़ हुई है भरी सी 
सांसो में ये जो गर्मी है ,आँखों में ये जो पानी है 
है रूह भी मेरी उलझी सी,राहे भी मेरी वीरानी है 
इस चेहरे पे एक साया है,जो खुद से ही झुंझलाया है 
मुड़ के देखा है जब भी वो,कुछ सहमाया घबराया है 
फिर से उठना है मुझको अब,शायद फिर से कुछ पाना है 
एक आइना है साथ मेरे,बस खुद से नज़रे मिलाना है 
बचपन के कुछ चर्चे भी है,यौवन के कुछ पर्चे भी है
है साथ मेरे अब भी वो पल,कुछ मासूम से खर्चे भी है
कुछ सपने है इन पलकों पर,वो अपने है फिर फलको पर
दौलत ओहदे सब ढोंग ही है,जीवन चलते ही जाना है
खोजा है सच को मैंने जब,पाया है खुद को तब से अब
वो आज दिखा है आँखों में,उसको मैंने पहचाना है
अल्ला मौला सब एक ही है,ना राम रहीम में भेद कोई
जाती पाती में पड़ना क्या,ये मुद्दा ही बचकाना है
मंदिर मस्जिद जा कर भी तो,बस दौलत शोहरत मांगी है
जो दिया हाथ किसी बेबस को,तो खुद से क्या शर्माना है
कहता है ये 'साहिल' भी अब,कुछ देर हो गयी जगने में
जाने से पहले दुनिया में,एक हस्ती भी तो बनाना है




इतना कहूंगा दोस्तों तुम्हारे बिना आज भी रात नहीं होती


ये तो न सोचा था कभी कि इतना आगे आ जाऊंगा मै
सोच कर पुराने हसीँ लम्हे,अकेले में कहीं मुस्कुराऊंगा मै
याद आते है सारे पल उस शहर के,उनमे क्या फिरसे खो पाउँगा मै
वो छोटी से पटरी पे प्लास्टिक कि गाड़ी,अब न कभी उसे चला पाउँगा मै
वो गर्मी कि छुट्टी , वो भरी हुई मुठ्ठी 
वो पोस्टमैन का आना और गाँव कि कोई चिठ्ठी
मोहल्ले के साथी और क्रिकेट के झगड़े
वो बारिश के मौसम में कीचड वाले कपड़े
वो पापा का स्कूटर और दीदी कि वो गाड़ी
वो छोटे से मार्केट से माँ लेती थी साड़ी
भैया कि पुरानी किताबो में निशान लगे सवाल
वो होली कि हुडदंग  में उड़ता हुआ गुलाल
दीवाली के पटाखे और दशहरे के मेले
काश साथ मिल कर हम फिर से वो खेले
स्कूल के वो झगड़े और कॉलेज के वो लफड़े
वो ढाबे की चाय और लड़कियों के कपड़े
सेमेस्टर के पेपर और रातों की पढाई
आखिर का सवाल था बंदी किसने पटाई
हॉस्टल के किस्से और जवानियों के चर्चे
वो प्रक्टिकल में पाकेट में छुपाये हुए पर्चे
वो सिगरेट का धुआं और दारू की वो बस्ती
आज भी चल रही है उधर पे ये कश्ती
आज बात नही होती ,मुलाकात नही होती 
इतना कहूँगा दोस्तों ,तुम्हारे बिना आज भी रात नही होती





नापाक इंसान


यूँ ही नहीं कहते लोग मुश्किल है यहाँ इंसान बनना
दौलत तो मिल जाती है अब इंसानियत नहीं मिलती
हर साकी मे नाप लेता है मज़हब अपना इंसान
नशे के नुमाइन्दो का कोई ईमान नहीं होता
खुदा के इस जहाँ मे उसका ही एक अक्स बन बैठा है
आवारगी के चन्द लम्हो मे रइसत खोजता है
गुरूर तो इतना करता है अपनी शख्सियत पे तू नादान
मोहब्बत भी खुदसे करता है और इबादत भी खुदसे
इल्म होता है अपनी किस्मत का तब उसे जानिब


अम्बरीष त्रिपाठी

(सॉफ्टवेयर इंजीनियर ,बंगलौर )


उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर से आया एक साधारण सा इंसान हूँ |एक सॉफ़्टवेयर कंपनी मे कार्यरत हूँ पर खाली वक़्त मे अक्सर अपनी कलम से दिल की बात लिखने की कोशिश करता हूँ |
 यूँ तो ज़िंदगी मे खुश रहने के बहाने ढूँदने चाहिए पर अक्सर मेरी कलम मे गम की स्याही भरी होती है | शायद खुदा के बन्दो का दर्द बाँट सकूँ , यही एक कोशिश रहेगी |


अपने ही बनाए एक शेर से कुछ ब्यान कर सकता हूँ खुद को :-

मेरी नज्म गर ब्यान कर सकी मेरी पीर अगर 
मेरी कलम की वो आख़िर इंतेहाँ होगी 



(समस्त चित्र गूगल से ) 

अटूट बंधन ……… हमारा फेस बुक पेज 



Share To:

Atoot bandhan

Post A Comment:

11 comments so far,Add yours

  1. सभी कवितायें अच्छी हैं .... बधाई

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत बहुत धन्यवाद

      Delete
  2. संभावनाशील कवि .... अच्छी कवितायें

    ReplyDelete
    Replies
    1. हौसला आफ़ज़ाही के लिए शुक्रिया

      Delete
  3. माँ वाली कविता मन को छू गयी

    ReplyDelete
  4. bahut bhavpurn kavitao ke liye badhi

    ReplyDelete
  5. bahut sundar kavitaye man ko chhu jane wali ...

    ReplyDelete
  6. अम्बरीश जी ..माँ कविता ने मन द्रवित कर दिया ..कुछ नमी सी है आँखों में ....और शब्दों की सार्थकता इसी में है कि वो मन तक पहुँचें ..आपको बहुत -बहुत बधाई ....वंदना जी आपने अच्छी कविता साझा कीं आपका आभार !!

    ReplyDelete