डर (कहानी -रोचिका शर्मा )

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रीना एक
पढ़ी-लिखी एवं समझदार लड़की थी । जैसे ही उसके रिश्ते  की बातें घर में होने लगीं उसके मन में एक डर
घर करने लगा
, वह था ससुराल का डर। वह तो अरेंज्ड मॅरेज के नाम से पहले से ही डरती थी । फिर
भी कुँवारी तो नहीं रह सकती थी । दुनिया की प्रथा है विवाह ! निभानी तो पड़ेगी ।
यह सोच उसने अपने पिताजी को बता दिया कैसा लड़का चाहिए । फिर क्या था पिताजी
ढूँढने लगे पढ़ा-लिखा एवं खुले विचारों वाला लड़का । बड़ी लाडली थी वह अपने पिता
की । एक दिन लड़का व उसके परिवार वाले उसे देखने आए । गोरा रंग
,
सुन्दर कद-काठी एवं रहन-सहन देख लड़का तो जैसे उस पर मोहित
हो गया ।

और उसी समय रिश्ते के लिए हाँ कर दी । लड़के के माता-पिता ने भी अपने बेटे
की हाँ में हाँ मिला दी । फिर क्या था चट मँगनी पट ब्याह । हाँ विवाह में ज़रूर
रिश्तेदारों ने अपनी फ़रमाइशों व रीति-रिवाजों की आड़ में काफ़ी परेशान किया ।
रीना तो स्वयं रीति-रिवाजों और रिश्तेदारों से घिरी हुई थी सो उसे तो भनक भी न लगी
कि शादी में कोई मन-मुटाव हो गया है । जब विदाई का समय आया अपने पिता की लाडली
रीना ने एक आँसू न बहाया । सोचा उसके पिता को दुख पहुँचेगा और हंसते-हंसते विदा हो
गयी । ससुराल के रास्ते में ही उसके पति ने उसे शादी में हुए मन-मुटाव के बारे में
बताया । और समझाया कि रिश्तेदार नाराज़ हैं और हो सकता है उसे भला-बुरा कहें ।रीना
को अरेंज्ड मॅरेज में जिस बात से डर था वही हुआ ।



जैसे ही वह
ससुराल पहुँची सभी रिश्तेदारों की फौज  ने
उसे घेर लिया और फिर ससुराल की रस्में शुरू हो गयीं । बात
बेबात कोई न कोई रिश्तेदार उस पर व्यंग्य
करते और शादी की रस्मों को लेकर उस पर ताने मारते । ननद का तो मुँह पूरे समय फूला
ही रहता  । अब वह ससुराल में डरी-सहमी ही
रहती । सोचती पति न जाने कैसा होगा । फिर भी शायद माँ-पिताजी के दिए संस्कार थे या
डर जिनके कारण वह मुँह भी न खोलती । बार-बार उसे अपने पिता की याद आती । कई बार
आँखों से आँसू बह निकलते और वह सोचती क्यूँ किया विवाह
?
इससे तो वह अपने घर में ही भली थी । एक माह बीत गया,
सभी रिश्तेदार अपनेअपने घर जा चुके थे एवं ननद भी ससुराल जा चुकी थी । चुप-चापमूक
बन वह मुँह नीचे किए सारा घर का काम करती एवं कभी-कभी अकेले में अपने पिता को याद
कर रो लेती ।
शायद थकान के
कारण या इतने काम की आदत न होने के कारण उसकी तबीयत बिगड़ गयी व उसे जुकाम
,बुखार हो गया । पाँच -छह दिन में तो उसकी हालत बहुत खराब हो
गयी । डॉक्टर की दवा तो वह ले रही थी किंतु खाँसी थी कि ठीक होने का नाम ही नहीं
ले रही थी । सारा दिन एवं रात को वह खों-खों कर खाँसती रहती । तभी एक दिन उसके
ससुर जी आए और बोले बेटा यह लो मैं ने अदरक का रस निकाला हैं थोड़ा इसे पी लो
तुम्हारी खाँसी ठीक हो जाएगी । जैसे ही रीना ने ऊपर मुँह उठाया उसके ससुर उसे
प्यार से देख मुस्कुरा रहे थे । उस प्यार भरी मुस्कुराहट को देखते ही रीना की
आँखों में आँसू आ गये ।
उसे अपने पिता
की  ही छवि ससुर जी में नज़र आई ।उसने झुक
कर अपने ससुर के पैर छू लिए । ससुर ने उसे बोला बेटी मैं भी तुम्हारे पिता के समान
हूँ और बेटियाँ पैर नहीं छूती । मेरा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ है । आज से इस घर
में मैं ही तुम्हारा पिता हूँ
, तुम्हें कोई भी तकलीफ़ हो तो मुझे बताना । रीना की आँखों
में आँसू थे। उसे तो एक पिता का घर छोड़ते ही दूसरे घर में पिता मिल गये थे जिसकी
उसने सपने में भी कल्पना न की थी । आँख में आँसू फिर भी वह मुस्कुरा रही थी । और
वह डर हमेशा के लिए ख़त्म हो गया था ।
                        रोचिका शर्मा, चेन्नई
डाइरेक्टर,सूपर गॅन ट्रेडर अकॅडमी

                        (www.tradingsecret.com)

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5 COMMENTS

  1. हर बहू को ससुराल में ऐसे ही पिता की आवश्यकता है . समाज के लिए सुन्दर संदेश

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